शनिवार, 28 जुलाई 2012

विशुद्ध शाब्दिक पॉर्न, उन फिल्म निर्माताओं की ओर से जो दर्शकों को भेड़-बकरियां समझने लगे हैं

फिल्मः क्या सुपरकूल हैं हम
डायरेक्टरः सचिन यार्दी
कास्टः रितेश देशमुख, तुषार कपूर, नेहा शर्मा, साराह जेन डियेज, अनुपम खेर, चंकी पांडे
स्टारः जीरो, 0.0

गोवा के बीच पर ‘दोस्ताना’ के जॉन अब्राहम की तरह चड्डी नीचे करके पोज दे रहे आदी (तुषार) को देख पुलिसवाला पकड़ने दौड़ता है। बीच-बचाव करने आई सिमरन (नेहा) कहती है, “छोड़ दीजिए, ये तो मुझे पोज दे रहा था। ये देखिए मैं तस्वीर भी खींच रही थी”। तो पुलिसवाला जवाब देता है, “ठीक है मैडम, पर इसे बोलिए कि आगे ठीक से पोज दे, इस बीच पर बच्चे भी खेलते हैं”। राइटर-डायरेक्टर सचिन यार्दी ने फिल्म में तो ये इकलौता समझदार डायलॉग डाल दिया, पर खुद जरा भी ध्यान नहीं रखा। ‘ए’ सर्टिफिकेट मिलने के बावजूद इंडिया में ऐसी फिल्मों के आधे से ज्यादा दर्शक स्कूली बच्चे होते हैं। इस थियेटर में भी थे।

और फिर ‘क्या सुपरकूल हैं हम’ तो बेहद वाहियात और बेहूदा फिल्म है। न इसमें फिल्ममेकिंग की खूबसूरती है, न ही कहानी और न ही लगातार बना रहने वाला मनोरंजन। डबल मीनिंग डायलॉग्स की तमाम हदें टूटती हैं। फिर भी एक संतुष्ट करने वाली फिल्म नहीं बन पाती। किरदारों के नाम ऐसे रखे गए हैं कि गंदी गुंजाइश निकले। कुत्ते का नाम फकरू (भारत के पांचवें राष्ट्रपति फक़रुद्दीन अली अहमद थे) है। अनुपम खेर का किरदार ‘मार-लो’ (मार्लो) है। जिस कुतिया को उनकी मां बनाया गया है उसका नाम ‘रोज मेरी मार-लो’ (रोज़ मैरी मार्लो) है।

फिल्म हर लिहाज से डैरोगेटरी (अभद्र, अपमानजनक) है। तुषार का किरदार एक फेयरनेस क्रीम के टेलिब्रैंड एड में कहता है, ‘मैं पहले इतना काला था इतना काला था कि अफ्रीका के लोग भी मुझे कालिया कहकर चिढ़ाते थे’। फिल्म गे लोगों पर भी व्यंग्य करती है। मांओं पर पिताओं पर भी। देवदास, एक था टाइगर, रा. वन, नरगिस फकरी, डायना पेंटी, राधे मां और सोशलाइट परमेश्वर गोदरेज सब की हंसी उड़ती है। शुरुआती सीन में ‘गोलमाल’ वाले संदर्भ में रोहित शेट्टी को भी दिखाया गया है, वह पांच-सात डायलॉग भी बोलते हैं, पर सब बेतुका लगता है।

प्रॉड्यूसर्स (एकता-शोभा कपूर) द्वारा रोकड़ा कमाने के लिए इरादतन ‘अमेरिकन पाई’ के इंडियन वर्जन के तौर पर ये फिल्म बनाई गई है, जिसमें बार-बार प्लेबॉय मैगजीन नजर आती रहती है। जाहिर है उद्देश्य समझ आता है। फिल्म देखते वक्त लगता है कि मुझे 16 से 35 के बीच आयुवर्ग की कोई निर्जीव वस्तु, जिसे ये लोग टारगेट ऑडियंस कहते हैं, समझ लिया गया है। उसी के लिहाज से सबकुछ ठूस दिया गया है। मगर हम भेड़ें नहीं हैं और ये बात तमाम एकता कपूरों को जान लेनी चाहिए। फिल्म की स्क्रिप्ट लिखने वाले, डायलॉग लिखने वाले ने कुछ दिन लगाए होंगे, कुछ व्यस्क-पॉर्न चुटकुलों की किताबें (दस-दस रुपये में रेलवे स्टेशन और ट्रेन में मिलती हैं) पढ़ी होंगी और फिल्म की लेखनी तैयार कर ली होगी। मगर दर्शकों के लिए उनका ये शॉर्टकट, उनकी तारीफ करने की बाध्यता नहीं बनना चाहिए।

इस फिल्म को पूरा देखने से मन में ग्लानि और घृणा होने लगती है। मसलन, ये निकृष्टतम मसखरी के पल। जब एक कुतिया को अनुपम खेर के किरदार मारलो की मां बताया जाता है, और सिड का कुत्ता आकर उसके साथ संभोग करके चला जाता है, तो मारलो रुआंसा हो जाता है, कि तमाम नौकरों के सामने भरे गार्डन में उसकी मां की इज्जत लुट गई। ऐसे घटिया पलों में पृष्ठभूमि में सारंगी जैसा पवित्र साज बज रहा होता है। इस वाद्य यंत्र का इससे गंदा संदर्भात्मक इस्तेमाल मैंने नहीं देखा। ऐसी दो-तीन फिल्में और आ गईं तो सारंगी की आत्मा प्राण त्याग देगी। ये दिव्य यंत्र दिलों के तार झनझनाने के लिए है किसी शाब्दिक पॉर्न कॉमेडी में अपमानजनक साधन बनने के लिए नहीं।

क्या सुपरकूल हैं हम को मैं जिंदगी में न तो कभी दोबारा देखना चाहूंगा, न इसके बारे में सुनना चाहूंगा, ये हिंदी सिनेमा की सबसे अश्लील फिल्म है, मैं इसे जीरो स्टार देता हूं।

एक कुत्ता और दो कमीने: कहानी
सिड (रितेश देशमुख) एक स्ट्रगलिंग डीजे है और आदी (तुषार कपूर) स्ट्रगलिंग एक्टर। अपने कुत्ते फकरू के स्पर्म, ब्रीडिंग में यूज कर सिड का खर्चा चल रहा है तो आदी बवासीर तक के टेलिब्रैंड ऐड करता है। एक टैरो कार्ड रीडर आदी को कहती है कि ‘स’ (सिमरन, नेहा शर्मा) नाम से एक लड़की उसकी लाइफ में आएगी और वो बड़ा स्टार बनेगा। वहीं जिस अनु (साराह जेन डियेज) का एक पार्टी में सिड की गलती से वॉर्डरोब मालफंक्शन होता है और यूट्यूब वीडियो बनता है, उससे सिड को प्यार हो जाता है। फिल्म में नकली बाबा थ्रीजी (चंकी पांडे) और पागल हो चुके रईस मारलो (अनुपम खेर, अनु के पिता) भी हैं। कहानी के नाम पर घटनाओं की यही धक्का-मुक्की है।


द्विअर्थी होने की पराकाष्ठाः सवांद (ए)

1. आदीः यार सिड, अगर सिमरन मुझे फेसबुक पर मिल गई तो उसकी वॉल पर क्या लिखूं?
सिडः लिख, इस वॉल पर पिशाब करना मना है।

2. सिमरन को रिश्ते के लिए देखने आया लड़का जब पूछताः तुम्हारा फेवरेट सीरियल क्या है?
 सिमरन 'बड़े' पर स्ट्रेस डालते हुए कहती हैः मुझे बड़े, अच्छे लगते हैं।
वह पूछता हैः तुम्हारी फेवरेट फिल्म कौन सी है?
सिमरन कहती हैः मुझे ब्लू फिल्म पसंद है।
बाद में लड़का धीरे से अपने पापा को कहता हैः डैड मुझे लगता है कि इस लड़की के ख्वाब बहुत बड़े-बड़े हैं ... और आप लोग मुझे चिंटू यूं थोड़े ही बुलाते हैं।

3. आदी यूं ही बिना किसी संदर्भ में कहता हैः सुन मेरे दिमाग में एक सवाल खड़ा हुआ है।
सिड जवाब देता हैः आजकल तेरे केस में सिर्फ सवाल ही खड़ा होता है।

4. दोनों हीरो सड़क किनारे खड़ी कार के बोनट पर बैठे हैं।
सामने स्टेफ्री पैड्स का बड़ा सा एड होर्डिंग लगा है।
आदी कहता हैः क्या देख रहा है यार, ये लड़कियों के इस्तेमाल की चीज है।
सिड निराश स्वर मेः यार मैं सोच रहा हूं कि एक पैकेट खरीद ही लूं, मेरा भी बहुत बुरा पीरियड चल रहा है।
तो आदी का जवाब आता हैः दो खरीद...

5. पार्टी में मिली एक लड़की जान-पहचान करने के दौरान सिड को अपने पिता के बारे में बताती है कि वो आगरा में रहते हैं। सिड कहता हैः तुम्हारे पापा क्या आगरा में वायग्रा बेचते हैं।

6. वहीं पार्टी में खाने की स्टॉल पर मट्ठी हाथ में लेकर सिड कहता हैः ये मुट्ठियां मारने के काम आएंगी।

7. अपने डॉग को ब्रीडिंग के लिए डॉक्टर के क्लिनिक ले जा रहा है सिड और गा रहा हैः अब है चु... जुदाई का मौसम।

8. लेडी डॉक्टरः तुम सीडी क्यों लाए हो?
सिडः मैं इसे प्ले करता हूं तब मेरे कुत्ते का मूड बनता है।
लेडी डॉक्टरः आई डिड नॉट नो कि आजकल कुत्ते भी मूड्स का इस्तेमाल करते हैं!

9. लगातार कई कुत्तियों की ब्रीडिंग करने के बाद फकरु को गोद में लेकर सिड बैठा होता है।
डॉक्टर आकर बोलती हैः योर डॉग हैज गॉट लॉट ऑफ स्टाइल, कहना पड़ेगा
सिडः इट्स कॉल्ड डॉगी स्टाइल।
 बाद में: मुझे इस पर फक-र (फक्र) है।

10. खराब नसीब की जांच करवाने आदी एक टैरो कार्ड रीडर के पास बैठा है।
पहले वह कार्ड्स की गड्डी आगे बढ़ाती है तो आदी उठाकर तीन पत्ती खेलने लगता है।
बाद में वह टोकती है और पत्ते बिछाकर पत्ता उठाने को कहती है।
कार्ड देखकर वह उसे कहती हैः तुम्हारी जिदंगी में एक लड़की आएगी जिसका नाम एस शुरू होगा। उसके आने से तुम बहुत बड़े स्टार बनोगे।
आखिर में वह बोलता हैः न जाने कहां मिलेगी मुझे ऐसी लड़की विद एन ऐस (एस)।

11. टीवी चैनल पर मॉडल (साराह जैन डियेज) का वॉर्डरोब मालफंक्शन हो जाता है और यूट्यूब से लेकर नेट पर वीडियो वायरल हो जाता है। एक न्यूज चैनल खास प्रोग्रैम बनाता है और न्यूज एंकर प्रोग्रैम का नाम उच्चारता हैः मेरे दो अनमोल रतन। (इशारा मॉडल को वक्षों की तरफ होता है)

12. सिड डीजे है और डिस्क्स चलाता है, गाने बजाता है, पर वह जब भी कहीं जाता है कहता हैः मेरे पास हार्ड डिक्स (डिस्क) हैं।

13. आदी अपनी लेडी लव के बारे में सिड से कहता हैः सिमरन, कैसा यश चोपड़ा की फिल्मों की हीरोइन जैसा नाम है न, आजकल की हीरोइन की तरह नहीं, फकरी, पेंटी।

14. मारलो बने अनुपम खेर अपनी बेटी और उसकी सहेली से घर में आए बाबा के बारे में बता रहे हैं।
मारलोः पता है, सात साल एक पैर पर खड़े होकर तपस्या की है इस बाबा ने... 
उधर बाबा 3जी बने चंकी पांडे की तस्वीर दिखती है जिसमें उनके दोनों पैर और जमीन को नहीं छू रहे पर वह खड़े हैं, शरीर के बीच वाले हिस्से पर किसी चीज के सहारे।
इसके बाद चंकी कैमरे की तरफ देखकर बोलते हैः कौनसा पैर ये मत पूछना।

15. आगे एक और सीन में वह कहते हैः देकर उन्हें ये कुतिया, बनाया चू... अ अ भाग्यशाली।

16. गोवा में पार्टी कर रहे हैं सिड-आदी।
शराब के नशे में आदी कहता हैः इट्स गोवा गाइज, लेट्स पार्टी।
लिव लाइफ किंग साइज। स्मोकिंग, ड्रिंकिंग, फकिं...।
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गजेंद्र सिंह भाटी

मंगलवार, 24 जुलाई 2012

दिमागी और समाजी अंधेरों से गुजरकर उठता है डार्क नाइट, और ऐसे ही बनता है मास्कधारी बेन भी

फिल्मः द डार्क नाइट राइजेज
डायरेक्टरः क्रिस्टोफर नोलन
कास्टः क्रिस्टियान बेल, टॉम हार्डी, गैरी ओल्डमैन, ऐनी हैथवे, मैरियान कोटिलार्ड, जोसेफ गॉर्डन लुइट, माइकल केन, मॉर्गन फ्रीमैन
स्टारः साढ़े तीन, 3.5
सुझाव: फिल्म तकनीक और स्क्रिप्ट के लिहाज से बहुत अच्छी बनी है इसलिए दोस्त और नोलन फैन्स जरूर देख सकते हैं। बच्चों के लिए फिल्म देखना की उपलब्धि नहीं होगी। खौफनाक विलेन बेन से सम्मोहित होने से पहले जान लें कि ये रोल बड़े अच्छे व्यवहार वाले ब्रिटिश एक्टर-राइटर टॉम हार्डी ने निभाया है।
पिछली बार थियेटर में ऐसे भय का निर्माण कैथरीन बिगलो की ऑस्कर विनिंग फिल्म ‘द हर्ट लॉकर’ ने किया था। इस बार क्रिस्टोफर नोलन की ‘द डार्क नाइट राइजेज’ ने। दरअसल नोलन बैटमैन फ्रैंचाइजी में भय, दर्द, टेंशन, मंथन, अंधेरा, संकेत और अजब सी सीरियस स्टोरीटेलिंग लेकर आए हैं। पिछली फिल्म ‘द डार्क नाइट’ में उन्होंने हीथ लेजर के रूप में कपकपा देने वाला जोकर क्रिएट किया, इस बार का खौफ है बेन (टॉम हार्डी)। कहानी में बेन को रायज-अल-गुल (लियाम नीसन) ने ट्रेन किया है, जिसने बैटमैन को ट्रेनिंग दी थी। ये बात रौंगटे खड़े करती है यानी ये विलेन हमारे हीरो से ज्यादा तगड़ा है। खैर, हिंदी और अमेरिकी फिल्मों में ये शायद पहला विलेन है जो शरीर से भी बलवान है और दिमाग से चाणक्य (कम से कम कहानी में उसे दर्शाया तो यूं ही गया है)।

फिल्म में बेन को इंट्रोड्यूस करने वाला सीन देखिए। अमेरिकी एजेंसी सीआईए उसे हवाई जहाज में बंदी बनाकर ले जा रही है और पीछे से उसके आदमी उसके ही प्लैन के मुताबिक एक बड़ा यान लेकर आते हैं। उस हवाई जहाज को खिलौने की तरह आसमान में ही तोड़-मरोड़कर एक साइंटिस्ट को किडनैप कर ले जाते हैं। बेन की आवाज के साथ किया गया प्रयोग फिल्म की जान है। वह जब-जब बोलता है लोग उसे सुनना चाहते हैं, बावजूद इसके कि वह डराएगा।

इस बार कैटवूमन यानी सलीना कायेल (ऐनी हैथवे), ब्रूस के क्लीन एनर्जी प्लांट में इनवेस्ट करने की इच्छुक मिरांडा (मैरियन कोटिलार्ड) और यंग पुलिस पेट्रोल ऑफिसर ब्लेक (जोसेफ गॉर्डन लुइट, जो बाद में रॉबिन बनेंगे) की फिल्म में एंट्री हुई है। सब प्रभावित करते हैं। मिरांडा का किरदार हालांकि सबसे हल्का रहता है। क्रिस्टोफर नोलन और उनके भाई जोनाथन का लिखा स्क्रीनप्ले क्लाइमैक्स से जरा पहले तक रोचक बना रहता है। इमेज मेकिंग और इमोशंस से भरपूर। हांस जिमर का म्यूजिक जिक्र करने लायक है। गौर करेंगे तो हर सीन के पीछे का बैकग्राउंड म्यूजिक उस सीन के इमोशन को मीलों आगे ले जाता है।

इन सबके अलावा नोलन और एक्टर क्रिस्टियान बेल यहां भी ब्रूस उर्फ बैटमैन से सिर्फ उछाल-छलांग ही नहीं करवाते, उसे गहरी सोच और उलझन में डूबा दिखाते हैं। इस हीरो के दिमाग में छाया ये अंधेरा ही उसे डार्क नाइट (यौद्धा) बनाता है। एक और अच्छी बात ये है कि ‘द अमेजिंग स्पाइडरमैन’ की ही तरह इस फिल्म का बैटमैन भी ज्यादा ह्यूमन हुआ है। मौजूदा विश्व के ढेर सारे राजनीतिक मुद्दों और बहसों को भी क्रिस्टोफर नोलन की स्क्रिप्ट से जोड़कर देखा जा सकता है। उनकी फिल्म के शहर गॉथम और हमारे आसपास की घटनाओं में ढेर सारी समानताएं हैं।

जो तथ्य अच्छे लगे
  • ब्रूस के ताबूत पर एल्फ्रेड का रोना। ब्रिटिश एक्टर माइकल केन जबर्दस्त हैं।
  • मॉर्गन फ्रीमैन का फिल्म में होना राहत है। वह टफ सी फिल्म को आसान बनाते हैं। हालांकि रोल छोटा है।
  • ब्रूस यानी बैटमैन का दुनिया की सबसे गंदली जेल में कैद होना और बाद में आशावान होकर बाहर निकलना।
  • ब्लेक की बैटमैन में आस्था। वह बाकी दुनिया की तरहअपने हीरो को गलत नहीं समझता।
 
‘द डार्क नाइट’ के आठ साल बाद
गॉथम शहर में शांति है। ‘डेंट कानून’ सख्ताई से लागू करके कमिश्नर गॉर्डन (गैरी ओल्डमैन) ने अपराधियों को जेल में डाल दिया है। उधर आठ साल से बैटमैन और कारोबारी ब्रूस वेन (क्रिस्टियान बेल) अंडरग्राउंड हैं। ब्रूस की कंपनी वेन एंटरप्राइजेज ने स्वच्छ ऊर्जा में पैसे लगाए मगर बाद में प्रोजेक्ट बंद कर दिया ताकि बुरी ताकतें इससे परमाणु हथियार न बना लें। इससे कंपनी घाटे में जा रही है। बेन (टॉम हार्डी) नाम का खतरनाक मास्कधारी आतंकी शहर के नीचे अपनी आर्मी और हथियार बना रहा है। ब्रूस को जब पता लगता है तो गॉथम के लोगों की मदद करने वह एक बार फिर बैटमैन बनकर लौटने का मन बनाता है। मगर कैसे? दिमाग और शरीर से वह काफी कमजोर हो चुका है और बेन बेहद ताकतवर है। हालात खौफनाक होने वाले हैं।
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गजेंद्र सिंह भाटी

सोमवार, 23 जुलाई 2012

मेरे हंसने के लिए किसी की छाती को ब्लाउज क्यों होना पड़े!

फिल्मः बोल बच्चन
डायरेक्टरः रोहित शेट्टी
कास्टः अजय देवगन, अभिषेक बच्चन, प्राची देसाई, असिन, कृष्णा अभिषेक, अर्चना पूरण सिंह, असरानी, नीरज वोरा
स्टारः डेढ़, 1.5
सुझाव: दो-तीन एक्शन सीन के अलावा थियेटर जाकर देखने लायक कुछ नहीं। टीवी पर आने का इंतजार कर सकते हैं। फिल्म को डेढ़ स्टार भी इसलिए कि सिंगल स्क्रीन वाले दर्शक टेक्नीकल खामियों पर ध्यान नहीं देते हुए फिल्म को कुछ हद तक एंजॉय कर पाते हैं।

‘बोल बच्चन’ देखने के बाद आपका पूरा दिन खराब रहता है। न कॉमेडी सर्कस वाले कृष्णा की मसखरी हंसाती है, न अर्चना पूरण सिंह के होने का कोई फायदा होता है। देखकर लगता है कि इस फिल्म से दोनों का अभिनय दस कदम पीछे लुढ़क गया है। अजय देवगन की डायलॉग डिलीवरी और डांस इतना बुरा है कि आंखें फोड़ लेने को मन करता है। हालांकि गलत अंग्रेजी बोलने वाले उनके तमाम सीन्स में दर्शक हंसते हैं, मगर ‘माई चेस्ट हैज बिकम ब्लाउज’ जैसे घटिया जुमलों पर हंसने का मुझे कोई कारण नहीं नजर आता है। जो हर पल और भी घटिया होते जाते हैं। स्क्रिप्ट नाम की जो सबसे इज्जतदार चीज फिल्म में होती है, उसे इस फिल्म के मुहुर्त शॉट के दौरान ही दरबान के साथ बाहर बिठा दिया गया होगा। मसलन, पुरानी ‘गोलमाल’ में अमोल पालेकर के डबल रोल की तरह इस फिल्म में अभिषेक भी दो हमशक्ल भाई होने का नाटक करते हैं। पूरी फिल्म इसी के सहारे आगे बढ़ती है, मगर बहकी-बहकी सी, लगता है कि कहानी थी ही नहीं और रोज सेट्स पर ही सोच लिया जाता होगा कि आज ये कर लेते हैं।

फिल्म में असिन हैं, प्राची देसाई हैं... मगर उन्हें देखकर न नयनसुख होता है, न ब्रेनसुख। गानों में इधर-उधर वो जहां भी हैं, वहां अजय देवगन और अभिषेक ओवरटेक कर लेते हैं। प्राची देसाई का ‘रॉक ऑन’ में कितना सटीक संदर्भात्मक इस्तेमाल हुआ था, जैसा ‘गजनी’ में असिन का हुआ था।

इस फिल्म का सबसे मजबूत रिएक्शन दर्शकों की तरफ से तब आता है जब पहला बड़ा फाइट सीक्वेंस आता है। अजय की बहन प्राची को उसका चचेरा भाई ही उठा ले जाता है, इस दौरान अभिषेक और अजय के किरदार तमाम पहलवान सरीके बुरे लोगों की हवा में उछाल-उछालकर धुलाई करते हैं। चूंकि सारा एक्शन बड़ा पावरफुल और हैरतअंगेज होता है इसलिए ऑडी में पीछे बैठा लड़का दोस्त से कहता है ‘रोहित शेट्टी की फिल्म है भई...’ ऐसा वो इम्प्रेस होकर और इस फैक्ट को स्वीकारकर कह रहा होता है कि डायरेक्टर अगर रोहित शेट्टी है तो बेसिर-पैर का जादुई एक्शन तो होगा ही। दिक्कत क्या रही इस फिल्म में भी बड़ी खामियां वही हैं, जो होती हैं। स्क्रिप्ट पर मेहनत नहीं हुई। अजय देवगन से कॉमेडी नहीं होती। अभिषेक-कृष्णा से होती भी है तो डबिंग के दौरान उनकी आवाज और सीन का माहौल मैच नहीं करता। लगता है रोहित शेट्टी सीन्स को शानदार बनाने के लिए एक्टर्स से कड़ी मेहनत नहीं करवा पाए। रहा-सहा भट्टा बिठा दिया एडिटिंग ने। फिल्म की प्रस्तुति बेजान है तो इसी वजह से।

भोला पृथ्वीराज और गोलमाल अब्बास: कहानी
दिल्ली के करोलबाग में अपनी बहन सानिया (असिन) के साथ रहता है अब्बास अली (अभिषेक बच्चन)। प्रॉपर्टी केस हार जाने और नौकरी खो देने के बाद उनके शास्त्री चाचा सुझाते हैं कि राजस्थान में उनके गांव रणकपुर चले चलो, वहां काम जरूर मिलेगा। यहां के बड़े आदमी हैं पृथ्वीराज रघुवंशी (अजय देवगन), जो बेहद गुस्सैल, मगर भले दिल के हैं। अब्बास को काम तो मिल जाता है पर किन्हीं वजहों से उसे झूठ बोलना पड़ता है कि उसका एक हमशक्ल जुड़वा भाई भी है। ये एक झूठ अब्बास से हजार झूठ बुलवाता है, जाहिर है झूठ से सख्त नफरत करने वाला रघुवंशी जब जानेगा तो इनका क्या हाल करेगा।
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गजेंद्र सिंह भाटी

शनिवार, 21 जुलाई 2012

जेम्स होमर की तरह आपके बच्चे भी क्या बैटमैन सीरिज के 'जोकर' और 'बेन' से प्रेरित नहीं होते होंगे!

फिल्मों के समाज पर असर से जुड़े पूर्व लेख यहां, यहां और यहां पढ़ सकते हैं,
(कॉलम सीरियसली सिनेमा से)
Bane (played by Tom Hardy) in 'The Dark Knight Rises'


James Holmer in two different pictures
डेनवर, कॉलोराडो (अमेरिका) के थियेटर में एक मास्कधारी लड़के की गोलीबारी से 12 लोगों की मौत और 50 से ज्यादा के घायल होने की घटना एक बार फिर फिल्मों में हिंसा के ग्लैमराइज्ड चित्रण के सोशल असर को सामने लाती है। इस घटना के दौरान ‘द डार्क नाइट राइजेज’ का प्रीमियर चल रहा था। अमेरिका के हर शहर में शो हाउसफुल चल रहे थे। यानी प्रमोशनल गतिविधियों के बाद फिल्म का ग्लैमर युवा दर्शकों के सिर चढ़कर बोल रहा था। क्रिस्टोफर नोलन ने बैटमैन सीरीज की अपनी तीसरी फिल्म ‘द डार्क नाइट राइजेज’ को भी इतने अद्भुत तरीके से डायरेक्ट किया है कि दुनिया का कोई भी दर्शक सम्मोहित हो जाए। हालांकि सुपरहीरो बैटमैन हथियारों का इस्तेमाल नहीं करता, मगर उनकी फिल्मों के विलेन की हिंसक इमेज हांस जिमर के म्यूजिक की तरह भव्य और विराट होती जाती है। आसपास की मुश्किलों और नैराश्य को देखते हुए एक औसत दर्शक भी वैसा ही सबको डरा देने वाला विलेन कहीं न कहीं बनना चाहता है।

Heath ledger as Joker in 'The Dark Knight'
 और दुर्योग देखिए, डेनवर का 24 साल का हमलावर लड़का जेम्स होमर फिल्म के विलेन ‘बेन’ जैसे खौफनाक अंदाज में प्रस्तुत होना चाहता था। उसके लिए कॉलोराडो और डेनवर ‘गॉथम सिटी’ बन गए थे। वहां के पुलिस कमिश्नर रेमंड कैली की मानें तो जेम्स होमर खुद को बैटमैन का दुश्मन ‘जोकर’ (नोलन की पिछली फिल्म ‘द डार्क नाइट’ में हीथ लेजर ने जोकर का किरदार निभाया था, इस उलझे-नकारात्मक किरदार को निभाते-निभाते ही कहा जाता है कि हीथ इतने मानसिक अवसाद में आ गए थे कि नशे की ओवरडोज से एक होटल में उनकी मौत हो गई, फिल्म की रिलीज से पहले। जोकर के रूप में हीथ के अभिनय को अब कल्ट माना जाता है।) कहकर संबोधित कर रहा था। कैली के मुताबिक उसने अपने बाल भी लाल रंग में रंगे हुए थे।

विश्व में जितने भी कमर्शियल फिल्में बनाने वाले निर्देशक हैं उनसे कभी भी पूछा जाए तो वो सीधे तौर पर फिल्मों के समाज पर असर को खारिज कर देते हैं। अगर वो सही हैं तो डेनवर, कॉलोराडो में हुई ये घटना क्या है? असल बात ये है कि किसी फिल्ममेकर ने कभी इस बात की परवाह नहीं की कि वह जाने कि उनकी फिल्मों का समाज के अलग आयुवर्ग और मनस्थिति वाले लोगों-बच्चों पर क्या असर होता है? अगर नहीं होता तो बड़ी फ्रैंचाइजी वाले अपनी फिल्मों की मर्चेंडाइज क्यों बाजार में उतारते? ‘कृष’ के दौरान राकेश रोशन और उनके फिल्म निर्माण सहयोगियों ने ऋतिक रोशन के पहले सुपरहीरो इंडियन कैरेक्टर की मर्चेंडाइज उतारी। ऐसा ही ‘रा.वन’ के वक्त शाहरुख खान ने किया। अनुराग कश्यप ने ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ के बारे में कह तो दिया कि जो होता है वह ही दिखाते हैं, पर बात इतनी ही तो नहीं है? देखादेखी भी तो लोग स्टाइल मारते हैं। मसलन, ‘कुंवारी हो... सादी नहीं हुई’ सरदार खान का ये संवाद सुनने में हजारों दर्शकों को बड़ा ही अनूठा लगता हो, और दोस्त लोग आपस में बोलना भी शुरू कर देते हैं, पर ये एक ग्लैमराइज्ड असर तो हुआ न। अगर ये दिखता असर है तो बहुत से अनदिखते असर भी तो होंगे न? क्या ये हत्यारा किरदार इस तरह से दर्शकों की घृणा का कारण बनने की बजाय उनका प्यारा नहीं हो गया?

अगर आपको याद हो तो पिछले साल इसी तरह नॉर्वे नरसंहार करने वाला आंद्रे बेरविंग भी घटना को अंजाम देने से पहले समाज से कटकर अलग ही जहनियत वाला हो चुका था गया था, जाहिर है उसपर भी कई असर रहे होंगे। ‘फॉलिंग डाउन’, ‘टैक्सी ड्राइवर’ और ‘होबो विद शॉटगन’ जैसी फिल्मों के मुख्य किरदार भी ऐसे ही हैं। ये फिल्में ऐसे अपराधियों के बनने की वजहों पर रोशनी डालती हैं।

आज ऐसे वक्त में जब दुनिया भर का समाज धीरे-धीरे एक-दूसरे से कट रहा है, जब बच्चे और युवा आसानी से फिल्मों की कहानियों को असल मानकर जीना चाहते हैं, ‘डेनवर थियेटर’ जैसी घटनाएं होती हैं। अमेरिका में ज्यादातर सुपरमार्केट में एक चॉकलेट खरीदने वाला युवा बंदूक खरीद सकता है। भारत भी उसी व्यवस्था की तरफ बढ़ रहा है। युवा मल्टीप्लेक्स में जाते हैं, 200 से 1000 रुपये आसानी से एक मूवी शो और पॉपकॉर्न-कोल्डड्रिंक पर खर्च कर देते हैं, जबकि उसी शहर में उनके हमउम्र युवा शिक्षाहीन और बिना किसी रुपये के हैं। उनमें निराशा और दिशाहीनता है। टीवी पर कॉमेडी करने वाले एक-दूसरे को थप्पड़ मारते हैं, गे लोगों या बार गल्र्स का मजाक उड़ाते हैं, एडल्ट बातें करते हैं, डबल मीनिंग डायलॉग बोलते जाते हैं और घोर लापरवाही बरतते हैं। ये सब जो हो रहा है, युवा और बालमन में कुछ सहनशील और सकारात्मक तो डालने से रहा।

आप आज के दौर की हिंदी फिल्में और फिल्ममेकर देखिए। प्रभुदेवा ‘राउडी राठौड़’ को साउथ की फिल्मों के सफल हिंसक-मनोरंजक फॉर्मेट पर बनाते हैं सिर्फ कारोबारी फायदे के लिए। इस ग्लैमराइज्ड एक्शन के बच्चों पर होने वाले बुरे असर के बारे में एक बार उनसे पूछा तो वह बोले, ‘आपके पूछने से पहले सोचा नहीं, आगे ध्यान रखने की कोशिश करूंगा’। जाहिर है वो ध्यान क्या ही रखेंगे? फिर आते हैं कारोबारी लिहाज से सफल डायरेक्टर रोहित शेट्टी पर। अपनी मूवीज (गोलमाल, सिंघम, बोल बच्चन) में ग्लैमराइज्ड एक्शन पर वह बार-बार पूरी दिशाहीनता के साथ कहते हैं, ‘मैं फिल्में समाज के भले के लिए नहीं बनाता, बस एंटरटेन करने के लिए बनाता हूं’। यानी वह भी जिम्मेदारी नहीं कुबूलते। ऐसा ही हाल तकरीबन समाज की बजाय बस सिनेमा को ही देखने और तवज्जो देने वाले तमाम फिल्मकारों के साथ है।

मैं डेनवर में हुई इस दुखद घटना को किसी एक इंसान की दिमागी खराबी नहीं मानता। हम जैसा समाज बनाते हैं, हमें वैसे ही समाज का सामना करना पड़ता है। अब देखिए न, ‘द डार्क नाइट राइजेज’ जैसी हिंसक फिल्म में भी उस थियेटर में एक कपल अपने तीन महीने के बच्चे को साथ लेकर गया था। अब समझिए कि भला उस बच्चे को कौन से मनोरंजन की जरूरत रही होगी? वो इस फिल्म से क्या सीखने वाला होगा? इस गोलीबारी में वह नवजात भी घायल हुआ और फिलहाल अस्पताल में है।
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गजेंद्र सिंह भाटी

मंगलवार, 17 जुलाई 2012

स्पाइडर शक्तियों वाला आदर्श लड़का लाए हैं मार्क वेब

फिल्मः द अमेजिंग स्पाइडरमैन
डायरेक्टरः मार्क वेब
कास्टः एंड्रयू गारफील्ड, एमा स्टोन, रायस आफन्स, इरफान खान, मार्टिन शीन, डेनिस लियरी, सैली फील्ड, क्रिस जायल्का
स्टारः साढ़े तीन, 3.5
सुझाव: भयंकर मसालेदार और टिपिकल सुपरहीरो फिल्म नहीं है। मगर जरूर देखनी चाहिए। एक-दो कमजोरियों के अलावा बेहद अच्छा सिनेमा है। बच्चों को जरूर देखनी चाहिए, खूब स्वच्छ फिल्म।
डायरेक्टर मार्क वेब की ‘द अमेजिंग स्पाइडरमैन’ में सबसे श्रेष्ठ बात जो हुई है, वो है एक सुपरहीरो का सुपरह्यूमन हो जाना। पीटर पार्कर स्पाइडर की तरह दीवारों से चिपककर चढ़ सकता है, बेहद फुर्तीला है, ताकतवर है, लेकिन कलाइयों से छूटने वाले मकडज़ाले उसने खुद बनाए हैं। यानी एक इंसानी कोशिश। वह विशाल छिपकली मानव से लड़ता है लेकिन दर्जनों फायरब्रिगेड वालों की मदद से। जब कैप्टन जॉर्ज स्टेसी (डेनिस लियरी) अपनी जान कुर्बान करते हैं तब जाकर पीटर शहर को जहरीली जैविक गैस से बचा पाता है। सुपरहीरो मूवीज में ऐसा होना बहुत जरूरी है। ताकि फिक्शन में रिएलिटी मिली रहे। कि हर बच्चा और दूसरा दर्शक महज स्पाइडरमैन के प्रॉडक्ट खरीदने की बजाय, अपने इंसानी रूप में रहते हुए ही सुपर होने की राह ढूंढ पाए।

फिल्म अगर ताजी लगती है तो कोलंबिया पिक्चर्स द्वारा मार्क वेब को डायरेक्शन सौंपने की वजह से। ‘500 डेज ऑफ समर’ जैसी हवा से हल्की और ताजी फिल्म बनाने वाले मार्क ने इस फिल्म में भी यही किया। एंड्रयू गारफील्ड के स्पाइडरमैन बनने की वजहें उन्होंने ज्यादा सच्ची बनाई हैं। उनका हीरो दर्द से कराहता है, उनके किरदारों में सेंस ऑफ ह्यूमर है और कुछ भी बिना लॉजिक के नहीं है। ये फिल्म पिछली तीन स्पाइडरमैन फिल्मों की तरह कॉमिक बुक जैसी तो नहीं है। सिर्फ मसाला एंटरटेनमेंट वाली भी नहीं है। पर स्मार्ट फिल्ममेकिंग है। क्वालिटी फिल्ममेकिंग है। पिछली फिल्मों में कहानी मोटा-मोटी चार-पांच सीन्स से ही याद रहती है, यहां इस फिल्म में कहानी कसीदाकारी की तरह है। महीन। दो घंटों में भी आपको फिल्म लंबी लगती है तो इसलिए कि इसमें बहुत कुछ है, इसलिए नहीं कि ये बोरिंग होगी। एंड्रयू गारफील्ड स्पाइडरमैन उर्फ पीटर पार्कर के रोल में टॉबी मैग्वायर से ज्यादा तरोताजा लगते हैं। वहीं मैरी जेन वॉटसन (क्रिस्टीन डनस्ट) 2002 में आई पहली स्पाइडरमैन मूवी के वक्त से धीरे-धीरे बेहद पजेसिव गर्लफ्रेंड होती गईं, वहीं इस मूवी में एमा स्टोन ऐसी नहीं हैं। वह अगर पीटर में कुछ पसंद नहीं करती तो चुप होकर आगे बढ़ जाती हैं, और मनाने पर तुरंत मुस्कुरा देती हैं।

फिल्म में आने वाले ये दो पल महज सीन होते हुए भी महान हो जाते हैं...
  • जब बिल्डिंग से सैंकड़ों मंजिल ऊपर लटकते हुए घायल स्पाइडरमैन गिरकर मरने वाला होता है, तो अब तक विशाल छिपकली मानव बनकर उससे लड़ रहा डॉ. कॉनर्स उसका हाथ थाम लेता है और उसे बचाता है। समाज अपराधियों को मारने से बेहतर नहीं होता, उन्हें भला बनाने से होता है। वी. शांताराम की ‘दो आंखें बारह हाथ’ में जो भलाई वाली आत्मा थी, अनजाने में कहीं से ऐसी ही भीतरी भलाई डॉ. कॉनर्स में भी निर्देशक ने कायम रखी, जो बड़ी अच्छी बात है।
  • पीटर को जो लड़का पहले सीन में पीटता है, सुपर पावर्स आने के बाद पीटर उसे पीटकर आगे नहीं बढ़ जाता। एक झड़प के बाद वो तथाकथित बुरा लड़का अच्छा बनता है। अंकल की मौत पर पीटर को गले लगाने और सहानुभूति जताने आता है। उनकी दोस्ती से कहानी का मसाला खत्म होता है पर भले बनने की प्रेरणा पैदा होती है।
हमारे जैसा ही लड़का है पीटर पार्करः कहानी
कॉलेज में पढ़ता है एक आम लड़का पीटर पार्कर (एंड्रयू गारफील्ड)। साथ पढऩे वाली ग्वेन स्टेसी (एमा स्टोन) के प्रति उसके मन में चाह पैदा हो रही है। पीटर अपने साइंटिस्ट माता-पिता के बारे में जानना चाहता है जो बचपन में एक आधी रात को उसे उसके अंकल-आंटी के घर छोड़ गए थे। फिर कभी लौटकर नहीं आए। हालांकि अंकल-आंटी ने भी पीटर को मां-पिता सा ही प्यार दिया। खैर, एक दिन पीटर को अपने पिता का एक बैग मिलता है, जिसमें एक जैव वैज्ञानिक फॉम्र्युला होता है और एक तस्वीर। तस्वीर में अपने पिता के साथ उसे एक साइंटिस्ट डॉ. कर्ट कॉनर्स (रायस आइफन्स) नजर आते हैं। वह अपने अतीत को जानने में जुट जाता है। इसी दौरान कुछ ऐसी घटना घटती है कि उसके शरीर में हैरतअंगेज बदलाव आने लगते हैं और पीटर के साथ पूरे शहर की लाइफ बदल सी जाती है।
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गजेंद्र सिंह भाटी

पर्याप्त जिज्ञासाओं वाली रिडली स्कॉट की अपर्याप्त फिल्म

फिल्मः प्रोमेथियस
डायरेक्टरः रिडली स्कॉट
कास्टः नूमी रेपेस, माइकल फासबैंडर, गाय पीयर्स, इदरिस एल्बा, लोगन मार्शल ग्रीन, चार्लीज थैरॉन
स्टारः तीन, 3.0
संक्षिप्त टिप्पणी
इंजीनियर
डायरेक्टर रिडली स्कॉट की 1979 में आई फिल्म ‘एलियंस’ का पिछला भाग है 'प्रोमेथियस’। यानी एलियंस फ्रैंचाइजी की फिल्मों में पृथ्वी (अमेरिका) पर आए एलियंस आखिर कहां से आए? मानव उत्पत्ति और इंसानी डीएनए से एलियंस किस तरह जुड़े हुए हैं? ऐसे बहुत सारे सवालों को जानने की कोशिश। मेरे लिए सम्मोहक है फिल्म की शुरुआत। चट्टानों, पर्वतों, झरनों, जंगलों और धरती का हैलीकॉप्टर व्यू जैसे-जैसे आगे बढ़ता है, सृष्टि की रचना में हमारी जिज्ञासा भी बढऩे लगती है। फिर एक भयंकर झरने के सिरे पर खड़े एक सफेद मानव (ग्रीक देवताओं जैसा तराशा शरीर) का आना। वह आता है, एक डिबिया खोलता है और उसे पी जाता है। धीरे-धीरे उसका शरीर भरभरा कर बिखरते हुए झरने के पानी में मिल जाता है। यानी कहानी के मुताबिक हमारा डीएनए उसी से आया, वो हमें बनाने वाली इंजीनियर्स में से एक है। ये एक पर्याप्त जिज्ञासा है।

फिल्म आधी हो जाती है तब तक आकर्षण बना रहता है, पर उसके बाद हमारे सवालों के जवाब नहीं मिलते। ऐसा लगता है कि ‘प्रोमेथियस’ के सीक्वल के लिए सारी रुचिकर बातें छिपा ली गई हैं। निस्संदेह हम सीक्वल देखेंगे पर यहां ये सबसे बड़ी खामी है। 2009 में जर्मन भाषा में बनी ‘द गर्ल विद द ड्रैगन टैटू’ में जानदार अभिनय करने वाली नूमी रेपेस और एक अत्याधुनिक इंसानी रोबॉट बने माइकल फासबैंडर फिल्म की जान हैं। हालांकि ये जान कहानी को होना था, स्क्रिप्ट को होना था, जो उतनी नहीं हो पाती। अमेरिकी टीवी की मशहूर लॉस्ट सीरिज लिखने वाले डेमन लिंडेलॉफ को अपने सपनों के स्टार रिडली स्कॉट के साथ काम करने का मौका मिला, उन्होंने और जॉनाथन स्पैथ्स ये फिल्म लिखी, पर आधी होने के बाद उनकी लिखी रामकहानी दिव्य नहीं रह जाती, जैसे कि शुरुआती हिस्सा है। संवादों में भी ह्यूमर की और चतुराई की कमी है। फिल्म उम्मीदों के लिहाज से कुछ अधूरी है, पर समझने के लिए दो बार तक देखी जा सकती है।

मानवता की खोज और प्रोमेथियसः ये 2089 है। स्कॉटलैंड की गुफाओं में मानव उत्पत्ति के निशान खोज रहे हैं हस्बैंड-वाइफ एलिजाबेथ (नूमी रेपेस) और चार्ली (लोगन मार्शल ग्रीन)। फिर हम 2093 में पहुंचते हैं। अंतरिक्ष में 17 क्रू मेंबर्स के साथ उड़ रहा है यान प्रोमेथियस। इसे चला रहा है इंसानी रोबॉट यानी एक एंड्रॉयड। नाम है डेविड (माइकल फासबैंडर)। जब एक चांदनुमा ग्रह एलवी-223 नजर आने लगता है तो तकरीबन तीन साल से स्लीप चैंबर में सोए सब मेंबर उठते हैं। वेलैंड कॉरपोरेशन नाम की कंपनी के इस यान का मिशन है इंसानों को बनाने वालों को ढूंढना, जो उन्हें इस ग्रह पर मिलने हैं। मगर जब मिलते हैं तो कुछ भी अच्छा नहीं होता।
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गजेंद्र सिंह भाटी

रॉक के दीवाने होंगे राजी, पर आम दर्शक माथा फोड़ लेंगे

फिल्मः रॉक ऑफ एजेस
डायरेक्टरः एडम शैंकमैन
कास्टः टॉम क्रूज, डिएगो बोनेटा, जूलिएन हू, पॉल जियामेटी, कैथरीन जेटा जोन्स, रसैल ब्रैंड, एलेक बॉल्डविन
स्टारः दो, 2.0
संक्षिप्त टिप्पणी

डायरेक्टर एडम शैंकमैन की ये अमेरिकी फिल्म हमारी हिंदी की ‘इंद्रसभा’ जैसी है। 1932 में आई इंद्रसभा में तकरीबन 70 गाने थे तो दो घंटों वाली ‘रॉक ऑफ एजेस’ में 20 गाने हैं। चूंकि ये एक म्यूजिकल प्ले और किताब पर बनी है, चूंकि ये 1980 के रॉक वल्र्ड को दी गई कॉमिकल श्रद्धांजलि है इसलिए हॉलीवुड फिल्मों का कोई ढांचा इसमें नहीं दिखता। इसमें बॉलीवुड वाला ढांचा है। गोविंदा वाले अंदाज में कैरेक्टर हर दूसरे-तीसरे सीन में गाना गाने लगते हैं। लीड कैरेक्टर के पीछे दर्जनों डांसर नाचने लगते हैं। ऐसी फिल्में अमेरिका में तीस-चालीस साल पहले बना करती थी। ये देख अपने देसी दर्शक चौंकते हैं, परेशान होते हैं, माथा खुजाते हैं, आगे वाली सीट पर सिर पटकते हैं और इस फिल्म में लाने के लिए दोस्तों को कोसते हैं। पर मैं इसे बुरी फिल्म नहीं मानता। सब्जेक्ट अलग है बस।

‘रॉक ऑफ एजेस’ में हमारी जान-पहचान वाला एक ही चेहरा है, टॉम क्रूज का। पर वो यहां ‘मिशन इम्पॉसिबल’ वाले अंदाज में नहीं हैं। यहां वो शराब, से-क्-स और स्टारडम के नशे में चौबीस घंटे चूर रहने वाले एक 80 के दशक के रॉकस्टार के रोल में बिल्कुल अलग लगते हैं। उनका किरदार बहुत सतही भी है लेकिन महसूस करने वाला महसूस कर सकता है कि जिंदगी में संगीत की तलाश में स्टेसी कितना सनकी और कसेला हो चुका है, कितना नियमहीन हो चुका है। फिल्म में एलेक बॉल्डविन, कैथरीन जेटा-जोन्स, रसेल ब्रैंड और पॉल जियोमेटी जैसे नामी एक्टर्स का होना भी बड़ा आकर्षण है पर ज्यादातर दर्शक उनसे परिचित नहीं हैं। स्पाइस गल्र्स के टूर कोरियोग्राफ करने और जैनेट जैक्सन के वीडियो में डांस करने वाले एडम का डायरेक्शन गहरे म्यूजिकल मिजाज वाला है, पर प्ले को फिल्म में तब्दील करते हुए वह कहानी को और पैना कर सकते थे।

रॉक के उस दौर की कहानीः 1987 के दौर में रॉक एन रोल म्यूजिक से प्यार करने वालों की कहानी है। ओकलाहोमा से सिंगर बनने शैरी लॉस एंजेल्स आती है। वहां उसे ‘द बरबन रूम’ नाइटक्लब में काम करने वाले ड्रू से प्यार हो जाता है, जो रॉक स्टार बनना चाहता है। क्लब तंगी की हालत में है। उसे उबारने के लिए क्लब का मालिक रॉकस्टार स्टेसी जैक्स को परफॉर्म करने को कहता है। स्टेसी को सच्चे प्यार और म्यूजिक की तलाश है पर वो सनकी है, नशे में रहता है। उधर मेयर की कंजरवेटिव वाइफ चर्च के साथ मिलकर इस क्लब को बंद करवाना चाह रही है। ताकि शहर से-क्-स, ड्रग्स और रॉक एन रोल से मुक्त हो जाए।
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गजेंद्र सिंह भाटी

मैक्सिमम लोग क्यों देखेंगे, मेरूदंड टूटी ऐसी फिल्म

फिल्मः मैक्सिमम
डायरेक्टरः कबीर कौशिक
कास्टः नसीरुद्दीन शाह, सोनू सूद, नेहा धूपिया, अमित साध, विनय पाठक, स्वानंद किरकिरे
स्टारः दो, 2.0
संक्षिप्त टिप्पणी

कबीर कौशिक को हर कोई उनकी पहली फिल्म ‘सहर’ से पहचानता है। फिल्म अपने नाम के अनुरूप सीरियस और ताजी थी। पर ‘मैक्सिमम’ जैसे फिल्मी टाइटल तक पहुंचते-पहुंचते जो उम्मीदें बंधती हैं, फिल्म देखने के बाद टूट जाती हैं। डायलॉग बड़े औसत हैं, जैसे हम आपस में बात करते हैं। एक फिल्म के लिए ये अच्छा भी है और बुरा भी। जैसे, अरुण ईनामदार के रोल में नसीरुद्दीन शाह का 'ट्विंकल ट्विंकल लिटिल स्टार...’ बोलना। फिल्ममेकिंग की भाषा में किरदारों को स्थापित करना फिल्म के लिए बहुत जरूरी होता है। मसलन, सोनू सूद के किरदार ने 44 के करीब एनकाउंटर किए हैं, मगर फिल्म में उसे दिखाया जाता है दो-चार सीन में खड़े-खड़े, अपराधी को गोली मारते हुए। कहीं भी, किसी एनकाउंटर सीन में उन्हें टीम के साथ रणनीति बनाते और भागते-दौड़ते नहीं दिखाया गया है। नसीर भी खड़े-खड़े ही दो-चार गोलियां मार देते हैं पूरी मूवी में, बस। जबकि कहने को ये मुंबई के शीर्ष ऑफिसर्स हैं। पहले और आखिरी सीन में सोनू सूद को खून से लथपथ सफेद शर्ट में भागते दिखाया जाता है, जो पूरी फिल्म में उनके मिजाज से अलग दिखता है।

अपने आइडिया लेवल पर ‘मैक्सिमम’ जितनी एक्साइटिंग कॉप ड्रामा लगी होगी, उतनी ही बिखरी हुई बनने के बाद है। मुंबई की राजनीति, पुलिस और मीडिया में उत्तर भारतीयों की मौजूदगी की परत को भी भीना-भीना छुआ गया है जो थ्रिलिंग हो सकता था। इन तमाम तत्वों पर बनी एक ठीक-ठाक फिल्म ‘गंगाजल’ है, जिसे दर्जनों बार देखा जा सकता है। पिछले दिनों रामगोपाल वर्मा की 'डिपार्टमेंट भी आई थी, जो इतनी ही दिशाहीन थी। फिल्म में अगर अच्छा लगते-लगते भी नसीर, सोनू, नेहा, विनय पाठक और अमित साध का अभिनय अधपकी सब्जी सा लगता है जो इल्जाम जाता है निर्देशक कबीर और उनकी एडिटिंग टीम को। तो थियेटर न जाएं, पर डीवीडी या टीवी रिलीज के दौरान देखें।

कहानीः मुंबई पुलिस के दो सीनियर ऑफिसर तकरीबन एक ही वरिष्ठता लेवल के हैं। उनके अपने अलग-अलग राजनीतिक और आपराधिक खेमे हैं। ग्राउंड लेवल पर एक ऑफिसर का खास है ऑफिसर प्रताप पंडित (सोनू) और दूसरे का अरुण ईनामदार (नसीरुद्दीन शाह)। दोनों ने दर्जनों एनकाउंटर किए हैं। अब मैक्सिमम पावर पाने के लिए लड़ाई चल रही है। खून खराबे और साजिशों के बीच।
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गजेंद्र सिंह भाटी

किंग जूलियन को छोड़ मेडागास्कर-3 में संतृप्ति कुछ भी नहीं, पर बच्चों को भाएगी

फिल्मः मेडागास्कर 3 – यूरोप्स मोस्ट वॉन्टेड (थ्रीडी-अंग्रेजी)
डायरेक्टरः ऐरिक डार्नेल, टॉम मेकग्राथ और कॉनराड वर्नन
आवाजः बेन स्टिलर, क्रिस रॉक, डेविड श्विमर, जेडा पिंकेट स्मिथ, साशा बैरन कोहेन
स्टारः तीन, 3.0
संक्षिप्त टिप्पणी

 बच्चों के लिए दुनिया भर में बनने वाली फिल्में तकरीबन सभी अच्छी होती हैं। चाहे ईरान में बनती माजिद माजिदी की ‘द कलर ऑफ पैरेडाइज’ हो या भारत में बनी रघुबीर यादव के अभिनय वाली ‘आसमान से गिरा’। हॉलीवुड की एनिमेशन और थ्रीडी फिल्में कभी निराश नहीं करती। ‘शार्क टेल’, ‘मेडागास्कर’ और ‘आइस ऐज’ बच्चों की पुराण बन चुकी हैं। ‘मेडागास्कर-3’ उम्मीद जितनी अच्छी तो नहीं है पर बच्चों को इसमें कुछ भी बोरिंग नहीं लगेगा। फिल्म में नई चीजें भी हैं। जैसे, पैरिस पहुंचे एलेक्स को पकडऩे की हैरतअंगेज कोशिशों में लगी फ्रेंच कैप्टन शॉन्तेल दुबुआ। उसका भरे बदन के साथ लाल स्कूटरों पर सवार हो फ्रेंच एक्सेंट में जानवरों की वैन का पीछा करना। साथ ही पेंगुइन्स और किंग जूलियन वाले सीन सबसे मजेदार हैं। बड़ों को फिल्म औसत लगेगी। पहली फिल्म में न्यू यॉर्क के जू से निकल शहरी जानवरों का अफ्रीका पहुंचना और वहां के ठेठ किरदारों से उनका सामना होना नई चीज थी इसलिए फिल्म रोचक बनी। इस बार उनके न्यू यॉर्क लौटने की बात में कोई चाव नहीं था इसलिए ये फिल्म मोटे तौर पर औसत हो गई। कुछ मौके थे जहां फिल्म बड़ी मजेदार हो सकती थी, पर कुछ कसर रह गई। मसलन...

Maurice and King Julien
  • पहली दो फिल्मों जितना चटख ह्यूमर किरदारों में नहीं है। जैसे क्रिस रॉक और बेन स्टिलर की आवाज वाले पात्रों मार्टी और एलेक्स के बीच पिछली फिल्मों में कितनी शानदार हास्य जुगलबंदी होती थी।
  • हांस जिमर का म्यूजिक तो है पर ‘आई लाइक टु मूव इट मूव इट’ जैसा एक भी फनी गाना नहीं है।
  • ‘द डिक्टेटर’ जैसी फिल्म से सुर्खियों में रहे उम्दा एक्टर साशा बैरन कोहेन ने इस सीरिज के सबसे फनी किरदार किंग जूलियन को अपनी आवाज दी है। वह कमाल हैं, लेकिन जूलियन के सीन कम लगते हैं।
एलेक्स को न्यू यॉर्क लौटना हैः कहानी
‘मेडागास्कर-2’ जहां खत्म हुई थी, वहां ये कहानी शुरू होती है। न्यू यॉर्क के चिडिय़ाघर में रहने वाले एलेक्स (शेर), मार्टी (जेबरा), मेल्मन (जिराफ) और ग्लोरिया (दरियाई घोड़ी) अब अफ्रीका में हैं। पेंगुइन्स इन्हें छोड़ मोंटे कार्लो, पैरिस में जुआ खेलने गए हैं। एलेक्स को डर है कि कहीं वह अपने साथियों के साथ अफ्रीका में पड़ा-पड़ा बूढ़ा तो नहीं हो जाएगा। उसे न्यू यॉर्क के चिड़ियाघर की याद सताने लगती है जहां का वह स्टार था। अब वह अपने दोस्तों के साथ पेंगुइन्स को ढूंढने मोंटे कार्लो ही जाने की योजना बनाता है। मगर वहां जाने पर सब कुछ उल्टा पुल्टा हो जाता है। सब न्यू यॉर्क तो पहुंचते हैं पर ढेर सारे एडवेंचर के बाद।
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गजेंद्र सिंह भाटी

दावा था राउडी मनोरंजन का, जो राठौड़ ने कुछ पूरा भी किया

फिल्मः राउडी राठौड़
डायरेक्टरः प्रभुदेवा
कास्टः अक्षय कुमार, सोनाक्षी सिन्हा, परेश गनतारा, नासर
स्टारः तीन, 3.0
संक्षिप्त टिप्पणी

कहानियों के मामले में तेलुगू और तमिल फिल्मों में फ्लैशबैक तो अनिवार्य चीज होती है। एक कहानी होगी, उसमें दूसरी कहानी होगी और फिर उसमें सबसे बड़ी महाकहानी होगी। कॉमेडी, क्रूरता, तुरंत न्याय और हीरोइज्म से भरी ऐसी ही एक तेलुगू फिल्म 'विक्रमारकुडू’ की हिंदी रीमेक (ऐसे चार-पांच रीमेक भिन्न-भिन्न भाषाओं में बन चुके हैं) है 'राउडी राठौड़’। इसमें मर्दानगी से भरा मूछों पर ताव देता हीरो है, तो खिलखिलाती तुरंत रीझकर प्यार कर बैठती सुंदर हीरोइन भी है। फिर एक ग्रामीण इलाके में खैनी चबाता, धोती पहनता, जाहिल सा विलेन भी है। हां, ये सब अफीम जैसे एंटरटेनमेंट वाली एक हिट फिल्म बनाने के साउथ के फिक्स फंडे हैं जो हर बार चल भी जाते हैं। अब ‘दबंग’, ‘वॉन्टेड’, ‘सिंघम’ और ‘राउडी राठौड़’ जैसी फिल्मों के जरिए हिंदी में भी आ गए हैं।

इस विश्लेषण को छोड़ दें तो ‘राउडी...’ जो दावा करती है, वो देती है। फिल्म कहती है कि एंटरटेन करूंगी और वो करती है। रंग-बिरंगी लोकेशन, खूबसूरत कॉस्ट्यूम और आसान कोरियोग्रफी भरे तीन-चार अच्छे गाने हैं। जिसमें ‘आ रे प्रीतम प्यारे’ गाने में शक्ति मोहन, मुमैद खान और मरियम जकारिया का नृत्य बेहद जानदार है। कहानी की सिचुएशन में बिल्कुल फिट। बहुत दिनों बाद आया ऐसा आइटम नंबर जिसकी कोरियोग्रफी अनूठी है, जो बिल्कुल भी वल्गर नहीं लगती। इसके अलावा अक्षय-सोनाक्षी की जोड़ी कुछ बिखरी मगर लुभाने वाली है। शिवा के कॉमिक अवतार में अक्षय एकरूप नहीं रह पाते। कभी सीरियस हो जाते हैं, कभी नॉर्मल तो कभी बहुत ज्यादा फनी। एएसपी विक्रम राठौड़ का रोल छोटा मगर दमदार है, दो-तीन सॉलिड डायलॉग और एक्शन से भरा। मगर शिराज अहमद के पास इस कहानी में धांसू डायलॉग लिखने की अच्छी-खासी गुंजाइश थी, जो उन्होंने खो दी। प्रभुदेवा के निर्देशन में मेहनत बहुत सारी है, पर उन्हें धार तेज करनी होगी। एडिटिंग पर ध्यान देकर फिल्म को और व्यवस्थित करना होगा। ये फिल्म अच्छी है पर मुझे ‘विक्रमारकुडू’ अपनी इंटेंसिटी और चुस्ती के लिहाज से ज्यादा बेहतर लगी। एक्टिंग में अक्षय से बेहतर हैं इसके तेलुगू वर्जन के हीरो रवि तेजा।

कहानीः व्यवहार में मजाकिया और अलग सा शिवा (अक्षय कुमार) मुंबई में अपने दोस्त के साथ मिलकर लोगों को ठगता और लूटता है। उसे प्रिया (सोनाक्षी सिन्हा) से प्यार हो जाता है। इस बीच उसे चोरी के बक्से में एक पांच-छह साल की बच्ची नेहा मिलती है, जो उसे अपना पापा कहती है। शिवा अपनी लाइफ में आई इस प्रॉब्लम से कन्फ्यूज है तभी उसे पता चलता है विक्रम राठौड़ नाम की एक शख्सियत का, जिसकी शक्ल हूबहू उसके जैसी है। बहादुरी, बदले और रोमांच से भरी इस कहानी में आगे ढेरों मोड़ आते हैं।
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गजेंद्र सिंह भाटी

प्रेम करने वालों को प्रिय लगेगी तेरी-मेरी कहानी

फिल्मः तेरी मेरी कहानी
डायरेक्टरः कुणाल कोहली
कास्टः शाहिद कपूर, प्रियंका चोपड़ा, प्राची देसाई
स्टारः ढाई, 2.5
संक्षिप्त अल्पकालीन टिप्पणी...

कुणाल कोहली की ‘तेरी-मेरी कहानी’ देखें। अगर उम्मीद से कम इंट्रेस्टिंग क्लाइमैक्स और जरा ढीली स्क्रिप्ट को छोड़कर देख सकें तो। प्रेमी जोड़े और ट्विटर-फेसबुक जेनरेशन वाले युवा भी फिल्म देखने जा सकते हैं। ज्यादा उम्मीदें न करें। पर फिल्म में कहीं कुछ स्टूपिड भी नहीं है। कुणाल की कोशिश ईमानदार और मेहनत भरी है। उन्होंने बड़े भावुक तरीके से ये लव स्टोरी कही है। उनका फिल्म प्रस्तुत करने का तरीका भी ताजा है। 1960 के बॉम्बे को दर्शाने वाले सीन खास हैं। सब कम्प्यूटर एनिमेशन से बनाए गए हैं। फिल्म के आखिरी क्रेडिट जब आते हैं तो बड़े ही रोचक अंदाज में सीन कैसे बने, ये बताया जाता है। रुककर जरूर देखें।

इस दौर की कहानी में डायरेक्टर साहब ने बारीकियों पर ध्यान दिया है। चाहे वॉटसन स्टूडियो का बोर्ड हो, चाल की रखवाली करने वाले पठान चाचा हों, कॉटेज ब्रैंड वाली दियासलाई हो या हीरोइन का मेकअप करते बंगाली मेकअप दादा। मगर 1910 के लाहौर में कुछ गलतियां रह जाती हैं। मसलन, जावेद (शाहिद) के एक डायलॉग में धर्मेंद्र की मिमिक्री झलकती है। जेल में ‘हमसे प्यार कर ले तू’ गाने पर नाचते हुए भी वह धर्मेंद्र के ‘प्रतिज्ञा’ फिल्म वाले फेमस स्टेप्स इस्तेमाल करते हैं। यहां फिल्म के डायरेक्टर का ध्यान इस बात पर नहीं जाता कि प्रतिज्ञा 1975 में आई थी और आप कहानी 1910 की सुना रहे हो। यंग दर्शकों को लंदन में पढ़ रहे कृष और राधा के कपड़े और एक्सेसरीज में काफी कुछ स्टाइल फॉलो करने को मिलेगा।

जनम जनम का साथ है: कहानी
 1910 के सरगोजा, लाहौर में जावेद और आराधना। 1960 के पूना में गोविंद और रुकसार। 2012 के लंदन में कृष और राधा। इन तीन जन्मों में दो जवां दिल (शाहिद और प्रियंका चोपड़ा) एक-दूसरे से मिलते हैं, फिर प्यार होता है, पर मिलन की राह में मुश्किलें आ जाती हैं। इन मुश्किलों से निकलकर इनका साथ हो पाता है कि नहीं, यहीं कहानी का ट्विस्ट है।
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गजेंद्र सिंह भाटी

सोमवार, 16 जुलाई 2012

कॉकटेल पर कुछ अल्पकालीन शब्द

फिल्मः कॉकटेल
डायरेक्टरः होमी अदजानिया
कास्टः सैफ अली खान, दीपिका पादुकोण, डियाना पेंटी, बोमन ईरानी, डिंपल कपाड़िया, रणदीप हुड्डा
स्टारः तीन, 3.0
अल्पकालीन सुझाव: अच्छी फिल्म है। एक बार अपने पार्टनर के साथ, फ्रेंड्स के साथ जरूर देख सकते हैं। एंजॉय करेंगे, कई बातें भा जाएंगी। कहानी एडल्ट लोगों के उलझे प्यार की है इसलिए फैमिली ऑडियंस या बच्चों के लिए ज्यादा कुछ है नहीं।

 'हम तुम’ और 'ओमकारा’ के बाद सैफ अली खान का कुछ बहुत अच्छा काम है 'कॉकटेल’ में। मसलन, उनके किरदार गौतम का केपटाउन के तट पर एकांत में बैठकर मीरा (डियाना पेंटी) को मिमिक्री करके हंसाना, या फिर मामा रैंडी (बोमन ईरानी) के साथ उनकी शुरुआती हंसी-मसखरी। ये अपनी एक्टिंग में जायका लाने की कोशिश करते हुए सैफ थे। ऐसा जितना 'बीइंग सायरस’ जैसी अच्छी फिल्म बनाने वाले होमी अदजानिया के डायरेक्शन की वजह से हुआ, उतना ही 'रॉकस्टार’ फेम डायरेक्टर इम्तियाज अली की लेखनी की वजह से भी। फिल्म के राइटर इम्तियाज और साजिद अली हैं। अब देखिए न, अंग्रेजी टोन वाली जबान और स्थिर इमोशन वाले सैफ जब मामा रैंडी को बोलते हैं कि “मामू, दिल्ली की पेचीदा गलियों में आपके राज गड़े हैं” तो लगता है कि ये किसी आम स्क्रिप्ट वाले शब्द नहीं लगते, ये किसी अलग बंदे ने डायलॉग लिखे हैं। आगे भी “यार मामा, 15 साल से यहां (लंदन) हो फिर भी सोच लाजपत नगर वाली है” ऐसे संवाद आते रहते हैं। फिल्म में अनिल मेहरा की सिनेमैटोग्राफी और श्रीकार प्रसाद की एडिटिंग कुछ जगहों पर बेहद अच्छी है।

इस मूवी की बड़ी खासियत है किरदारों को जैसे डिफाइन किया गया है। वरॉनिका (दीपिका पादुकोण) शुरू में बेपरवाह, लापरवाह, दारू-डांस में डूबी रहने वाली और बड़े कैजुअल तरीके से किसी से भी से-क्-स करने वाली बनी हैं। जो बाद में प्यार में, फैमिली में पडऩा चाहती हैं। नहीं कर पाती तो रोती हैं। मीरा शांत, शर्मीली, कृतज्ञ और आम हिंदुस्तानी लड़की है। वह हर मोड़ पर नैतिक बने रहना चाहती है, बनी भी रहती है। गौतम का शुरू में राह चलती किसी भी लड़की को फ्लर्ट करने का तरीका अनोखा है। दर्शक मान जाते हैं कि भई ऐसे बोलेगे तो लड़की का पटना जायज है। वह ऐसा ही है। मामा भी उसके मिजाज से वाकिफ हैं। बीच में इस किरदार में थोड़ा कन्फ्यूजन होता है। मीरा को गौतम की बेपनाह प्यार करने की आदत भाती है, जो लंदन में उसका कानूनी पति कुणाल (रणदीप हुड्डा) नहीं कर पाया। कहीं-कहीं दीपिका के अंदाज देख आपको लगेगा कि आप 'लव आजकल’ ही तो नहीं देख रहे, पर फिल्म अलग रहती है। बस औरतों की नैतिक बॉलीवुड छवि से अलग औरतें गढ़ती है।

'कॉकटेल’ की जान है म्यूजिक। गिप्पी ग्रेवाल और हनी सिंह का गाना 'अंग्रेजी बीट ते’ फिल्म में दीपिका का बेहद पावरफुल इंट्रो देता है। आरिफ लोहार का 'जुगनी’ फिल्म में तब के इमोशन के हिसाब से बड़ा लाउड हो जाता है, पर अलग लगता है। क्रेडिट्स में मिस पूजा का गाया 'सेकेंड हैंड जवानी’ भी आता है, पूजा की आवाज को पेंडू ठप्पे से मुक्त करते हुए।

 गौतम, मीरा, वरॉनिका का लव कॉकटेलः कहानी
लंदन में रहने वाला गौतम हर खूबसूरत कुड़ी से प्यार कर बैठता है, एक-दो दिन वाला प्यार। उसके फ्लर्ट करने की आदत का जवाब एक दिन उससे भी बड़ी बिंदास लड़की वरॉनिका (दीपिका) देती है और गौतम उसका दीवाना हो जाता है। मगर जब मां (डिंपल कपाडिय़ा) लंदन आ जाती है तो बचने के लिए कह देता है कि वरॉनिका के साथ रहने वाली भारतीय सी दिखती मीरा (डियाना) से वह प्यार करता है। पासे पलटते हैं, उसे अब मीरा से प्यार हो ही जाता है। अब मीरा कैसे उस वरॉनिका को धोखा दे पाएगी जिसने परदेसी जमीन पर उसका साथ तब दिया जब मीरा के सगे पति ने उसे धोखा दे दिया था।
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गजेंद्र सिंह भाटी