Tuesday, July 5, 2011

रियल प्रेस कॉन्फ्रेंस के रील सबक

इन एसीपी राठौड़ को हमने जॉन मैथ्यू मथान के निर्देशन में बनी 'सरफरोश' में देखा था। पहली बार कोई फिल्मी असिस्टेंट कमिश्नर ऑफ पुलिस इतना ह्यूमन लगा था। तब से 'सरफरोश' मेरी फेवरेट फिल्मों में और जय सिंह राठौड़ फेवरेट किरदारों में शामिल हो गए। उसके बाद अगर कोई दूसरा ऐसा किरदार मिल पाया है तो वो है जेसीपी रॉय का। जॉइंट कमिश्नर ऑफ पुलिस मुंबई (क्राइम) हिमांशु रॉय। मौका सीनियर क्राइम जर्नलिस्ट जे.डे के मर्डर केस पर रॉय की सबसे महत्वपूर्ण प्रेस कॉन्फ्रेंस का था, जो 27 जून को हुई। मैंने ज्यों ही देखना शुरू किया, त्यों ही इस इमेज एनेलिसिस में घुसता चला गया। घनी काली मूछें साउथ के हीरोज (सुपर) जैसी, मुख पर गंभीरता, दिमाग बर्फ सा शांत, चौड़ा ललाट, चौड़ा सीना, चौकड़ी वाला ब्लू शर्ट, अंदर सफेद टी-शर्ट, खाकी पेंट और खाकी सा बेल्ट। बोलने का अंदाज सीधा, सोफिस्टिकेटेड, बैलेंस्ड, सुलझा हुआ, क्लीयर, मैच्योर और एक फिल्मी हीरो (एसीपी/एसपी/डीसीपी/जॉइंट कमिश्नर/एसीपी क्राइम ब्रांच स्पेशल टीम) के लिहाज से बिल्कुल परफेक्ट। शायद परफेक्ट से भी ज्यादा ही परफेक्ट।

दर्जनों कैमरों के सामने केस सुलझाने वाली स्पेशल टीम खड़ी थी। सादे कपड़ों में ये सब 'आन:मेन एट वर्क' के डीसीपी हरिओम पटनायक (अक्षय कुमार) की सीबीआई टीम के मेंबर लग रहे थे। इनमें कोई अप्पा कदम (सुनील शेट्टी) था, कोई विक्रम सिंह (शत्रुघ्न सिंह) तो कोई कॉन्सटेबल खालिद अंसारी (परेश रावल). माइक के सामने जेसीपी हिमांशु रॉय के आते ही मुझे टीवी स्क्रीन 70 एमएम का परदा लगने लगी। अपनी प्रेंजेंटेशन में हीरोइक, सशक्त और रियलिस्टिक सी रॉय की ये कॉन्फ्रेंस फिल्ममेकर्स के लिए एक रियल डॉक्युमेंट साबित हो सकती है। इसमें फिल्मी जरूरत जितना ड्रामा भी है, हीरोइज्म वाला एटिट्यूड भी और देश की नजरों में चढ़ा हुआ बड़ा केस भी। बाकी उनकी मूछें और कपड़े भी सिचुएशन और कैरेक्टर को रियल बनाते हैं। केस के बारे में मीडिया को उन्होंने बेदाग अंग्रेजी, अच्छी हिंदी और मराठी तीनों भाषाओं में बताया। केस की एक-एक डीटेल बिना अटके, बिना कोई प्रेस नोट पढ़े वह बताते गए। ये लेंग्वेज वाला ऐसा पहलू है जो एक्टर्स के रोल को बहुत प्रभावी बना सकता है।

ये सोचने वाली बात है कि कमिश्नर, जॉइंट कमिश्नर और एसीपी तो पहले भी रहे हैं फिर बात सिर्फ रॉय के बारे में ही क्यों। क्योंकि उनके अनुकूल ही अभी हमारे दौर के फिल्मी पुलिसवाले और उनकी फिजिकैलिटी है। हमारे पुलिस और नॉन-पुलिस रोल में रॉय की घनी मूछें नजर आने लगी हैं। तभी तो बिन मूछ वाले हीरोज के दौर में हमने 'वंस अपॉन अ टाइम इन मुंबई' में एसीपी विल्सन (रणदीप हुड्डा, हीरो नहीं सूत्रधार), 'गंगाजल' में एसपी अमित कुमार (अजय देवगन) और 'खाकी' में डीसीपी अनंत श्रीवास्तव (अमिताभ बच्चन) को स्वीकार किया। मूछों और प्लॉट के मामले में साउथ के गहरे असर वाला फेज अभी हमारी फिल्मों पर चल रहा है। 'रावण' के एसपी देव प्रताप (विक्रम), 'दम मारो दम' के एसीपी विष्णु कामथ (अभिषेक) और 'सिंघम' के बाजीराव सिंघम (देवगन) में मूछों और अच्छी कद काठी वाला फैक्टर है। सबके चेहरे में वो एक हीरो और एक मॉडल वाला अंश झलकता है। 'शैतान' में भी राजीव खंडेलवाल की इंटेंसिटी में इनवेस्टिगेटिव एजेंसियों के काम करने के तरीके को देख सकते हैं। कमिश्नर पवन मल्होत्रा के साथ उनके अनौपचारिक-औपचारिक रहते, उग्र-शांत होते ताने-बाने को देख सकते हैं।

आप रॉय की कॉन्फ्रेंस का वीडियो नेट से निकालिए और एक-एक चीज को ऑब्जर्व करना शुरू करिए। आपको अपनी फिल्म का आदर्श हीरो नजर आएगा। एक-एक वाक्य के साथ उनके बोलने का तरीका और इस मर्डर केस में जल्दी रिजल्ट सामने ले आना हमें कायल करता है। जैसे हम एसीपी राठौड़ के 'सरफरोश' में होते जाते हैं। जैसे हम 'सिंघम' में बाजीराव सिंघम के हो सकते हैं। रॉय के पुलिस रिकॉर्ड पर मैं कोई टिप्पणी नहीं करता। मेरा ध्यान रियल और रील की इमेज पर है। कैसे असल जिंदगी के लोग रील के हीरोज से ज्यादा हीरोइक लगने लगते हैं और कैसे रील पर हमारे हीरो इन असली अधिकारियों से कुछ सीखकर ऐतिहासिक रोल निभा सकते हैं। इसमें 'दबंग' छिछला उदाहरण है तो 'सरफरोश-सिंघम' सीरियस। हालांकि 'सिंघम' घोर कमर्शियल फिल्म है पर सीरियस काम करने वाले अजय देवगन और उनकी 'गंगाजल' वाली ईमानदारी 'सिंघम' को सीरियसली स्वीकार करने योग्य बनाती है। रॉबिन हुड पांडे हमारे दिल में छोटी-छोटी अच्छी अदाओं से जगह बना लेते हैं। एसीपी राठौड़ हमारे जीवन के सबसे बेस्ट रोल्स में शुमार होते हैं। इसकी वजह ये है कि अपने काम को सही से न करने और लोगों के साथ बुरे बर्ताव के लिए बदनाम पुलिस की वर्दी को कुछ (फिल्मों में) अच्छे इंसान मिल जाते हैं, जो बहुत अच्छे हैं। सोचिए ऐसे में अगर हिमांशु रॉय जैसे लोग और उनकी क्राइम ब्रांच की रिजल्ट देने वाली टीम यूं मिलती है तो आने वाले वक्त में ऐसे फिल्मी रोल हमें ज्यादा असल लगेंगे और असल लोगों में फिल्मी हीरो वाला अंश दिखाई देने लगेगा।
गजेंद्र सिंह भाटी

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एक हिंदी दैनिक के साप्ताहिक कॉलम सीरियसली सिनेमा में प्रकाशित पहली कड़ी