Tuesday, December 13, 2011

“मैं आपसे असहमत हूं: अभिषेक बच्चन”

सफेद कुर्ते-पायजामे में बैठे अभिषेक बच्चन। अपने हंसने-हंसाने के उस जाने-पहचाने अंदाज के साथ, जो उन्होंने अपने पिता अमिताभ बच्चन से विरासत में पाया है। अपने एक्सक्लूसिव होने के उस आवरण के साथ, जो हर हिट-फ्लॉप के बावजूद उनके इर्द-गिर्द बना हुआ है। कोई ऐसा सवाल पूछता है तो कोई वैसा। पर मुंह बनाने की बजाय वह या तो अहसमति जताते हैं, या फिर उस सवाल को हंसी में छिपा देते हैं। बेटी के जन्म के बाद उनके व्यक्तित्व में एक अलग किस्म का ठहराव, झुकाव और तसल्ली देखी जा सकती है। हो सकता है ऐसा ही कुछ बदलाव परदे पर उनके अभिनय में भी दिखे। अब्बास-मुस्तान के निर्देशन में उनकी फिल्म 'प्लेयर्स’ 6 जनवरी 2012 को रिलीज हो रही है। इसी सिलसिले में उनसे बातचीत हुई। कुछेक सवाल दूसरे सिरों से भी आए, बाकी इसी छोर से।


आलोचना
मुझे स्वीकार है
फिल्म क्रिटिक्स भले ही उनकी फिल्मों की तारीफ नहीं कर पाते हों, पर अभिषेक कहते हैं कि मैंने हमेशा खुद को बदला है। उनके मुताबिक, “मेरी कोशिश रहती है कि हर फिल्म पिछली से अलग हो। 'दिल्ली-6’, 'दोस्ताना’, 'खेलें हम जी जान से’ या 'दम मारो दम’ सब अलग थीं। अब 'प्लेयर्स’ आई है जो एक्शन फिल्म है। आने वाली फिल्मों में 'बोल बच्चन’ कॉमेडी है और 'धूम-3’ मसाला एंटरटेनर है।" मगर इतनी कोशिशों के बाद भी जब उनकी फिल्म आती है तो एक झटके से आलोचक उनके काम को खारिज कर दते हैं। क्या वो इस क्रिटिसिज्म को स्वीकार करते हैं या मन ही मन कहते हैं कि नहीं, इस फिल्म में मैंने अच्छा काम किया था, मैं सहमत नहीं हूं? उनका बेहद सुलझा हुआ छोटा जवाब आता है, “नहीं, मैं ऐसा नहीं सोचता। मैं हमेशा क्रिटिसिज्म को स्वीकार करता हूं।"

इंडियन सेंस में देखें ये रीमेक
अब्बास-मुस्तान की फिल्में देखकर जवान हुए अभिषेक इनमें से अपनी फेवरेट बताते हैं। कहते हैं, “खिलाड़ी, बाजीगर और 1990 के बाद की सारी फिल्में मैंने देखी हैं। मुझे रेस और एतराज भी पसंद है। आई लव देम। शायद इसलिए मैं शुरू से उनके साथ काम करना चाहता था।" इन भाइयों की हालिया फिल्म 'प्लेयर्स’ हॉलीवुड फिल्म 'इटैलियन जॉब’ की ऑफिशियल रीमेक है। जब ऑरिजिनल फिल्म लोग देख चुके हैं, तो रीमेक के दर्शक क्या घट नहीं जाते? उन्हें क्यों और कैसे देखा जाए? सुनकर फिल्म में चार्ली मैस्केरेनहस का लीड रोल कर रहे अभिषेक कहते हैं, “ये फिल्म पहले 1969 में बनी थी और फिर 2003 में। उन्होंने इसके राइट्स खरीदे हैं। और इंडियन संदर्भ में अब्बास-मुस्तान भाई ने कहानी बदली है। वो लोगों को जरूर पसंद आएगी। और चाहे अंग्रेजी फिल्म का रीमेक हो, हमें इंडियन सेंस में देखना चाहिए। मैं भी फिल्में ऐसे ही देखता हूं।"

पापा की फिल्में लैजेंड्री और कल्ट
इस फिल्म में अभिषेक एक थीफ बने हैं। लेकिन ये रोल पॉजिटिव है। कहते हैं, “ये कैरेक्टर रॉबरी पैसों के लिए नहीं करता है, बदला लेने के लिए करता है। फिल्म सोना लूटने के बारे में है। जिसे मेरा कैरेक्टर चार्ली अपने दोस्तों के साथ लूटता है।" बातचीत के दौरान सवाल कहीं से उठकर कहीं जाते रहे। 'डॉन-टू’ और 'अग्निपथ’ जैसी अमिताभ बच्चन की फिल्मों की रीमेक वो क्यों नहीं करते? इसके जवाब में उनकी प्रतिक्रिया आती है, “अरे भाई, कोई मुझे पूछता नहीं तो मैं क्या करूं। मैं चाहूंगा कि मेरी फिल्मों का रीमेक हो, दूसरों की फिल्मों का मैं न करूं। पापा की जितनी भी फिल्में हैं वो लैजेंड्री हैं और कल्ट हैं। उन्हें वैसे ही रहने दिया जाए।"

आधे-अधूरे पर पूरे...
# 'बोल बच्चन’ में अजय देवगन के साथ काम कर रहा हूं।
# 'प्लेयर्स’ में जॉनी भाई भी हैं। वो बहुत बिजी एक्टर हैं और एक लैजेंड हैं। उनके साथ काम करके हमेशा सीखता हूं।
# उनका नाम मुस्तान (डायरेक्टर मुस्तान बर्मावाला) है और दुर्भाग्य से इंडस्ट्री ने उन्हें मस्तान नाम से रीनेम कर दिया है।
# ये डिबेट पुरानी है कि आर्ट जिंदगी की नकल करता है या जिंदगी आर्ट की। ये एंटरटेनमेंट की दुनिया है। आपको बस अपनी फिल्में बनाते रहना चाहिए।
# मैंने दोनों 'इटैलियन जॉब’ देखी है। ऑरिजिनल 1969 में बनी थी, ब्रिटिश एक्टर माइकल केन के लीड रोल वाली, वो मेरी फेवरेट फिल्मों में से है।

प्रश्नोत्तर सहमति-असहमति के
इन
दिनों हमारी फिल्में स्टाइल, टेक्नीक और एक्शन में हूबहू हॉलीवुड मूवीज सी ही लगने लगी हैं। हॉलीवुड ने तो अपना अंदाज खुद इजाद किया था, क्या हमें भी उन्हें कॉपी करने की बजाय अपना अंदाज नहीं ढूंढना चाहिए?
मैं इसे ऐसे नहीं देखता। मैं आपको बहुत सारी हॉलीवुड मूवीज दिखा सकता हूं जो इंडियन फिल्मों से इंस्पायर्ड हैं और उन जैसी बनी हैं। हॉलीवुड और हम सब एक बड़ी क्रिएटिव फैमिली हैं। हमारे बीच ये शेयरिंग होनी चाहिए। हमारे टेक्नीशियन वहां काम करते हैं, वहां के टेक्नीशियन यहां। तो ये भेद नहीं होना चाहिए।

'प्लेयर्समल्टीप्लेक्स के लिए है या सिंगल स्क्रीन के लिए। क्या हम ये बंटवारा करके देख सकते हैं?
नहीं, ये फिल्म दोनों के लिए है। अगर आपने अब्बास-मुस्तान भाई की फिल्में देखी हैं तो वो हर तरह की ऑडियंस के लिए होती हैं। और मुझे ये मल्टीप्लेक्स और सिंगल स्क्रीन को अलग करके देखने की बात कभी समझ नहीं आई है। मैं ये फर्क नहीं मानता। क्योंकि पांच साल पहले मल्टीप्लेक्स नहीं थे तो सब ऑडियंस थियेटर में जाकर देखती थी। फर्क कहां था?

नहीं, कस्बों में और इंडिया के इंटीरियर्स में लोगों को 'डेल्ही बैलीजैसी फिल्मों का सेंस ऑफ ह्यूमर शायद समझ आए, जबकि उन्हें 'सिंघमसमझ आएगी।
नो, नो! आई डिसअग्री विद यू! ये कहना गलत होगा कि रूरल में ऑडियंस को समझ नहीं आता। वो लोग बहुत इंटेलिजेंट हैं। उनकी पसंद अलग जरूर हो सकती है। समझ आना एक बात है और पसंद आना दूसरी। आप चंडीगढ़ से हैं, आपको शायद साउथ इंडियन फिल्म पसंद न आए, पर इसका मतलब ये नहीं कि आपको समझ नहीं आएगी।

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गजेंद्र सिंह भाटी