सोमवार, 26 सितंबर 2011

यूं ही बने रहें सर जॉनी इंग्लिश

फिल्म: जॉनी इंग्लिश रीबोर्न (अंग्रेजी)
निर्देशक: ऑलिवर पार्कर
कास्ट: रॉवन एटकिंसन, गिलियन एंडरसन, रोजमंड पाइक, डोमिनिक वेस्ट, डेनियल कालुया
स्टार: तीन, 3.0

चार्ली चैपलिन के बाद बड़ी पवित्रता से हर एक दर्शक को अगर कोई हंसा पाता है तो वो हैं ब्रिटिश एक्टर रॉवन एटकिंसन। कभी मिस्टर बीन तो कभी जॉनी इंग्लिश बनकर। 'जॉनी इंग्लिश रीबोर्न' भी खूब हंसाती है। रात के शो में चंडिगढिय़न बॉयज सीटों पर उछल-उछलकर हंसे। पेट पकड़कर हंसे। तो ये एक मस्ट वॉच है। पूरी फैमिली के साथ जरूर देखें। हफ्ते की श्रेष्ठ फिल्म। इस बार आपका जॉनी इंग्लिश कुछ स्मार्ट है। वह मार खाता ही नहीं है, पिटाई करता भी है। उसके पास अत्याधुनिक गैजेट हैं। वह हिमालय की ऊंचाइयों में चीन से कहीं अपनी शक्तियां बढ़ाकर :) लौटा है। ये जरूर ध्यान रखिएगा कि फिल्म में हर सेकंड लाफ्टर का डोज नहीं है। सुकून पर ज्यादा ध्यान दिया गया है।

अब क्या करेगा जॉनी
ब्रिटिश सीक्रेट एजेंसी एमआई-7 को जब ये पता चलता है कि चीन के प्रधानमंत्री की जान को खतरा है तो वह अपने सबसे बेस्ट एजेंट को याद करती है। स्पेशल एजेंट सर जॉनी इंग्लिश (रॉवन एटकिंसन)। जॉनी अपने पिछले मिशन के बाद से ही एशिया में किसी एकांत जगह पर अपने आपको मजबूत करने में जुटा है। बुलावा आने पर वह लौटता है और काम पर लगता है।

कसर कहां रही
# फिल्म के शुरुआती क्रेडिट बोरिंग तरीके से आते हैं। हां, माना कि ये जेम्स बॉन्ड मूवीज के क्रेडिट्स के साथ मसखरी करने की कोशिश में होता है, पर फिर भी ये इंट्रेस्टिंग नहीं हैं।
# स्पेशल एजेंट टकर बने डेनियल कालुया जॉनी के पार्टनर के तौर पर बोझिल लगते हैं, उनके होने न होने से कोई फर्क नहीं पड़ता। उनमें हंसी का कोई अंश नहीं है।
# पिछली फिल्म की तुलना में यहां रॉवन कुछ धीमे पड़े हैं, ये उनकी लेखनी में दिखता है। ***************
गजेंद्र सिंह भाटी

बिन मौसम मेला है ये

(खिलखिलाती, फिल्म को पहले ही प्रडिक्ट कर लेती, बेहद मजाकिया निष्ठुर उन लड़कियों ने फिल्म को यूं सम अप किया)

फिल्म: मौसम
निर्देशक: पंकज कपूर
कास्ट: शाहिद कपूर, सोनम कपूर, अदिति शर्मा, कमल चोपड़ा, मनोज पाहवा, सुप्रिया पाठक
स्टार: दो, 2.0

पूरा थियेटर निराश था। यही निराशा 'सांवरिया' के पहले शो में देखी थी। 'मौसम' खत्म होने में अभी 25 मिनट थे और आठ लड़कों का वह ग्रुप उठकर जाने लगा। मेरे पास बैठे एक पिता खड़े हुए और बेटे से बोले, 'मैं गाड़ी निकाल रहा हूं तुम ममी और भैया के साथ बाहर आ जाना।' पूरे थियेटर से आ रही बू की आवाजों के बाद भी मैं डटा रहा। चाहता था कि पंकज कपूर की ये फिल्म बहुत अच्छी हो। मैंने पचास एंगल से मन ही मन इसे अच्छा साबित करने की कोशिश की पर कर नहीं पाया। फिल्म का पहला आधा घंटा और बीच-बीच में आते रियलिस्टिक किरदार, चीजें, कपड़े, बोली, गांव और सीन बड़े अच्छे हैं। उसके बाद हर बदलते मौसम में हम परेशान होने लगते हैं। ऐसे लगता है कि कोई जबरदस्ती एक ऐसा नॉवेल पढ़कर हमें सुना रहा है जो हमें बहुत बोरिंग लग रहा है। बहुत सारी सिनेमैटिक, एब्सट्रैक्ट और अच्छी चीजें होने के बावजूद दुख के साथ मैं कहूंगा कि मौसम अच्छी नहीं है।

शॉर्ट में स्टोरी
मल्लूकोट, पंजाब में रहने वाले हरिंदर सिंह (शाहिद कपूर) को अपने पड़ोस में आई कश्मीरी शरणार्थी लड़की आयत (सोनम कपूर) से मासूमियत भरा प्यार हो जाता है। पर इकरार से पहले वह बिछड़ जाते हैं। फिर बदलते मौसम की तरह मिलते-जुदा होते रहते हैं।

हां पकंज, हमें सहानुभूति है
एक मुस्लिम परिवार पर बीतती कहानी 1991, 1993, 1999, 2002 से गुजरती है। 1984 का भी जिक्र आता है। दुख भरी है। एयरफोर्स के वीर रस वाले फाइटर प्लेन, पौशाक, बैज, टशन और गर्व हैं। बड़े लैंडस्केप हैं। स्कॉटलैंड है, स्विटजरलैंड है, अमेरिका है। ये सब तो ठीक पर दोनों लीड स्टार शाहिद और सोनम एक्टिंग करना नहीं जानते हैं। ये दोनों पंकज कपूर की इस फिल्म के हर सीन को मटियामेट करते रहते हैं। पंकज भी निर्देशन के दौरान फिल्म की कहानी से न जुड़े रहकर अपने बेटे की प्रोफाइल शूट करते लगते हैं। (हां, ये बात और है कि 'मौसम' जैसी दर्जनों प्रोफाइल फिल्में भी शाहिद को बेहतर एक्टर पाएंगी, ऐसा लगता नहीं है) साथ ही वह बीच में कई पोएटिक भाषाओं में बातें करने लगते हैं, जो कि आम दर्शकों के मतलब की चीज नहीं है। कहानी को भी वो रेलेवेंट नहीं रख पाते। ऑटो से लौटते वक्त मेरे साथ एक अनजाना यंग कपल बैठा था। लड़की कहने लगी, 'यार पता नहीं ये फिल्म किस बंदे ने बनाई है। बड़ी बोरिंग थी। सब कुछ डाल दिया। इतना भी कम था तो रीसेंट ब्लास्ट भी डाल देते।'

नहीं सुधरेंगे क्या?
शाहिद जो एटिट्यूट चेहरे पर लेकर चलते हैं वह खोखला है। वह भयंकर रूप से निराश करते हैं। उन्हें थोड़ा रुककर ये भी जान लेना चाहिए कि अपने मैनरिज्म या शारीरिक भाव-भंगिमाओं के साथ वह कभी सहज नहीं हो पाते। अभी नहीं हो पाए हैं, आगे भी मिजाज कम ही लगते हैं। आर्मी की वर्दी में कैसे सोबर रहा जाता है ये जानने के लिए शाहिद 'लक्ष्य' की डीवीडी लें और एडजुटेंट मेजर प्रताप सिंह बने अभिमन्यु सिंह को देखें। अभिमन्यु आईएमए की पासिंग आउट परेड में माइक पर बोल रहे होते हैं। सोनम फिल्म में थोपी हुई लगती हैं। शुरू के आधे घंटे में वह निर्देशक साहब की वजह से नॉर्मल लगती हैं, इसकी प्रशंसा करूंगा। उसके बाद तो न पूछें।

ये अच्छा है
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आयत के अब्बू बने एक्टर कमल चोपड़ा ने कश्मीरी शरणार्थी की आवाज और लाचारी को जैसे निभाया है वह बेहतरीन है। फिल्म के बाकी एक्टर उनसे ही बहुत कुछ सीख सकते हैं।
# फिल्म के पहले आधे घंटे में पंजाब को पंकज कपूर ने बहुत सच्ची खूबसूरती से फिल्माया है। मसलन ये बेहद नेचरल सीन है जहां हरिंदर स्कूटर पर आयत के अब्बू को लेकर आ रहा है और पीछे मोहल्ले की चाची लड़ रही है और उनकी आवाज पूरी गली में गूंज रही है।
# मनोज पाहवा की एक्टिंग। वो सीन जब आयत को कातर निगाहों से देखने के लिए अपनी साइकिल की चैन बनाने का नाटक करता हरिंदर है, सामने बैठे मनोज कहते हैं, 'आजकल तो इसकी चैन हमेशा ही उतरी रहती है।' चाय पीते हुए उनका वो लुक और अंदाज उनके वॉन्टेड वाले अंदाज से कितना अलग है।
# गांवों की गलियों को पंकज की नजर से देखना। मनोज पाहवा का किरदार पहले घोड़ागाड़ी चलाता था, अब रिक्शा ले लेता है। ऑरिजिनल फटा सा रिक्शा है। छट से फटा हुआ। गली से आयत और फूफी को सामान साथ जब दुपहरी में ऑटो में लेकर वह ऑटो गियर में डालकर चलते हैं और पीछे से धूल उड़ती है तो अपने गांव की हूबहू ऐसी ही गलियों की याद आ जाती है।
# गोधरा दंगों के दौरान दंगाइयों से हरिंदर/हैरी आयत को बचाता है तो वह पूछती है.. 'ये कौन है हैरी।' हैरी जवाब देता है, 'भयानक साये हैं आयत, इनके न चेहरे होते हैं न नाम।' ऐसे कुछ संवाद ज्यों ही आते हैं हम समझ जाते हैं कि पंकज कपूर की जबां बोल रही है। मसलन, कमल चोपड़ा के किरदार का एक सीन में ये कहना, 'बाकी तो सब लकड़ी पत्थर है। रख लेने दो उन्हें। इंसानों को उजाड़ रहे हैं, न जाने क्या जोड़ लेंगे।' जैसे शुरू में ये डायलॉग है। 'ये कार सेवा क्या है'... 'कुछ नहीं, ब्लू स्टार मरा नहीं कि अयोध्या पैदा हो गया।'

हमें ये संदर्भ गवारा नहीं
# एक सोल्जर वॉर टाइम में हर पल आखिर कैसे अपने खोए प्यार के बारे में सोचता रह सकता है। (वो भी एक ऐसा प्यार जो महाप्रेमनुमा है इसका एहसास फिल्म बिल्कुल नहीं करवा पाती है, बस ये फैक्ट निगलने के लिए हमारे आगे रख दिया जाता है) खासतौर पर तब जब वो फोन पर अपनी बहन से स्टाइलिश पैशनेट देशभक्ति के अंदाज में कुछ यूं कहता है, 'आई वोन्ट कम, अनटिल आई पुश देम (दुश्मन) बैक टु देयर ब्लडी होल्स।' बेहद फनी और नकली लगता है। क्या देशभक्ति महज इस सीन में ही है।
# मल्लूकोट के दिनों में जब एक सीन में शाहिद अपने चार दोस्तों को कार में बिठाकर ट्रेन से रेस लगाता है, फिर ट्रेन से पहले रेलवे स्टेशन क्रॉस कर लेता है, बाल-बाल बचते हुए, तो पलटकर जाती ट्रेन को देखता है। यहां यूं लगता है कि ये बंदा एयरफोर्स से अपने लैटर का इंतजार कर रहा है और कितना पैशनेट है आम्र्ड फोर्सेज में जाने को लेकर। मगर बाद में ये पैशन खत्म सा हो जाता है।
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गजेंद्र सिंह भाटी

रविवार, 25 सितंबर 2011

ये स्पीडी संसार बेलिया

फिल्म: स्पीडी सिंग्स
निर्देशक: रॉबर्ट लीबरमैन
कास्ट: विनय विरमाणी, रसल पीटर्स, कैमिला बेल, अनुपम खेर, रॉब लो, सकीना जाफरी, गुरप्रीत घुग्गी
स्टार: तीन, 3.0

इंटरनेशनली 'ब्रेकअवे' के नाम से रिलीज हुई हमारी 'स्पीडी सिंग्स' एक संतोषजनक फिल्म है। बहुत नई और धांसू नहीं है पर निराश नहीं करती। आप एंजॉय करते हैं। फिल्म में रसल पीटर्स जैसे बेहद फेमस स्टैंड अप कॉमेडियन हैं, गुरप्रीत घुग्गी हैं और अनुपम खेर हैं पर सब जाया हैं। क्योंकि उनके इंग्लिश बोलते चेहरों के पीछे दूसरे लोगों के हिंदी वॉयसओवर फिट नहीं हो पाते। अब रसल पीटर्स को ही लीजिए। उन्हें हम पसंद ही उनके हिंदी डायलॉग्स, एक्सेंट और टाइमिंग की वजह से करते हैं। वॉयसओवर में सब दब जाता है। शेरां दी कौम पंजाबी... वीर जी वियोण चलेया... और ए साडा संसार बेलिया... जैसे गाने थियेटर में बैठे लोगों को खूब पंसद आते हैं। हल्की-फुल्की अच्छी एंटरटेनर हैं। ट्राई कर सकते हैं।

स्पीडी सिंग्स की कहानी
दरवेश सिंह (अनुपम खेर) टोरंटो में रहते हैं। वाहेगुरु और अपने बिजनेस को सबकुछ मानते हैं। बेटा राजवीर (विनय विरमाणी) आइस हॉकी खेलना चाहता है पर पिता क्रिकेट पसंद करते हैं (उनके मुताबिक क्रिकेट को इंडियन देखते हैं, आइस हॉकी को कौन जानता है)। वह चाहते हैं कि राजवीर अपने चाचा अंकल सैमी (गुरप्रीत घुग्गी) के ट्रक बिजनेस का वारिस बने। बाप-बेटे में यही अनबन है। अपने पैशन को पूरा करने के लिए राजवीर पूरी तरह से सिख दोस्तों की आइस हॉकी टीम भी बना लेता है और कोच डैन (रोब लोव) को भी मना लेता है। पर चुनौतियां तो बस शुरू हुई हैं।

कुछ कड़वा
# आइस हॉकी पर डायरेक्टर रॉबर्ट लीबरमैन ने 'द माइटी डक्स 3' भी बनाई थी और गेम के लिहाज से वो फिल्म उनकी 'स्पीडी सिंग्स' से बहुत बेहतर है।
# कैनेडा की पृष्ठभूमि में अक्षय कुमार की 'पटियाला हाउस' में भी खेल (क्रिकेट), बाप-बेटे के रिश्तों की अनबन, पराई धरती पर अपना अस्तित्व साबित करने की कोशिश और सिखों के मान की बात थी। यहां भी ये सब है। यहां खेल है आइस हॉकी का और ये फिल्म ज्यादा इमोशनल टेंशन नहीं देती।
# फिल्म के लीड एक्टर विनय की ही लिखी इस फिल्म में बहुत की हॉलीवुड फिल्मों का घालमेल है। हंसी-मजाक और पंजाबी म्यूजिक भी बिल्कुल नया नहीं है, पर दोबारा देख-सुनकर भी हम पकते नहीं हैं।
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गजेंद्र सिंह भाटी

बुधवार, 21 सितंबर 2011

तीस सेकंड की खरपतवार की खपत हम पर कैसे हो

बहुत भोली और मासूम लगने वाली एड फिल्में सिर्फ तीस सेकंड में हमारे अगले तीस सालों पर असर छोड़ जाती हैं। अच्छा भी और बुरा भी। इन दिनों इसके बुरे उदाहरण ज्यादा रहे हैं। कुछ हफ्ते पहले ही ब्रिटेन की विज्ञापनों के स्टैंडर्ड पर नजर रखने वाली एजेंसी ने कॉस्मेटिक्स कंपनी 'लॉरिएल' के लेटेस्ट एड पर रोक लगा दी। वजह ये थी कि इसमें हॉलीवुड एक्ट्रेस जूलिया रॉबट्र्स और क्रिस्टी टर्लिंगटन के चेहरों को फोटोशॉप सॉफ्टवेयर के जरिए डिजीटली ज्यादा सुंदर बनाया गया था, जितना इस क्रीम के इस्तेमाल से नहीं होता। ये अनैतिक भी था और प्राकृतिक ब्यूटी के खिलाफ भी। लॉरिएल ऐश्वर्या रॉय को लेकर जो इंडियन वर्जन बनाती है, उसमें भी फोटोशॉप के जरिए एक्ट्रीम गोरापन और झीनी स्किन दिखाई जाती है। वहीं शाहरुख का 'मर्दों वाली क्रीम लगाते हो' एड तो बेहूदगी की इंतहा है।

आपका ये जानना जरूरी है कि इन विज्ञापनों को बनाने वाले आपकी आलोचना से परे नहीं होते। एड और पीआर का कोर्स पढ़कर फील्ड में आने वाले यंगस्टर कुछ भी कैची और शॉकिंग बनाने लगते हैं। टेलीकॉम कंपनी यूनीनोर का बीते दिनों टीवी पर दिन में दर्जनों बार आने वाला एड लीजिए। 'लव सेक्स और धोखा' और 'शैतान' जैसी हालिया फिल्मों में दिखे एक्टर राजकुमार यादव के पैर पर प्लास्टर बंधा है और वह अपनी गर्लफ्रेंड और उसकी दूसरी दोस्त को फोन पर झूठ बता रहा है कि बच्चों की पतंग उतारते हुए चालीस फुट नीचे गिर गया और लग गई। जब उसका दोस्त कहता है, क्यों फोन का बिल बढ़ा रहा है तो राम कुमार कहता है, 'अबे दो पैसे में दो पट रही हैं, क्या प्रॉब्लम है।' यहां से टेलीकॉम कंपनी का नाम हमें याद हो जाता है, एड बनाने वाले का भी प्रमोशन पक्का हो जाता है, पर दो पैसे में दो पटाने का संवाद कितना ओछा और घटिया है, ये हम ज्यादा सोचते नहीं हैं। ऐसा ही एड है टाटा नैनो का। कार में पत्नी कुछ गुनगुनाने लगती है तो पति कहता है, 'इतने साल स्कूटर की तेज हवा मुझसे कुछ चुरा रही थी'.. जब वह पूछती है क्या, तो जवाब होता है, 'तुम्हारी आवाज' उद्देश्य क्या है? सिर्फ इतना कि स्कूटर वालों, स्कूटर फैंको और कार ले लो। मतलब नैनो की सेल्स बढ़ाने के लिए स्कूटर को आउटडेटेड या व्यर्थ बताने का अप्रत्यक्ष संदेश। क्या ये एड एक नैनो को बनने में खर्च होने वाले देश के हजारों लीटर पानी की बात करता है। करोड़ों नैनो खरीदने पर पार्किंग और सड़कों पर ट्रैफिक की समस्या होगी उसका क्या? स्कूटर वाला उसी पर रहना चाहता है। वह संतोषी जीव है, आप उसे जबरदस्ती महत्वाकांक्षी क्यों बनाना चाहते हैं। संसार में सबकी जरूरत के लिए तो पर्याप्त है, लालच के लिए नहीं।


'कौन बनेगा करोड़पति' के इस सीजन में अमिताभ बच्चन ने वापसी की है। इस बार फिल्म माध्यम के इमोशनल टूल्स का इस्तेमाल करते हुए गरीबी और मध्यम वर्ग की लाचारी को भुनाते हुए एड बनाए गए हैं। यहां इस एड में एक युवती बुझे चेहरे और लाचारगी के साथ कैमरे में बोलती है, 'मैं अपनी मां के लिए घर बनाना चाहती हूं। (अब भयंकर विवशता का एहसास करवाते हुए कहती है)...हमारा घर बहुत छोटा है।' सुनकर दिल कांप जाता है। पर क्या 'गजब राखी की अजब कहानी' की कमर्शियल नौटंकी से आगे भी 'कौन बनेगा करोड़पति' बढ़ पाएगा।


हालिया 'रॉयल एनफील्ड: हैंडक्राफ्टेड इन चेन्नई' विज्ञापन, शानदार सिनेमैटिक स्टोरीटेलिंग और फोटोग्रफी का उदाहरण है। सुबह घर से एनफील्ड के प्लांट में जाने को निकलता पति, बाल बांधती वाइफ, घर में बैठी बूढ़ी मां, दरवाजे से झरकर आती सूरज की किरणें, भागकर पिता को टिफिन पकड़ाती और गाल पर पाई देती बिटिया, चेन्नई की सड़कों के रंग समेटता अपनी एनफील्ड पर चलता व व्यक्तिआसपास धार्मिक नाच भी हो रहे हैं और रजनीकांत की फिल्म 'रोबॉट' के पोस्टर भी लगे हैं। ऐसा लगता है जैसे आप थियेटर में फिल्म देख रहे हैं। ये मिसाल है कि एड फिल्में सिनेमैटिकली भी फीचर फिल्मों जैसी होती हैं।


मैं आज की इन एड फिल्मों में नुक्स इसलिए निकाल पा रहा हूं क्योंकि हमारे पास सोशल एडवर्टीजमेंट के सुंदर प्रयास मौजूद हैं। उनमें फोटोग्रफी, डायरेक्शन, लिरिक्स, कॉपी और कहानी को किसी फिल्म सी तवज्जो दी गई है। सार्थकता के भाव के साथ हमारे दिलों को पवित्र कर जाने वाली एक ऐसी ही एड थी राष्ट्रीय साक्षरता अभियान की जो दूरदर्शन पर आती थी।
इसके बोल थे, पूरब से सूर्य उगा, ढला अंधियारा, जागी हर दिशा दिशा, जागा जग सारा...।

गजेंद्र सिंह भाटी
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साप्ताहिक कॉलम सीरियसली सिनेमा से

सोमवार, 19 सितंबर 2011

एस-ई-एक्स और मजेदार मूर्ख प्यार

फिल्म: क्रेजी स्टूपिड लव (अंग्रेजी)
निर्देशक: ग्लेन फिकारा और जॉन रेक्वा
कास्ट: स्टीव कैरल, रायन गोज्लिंग, जूलिएन मूर, एमा स्टोन, मैरिसा टोमइ, केविन बैकन, जोनाह बोबो, एनेलेई टिपटन
स्टार: तीन, 3.0

'क्रेजी स्टूपिड लव' के रूप में बहुत दिन बाद कोई ऐसी स्क्रिप्ट आई है जो बेहद हल्की-फुल्की और ठंडी हवा के झौंके जैसी है। फिल्मों को हर एक सेकंड एंटरटेन करना चाहिए, इस विचार के उलट भी कुछ दर्शक होते हैं और उन्हीं दर्शकों के लिए है ये मूवी। समझने में बड़ी आसान, बिना कोई फिल्ममेकिंग की टेक्निकल टेंशन देते हुए आसान से आसान रूप में आगे बढ़ती हुई। बेहद कम्युनिकेटिव। मैरिड कपल्स जरूर देखें, क्योंकि विषय प्यार है और अमेरिकन फिल्मों का प्यार तो आपको पता ही है कितना ओपन होता है। स्टीव कैरल बेहद एफर्टलेस एक्टर हैं। 'ब्रूस ऑलमाइटी' में न्यूज एंकर के छोटे से मजाकिया रोल में उन्होंने अपनी छाप छोड़ी थी। तब से वो ऐसे एक्टर हो गए हैं जिनसे उम्मीदें नहीं बांधनी पड़ती है। हालांकि स्टूपिड लव की इस कहानी में कुछ समाधान अमेरिकी कैपिटलिज्म वाले हैं, पर उनपर अलग बात हो सकती है। रायन गोज्लिंग भी एफर्टलेस हैं। जैसे उनके लुक्स हैं वैसी ही उनकी एक्टिंग भी है। धारदार। बेहद प्रभावी। कुछ ऐसी ही अलग मूड वाली धारधार एक्टिंग उनकी आने वाली फिल्म 'ड्राइव' में भी नजर आएगी, जिसमें वो 'ट्रांसपोर्टर' फिल्मों के जैसन स्टैथम अंदाज वाले ड्राइवर बने हैं। जूलियेन मूर अपने रोल के प्रति ईमानदार रहती हैं। उनका रोल जिस जरूरत वाला था वो उन्होंने पूरी की है। फिल्म में सबसे फनी पार्ट है कैल का बेटा बने रॉबी, जो पूरी फिल्म में अपनी प्यार जैसिका को पाने के लिए कोशिशें करते रहते हैं, साथ ही अपने पिता को भी प्रेरणा देते रहते हैं।

स्टूपिड प्यार यूं होता है
फिल्म के पहले सीन में ही कैल वीवर (स्टीव कैरल) को उसकी वाइफ एमिली (जूलियेन मूर) ये कहकर चौंका देती है कि वह तलाक चाहती है, क्योंकि वह अपने कलीग डेविड लिंडहेगन (केविन बैकन) के करीब आ चुकी है। अपनी आधी उम्र में पहुंच चुका कैल समझ नहीं पाता कि क्या कहे। कैल का 13 साल का बेटा रॉबी (जोना बोबो) खुद की और अपनी बहन की 17 साल की बेबीसिटर जैसिका राइली (एनेली टिपटन) से प्यार करता है, जबकि जैसिका कैल के प्रति आकर्षित है। जिंदगी की इस नई उलझन के बीच कैल को एक बार में जैकब पामर (रायन गोज्लिंग) मिलता है, जो उसे स्टाइल और शरीर में फिट बनाता है और दूसरी औरतों के साथ डेट पर जाकर अपने कॉन्फिडेंस को बढ़ाने के तरीके सिखाता है। पर प्यार में मूर्खताओं की इस कहानी में चार-पांच कहानियां चलने लगती हैं और इससे दो घंटे फनी बन पड़ते हैं।

मसलन डायलॉग
एक सीन में कैल के पड़ोसी बर्नी (जॉन कैरल लिंच) की वाइफ कैल के चरित्र के बारे में कोई एडल्ट बात कह रही होती है, तो अपने बच्चों के सामने ऐसे नहीं बोलने की बात कहते हुए बर्नी बोलता है, 'आई डोन्ट लाइक दिस एस-ई-एक्स टॉक इन फ्रंट ऑफ द के-आई-डी-एस।' ये बड़े गुदगुदाने वाले तरीके से होता है। मुझे ये डायलॉग सबसे फनी और खास इसलिए लगा क्योंकि आम अमेरिकी मूवीज की तरह ढर्रे वाले बुरे शब्द यहां यूज नहीं होते और पूरा फन भी कायम रहता है।

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गजेंद्र सिंह भाटी

रविवार, 18 सितंबर 2011

कैप्टन अमेरिका दौड़ेगा नहीं पर चलेगा, जरूर चलेगा

फिल्म: कैप्टन अमेरिका - द फस्र्ट अवेंजर (अंग्रेजी)
निर्देशक: जो जॉनस्टन
कास्ट: क्रिस इवान्स, हैली एटवेल, ह्यूगो वीविंग, टॉमी ली जोन्स, सबैश्चियन स्टैन, डॉमिनिक कूपर, नील मेकडॉनफ, डेरेक ल्यूक, स्टैनली टुकी
स्टार: ढाई, 2.5
बहुत सारी खूबियों के बावजूद मैं 'कैप्टन अमेरिका: द फस्र्ट अवेंजर' को औसत फिल्म मानूंगा। दुख की बात है। जब स्टीव रॉजर्स ट्रीटमेंट के बाद सुपर सोल्जर बन जाता है और उसी सीन में नाजी एजेंट के पीछे न्यू यॉर्क की सड़कों पर नंगे पांव दौड़ता है, तो बस यहीं तक फिल्म बहुत ही इंट्रेस्टिंग लगती है। उसके बाद स्क्रिप्ट से इमोशन गायब हो जाते हैं, विलेन का कैरेक्टर स्पष्ट नहीं हो पाता, कहानी में घुमाव नहीं आते, न दर्शकों और लोगों में डर का माहौल बनता है और न सुपरहीरो के आने पर तालियां बजती हैं। अब यहां कैप्टन अमेरिका के गैर-मशीनी स्टंट आगे भी जारी रहते तो फिल्म अद्भुत हो सकती थी, पर ऐसा होता नहीं। आप 2003 में आई 'रनडाउन/वेलकम टू द जंगल' में ड्वेन जॉनसन (द रॉक) को देखिए। जंगल में उनके इंसानी स्टंट कमाल के हैं। वो एक सुपर हीरो फील देते हैं, यहां कैप्टन नहीं दे पाते। फिर भी एक अलग सुपरहीरो टेस्ट के लिए ये फिल्म जरूर एंजॉय कर सकते हैं।

मिलें कैप्टन अमेरिका से
आर्कटिक की बर्फ में 2011 में वैज्ञानिकों को अमेरिकी झंडे में लिपटी गोल ढाल जैसी चीज मिलती है। बता दूं कि ये सुपरहीरो 'कैप्टन अमेरिका' की ढाल है। अब कहानी 1942 में पहुंचती है। दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान नाजी अफसर जोहान (ह्यूगो वीविंग) नॉरवे से कोई रहस्यमयी शक्तियों वाला क्रिस्टल चुराता है और अपनी विशेष सेना और ताकत बनाने लगता है। वहीं न्यू यॉर्क में कम कद का दुबला-पतला कमजोर स्टीव रॉजर्स (क्रिस इवॉन्स) सेना की भर्ती में लिया नहीं जाता। पर उसके भीतर छिपे अच्छे इंसान को डॉ. अब्राहम (स्टैनली टुकी) पहचानते हैं और उसे 'सुपर सोल्जर' बना देते हैं। बहुत सी सतहों से होते हुए स्टीव का मुकाबला जोहान से होता है।

कहां क्या लगता है...
# 'द क्यूरियस केस ऑफ बेंजामिन बटन' में बूढ़े पैदा हुए ब्रेड पिट को दिखाने के लिए जो तकनीक बरती गई, वही यहां क्रिस इवॉन्स पर अपनाई जाती है। एक सेकंड भी ऐसा नहीं लगता कि ये दुबला-पतला स्टीव असल में छह फुट से ज्यादा का छरहरा हीरो हो जाएगा।
# समझ नहीं आता कि हर बार एक औसत अमेरिकी को सुपर बनने के लिए कोई डायमंड, क्रिस्टल या कुछ और ही क्यों चाहिए होता है? क्या इंसानी ताकत काफी नहीं। हर बार इस देश के दुश्मन रूसी, जापानी, जर्मन, मुस्लिम और चीनी ही क्यों होते हैं?
# स्टीव का कांधे पर अमेरिकी फ्लैग वाली ढाल लटकाए नाजी आर्मी कैंप में इधर-ऊधर भागना अखरता है।
# सुपरहीरो बनने के बाद स्टीव को रंगीन ड्रेस पहनाकर देश की जनता के सामने प्रोपगेंडा करवाया जा रहा है, वह उदास है। तभी एक बुद्धिभरा सांकेतिक सीन आता है। वह बारिश में बैठा एक चित्र बना रहा है, जिसमें उसकी जगह एक बंदर सुपरहीरो की ड्रेस में छाता लेकर नाच रहा है।

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गजेंद्र सिंह भाटी

शनिवार, 17 सितंबर 2011

इंसानी कसाईबाड़े में बंद आठ जिंदगियां

फिल्म: फाइनल डेस्टिनेशन 5 (अंग्रेजी)
निर्देशक: स्टीवन क्वेल
कास्ट: निकोलस डोगस्टो, माइल्स फिशर, एलन रो, जेक्लीन वुड, एमा बेल, पी.जे.बायर्न, आर्लन एस्कर्पेटा, डेविड कोएश्चनर, टोनी टॉड
स्टार: तीन, 3.0

सबसे पहले जान लें कि ये हॉरर फिल्म है। वीभत्स है और थ्रीडी में है इसलिए खून और मांस से लथपथ सीन देख बड़े से बड़ा सूरमा भी विचलित हुए बगैर नहीं रह पाएगा। तो फैमिली और बच्चों के साथ देखने का प्लैन बनाने से पहले सोच लें। अपने जॉनर के हिसाब से 'फाइनल डेस्टिनेशन 5' संतुष्ट करती है। मगर कहानी में नया कुछ नहीं है। एक्टिंग सबकी फेल है। मौत का इंतजार कर रहे उन आठ लोगों में सब बारी-बारी मर रहे हैं, मगर बचे हुए लोगों के चेहरे पर भय ही नहीं नजर आता। फिल्म में कभी-कभार फनी डायलॉग भी आ ही जाते हैं। 2000 में आई पहली 'फाइनल डेस्टिनेशन' के सबसे करीब ये फिल्म अपनी थ्रीडी के लिए जानी जाएगी। हर एक्सीडेंटल सीन को नक्काशीनुमा परफेक्शन से बनाया गया है। खासतौर पर ब्रिज गिरने वाला सीन। बाकी सात-आठ भयावह दृश्य और हैं। इस फ्रैंचाइजी के रेग्युलर फैन जरूर देखें।

उन भाग्यशाली आठ की कहानी
एक कंपनी के सभी कलीग घूमने जा रहे हैं। बस नॉर्थ बे ब्रिज पहुंचती है कि सैम (निकोलस डोगस्टो) को आभास होता है कि ब्रिज टूट जाएगा और -एक करके सब मर जाएंगे। उसका ध्यान भंग होता है और वो अपनी गर्लफ्रैंड मॉली (एमा बेल) का हाथ पकड़ सबको चेताते हुए बस से निकलकर भागने लगता है। जो लोग उसके पीछे जाते हैं वो बच जाते हैं बाकी मारे जाते हैं, क्योंकि ब्रिज वाकई में टूट जाता है। अब इन जिंदा बचे आठ लोगों के पीछे मौत लगी है और कहानी आगे बढ़ती है।

बात कमजोरी की
# कहानी में इनोवेशन नहीं है। सब कुछ इस सीरिज की पहली फिल्म जैसे होता है। कुछ लोग टुअर पर निकले हैं। कोई एक बड़े एक्सीडेंट को भांप लेता है। उसके कहने से कुछ लोग भाग लेते हैं और बच जाते हैं। फिर उस एक से पुलिस पूछताछ करती है। फिर सब सीमेट्री पर शोक प्रकट करने जुटते हैं। फिर एक अजीब सी बातें करने वाला बंदा आता है और कहता है, 'डेथ डज नॉट लाइक टु बी चीटेड।' अब यहां तक आते-आते पता चल जाता है कि इस फिल्म में आठों जिस क्रम में उस ब्रिज पर मरने वाले थे उसी क्रम में फिल्म के बाकी हिस्से में मारे जाएंगे।
# आइजेक (पी.जे.बायर्न) के हंसने के तरीके में टॉम हैंक्स की आवाज सुनाई देती है और पीटर (माइल्स फिशर) की पर्सनैलिटी हूबहू टॉम क्रूज जैसी लगती है। हालांकि फिल्म में दोनों ही गुण काम नहीं आते।
# बाकी चार फिल्मों की तरह इसमें भी थीम वही है। मौत के आने की आहट, उसका पूर्वाभास, उससे बच जाना और फिर अंतत: मारा जाना। जब ये इतना एब्सट्रैक्ट विषय है ही तो इसमें कुछ और मेहनत करके स्मार्ट मोड़, डायलॉग या सोच डाली जा सकती थी। राइटर एरिक हाइजरर ने कोई उल्लेखनीय स्क्रीनराइटिंग पहले नहीं की है, तो कमजोर स्क्रिप्ट होने की एक बड़ी वजह तो वो हैं। दूसरा फिल्म के निर्माता, जिनका ज्यादा ध्यान फिल्म को कमर्शियल बनाने और उसके थ्रीडी वर्जन पर टेक्नीकल काम करने में चला गया।

आखिर में
फिल्म में इरीटेटिंग थे मुझसे पीछे बैठे दो पंजाबी दोस्त। हर खौफनाक और खूनी सीन में जब मांस के लोथड़े थ्रीडी चश्मे के लेंस के करीब भक्क से आकर लगते थे, वो दोनों फन के मारे जोर-जोर से हंसने लगते। जैसे मिस्टर बीन का प्रोग्रेम देख रहे हों। इसके उलट पूरे थियेटर में दर्शकों की सांस हलक में अटकी ही रही।
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गजेंद्र सिंह भाटी

मंगलवार, 13 सितंबर 2011

'हीरानी से लडऩे को तरकश में बड़े तीर चाहिए'

इनकी सबसे पहली पहचान बनी 1991 के शुरू में दूरदर्शन पर आने वाले एपिक सीरियल 'चाणक्य' से। लेखक, निर्देशक और मुख्य अभिनेता चाणक्य डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी खुद थे। 2003 में इन्होंने फिल्म 'पिंजर' बनाई और अब ला रहे हैं सनी देओल की मुख्य भूमिका वाली 'मोहल्ला अस्सी'। ये फिल्म मशहूर उपन्यासकार काशीनाथ सिंह के उपन्यास 'काशी का अस्सी' पर बनी है। कुछ वक्त पहले बड़ी तुरत-फुरत में हुई इस बातचीत के कुछ अंश:

'काशी का अस्सी' में बहुत सारे किरदार-कहानियां हैं, इसे दो घंटे की स्क्रिप्ट में ढालना कैसा रहा?
आप सही कह रहे हैं। पर किताब के अध्याय 'पांड़े कौन कुमति तोहें लागी' पर ही स्क्रिप्ट का ज्यादातर ढांचा आधारित है।

क्या उपन्यास की तरह फिल्म में भी गालियां उसी प्रवाह में हैं?
देखिए, समाज में गालियों को बुरा माना जाता है, पर इस कहानी में गालियां तृतीय पात्र की तरह हैं। वो आती हैं, पर फिल्म में कथा का पात्र, उसका संघर्ष, बाकी किरदारों की अभिव्यक्ति, ग्लोबलाइजेशन और उदारवाद में समाज में क्या-क्या उखड़ रहा है, रिश्ते और सब कुछ कैसे टूट रहा हैं... ये सब भी हैं। बाकी सिर्फ गालियों से कुछ नहीं होता है। हिंदी में हर साल 240 फिल्में बनती हैं, सब गालियों से तो सफल नहीं हो सकती है न। 'काशी का अस्सी' की तो पहचान ही गालियों से है।

मूल एक्शन छवि से सनी को अलग इमेज में लाते वक्त कुछ चिंता नहीं हुई?
नहीं। न ही मैंने इस इमेज की चिंता की और न ही सनी ने। एक अभिनेता वह होता है जो चुनौतियों को स्वीकार करे। दुर्भाग्य से सनी को वैसी भूमिकाएं कभी नहीं दी गई। उनकी एक्टिंग के दूसरे पहलू कभी लोगों के सामने नहीं आ पाए। और हम भूल जाते हैं कि सनी वही एक्टर हैं जिन्हें दो राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भी मिले हैं। इतिहास गवाह रहा है कि जब भी कोई एक्टर अपनी स्थापित छवि को तोड़ता है तो लोग उसे सिर आंखों पर बिठाते हैं। प्राण साहब अपनी शुरुआती फिल्मों में मशहूर विलेन रहे हैं, पर जब उन्होंने पॉजिटिव चरित्र भूमिकाएं करनी शुरू की तो लोगों ने खूब सराहा। संजय दत्त को लीजिए। वो पहले अलग भूमिकाएं करते रहे, पर जब उन्होंने 'मुन्नाभाई...' की तो किसी ने उम्मीद भी नहीं की थी।

फिल्म बनाने से पहले रिकवरी की परवाह करते हैं?
मैंने कभी इसकी परवाह नहीं की। वैसे भी कहानीकारों को इसकी परवाह नहीं करनी चाहिए। मेरी फिल्म में सनी हैं और वो एक स्थापित कलाकार हैं इसलिए मुझे चिंता करने की जरूरत नहीं है।

फिल्म कब रिलीज होगी?
नवंबर-दिसंबर तक रिलीज करने की सोच रहे हैं। तब बॉक्स ऑफिस पर ज्यादा भीड़ भी नहीं होती है। जैसे अभी 'सिंघम' की रिलीज टाइमिंग रही।

हाल ही में अलग सिनेमैटिक लेंग्वेज वाली फिल्में आई हैं। सार्थकता के लिहाज से आप उन्हें कितना महत्व देते हैं?
स्टोरीटेलिंग तो देखिए हर दिन बदलती है। नानी-दादी की कहानी भी चलती है और यार-दोस्तों की भी। हमारे बीच हर स्टाइल की कहानी को जगह है। इसमें 'डेल्ही बैली' भी है, अनुराग का सिनेमा भी है और राजकुमार हीरानी का सिनेमा भी है।

इस फिल्म के कथ्य में आपने किस बात का ध्यान रखा है?
मैंने अपनी कहानी का प्रारब्ध, मध्य और अंत ढूंढने की कोशिश की है। एक फिल्मी स्टोरी कहने का जो क्लासिक फॉर्मेट होता है उसे तोडऩे की कोशिश की है।

मौजूदा फिल्ममेकर्स में किसके काम को अच्छा मानते हैं और क्यों?
मैं मानता हूं कि कहानी सबसे बड़ी होती है। राजकुमार हीरानी ने 'लगे रहो मुन्नाभाई' में महात्मा गांधी के किरदार को जैसे इस्तेमाल किया, उससे मैं बहुत प्रभावित हुआ। मैंने उन्हें फोन किया और कहा कि तुमसे लडऩे के लिए तरकश में बड़े तीर लाने पड़ेंगे क्योंकि तुमने काम ही ऐसा किया है।

हमेशा ऐतिहासिक किरदारों पर ही क्यों काम करते हैं?
मैंने हमेशा एतिहासिक विषयों पर फिल्में बनाई हैं। क्योंकि वर्तमान तो सबके सामने हैं, उसे सब जानते हैं, पर जो गुजर गया है वो अज्ञात है। जिज्ञासा होती है कि वो जब कभी रहा होगा तो उसका स्वरूप कैसा हुआ होगा।

अपनी बातचीत में आप 'वैराग्य' का भाव पैदा होने का जिक्र करते हैं। क्या पहचान या फीडबैक न मिलने से भी ऐसा होता है?
जो तारीफ नहीं मिलने पर वैराग्य की बात करते हैं, वो निराशा का भाव होता है, वैराग्य का नहीं। वैराग्य आपकी वैचारिक और सामाजिक पृष्टभूमि से आता है।

'चाणक्य' आज भी लोगों के क्लासिक डीवीडी कलेक्शन में शामिल है। क्या फिर अभिनय करने का ख्याल नहीं आता?
नहीं यार, बहुत हो गया वो। जितना करना था कर लिया। बाकी अपनी रचनात्मकता को प्रदर्शित करने के मौके अभिनय से ज्यादा निर्देशन में होते हैं।

इतनी कम फिल्में क्यों बनाते हैं?
एक बार सईद अख्तर मिर्जा से किसी ने पूछा था कि आप फिल्में क्यों नहीं बनाते हैं, तो उन्होंने कहा कि मैं कहां नहीं बनाता हूं कोई बनाने ही नहीं देना चाहता है। वही मेरे साथ है। फिल्मों की लागत बहुत बढ़ गई है। एक फ्लॉप हो जाए तो दूसरी बनाने के रास्ते बंद से हो जाते हैं। एक हिट हो जाए तो दूसरी के लिए सोचना नहीं पड़ता। मुझे ये लगता है कि 'मोहल्ला अस्सी' के बाद मुझे दूसरी फिल्म बनाने में कोई मुश्किल नहीं आनी चाहिए।

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गजेंद्र सिंह भाटी

रविवार, 11 सितंबर 2011

इस सबजेक्ट पर बनी फिल्मों के ढर्रे की मरम्मत करती हुई

फिल्म: फ्रैंड्स विद बैनिफिट्स
निर्देशक: विल ग्लूक
कास्ट: जस्टिन टिंबरलेक, माइला क्यूनिस, वूडी हैरलसन, नोलन गाउल्ड, जेना एल्फमेन, रिचर्ड जेनकिंस, पैट्रिशिया क्लार्कसन
स्टार: तीन, 3.0

जब आप थियेटर में होते हैं तो प्रार्थना करते हैं कि फिल्म शुरू होने तक टॉर्चर देने वाले चाय, क्रीम या रियल एस्टेट के एड न दिखाए जाएं। ऐसे में जब बैक टु बैक 'मनीबॉल', 'जूकीपर', '30 मिनट्स' और 'अनॉनिमस' जैसी चार बेहतरीन और अलग टेस्ट वाली फिल्मों के ट्रेलर दिखते हैं तो मूड फ्रैश हो जाता है। उसके बाद शुरू होती है 'फ्रेंड्स विद बैनिफिट्स' और बड़े ऑर्डिनरी से पोस्टर वाली ये फिल्म उस मूड को खराब नहीं होने देती। जस्टिन टिंबरलेक और माइला क्यूनिस अपने आप में कोई मेगास्टार नहीं हैं, पर फिल्म के स्मार्ट और चपल डायलॉग्स के साथ सुकून देते हैं। गुदगुदाने का बाकी काम जीक्यू के स्पोट्र्स एडिटर टॉमी बने वूडी हैरलसन और डिलन का भांजा सैमी (नोलन गोउल्ड) करते हैं। सैमी की फेल होती मैजिक ट्रिक्स और टॉमी के 'यू श्योर, योर नॉट गे?' सबसे ज्यादा याद रहते हैं। एक नॉन-कॉमिक जॉनर वाली फिल्म में हंसी की संतुलित मात्रा इस फिल्म जितनी होती है, ये आदर्श पैमाना हो सकता है। इस सब्जेक्ट वाली ज्यादातर हॉलीवुड फिल्मों में स्क्रिप्ट जो ढर्रा लिए होती है, वो यहां नहीं है। इसे जरूर देख सकते हैं।

दोस्ती के दौरान
डिलन (जस्टिन टिंबरलेक) लॉस एंजेल्स में इस छोटी इंटरनेट कंपनी में आर्ट डायरेक्टर है। उसका काम बहुत अच्छा है इसलिए जीक्यू मैगजीन उसे इंटरव्यू करना चाहती है। उसकी भर्ती सुनिश्चित करने का काम एक एग्जीक्यूटिव रिक्रूटर जैमी (माइला क्यूनिस) को मिलता है। पर डिलन एलए छोड़कर न्यू यॉर्क नहीं आना चाहता। जैमी की कोशिशों से वह न्यू यॉर्क जीक्यू में आ जाता है। फिर दोनों सिर्फ दोस्त रहने और उससे आगे न बढऩे की शर्त पर फिजिकल होते हैं। पर प्यार का क्या है वो तो होना ही होता है।

रिश्तों की समझाइश
सिर्फ फ्रेंड होने या बॉयफ्रेंड-गर्लफ्रेंड हो जाने और सिर्फ फिजीकल रहने या प्यार कर बैठने की कशमकश है डिलन और जैमी के बीच। महाशहरी इंग्लिश स्पीकिंग यंगस्टर्स और वर्किंग प्रफेशनल्स इस सब्जेक्ट के दायरे में आते हैं। उन्हें ये फिल्म सबसे ज्यादा पसंद आएगी। जो लोग हॉलीवुड की फिल्में देखते हैं और सुनकर तुरंत समझते हैं, उन्हें फिल्म देखने वक्त राहतभरा मजा आएगा। इसी के तहत फिल्म में जो फिजीकल होने के सीन हैं वो फनी लगते हैं। उनमें वल्गैरिटी या कहीं भी भद्दापन नहीं है। बल्कि यहां भी दर्शक कंफर्टेबल रहते हुए ठहाके लगाते हैं। डिलन के अपने पिता (रिचर्ड जेनकिंस) और बड़ी बहन एनी (जेना एल्फमैन) के साथ रिश्ते को भी अच्छे फ्रेम में जड़ा गया है। वो फिल्म की जरूरत लगते हैं। ठीक वैसे ही जैमी की बोल्ड मदर (पैट्रिशिया क्लार्कसन) भी फिल्म में फिट लगती हैं।

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गजेंद्र सिंह भाटी

शनिवार, 10 सितंबर 2011

सोडरबर्ग का इंफेक्शन, एक ईमानदार कोशिश

फिल्म: कंटेजियन (अंग्रेजी)
निर्देशक: स्टीवन सोडरबर्ग
कास्ट: मैट डेमन, केट विंस्लेट, ग्वेनैथ पॉल्ट्रो, जूड लॉ, मेरियन कोटिलार्ड, लॉरेंस फिशबर्न
स्टार: तीन, 3.०

'कंटेजियन' को देखने से पहले मैं फिल्म के बारे में कुछ भी नहीं जानता था, तो उसे बिना किन्हीं उम्मीदों के देख पाया। चूंकि निर्देशक स्टीवन सोडरबर्ग के सिनेमा से भी वाकिफ हूं तो यहां उनके उस एफर्ट को समझ पाया जो उन्होंने 'बबल', 'सेक्स लाइज एंड वीडियोटेप्स' और 'चे' बनाकर किया था। संक्रमण, वायरस या फ्लू पर बनने वाली हॉलीवुड़ फिल्मों में लोगों के डर और मानवता पर खतरे के इमोशन को फिल्म में लार्जर देन लाइफ बनाकर भुनाया जाता है। लोगों को जॉम्बी बनाकर, सूने हो चुके शहर की सड़कें दिखाकर, न्यूक्लियर यूज के साथ आर्मी को लाकर और एक-दो लोगों को हीरो बनाकर एक धांसू एंटरटेनिंग फिल्म बना दी जाती है। जो कोई बुरी बात नहीं है, पर यहां ऐसा नहीं है। केट विंस्लेट, ग्वेनैथ पॉल्ट्रो और मेरियन कोटिलार्ड यूं आती और चली जाती हैं जैसे सोडरबर्ग के लिए उनकी फिल्म की कहानी से जरूरी और ऊंचा कोई नहीं है। इस फिल्म में हम ऐसी भयावह बीमारियों के उभरने और फैलने के प्रोसेस को समझते हैं। जान पाते हैं कि कैसे गवर्नमेंट एजेंसियां काम करती हैं। कितनी बेइमानी और ईमानदारी से। ये भी कि सरकारों के लिए मुश्किल वक्त आने पर जनता कितनी कम जरूरी हो जाती है। ऐसे किरदार भी दिखते हैं जो हकीकत जानते हैं और लोगों की मदद कर सकते हैं पर उन्हें दबा दिया जाता है। मसलन यहां जूड लॉ का किरदार, जो मल्टीनेशनल कंपनियों पर कमेंट करता है और लगातार बोलता रहता है। इतनी जानकारी देने और मानवता पर आन पड़ी आपदा को सरल तरीके से दिखाने के गुण के बावजूद फिल्म कोई डॉक्युमेंट्री नहीं लगती, एक संपूर्ण हॉलीवुड फिल्म लगती है। पहली बात ये कि 'कंटेजियन' बोरिंग नहीं है, दूसरी ये कि ये मसाला एंटरटेनर भी नहीं है। हां, इतना जरूर है कि '28 डेज लेटर', 'रेजिडेंट ईविल' और 'आउटब्रेक' जैसी फिल्मों के बीच हमें इस फिल्म जैसी बेहद ईमानदार कोशिश नजर आती है। डैनी बॉयेल की '28 डेज लेटर' में हम देखते हैं कि चिंपाजिंयों पर हुए क्रूर मानवीय प्रयोगों से पैदा हुआ वायरस कैसे 28 दिन बाद शहर को खाली कर देता है, वहीं इस फिल्म में उन 28 दिन तक हम कैसे पहुंचते हैं, ये देखते हैं। सुलझी हुई इस बेहद मैच्योर फिल्म को एक बार जरूर देखना चाहिए।

जमीन से जुड़ी कहानी
हॉन्ग कॉन्ग में अपनी बिजनेस ट्रिप से अमेरिका लौटी बैथ (ग्वेनैथ पॉल्ट्रो) अगले दिन अपने घर में बेहोश होकर गिर जाती है। हस्बैंड मिल्च (मैट डेमन) अस्पताल ले जाता है पर डॉक्टर उसे मृत घोषित कर देते हैं। धीरे-धीरे अमेरिका और दुनिया के दूसरे हिस्सों में भी लोग इस वायरस से इन्फैक्टेड होने लगते हैं और मौतें होने लगती हैं। चमगादड़ और सूअर के जरिए फैले इस वायरस की तह तक जाने में डब्ल्यूएचओ, अमेरिकी डिजीज कंट्रोल और प्रिवेंशन सेंटर और बाकी एजेंसियां एक्टिव हो जाती हैं। फिर कहानी में एक ब्लॉगर-जर्नलिस्ट एलन (जूड लॉ) आता है, जो शुरू से सब कुछ जानता है पर कोई उसकी सुनता नहीं। वैकल्पिक मीडिया में उसके लाखों फॉलोवर बनते हैं और साथ ही साथ गवर्नमेंट की फेल हो चुकी लीडरशिप, ध्वस्त शहरी ढांचा और बेबस अमेरिकी जनता दिखती है। फिल्म की कहानी में मौजूद हर मैलोड्रमैटिक संभावना को कम से कम बढ़ाने-चढ़ाने की कोशिश की गई है।

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गजेंद्र सिंह भाटी

फिल्मी फिल्म है, एन्जॉय करें और भूल जाएं

फिल्म: मेरे ब्रदर की दुल्हन
निर्देशक: अली अब्बास जफर
कास्ट: इमरान खान, कटरीना कैफ, अली जफर, मोहम्मद जीशान अयूब, तारा डिसूजा, बृजेंद्र काला
स्टार: तीन, 3.0

फिल्म देखते हुए मुझे कुछ झुंझलाहट हुई। क्यों? जानने से पहले 'हम आपके हैं कौन' के अंताक्षरी सॉन्ग पर चलते हैं। जिसके पास तकिया आता है वह कोई न कोई फिल्मी गाना गाता है या डायलॉग बोलता है। अनुपम खेर अपनी बारी आने पर प्लास्टिक की कुर्सी पर खड़े हो, हाथ में मिनरल वॉटर की बोतल ले, रीमा लागू को बसंती और आलोकनाथ को मौसी बनाकर 'शोले' का मशहूर डायलॉग सुसाइड... बोलते हैं। ये सीक्वेंस शानदार बन पड़ता है, मगर जीप के बोनट पर खड़ी होकर जब कटरीना सुसाइड... वाला डायलॉग इस फिल्म में बोलती हैं तो छाती चौड़ी नहीं होती कि मैं ये फिल्म देखने आया। 'ओम शांति ओम' और 'बुड्ढा होगा तेरा बा' जैसी फिल्मों में इतना बॉलीवुड डाल दिया जाता है कि ये फिल्में खुद कुछ नहीं रह पातीं। ऐसा ही 'मेरे ब्रदर की दुल्हन' के साथ है। चूंकि इस फिल्म का नाम और स्टोरी इतने अनुमानित हैं कि ढाई घंटे दिखाने को कुछ बचता नहीं। इस कसर को ढकने के लिए डायरेक्टर अली अब्बास जफर हिट फिल्मों के गानों की कोरियोग्रफी, पोस्टर और डायलॉग फिल्म में ठूसते जाते हैं और हम फ्रैश कंटेंट को तरसते जाते हैं। उन्हें समझना होगा कि कटरीना और तारा डिसूजा के किरदारों को बीड़ी, सिगरेट या दारू पिला देने से वह कुछ नया नहीं करते। नयापन स्क्रिप्ट और अदाकारी में चाहिए जो मिसिंग है। हालांकि फैमिली और फ्रैंड्स के साथ जाएंगे तो फिल्म आपको ठीक-ठाक एंटरटेनमेंट देगी, बावजूद इसके मुझे ये टोटके थोथे और इरीटेट करने वाले लगे।

बात कुछ यूं है
लंदन में रहने वाला लव अग्निहोत्री (अली जफर) अपनी पांच साल से गर्लफ्रेंड रही गुजराती लंदन बोर्न लड़की पियाली (तारा डिसूजा) से ब्रेकअप कर लेता है। अब शादी करके सेटल होना चाहता है। दिल्ली में छोटे भाई कुश (इमरान खान) को फोन करके अपने लिए लड़की ढूंढने को कहता है। कुश देहरादून अपने पेरंट्स के पास जाता है। जुबां पर गाना लिए 'दिल से हो दिल्ली, हो धड़कन से लंदन... मेरे ब्रदर की दुल्हन'। उसकी तलाश डिंपल दीक्षित (कटरीना कैफ) पर आकर रुकती है, जिसे वह पहले भी मिल चुका है। बात आगे बढ़ती है और फिर कुछ ऐसा होता है कि कुश को डिंपल से प्यार हो जाता है। चूंकि फिल्म बिल्कुल भी गंभीर नहीं है इसलिए बिना किसी बड़ी टेंशन के हम क्लाइमैक्स में पहुंचकर थियेटर से बाहर निकल आते हैं।

अभिनय के मामले में औसत
फिल्म के लीड एक्टर अपने कैरेक्टर को अपने प्रयासों से कोई आइडेंटिटी नहीं दे पाते हैं। कटरीना का बिंदास अंदाज हो या अली जफर की कुछ-कुछ पाकिस्तानी एक्सेंट में डायलॉग डिलीवरी या फिर इमरान का ब्लैंक फेस, सब इनकी पिछली फिल्मों में हमने देखा है। बृजेंद्र काला (शादी अरेंजर) और मोहम्मद जीशान अयूब (शोभित, कुश का दोस्त) के किरदार कुछ क्षण ही सही अपने परफॉर्मेंस में ताजगी लाते हैं। कैसा ये इस्क है... और मेरे ब्रदर की दुल्हन... गानों के बोल इरशाद कामिल ने मेहनत से लिखे हैं पर जबान पर नहीं चढ़ते, न ही याद हो पाते हैं।

बॉलीवुड की पैरोडी सी है यहां
# ओपनिंग गाने में चल छैंया छैंया (शाहरुख), हुण हुण दबंग दबंग - जवानी फिर ना आए (सलमान), मस्ती की पाठशाला (आमिर).. इन गानों के सिग्नेचर डांस स्टेप हैं।
# ऐसा ही कैसा ये इस्क है... गाने में है। मसलन, इसमें 'जोधा अकबर' के ख्वाजा जी.. गाने के स्टेप हैं।
# 'हम भाग नहीं सकते। मैं 'कयामत से कयामत तक' का आमिर खान और तुम जूही चावला नहीं हो। कि भागकर हम अपनी छोटी सी झोंपड़ी बनाएंगे। मैं फैक्ट्री में काम करूंगा और तुम कपड़े में प्याज-रोटी बांधकर मेरे लिए लाओगी। हम लोग मिडिल क्लास फैमिली से हैं, फिल्म के कैरेक्टर नहीं।'... इमरान के इस डायलॉग में भी फिल्मी संदर्भ है।
# शादी की तैयारियां करवा रहे बृजेंद्र काला कुछ कॉमिक रिलीफ लेकर आते हैं। जब उनसे पूछा जाता है, 'सब कंट्रोल में है... तो वह कहते हैं, 'कंट्रोल से भी कंट्रोल है। आई एम अ कॉम्पलैन बॉय।' पढऩे में खास नहीं लगता, पर परदे पर देखकर हंसी आती है। एक डायलॉग में पूछा जाता है, 'भाई साहब हो गए रेडी?' तो वह कहते हैं, 'ऐसा वैसा रेडी?.. एवर रेडी।'
# 'यूपी आए और भांग नहीं पी तो क्या खाक यूपी आए।' इस सीक्वेंस के दौरान ढाबे पर बैकग्राउंड में 'दबंग' और 'मुगल-ए-आजम' के एकदम नए बड़े पोस्टर खासतौर पर लगाए नजर आते हैं।
# पुराने जमाने का फिलिप्स का रेडियो एक-दो गानों के शुरू होने का लॉजिक बनता है। गैजेट्स के इस बेहद आधुनिक वक्त में चार बड़े निप्पो सेल वाला वो एंटीक रेडियो अलग अनुभव देता है।

आखिर में
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चूंकि अली अब्बास जफर पहली बार के निर्देशक-लेखक हैं इसलिए फिल्म की थीम और एक और प्रेडिक्टेबल लव स्टोरी के लिए ही उनकी आलोचना करने से बचना चाहिए। बावजूद मेरी झुंझलाहट के मैंने ध्यान इस बात का रखा है कि बड़ी लगन और पागलपन से फिल्म में बॉलीवुड को रखा गया। पहली फिल्म हर किसी का बड़ा सपना होती है और उसके साथ संभवत: कोई भी बेइमानी नहीं करता है। ऐसे में तीन स्टार फिल्म में इन सब चीजों को डालने के जज्बे के लिए है और उस लिहाज से फिल्म ठीक है। थियेटर में बैठे दर्शक भी कहीं बोर होते या नाखुश नहीं होते दिखते। पर जब संदर्भ और तुलना में पिछले पचास साठ साल की फिल्में हर बार होती हैं तो ये फिल्म मुझे झुंझलाहट और दोहराव भरी लगती है।

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गजेंद्र सिंह भाटी

बुधवार, 7 सितंबर 2011

मूंदड़ों का वह लड़का सेंसलेस न था

जगमोहन मूंदड़ा 1948-2011

तब का कलकत्ता। बड़े बाजार की तंग गलियों में राजस्थान से आकर बसे मारवाड़ी बाणियों की बड़ी रिहाइश में एक घर मूंदड़ों का भी था। उसी घर में रहता था जगमोहनदास नाम का वो लड़का। टॉलीगंज में अपने एक रिश्तेदार के घर की खिड़की में बैठता तो इंतजार करता सामने पुरानी इमारत की छत पर नहाने के बाद बाल सुखाने आया करती उस नई-नवेली बंगाली दुल्हन का। कामुकता के साथ वो उसका पहला वास्ता था। घर में सख्त दादी को फिल्में पसंद न थीं। ले देकर साल में एक-आध धार्मिक फिल्म दिखा दी जाती। पर उसे बंधना न था। व अंग्रेजी बोलना चाहता था। खुले समाज में जीना चाहता था। बारह बरस के जगमोहन ने 'कागज़ के फूल' देखी तो न जाने कैसे अपनी कम उम्र के उलट ये समझ बना ली कि एक फिल्म में निर्देशक की अहमियत सबसे ज्यादा होती है। बीते रविवार की सुबह जब उस लड़के ने अपनी अंतिम सांस ली, तो वह 62 साल का था और उसे लोगों ने एक फिल्म निर्देशक के तौर पर पहचाना। वह निर्देशक जिसने 'बवंडर', और 'प्रोवोक्ड' जैसी सार्थक फिल्में बनाई।

क्या इन दो फिल्मों के परे कोई जगमोहन मूंदड़ा था ही नहीं? क्या इसके अलावा उन्हें 'नॉटी एट फॉर्टी' और 'अपार्टमेंट' जैसी खारिज फिल्में बनाने वाला मान लिया जाए? क्या उनकी फिल्मों में कोई सिनेमैटिक भाषा नहीं होती थी? कोई कहानी नहीं होती थी?

ये सवाल बहुत बाद में आए, भारत में तो जगमोहन मूंदड़ा को बहुत पहले से ही बी ग्रेड इरॉटिक हॉलीवुड थ्रिलर्स बनाने वाला माना गया, जबकि ऐसा था नहीं। इतना जरूर था कि पूरी जिंदगी वो एक किस्म की फिल्में बनाने तक सीमित नहीं रहे। संजीव कुमार और शबाना आजमी को लेकर 1982 में उन्होंने अपनी पहली फिल्म 'सुराग' बनाई। फिर 1985 में दीप्ति नवल और शबाना की शीर्ष भूमिकाओं वाली वूमन सेंट्रिक फिल्म 'कमला' बनाई। श्याम बेनेगल और गोविंद निहलानी की फिल्मों जैसे फ्रेम्स वाली 'कमला' भारत में नेशनल अवॉर्ड के लिए नामित हुई। यहां से लेकर 2000 में 'बवंडर' आने तक जग मूंदड़ा (हॉलीवुड में उनका नाम) ने अमेरिकन ऑडियंस के लिए इरॉटिक हॉरर-थ्रिलर फिल्में बनाईं। ये फिल्में थीं 'द जिग्सॉ मर्डर्स' (1988), 'हैलोवीन नाइट्स' (1988), 'नाइट आइज' (1990), 'एलए गॉडेस' (1993), 'सेक्सुअल मेलिस' (1994) और 'टेल्स ऑफ द कामसूत्र : मॉनसून' (1998) हालांकि इनमें कोई बड़े अमेरिकी सितारे नहीं थे, पर अपनी समकालीन कम बजट वाली थ्रिलर्स से बेहतर 'जग मूंदड़ा मार्का' नयापन इनमें होता था।

वो सेंसलेस नहीं थे। कमतर भी नहीं थे। ऐसा होता तो 'बवंडर', 'कमला', 'प्रोवोक्ड' और 'शूट ऑन साइट' जैसी बिना नुक्स वाली फिल्में न बनती। साथिन भंवरी देवी के साथ हुए रेप की सच्ची घटना पर बनी 'बवंडर' की बेहतरीन फिल्म थी। वो हर तरह की फिल्में बनाते थे। 'नॉटी एट फॉर्टी' की स्क्रिघ्ट लेकर गोविंदा मिले तो वो बना दी, किसी महिला प्रधान स्क्रिघ्ट के लिए ऐश्वर्या राय ने संपर्क किया तो उन्होंने 'प्रोवोक्ड' बना दी। लॉस एंजेल्स उनका पहला घर था, जहां वो आईआईटी मुंबई से पढऩे के बाद गए थे। जहां उन्होंने थियेटर किराए पर लेकर कुछ साल हिंदी फिल्में दिखाईं। जहां देवआनंद की 'देस परदेस', राज कपूर की 'सत्यम शिवम सुंदरम' और यश चोपड़ा की 'कभी कभी' के प्रीमियर उन फिल्ममेकर्स की मौजदूगी में वहां हुए।

मैं समझता हूं उनका अच्छा काम आना बाकी थी। उनकी पॉलिटिकल सटायर 'किस्सा कुत्ते का' की शूटिंग अक्टूबर से शुरू होने वाली थी। वह सोनिया और राजीव गांधी की प्रेम कहानी पर 'सोनिया' बनाना चाहते थे, जो राजनीतिक पेचों में फंसी थी। उन्होंने कोलकाता जाकर चित्रा बैनर्जी की शॉर्ट स्टोरी पर 'भद्रलोक' बनाने की सोची थी। वह 'बर्दाश्त' बनाना चाहते थे। एक ऐसे आदमी की कहानी जिसने जिंदगी में बहुत अन्याय झेला है पर अब उसका जवाब देना चाहता है। मगर ये चारों कहानियां अनकही रह गईं। जगमोहन मूंदड़ा ने श्रेष्ठ अमर फिल्में भी बनाई और पॉपकॉर्न सिनेमा भी। मगर हॉलीवुड और हिंदी दोनों अलग फिल्मी धाराओं को उन्होंने बिना मिलाए बनाया, जो बहुत कम निर्देशक कर पाते हैं। उन्होंने चुपचाप बिना किन्हीं फिल्मी हथकंडों के फिल्में बनानी शुरू कीं और उसी ईमानदारी के साथ बनाते हुए हमारे बीच से चले गए।

लोग शायद उन्हें भूल जाएंगे, मगर मैं और मेरे दोस्त नहीं। हम लोगों के लिए 'बवंडर' हमारे उस उम्र के किस्सों और बेशकीमती यादों का अहम हिस्सा थी। हम दोस्त जब-जब अपने बीते दोस्ताने और भोलेपन भरी हंसी-ठिठोली का जिक्र बुढ़ापे की देहरी लांघने तक करेंगे, तब-तब जगमोहन मूंदड़ा और रेतीली माटी की कहानी 'बवंडर' को याद करेंगे। हम तुरंत हंसेंगे और उस दौर में लौट जाएंगे। सिर्फ जगमोहन मूंदड़ा की बदौलत। फिल्में यही तो करती हैं और जो फिल्मकार हमारी उस वक्त की फिल्मों को बनाने वाला रहा होता है, वो बस खुद की जिंदगी का हो जाता है। अपनी तमाम फिल्मी कमियों और आलोचनाओं के बावजूद। ... और फिर 'बवंडर' तो आज भी उन लाजवाब ठोस फिल्मों में से है। दुआओं में रहोगे तुम... जगमोहन मूंदड़ा।

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गजेंद्र सिंह भाटी

शुक्रवार, 2 सितंबर 2011

मनोरंजन और मैसेज बगैर देखना चाहें तो हाजिर है पीले जूतों वाली लड़की

फिल्म: दैट गर्ल इन यैलो बूट्स
निर्देशक: अनुराग कश्यप (I hope you feel the film, because you will not enjoy it.)
कास्ट: कल्कि कोचलिन, प्रशांत प्रकाश, कुमुद मिश्रा, पूजा सरूप, गुलशन दैवय्या, नसीरूद्दीन शाह, शिवकुमार सुब्रमण्यम
स्टार: ढाई, .5

'दैट गर्ल इन यैलो बूट्स' की शूटिंग शुरू करने से पहले निर्देशक अनुराग कश्यप जरूर वल्र्ड सिनेमा में गिनी जाने वाली कोरियाई या यूरोपियन फिल्मों के खुमार में रहे होंगे। एक फिल्ममेकर के लिए उन फिल्मों का जोन ही ऐसा होता है कि आपको उठ-जगाकर एक खास बोल्ड-ब्रीफ-क्रू फिल्मशैली बरतने के लि सम्मोहित कर देता है। बहुत अच्छी बात है। मगर इस तरह की फिल्में (ये फिल्म भी) फैमिली (या अकेले भी) मनोरंजन और अच्छे सामाजिक संदेश इन दो सबसे अहम लक्ष्यों को ठोकर मारते हुए आगे बढ़ती है। उन्हें निर्देशक खुद के लिए और खास दर्शकों को बौद्धिक तौर पर संतुष्ट करने के लिए ही बनाता है। हां, रेगुलर फिल्में इन फिल्मों से धाकड़ सिनेमैटिक लेंगवेज और तरोताजा लगने वाली स्क्रिप्ट के सबक सीख सकती हैं। आते हैं 'दैट गर्ल...' पर। ये फिल्म आपको खुश नहीं करेगी। चौंकाने के लिए और बीच-बीच में आंखों पर हाथ रखने के लिए बनाई गई है। देखने वाले इसे फिल्म फेस्टिवल्स में या यूटीवी वल्र्ड मूवीज चैनल पर किसी दिन देखेंगे। फिल्म के विषय और कुछ एडल्ट कंटेंट को छोड़ दें तो तारीफ का सबसे बड़ा कोना है अनुराग का अलग कथ्य वाला समृद्ध निर्देशन। फिर राजीव रवि की सिनेमेटोग्रफी और श्वेता वेंकट की एडिटिंग। अपनी इमेज के लिहाज से कल्कि अपने रोल में कहीं भी उन्नीस नहीं नजर आती हैं। मगर कहीं-कहीं कमाल तो कहीं ओवर। एक्टिंग में छाप छोड़ जाते हैं पूजा सरूप (न जाने ये अब तक मुंबई में सिर्फ थियेटर ही क्यों कर रही थीं) और गुलशन दैवय्या (हिंदी फिल्मों के यादगार गैंगस्टर्स में शामिल होते हुए)। फिल्म कभी भूले-भटके दोबारा देखूंगा भी तो इनकी एक्टिंग और फिल्ममेकिंग के हिस्सों को पढऩे के लिए।

पीले जूते किसके
बस
इतना जानें कि ब्रिटेन से रूथ अपने पिता के स्नेह भरे पत्र के सहारे उन्हें ढूंढने आई है। फोटो नहीं है, पता नहीं और मां का इस फैसले में समर्थन नहीं है। चूंकि वीजा संबंधी अड़चने हैं और पिता की तलाश करनी है तो एक मसाज पार्लर में काम करती है। पार्लर की मालकिन माया (पूजा सरूप) अच्छे दिल की लेकिन चौबीस घंटे फोन पर 'पकवास' करने वाली औरत है। रूथ ऑफिस-ऑफिस डोनेशन की शक्ल में घूस देती है। सादे कपड़ों वाला इंस्पेक्टर (कार्तिक कृष्णन) भी उसे घर के आगे ही बैठा मिलता है। एक्सट्रा मनी बनाने के लिए पार्लर में मसाज के अलावा 'और भी कुछ' करती है। बायफ्रैंड प्रशांत (प्रशांत प्रकाश) भी रूथ की जिंदगी में कुछ हल नहीं करता, बल्कि उसे मुश्किलें ही देता है। एक इच्छुक गैंगस्टर चितियप्पा गौड़ा (गुलशन दैवय्या) है जो फिल्म को इंट्रेस्टिंग करता है और रूथ को परेशान। मुंबई और रूथ की जिंदगी में अंधेरा बढ़ रहा है। क्लाइमैक्स बेहद कम एक्साइटिंग है इसके लिए तैयार रहें।

स्क्रिप्ट के दायरे में
आपको कई संदर्भ दिखाई देते हैं। ओशो का एनलाइटनमेंट, जिम मॉरिसन वाली टाई, पासपोर्ट ऑफिस में अफसर बाबू (मुश्ताक खान) की जेनुइन डकार और पीले जूते। 'गुलाल' में राम प्रसाद बिस्मिल की लिखी 'सरफरोशी की तमन्ना' की पुनर्रचना की गई थी और यहां करमारी गाने में कबीर के बदले-रखे शब्द हैं, जो सैंकड़ों साल बाद मुंबई की गंदली हकीकत पर फिलॉसफी की तरह फिट होते हैं। ये गीत फिल्म की सबसे यादगार चीज है। फिल्म में लिरिक्स वरुण ग्रोवर के हैं, उनकी अच्छी शुरुआत। फिल्म का म्यूजिक वल्र्ड सिनेमा वाली फिल्मों की सिग्नेचर ट्यून जैसा लगता है। इसकी अच्छी वजह है बैनेडिक्ट टेलर का नरेन चंदावरकर के साथ मिलकर संगीत देना। डायलॉग विविध किस्म के हैं। मसलन, तुम बड़ी सती सावित्री हो!; तुम कौनसी ब्रम्हा की छठी औलाद हो!; आई लाइक योर टीथ, सोर्ट ऑफ बग्स बनी मीट्स जूलिया रॉबट्र्स। यहां तक कि सिर्फ चंद सेकंड के लिए जब पीयूष मिश्रा ऑटो वाला बनकर आते हैं और रूथ को मा और दर बोलना सिखाते हैं।

एक जरूरी बात
चितियप्पा गौड़ा (गुलशन दैवय्या) नाम का अनोखा गैंगस्टर। अपुन, ठोक डाल, मच मच, खोखा, मेरे कू और भाई मैं क्या बोलता ए... न जाने मुंबई के सांचों में ढले गैंगस्टर्स की ये शब्दावली हिंदी फिल्मों में कितनी लंबी है, पर एक जैसी है। चितियप्पा की भाषा तरोताजा करने वाली है। कन्नड़ बोलता है, फिर कोशिश करके अंगे्रजी भी बोल ही लेता है। बस। अब ये चितियप्पा हमारी मूवीज में खास इसलिए है कि इसके कपड़े, बोली और व्यवहार स्टीरियोटिपिकल नहीं है। जैसा कि हमारी फिल्मों में दिखाया जाता है। दूसरा हमेशा डॉन या तो मराठी होते हैं या उत्तर भारतीय। जैसे कि 'मुंबई मेरी जान' में थॉमस (इरफान खान) से पहले कोई व्यथित कन्नड़, तमिल, तेलुगू या मलयालम बोलने वाला प्रवासी कामगार यूं हमारी फिल्मों में न दिखा था। अब 'दैट गर्ल...' चितियप्पा को लाई है। पूरे ऑरिजिनल ढंग से। जब वो अपने आदमियों के साथ रूथ के घर जाता है तो हम चौंक जाते हैं, क्योंकि ये कथित गुर्गे दिखने में इतने बूढ़े और सिंपल पेंट-शर्ट डाले नहीं होते थे। जो बकवास नहीं करते, रिवॉल्वर नहीं रखते, मीट की दुकान नहीं होते और गालियां नहीं बकते। ये अंदर रसोई से कॉफी बनाकर लाते हैं। लड़की से अदब से पेश आते हैं और बात-बात पर उचकते नहीं हैं। बात गुलशन दैवय्या की। एक संपूर्ण मॉडलनुमा हीरो की तरह गुलशन कुछ महीने पहले एक टीवी कमर्शियल में दिखे थे, बेहद संपूर्ण। फिर 'दम मारो दम' में। फिर प्रभावी ढंग से 'शैतान' में। अब 'दैट गर्ल...' में। उनकी एक्टिंग में घिसावट और बासीपन नहीं हैं। आगे भी उनपर संजीदगी से नजर रहेगी। पूरा सरूप पर भी।

आखिर में...
फिल्म में नसीरूद्दीन शाह, रजत कपूर, रोनित रॉय, मकरंद देशपांडे और पीयूष मिश्रा दिखते हैं। न जाने क्यों दिखते हैं। क्योंकि स्क्रिप्ट में उनका विशेष महत्व नहीं है। मित्रवत वजहें हो सकती हैं क्योंकि इन सबकी जगह अनजान कलाकार भी होते तो कुछ बदलता नहीं।

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गजेंद्र सिंह भाटी

गुरुवार, 1 सितंबर 2011

शब्दहीन कर देती है बहादुर 'बोल'

फिल्म: बोल (पाकिस्तानी फिल्म)
निर्देशक: शोएब मंसूर
कास्ट: हुमैमा मलिक, मंजर सेहबई, शफकत चीमा, जैब रहमान, अम्र कश्मीरी, आतिफ असलम, इमान अली, माहिरा खान
स्टार: साढ़े तीन, 3.0
अगर आधी रात में भी पांच किलोमीटर दूर जाकर एक 'बोल' देखने की सूरत हो, तो मैं हंसते-हंसते हर सुबह पांच किलोमीटर दूर जाकर एक 'बॉडीगार्ड' देखने को तैयार हूं। खुशी है कि काफी दिन बाद इतनी गले तक तृप्त कर देने वाली फिल्म देखी। ये कोई मनोरंजन करने वाली फिल्म नहीं है, बल्कि उम्दा स्टोरीटेलिंग है। जैसे कि 'मदर इंडिया' है। शोएब मंसूर पाकिस्तानी सिनेमा को नई इज्जत बख्शने वाले फिल्मकार बने हैं। पहले 'खुदा के लिए' से और अब 'बोल' से। फिल्में बनाने के तमाम नियमों को साधारण से साधारण तरीके से फॉलो करती हुई भी ये फिल्म बेहतरीन बनती है, सिर्फ इसलिए कि अपनी कहानी के प्रति ईमानदार बनी रहती है और आखिर तक बनी रहती है। मैं ये तो नहीं कह सकता कि इसे फैमिली के साथ देखें कि नहीं, पर इतना जरूर कहूंगा कि तमाम एडल्ट कंटेंट होते हुए भी कोई पिता-पुत्र या मां-बेटी असहज हुए बिना इसे देख सकते हैं। ये एडल्ट तत्व परदे पर बिल्कुल भी नहीं आता, पर आप समझ जाते हैं। वाह, कितनी भली बात है। जब फिल्म खत्म होगी तो आप उसी एक्सपीरियंस से गुजर चुके होंगे जिसके लिए फिल्म देखने हम थियेटर जाया करते हैं। ये फील गुड फिल्म तो नहीं, पर मस्ट वॉच है, ताकि आपको पता लगे कि हम बॉलीवुड के दर्शक इस मीडियम के लेकर कितने करप्ट हो चुके हैं, कितने विकल्पहीन हो चुके हैं और कितने पशु हो चुके हैं।

बोल की कहानी
पाकिस्तान
के प्रेसिडेंट फांसी की सजा पाई जैनब (हुमाइमा मलिक) की माफी की अपील खारिज कर देते हैं, पर आखिरी ख्वाहिश के तौर पर उसे देश के मीडिया के सामने अपनी कहानी सुनाने की मंजूरी दे देते हैं। वह सुनाती है। बंटवारे के बाद हकीम साहब (मंजर सेहबई) दिल्ली से लाहौर आ जाते हैं। बेटे की चाहत में सात बेटियां जनते जाते हैं। बेटा सैफी (अम्र कश्मीरी) होता भी है, तो आदमी होकर भी औरतों जैसा होता है। बीवी सुरैया (जैब रहमान) और बेटियां हकीम साहब के दकियानूसी और कट्टर धार्मिक विचारों तले घर को बर्बाद होते देखती हैं। पर बड़ी बेटी जैनब गालियां और पिटाई खाते हुए भी पिता का विरोध करती चलती है। बहनों को पिता पढऩे नहीं देते। घर से बाहर जाने नहीं देते। छोटी बहन आयेशा (माहिरा खान) डॉक्टर मुस्तफा (आतिफ असलम) के साथ मिलकर रॉक बैंड बनाती है, पर छिप-छिपकर। हकीम साहब की जिंदगी में न चाहते हुए भी चकला चलाने वाले साका कंजर (शफकत चीमा) और तवायफ मीना (इमान अली) आते हैं। बीच में मुद्दे हैं इस समाज में आर्थिक तंगी के बावजदू दर्जनों बच्चे जनते पुराने ख्यालों के लोग, जो उसे ऊपरवाले की रहमत मानते हैं। सवाल है, जब पाल नहीं सकते तो पैदा क्यों करते हो। अहम सवाल इस कट्टर समाज में औरत होने के मायनों का भी है।

पाक ईमान से बनी फिल्म
# दिन परेशां है, रात भारी है... जैसे बेहद सिंपल और कारगर गीत और म्यूजिक फिल्म की डार्क टोन को सहलाते चलते हैं।
# भारत-पाकिस्तान का मैच चल रहा है। बेटी मन ही मन सचिन की सेंचुरी पूरी होने की ख्वाहिश रखती है। हकीम साहब आगबबूला हो डांटते हैं। बेटियों को इबादत करने को कहते हैं। पाकिस्तान हारा तो खैर नहीं। यहां जैनब पिता के जड़ विचारों को 'ऑस्ट्रेलिया में तो कोई इबादत नहीं करता फिर भी वो सालों से बेस्ट हैं' जैसे लॉजिक देती है। स्क्रिप्ट में क्रिकेट के साथ 'पाकीजा' और मीनाकुमारी के संदर्भ है। इसलिए कि धर्म के इस हिस्से में फिल्में और संगीत हराम हैं।
# अपने बेटे सैफी के जीने और मरने के फैसला करने के लिए हकीम साब आंख मूंदकर जब अपनी धार्मिक किताब के पन्ने पर अंगुली रखते हैं तो किताब फैसला देती है 'डुबोया मुझको मेरे होने ने, न होता मैं तो क्या होता।' देखिए ऐसी बेजोड़ छोटी-छोटी पंक्तियां स्क्रिप्ट को कितना समृद्ध बनाती हैं।
# फिल्म के आखिर में मेक्डॉनल्ड की तर्ज पर बची बहनों के 'जैनब्स कैफे' खोलने का पश्चिमी पूंजीवादी अंत बहस करने लायक है, अंतिम नहीं।
# हुमाइमा मलिक का अभिनय बहुत अच्छा है। पाकिस्तान के वरिष्ठ थियेटर एक्टर और अभिनेता मंजर सेहबई की अदाकारी इंडियन एक्टर्स के लिए अच्छी-खासी सीख है। बेहतरीन। अम्र कश्मीरी और जैब रहमान की महत्वपूर्ण अदाकारी के बीच रोचक कैरेक्टर साबित होते हैं साका कंजर बने शफकत चीमा। यहां तक कि फिल्म के शुरू में हकीम साहब के घर सैफी को मांगने आए किन्नर का सीन भी आप देखें तो उसका अभिनय दंग कर देता है।

आखिर में दो किस्से...
1. फिल्म खत्म हुई और चंडीगढ़ के थियेटर में आखिर वही लड़के तालियां बजाने के मजबूर हो गए जो शुरू में हर गंभीर और इमोशनल सीन में हंस रहे थे और दूसरों का ध्यान बंटा रहे थे। इनमें वो लड़का था जो इंटरवल में अपने दोस्तों से कह रहा था, 'यार ये क्या फिल्म है। इतनी ज्यादा बैड फीलिंग वाली। मुझसे तो देखी नहीं जा रही चल बाहर होकर आते हैं।'
2. पाकिस्तान में औरतों के हालात का संदर्भ फिल्म में सबसे प्रमुख है और मुस्लिम युवतियों की अपनी इमेज पर वो लड़का रात के दो बजे लिफ्ट में अपने दोस्तों को वाकया सुना रहा था। 'बोल' ने बोलने को जो प्रेरित कर दिया था। मैं भी सामने खड़ा लिफ्ट से नीचे उतर रहा था। दरअसल जब वह किसी एग्जाम के सिलसिले में हैदराबाद गया था। उसने वहां किसी मुहल्ले में एक मुस्लिम लड़की से एग्जाम सेंटर वाली स्कूल का पता पूछा और लड़की बोली, 'यू गो स्ट्रैट एंड टेक लेफ्ट टर्न, यूल बी देयर।' लड़का शॉक सा अपने दोस्तों से कह रहा था 'कम ऑन यार! वो सिंपल सी दिखने वाली लड़की पापड़ बनाती थी और उसके स्मार्ट जवाब ने मेरा दिमाग हिला दिया।' लिफ्ट लोअर बेसमेंट में जा रही थी, मैं उन लोगों की बातों को ओर सुनना चाह रहा था पर मुझे अपर बेसमेंट में उतरना था। मतलब ये कि फिल्म में जो उपाय सुझाया गया है, उसे वह लड़का खुद के साथ हुए वाकये से पुख्ता कर रहा था। माने, फिल्म बनाना सार्थक हुआ।

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गजेंद्र सिंह भाटी