Tuesday, September 13, 2011

'हीरानी से लडऩे को तरकश में बड़े तीर चाहिए'

इनकी सबसे पहली पहचान बनी 1991 के शुरू में दूरदर्शन पर आने वाले एपिक सीरियल 'चाणक्य' से। लेखक, निर्देशक और मुख्य अभिनेता चाणक्य डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी खुद थे। 2003 में इन्होंने फिल्म 'पिंजर' बनाई और अब ला रहे हैं सनी देओल की मुख्य भूमिका वाली 'मोहल्ला अस्सी'। ये फिल्म मशहूर उपन्यासकार काशीनाथ सिंह के उपन्यास 'काशी का अस्सी' पर बनी है। कुछ वक्त पहले बड़ी तुरत-फुरत में हुई इस बातचीत के कुछ अंश:

'काशी का अस्सी' में बहुत सारे किरदार-कहानियां हैं, इसे दो घंटे की स्क्रिप्ट में ढालना कैसा रहा?
आप सही कह रहे हैं। पर किताब के अध्याय 'पांड़े कौन कुमति तोहें लागी' पर ही स्क्रिप्ट का ज्यादातर ढांचा आधारित है।

क्या उपन्यास की तरह फिल्म में भी गालियां उसी प्रवाह में हैं?
देखिए, समाज में गालियों को बुरा माना जाता है, पर इस कहानी में गालियां तृतीय पात्र की तरह हैं। वो आती हैं, पर फिल्म में कथा का पात्र, उसका संघर्ष, बाकी किरदारों की अभिव्यक्ति, ग्लोबलाइजेशन और उदारवाद में समाज में क्या-क्या उखड़ रहा है, रिश्ते और सब कुछ कैसे टूट रहा हैं... ये सब भी हैं। बाकी सिर्फ गालियों से कुछ नहीं होता है। हिंदी में हर साल 240 फिल्में बनती हैं, सब गालियों से तो सफल नहीं हो सकती है न। 'काशी का अस्सी' की तो पहचान ही गालियों से है।

मूल एक्शन छवि से सनी को अलग इमेज में लाते वक्त कुछ चिंता नहीं हुई?
नहीं। न ही मैंने इस इमेज की चिंता की और न ही सनी ने। एक अभिनेता वह होता है जो चुनौतियों को स्वीकार करे। दुर्भाग्य से सनी को वैसी भूमिकाएं कभी नहीं दी गई। उनकी एक्टिंग के दूसरे पहलू कभी लोगों के सामने नहीं आ पाए। और हम भूल जाते हैं कि सनी वही एक्टर हैं जिन्हें दो राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भी मिले हैं। इतिहास गवाह रहा है कि जब भी कोई एक्टर अपनी स्थापित छवि को तोड़ता है तो लोग उसे सिर आंखों पर बिठाते हैं। प्राण साहब अपनी शुरुआती फिल्मों में मशहूर विलेन रहे हैं, पर जब उन्होंने पॉजिटिव चरित्र भूमिकाएं करनी शुरू की तो लोगों ने खूब सराहा। संजय दत्त को लीजिए। वो पहले अलग भूमिकाएं करते रहे, पर जब उन्होंने 'मुन्नाभाई...' की तो किसी ने उम्मीद भी नहीं की थी।

फिल्म बनाने से पहले रिकवरी की परवाह करते हैं?
मैंने कभी इसकी परवाह नहीं की। वैसे भी कहानीकारों को इसकी परवाह नहीं करनी चाहिए। मेरी फिल्म में सनी हैं और वो एक स्थापित कलाकार हैं इसलिए मुझे चिंता करने की जरूरत नहीं है।

फिल्म कब रिलीज होगी?
नवंबर-दिसंबर तक रिलीज करने की सोच रहे हैं। तब बॉक्स ऑफिस पर ज्यादा भीड़ भी नहीं होती है। जैसे अभी 'सिंघम' की रिलीज टाइमिंग रही।

हाल ही में अलग सिनेमैटिक लेंग्वेज वाली फिल्में आई हैं। सार्थकता के लिहाज से आप उन्हें कितना महत्व देते हैं?
स्टोरीटेलिंग तो देखिए हर दिन बदलती है। नानी-दादी की कहानी भी चलती है और यार-दोस्तों की भी। हमारे बीच हर स्टाइल की कहानी को जगह है। इसमें 'डेल्ही बैली' भी है, अनुराग का सिनेमा भी है और राजकुमार हीरानी का सिनेमा भी है।

इस फिल्म के कथ्य में आपने किस बात का ध्यान रखा है?
मैंने अपनी कहानी का प्रारब्ध, मध्य और अंत ढूंढने की कोशिश की है। एक फिल्मी स्टोरी कहने का जो क्लासिक फॉर्मेट होता है उसे तोडऩे की कोशिश की है।

मौजूदा फिल्ममेकर्स में किसके काम को अच्छा मानते हैं और क्यों?
मैं मानता हूं कि कहानी सबसे बड़ी होती है। राजकुमार हीरानी ने 'लगे रहो मुन्नाभाई' में महात्मा गांधी के किरदार को जैसे इस्तेमाल किया, उससे मैं बहुत प्रभावित हुआ। मैंने उन्हें फोन किया और कहा कि तुमसे लडऩे के लिए तरकश में बड़े तीर लाने पड़ेंगे क्योंकि तुमने काम ही ऐसा किया है।

हमेशा ऐतिहासिक किरदारों पर ही क्यों काम करते हैं?
मैंने हमेशा एतिहासिक विषयों पर फिल्में बनाई हैं। क्योंकि वर्तमान तो सबके सामने हैं, उसे सब जानते हैं, पर जो गुजर गया है वो अज्ञात है। जिज्ञासा होती है कि वो जब कभी रहा होगा तो उसका स्वरूप कैसा हुआ होगा।

अपनी बातचीत में आप 'वैराग्य' का भाव पैदा होने का जिक्र करते हैं। क्या पहचान या फीडबैक न मिलने से भी ऐसा होता है?
जो तारीफ नहीं मिलने पर वैराग्य की बात करते हैं, वो निराशा का भाव होता है, वैराग्य का नहीं। वैराग्य आपकी वैचारिक और सामाजिक पृष्टभूमि से आता है।

'चाणक्य' आज भी लोगों के क्लासिक डीवीडी कलेक्शन में शामिल है। क्या फिर अभिनय करने का ख्याल नहीं आता?
नहीं यार, बहुत हो गया वो। जितना करना था कर लिया। बाकी अपनी रचनात्मकता को प्रदर्शित करने के मौके अभिनय से ज्यादा निर्देशन में होते हैं।

इतनी कम फिल्में क्यों बनाते हैं?
एक बार सईद अख्तर मिर्जा से किसी ने पूछा था कि आप फिल्में क्यों नहीं बनाते हैं, तो उन्होंने कहा कि मैं कहां नहीं बनाता हूं कोई बनाने ही नहीं देना चाहता है। वही मेरे साथ है। फिल्मों की लागत बहुत बढ़ गई है। एक फ्लॉप हो जाए तो दूसरी बनाने के रास्ते बंद से हो जाते हैं। एक हिट हो जाए तो दूसरी के लिए सोचना नहीं पड़ता। मुझे ये लगता है कि 'मोहल्ला अस्सी' के बाद मुझे दूसरी फिल्म बनाने में कोई मुश्किल नहीं आनी चाहिए।

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गजेंद्र सिंह भाटी

Sunday, September 11, 2011

इस सबजेक्ट पर बनी फिल्मों के ढर्रे की मरम्मत करती हुई

फिल्म: फ्रैंड्स विद बैनिफिट्स
निर्देशक: विल ग्लूक
कास्ट: जस्टिन टिंबरलेक, माइला क्यूनिस, वूडी हैरलसन, नोलन गाउल्ड, जेना एल्फमेन, रिचर्ड जेनकिंस, पैट्रिशिया क्लार्कसन
स्टार: तीन, 3.0

जब आप थियेटर में होते हैं तो प्रार्थना करते हैं कि फिल्म शुरू होने तक टॉर्चर देने वाले चाय, क्रीम या रियल एस्टेट के एड न दिखाए जाएं। ऐसे में जब बैक टु बैक 'मनीबॉल', 'जूकीपर', '30 मिनट्स' और 'अनॉनिमस' जैसी चार बेहतरीन और अलग टेस्ट वाली फिल्मों के ट्रेलर दिखते हैं तो मूड फ्रैश हो जाता है। उसके बाद शुरू होती है 'फ्रेंड्स विद बैनिफिट्स' और बड़े ऑर्डिनरी से पोस्टर वाली ये फिल्म उस मूड को खराब नहीं होने देती। जस्टिन टिंबरलेक और माइला क्यूनिस अपने आप में कोई मेगास्टार नहीं हैं, पर फिल्म के स्मार्ट और चपल डायलॉग्स के साथ सुकून देते हैं। गुदगुदाने का बाकी काम जीक्यू के स्पोट्र्स एडिटर टॉमी बने वूडी हैरलसन और डिलन का भांजा सैमी (नोलन गोउल्ड) करते हैं। सैमी की फेल होती मैजिक ट्रिक्स और टॉमी के 'यू श्योर, योर नॉट गे?' सबसे ज्यादा याद रहते हैं। एक नॉन-कॉमिक जॉनर वाली फिल्म में हंसी की संतुलित मात्रा इस फिल्म जितनी होती है, ये आदर्श पैमाना हो सकता है। इस सब्जेक्ट वाली ज्यादातर हॉलीवुड फिल्मों में स्क्रिप्ट जो ढर्रा लिए होती है, वो यहां नहीं है। इसे जरूर देख सकते हैं।

दोस्ती के दौरान
डिलन (जस्टिन टिंबरलेक) लॉस एंजेल्स में इस छोटी इंटरनेट कंपनी में आर्ट डायरेक्टर है। उसका काम बहुत अच्छा है इसलिए जीक्यू मैगजीन उसे इंटरव्यू करना चाहती है। उसकी भर्ती सुनिश्चित करने का काम एक एग्जीक्यूटिव रिक्रूटर जैमी (माइला क्यूनिस) को मिलता है। पर डिलन एलए छोड़कर न्यू यॉर्क नहीं आना चाहता। जैमी की कोशिशों से वह न्यू यॉर्क जीक्यू में आ जाता है। फिर दोनों सिर्फ दोस्त रहने और उससे आगे न बढऩे की शर्त पर फिजिकल होते हैं। पर प्यार का क्या है वो तो होना ही होता है।

रिश्तों की समझाइश
सिर्फ फ्रेंड होने या बॉयफ्रेंड-गर्लफ्रेंड हो जाने और सिर्फ फिजीकल रहने या प्यार कर बैठने की कशमकश है डिलन और जैमी के बीच। महाशहरी इंग्लिश स्पीकिंग यंगस्टर्स और वर्किंग प्रफेशनल्स इस सब्जेक्ट के दायरे में आते हैं। उन्हें ये फिल्म सबसे ज्यादा पसंद आएगी। जो लोग हॉलीवुड की फिल्में देखते हैं और सुनकर तुरंत समझते हैं, उन्हें फिल्म देखने वक्त राहतभरा मजा आएगा। इसी के तहत फिल्म में जो फिजीकल होने के सीन हैं वो फनी लगते हैं। उनमें वल्गैरिटी या कहीं भी भद्दापन नहीं है। बल्कि यहां भी दर्शक कंफर्टेबल रहते हुए ठहाके लगाते हैं। डिलन के अपने पिता (रिचर्ड जेनकिंस) और बड़ी बहन एनी (जेना एल्फमैन) के साथ रिश्ते को भी अच्छे फ्रेम में जड़ा गया है। वो फिल्म की जरूरत लगते हैं। ठीक वैसे ही जैमी की बोल्ड मदर (पैट्रिशिया क्लार्कसन) भी फिल्म में फिट लगती हैं।

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गजेंद्र सिंह भाटी

Saturday, September 10, 2011

सोडरबर्ग का इंफेक्शन, एक ईमानदार कोशिश

फिल्म: कंटेजियन (अंग्रेजी)
निर्देशक: स्टीवन सोडरबर्ग
कास्ट: मैट डेमन, केट विंस्लेट, ग्वेनैथ पॉल्ट्रो, जूड लॉ, मेरियन कोटिलार्ड, लॉरेंस फिशबर्न
स्टार: तीन, 3.०

'कंटेजियन' को देखने से पहले मैं फिल्म के बारे में कुछ भी नहीं जानता था, तो उसे बिना किन्हीं उम्मीदों के देख पाया। चूंकि निर्देशक स्टीवन सोडरबर्ग के सिनेमा से भी वाकिफ हूं तो यहां उनके उस एफर्ट को समझ पाया जो उन्होंने 'बबल', 'सेक्स लाइज एंड वीडियोटेप्स' और 'चे' बनाकर किया था। संक्रमण, वायरस या फ्लू पर बनने वाली हॉलीवुड़ फिल्मों में लोगों के डर और मानवता पर खतरे के इमोशन को फिल्म में लार्जर देन लाइफ बनाकर भुनाया जाता है। लोगों को जॉम्बी बनाकर, सूने हो चुके शहर की सड़कें दिखाकर, न्यूक्लियर यूज के साथ आर्मी को लाकर और एक-दो लोगों को हीरो बनाकर एक धांसू एंटरटेनिंग फिल्म बना दी जाती है। जो कोई बुरी बात नहीं है, पर यहां ऐसा नहीं है। केट विंस्लेट, ग्वेनैथ पॉल्ट्रो और मेरियन कोटिलार्ड यूं आती और चली जाती हैं जैसे सोडरबर्ग के लिए उनकी फिल्म की कहानी से जरूरी और ऊंचा कोई नहीं है। इस फिल्म में हम ऐसी भयावह बीमारियों के उभरने और फैलने के प्रोसेस को समझते हैं। जान पाते हैं कि कैसे गवर्नमेंट एजेंसियां काम करती हैं। कितनी बेइमानी और ईमानदारी से। ये भी कि सरकारों के लिए मुश्किल वक्त आने पर जनता कितनी कम जरूरी हो जाती है। ऐसे किरदार भी दिखते हैं जो हकीकत जानते हैं और लोगों की मदद कर सकते हैं पर उन्हें दबा दिया जाता है। मसलन यहां जूड लॉ का किरदार, जो मल्टीनेशनल कंपनियों पर कमेंट करता है और लगातार बोलता रहता है। इतनी जानकारी देने और मानवता पर आन पड़ी आपदा को सरल तरीके से दिखाने के गुण के बावजूद फिल्म कोई डॉक्युमेंट्री नहीं लगती, एक संपूर्ण हॉलीवुड फिल्म लगती है। पहली बात ये कि 'कंटेजियन' बोरिंग नहीं है, दूसरी ये कि ये मसाला एंटरटेनर भी नहीं है। हां, इतना जरूर है कि '28 डेज लेटर', 'रेजिडेंट ईविल' और 'आउटब्रेक' जैसी फिल्मों के बीच हमें इस फिल्म जैसी बेहद ईमानदार कोशिश नजर आती है। डैनी बॉयेल की '28 डेज लेटर' में हम देखते हैं कि चिंपाजिंयों पर हुए क्रूर मानवीय प्रयोगों से पैदा हुआ वायरस कैसे 28 दिन बाद शहर को खाली कर देता है, वहीं इस फिल्म में उन 28 दिन तक हम कैसे पहुंचते हैं, ये देखते हैं। सुलझी हुई इस बेहद मैच्योर फिल्म को एक बार जरूर देखना चाहिए।

जमीन से जुड़ी कहानी
हॉन्ग कॉन्ग में अपनी बिजनेस ट्रिप से अमेरिका लौटी बैथ (ग्वेनैथ पॉल्ट्रो) अगले दिन अपने घर में बेहोश होकर गिर जाती है। हस्बैंड मिल्च (मैट डेमन) अस्पताल ले जाता है पर डॉक्टर उसे मृत घोषित कर देते हैं। धीरे-धीरे अमेरिका और दुनिया के दूसरे हिस्सों में भी लोग इस वायरस से इन्फैक्टेड होने लगते हैं और मौतें होने लगती हैं। चमगादड़ और सूअर के जरिए फैले इस वायरस की तह तक जाने में डब्ल्यूएचओ, अमेरिकी डिजीज कंट्रोल और प्रिवेंशन सेंटर और बाकी एजेंसियां एक्टिव हो जाती हैं। फिर कहानी में एक ब्लॉगर-जर्नलिस्ट एलन (जूड लॉ) आता है, जो शुरू से सब कुछ जानता है पर कोई उसकी सुनता नहीं। वैकल्पिक मीडिया में उसके लाखों फॉलोवर बनते हैं और साथ ही साथ गवर्नमेंट की फेल हो चुकी लीडरशिप, ध्वस्त शहरी ढांचा और बेबस अमेरिकी जनता दिखती है। फिल्म की कहानी में मौजूद हर मैलोड्रमैटिक संभावना को कम से कम बढ़ाने-चढ़ाने की कोशिश की गई है।

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गजेंद्र सिंह भाटी

फिल्मी फिल्म है, एन्जॉय करें और भूल जाएं

फिल्म: मेरे ब्रदर की दुल्हन
निर्देशक: अली अब्बास जफर
कास्ट: इमरान खान, कटरीना कैफ, अली जफर, मोहम्मद जीशान अयूब, तारा डिसूजा, बृजेंद्र काला
स्टार: तीन, 3.0

फिल्म देखते हुए मुझे कुछ झुंझलाहट हुई। क्यों? जानने से पहले 'हम आपके हैं कौन' के अंताक्षरी सॉन्ग पर चलते हैं। जिसके पास तकिया आता है वह कोई न कोई फिल्मी गाना गाता है या डायलॉग बोलता है। अनुपम खेर अपनी बारी आने पर प्लास्टिक की कुर्सी पर खड़े हो, हाथ में मिनरल वॉटर की बोतल ले, रीमा लागू को बसंती और आलोकनाथ को मौसी बनाकर 'शोले' का मशहूर डायलॉग सुसाइड... बोलते हैं। ये सीक्वेंस शानदार बन पड़ता है, मगर जीप के बोनट पर खड़ी होकर जब कटरीना सुसाइड... वाला डायलॉग इस फिल्म में बोलती हैं तो छाती चौड़ी नहीं होती कि मैं ये फिल्म देखने आया। 'ओम शांति ओम' और 'बुड्ढा होगा तेरा बा' जैसी फिल्मों में इतना बॉलीवुड डाल दिया जाता है कि ये फिल्में खुद कुछ नहीं रह पातीं। ऐसा ही 'मेरे ब्रदर की दुल्हन' के साथ है। चूंकि इस फिल्म का नाम और स्टोरी इतने अनुमानित हैं कि ढाई घंटे दिखाने को कुछ बचता नहीं। इस कसर को ढकने के लिए डायरेक्टर अली अब्बास जफर हिट फिल्मों के गानों की कोरियोग्रफी, पोस्टर और डायलॉग फिल्म में ठूसते जाते हैं और हम फ्रैश कंटेंट को तरसते जाते हैं। उन्हें समझना होगा कि कटरीना और तारा डिसूजा के किरदारों को बीड़ी, सिगरेट या दारू पिला देने से वह कुछ नया नहीं करते। नयापन स्क्रिप्ट और अदाकारी में चाहिए जो मिसिंग है। हालांकि फैमिली और फ्रैंड्स के साथ जाएंगे तो फिल्म आपको ठीक-ठाक एंटरटेनमेंट देगी, बावजूद इसके मुझे ये टोटके थोथे और इरीटेट करने वाले लगे।

बात कुछ यूं है
लंदन में रहने वाला लव अग्निहोत्री (अली जफर) अपनी पांच साल से गर्लफ्रेंड रही गुजराती लंदन बोर्न लड़की पियाली (तारा डिसूजा) से ब्रेकअप कर लेता है। अब शादी करके सेटल होना चाहता है। दिल्ली में छोटे भाई कुश (इमरान खान) को फोन करके अपने लिए लड़की ढूंढने को कहता है। कुश देहरादून अपने पेरंट्स के पास जाता है। जुबां पर गाना लिए 'दिल से हो दिल्ली, हो धड़कन से लंदन... मेरे ब्रदर की दुल्हन'। उसकी तलाश डिंपल दीक्षित (कटरीना कैफ) पर आकर रुकती है, जिसे वह पहले भी मिल चुका है। बात आगे बढ़ती है और फिर कुछ ऐसा होता है कि कुश को डिंपल से प्यार हो जाता है। चूंकि फिल्म बिल्कुल भी गंभीर नहीं है इसलिए बिना किसी बड़ी टेंशन के हम क्लाइमैक्स में पहुंचकर थियेटर से बाहर निकल आते हैं।

अभिनय के मामले में औसत
फिल्म के लीड एक्टर अपने कैरेक्टर को अपने प्रयासों से कोई आइडेंटिटी नहीं दे पाते हैं। कटरीना का बिंदास अंदाज हो या अली जफर की कुछ-कुछ पाकिस्तानी एक्सेंट में डायलॉग डिलीवरी या फिर इमरान का ब्लैंक फेस, सब इनकी पिछली फिल्मों में हमने देखा है। बृजेंद्र काला (शादी अरेंजर) और मोहम्मद जीशान अयूब (शोभित, कुश का दोस्त) के किरदार कुछ क्षण ही सही अपने परफॉर्मेंस में ताजगी लाते हैं। कैसा ये इस्क है... और मेरे ब्रदर की दुल्हन... गानों के बोल इरशाद कामिल ने मेहनत से लिखे हैं पर जबान पर नहीं चढ़ते, न ही याद हो पाते हैं।

बॉलीवुड की पैरोडी सी है यहां
# ओपनिंग गाने में चल छैंया छैंया (शाहरुख), हुण हुण दबंग दबंग - जवानी फिर ना आए (सलमान), मस्ती की पाठशाला (आमिर).. इन गानों के सिग्नेचर डांस स्टेप हैं।
# ऐसा ही कैसा ये इस्क है... गाने में है। मसलन, इसमें 'जोधा अकबर' के ख्वाजा जी.. गाने के स्टेप हैं।
# 'हम भाग नहीं सकते। मैं 'कयामत से कयामत तक' का आमिर खान और तुम जूही चावला नहीं हो। कि भागकर हम अपनी छोटी सी झोंपड़ी बनाएंगे। मैं फैक्ट्री में काम करूंगा और तुम कपड़े में प्याज-रोटी बांधकर मेरे लिए लाओगी। हम लोग मिडिल क्लास फैमिली से हैं, फिल्म के कैरेक्टर नहीं।'... इमरान के इस डायलॉग में भी फिल्मी संदर्भ है।
# शादी की तैयारियां करवा रहे बृजेंद्र काला कुछ कॉमिक रिलीफ लेकर आते हैं। जब उनसे पूछा जाता है, 'सब कंट्रोल में है... तो वह कहते हैं, 'कंट्रोल से भी कंट्रोल है। आई एम अ कॉम्पलैन बॉय।' पढऩे में खास नहीं लगता, पर परदे पर देखकर हंसी आती है। एक डायलॉग में पूछा जाता है, 'भाई साहब हो गए रेडी?' तो वह कहते हैं, 'ऐसा वैसा रेडी?.. एवर रेडी।'
# 'यूपी आए और भांग नहीं पी तो क्या खाक यूपी आए।' इस सीक्वेंस के दौरान ढाबे पर बैकग्राउंड में 'दबंग' और 'मुगल-ए-आजम' के एकदम नए बड़े पोस्टर खासतौर पर लगाए नजर आते हैं।
# पुराने जमाने का फिलिप्स का रेडियो एक-दो गानों के शुरू होने का लॉजिक बनता है। गैजेट्स के इस बेहद आधुनिक वक्त में चार बड़े निप्पो सेल वाला वो एंटीक रेडियो अलग अनुभव देता है।

आखिर में
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चूंकि अली अब्बास जफर पहली बार के निर्देशक-लेखक हैं इसलिए फिल्म की थीम और एक और प्रेडिक्टेबल लव स्टोरी के लिए ही उनकी आलोचना करने से बचना चाहिए। बावजूद मेरी झुंझलाहट के मैंने ध्यान इस बात का रखा है कि बड़ी लगन और पागलपन से फिल्म में बॉलीवुड को रखा गया। पहली फिल्म हर किसी का बड़ा सपना होती है और उसके साथ संभवत: कोई भी बेइमानी नहीं करता है। ऐसे में तीन स्टार फिल्म में इन सब चीजों को डालने के जज्बे के लिए है और उस लिहाज से फिल्म ठीक है। थियेटर में बैठे दर्शक भी कहीं बोर होते या नाखुश नहीं होते दिखते। पर जब संदर्भ और तुलना में पिछले पचास साठ साल की फिल्में हर बार होती हैं तो ये फिल्म मुझे झुंझलाहट और दोहराव भरी लगती है।

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गजेंद्र सिंह भाटी

Wednesday, September 7, 2011

मूंदड़ों का वह लड़का सेंसलेस न था

जगमोहन मूंदड़ा 1948-2011

तब का कलकत्ता। बड़े बाजार की तंग गलियों में राजस्थान से आकर बसे मारवाड़ी बाणियों की बड़ी रिहाइश में एक घर मूंदड़ों का भी था। उसी घर में रहता था जगमोहनदास नाम का वो लड़का। टॉलीगंज में अपने एक रिश्तेदार के घर की खिड़की में बैठता तो इंतजार करता सामने पुरानी इमारत की छत पर नहाने के बाद बाल सुखाने आया करती उस नई-नवेली बंगाली दुल्हन का। कामुकता के साथ वो उसका पहला वास्ता था। घर में सख्त दादी को फिल्में पसंद न थीं। ले देकर साल में एक-आध धार्मिक फिल्म दिखा दी जाती। पर उसे बंधना न था। व अंग्रेजी बोलना चाहता था। खुले समाज में जीना चाहता था। बारह बरस के जगमोहन ने 'कागज़ के फूल' देखी तो न जाने कैसे अपनी कम उम्र के उलट ये समझ बना ली कि एक फिल्म में निर्देशक की अहमियत सबसे ज्यादा होती है। बीते रविवार की सुबह जब उस लड़के ने अपनी अंतिम सांस ली, तो वह 62 साल का था और उसे लोगों ने एक फिल्म निर्देशक के तौर पर पहचाना। वह निर्देशक जिसने 'बवंडर', और 'प्रोवोक्ड' जैसी सार्थक फिल्में बनाई।

क्या इन दो फिल्मों के परे कोई जगमोहन मूंदड़ा था ही नहीं? क्या इसके अलावा उन्हें 'नॉटी एट फॉर्टी' और 'अपार्टमेंट' जैसी खारिज फिल्में बनाने वाला मान लिया जाए? क्या उनकी फिल्मों में कोई सिनेमैटिक भाषा नहीं होती थी? कोई कहानी नहीं होती थी?

ये सवाल बहुत बाद में आए, भारत में तो जगमोहन मूंदड़ा को बहुत पहले से ही बी ग्रेड इरॉटिक हॉलीवुड थ्रिलर्स बनाने वाला माना गया, जबकि ऐसा था नहीं। इतना जरूर था कि पूरी जिंदगी वो एक किस्म की फिल्में बनाने तक सीमित नहीं रहे। संजीव कुमार और शबाना आजमी को लेकर 1982 में उन्होंने अपनी पहली फिल्म 'सुराग' बनाई। फिर 1985 में दीप्ति नवल और शबाना की शीर्ष भूमिकाओं वाली वूमन सेंट्रिक फिल्म 'कमला' बनाई। श्याम बेनेगल और गोविंद निहलानी की फिल्मों जैसे फ्रेम्स वाली 'कमला' भारत में नेशनल अवॉर्ड के लिए नामित हुई। यहां से लेकर 2000 में 'बवंडर' आने तक जग मूंदड़ा (हॉलीवुड में उनका नाम) ने अमेरिकन ऑडियंस के लिए इरॉटिक हॉरर-थ्रिलर फिल्में बनाईं। ये फिल्में थीं 'द जिग्सॉ मर्डर्स' (1988), 'हैलोवीन नाइट्स' (1988), 'नाइट आइज' (1990), 'एलए गॉडेस' (1993), 'सेक्सुअल मेलिस' (1994) और 'टेल्स ऑफ द कामसूत्र : मॉनसून' (1998) हालांकि इनमें कोई बड़े अमेरिकी सितारे नहीं थे, पर अपनी समकालीन कम बजट वाली थ्रिलर्स से बेहतर 'जग मूंदड़ा मार्का' नयापन इनमें होता था।

वो सेंसलेस नहीं थे। कमतर भी नहीं थे। ऐसा होता तो 'बवंडर', 'कमला', 'प्रोवोक्ड' और 'शूट ऑन साइट' जैसी बिना नुक्स वाली फिल्में न बनती। साथिन भंवरी देवी के साथ हुए रेप की सच्ची घटना पर बनी 'बवंडर' की बेहतरीन फिल्म थी। वो हर तरह की फिल्में बनाते थे। 'नॉटी एट फॉर्टी' की स्क्रिघ्ट लेकर गोविंदा मिले तो वो बना दी, किसी महिला प्रधान स्क्रिघ्ट के लिए ऐश्वर्या राय ने संपर्क किया तो उन्होंने 'प्रोवोक्ड' बना दी। लॉस एंजेल्स उनका पहला घर था, जहां वो आईआईटी मुंबई से पढऩे के बाद गए थे। जहां उन्होंने थियेटर किराए पर लेकर कुछ साल हिंदी फिल्में दिखाईं। जहां देवआनंद की 'देस परदेस', राज कपूर की 'सत्यम शिवम सुंदरम' और यश चोपड़ा की 'कभी कभी' के प्रीमियर उन फिल्ममेकर्स की मौजदूगी में वहां हुए।

मैं समझता हूं उनका अच्छा काम आना बाकी थी। उनकी पॉलिटिकल सटायर 'किस्सा कुत्ते का' की शूटिंग अक्टूबर से शुरू होने वाली थी। वह सोनिया और राजीव गांधी की प्रेम कहानी पर 'सोनिया' बनाना चाहते थे, जो राजनीतिक पेचों में फंसी थी। उन्होंने कोलकाता जाकर चित्रा बैनर्जी की शॉर्ट स्टोरी पर 'भद्रलोक' बनाने की सोची थी। वह 'बर्दाश्त' बनाना चाहते थे। एक ऐसे आदमी की कहानी जिसने जिंदगी में बहुत अन्याय झेला है पर अब उसका जवाब देना चाहता है। मगर ये चारों कहानियां अनकही रह गईं। जगमोहन मूंदड़ा ने श्रेष्ठ अमर फिल्में भी बनाई और पॉपकॉर्न सिनेमा भी। मगर हॉलीवुड और हिंदी दोनों अलग फिल्मी धाराओं को उन्होंने बिना मिलाए बनाया, जो बहुत कम निर्देशक कर पाते हैं। उन्होंने चुपचाप बिना किन्हीं फिल्मी हथकंडों के फिल्में बनानी शुरू कीं और उसी ईमानदारी के साथ बनाते हुए हमारे बीच से चले गए।

लोग शायद उन्हें भूल जाएंगे, मगर मैं और मेरे दोस्त नहीं। हम लोगों के लिए 'बवंडर' हमारे उस उम्र के किस्सों और बेशकीमती यादों का अहम हिस्सा थी। हम दोस्त जब-जब अपने बीते दोस्ताने और भोलेपन भरी हंसी-ठिठोली का जिक्र बुढ़ापे की देहरी लांघने तक करेंगे, तब-तब जगमोहन मूंदड़ा और रेतीली माटी की कहानी 'बवंडर' को याद करेंगे। हम तुरंत हंसेंगे और उस दौर में लौट जाएंगे। सिर्फ जगमोहन मूंदड़ा की बदौलत। फिल्में यही तो करती हैं और जो फिल्मकार हमारी उस वक्त की फिल्मों को बनाने वाला रहा होता है, वो बस खुद की जिंदगी का हो जाता है। अपनी तमाम फिल्मी कमियों और आलोचनाओं के बावजूद। ... और फिर 'बवंडर' तो आज भी उन लाजवाब ठोस फिल्मों में से है। दुआओं में रहोगे तुम... जगमोहन मूंदड़ा।

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गजेंद्र सिंह भाटी

Friday, September 2, 2011

मनोरंजन और मैसेज बगैर देखना चाहें तो हाजिर है पीले जूतों वाली लड़की

फिल्म: दैट गर्ल इन यैलो बूट्स
निर्देशक: अनुराग कश्यप (I hope you feel the film, because you will not enjoy it.)
कास्ट: कल्कि कोचलिन, प्रशांत प्रकाश, कुमुद मिश्रा, पूजा सरूप, गुलशन दैवय्या, नसीरूद्दीन शाह, शिवकुमार सुब्रमण्यम
स्टार: ढाई, .5

'दैट गर्ल इन यैलो बूट्स' की शूटिंग शुरू करने से पहले निर्देशक अनुराग कश्यप जरूर वल्र्ड सिनेमा में गिनी जाने वाली कोरियाई या यूरोपियन फिल्मों के खुमार में रहे होंगे। एक फिल्ममेकर के लिए उन फिल्मों का जोन ही ऐसा होता है कि आपको उठ-जगाकर एक खास बोल्ड-ब्रीफ-क्रू फिल्मशैली बरतने के लि सम्मोहित कर देता है। बहुत अच्छी बात है। मगर इस तरह की फिल्में (ये फिल्म भी) फैमिली (या अकेले भी) मनोरंजन और अच्छे सामाजिक संदेश इन दो सबसे अहम लक्ष्यों को ठोकर मारते हुए आगे बढ़ती है। उन्हें निर्देशक खुद के लिए और खास दर्शकों को बौद्धिक तौर पर संतुष्ट करने के लिए ही बनाता है। हां, रेगुलर फिल्में इन फिल्मों से धाकड़ सिनेमैटिक लेंगवेज और तरोताजा लगने वाली स्क्रिप्ट के सबक सीख सकती हैं। आते हैं 'दैट गर्ल...' पर। ये फिल्म आपको खुश नहीं करेगी। चौंकाने के लिए और बीच-बीच में आंखों पर हाथ रखने के लिए बनाई गई है। देखने वाले इसे फिल्म फेस्टिवल्स में या यूटीवी वल्र्ड मूवीज चैनल पर किसी दिन देखेंगे। फिल्म के विषय और कुछ एडल्ट कंटेंट को छोड़ दें तो तारीफ का सबसे बड़ा कोना है अनुराग का अलग कथ्य वाला समृद्ध निर्देशन। फिर राजीव रवि की सिनेमेटोग्रफी और श्वेता वेंकट की एडिटिंग। अपनी इमेज के लिहाज से कल्कि अपने रोल में कहीं भी उन्नीस नहीं नजर आती हैं। मगर कहीं-कहीं कमाल तो कहीं ओवर। एक्टिंग में छाप छोड़ जाते हैं पूजा सरूप (न जाने ये अब तक मुंबई में सिर्फ थियेटर ही क्यों कर रही थीं) और गुलशन दैवय्या (हिंदी फिल्मों के यादगार गैंगस्टर्स में शामिल होते हुए)। फिल्म कभी भूले-भटके दोबारा देखूंगा भी तो इनकी एक्टिंग और फिल्ममेकिंग के हिस्सों को पढऩे के लिए।

पीले जूते किसके
बस
इतना जानें कि ब्रिटेन से रूथ अपने पिता के स्नेह भरे पत्र के सहारे उन्हें ढूंढने आई है। फोटो नहीं है, पता नहीं और मां का इस फैसले में समर्थन नहीं है। चूंकि वीजा संबंधी अड़चने हैं और पिता की तलाश करनी है तो एक मसाज पार्लर में काम करती है। पार्लर की मालकिन माया (पूजा सरूप) अच्छे दिल की लेकिन चौबीस घंटे फोन पर 'पकवास' करने वाली औरत है। रूथ ऑफिस-ऑफिस डोनेशन की शक्ल में घूस देती है। सादे कपड़ों वाला इंस्पेक्टर (कार्तिक कृष्णन) भी उसे घर के आगे ही बैठा मिलता है। एक्सट्रा मनी बनाने के लिए पार्लर में मसाज के अलावा 'और भी कुछ' करती है। बायफ्रैंड प्रशांत (प्रशांत प्रकाश) भी रूथ की जिंदगी में कुछ हल नहीं करता, बल्कि उसे मुश्किलें ही देता है। एक इच्छुक गैंगस्टर चितियप्पा गौड़ा (गुलशन दैवय्या) है जो फिल्म को इंट्रेस्टिंग करता है और रूथ को परेशान। मुंबई और रूथ की जिंदगी में अंधेरा बढ़ रहा है। क्लाइमैक्स बेहद कम एक्साइटिंग है इसके लिए तैयार रहें।

स्क्रिप्ट के दायरे में
आपको कई संदर्भ दिखाई देते हैं। ओशो का एनलाइटनमेंट, जिम मॉरिसन वाली टाई, पासपोर्ट ऑफिस में अफसर बाबू (मुश्ताक खान) की जेनुइन डकार और पीले जूते। 'गुलाल' में राम प्रसाद बिस्मिल की लिखी 'सरफरोशी की तमन्ना' की पुनर्रचना की गई थी और यहां करमारी गाने में कबीर के बदले-रखे शब्द हैं, जो सैंकड़ों साल बाद मुंबई की गंदली हकीकत पर फिलॉसफी की तरह फिट होते हैं। ये गीत फिल्म की सबसे यादगार चीज है। फिल्म में लिरिक्स वरुण ग्रोवर के हैं, उनकी अच्छी शुरुआत। फिल्म का म्यूजिक वल्र्ड सिनेमा वाली फिल्मों की सिग्नेचर ट्यून जैसा लगता है। इसकी अच्छी वजह है बैनेडिक्ट टेलर का नरेन चंदावरकर के साथ मिलकर संगीत देना। डायलॉग विविध किस्म के हैं। मसलन, तुम बड़ी सती सावित्री हो!; तुम कौनसी ब्रम्हा की छठी औलाद हो!; आई लाइक योर टीथ, सोर्ट ऑफ बग्स बनी मीट्स जूलिया रॉबट्र्स। यहां तक कि सिर्फ चंद सेकंड के लिए जब पीयूष मिश्रा ऑटो वाला बनकर आते हैं और रूथ को मा और दर बोलना सिखाते हैं।

एक जरूरी बात
चितियप्पा गौड़ा (गुलशन दैवय्या) नाम का अनोखा गैंगस्टर। अपुन, ठोक डाल, मच मच, खोखा, मेरे कू और भाई मैं क्या बोलता ए... न जाने मुंबई के सांचों में ढले गैंगस्टर्स की ये शब्दावली हिंदी फिल्मों में कितनी लंबी है, पर एक जैसी है। चितियप्पा की भाषा तरोताजा करने वाली है। कन्नड़ बोलता है, फिर कोशिश करके अंगे्रजी भी बोल ही लेता है। बस। अब ये चितियप्पा हमारी मूवीज में खास इसलिए है कि इसके कपड़े, बोली और व्यवहार स्टीरियोटिपिकल नहीं है। जैसा कि हमारी फिल्मों में दिखाया जाता है। दूसरा हमेशा डॉन या तो मराठी होते हैं या उत्तर भारतीय। जैसे कि 'मुंबई मेरी जान' में थॉमस (इरफान खान) से पहले कोई व्यथित कन्नड़, तमिल, तेलुगू या मलयालम बोलने वाला प्रवासी कामगार यूं हमारी फिल्मों में न दिखा था। अब 'दैट गर्ल...' चितियप्पा को लाई है। पूरे ऑरिजिनल ढंग से। जब वो अपने आदमियों के साथ रूथ के घर जाता है तो हम चौंक जाते हैं, क्योंकि ये कथित गुर्गे दिखने में इतने बूढ़े और सिंपल पेंट-शर्ट डाले नहीं होते थे। जो बकवास नहीं करते, रिवॉल्वर नहीं रखते, मीट की दुकान नहीं होते और गालियां नहीं बकते। ये अंदर रसोई से कॉफी बनाकर लाते हैं। लड़की से अदब से पेश आते हैं और बात-बात पर उचकते नहीं हैं। बात गुलशन दैवय्या की। एक संपूर्ण मॉडलनुमा हीरो की तरह गुलशन कुछ महीने पहले एक टीवी कमर्शियल में दिखे थे, बेहद संपूर्ण। फिर 'दम मारो दम' में। फिर प्रभावी ढंग से 'शैतान' में। अब 'दैट गर्ल...' में। उनकी एक्टिंग में घिसावट और बासीपन नहीं हैं। आगे भी उनपर संजीदगी से नजर रहेगी। पूरा सरूप पर भी।

आखिर में...
फिल्म में नसीरूद्दीन शाह, रजत कपूर, रोनित रॉय, मकरंद देशपांडे और पीयूष मिश्रा दिखते हैं। न जाने क्यों दिखते हैं। क्योंकि स्क्रिप्ट में उनका विशेष महत्व नहीं है। मित्रवत वजहें हो सकती हैं क्योंकि इन सबकी जगह अनजान कलाकार भी होते तो कुछ बदलता नहीं।

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गजेंद्र सिंह भाटी