Thursday, February 28, 2013

जॉन मैक्लेनः बच्चों की मृगमरीचिका और कातिलों का हीरो

जॉन मूर के निर्देशन में बनी डाई हार्ड सीरीज की पांचवीं फिल्म पर कुछ बातें...


“अ गुड डे टु डाई हार्ड” देखने के बाद जैसे ही बाहर निकला, मन किया शीशा तोड़ते हुए चौथे माले से नीचे चमचमाते मॉल में कूद जाऊं। नीचे जाते हुए स्लो मोशन शॉट बड़ा सम्मोहक होगा। जॉन मैक्लेन को पिछली चार फिल्मों से देखता आया हूं। बंदा हर बार बच जाता है। हर तरह की स्थिति में बच जाता है। इस फिल्म में शुरू के मुख्य लंबे चेस सीन में इतनी कारें (सुंदर-सुंदर रंगों वाली) कुचली जाती हैं, इतने पौराणिकतामय प्रभावी तरीके से उसका ट्रक और उसके दुश्मन रूसी दुष्टों का बड़ा ट्रक मॉस्को की छह-आठ लेन सड़कों पर कलाबाजियां खाते हुए गिरता है कि लगता है वह मर गया, मगर पता है कि नहीं मरा। मैक्लेन भला मर सकता है! वह पूरणमासी की किसी विशेष नक्षत्रों वाली रात में जन्मा था। कुछ-कुछ अपने ‘शिकारी’ गोविंदा की तरह। ऐसा नहीं है कि ऊपर से कूदने का विचार मैक्लेन को देख पहली बार आया है। पहले भी आया है। न जाने कितनी बार आया है। जब-जब कोई हॉलीवुड फ्रैंचाइजी देखी है, आया है। ‘द अवेंजर्स’ के वक्त, ‘हल्क’ के वक्त, ‘द डार्क नाइट राइजेज’ के वक्त, ‘द बोर्न लैगेसी’ के वक्त, ‘रैंबो-4’ के वक्त, ‘द एक्सपेंडेबल्स’ के वक्त। हर बार इन जैसा हीरो बन जाने की भावना काबू से बाहर होती रही। ‘द डार्क नाइट राइजेज’ देखी तो बेन बनना चाहा। स्टेडियम का वो दृश्य जहां वो भोला सा बच्चा “ओ से कैन यू सी, बाय द डॉन्स अर्ली लाइट...” गा रहा होता और हजारों दर्शक मैच शुरू होने का इंतजार कर रहे होते, मेरे आने से अनजान, फिर मैच शुरू होता, फील्ड विस्फोट से भरभराकर तबाह होती और मैं मास्क धरे प्रवेश करता। उफ... क्या सीन होता न। फिर उस खौफनाक आवाज में हजारों अमेरिकियों की सांसें अपरिमेय डर से रोक कर रख देता। मेरे होने का अहसास वहां होता, मैं हीरो होता, मैं फुटेज में होता। फिल्म देख पीवीआर से निकला तो लगा, छलांग लगाता हूं, जब बेन लॉजिकली योग्य है, ताकतवर है तो मैं क्यों नहीं। इस ख्याल को धक्का देने वाला वो ख्याल और तर्क था कि जैसे ही तुम छलांग लगाओगे तुम इतने स्मार्ट होवोगे कि कोई न कोई रस्सी, रेलिंग, पत्थर जरूर पकड़ लोगे और ढस्स से लैंड कर लोगे। ये ख्याल सुपर कमांडो ध्रुव की और डोगा कि कॉमिक्स पढ़ते हुए भी आते रहे हैं। वो हर महामानव और दुश्मन का सामना करते ही इतने सम्मोहक-साइंटिफिक तरीके से थे। कूदने का ये ख्याल ‘डाई हार्ड-5’ देखने के बाद और प्रभावी हो उठा, कि एग्जिट गेट के अंदर से भागते बाहर आऊं और वेव सिनेमा के चौथे माले से शीशा तोड़ते हुए कूद जाऊं, पॉन्टी चड्ढा और उसके भाई हरदीप के मर्डर केस की मौन गूंज भरे उस प्रांगण में मुझे कुछ न होगा। मैक्लेन बच सकता है तो मैं क्यों नहीं?
Bruce Willis in his character of John McClane, in a still from the movie.
मगर न जाने क्यों, भगवान ने मुझे हर बार सद्बुद्धि दी और शैतान को मेरे दिमाग पर कब्जा करने से रोका। शायद ऐसा ही हुआ होगा। लेकिन क्या ऐसा हमेशा हो पाएगा। और क्या बच्चों के जेहन को हर बार ये समझ मिल पाएगी की वह बस एक फिल्म है। असली ब्रूस विलिस तो एक सीढ़ी के ऊपर से भी कार नहीं कुदा सकता फिर मॉस्को के उस ब्रिज से गाड़ी कुदा देना तो संभव ही नहीं है। क्या हर बच्चा जान पाएगा कि बेन की आवाज को हांस जिमर और क्रिस्टोफर नोलन ने कैसे विकृत करके बनाया और टॉम हार्डी उस भूमिका के उलट कितना सिंपल बंदा है।

फिल्मों का ये ही जादू होता है। ये हमें सपने देती हैं। किसी विशेष क्षेत्र में करियर बनाने का पुश देती हैं। निराशा के पलों के लिए सूत्रवाक्य देती हैं। दुख में गुनगुनाने के लिए गाने देती हैं। मगर जिस किस्म का मनोरंजन कुछ फिल्में देती हैं वो खतरनाक देती हैं। दिनों-दिन कुशल और प्रभावी होती तकनीक हर स्टंट को आसान और संभव दिखाती है। देख लगता है, हम भी कर सकते हैं। मुझे नहीं पता कि जेम्स होमर, बेन से कितना प्रभावित हुआ था, लेकिन उसके कर्मों में जोकर के अंश जरूर लगे जो कोई अलग बात नहीं है। ये बेन, जोकर, मैक्लेन सभी हिंसा के अलग-अलग प्रतिरूप हैं। कब परदे से दिमाग पर चढ़ जाते हैं पता नहीं चलता। क्या ऐसा मनोरंजन हम ज्यादा दिन चाह पाएंगे। इतने खून-खराबे भरे, रीसाइकिल होते, फ्रैंचाइजीनुमा ड्रामे क्या इतने जरूरी हैं हमारे लिए? क्या आप इनकी कीमत वहन कर पाएंगे? ये सवाल और बलवती हो उठे ‘अ गुड डे टु डाइ हार्ड’ देखकर।

बात करते हैं कहानी की।

मॉस्को, रूस से शुरू होती है। पूर्व अरबपति यूरी कोमोरोव (सबेश्चियन कोश) पर अदालती केस चलने वाला है। कभी उसके साथ मिल कर गैरकानूनी काम करने वाला और अब देश का डिफेंस मिनिस्टर विक्टर शगैरिन (सरगेई कोलिश्निकोव) अपने खिलाफ सबूतों वाली फाइल यूरी से चाहता है। मगर यूरी ऐसा नहीं करने के तैयार। इस मामले में जैक (जय कर्टनी) का प्रवेश होता है। वह कोमोरोव के किसी आदमी को गोली मार देता है, पुलिस गिरफ्तार कर लेती है, जेल में वह यूरी के खिलाफ गवाह बनने के तैयार हो जाता है। अब हम रूस से अमेरिका पहुंचते हैं। जॉन मैक्लेन (ब्रूस विलिस) नौकरी पर ही ध्यान देता रहा, कभी बेटे के साथ स्नेह भरा रिश्ता कायम नहीं कर पाया। जब उसे जैक की गिरफ्तारी का पता चलता है तो वह छुट्टी पर रूस जाता है। अदालत पहुंचता है तो वहां धमाके होते हैं। शगैरिन के आदमी यूरी को पकड़ना चाह रहे हैं तो सीआईए की ओर से काम कर रहा जैक यूरी से गुप्त फाइल लेकर उसे रूस से बाहर सुरक्षित निकलवाने के मिशन पर है। इसी बीच, सामने आ जाते हैं उसके डैड। पिता को फूटी आंख पसंद न करने वाला जैक अपने मिशन को जारी रखता है लेकिन धीरे-धीरे एक जासूसी एजेंट वाले उसके पैंतरे कमजोर पड़ने लगते हैं और डाई हार्ड सीरीज वाले जॉन मैक्लेन का महत्व बढ़ता जाता है। उसका अनुभव काम आता है।

फिल्म की बुनावट और मूड में जाएं तो कुछ चीजें नजर आती हैं। जब जॉन मैक्लेन के पहले दर्शन होते हैं तो उनके पीछे दीवार पर ओबामा की तस्वीर लगी होती है। ये बदले वक्त का पहला संकेत यूं होती है कि 1988 में सीरीज की पहली फिल्म आई तब से अब तक मुल्क के राजनीतिक हालात में एक व्यापक बदलाव हो चुका है (ये भी कि मौजूदा राजनीतिक ढांचे के तले दूसरे मुल्कों से संबंध उतने बुरे नहीं हैं कि कोई विदेशी ताकत से पाला पड़े, इसीलिए फिल्म का नायक ही दूसरे मुल्क में चला जाता है, वहां के अंदरुनी मसले में टांग अड़ाने के लिए)। पुलिस स्टेशन में मैक्लेन है तो एक युवा अश्वेत साथी भी, वह उसे उसके बेटे जैक की जानकारी लाकर देता है। वह जॉन को कहता है, “तुम कैसे हो ग्रैंडपा (दादा)। ” इसके मायने ये हैं कि जासूसी से लेकर देश की रक्षा तक की जिम्मेदारी युवा पीढ़ी ने ले ली है, उसे घर बैठ आराम करना चाहिए। जो वह करना भी चाहता है। मगर अपने ‘007’ बेटे को बचाने उसे जाना ही पड़ता है। मॉस्को में टैक्सी में बैठा जॉन ट्रैफिक में फंसा है। ड्राईवर से पूछता है, “क्या ट्रैफिक के हाल यहां भी बुरे हैं?” ये भी एक वैश्विक महानगरीय समस्या है जो जॉन मैक्लेन के किरदार के अस्तित्व के वक्त से मौजूद है। पहले सिर्फ अमेरिकी महानगरों में थीं, अब अमेरिकी सांस्कृतिक और आर्थिक अतिक्रमण वाले हर मुल्क की समस्या है। इस फिल्म में शुरू में दिखाया जाता है कि जॉन हीरो बनने वाली स्टंटबाजियों को महत्व नहीं देता। लगता है पिछली चार डाई हार्ड फिल्मों से उसने सबक लिया है कि परिवार को वक्त देना कितना जरूरी था। वह कहता है, “मैंने सोचा कि हर वक्त काम करना एक अच्छी चीज थी।” लेकिन अब चाहता है कि वह और उसका बेटा अमेरिका लौट जाएं इस मिशन को छोड़कर और नए सिरे से परिवार की तरह रहना शुरू करें। साइंटिस्ट और अरबपति यूरी की कहानी भी जॉन की तरह समान लगती है कि उसने भी काम के चक्कर में अपनी बेटी को वक्त ही नहीं दिया।

आयरलैंड मूल के निर्देशक जॉन मूर की ‘फ्लाइट ऑफ द फीनिक्स’ मुझे भाई थी, ये फिल्म कमजोर है। इसे सीरीज की पांचवीं फिल्म होने की अति-उम्मीदें मार जाती हैं। पिछली फिल्मों से ज्यादा धाकड़ बनाने के चक्कर में सारा ध्यान अमानवीय एक्शन और स्टंट पर चला जाता है जो आंखों की पुतलियों को कलाबाजियां खिलाता है, पर फिल्म खत्म होने तक वो सुगढ़ अनुभव नहीं देता जैसा 1988, 95 और 99 में आई तीनों शुरुआती फिल्मों ने दिया।

इस फिल्म में अमेरिकी फिल्मों के पसंदीदा और पारंपरिक शत्रुओं पर लौटा गया है। पहली डाई हार्ड में जर्मन आतंकियों ने लॉस एंजेल्स की नाकाटोमी प्लाजा बिल्डिंग को कब्जे में ले लिया था। दूसरी में एक लातिन अमेरिकी तानाशाह को छुड़वाने की कोशिश हुई। तीसरी फिल्म में फिर जर्मन कनेक्शन था और चौथी में एक अमेरिकी ही साइबर आतंकी बनकर उभरा। इस फिल्म में दुश्मन हैं रूसी। लेकिन यहां उनके मुल्क में जाकर हीरो बनने के चक्कर में चर्नोबिल विभीषिका का एंगल घुसाया गया है। दिखाया जाता है कि यूरी और मिनिस्टर के यूरेनियम साइड रैकेट से ये हादसा हुआ। ये अमेरिकी एंटरटेनमेंट का दावा है जबकि चर्नोबिल नरसंहार और भोपाल गैस त्रासदी की तमाम तथ्यपरक चीजें पब्लिक स्पेस में उपलब्ध हैं... वो फैक्ट इतने नाटकीय और सीधे नहीं हैं जितना यहां फिल्म बना देती है। जॉन और जैक चर्नोबिल की इमारत के अवशेष देख बात करते हैं, “ये तुम्हें किसकी याद दिलाता है?”, “नेवार्क”, …नेवार्क दरअसल अमेरिका में परमाणु संयंत्र का एक केंद्र है... क्या डायरेक्टर जॉन मूर कुछ कहना चाहते हैं यहां?

यहां रूसी-अमेरिकी वाले फंडे को देख ये सवाल भी उठता है कि हमेशा मैक्लेन जैसे अमेरिकी नायक ही क्यों हीरो हो जाते हैं?

इसमें उल्टा भी तो हो सकता है...

हो सकता है किसी रूसी का बेटा वहां की गुप्तचर संस्था केजीबी की ओर से काम करे और किसी अमेरिकी यूरेनियम वैज्ञानिक को अमेरिका से हिफाजत सहित बाहर निकालने की बात कहे और शर्त रखे कोई फाइल मांगने की। उसके इस मिशन के बीच उसका रूसी पिता आ जाए जो वहां के पुलिस विभाग का बड़ा काबिल अधिकारी रहा है, एटिट्यूड वाला है। वह अलग-अलग मौकों पर रूस में अपना हीरोइज्म साबित कर चुका है। अब वह अपने बेटे के साथ वक्त बिताना चाहता है, उन दिनों की भरपाई करना चाहता है जब वह काम की वजह से उसके साथ वक्त न बिता सका। पर यहां मामला उल्टा पड़ जाए। कोई साजिश निकल आए। अब वो अमेरिका की सड़कों पर स्टंट करते गाड़ियां दौड़ा रहे हैं। फिल्म के आखिर में वो लोग हिफाजत के साथ रूस आ जाते हैं और अमेरिका में बड़े बम-वम फोड़ आते हैं। हमें ये कहानी हजम क्यों नहीं हो सकती?

या फिर बॉर्डर फिल्म का वो संवाद जहां पाकिस्तानी फौजी अधिकारी भारतीय को ललकारते हुए कहता है, “कुलदीप सिंह, तेरी मौत दे फरिश्ते तेरे दरवाजे ते खड़े ने, या ते अपने बंदेयां समेत सिर ते हाथ रखकर बाहर आ जा, या ते फिर अपनी अंतिम अरदास पढ़ लै।” जवाब में मेजर कुलदीप सिंह कहता है, “ओए तू गुलाम दस्तगीर है ना, लाहौर दा मशहूर गुंडा, गंदे नाले दी पैदाइश। ऐ तां वक्त ही दस्सेगा कि मेरी अंतिम अरदास हुंदी है या फिर तेरा इल्लाह पढ़ेया जांदा है। हुण तू इक कदम वी बाहर निकल्या तां मैं तैनूं उसी गंदे नाले विच मार सुट्यांगा जित्थों तू आया सी।” ये संवाद हमें उल्टा क्यों नहीं हजम हो सकता? जहां पाकिस्तानी अधिकारी किसी भारतीय किरदार को मेरठ के चौराहे का गुंडा बोल दे। क्यों कोई पाकिस्तानी सैनिक हीरो नहीं हो सकता? उसका हीरोइज्म कम क्यों है? कोई सनी देओल पंप उखाड़ अपनी सकीना को सरहद पार ले आता है, ऐसा कोई पाकिस्तानी करे तो, किसी दिव्या पांडे को पाकिस्तान ले जाए तो।

क्यों हीरो हमेशा जनता की नजरों में एक ही तरह के होते हैं? और क्यों दुश्मन भी एक ही तरह के? ये मनोरंजन का दरअसल सूत्र बन चुका है। तय सूत्र। जैसे अमेरिकी कहानियों में विलेन एक ही तरह के होने लगे हैं। ‘द डार्क नाइट राइजेज’ में नक्सली और जूलियन असांजे जैसे अपराधी हैं, वही सीआईए जब पाकिस्तान में जाकर ओसामा के खिलाफ बड़ा ऑपरेशन कर आता है तो अमेरिकी बुरे नहीं बनते। उनकी इमारतों में दो प्लेन घुस गए तो वो नाराज हो गए। उन्होंने अपने यहां की हथियार कंपनियों के अरबों डॉलर का आयुध अफगानिस्तान-ईराक में उड़ेल दिया तो जवाबी प्रतिक्रिया में उन मुल्कों के लोगों को भी तो अमेरिका आकर अपना हीरोइज्म दिखाने दो! असल में न सही, मनोरंजन में ही सही। जिसका गन्ना उसकी गंडेरी वाली बात भी तो नहीं है न यहां। यहां जिसकी लाठी उसकी भैंस है और सारे बड़े लट्ठ धन्ना सेठ अमेरिका के पास हैं।

इस लिहाज से अभी तक सिर्फ जेम्स कैमरून की ‘अवतार’ में और नील ब्लूमकांप की ‘डिस्ट्रिक्ट-9’ में ही कुछ नयापन दिखा है। ‘अवतार’ में नक्सली या आदिवासी प्रतिरोध का समर्थन दिखता है। मूल निवासियों की निजता और रिहाइश में सेंध न लगाने का संदेश मिलता है। अन्यथा कुछ नहीं है। कैथरीन बिगलो ने भी ज्यादा से ज्यादा अमेरिकी जेल शिविरों में दी जाने वाली यंत्रणा की आंशिक तस्वीर ‘जीरो डार्क थर्टी’ में दिखाई है, वह भी हदों में रहते हुए।

जॉन मैक्लेन तो यहां खुले तौर पर अपने बेटे से कहता है, “लेट्स किल सम...”

वैसे ये क्या बात हुई? ऐसे कैसे, किल सम...? 

A Good Day to Die Hard/Die Hard-5 is the fifth from the series which began in 1988. The central character of the movie, a New York City police detective John McClane (Bruce Willis), this time goes to Moscow to find and help his wayward son Jack (Jai Courtney). John doesn't know that his son is a CIA operative and is on a mission there. Russian underworld is pursuing him and a nuclear weapons heist is coming their way. Director of the movie is John Moore, whose 'Flight of the Phoenix' I liked when I saw first.
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Tuesday, February 26, 2013

फालके की कालिया मर्दन जंग लगे केन में पड़ी मिट्टी हो जाती, पी. के. नायर ने जोड़ी, सहेजीः शिवेंद्र सिंह डूंगरपुर

हमारे वक्त की सबसे महत्वपूर्ण फिल्मों में से एक सेल्युलॉयड मैन के निर्देशक शिवेंद्र सिंह डूंगरपुर से बातचीत, उनकी डॉक्युमेंट्री भारत में फिल्म संरक्षण के पितामह पी. के. नायर के बारे में है


सन् 1912 में मानसून के बाद बंबई के दादर इलाके में ‘राजा हरिश्चंद्र’ की शूटिंग शुरू हुई। ‘मोहिनी भस्मासुर’ 1914 में प्रदर्शित की गई। उनकी तीसरी फिल्म ‘सावित्री-सत्यवान’ थी। ‘लंका दहन’ सन् 1917 में बनकर तैयार हुई। हनुमान की समुद्र पर उड़ान इस फिल्म का मुख्य आकर्षण थी। हनुमान उड़ता हुआ आकाश में पहले बहुत ऊंचाई तक जाता है और फिर धीरे-धीरे छोटा-छोटा होता जाता है। ‘कृष्ण जन्म’ और ‘कालियामर्दन’ दोनों ही फिल्मों में कृष्ण की भूमिका फालके की बेटी मंदाकिनी ने की थी जो उस समय सात वर्ष की थी। प्रत्यक्षदर्शी बताते हैं कि ‘कालियामर्दन’ में नाग के फन से नदी में कूदते समय मंदाकिनी साहस नहीं कर पाती थीं लेकिन फालके निर्भीकतापूर्वक उसका साहस बढ़ाते रहते थे। फालके की रुचि सिनेमा के रचनात्मक पक्ष में थी। इन कथा फिल्मों के साथ-साथ वे लघु फिल्में भी बनाया करते थे। ‘लंका दहन’ के समय उन्होंने एक लघु हास्य फिल्म ‘पीठाचे पंजे’ बना कर मूल कथा फिल्म के साथ प्रदर्शित की थी। ‘लक्ष्मी का गलीचा’ में उन्होंने ट्रिक फोटोग्राफी और मनोरंजक तरीके से सिक्के तैयार करने की विधि बतायी थी। ‘माचिस की तीलियों के खेल’ में माचिस की तीलियों से बनने वाली विभिन्न आकृतियां दर्शायी गयी थीं। ‘प्रोफेसर केलफा के जादुई चमत्कार’ में फालके ने स्वयं जादूगर का अभिनय किया था। सन 1918 में ही उन्होंने ‘फिल्में कैसे बनायें’ जैसी शिक्षाप्रद फिल्म बनाई थी।

... सोलह फरवरी सन् 1944 को जब दादा साहब फालके का नासिक में देहान्त हुआ, तब तक लोग भारतीय सिनेमा के इस पितामह को भूल चुके थे। अपने जीवन के अन्तिम वर्ष उन्होंने गुमनामी और अकेलेपन में बिताये। वर्षों बाद जब कुछ शोधार्थी नासिक पहुंचे तो वहां उन्हें फालके के घर से फिल्मों के जंग खाये डिब्बे मिले। बहुत सी फिल्में मिट्टी हो चुकी थीं। फालके की फिल्मों के इन टुकड़ों को जोड़कर राष्ट्रीय फिल्म संग्रहालय ने एक कार्यक्रम तैयार किया।

मनमोहन चड्ढा की 1990 में आई किताब ‘हिंदी सिनेमा का इतिहास’ में धुंडिराज गोविंद फालके का अध्याय जहां खत्म होता है, हमारी कहानी वहां से शुरू होती है। कहानी पी. के. नायर की। नासिक से पहुंचे जिन शोधार्थियों ने फालके के घर उनकी फिल्मों के जंग खाये डिब्बों की सुध ली थी, वो नायर ही थे। राष्ट्रीय फिल्म संग्रहालय के संस्थापक। वो नींव के पत्थर जिन्हें सिनेमा के कद्रदानों के बीच लगभग न के बराबर जाना जाता है। भारतीय सिनेमा के शुरुआती दशकों में बनी दुर्लभ 1700 फिल्में नष्ट हो गईं और उनमें से 9-10 संरक्षित की गईं तो नायर की बदौलत। उन्होंने राजा हरिश्चंद्र (1913), कालिया मर्दन (1919), अछूत कन्या (1936), जीवन नैया (1936), कंगन (1939), बंधन (1940), किस्मत (1943), कल्पना (1948) और चंद्रलेखा (1949) को आने वाली भारतीय सभ्यताओं के लिए बचाकर रखा है। फिल्म संरक्षण के अलावा भी उनका योगदान मुख्यधारा की हिंदी फिल्मों और कलाकारों तक रहा। रिलीज के दस साल बाद दिलीप कुमार को पहली बार ‘मुग़ल-ए-आज़म’ अभिलेखागार में से निकाल उन्होंने ही दिखाई थी। आशुतोष गोवारिकर नाम के युवक को अभिनय से निर्देशन में जाने की प्रेरणा देने वाले वही थे। बाद में आशुतोष ने ‘लगान’ और ‘जोधा अकबर’ बनाई। भारतीय फिल्म और टेलीविज़न संस्थान, पुणे (एफ.टी.आई.आई.) और राष्ट्रीय फिल्म संग्रहालय, पुणे (एन.एफ.ए.आई.) में आने-जाने वाले हजारों-हजार फिल्म निर्माण विधा से जुड़े लोगों की जिंदगी का वह हिस्सा रहे हैं। लेकिन पी. के. नायर ने न तो कभी सुर्खियों में आने की कोशिश की, न अपने किए का श्रेय लेने के लिए हाथ-पैर मारे और न ही ये मुल्क इस लायक था कि उन्हें वो इज्जत दे सके। जिन्होंने दादा साहब फालके का खोया ‘भारतीय सिनेमा के पितामह’ होने का गौरव उनकी विलुप्ति के कगार पर खड़ी फिल्मों को बचाकर लौटाया, उन्हीं नायर को अभी तक फालके सम्मान नहीं मिला है। मगर ऐसा लगता है कि अब हमारी तमाम गलतियां सुधरेंगी।
P. K. Nair at his residence in Thiruvananthapuram, Kerala. Photo: Shivendra Singh Dungarpur
 
मुंबई और डूंगरपुर स्थित फिल्मकार शिवेंद्र सिंह डूंगरपुर ने अपने एफ.टी.आई.आई. दिनों के श्रद्धेय व्यक्तित्व नायर साहब पर बीते साल एक डॉक्युमेंट्री फिल्म बनाई है। उनकी फिल्म ‘सेल्युलॉयड मैन’ नायर के योगदान के अलावा भारत में फिल्म संरक्षण पर बात करती है। बनने के वक्त से ही ये फिल्म दुनिया भर के तमाम विशेष अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में जाकर आ चुकी है और अभी भी आमंत्रण आ रहे हैं। शिवेंद्र के बारे में बात करें तो वह पहले गुलज़ार की कुछ फिल्मों में उनके सहयोगी रहे और फिर फिल्ममेकिंग की पढ़ाई की। उसके बाद इत्तेफाक (संभावित शीर्षक) फिल्म का निर्देशन शुरू किया जिसमें संजय कपूर, चंद्रचूड़ सिंह, रानी मुखर्जी और करिश्मा कपूर की मुख्य भूमिकाएं थीं। फिल्म पूरी न हो पाई और बाद में वह विज्ञापन फिल्में बनाने लगे। देश के प्रभावी विज्ञापन फिल्मकारों में वह शुमार हुए। बीच में वह ‘गुरुदत्त’ शीर्षक से बायोपिक बनाने वाले थे लेकिन उस पर काम शुरू नहीं हुआ। शिवेंद्र खुद भी लगातार विश्व सिनेमा के संरक्षण में लगे हुए हैं। अल्फ्रेड हिचकॉक की एक फिल्म के पुनरुत्थान के लिए उन्होंने आर्थिक सहयोग किया था। मार्टिन स्कॉरसेजी को उन्होंने उदय शंकर की दुर्लभ फिल्म ‘कल्पना’ ले जाकर दी, जब मार्टिन को फिल्म मिल नहीं रही थी। शिवेंद्र लगातार विश्व का भ्रमण कर रहे हैं और दुनिया के अलग-अलग मुल्कों के दिग्गज फिल्म निर्देशकों और सिनेमैटोग्राफर्स से वीडियो साक्षात्कार कर रहे हैं। वह अब तक पॉलैंड के आंद्रे वाइदा (Andrzej Wajda), क्रिस्ताफ जेनोसी (Krzysztof Zanussi), वितोल सोबोचिंस्की (Witold Sobociński), येज़े वोइचिक (Jerzy Wójcik), हंगरी के इज़्तवान साबो (István Szabó), मीक्लोश इयांचो (Miklós Jancsó), पुर्तगाल के मेनुवल जॉलिवइरा (Manoel de Oliveira), स्लोवाकिया के यूराई हेरेस (Juraj Herz), चेक रिपब्लिक के यानी निमेच (Jan Němec), यीरी मेंजल (Jiří Menzel), यारोमीर शोफर (Jaromír Šofr), वीरा ख़ित्येरोवा (Věra Chytilová) और फ्रांस के राउल कूतार्द (Raoul Coutard) से मिल चुके हैं और उनके लंबे इंटरव्यू कर चुके हैं। निजी तौर पर अभी के दिनों में मैंने सिनेमा जगत में इससे उत्साहजनक बात नहीं जानी है। यीरी मेंजल पर तो शिवेंद्र फिल्म भी बना रहे हैं जो जल्द ही हमारे सामने आ सकती है।

तो ‘सेल्युलॉयड मैन’ के सिलसिले में मेरी शिवेंद्र सिंह से बातचीत हुई।

‘सेल्युलॉयड मैन’ को लेकर कैसी प्रतिक्रियाएं आईं हैं?
अब तक 14 अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में जाकर आ चुकी है, कुछ और में जाने वाली है, इस तरह कोई 22-25 फेस्टिवल हो जाएंगे। किसी भी भारतीय डॉक्युमेंट्री फिल्म के लिए ये एक रिकॉर्ड होगा। शाजी करुण की ‘पिरवी’ और सत्यजीत रे की ‘पथेर पांचाली’ ही ऐसी फिल्में थीं जिन्हें सबसे ज्यादा फिल्म समारोहों में प्रदर्शित किया गया। उनके बाद ‘सेल्युलॉयड मैन’ ही है। इसका श्रेय नायर साहब को जाता है। पूरे हिंदुस्तान में प्रिजर्वेशन (फिल्म संरक्षण) का माहौल उभरकर आ रहा है। लोगों में जागरुकता आ रही है। मैंने उम्मीद नहीं की थी कि इतना होगा। आर्काइव्स में हमारी इतनी फिल्में हैं जो यूं ही पड़ी हैं, कोई देखभाल नहीं कर रहा है। मैंने सोचा था कि थोड़ा-बहुत शूट करके कुछ करूंगा। करते-करते तीन साल बीत गए। बिल्कुल नहीं सोचकर चला था कि इतना रिस्पॉन्स आएगा। इतना भारी रिस्पॉन्स कि कुछ ऐसे समारोहों में गई है जहां बहुत ही मुश्किल है जाना। जैसे टेलेराइड जो कोलोराडो में है, वो बहुत ही सलेक्टिव हैं, हॉलीवुड का गढ़ है, वहां बड़ी-बडी हॉलीवुड फिल्में होती हैं, स्टार होते हैं, वहां घुसना बड़ा मुश्किल है, पर उन्होंने चुना। मैं आभारी हूं उनका कि उन्होंने हमें जगह दी और दो-तीन स्क्रीनिंग कराई, अकेडमी (ऑस्कर्स) को दिखाई। फिल्म यूरोप के कई देशों में भी गई है, भारत में हर फिल्म फेस्टिवल में लगी है।

Shivendra at the Il Cinema Ritrovato, Bologna.
सिनेमाघरों में कब तक लाएंगे?
मार्च का सोचा था लेकिन मैं चाहता हूं कि रिलीज ढंग से हो। ये नहीं चाहता हूं कि ऐसी जगह रिलीज हो जाए जहां लोग जाने तक नहीं। इसमें सरकार का भी योगदान चाहता हूं। चूंकि ये एक एजुकेशनल फिल्म है इसलिए पैसे कमाने से ज्यादा जरूरी ये है कि लोगों तक पहुंचे। फ्री होनी चाहिए या इतने कम पैसे की टिकट हो कि लोग बिल्कुल आकर देखें और फिल्म में नायर साहब की बातों का ज्ञान लें। खुद की फिल्म संस्कृति को हम कैसे बचाएं और आगे वाली पीढ़ी के सुपुर्द करें, ये बात है। रिलीज जरूर होगी पर मेरी चिंता यही है कि टिकट की कीमत कम हो, जिनसे भी बात कर रहा हूं ये बात सामने रख रहा हूं। नहीं तो आप उसे मल्टीप्लेक्स में कंपीट करवा रहे हैं और कोई एजुकेशनल फिल्म देखने के लिए पांच सौ रुपये नहीं देगा। आम या आर्थिक तौर पर असमर्थ लोग भी देखना चाहेंगे तो ऐसी फिल्मों में टिकट न्यूनतम कीमत वाली होनी चाहिए।

राष्ट्रीय फिल्म संग्रहालय की स्थापना पी. के. नायर ने की…
हां, एन.एफ.ए.आई. की स्थापना उन्होंने अकेले ही की, और कोई था नहीं उसके साथ। उस वक्त का जमाना अलग था, नेहरुवियन पीरियड था। वो अच्छे विचारों के इंसान थे, कला और कलाकारों के लिए उन्होंने दिल्ली में काफी कुछ किया। मिसेज गांधी भी सूचना एवं प्रसारण मंत्री रहीं तो उन्होंने भी काफी योगदान दिया। ये आर्काइव उसी वक्त खुला जब उन्हें लगा कि हमें एक आर्काइव खोलना है। मेरे ख्याल से नायर साहब ये कर पाए क्योंकि उस वक्त ये लोग उनके साथ थे, सहयोग था। आज के माहौल में अलग बात है। आज सबकुछ होने के बाद भी सरकार का ध्यान इस और नहीं जा रहा।

दादा साहब फालके को फादर ऑफ इंडियन सिनेमा कहा जाता है, इसमें नायर का कैसा योगदान रहा?
बहुत बड़ा योगदान था। नायर साहब नासिक गए, फालके के परिवार से मिले, उनकी यूं ही पड़ीं फिल्में उठाईं और सहेजीं। उनकी एक फिल्म कालिया मर्दन (1919) की फुटेज टुकड़ों में पड़ी थी। पी. के. नायर ने फालके के हाथ से लिखे डायरी नोट्स के आधार पर फिल्म को नए सिरे से जोड़ा। उन्होंने फालके के बड़े बेटे से पूछा, उनकी बेटी मंदाकिनी जिन्होंने कालिया मर्दन में काम किया था उनसे पूछा। इस तरह ये फिल्म बची। बाद में उसे मुंबई में 1970 में हुए फालके सेंटेनरी सेलिब्रेशन में दिखाया गया। 1982 में उसे लंदन के एन. एफ. टी. फेस्टिवल में भारतीय हिस्से के तौर पर दिखाया गया। बाद में एविग्नां, फ्रांस में हुए साइलेंट फिल्म फेस्टिवल में दिखाया गया। गुलज़ार साहब ने ‘सेल्युलॉयड मैन’ में कहा है कि अगर हम फालके के बारे में आज कुछ भी जानते हैं, वो नहीं जान पाते अगर नायर साहब नहीं होते। हम फालके के बारे में सिर्फ सुनते लेकिन उनकी फिल्म नहीं देख पाते। नायर साहब की बदौलत हम फालके को आज देख पा रहे हैं। वो हर जगह जाकर खुद फिल्में इकट्ठा करते थे, क्लीन करते थे, कैटेलॉगिंग करते थे और आर्काइव में रखते थे।

एक हिला देने वाला आंकड़ा है कि 1700 मूक (साइलेंट) फिल्में भारत में बनीं और बची हैं सिर्फ 9 से 10। इतनी भी बची हुई हैं सिर्फ नायर साहब की वजह से। नहीं तो पहले ही खत्म हो जाता है। आर्काइव खुला 1964 में और हमारी पहली फिल्म राजा हरिश्चंद्र बनी 1913 में यानी उससे पहले 50 साल तो सब खत्म हो चुका था। 50 साल तक तो कोई संरक्षण हुआ ही नहीं। ये बहुत बड़ा वक्त होता है। और फिर फिल्में भी बदल रहीं थीं, साउंड आ गया था।

मैं विदेश जाता हूं तो लोग हैरान हो जाते हैं सुनकर। आप देखिए स्वीडिश फिल्म आर्काइव की वेबसाइट क्या कहती है। उनकी सिर्फ चार फिल्म मिसिंग है, बाकी आज तक के उनके इतिहास में बनी तमाम साइलेंट फिल्में उनके पास सुरक्षित हैं। चार भी वो गायब हैं जो प्रोड्यूसर्स ने दी नहीं हैं या कोई दूसरा चक्कर है। कभी-कभी तो मैं इतना हैरान हो जाता हूं कि हिंदुस्तान की संस्कृति और परंपरा जो इतनी प्राचीन है उसे बचाने का कष्ट हमने कभी किया ही नहीं। नायर साहब अकेले इंसान कितना कर सकते हैं वो भी ऐसे हिंदुस्तान में जहां हर साल हजार फिल्में बनती हैं और हर इंसान को राजी करना, हर इंसान से बात करना कि आप आर्काइव में फिल्म देने के बारे में सोचिए, आप ही की चीज सहेजी जाएगी लेकिन हर सामने वाला सोचता है कि इनसे मैं कितना पैसा निकाल पाऊं।

आपका बचपन कहां बीता? कैसा बीता? आसपास कैसी फिल्में रहीं? फिर फिल्मकारी में कैसे आए?
मैं डूंगरपुर, राजस्थान का रहने वाला हूं। राजपरिवार (पूर्व) से हूं। राजपरिवार से होने का एक फायदा ये हुआ कि मुझमें प्रिजर्वेशन की परंपरा आई। डूंगरपुर का हाउस सबसे पुराने रॉयल ठिकाणों में से है। हम लोग सब सिसोदिया हैं और चित्तौड़ से हैं। हम ओल्डर ब्रांच हैं उदयपुर से। अरविंद सिंह मेवाड़ मुझे काका बोलते हैं। हमारा परिवार सिसोदिया खानदान में हेड ब्रांच है। हमारा जो पैलेस है जूना महल वो 800-900 साल पुराना है इसलिए हम लोग जानते थे कि हिस्ट्री कितनी जरूरी है, प्रिजर्वेशन कितना जरूरी है। मेरी मां डुमरांव (बिहार) स्टेट से हैं जहां से बिस्मिल्लाह खान थे, वह वहां कोर्ट म्यूजिशियन थे, बाद में उनका परिवार बनारस चला गया था। डुमरांव बक्सर से जरा पहले पड़ता है। पटना में दो सबसे बड़े स्टेट हुआ करते थे। एक था दरभंगा और दूसरा डुमरांव। बहुत बड़ी जमींदारी थी। मेरी पैदाइश पटना में हुई क्योंकि मैं अपने पिता का पहला बच्चा था। मेरे पिता समर सिंह जी आईएएस थे, एनवायर्नमेंट मिनिस्ट्री में थे, वहीं से रिटायर भी हुए। मैं पटना में जन्मा इसलिए अपनी नानी के पास डुमरांव में काफी वक्त बिताया। वह नेपाल से थीं। तब राजपरिवार की काफी शादियां नेपाल में होती थीं। मेरी फर्स्ट कजिन सिस्टर राजमाता साहब (पूर्व) जैसलमेर हैं और महारानी ऑफ कश्मीर भी उनकी फर्स्ट कजिन हैं।

मेरी नानी बहुत शौकीन थीं फिल्मों की। वह मुझे अकसर सिनेमाहॉल ले जाती थीं और पूरा सिनेमाहॉल बुक करवाती थीं। तो मेरे ख्याल से मेरा लगाव फिल्मों से उस तरह हुआ। डूंगरपुर में हालांकि मेरा बचपन बीता मगर वो इतने शौकीन नहीं थे, थोड़ी-बहुत इंग्लिश फिल्में देखते थे, लेकिन डुमरांव का परिवार बहुत जुड़ा हुआ था। मुझ पर नानी का बहुत असर था। उनकी वजह से मैंने फिल्में देखीं। जैसे ‘पाकीजा’ मीना कुमारी की और कई ऐसी फिल्में। मैं जब शिक्षा प्राप्त करने दून बोर्डिंग स्कूल गया तो वहां मैंने ठान लिया कि मैं फिल्मों में डायरेक्टर के तौर पर जुडूंगा। वहां चंद्रचूड़ सिंह (एक्टर) मेरे क्लासमेट थे। उन्होंने ठान लिया था कि वह एक्टर बनेंगे और मैंने ठान लिया था कि मैं डायरेक्टर बनूंगा। इन्हीं भावनाओं के साथ हम वहां से निकले। मैंने दिल्ली में सेंट स्टीफंस कॉलेज से हिस्ट्री में ऑनर्स किया, उन्होंने भी। हम साथ ही बॉम्बे आए। काफी दबाव था डूंगरपुर परिवार से। वो चाहते नहीं थे कि मैं फिल्मों से जुड़ूं। मेरे ग्रैंड अंकल डॉ. नागेंद्र सिंह इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस (हेग) के अध्यक्ष थे और वह चाहते थे कि मैं ऑक्सफोर्ड जाऊं जैसे मेरे दादा गए और मेरे परिवार के बाकी सदस्य गए। डूंगरपुर का परिवार शिक्षा के मामले में काफी आगे था। ...लेकिन मेरे सबसे बड़े सपोर्ट मेरे काकोसा थे राज सिंह डूंगरपुर (क्रिकेटर)। वो एक ऐसी पर्सनैलिटी थे कि उनके जैसी पर्सनैलिटी मैंने देखी नहीं है कहीं। उन्होंने मुझे बेटे की तरह रखा। मैं बॉम्बे उनके पास आया, वहां गुलजार साहब को असिस्ट करना शुरू किया। उनके पास रहकर मुझे इतनी शक्ति मिली कि ठान लिया इसी लाइन में कुछ करूंगा। गुलज़ार साहब के साथ मैंने ‘लेकिन’ में काम किया। एक थोड़ी अधूरी फिल्म थी ‘लिबास’ और कई डॉक्युमेंट्रीज पर काम करते हुए भी मैं उनके साथ ही रहा। वह मेरे गुरु हैं। उन्होंने सोचा कि मुझे फिल्म एंड टेलीविज़न इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया (एफ.टी.आई.आई.) जाना चाहिए जहां मैं और बेहतर शिक्षा प्राप्त कर सकूं। लेकिन उस वक्त मैंने अपने पिता के कहने पर लॉ कॉलेज जॉइन कर लिया था। मैं मुंबई की डी रोड़ पर रहता था, वह वानखेड़े स्टेडियम के ठीक सामने है। राज सिंह जी ने अपना घर हमेशा क्रिकेट स्टेडियम के पास ही रखा था क्योंकि क्रिकेट से ज्यादा उनको कुछ सूझता नहीं था। मेरा लॉ कॉलेज ए रोड़ पर था। मैं सुबह जाता था, क्लास करता था और गुलज़ार साहब के पास चला जाता था लेकिन उन्होंने ठान लिया और आदेश कर दिया था कि आप एफ.टी.आई.आई. जाइए। मैंने आवेदन किया, वहां का एडमिशन प्रोसेस काफी मुश्किल था, एंट्रेंस था, इंटरव्यू थे और सीट सिर्फ छह थीं लेकिन मुझे वहां पर एक स्थान मिल गया। तीन साल यानी 1994 की शुरुआत तक मैं वहां पढ़ता रहा।

वहां से आने के बाद मुझे एक फिल्म डायरेक्ट करने का मौका मिला जिसमें संजय कपूर और रानी मुखर्जी थे। रानी मुखर्जी बिल्कुल नईं थी उस वक्त, उनकी फिल्म रिलीज हो रही थी, मैं उनको कंप्यूटर क्लास में मिलने गया था। चंद्रचूड़ सिंह ने कहा था कि “मेरी क्लास में एक लड़की पढ़ती है, उसका नाम रानी मुखर्जी है और वह काजोल की बहन लगती है और उसको देखिए वो हीरोइन के लिए बहुत जंचेगी।” तो हम उसको मिलने गए। काफी बड़ी कास्ट थी। हमने ए. आर. रहमान को लिया। रहमान उस वक्त काफी नए थे, कोई भी साइन करने को तैयार नहीं था उन्हें। लोग कह रहे थे कि इल्याराजा फ्लॉप हो गए तो रहमान क्या चीज हैं। खैर, उस माहौल में मैंने पिक्चर शुरू की। 40 फीसदी फिल्म बनकर तैयार हुई। फिल्म के प्रोड्यूसर थे मिलन जवेरी, उन्हें पैसा आ रहा था टिप्स से। उस वक्त क्या हुआ कि टिप्स वालों पर गुलशन कुमार मर्डर केस में शामिल होने के आरोप लगे। फिल्म बंद हो गई। और एक-दो पिक्चर जो मैंने साइन की थीं वो भी बंद हो गईं। ये ऐसा वक्त था जब कोई फिल्म पूरी नहीं होती या अटक जाती तो उसे शुभ नहीं मानते थे। अभी दौर बदल चुका है, इंडस्ट्री बदल चुकी है। उस वक्त पुराने यकीनों में लोग चलते थे। उसके बाद काफी स्ट्रगल रहा मेरा। आप विश्वास करिए मुझ पर घर से इतना दबाव पड़ा... उन्होंने कहा कि “तुम ये फिल्म लाइन छोड़ दो, ये क्या है, बकवास है, तुम डूंगरपुर के परिवार से हो, परंपरा से हो, परिवार में पहले कभी किसी ने ऐसा काम नहीं किया है” और बहुत दबाव पड़ा। मेरी मां का मेरे साथ आशीर्वाद था। उन्होंने कहा कि “तुम जो करना चाहो करते रहो।” 1995 से 2001 तक मेरा स्ट्रगल चलता रहा, छह साल स्ट्रगल चला। मैं स्टेशनों पर खाता था खाना। उसी तरह रहता था जैसे कोई स्ट्रगलर रह रहा हो। राजपरिवार से होने का कोई भी प्रभाव नहीं पड़ा। फिर विज्ञापन आए। किसी ने मुझे एड फिल्म ऑफर की और वो दौर आज तक चल रहा है। मैंने स्थापना की डूंगरपुर फिल्म्स की 2001 में। विज्ञापन फिल्म एक के बाद एक करने लगा और बहुत कामयाबी मिली। इतनी कामयाबी मिली कि हम दिल्ली में सबसे बड़े प्रोडक्शन हाउसेज में से बन गए। चार सौ कमर्शियल कर चुका हूं अभी तक लेकिन ध्यान हमेशा फिल्मों में था। विज्ञापन फिल्मों में मैंने बहुत कामयाबी हासिल की लेकिन प्यार फिल्मों से ही था। फिल्मों के लिए ही आया था, फिल्मों के लिए ही जी रहा था। राज सिंह जी ने मुझसे एक बात कही थी कि “तुम इस लाइन को तभी जॉइन करो जब उससे उतना ही प्रेम करो जितना मैं क्रिकेट से करता हूं” मैं उनकी वो बातें आज भी नहीं भूला हूं। उन्होंने मुझे ये पहली शिक्षा दी थी और आज भी मैं फिल्मों से ही जुड़ा हुआ हूं। मेरी जिंदगी फिल्म है, सुबह से शाम मैं फिल्में ही सोचता हूं। फिर एक मौका मिला मुझे फिल्म संरक्षण में घुसने का।

एक दिन मार्टिन स्कॉरसेजी का इंटरव्यू पढ़ा मैंने कि बलोना (इटली) में फिल्म प्रिजर्व होती है। मैं वहां का फेस्टिवल देखने चला गया जो जून-जुलाई में होता है इल सिनेमा रित्रोवातो (Il Cinema Ritrovato)। वहां पुरानी फिल्मों को वो रेस्टोर करके दिखाते हैं। उस दौरान मैंने सोचा कि यार हिंदुस्तान में तो इतना खजाना है, उन फिल्मों का क्या होगा। एफ.टी.आई.आई. में नायर साहब का प्रभाव इतना ज्यादा था कि उनसे डरते थे हम लेकिन पर्सनल लेवल पर मैं नहीं जानता था। तो मैंने दोस्तों के साथ मिलकर सोचा कि जाकर नायर साहब से मिला जाए। तब मार्टिन स्कॉरसेजी को ‘कल्पना’ फिल्म की जरूरत थी इंडिया से और वो ट्राई करके बैठ चुके थे, जाहिर है इंडिया में जो सरकारी पॉलिसी है, वह उनकी मदद नहीं कर पाई। मैंने कहा कि मैं आपको ‘कल्पना’ लाकर देता हूं। मैं आर्काइव्स के चक्कर काटता रहा और उन्हें मनाने में बहुत महीने लग गए। मुझे पता था कि ये एक बेहतरीन फिल्म है, इसे उदय शंकर ने बनाया था। बीच में मैंने और अनुराग कश्यप ने मिलकर एक फिल्म लिखी थी गुरुदत्त पर और मैं यूटीवी के लिए उसे डायरेक्ट करने वाला था। उस वक्त ‘कल्पना’ पर हमारी नजर पड़ी। वो इसलिए क्योंकि उदय शंकर का एक स्कूल हुआ करता था अल्मोड़ा में, जिसमें गुरुदत्त पढ़ते थे और गुरुदत्त ने ‘कल्पना’ को टाइप किया था। तो हमने वो फिल्म देखी थी। क्या कमाल फिल्म थी। जब उसे लेने आर्काइव गए तो मेरी नजर पड़ी, मुझे लगा कि नायर साहब पर कुछ करना चाहिए। वहां से मैंने ‘सेल्युलॉयड मैन’ बनानी शुरू की। ‘कल्पना’ भी तब पुनर्जीवित हुई और मेरा पूरा दौर चला रेस्टोरेशन और प्रिजर्वेशन का। मैं अभी अपना फाउंडेशन खोल रहा हूं जिसमें हम सहेजेंगे और संरक्षित करेंगे। मैंने पूरी फिल्म फिल्म स्टॉक पर शूट की है। मेरा मानना था कि नायर साहब अगर फिल्में इकट्ठा कर रहे हैं और फिल्म केन इकट्ठा कर रहे हैं तो उन पर बनने वाली फिल्म भी फिल्म यानी रील पर ही होनी चाहिए।

नानी मां ने और कौन सी फिल्में दिखाईं? और किसने दिखाई? वो दिन कैसे थे? बाद में क्या पड़ाव आते रहे फिल्म देखने के अनुभवों में?
‘पाकीजा’ का गाना “इन्हीं लोगों ने...” आज भी कहीं चलता है तो मुझे नानी की याद आ जाती है। राज कपूर की ‘श्री 420’ का गाना “रमैया वस्ता वैय्या...” याद है। बिमल रॉय की फिल्म ‘दो बीघा जमीन’ देखी थी मैंने। ये कुछ ऐसी फिल्में और फिल्ममेकर थे जिनके गाने सुनते रहते थे हम लोग। मेरे ग्रैंडफादर चार्ली चैपलिन, लॉरेल हार्डी और जॉन फोर्ड की अमेरिकी वेस्टर्नर्स और हार्वर्ड रोर्क की फिल्में देखते थे। उनके साथ मैंने भी देखी। हमारे यहां डुमरांव में उनका खुद का प्रोजेक्शनिस्ट था, प्रोजेक्टर था तो वो अकसर 16 एमएम फिल्में कैलकटा से लाकर दिखाते थे। ये रोज का होता था। फैमिली की जो रोजाना फिल्में शूट होती थीं वो भी देखते थे। थियेटर में जाकर दो-दो शो देखते थे। कभी पटना में देखते थे कभी डुमरांव में, जहां एक शीला टॉकीज होता था। नानी पूरा शीला टॉकीज बुक करती थीं, वो नीचे बैठती थीं और मैं भी नीचे उनके साथ स्टॉल में बैठता था। मेरे पिता भोपाल में पोस्टेड थे और मैं बहुत मुश्किल से उन्हें मना पाता था। जब मैं चार-पांच साल का था तब ‘शोले’ लगी थी और मुझे वो देखनी थी। पर मुझे याद है उन्होंने मना कर दिया था कि आप नहीं जाएंगे और मैं पूरे दिन रो रहा था। फिर अगले दिन मां ने कहा कि ठीक है इसे जाने दो ‘शोले’ देखने के लिए। मैं बच्चन साहब का बहुत बड़ा फैन था और मेरी दोस्ती चंद्रचूड़ से उस कारण ही हुई। क्योंकि दून स्कूल में हम दोनों उनके दीवाने होते थे। हमारे पास एक डायरी थी जिसमें बच्चन साहब की फिल्मों के पूरे ब्यौरे लिखे होते थे। कार, क्रू, क्रेडिट्स सबकुछ। हम सेंट स्टीफंस में भी थे तो कई बार बात करते थे बच्चन साहब के ऊपर। हम लोग इस वजह से बहुत बार क्लास से बाहर निकाले गए। लेकिन लाइफ में गुलज़ार साहब के आने के बाद उन्होंने मुझे अलग किस्म की फिल्में दिखाईं। मैंने पहली बार ‘पथेर पांचाली’ देखी, सत्यजीत रे की। तब मुझे यकीन हुआ कि फिल्म एक आर्ट फॉर्म भी है और इसका पूरी दुनिया में कितना ज्यादा प्रभाव है। इस चीज ने मेरी मदद की। वहां नायर साहब ने दुनिया की नायाब फिल्में दिखाईं और भारतीय क्लासिक्स दिखाईं जो कमाल थी। उससे मुझे काफी ज्ञान प्राप्त हुआ। नायर साहब की फिल्मों की वजह से ही हम आज जो हैं वो हैं। शायद वो न होते तो हमारा वो विजन और फिल्ममेकर बनने की आकांक्षा नहीं आ पाती। तीन महत्वपूर्ण इंसान हैं मेरी जिंदगी में जो मेरे फिल्ममेकर बनने की वजह हैं। पहली मेरी नानी जिनका नाम महारानी ऊषारानी था। उन्होंने मेरा फिल्मों से लगाव लगाया। दूसरे हैं गुलज़ार साहब, वो गुरु हैं, उन्होंने मुझे दिशा दिखाई। और सबसे महत्वपूर्ण हैं नायर साहब जिन्होंने हमें बनाया और जिनकी वजह से हम हैं।

एफ.टी.आई.आई. में आपके बैचमेट कौन-कौन थे जो आज सफल हो गए हैं?
कैमरामैन काफी हैं। सुबीत चैटर्जी हैं जिन्होंने कई फिल्में शूट की हैं। ‘डोर’, ‘चक दे’, ‘गुजारिश’, ‘मेरे ब्रदर की दुल्हन’। संतोष ठुंडिल मेरे कैमरामैन थे जिन्होंने ‘कुछ कुछ होता है’, ‘पिंजर’, ‘कृष’ और ‘राउडी राठौड़’ जैसी फिल्में कीं। डायरेक्शन में कोई इतना उभरकर नहीं आया है। प्रीतम (म्यूजिक डायरेक्टर) मुझसे दो साल जूनियर थे। रसूल पोकट्टी (साउंड मिक्सिंग का ऑस्कर जीते) मेरे से एक साल जूनियर थे।

याद वहां की कोई...
विजडम ट्री तो जिदंगी ही था। वहां बैठकर डिस्कस करते थे क्या फिल्म बनाने वाले हैं क्या नहीं बनाने वाले हैं। पूरी जिंदगी हमारी वहां गुजर गई।

आपने क्या डिप्लोमा फिल्म बनाई थी वहां?
डिप्लोमा फिल्म में इरफान थे पहले, बाद में राजपाल यादव भी थे, शैल चतुर्वेदी करके एक पोएट थे। ये सब थे। अलग फिल्म थी। एक आदमी खुद के प्रतिबिंब से डरता है, उसकी कहानी थी। उसे हमने एक शॉर्ट स्टोरी से लिया था। नाम फिलहाल जेहन में नहीं आ रहा।

एल्फ्रेड हिचकॉक की ‘द लॉजर: अ स्टोरी ऑफ द लंडन फॉग’ क्या आपने डोनेट की थी?
नहीं, मैंने कुछ पैसा दिया था उसे रेस्टोर करने के लिए। हुआ यूं कि मैं हिचकॉक का बहुत बड़ा फैन था। जब मुझे पता लगा कि बीएफआई यानी ब्रिटिश फिल्म इंस्टिट्यूट को पैसा चाहिए उस फिल्म को रेस्टोर करने के लिए तो मैंने कहा कि मैं कुछ पैसा देना चाहूंगा इसके लिए।

उदय शंकर की ‘कल्पना’ (1948) का पुनरुत्थान कैसे हुआ? हाल ही में इसका कान फिल्म फेस्ट में प्रीमियर भी हुआ...
जी, वहां प्रतिक्रिया बहुत ही बेहतरीन रही। देखिए, ‘कल्पना’ इतनी जरूरी फिल्म है, ये अकेली ऐसी फिल्म है जो इतने डांस फॉर्म को एक-साथ फिल्म के रूप में लाती है जिन्हें उदय शंकर ने बनाया था। उनकी डांस एकेडमी में जोहरा सहगल स्टूडेंट रह चुकी हैं, उन्होंने पढ़ाया भी था वहां पर। उनकी डांस एकेडमी बहुत फेमस थी और उन्होंने बड़े इंट्रेस्टिंग और नाटकीय तरीकों से फिल्म को शूट किया था चेन्नई जाकर। जब मुझे पता चला कि ये फिल्म स्कॉरसेजी को चाहिए तो मैंने काम किया और कैसे न कैसे उन्हें लाकर दी। मुझे पता था कि एक बार ‘कल्पना’ रेस्टोर हो गई तो बाकी फिल्मों का भी दौर चालू हो जाएगा और भारत भी उस नक्शे पर आ जाएगा।

नायर साहब की बदौलत अथवा आपकी फिल्म के बाद जो भी प्रिजर्व हुआ है वो लौटकर लोगों तक कितना जा रहा है, या अभी उन्हें आर्काइव्ज में ही रखा जा रहा है?
अभी तक तो आर्काइव में ही रखा है। मैं अपना फाउंडेशन लॉन्च कर रहा हूं। उसका काम होगा फिल्मों को प्रिजर्व करेगी। उसके जरिए हम जितना सेव कर सकते हैं करेंगे, मदद कर सकते हैं करेंगे।

जब फिल्म नई-नई थियेटर में लगती है तो हम बड़ा जजमेंटल होकर देखते हैं, आलोचनात्मक होकर देखते हैं, उनके सामने एक किस्म की प्रतिरोधी शक्ति खड़ी कर देते हैं, लेकिन जैसे ही वो फिल्म कुछ सालों में हमारे नॉस्टेलजिया में जाकर कैद हो जाती है और फिर हमारे सामने आती है तो हम जरा भी जजमेंटल नहीं होते, वो हमारे लिए बस एक प्यार करने वाली, सेहजने वाली चीज बन जाती है। क्या इस सोच या परिदृश्य के बारे में आपने कभी सोचा है?
बहुत सोचा है, बहुत सोचा है। कई बार हम सोचते हैं कि हमें नहीं पता या हम नहीं जानते लेकिन ऐसा होता है कि वही फिल्म कुछ साल बाद जाकर क्रिटिकल तारीफ हासिल करती है। कई बार हम फिल्म को उस वक्त देखते हैं जब हालात कुछ और होते हैं, प्रस्तुतिकरण कुछ और होता है। बाद में देखते हैं तो उसका टाइम कुछ और होता है, फ्रेम ऑफ माइंड कुछ और होता है। कई बार फिल्म वक्त के साथ मैच्योर होती हैं। ये हमेशा रहा है। जब ‘शोले’ की ओपनिंग आई तो लोगों को पसंद नहीं आई, हफ्ते दो हफ्ते शायद कोई नहीं आया लेकिन बाद में माउथ टु माउथ पब्लिसिटी हुई और लोगों ने आकर देखा तो उन्हें कुछ नई चीज लगी।

‘सेल्युलॉयड मैन’ को बनाने में कितना वक्त लगा और क्या ज्यादा सिनेमैटोग्राफर इस्तेमाल करने की वजह ये थी कि ज्यादा से ज्यादा अपना योगदान देना चाहते थे?
तीन साल लगे। ग्यारह सिनेमैटोग्राफर हैं और सभी इंडिया में टॉप के हैं। के. यू. मोहनन हैं जिन्होंने ‘तलाश’ शूट की, पी. एस. विनोद हैं जिन्होंने फराह खान की आखिरी फिल्म शूट की थी। संतोष ठुंडिल हैं, किरण देवहंस हैं जिन्होंने ‘जोधा अकबर’ शूट की, विकास शिवरमण हैं जिन्होंने ‘सरफरोश’ जैसी कई बड़ी फिल्में शूट की। अभीक मुखोपाध्याय हैं जिन्होंने ‘रेनकोट’, ‘चोखेर बाली’ और ‘बंटी और बबली’ जैसी कई फिल्में शूट कीं। ये सब 11 लोग इस फिल्म से जुड़े इसकी मुख्य वजह ये रही कि ये सब स्टूडेंट रह चुके हैं एफ.टी.आई.आई. के। इन सबने नायर साहब को देखा है और उनसे प्रभावित रहे हैं। तीन साल में फिल्म अलग-अलग क्षेत्र में शूट हुई तो अलग-अलग क्षेत्र के हिसाब से हमने सिनेमैटोग्राफर लिए। मैं ये दिखाना चाहता था कि कैसे इतने लोग लगे होने के बावजूद फिल्म एक लग सकती है। ये भी कि इतने लोग नायर साहब को पसंद करते हैं और उनसे ज्ञान प्राप्त कर चुके हैं।

आपका फिल्म स्टॉक कोडेक का था या कोई और था?
अधिकतर हमने कोडेक किया। कोडेक 16 एमएम कैमरा और कुछ 35 एमएम है। दिलीप साहब वाला हिस्सा हमने पैनाविजन पर किया क्योंकि मैं जानता था कि दिलीप साहब ये आखिरी बाहर इंटरव्यू दे रहे हैं या उसके बाद कोई उन्हें परदे पर इंटरव्यू के लिए नहीं ला पाएगा और वो भी मूवी कैमरा में क्योंकि आपको मालूम है सेल्युलॉयड कैमरा जा रहा है। 16 एमएम कैमरा आमिर खान प्रॉडक्शन से लिया गया किराए पर। कोडेक हमारा मुख्य आपूर्तिकर्ता था, उन्हीं से ज्यादातर लिया। हालांकि छह-सात केन हमें फूजी ने भी दिया, लेकिन मुख्य कोडेक के साथ था।

Shivendra with Dilip Kumar & Saira Banu at their residence.
इसमें दिलीप कुमार और सायरा बानो भी नजर आएंगे?
हां। दिलीप साहब का पूरा इंटरव्यू सायरा बानो जी ने लिया है। मुख्यतः उन्होंने शायरी वगैरह ही पढ़ी हैं। ‘मुग़ल-ए-आज़म’ दिलीप साहब ने देखी नहीं थी जब रिलीज हुई क्योंकि उन्हें प्रॉब्लम हो गई थी के. आसिफ साहब के साथ। नायर साहब ने वो फिल्म रखी हुई थी। करीब दस साल बाद उन्होंने दिलीप साहब को वो फिल्म आर्काइव्स में से निकालकर दिखाई। रिलीज के दस-बारह साल बाद दिलीप साहब ने वो फिल्म देखी।

मुख्यधारा के हिंदी फिल्म सितारों का भी नायर साहब से यूं जुड़ाव रहा?
जी, जैसे नायर साहब ने एक बार बताया कि संजीव कुमार सत्यजीत रे की ‘शतरंज के खिलाड़ी’ में काम करना चाहते थे। वो आर्काइव्स में नायर साहब से मिलने आए और बोले कि मैंने आर्काइव्स के बाहर घर ले लिया है और आप मुझे रोज सत्यजीत रे की फिल्में दिखाइए ताकि मैं काफी कुछ सीख सकूं उनकी फिल्म में काम करने से पहले। ये बात सिर्फ संजीव कुमार जैसा एक्टर कर सकता था, यही बात नायर साहब ने कही कि इतना लगाव इतना प्रेम, इसलिए वो इतने बेहतरीन एक्टर थे। तो संजीव कुमार महीना भर आर्काइव्स में आते रहे। देखिए, नायर साहब का योगदान ये रहा है। उन्होंने उभरते निर्देशकों को मदद की, इंडस्ट्री को मदद की। विधु विनोद चोपड़ा तो पागल हैं उनके पीछे। राजकुमार हीरानी पागल हैं। आशुतोष गोवारिकर डायरेक्टर बने ही नायर साहब की वजह से। वो एक्टर थे और वहां पर एप्रीसिएशन कोर्स करने आए थे। नायर साहब फिल्में गांव-गांव लेकर गए। नसीरुद्दीन शाह ने बोला है, जया बच्चन ने बोला है कि हम फिल्मों में हैं तो श्रेय जाता है नायर साहब को। शबाना आजमी हों, जानू बरूआ हों, गिरीष कासरवल्ली हों... सब लोगों ने एक ही बात दोहराई है कि आज वो जो भी हैं, नायर साहब की बदौलत।

विज्ञापन फिल्मों और डॉक्युमेंट्री बनाने की आपकी प्रक्रिया क्या रहती है?
विज्ञापन फिल्मों का तो अलग ही होता है, अगर डॉक्युमेंट्री की बात करें तो मैंने एक कॉन्सेप्ट और ओपनिंग सीन लिखे थे। बाकी सब ऑर्गेनिक था। मैं नायर साहब के साथ बैठा, मैंने सोचा कि क्या क्या करना चाहिए, सवाल लिखे।

वर्ल्ड सिनेमा के अजनबी दिग्गजों को आप जाकर इंटरव्यू कर रहे हैं?
वो मेरा आर्काइवल मामला है। मैं चाहता हूं कि जितना आर्काइव कर सकूं हिंदुस्तान में ही नहीं पूरी दुनिया में। तो मैं घूमता रहता हूं और जिन निर्देशकों ने मुझे बहुत प्रभावित किया है उनसे मिलने चला जाता हूं। उतना अच्छा।

इन इंटरव्यू की लंबाई कितनी है?
तकरीबन तीन-तीन घंटे के होंगे।

भाषाई मुश्किल आई होगी?
नहीं, जहां भी गया वहां मेरे साथ ट्रांसलेटर रहे। हम लोग एंबेसी से बात करके ट्रांसलेट करते थे। काफी लंबा प्रोसेस हो जाता है।

इन्हें शेयर भी करेंगे?
हां, हमारी अगली डॉक्युमेंट्री एक चेज़ फिल्ममेकर हैं जीरी मेंजल (Jiří Menzel), उन पर है। धीरे-धीरे शेयर करेंगे। अगर ये डॉक्युमेंट्री एक साल में तैयार हो जाएगी तो उसे शेयर करेंगे।

कुछ वक्त पहले आपने एक फोटोग्राफर जितेंद्र आर्य की जिंदगी पर भी इस स्टाइल में एक डॉक्युमेंट्री प्रोड्यूस की थी ‘की-फिल कट’?
वह ‘इलस्ट्रेटेड वीकली’ में थे और बहुत ही जानी-मानी हस्ती थे। इतने बड़े फोटोग्राफर थे कि उन्होंने बॉम्बे फिल्म इंडस्ट्री के बहुत सारे लोगों को प्रभावित किया था। हमने ये सोचा कि क्यों न उनपर एक छोटी सी डॉक्युमेंट्री बनाई जाए। क्योंकि ये ऐसे लोग हैं जिन्हें धीरे-धीरे सब भूल जाएंगे। उसे एक लड़की है अरवा मामाजी उसने डायरेक्ट किया था।

पर क्या ये प्रसारित हो नहीं पाई?
ये दरअसल उनकी वाइफ के सुपुर्द की गई थी फिल्म। उन्होंने ही इसे बांटा। एक आर्काइवल प्रोसेस था। जितने भी फोटोग्राफी क्लब हैं, सोसायटी हैं, काला-घोड़ा फेस्टिवल है, इन सभी में इसे दिखाया गया। क्योंकि एक तो इसकी लंबाई काफी छोटी थी और दूसरा ये निजी भी थी आर्काइवल महत्व की इसलिए।

किसी चैनल पर दिखाने की कोशिश नहीं हुई?
अब हिंदुस्तान में भला कौन सा चैनल लेगा, उन्हें डेली सोप से फुर्सत ही कहां है।

आपके कश्मीर में साक्षरता और कोढ़ व एड्स पर बनाए सरकारी विज्ञापन बाकी आम विज्ञापनों से जुदा हैं...
दरअसल कोढ़ और एड्स दोनों ही सरकार के प्रोजेक्ट थे तो बनाने का अंदाज मैंने नेचुरल रखा। आइडिया था कि वहीं के लोगों को चुना जाए। वो मेरा निजी मानना था कि लोग वहीं के हों, उस गांव के हों और नेचुरल रहें। ताकि जो बात कहनी है वो जाकर उन्हें छुए। वो जो फिल्म है वो कश्मीर पर है और उसे वहीं कश्मीर के बॉर्डर पर शूट किया, बच्चे भी वहीं के थे। मेरा हमेशा ये अंदाज रहा है कि जितने नेचुरल लोग रहें, जिनती नेचुरल जगह रहें और जितना स्पोंटेनियस मेरा अंदाज रहे तो ही फिल्म अच्छी बना पाएगी।

जब इंटरनेशनल ब्रैंड या मल्टीनेशनल्स के विज्ञापनों को आप करते हैं, बतौर फिल्मकार या बतौर विज्ञापन फिल्मकार आप उनमें संवेदनाएं, मासूमियत और त्याग वाले इमोशंन डालते हैं, रिश्तों को पिरोते हैं। ये सब दिखने में बहुत सुंदर और शानदार बन पड़ता है लेकिन उसकी जो एंटी-कैपिटलिस्ट या सोशलिस्ट आलोचना है कि बड़े ब्रैंड्स का हम मानवीयकरण करके उन्हें बेचने की कोशिश करते हैं, उसे आप कैसे लेते हैं? आपका निजी मत उस ब्रैंड और ऐसा करने पर क्या रहता है? इन लॉजिक को आप ध्यान में रखते हैं या सिर्फ कहते हैं कि मैं तो अपना काम कर रहा हूं, आप बहस या जो समझना है समझो। आप ये समाज पर छोड़ देते हैं?
नहीं, ये डिबेट अकसर रहती तो है। मुश्किल रहता है हमेशा लेकिन मैं एक फिल्ममेकर के तौर पर उसे लेता हूं क्योंकि समाज इतना बेवकूफ नहीं है। मैं ये मानता हूं। आप अगर कोई चीज लेने जा रहे हो मार्केट में तो आपको पूरा यकीन है कि वो क्या है। लेकिन कुछ ऐसे ब्रैंड हैं जो मैं करता नहीं हूं जैसे फेयर एंड लवली हैं। मैंने इन ब्रैंड को हमेशा मना किया है। मेरा उस पर एक निजी टेक रहता है। लेकिन कुछ फिल्में ऐसी होती हैं जिनके सिक्के की तरह दोनों पहलू देखता हूं। मैं आपको बताता हूं, एक फिल्म मैंने की, वेदांता पर। पीयूष पांडे उसमें क्रिएटिव थे, वह राजस्थान से हैं, जयपुर के हैं। उन्होंने विज्ञापनों में हिंदुस्तानी परंपरा डाली जो पहले पूरी तरह अंग्रेजों के थे। तो पीयूष भाई मेरे पास आए और उन्होंने कहा कि एक एड फिल्म बनानी है वेदांता पर, वो भी उदयपुर में और गांव होगा डूंगरपुर के पास में। तुम अपने तरीके से बनाओ। मुझे कई लोगों ने कहा कि वेदांता पर तुम कैसे कर सकते हों शिवी... उनका तो उड़ीसा में और वहां-वहां ये चल रहा है। जब मैंने खोदकर निकाला तो सिटी बैंक और आई.सी.आई.सी.आई. बैंक उन्हें सपोर्ट कर रहे थे, तो मैंने सोचा कि यार 80 फीसदी हिंदुस्तान इन बैंकों से जुड़ा हुआ है और यही बैंक वेदांता को सपोर्ट कर रहे हैं तो किस नजरिए से इसे देखें। क्या सही है क्या गलत है। तो इसका मतलब क्या आई.सी.आई.सी.आई. बैंक को हम बंद कर दें क्या। दरअसल जिस समाज में आज हम रह रहे हैं, उसमें ये बहुत मुश्किल चुनाव हमारे सामने रख दिए गए हैं। क्या गलत है क्या सही है, हर चीज के दो पहलू हैं, हर चीज कैपिटलिस्ट है और हर चीज नहीं भी। आपको बस अपना काम करना है। वो ही जरूरी है कि कितनी ईमानदारी से आप काम कर सकते हो। फिर मैंने गांव में जाकर चुना और अपने तरीके से उसे दिखाया और जो दिखाया वो बातें सच थीं। क्योंकि मैं खुद गया था वहां और स्कूलों में उन्होंने प्रभावित था और दूसरे काम करवाए थे। जितना डेमेज वो कर रहे होंगे, उससे ज्यादा तो कई और लोग कर चुके होंगे। सब कुछ एक चक्र हो चुका है, हम उस चक्र से बने समाज में आ चुके हैं। ऐसे समाज में जो है, अब नहीं बदलने वाला। मैंने अपनी तरफ से पूरी कोशिश करते हुए खुद को चॉकलेट, वॉशिंग पाउडर जैसे कंज्यूमर ड्यूरेबल्स पर ही रखा है जहां पर मैं समझता हूं लोग जानते हैं कि कौन सा सर्फ या पाउडर बैटर है। वो तो हमारे रोजमर्रा के इस्तेमाल की चीज है, उसे तो कम्युनिस्ट भी इस्तेमाल कर रहा है। वो भी दुकान में जाकर उसको ले रहा है, चॉकलेट भी खा रहा है। तो कोशिश पूरी करता हूं कि वहां न जाऊं जहां हम बच्चियों-बच्चों को ललचा रहे हैं, पर हो तो रहा है। पर डिबेट तो रहती ही है और मैं नहीं कहता हूं कि मैं बाहर आ गया हूं इससे, मैं भी फंसा हूं इसी चक्र में जैसे बाकी लोग फंसे हैं।

जैसे डोमिनोज का आपका विज्ञापन है, उसे देखकर लगता है कि क्या आप पिज्जा बेच रहे हैं संवेदनाओं के सहारे या फिर आप एक विकल्प दे रहे हैं कि दूसरों के बारे में सोचो या मिल बांटकर खाओ, चाहे पिज्जा हो या जलेबी?
उसमें अगर आप देखें तो डोमिनोज भी बहुत बाद में आता है। उसमें भी हमने बहुत जोर नहीं डाला है। उसे बहुत सामान्य रखा है कि फोन किया, ऑर्डर दिया और डोमिनोज आ गया। आप चाहें तो उसे महज एक फिल्म के तौर पर भी देख सकते हैं बच्चों ने मिलकर एक बुजुर्ग के लिए कुछ किया। बाद में डोमिनोज की तरफ इशारा जाता है तो मेरे ख्याल से वो एड ज्यादा तो बच्चों के बारे में है।

तो क्या जिस चक्र की बात आप कर रहे हैं वो एक न पलटी जा सकने वाली प्रक्रिया बन चुका है?
लेकिन हम ये कोशिश जरूर कर सकते हैं जो भी काम अब करें वो नए सिरे से करें, उस प्रक्रिया को बढ़ावा देने के लिए न करें, सच्चाई के लिए करें। बाकी ये दुविधा हमेशा बनी रहने वाली है। हम बस वैल्यूज को बनाए रखें कि जहां हो सके दूसरे के बारे में सोचें, उसकी मदद करें। इससे ज्यादा कुछ करना भी चाहेंगे तो वो छद्म जीवन जीना हो जाएगा।

आपकी जितनी एड फिल्में मैंने देखी, उनमें डीटीएच है, ग्रीनप्लाय है या टाइम्स ऑफ इंडिया है, व्हील है... उनमें काफी रंग, इंसान और परते हैं। इन्हीं सब चीजों से अच्छी-खासी फीचर फिल्में बन सकती थीं, तो फिल्में क्यों नहीं?
मेरी सफलता की एक वजह ये रही कि मैं जब विज्ञापन जगत में आया तो सब लोग स्टूडियो में शूट कर रहे थे, उनके विज्ञापन परफेक्शन और ब्यूटी वाली छवियों से भरे लगते थे। मेरी शुरुआती एड फिल्मों में एक थी विम साबुन की, उसमें रीमा सेन और राजपाल यादव थे। उसे मैंने वीटी स्टेशन के बाहर शूट किया। मुझे कहा गया कि यार ये क्या कर दिया तुमने। लेकिन मैं विज्ञापनों को सड़क पर लेकर गया। क्योंकि तब जितने बन रहे थे उनमें जिंदगी होती ही नहीं थी। जैसे ऐश्वर्या का एक आता है... इतना ब्यूटीफुल सा होता है कि लाइफ लगती ही नहीं है उसमें। मेरे लिए जो जिंदगी मैं जी रहा हूं वही विज्ञापन हैं। अपने हर विज्ञापन में संस्कृति, विविधता और भारतीय डांस फॉर्म को शामिल करता रहा हूं। क्या ये एंटरटेनमेंट नहीं है, अगर आप देखते नहीं हैं तो क्या है नहीं। ये विरोधाभास मैंने दिखाया। वैसे मैं हमेशा से फिल्ममेकर ही था। हर एड को फिल्म समझकर ही शूट किया। क्योंकि न मैंने एड फिल्म बनानी अलग से सीखी थी न मुझे आती थी, मुझे फिल्म बनानी आती थी, मैं उन्हीं से एड फिल्मों में आया था। मुझे लगता है कि जो एडवर्टाइजिंग से फिल्मों में आए हैं वो ज्यादा गहराई में जा नहीं पाते, कुछेक ही हैं जो बहुत सफल हो पाए हैं। क्योंकि एक 30 सैकेंड के एड में आपको कैरेक्टर डिवेलप करना है, उसमें आप अलग माहौल में जी रहे हैं, लोगों की नब्ज के बारे में सोच रहे हैं.. लेकिन अगर आप फिल्मों से एडवर्टाइजिंग में आए हैं तो आपने लोगों को देखा है, उनके जीवन को जाना है।

फीचर फिल्में कब बनाएंगे?
फिल्मों में मैं हमेशा से ही था। बेहद यंग डायरेक्टर था उस वक्त मैं, कोई 23 साल का था और डायरेक्शन कर चुकने के बाद मुझे एड फिल्मों में जाना पड़ा। गुरुदत्त पर भी स्क्रिप्ट लिख रहा था लेकिन कुछ प्रॉब्लम्स आ गईं और वो ठहर गई, बनती तो अभी तक पूरी हो गई होती। अब फिर स्क्रिप्ट लिख रहा हूं, जल्द ही पूरी कर लूंगा, मेरा असल प्यार तो फिल्ममेकिंग ही है न।

शुरू में जो फिल्म बना रहे थे, उसके बारे में बताएं?
उसमें संजय कपूर, करिश्मा कपूर, रानी मुखर्जी, ओम पुरी, चंद्रचूड़ सिंह, काव्या कृष्णन, नम्रता शिरोड़कर, डैनी, फरीदा जलाल, जॉनी लीवर वगैरह सब थे। ए. आर. रहमान का म्यूजिक था। गुलज़ार साहब गाने लिख रहे थे। वो लिखी थी श्रीराम राघवन, मैंने और करण बाली साहब ने। श्रीराम मुझसे एक साल सीनियर थे। करण बाली भी एक साल सीनियर थे, फिलहाल वो एक अच्छी साइट अपरस्टॉल चलाते हैं। उसमें सीनियर पर्सन थीं रेणु रलूजा जो एडिटर थीं, बाकी सब नए थे। शर्मिष्ठा रॉय जो आर्ट डायरेक्टर थीं वो भी नईं थीं। तब उन्होंने यशराज की बड़ी-बड़ी फिल्में नहीं की थीं। उसका संभावित शीर्षक इत्तेफाक रखा था, राइट्स नहीं लिए थे। वो राइट्स बी. आर. चोपड़ा साहब के पास थे।

आपकी हरदम पसंदीदा फिल्में कौन सी रही हैं?
पथेर पांचाली (1955)। एक याशुजीरो ओजू की जापानी फिल्म टोकियो स्टोरी (1953) थी। एक आंद्रेई टारकोवस्की की द मिरर (1975) थी। ऋत्विक घटक की मेघे ढाका तारा (1960)। ला वेंचुरा (1960) मिकेलेंजेलो एंटिनियोनी की। अकीरा कुरोसावा की राशोमोन (1950)। विट्टोरियो डि सीका की बाइसिकिल थीव्स (1948)। एल्फ्रेड हिचकॉक की नॉर्थ बाइ नॉर्थवेस्ट (1959)। ग्रैंडफादर जॉन फॉर्ड और हार्वर्ड रोर्क की फिल्में लाते थे, वो भी थीं। ये सब फिल्में देखकर मेरा दिमाग अलग ही दिशा में चला गया।

अभी भी देखते हैं वर्ल्ड सिनेमा में जो रचा जा रहा है?
हर वक्त। सुबह, शाम, रात फिल्में ही देखता हूं। शूटिंग, मीटिंग, प्रोजेक्ट, फिल्म फेस्टिवल्स इनकी वजह से ट्रैवल बहुत करता हूं। फाउंडेशन का काम चल रहा है। मेरा खुद का वॉल्ट है जहां फिल्में रखता हूं उसकी क्लीनिंग चल रही है। जीरी मेंजल पर डॉक्युमेंट्री बना रहा हूं, सेल्युलॉयड मैन पर काम चल रहा है। एड फिल्में चलती रहती हैं, आर्काइव का काम चलता रहता है, मेरी स्क्रिप्ट चल रही है। चार ऑफिस हैं, उन्हें संभालना आसान नहीं है। दिन कैसे निकल जाता है पता ही नहीं चलता, कभी-कभी तो वक्त के इतने तेजी से गुजर जाने से डरता हूं। मैं लिखता भी बहुत हूं। रोज की डायरी है, सेल्युलॉयड मैन की डायरी है उस पर लिखता हूं। आज भी इंक और पैन से लिखता हूं इसलिए मैं मेल बहुत कम लिखता हूं। लेटर्स लिखता हूं, पोस्टकार्ड लिखता हूं... ये सब मेरे शौक हैं। मैं बॉम्बे में एक लैब को स्पॉन्सर करता हूं जिसमें ब्लैक एंड व्हाइट में गोल्ड प्रिंट निकलता है।

फिल्में देखने का जरिया क्या रहता है?
बड़ी स्क्रीन पर देखता हूं। मेरे ऑफिस में मिनी थियेटर है। वैसे मैं सिनेमा हॉल प्रेफर करता हूं, क्योंकि फिल्ममेकर ने उन्हें इसी लिए बनाया है। मगर जब कोई फिल्म निकल जाती है तो डीवीडी पर।

राजस्थानी फिल्में देखी हैं आपने? वहां का क्या सीन लग रहा है?
मुझे मालूम है कई लोगों ने वहां हिस्टोरिकल फिल्में भी बनाई हैं। लेकिन अभी तक कोई फिल्म नजर नहीं आई है जिसे कह सकूं कि मुझे पसंद आई हो। मुख्य चीज हमारे वहां ये है कि डायलेक्ट या बोलियां बहुत ज्यादा हैं, रीजनल बहुत ज्यादा है इसीलिए वहां हिंदी ज्यादा चल रही है। आप एक रीजन को लेकर बनाएंगे तो वो राजस्थान के बाकी इलाकों में नहीं चलेगी। ये समस्या है। आप रीजनल बंगाली में बना सकते हैं, पूरे बंगाल में वही चलता है। उड़ीसा में उड़िया पूरे में चलती है। कर्नाटक में वहां की एक भाषा है। लेकिन राजस्थान में दिक्कत ये है कि जो भाषा जयपुर में है वो बीकानेर या जैसलमेर में नहीं है, जो वहां है वो बाकी हिस्सों में नहीं है। किसी भी एक में राजस्थान करके फीलिंग नहीं आएगी।

P. K. Nair at the archive, 2009.
Shivendra Singh Dungarpur is an Indian filmmaker. He's directed over 400 commercials. His latest is a 2012 documentary ‘Celluloid Man’. The FB page of Celluloid Man says, "It is a tribute to an extraordinary man called Mr. P.K. Nair, the founder of the National Film Archive of India, and the guardian of Indian cinema. He built the Archive can by can in a country where the archiving of cinema is considered unimportant. The fact that the Archive still has nine precious silent films of the 1700 silent films made in India, and that Dada Saheb Phalke, the father of Indian cinema, has a place in history today is because of Mr. Nair. He influenced generations of Indian filmmakers and showed us new worlds through the prism of cinema. He is truly India’s Celluloid Man. There will be no one like him again."
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Sunday, February 10, 2013

I remember crawling around in the dark under my mother as she was editing on the noisy steenbeck, in the front room: Lucy Mulloy (Una Noche)

Seven years ago her documentary short was nominated for a Student Oscar, and last year she came with ‘Una Noche’ an emotional-vibrant journey of three young Cuban characters which won at many International Film Festivals including 43rd IFFI, India. Meet Lucy Mulloy from Britain, a very talented storyteller and an emerging woman filmmaker.


I’d seen ‘A Better Life’ directed by Chris Weitz early last year, and I loved Demian Bichir for his performance as Carlos, the off-the-books gardener and a single parent trying so hard to live the American dream on the alien land. The movie put a human face to the story of illegal immigrants (the protagonist is a Mexican) living in America: undocumented, unwelcomed and in constant fear of deportation. Then I recently came across a similar heart wrenching Spanish-English drama ‘Una Noche’ (one night). It was directed by London born - New York based Lucy Mulloy. The movie follows lives of three teenagers: Elio, Raul and Lila in Havana, Cuba. One day an unwanted assault involving a tourist takes place after which Raul decides to flee to America. Elio and Lila are with him. They take the water route, emotionally somewhat similar to Ang Lee’s ‘Life of Pi.’
Lucy Mulloy

Lucy’s was more of an independent effort, and I wanted to talk to her and know more about the person and the creative process. After much effort I was able to communicate. She was travelling with the movie to various International Film Festivals, and it took time. ‘Una Noche’ (FB/Twitter) has so far won at Tribeca (Best Director), Gotham, Brasilia, Deauville, Athens, Fort Lauderdale, Stockholm and Oaxaca. Last year it was in Goa and was given a special Jury Prize at International Film Festival of India.

To talk about Lucy, she is the daughter of Phil Mulloy and Vera Neubauer. Phil is a well known British animator and live-action filmmaker (see Intolerance 1, 2, 3). Similarly Vera is also a very prolific animator in Britain. Lucy's brother Daniel is the producer of ‘Una Noche’ and three time BAFTA winning short filmmaker. He's won numerous awards (see Dad, Sister, Antonio's Breakfast) and regarded as one of the finest short film makers. Lucy graduated from New York University Film School. Before that she studied Politics, Philosophy and Economics at Oxford University. In 2005, she made a documentary ‘This Morning’ which was nominated for the Student Academy Award. Now her next project ‘Una Noche Mas’, the sequel to ‘Una Noche’ is developing. She’s also writing a script set in NYC and Rio.

I hope you’d love it.
Here is the Q & A with her.

Tell me about you and your family. How was your childhood and how instrumental was the environment of your house in your becoming a filmmaker?
I was really lucky to be brought up with both of my parents making films. They are mainly animation filmmakers and so filmmaking was always present in my life, even before I knew what they were doing, I remember crawling around in the dark under my mother as she was editing on the noisy steen-beck, in the front room. I remember looking at the little images on the left over splices of film. We would make puppets with my mother when we were small for her animation films. Our parents always included us in their process. It was all I knew as a kid and I loved it. My father would be working on his drawings and I would sit on the wooden floor of his studio with coloring pens drawing and listening to his music. I am very lucky that I have amazing encouraging parents who always inspired me. They were always passionate independent voices. My brother is a filmmaker too. Our parents heavily influenced us both. They just wanted us to do what made us happy. I always knew that I would make movies. It seemed like the best way to incorporate everything that I love.

An Indian movie you like.
When I was a kid in London they would play a Bollywood movie on the TV every Saturday morning. I was really young, but it was so exciting to enter into this musical, vibrant world. I wonder why they stopped showing them. There is not enough exposure to Indian movies in the UK or US mainstream. An Indian movie that made an impression on me was “Monsoon Wedding”. The naturalistic quality and intimacy of the moments created a very emotional experience. The aesthetic of the movie and the perspectives and with long lenses, capturing beautiful moments were also very refreshing.

Making ‘This Morning’ in 2005 to ‘Una Noche’ this year, what did Lucy Mulloy do in between?
Since 2005 I went to film school for another year, where I made short movies and shot exercises for classes. I loved film school because it gave me the opportunity to be completely free and experimental. I was also surrounded by people who were passionate about telling stories and sharing ideas. Prior to film school I had been at Oxford working in academia, writing essays, working independently, researching, so film school was a creative, collaborative paradise for me. I really enjoyed the freedom of being able to make and express exactly what I felt. It made me very happy. ‘Una Noche’ was a natural progression. It is my thesis film from film school.

You worked with Spike Lee as a production intern for the Hurricane Katrina documentary ‘When the Levees Broke.’ What was the experience like? Which is your Spike Lee favorite?
It was a privilege to see him working. I learnt a lot. He has his eye on everything. He knows exactly what is going on at all times on his set and he is aware of each and every person. He nurtures young talent and seeks to help people progress into becoming working filmmakers. Spike Lee is also a professor at NYU and was my mentor. He takes time out to go through each and every detail. I sat down more with him more than with any other professor when it came to editing the movie. He makes time to help you. I really value this. He is very insightful when it comes to editing and will push and challenge his students. ‘Una Noche’ was awarded the Spike Lee production grant, which was a huge help to getting the movie off the ground. Spike is nurturing a new generation of voices. I really appreciate his help. It is inspiring to see him making a movie each year on his own terms.
I love "Do the right thing".
Going to New Orleans with Spike and his team just two months after Katrina hit was a very emotional experience. I was shocked by the lack of action that was being taken to help restore the city. It seemed like the whole world was talking about the destruction that had taken place, but New Orleans was an apocalyptic ghost town. It felt completely abandoned. People’s entire material lives were scattered on the streets, family photos, baby’s cots and toys. It was very sad.

How did you conceive the content idea of ‘Una Noche’?
Javier Nunez Florian and Lucy while shooting.
I spent a lot of time in Cuba. From my very first trip I met people who were planning trips to leave on rafts. Migration is something that touches everyone on the island in one way or another. To cross 90 mile of dangerous water on a homemade raft is an extreme choice to make, it is literally to risk everything to get to the US. I was meeting people who were planning this trip, not knowing if they would be dead or alive in a few months time. It was harrowing and I wanted to understand what would push someone to that point. I was interested in telling the story from a young person’s perspective. I love working with kids and teenagers because they are happy to play and pretend and easily enter the realm of fantasy, so they make good actors! I had a conversation with a young boy I met on the sea front in Havana. I was asking him about whether he knew of any kids who had left on rafts and he told me the story of two boys and a girl who made a raft and left together very early one morning. That true story was the initial spark that inspired ‘Una Noche’.

Should I say that your film was a perfect case of life imitating art, as two of your actors disappeared in Miami en route to Tribeca Film Fest - thus giving a vent to the focal theme of the film (Cubans emigrating to the US)?
The movie is reflecting a real situation. The story of ‘Una Noche’ is something that really happens, which is why it was personally important for me to make this film.

There are regular talks of the best health care made available by the government in Cuba. But the hospital scene where a lead character met a nurse for medicine and a secret vendor opening a bed as a medicine store do not tally the government claims. S-e-x is also used as a metaphor of the hardships people in general have to undergo. Did you want to make a statement on life and government policy in Cuba?
There are talented medics in Cuba, but this does not negate the fact that sometimes things are sold off the record, not everywhere, but this can happen. Depicting this does not contradict that medics are good in Cuba. S-e-x is shown in the movie at moments when it was important to the story, or the impact it has on a character, whether witnessing it or doing it.
  S-e-x for many different reasons is a strong motivating drive in ‘Una Noche’. That was my intention. I wanted to juxtapose Lila's more innocent worldview with the way that s-e-x is present around her. It is something that she is starting to become curious about, which is reflected in her attraction to Raul, but she does not sexualize herself and she is conflicted about her attraction to him. I wanted to present her as an alternative image, contrary to the over sexualized stereotypes of young Cuban women, so it was important to contrast her outlook to those around her. Raul uses s-e-x as a release, an escape, as a way not to have to access deeper emotions, a way of numbing himself and also as a currency, to get what he needs.
  ‘Una Noche’ is focused on the lives of these three specific characters and their journeys of self-discovery. I am not making a general statement in showing the way that they live. It is not a reflection on Cuba as a whole. We did use all real locations and real homes. We are following three lives over one day. People may come into the cinema with a political perspective and that may mark their reading of the story. Everyone has a different interpretation and will leave the cinema with his/her own emphasis.

There is a certain spatial aspect in the film, like the confining space of the raft at sea sets an unorthodox but real stage for the climax of the whole drama. The earlier chaos in Cuban streets and homes gave way to greater chaos. How do you explain the semiotics thus expressed in your film? And, in this respect, what is the aspiration of your film?
Poster of Una Noche
When they are on the ocean I wanted the audience to feel the vast immensity of the water, but also the sense that they are trapped on a claustrophobic little raft and that they cannot get away from one another. My intention was to light all the emotional fuses in the city, for the audience to really get to know each character independently, so that when they are brought together their emotional bombs can explode. Once they are all on the raft their jealousy, desire, sense of who they are and what they feel for one another comes to the fore in a pretty messy love triangle. The journey is very important in them learning about themselves and influencing one another. Raul, for example, observes the siblings love between Elio and Lila and realizes his negative impact on Lila when she wants to get out of there because she wants to get away from him. These moments stimulate self reflection in his character.
  The film is about many things, love, respect, betrayal, family, ego, sexual attraction, unrequited love, friendship, sibling bonds and loss. There were a lot of emotions that I was going through making the film. I lost a very dear friend and that had a big impact on the story. The movie is dedicated to her. I wanted to express some of the feelings that I was going through at that time.

Which filmmakers across the world do you think have got the best out of non-actors in their movies (like you did)? And why non-actors?
Ken Loach is a great example of a director who often works with non-actors, films like “Kes” and “Sweet Sixteen” are very natural and organic in their acting. Also Michael Winterbottom's “In This World” comes to mind. Another good example is Fernando Meirelles and Kátia Lund's “City of God” fantastic acting by non-actors. I particularly remember the little kid crying when he’s shot in the foot. I think that it is often the case when looking for young talent, that it is easier to find non-actors who are willing to learn and be fresh. Kids are open to playing still and entering into fantasy world without inhibitions or self-consciousness, which is invaluable to a director. I love the relationships formed whilst working with non-actors. There is a lot of trust involved and I very much appreciate that you can keep the natural elements of that real person, the aspects of their character that drew you to them initially. I like the process of developing their talents too, when you can see their surprise by their own performance and feel them take a new pride and energy from their achievements. In ‘Una Noche’ a lot of the adult characters are also non-actors. I had the luxury of time to train them. I was looking for an aesthetic foremost and I feel that if you work hard with almost any person who is committed, that they have the potential to act. It really is all about confidence and trust. Trust to make yourself vulnerable.

What made narrative a strong part of your storytelling and filmmaking? If a cinema student wishes to learn it, what must he do? What study-video material would you refer?
In writing ‘Una Noche’ I was thinking about telling a story that I would want to see on the screen. It was that simple. I was writing something that would excite and grip me, as a viewer and that I would be invested in. I was thinking about relationships that progress, about how emotional states of different people can affect one another. I was taking influences from my life, from observations of others and from my imagination. I do not like watching films when I am making a movie. I like to focus more on the world around me and take inspiration from there. That said, one of my favorite movies is “Taxi Driver”. Robert De Niro's character is complex, real and subversive. I love that film. I was initially also inspired by “Soy Cuba” an old Russian film by Mikhail Kalatozov that is stunningly shot. Its energy is so raw. Visually, I really admire that movie and it was very amazing to hear about how it was made. It was before steady cam existed and the cinematographer did weight training with gallons of water to prep for making sure the handheld camera was on point. They have tracking shots that go up and down structures and under water and are visually incredible for 1964 when it was made. That movie really inspired me.

My advice to a film student is to tell the stories that excite you. Find your own voice.

You’ve studied politics from oxford, I’ll ask, what is ‘politics of films’?
At Oxford I was interested in political theory, the psychology of society. How people respond to different political systems and how various perceptions of the human condition are understood. It was most interesting for me to understand how people justified ways of envisioning society. I was especially interested in studying concepts of society that I did not subscribe to, for example conservative philosophers, like Burke. It fascinated me because I felt like I was starting to understand a mind set that I could not justify or fathom before. It was a very helpful background for my film making for sure.

There is a marked conflict between the experimental and the entertaining in cinema. Why have you associated with the former one?
My intention was defiantly to make a film that was entertaining. This is really important to me. My primary focus is to make a movie that I would want to watch; that would grip an audience, pull them into the characters' journeys, surprise, provoke and visually stimulate them, hopefully make them fall for the characters and root for them. As a filmmaker one of my main interests is to evoke empathy for my characters. I consciously wanted to keep up the pace of the film and include elements of action, thriller and strong emotions. I was not focused on the commercial prospects of the film, but more what would I want to see, what story would keep me watching and wanting to find out more about the characters and where the narrative would take them physically and more importantly emotionally. Certainly, I want to keep evolving in my work and fundamentally keep making stories that I am passionate about. I would not want to work any other way, making a movie is too hard to do without feeling completely committed to it and in love with the story, the characters, the locations and all aspects of making that vision materialize on a cinema screen.

When you conceive an idea, it’s something lyrical - spiritual - emotional and dramatic inside which remains within only until the dreamer in you is innocent and pure. But, once you start out to make the movie, you repeatedly have to maneuver the production, instruct the actors and technicians and take the tension of everything. I mean, when you’re exhausted managing everything, then only the rolling of camera starts. How do you save the initial idea and passion intact up to this point?
That is a good question. When I was making ‘Una Noche’ I was initially terrified. It was my first time working with a full crew. I was so focused on the physicality of making the movie that the process became an embodiment of all of those initial ideas. It was very exhilarating because I had been envisioning, dreaming and obsessing over the story, the actors, the locations for months and when it came to making it the moment was the only important thing. It was about being lucid and open to the moment and convicted to executing each shot that we needed to tell the story in the best possible way. It was also about being open to the talent around me and to harnessing and ensuring that the crew could harness that collaboration and use it to the best of everyone’s ability in the time given.
Dariel Arrechaga in a still from the movie, he plays Raul.

(लूसी मलॉय समर्थ एवं उभरती महिला फिल्मकार हैं। वह लंदन में जन्मीं और न्यू यॉर्क में रहती हैं। उनके पिता फिल मलॉय, मां वीरा नॉएवाउवर और भाई डेनियल भी काफी वक्त से एनिमेशन और शॉर्ट फिल्ममेकिंग से जुड़े हैं और प्रतिष्ठित नाम हैं। लूसी ने ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से दर्शन, राजनीति और अर्थशास्त्र की पढ़ाई की। उन्होंने न्यू यॉर्क यूनिवर्सिटी फिल्म स्कूल से फिल्ममेकिंग की। 2005 में उनकी बनाई शॉर्ट डॉक्युमेंट्री ‘दिस मॉर्निंग’ को स्टूडेंट ऑस्कर पुरस्कार के लिए नामांकन मिला। पिछले साल वह अपनी पहली फीचर फिल्म ‘उना नोचे’ (एक रात) के साथ लौटीं। हवाना, क्यूबा के रहने वाले तीन किशोरों की इस कहानी को अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में काफी सराहा गया और सम्मानित किया गया। पिछले साल गोवा में हुए 43वें भारतीय अंतराष्ट्रीय फिल्मोत्सव में उनकी फिल्म को स्पेशल ज्यूरी प्राइज दिया गया।)
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Saturday, February 9, 2013

मक्खी शब्द के मायने बदलने का वर्षः 2012

मूलतः तेलुगू भाषा में फिल्म बनाने वाले के. के. राजामौली की शुरुआती फिल्में बहु-भाषाओं में डब हुईं तो बाद की फिल्मों के कई भाषाओं में रीमेक बने। अक्षय कुमार स्टारर राउडी राठौड़ और अजय देवगन की सन ऑफ सरदार उन्हीं की कारोबारी तौर पर बेहद सफल दक्षिण भाषी फिल्मों की हिंदी रीमेक रही हैं। गुजरे साल उन्होंने एक मक्खी की कहानी बड़े परदे पर दिखाई। मक्खी जो पैसे, पावर और पाप से चूर एक मनुष्य को धूल चटाती है। न सिर्फ भारत बल्कि अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में भी फिल्म की भूरि-भूरि प्रशंसा हुई है। आइए जानते हैं इस फिल्म के भीतर की गहराइयों को और इसे देखने के और भिन्न परिपेक्ष्य को।


“मैं यह मरियल देह नहीं हूं, देह तो केवल ऊपर की क्षुद्र पपड़ी है; और दूसरा यह कि मैं कभी न मरनेवाला अखंड और व्यापक आत्मा हूं”। - विनोबा, ‘गीता प्रवचन’ में

Poster of 'Makkhi.'
वैज्ञानिक सोच रखना इतना जरूरी अभी बना दिया गया है कि पुनर्जन्म, कर्म, आस्था, पवित्रता, परोपकार और स्पर्शहीन प्रेम की बात करने वाला अंकल जी समझा जाता है, पुरानी सोच वाला समझा जाता है, खारिज समझा जाता है। श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीरामचरितमानस को हिंदी में उद्धरित करें तो आधुनिकता की बात आ जाती है, जिक्र करने वाले को पिछड़ा हुआ महसूस करवाया जाता है। हां, अगर ये ग्रंथ अंग्रेजी में हों और उन्हें उद्धरित करने वाले परदेसी शिक्षाविद्, पत्रकार, राजनेता, साहित्यकार, फिल्मकार और नौजवां हों तो कोई आपत्ति नहीं होती। समाज में जब अपनी पृष्ठभूमि और पुराण यूं बहिष्कृत कर दिए गए हों वहां फिल्मकारी और एस. एस. राजामौली आते हैं। वह जो कहते और दिखाते हैं, हम मानते हैं। अगर उनकी फिल्म का नायक मार दिया जाता है और पुनर्जन्म से उसका आत्मा उसी क्षण एक मक्खी के अंडे में प्रविष्ट हो जाता है, हम मानते हैं। बाद में मक्खी की देह में वह नायक इंसानों की भांति सोचता, समझता, पढ़ता, याद रखता और क्रियाएं करता है... हम मानते हैं। उस मक्खी से नायक की (उसकी) प्रेमिका प्रेम करने लगती है, हम मानते हैं। अंततः वह अपना बदला पूरा कर लेता है, हम सबकुछ मानते हैं।

क्यों?...

क्योंकि ये फिल्में हैं, और एक फिल्म रचने वाला जहान भर की अतार्किक चीजें सिनेमाई तर्कों से मानव मस्तिष्क में डालना जानता है। उसके पास इतने फिक्स तरीके हैं कि जो चाहे मनवा सकता है। कुछ भी। बेन एफ्लेक की इस बार के ऑस्कर पुरस्कारों में धूम मचाने जा रही ‘अर्गो’ भी ऐसी ही एक सुखद फिल्म है। 1979 की इस कहानी में तेहरान में अमेरिकी दूतावास पर आतंकी कब्जा कर लेते हैं, 50 से ज्यादा लोग बंधक बनते हैं, उनमें से छह भागकर दूसरे देश के एक राजदूत के घर में छिप जाते हैं। उन छह को वहां से सुरक्षित निकालने के लिए एक सीआईए अधिकारी टोनी मेंडेज (एफ्लेक) को ईरान में घुसना है। तो वह एक छद्म फिल्म निर्माता बन वहां जाता है। थ्रिलर-ड्रामा ‘अर्गो’ के भीतर ही वह ‘अर्गो’ नाम की साइंस-फैंटेसी बनाने का ढोंग करता है और वो छह लोग लौटते में उसके कैनेडियन क्रू होने का। फिल्म क्रू होने के बहाने इस खतरनाक मिशन पर दुश्मन देश जाने की ऐसी नाटकीय कोशिश 33 साल पहले सच में हुई थी। पिछले साल आई तमिल फिल्म ‘पयनम’ में भी मेजर रविंद्र (नागार्जुन) विमान बंधक बनाने वालों को यकीन दिलाने के लिए कि उनका मर चुका आतंकी लीडर यूसुफ खान जिंदा है, एक फिल्म निर्देशक (ब्रह्मानंदम) और एक्टर (श्रीचरन) की मदद लेता है। फिर एक वीडियो फुटेज बनाई जाती है जिसमें डायरेक्टर उस एक्टर को हूबहू आतंकी लीडर जैसा प्रस्तुत करता है।

ये दोनों ही किस्से निर्देशक राजामौली की जादूगरी के समानांतर चलते हैं। जादूगरी ऐसी कि जब तक मक्खी खत्म होती है, एक आश्चर्यजनक-मजबूत संदेश दर्शक की रीढ़ तक पहुंच चुका होता है, कि ‘अब कोई किसी मक्खी को यूं न मारेगा’। चींटी और हाथी की कहानी से हम सभी पहले परिचित थे, कि एक चींटी अगर हाथी की सूंड में घुस जाए तो उसके प्राण ले सकती है। इस फिल्म के बाद हम मक्खी और इंसान की कहानी याद रखते हैं। वाकई लगने लगता है कि अंततः एक मक्खी भी ताकतवर होती है, अगर अपनी असल शक्ति पहचान ले तो। अद्भुत! हालांकि फिल्म का तमिल नाम ‘एगा’ ज्यादा इज्जत भरा और अज्ञात-रहस्यमय लगता है, पर फिर सोचने लगता हूं कि मक्खी नाम निम्न, नीचा, गंदा, कुत्सित, कमजोर, कायर, पैरों में गिरा, आम और गरीब जैसे शब्दों का पर्याय बन चुका है... ‘एगा’ नाम रखकर फिल्म का स्तर तो ऊपर आ जाता पर ‘मक्खी’ शब्द के मायने सम्मानजनक बनाने ज्यादा जरूरी हैं, वो कब हो पाता। इसलिए मक्खी शब्द ही बार-बार दोहराना होगा, इतनी बार कि हमारे जेहन में इस शब्द के पर्याय ही बदल जाएं। चूंकि मक्खी आज देश के आम आदमी की समानार्थक है तो ऐसा हो कि इस शब्द को सुनकर जेहन में कमजोर की नहीं सम्मानित पर्याय की छवि उभरे।

सरल शब्दों में कहूं तो देखने से पहले फिल्म का नाम सुनकर इच्छा हुई कि ‘हुंफ... मक्खी। क्या नाम है? ऐसी ही होगी... इसे भी अखबार पटककर मार दो और दूर फैंक दो’। पर जब देखी तो राय बदल गई। ये फिल्म हमें कभी किसी को मक्खी न कहने और छोटा या गरीब न समझने का अप्रत्यक्ष एहसास देती है जो कि बहुत ही अच्छी बात है।

Nani and Samantha in a still.
तो ये कहानी सबसे पहले एक नौजवान जॉनी/नानि (नवीन बाबू) और लड़की बिंदु (समांथा) की है। जॉनी बिंदु के घर के सामने रहता है। उससे बेइंतहा प्यार करता है। बिंदू माइक्रो आर्टिस्ट है। चावल के दानों से कलाकृतियां बना देती है। प्यार दोनों में काफी वक्त से है पर शर्म के साये पलता है। शांत, मासूम, मर्यादित और आत्मीय प्यार। लोगों को अचरज होता होगा कि दक्षिण की अनजानी फिल्म, अनजाने एक्टर और बेसिर-पैर की कहानी भला पूरी दुनिया में एक स्वर में क्यों सराही जा रही है? जवाब इतना आसान नहीं है, मगर फिल्म के शुरू में ही दर्शकों से जुड़ जाने की एक वजह इन दोनों किरदारों के प्यार का ये भोला स्वरूप है। लोग भले ही कितने ही आधुनिक बना दिए जा रहे हैं, पर मूलतः वह आज भी अपने उन्हीं नजरों में छिपे अस्पृश्य बने रहते प्यार की जड़ों से पोषित होते हैं। खैर, दोनों ने प्यार का मौखिक इजहार नहीं किया है, पर एक-दूसरे की परवाह प्यार वालों के जैसे करते हैं। बिजली चली जाती है तो जॉनी डिश की छतरी को लाइट बनाकर बिंदू की खिड़की में रोशनी फैंकता है जिसके तले वह अपना काम कर पाती है। अपने एनजीओ से लौटते वक्त जब उसकी स्कूटी पंक्चर हो जाती है तो वह जॉनी को मिस्ड कॉल देती है और जब वह गली में आ जाता है तो उसके आगे-आगे अपने घर की ओर पैदल बढ़ती है। वह बिंदू के पीछे-पीछे चलता रहता है और उसे घर तक छोड़कर आता है। रास्ते में सपने में दोनों गाने गाते हैं।

अब यहां दो-तीन चीजें हैं।

एक तो बिंदू का शर्म-ओ-हया और मर्यादा में रहना। उसे पता है, आम हिंदुस्तानी लड़कियों को उनकी मांएं क्या सीख देती हैं, कि रात को अकेले नहीं आना-जाना, देर हो जाए तो किसी भरोसेमंद को साथ ले लेना। इसलिए वह जॉनी को फोन करती है। दूसरा, जॉनी बात करना चाहता है, पर समझ जाता है कि उसकी स्कूटी पंक्चर है और वह चाहती है कि उसके साथ घर तक सुरक्षा के लिहाज से जाऊं। तो वह जाता है। बिना बातों के, बिना किसी स्पर्श की कामना के उसके साथ चलता है। तीसरा, इन दोनों के प्यार का ये स्वरूप ही कहानी में आगे ज्यादा काम आता है। अगर ये दोनों हाथों में हाथ डाले पार्क में बैठते, फोन पर बहुत बातें करते, रोमैंस करते या शारीरिक होते तो कहानी और दर्शक दोनों ही इनका साथ छोड़ देते क्योंकि आगे तो जॉनी के शरीर का स्वरूप पूरी तरह बदल जाना है। ऐसे में अनकंडिशनल लव और शरीर की कम महत्ता वाले प्यार का शुरू में होना जरूरी था। जब जॉनी मक्खी हो जाता है तो भी बिंदू उससे जुड़ाव महसूस कर पाती है और उस आत्मा से प्यार कर पाती है जो जॉनी के शरीर के इतर था।

कहानी में फिर बहुत ही जल्द सुदीप (सुदीप, रामगोपाल वर्मा की ‘रण’ में अमिताभ के किरदार के बेटे बने थे) का प्रवेश होता है। वह करोड़पति कारोबारी है। व्याभिचारी है। पता चलता है कि पैसों के लिए उसने अपनी पत्नी को मार दिया था। बिंदु की सुदीप से मुलाकात अपने एनजीओ के लिए डोनेशन लेने के सिलसिले में होती है। वहां बिंदु पर नजर पड़ते ही सुदीप के मन में हवस जाग जाती है। वह यहीं से बिंदु को अपनी अच्छी छवि से प्रभावित करने की कोशिश करता है। पर जॉनी बीच में आ जाता है। सुदीप उसे बेरहमी से मरवा देता है जिसकी जानकारी बिंदु को नहीं होती। पर ये हिंदुस्तान है और ये दक्षिण भारत है। यहां आस्था का रास्ता तर्कों से नहीं भावों से होकर गुजरता है। उसका पुनर्जन्म होता है, पूरे दैवीय और भरोसेमंद तरीके से। और वह सुदीप से बदला लेता है। और वह बिंदु की रक्षा करता है।

कंप्यूटर प्रभावों से रचित इस मक्खी और कुछ दृश्यों में हमें एनिमेशन के नकली रंगों को बर्दाश्त करना पड़ता है, पर चलता है। बावजूद इसके फिल्म ऐसी बन पड़ती है कि विदेशी फिल्मकार भी देख लें तो भाव विह्अल हो जाएं। आखिर फिल्म इतनी विश्वसनीय और जादुई कैसे हो पाती है? इसका एक मूलभूत उत्तर एरॉन सॉर्किन देते हैं। ‘द सोशल नेटवर्क’ के स्क्रीनप्ले राइटर एरॉन से दो साल पहले एबीसी न्यूज के एक साक्षात्कार में पूछा गया, “जो इंसान सोशल मीडिया को खुद इतना नापसंद करता है आखिर वह फेसबुक की कहानी कैसे लिख बैठता है?” और एरॉन ने कहा, “मुझे बिल्कुल नहीं लगता कि मैंने फेसबुक की कहानी लिखी है। हां, केंद्र में ये आधुनिक आविष्कार (फेसबुक) जरूर है, इसकी कहानी उतनी ही पुरानी है जितनी कि कहानी कहने की विधा। इसमें दोस्ती, धोखे, वफादारी, ईर्ष्या, ताकत और वर्ग (क्लास) की थीम हैं। ये ऐसी चीजें हैं जिनके बारे में एस्केलस (प्राचीन लैजेंड्री ग्रीक नाटककार) ने लिखा होता, शेक्सपीयर ने लिखा होता और कुछ दशक पहले पैटी चेयोवस्की (पॉलिश उपन्यासकार और लेखक) ने लिखा होता”। राजामौली की फिल्म के पीछे भी तार्किकता, भावुकता और नाटकीयता की प्राचीन संगति वाली स्क्रिप्ट काम करती है। जॉनी के मक्खी के रूप में जन्म लेने की कड़ी के बाद में हम एक ही लक्ष्य की ओर बढ़ते हैं, रक्त रंजित बदले की भावना। अभी पूरा तमिल, तेलुगू, कन्नड़ और हिंदी सिनेमा हिंसा के इस भाव को भुना, धड़ाधड़ पैसे कूट रहा है। खैर, इसमें साथ देता है राजामौली के पुराने सहकर्ता एम. एम. कीरावेनी का संगीत। बाकी भावों में असर पैदा करने के लिए स्लो मोशन में उड़ते पत्ते, गाए जाते लव सॉन्ग और स्टंट होते दिखते हैं।

देश के मौजूदा हालातों से फिल्म एक सीन में जबर्दस्त सांकेतिक रूप से जुड़ती है। इस सीन में सुदीप भाप स्नान लेने के लिए हॉट एयर मशीन में फिट होकर बैठता है। मुंह को छोड़ वह बाकी सारे शरीर को मशीन में लॉक करवा लेता है। अब वहीं मक्खी के रूप में इंतजार कर रहा होता है जॉनी। वह सुदीप की नाक पर बैठकर उसे बेबस कर देता है। यहां ये एक कॉमन मैन की सत्ता को सबक सिखाने वाली गूंज लगती है। यहां वह पल याद आता है जब जॉनी नाम का ये अदना सा लड़का और भी मामूली सी मक्खी बनकर लौटता है। इस पल उसे एहसास होता है कि वह कितना लाचार है। वह सुदीप को पहली बार देखता है और आग-बबूला हो जाता है। उसकी मक्खी वाली आंखों में ज्वालामुखी फूटने लगता है। वह पूरी ताकत जुटाकर हवाई यान की गति से उड़ता हुआ आता है, ये सोचते हुए कि एक टक्कर में सुदीप के टुकड़े-टुकड़े कर देगा और वह भिड़ता है। पर देखता है कि कुछ नहीं हुआ। सुदीप ने तो उसे देखा तक नहीं, उसे चोट पहुंचाना तो बहुत दूर की बात है। एक दर्शक के तौर पर मैं रूआंसा हो जाता हूं। उस मक्खी में खुद का अक्स देखता हूं। जॉनी न सिर्फ अभी मक्खी है बल्कि जीते जी भी एगा यानी मक्खी ही था। तभी तो उसे सुदीप ने चुटकी बजाते मरवा दिया। मैं एक आम इंसान भी ऐसा ही हूं। किसी चीज का विरोध करूं तो रातों-रात नक्शे से मेरा नाम मिटा दिया जाए। चाहे बेटी को छेड़छाड़ से बचाने की कोशिश में गोली मार दिए गए पंजाब के एक ए.एस.आई. रविंदर पाल सिंह का मामला हो या हर राज्य में निरंकुशता की ऐसी दर्जनों बर्बर घटनाएं; चाहे गैस सिलेंडर के बढ़े भाव हों, मल्टी ब्रैंड रिटेल में एफ.डी.आई. को मंजूरी हो और दमनकारी तरीके से थोप दी गई नई आर्थिक नीतियां हों, हम जनता तो मक्खी ही हैं। राष्ट्रीय स्तर पर उभरे घोटालों पर कोई कार्रवाही न होना और रोज सत्ता पक्ष के वकील प्रवक्ताओं की मूर्ख बनाने वाली बातों का मजमा लगना, हमारा मखौल उड़ाता है। कि तू लाचार है, तू आम है। है कोई माई का लाल तुममें जो प्रधानमंत्री के कान में जूं भी रेंगवा दे। उन्हें डरा के दिखा दे। उन्हें ये समझा दे कि आम आदमी के हिसाब से सब तय करो। उन्हें ये समझा के दिखा दे कि पूंजीवाद इस देस की मूल धारा नहीं था। सिलेंडर के दाम कम करवा के दिखा दे। कोई नहीं करवा सकता है। तो शुरुआती दृश्य में सुदीप सत्ता और मक्खी आम इंसान है, लगता है सत्ता के गाल से कितना भी भिड़ लें कुछ न होगा। पर बाद में मशीन में बंद भाप स्नान करते सुदीप को जॉनी रुला देता है। यहां से सीन दर सीन वह अपने दुश्मन को तोड़ता जाता है और हराता जाता है। ठीक अरविंद केजरीवाल के घोटालों के खुलासों की तरह। ये एगा प्रेरणा बनता है कि समाज के कमजोर सोच लें तो क्या कुछ नहीं कर सकते।

इस सांकेतिक दृश्य के बाद सारा ध्यान स्थिर होता है मक्खी के भाव व्यक्त करने के तरीके पर और कहानी की प्रस्तुति पर। सुदीप से बात करने के लिए निर्देशक महोदय जाब्ता ये करते हैं कि टीवी का रिमोट दब जाता है और टीवी पर आ रही रजनीकांत की फिल्म शिवाजी का डायलॉग गूंजता है। इसमें रजनी बोलता है पर सुदीप को एहसास हो जाता है कि ये किसी और की चुनौती है, “मुन्ना झुंड में तो सूअर आते हैं, शेर तो अकेला ही आता है...” और रिमोट दबा रह जाता है और ये लाइन दोहराती रहती है। सुदीप अपने आदमियों से पूछता है, “ये एनिमल्स बदला लेते हैं क्या?” तो एक कहता है, “हां सर, बड़जात्या की पिक्चरों में”। वह पूछता है, “अरे असल में क्या?” वह आदमी कहता है, “हां सर, सांप, छोटे सांप सब बदला लेते हैं। एक बार मेरी दादी ने बताया था कि दादा को सांप ने काट लिया था”। सुनकर सुदीप की जिज्ञासा और सोच बढ़ती जाती है, वह पूछता है, “सांप नहीं, छोटे जानवर... जैसे चिड़िया, चूहा, मक्खी?” तो वह कहता है, “ले सकते हैं सर। सांप ले सकते हैं तो मक्खी को भी मौका मिलना चाहिए न सर”। ऐसे डायलॉग धीमे-धीमे तर्क बनते जाते हैं। दर्शक सुदीप को भरोसा करते देखता है, डरते देखता है तो उसके लिए भी तसल्ली की बात हो जाती है कि हां भई, मक्खी वही लड़का है और अब ये विलेन डरने लगा है। देखो, कैसे अपने आदमियों से पूछ रहा है। आदमियों के जवाब देने के तरीके में जो हास्य है वो दर्शकों के लिए दोतरफा काम करता है। एक तो फिल्मी हास्य का कोटा पूरा होता है और दूसरा विलेन के चेहरे की हवाइयां उड़ती देख उसके थियेटर में आने का ध्येय पूरा हो जाता है।

Sudeep in a still.
कहानी में अघोरी भी आता है, सुदीप को देख कहता है, “पैसे की आग, मुंह पे राख, होगा, सब होगा, तब इस तंत्रा को ढूंढने आओगे”। मगर बिना किसी परलौकिक शक्तियों के अघोरी को भी मक्खी हरा देता है। फिल्म में एक बड़ा रूपक भी आता है। बिंदु हवा में जहरीला स्प्रे मार रही है और उसे देख मोहित हो चुका मक्खी जहर पी हवा में गिर रहा है। दोबारा स्प्रे करने के दौरान डिब्बे में अड़कर उसके गले का हार उड़कर टूट जाता है, ये हार जॉनी और उसके प्यार की निशानी है। जब दर्शक भावुक तौर पर यहां निचोड़ा जा चुका होता है और मक्खी मरने को होती है तो जाते-जाते बिंदु बगीचे में पानी का नल चालू कर देती है और उस पानी से मक्खी बच जाता है। बाद में जब बिंदु को बताना होता है कि वह जॉनी है और इस रूप में लौटा है तो लकीरें खींचकर मक्खी लिखता है, “आई एम जॉनी रीबॉर्न”। ऐसे क्षण में ये पहलू किसी भी फिल्मकार के लिए चुनौती भरा हो सकता है कि अब भला इस नर मक्खी और इस युवती के बीच संवाद कैसे हो? वह फिर से मिल रहे हैं तो गले मिलें? हाथ मिलाएं? कि क्या करें? यहां इन जरूरतों से बचा इसीलिए जाता है क्योंकि कहानी के शुरू में दोनों का अस्पृश्य प्यार दिखाया जा चुका था। जब संवाद और शारीरिक स्पर्श पहले भी अप्रत्यक्ष ही थे तो यहां भी ऐसे ही चल जाता है। अपनी महबूबा को पा मक्खी में और हिम्मत आ जाती है। अब उसके लिए पार्श्व गीत बजाया जाता है। “मक्खी हूं मैं मक्खी, सैर कर नरक की, मेरी इक नजर से तूने मौत चक्खी..”। इस दौरान मक्खी जो कर रहा होता है, वो दर्शकों के सामने अपनी पूरी किरकिरी करवाने वाला होता है, पर दर्शक उसे गंभीरता से ले रहे होते हैं। जॉनी यहां मक्खी बना कसरत कर रहा होता है। डंबल उठाता है, पुशअप करता है, और तो और कैसेट रील को ट्रेडमिल बनाकर उस पर जॉगिंग करता है। कुछ को ये मूर्खता की पराकाष्ठा लग सकती है, पर शुरू में मैंने जिन फिक्स तरीकों का जिक्र किया था जिनमें एक फिल्मकार दर्शकों से कुछ भी मनवा सकता है, ये उन्हीं में आते हैं।

यहां इस दृश्य के बचकानेपन पर हम जिरह करने भी लगें तो देखिए कहां तक पहुंचते हैं। पहला तर्क मन में आता है कि मक्खी और सुदीप के शरीर में भौतिक रूप से जमीन-आसमान का फर्क है। चाहे मक्खी कितनी भी कसरत कर ले वह वैज्ञानिक रूप से फूंक भर ज्यादा ताकतवर भी न होगा। दूसरा कि हिंदी फिल्मों में जब भी किसी हीरो को किसी दुर्घटना से वापसी करनी होती है या उसे कमजोर से ताकतवर बनना होता है तो इन्हीं सब प्रक्रियाओं से गुजरना होता है। 2003 में आई ‘दम’ (और दो साल पहले आई मूल तमिल फिल्म ‘धिल’) में जब उदय (विवेक ओबेराय) को इंस्पेक्टर शंकर मार-मार कर ट्रेन की पटरियों पर फिंकवा देता है तो उसकी वापसी के चरण भी ऐसे ही होते हैं। अस्पताल में मृतप्राय पड़ा उदय दोनों टूटी टांगों से एक दिन चलने लगता है, फिर जॉगिंग और कसरत आदि करके खुद को लड़ने लायक और पुलिस की परीक्षा देने लायक बनाता है। निर्देशक मंसूर खान की सदाबहार प्रस्तुति ‘जो जीता वही सिकंदर’ में जब रतन (मामिक सिंह) को राजपूत कॉलेज के लड़के मारपीट के दौरान गलती से पहाड़ियों पर से धकेल देते हैं तो वह बुरी हालत में अस्पताल में भर्ती करवाया जाता है। पिता (कूलभूषण खरबंदा) और पूरे मॉडल कॉलेज के लिए आने वाली साइकिल रेस में आशा की किरण रतन ही था, मगर अब उसके वापसी करने में इतना वक्त लगेगा कि देर हो जाएगी। ऐसे में पिता की आंखों के आंसू पोंछने के लिए निखट्टू और आवारा छोटा बेटा संजय (आमिर खान) सामने आता है। उसके कमजोर से योग्य बनने की प्रक्रिया भी यही होती है। जॉगिंग, साइकलिंग और परिवार-दोस्तों की हौसला अफजाई। वही हौसला अफजाई जो मक्खी की बिंदु करती है।

मक्खी की भाव-भंगिमाओं में तरंग डालने की राजामौली छोटी, घिसी-पिटी पर सफल कोशिश करते हैं। गाड़ी में जा रहे सुदीप की हालत वह ऐसी करता है कि उसका बुरा एक्सीडेंट होता है, उसके बाद वह उसकी कार के शीशे पर लिख जाता है, “आई विल किल यू”। वह अपने खड़े बालों पर हाथ फिराता है जैसे हिंदी फिल्म का कोई बड़ा हीरो है, जो वह है भी। बिंदु के साथ मक्खी हाई फाइव करता है। इसी दौरान एक दृश्य में अपने दुश्मनों के खून से नहाए मक्खी को बिंदु सीरिंज के पानी से नहलवाती है। हमारी दक्षिण भारतीय फिल्मों में हीरो गंडासों-तलवारों से रक्त बहाते हैं (गिप्पी ग्रेवाल की आने वाली पंजाबी फिल्म ‘सिंह वर्सेज कौर’ का ये गाना दुनाली भी देख लें) और रक्त से नहाते हैं, फिर उन्हें दुग्ध स्नान करवाया जाता है। ये किरदार अच्छे-बुरे राजपूती वीरों की ऐतिहासिक लड़ाइयों से निकलकर आए लगते हैं। मसलन, एस. शंकर की ‘नायक’ में जब शिवाजी (अनिल कपूर) का गुंडे पीछा करते हैं। वह लड़ता है। फिर कीचड़ और खून से सना शिवाजी जब एक दुकान में पहुंचकर एक कोल्ड ड्रिंक मांगता है औऱ उससे अपना मुंह धोता है तो लोग पहचान जाते हैं और उसे पद पर बिठाकर दुग्धाभिषेक वाली मुद्रा में नहलवाते हैं।

पिता के बताए छोटे से विचार से पनपा इस पूरी फिल्म का व्याकरण राजामौली की पिछली फिल्मों में भी दिखा है। राजामौली ने रवि तेजा को लेकर ‘विक्रमारकुडू’ बनाई थी जिसकी हिंदी रीमेक प्रभुदेवा ने अक्षय कुमार को लेकर बनाई, ‘राउडी राठौड़’। मूल फिल्म हिंदी से ज्यादा प्रभावी है। घोर मसालेदार। उन्होंने कॉमिक एक्टर सुनील वर्मा को हीरो लेकर एक्शन-कॉमेडी ‘मर्यादा रामन्ना’ बनाई, जिसकी हिंदी रीमेक रही अजय देवगन-सोनाक्षी सिन्हा की ‘सन ऑफ सरदार’। दक्षिण भारत की फिल्मों को अचरज की दृष्टि से देखने को मजबूर कर देने वाली ‘मगधीरा’ भी उन्होंने ही बनाई थी। विशेष कंप्यूटर प्रभाव वाले दृश्यों के मामले में इसने बड़ी-बड़ी हिंदी फिल्मों को नीचे बैठा दिया। इसमें बतौर हीरो नजर आए थे राम चरण तेजा। चिरंजीवी के बेटे यही राम चरण जल्द ही ‘जंजीर’ की हिंदी रीमेक में दिखेंगे। इन सभी फिल्मों की कहानी शुरू में बड़ी असाधारण रही है, फिर उसे फिल्मी प्रारुप में जमाने के लिए एनिमेशन और इमोशन इन दो चीजों का सबसे ज्यादा उपयोग बतौर निर्देशक उन्होंने किया। ‘मक्खी’ की रिलीज से पहले एक साक्षात्कार में राजामौली ने कहा भी कि किसी भी दूसरी चीज से ज्यादा इमोशनल कंटेंट काम करता है, जो कि बिल्कुल सही है।

‘मक्खी’ बहुत हिम्मत के साथ बनाई गई फिल्म है। हिंसा और बदले की भावना को छोड़ दें तो ये बच्चों की फिल्म भी बनती है। एक ऐसी फिल्म जो वक्त के साथ और बेहतर होते कंप्यूटर ग्राफिक्स और विजुअल इफेक्ट्स के बीच भी कभी पुरानी या तकनीकी तौर पर कमजोर नहीं लगेगी। क्योंकि इसकी कहानी में इमोशन हैं और किसी भी फिल्म को अमर करने के लिए ये एक शब्द काफी होता है। व्यक्तिगत तौर पर मुझे उत्साहित ये बात करती है कि ऐसे वक्त में जब जेम्स बॉन्ड की नवीनतम फिल्म ‘स्काइफॉल’ में हम जूलियन असांजे के वृहद संदर्भ को पाते हैं, ‘द डार्क नाइट राइजेज’ में हम ऑक्युपाई वॉल स्ट्रीट का जिक्र देखते हैं, भारतीय फिल्मों में ‘मक्खी’ या ‘एगा’ ही ऐसी है जो फिलवक्त मुल्क में चल रहे किसी मुद्दे (केजरीवाल का व्यवस्था से टकराव) पर संदर्भात्मक बात करने का मौका देती है। बस बुनियादी तौर पर ये बहसें सही भी हो जाएं तो वारे न्यारे हैं।
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जानकारी के लिएः बीच में किए जिक्र के विपरीत मक्खियों, मच्छरों, चींटियों और वायुमंडल में विद्यमान जीवों को मारना या मारने देना मुझे पसंद नहीं। फिल्म देखने के पहले से ही, होश संभालने के बाद से ही। ये बतौर प्रजाति हमारे असंवेदनशील होने को दिखाता है। जब हम इन जीवों के साथ सह-अस्तित्व नहीं कर पाते तो फिर दूसरी आपराधिक घटनाओं पर व्याकुल क्यों होते हैं। संवेदनाएं जीव-जंतुओं के लिए जा रही है तो आपसी भी तो जाएंगी न।

 (‘Makkhi’ is a 2012 Hindi feature film written and directed by S S Rajamouli. It was dubbed from the Telugu and original version ‘Eega’. It stars Sudeep, Nani and Samantha in main leads. The film was full of visual effects and animation. ‘Makkhi’ won critical acclaim from almost all corners for gripping direction and convincingly staging a fly as a protagonist.) 
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