निर्देशकः शुभ मुखर्जी
कास्टः सौरभ शुक्ला, रघुवीर यादव, शुभ मुखर्जी, प्रतीक कटारे, हर्षल पारेख, चित्रक बंधोपाध्याय, आमना शरीफ, जाकिर हुसैन
स्टारः ढाई, 2.5
एक्टर कैरेक्टर और उनका असर
सौरभ शुक्ला: चौहान के रोल में उनकी वाइफ का नाम सविता होना और लड़कों के बैग से निकली सविता भाभी की कॉमिक्स का लिंक भिडऩा हंसाता है। उनकी एंट्री अच्छी होती है, मगर बाद में वो अच्छे, बुरे और ढीले लगते हैं। फिल्म की सबसे मजबूत कड़ी हैं।
रघुवीर यादव: ओमप्रकाश के रोल में उनसे हरियाणवी इतना अच्छा नहीं बना गया। पूरी मूवी में वो 'तेरी भैण का तेरी’ बोलते रहते हैं। चार-पांच बार तो बहुत हंसी आती है, उसके बाद नहीं। रघुवीर का पूरा यूज निर्देशन में
नहीं हुआ। इनका एक डायलॉग याद रहता है, 'बातें तो ऐसी कर रहे हैं जैसे लाल किले को सफेद कर देंगे रात भर में।‘
शुभ मुखर्जी: फिल्म बहुत बार कन्फ्यूज्ड लगती है तो अंकित के रोल में इनकी एक्टिंग औ
प्रतीक कटारे: चाइल्ड आर्टिस्ट प्रतीक अपने किरदार ध्रुव में कुछ खास नहीं कर पाते। बस उनका एक डायलॉग ही याद रहता है, 'मैं छोटा शकील नहीं, वकील बनना चाहता हूं।'
चित्रक: रोहन के रोल में अमेरिकन एक्सेंट की इनकी तुड़ी-मुड़ी हिंदी हजम नहीं होती। शुरू में तो हमें समझना पड़ता है। फिल्म बहुत आगे बढ़ जाती है तो हम कनविंस होते हैं। फिर भी इनका गेटअप और भोंदूपन कहानी को
इंट्रेस्टिंग रंग देता है।
हर्षल: बुलाई के रोल में हर्षल भी रोहन की तरह हमारी नजरों में चढऩे में वक्त लेते हैं। पर उनकी एक्टिंग में चित्रक की ही तरह कोई खामी नजर नहीं आती। हिंदी सिनेमा का एक और भोला किरदार।
आमना शरीफ: अमीना के रोल में आमना शरीफ को न भी लेते तो चलता। यूजलेस।
जाकिर हुसैन: टेरेरिस्ट ओमामा के रोल में जाकिर 'तेरे बिन लादेन’ के मजाकिया ओसामा की याद दिलाते हैं। पर उनका (आदित्य लखिया का भी) अरबी और उर्दू जैसे कुछ बने-बनाए अजीब शब्द (मसलन, अल बकायदा) बोलना पकाता है। दोष दूंगा निर्देशक और राइटर को।
ये है कहानी
दिल्ली एयरपोर्ट में सीआईएसएफ के गाड्र्स ने चार लड़कों को एक लैंड कर रही अमेरिकी एयरलाइंस का वीडियो बनाते हुए पकड़ा है। ये हैं अंकित शर्मा (शुभ मुखर्जी) उसका छोटा भाई ध्रुव (प्रतीक कटारे), लंबे बालों वाला भोला दोस्त बुलाई (हर्षल पारेख) और हिंदी कम समझने वाला भोंदू दोस्त रोहन मल्होत्रा (चित्रक बंधोपाध्याय)। इंस्पेक्टर ओमप्रकाश (रघुवीर यादव) इनसे पूछ-पूछकर थक जाता है और उसे कुछ संदिग्ध लगता है तो एटीएस ऑफिसर चौहान (सौरभ शुक्ला) को बुला लेता है। इस एयरपोर्ट पर आतंकियों और बम धमाके की पक्की सूचना आती है और इस बीच ये चारों फंसे हुए हैं। फिर कहानी में असली आतंकियों की एंट्री होती है। क्लाइमैक्स भागमभाग भरा है।
आखिर में...
फिल्म में रघुवीर यादव और उनकी एयरपोर्ट सिक्योरिटी में लगी सीआईएसएफ टीम में ज्यादातर हरियाणवी हैं। रघुवीर भी तेरी भैंण की तेरी... बोलकर ही हरियाणवीपन दिखाने की कोशिश करते हैं पर असफल रहते हैं। असली हरियाणवी छाप तो हमारी फिल्मों में वो कैरेक्टर आर्टिस्ट ही ला पाया है जो 'दिल से’ में अमर वर्मा बने शाहरुख को थप्पड़ जड़ता है और 'रॉकस्टार’ में बस स्टैंड पर गिटार बजाते जर्नादन जाखड़ को।
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गजेंद्र सिंह भाटी
सुकरात की लाइन 'आत्मा सबकी अमर होती हैं, पर जो सदचरित्र होते हैं उनकी आत्माएं देवीय हो जाती हैं' से डायरेक्टर तरसेम सिंह अपनी फिल्म का आधार बनाते हैं। इंडिया मूल के हैं और अलग फिल्में बनाते हैं। न समझ आने वाले संकेतों, अब्सट्रैक्ट किरदारों और आर्टिस्टिक से फ्रेम वाली। समझना हो तो उनकी 2006 में आई फिल्म 'द फॉल' देख लीजिए। फिल्म जबरर्दस्त थी, पर आम दर्शकों की समझ से परे। खैर, जैसा उन्होंने खुद कहा था, ये फिल्म रेनेसां काल की पेंटिंग जैसी लगती है, पर इसी से दर्शक के लिए फिल्म के टाइम और कहानी को समझना कठिन होता जाता है। अगर कहूं तो इससे ज्यादा स्पष्ट फिल्म '300' थी। इस फिल्म में सबसे मजबूत पहलू है विलेन बने मिकी राउर्की, जो 'आइरन मैन 2' में वैंको के रोल में रेसट्रैक पर इलैक्ट्रिक चाबुक से कारों को पपीते की तरह काटते नजर आते हैं। 'इममॉर्टल्स' में अगर ये विलेन मजबूत है तो हीरो हैनरी कमजोर। एक तो फिल्म के स्क्रीनप्ले और डायलॉग्स में जान नहीं है और दूसरा लड़ाई वाले सीन छोड़ दें तो हैनरी की एक्टिंग में गुस्सा और इंटेंसिटी नहीं है। जिसने भी ड्रेस और सेट डिजाइन किए हैं वो बहुत बड़ा कामचोर रहा होगा। फिल्म को हम इंडिया में फ्रेडा पिंटो के एंगल से कनेक्ट कर रहे हैं, पर उन्हें देखकर आप पक जाते हैं। आपको किसी स्कूली स्टेज प्ले की रिहर्सल भी शायद इस फिल्म से बेहतर मिलेगी। रही-सही कसर थ्रीडी का अतिरिक्त अंधेरा पूरा कर देता है। काश, जैसे उम्दा कुछ बेरहमी के सीन है, उतनी ही पूरी फिल्म भी हो पाती। माइथोलॉजिकल फिल्मों को फॉलो करने वाले एक बार देख सकते हैं, बाकी न देखें तो अच्छा होगा।


