शनिवार, 2 जुलाई 2011

'ए' को याद रखिए और हंसिए

फिल्मः डेल्ही बैली
डायरेक्टरः अभिनय देव
कास्टः विजय राज, इमरान खान, वीर दास, कुणाल रॉय कपूर, पूर्णा जगन्नाथन, शैनाज ट्रैजरीवाला
स्टारः तीन, 3.0

जो डर था वही हुआ। कुछ साल पहले जब 'अमेरिकन पाई' देखी थी, तो लगा था कि इसके अंश उड़कर हमारी फिल्मों में भी आएंगे ही। यकीन मानिए, ये सोचकर बहुत अच्छा नहीं लगा था। फिर हाल ही में 'हैंगओवर' आई। अब 'डेल्ही बैली' आई है। अब हम भी 'ऐसी' फिल्में बनाने लगे हैं। सोचना पड़ेगा। एंटरटेनमेंट के मामले में ये फिल्म बहुत अच्छी है। उम्मीदों से दोगुना देती है। सीट से हिलने नहीं देती है और हंसा-हंसाकर (मुझे नहीं) दोहरा कर देती है। सिर्फ एंटरटेनमेंट (ए सर्टिफिकेट वाला) के लिए मैं इसे तीन स्टार दे रहा हूं। मुश्किल है परिवार के साथ जाने में। इसे आप परिवार के साथ नहीं देख सकते हैं, न ही बच्चों और टीनएजर्स को ये फिल्म देखनी चाहिए। एडल्ट हैं तो दोस्तों के साथ जाएं, चाहें तो अकेले जाएं।

दिल्ली का उदर
तीन दोस्त हैं। दिल्ली में न जाने किस कॉलोनी में एक घर के फर्स्ट फ्लोर में किराए पर रहते हैं। कमरे में अंधेरा है, टॉयलेट में पानी नहीं है, सोने-रहने की जगह बिखरी पड़ी है और बिखरी पड़ी है इनकी लाइफ। ताशी (इमरान खान) एक अंग्रेजी अखबार में जर्नलिस्ट है। नितिन (कुणाल रॉय कपूर) उसका फोटोजर्नलिस्ट दोस्त है और 'काम' करना बड़ा पसंद करता है। तीसरा दोस्त अरूप (वीर दास) अखबार में ही कार्टूनिस्ट है। पानी सुबह दो घंटे ही आता है, पर इन तीनों को उठने में आलस आता है और पानी चला जाता है, फिर संडास में मुश्किल होती है। मेनका (पूर्णा जगन्नाथन) ताशी के साथ दफ्तर में काम करती है और सोनिया (शेनाज ट्रैजरीवाला) उसकी होने वाली वाइफ है। ये लो परिचय पूरा। कहानी सिंपल है। इन तीनों की जिंदगी फिल्म के दो घंटों के दौरान नरक बन गई है, कारण कई है। ये पहले भी भाग रहे थे और अब भी भाग रहे हैं।

सिर्फ ये ही अच्छा है
फिल्म में हुफैजा लोखंडवाला की एडिटिंग (अगर उन्होंने अकेले की है तो) पहली अच्छी चीज है। कैरेक्टर्स और कहानी कैसे डिवेलप होंगे, इसको दिमाग में सोचना और उन्हें पेश करना दूसरी बेहतर चीज है। हर बार हालात और कैरेक्टर के चेहरे के पिटे हुए भाव हंसाते हैं। कार्टूनी पहलू भी है। मसलन, वह सीन जिसमें विजय राज इमरान के कैरेक्टर ताशी को गोली मारने वाला है, अरूप टाई के सहारे छत से लटका हुआ है। उसके भार से और ऊपरी फ्लोर में चल रही कथक क्लास से छत क्रैक हो जाती है और कथक कर रही लड़की का पांव छेद में से नीचे निकल आता है। कुछ अच्छे पल भी हैं, जैसे बुरके में बैठे वीर दास का पानी पीना। वह बुरका उठाए बगैर ही पानी की गिलास मुंह को लगाता है और पानी बाहर गिर जाता है। फनी। फिल्म में एक्टिंग को लेकर किसी से शिकायत नहीं है। विजय राज सारे थ्रिल की डोरी अकेले खींचे रहते हैं। उनके मुंह से निकली हिंदुस्तानी गालियां थोपी हुई नहीं लगती। पर गाली तो गाली है, नहीं होती तो बेहतर होता।

कहीं तो लिमिट रखो
इसे यूथ की फिल्म कहा जा रहा है, पर मैं नहीं मानता। हां, मैट्रोपॉलिटन सिटीज के अंग्रेजी बोलने वाले यंगस्टर इसे देखकर तुरंत आकर्षित हो जाएंगे, फिर भी ये फिल्म भारत के आधे युवाओं को भी रेप्रजेंट नहीं करती है। मैं गारंटी के साथ कह सकता हूं कि फिल्म में जितनी बार 'एफ' शब्द का इस्तेमाल हुआ है, उतनी बार उसके हिंदी वर्जन वाले शब्द को बोला जाता तो थियेटर में बैठे लोग कानों में अंगुलियां डाल लेते और इसे सी ग्रेड माना जाता। आखिर 'अमेरिकन पाई' और अब 'डेल्ही बैली' के अलावा कितनी ऐसी फिल्में हैं जिनमें 'विष्ठा' (स्टूल) दिखाई गई है। कितनी ऐसी हिंदी फिल्में हैं (हॉलीवुड में तो हर दूसरी फिल्म में) जहां एक बॉयफ्रेंड अपनी गर्लफ्रेंड की शादी रोकने आता है और एक ऐसी यौन क्रिया का नाम लेता है जो शारीरिक संबंध बनाने के दौरान की जाती है। आखिर ये कैसा मनोरंजन है जिसमें लड़की को 'जा चुड़ैल' कहा जाता है, ताकि हम सब हंसें। इन सबमें लॉजिक ये दिया जाता है कि फिल्म को 'ए' सर्टिफिकेट मिला है। पर कितने ऐसे मल्टीप्लेक्स हैं जहां इटेबल्स के साथ-साथ अठारह से कम उम्र के टीनएजर्स को भी अंदर नहीं जाने दिया जाता है, बाहर ही रोक दिया जाता है।

क्या ये हमारी फिल्म है?
'डेल्ही बैली' दिखने में हिंदुस्तानी फिल्म लगती है। एक्टर्स यहां के हैं, उनके कैरेक्टर और जबान हॉलीवुड के। खासतौर पर वीर दास और इमरान खान के कैरेक्टर्स और उनके मैनरिज्म। देखते वक्त ध्यान रखें कि आपकी रगों में अलग किस्म का सेंस ऑफ ह्यूमर स्थापित किया जा रहा होगा। बरास्ते फिल्म के राइटर अक्षत वर्मा, ये ह्यूमर लॉस एंजेल्स से आया है। वहीं पर उन्होंने फिल्ममेकिंग कोर्स सीखा और वहां की इंडस्ट्री की मनोरंजन की परिभाषा को यहां ले आए। ये जो फिल्मों में गंदा बोलकर और दिखाकर दर्शकों के मन में शॉक वैल्यू पैदा करने की आदत है, वह हमारी फिल्मों में कभी नहीं थी। हॉलीवुड से आई है। फिल्म राइटिंग और मेकिंग की एक आचार संहिता होती है, कि एंटरटेनमेंट के बहाने हम इस सीमा को पार नहीं करेंगे। अब इस फिल्म के आने के बाद ये आचार संहिता टूटेगी और बुरे नतीजे सामने आएंगे। धन्यवाद, उन दो दर्जन हिंदी फिल्ममेकर्स का जिन्होंने अपने स्वयं के तय किए नैतिक नियमों में रहते हुए ही अब तक की सर्वश्रेष्ठ फिल्में बनाईं। ऐसी फिल्में जो अगले सौ-हजार साल तक हमें स्वस्थ मनोरंजन देती रहेंगी।

आखिर में...
फिल्म के शुरुआती सीन किरण राव की 'धोबीघाट' जैसे ट्रीटमेंट वाले हैं। 'भेजा फ्राई' में भारत भूषण नाम को सुनकर अंग्रेजीदां यूथ हंस पड़ता है। 'धोबीघाट' में मुन्ना (प्रतीक बब्बर) के बिहारी मूल को सुनकर ये यूथ हंसता है। 'थ्री ईडियट्स' में राजू रस्तोगी (शरमन जोशी) की सांवली-मोटी बहन को देखकर ये यूथ हंसता है। इस फिल्म में इस यूथ को हंसाने के लिए के.एल.सहगल जैसी आवाज में 'दुनिया में प्यार जब बरसे, ना जाने दिल ये क्यों तरसे, इस दिल को कैसे समझाऊं, पागल को कैसे मैं मनाऊं' गाना बजता है। आमिर खान आइटम नंबर में अपनी छाती पर उगे नकली घने बालों को अनिल कपूर के बालों से जोड़ते हैं। आखिर हम कब, कहां, किसपर, क्यों हंस रहे हैं, ये सोचना क्या अब गैर-जरूरी हो गया है।
गजेंद्र सिंह भाटी