Thursday, May 5, 2016

फिल्में मैं पूंजीगत प्राप्ति के लिए नहीं कला के लिए बनाता हूं, मैं जागरूकता के साथ रचा आर्ट पसंद करता हूं: राम रेड्‌डी

.Q & A. .Raam Reddy, film writer and director (THITHI).  
The character of Century Gowda in a still from Thithi.

आज बेंगलुरु, मैसूर, मंड्या और हुबली में 23 शोज़ के साथ तिथि रिलीज हो रही है। ये बड़ी विरली सी फिल्म है। दिसंबर के अंत में इसका पहला टीज़र सार्वजनिक किया गया तो सेंचुरी गवडा के विचित्र लेकिन अपने से पात्र ने हैरान किया। ये बुजुर्ग, जो बैठा है, आने-जाने वाले बच्चों और एक पुरुष को छेड़ रहा है, कोस रहा है। भारतीय गांवों में ऐसे व्यंग्य भरे और अल्हड़ पात्र बहुत हैं, हमने देखे हैं लेकिन फिल्मों में इन्हें जगह नहीं मिली है। युवा निर्देशक राम रेड्‌डी की कथ्य को लेकर सोच का भी एक अंदाजा उठा। दिलचस्पी बहुत बढ़ी। अब तो दूसरा टीज़र (उतना ही सटका हुआ) और पूरा ट्रेलर भी मौजूद है लेकिन पहले टीज़र की हस्ती वैसी ही बनी हुई है। राम भारत के युवा फिल्मकारों की उस नई प्रजाति का हिस्सा हैं जो पुराने पथों पर नहीं चलते, वे अपने ही रास्ते बना रहे हैं, फिल्म बनाने की अपनी ही विधियां तलाश रहे हैं और उसमें जबरदस्त साबित हो रहे हैं। निश्चित तौर पर तिथि ऐसी फिल्म है जिसे मिस नहीं किया जाना चाहिए।

साढ़े तीन साल की अवधि में ये कृति तैयार हुई है। पिछले साल बेहद प्रतिष्ठित लोकार्नो फेस्ट में इसने दो शीर्ष पुरस्कार जीते। गोल्डन लियोपर्ड और सर्वोत्कृष्ट पहली फिल्म। इससे पहले पट्‌टाभिरामा रेड्‌डी द्वारा निर्देशित संस्कारा ही ऐसी कन्नड़ फिल्म थी जिसने (1972 में) लोकार्नो में सम्मान पाया था। बुधवार, 3 मई को इसे बेस्ट कन्नड़ फिल्म का नेशनल अवॉर्ड राष्ट्रपति के हाथों मिला। माराकेच, पाम स्प्रिंग्स, सेन फ्रैंसिस्को, मामी और अन्य फिल्म समारोहों में भी तिथि जीती। जिस भी फिल्मकार और दर्शक ने इसे देखा, प्रभावित हुए बगैर नहीं रहा। अगर सब ठीक रहा तो फिल्म देश के बाकी राज्यों में भी लग सकेगी।

राम और उनका परिवार बेंगलुरु में रहता है। कर्नाटक के पहले मुख्यमंत्री के.सी. रेड्‌डी उनके दादा लगते हैं। राम ने दिल्ली के सेंट स्टीफंस कॉलेज से अर्थशास्त्र की पढ़ाई की। फिर 2012 में चैक गणराज्य की राजधानी में बने प्राग फिल्म स्कूल से निर्देशन का कोर्स किया। 8-9 शॉर्ट फिल्में बनाईं जिनमें से दो फिल्म फेस्टिवल्स में भी गई। तिथि की यात्रा ने 2014 में ठोस मोड़ लिया जब एनएफडीसी के फिल्म बाजार में वर्क-इन-प्रोग्रेस सेक्शन में निर्माता इस कहानी से प्रभावित हुए और साथ दिया। ये कहानी और स्क्रिप्ट राम के साथ उनके करीबी दोस्त ऐरे गवडा ने लिखी है जिनके गांव में ही फिल्म स्थित है। राम तबला वादक हैं, फोटोग्राफी और अन्य कलात्मक गतिविधियों का शौक भी रखते हैं। उन्होंने 19 की उम्र में It's Raining in Maya नाम का नॉवेल भी लिखा। उनसे कुछ बात हुई। प्रस्तुत है:

क्या कर्नाटक के अलावा भी देश के किसी हिस्से में ये फिल्म रिलीज हो रही है?
इस चीज पर हम काम कर रहे हैं। आइडिया ये है कि अगर हम पहले अपने होम स्टेट और अपनी भाषा में सफल हो पाएं तो एक मजबूत स्थान पर होंगे और राष्ट्रीय स्तर पर वितरकों के पास जा पाएंगे। योजना है ये कि हम सही शो टाइमिंग प्राप्त कर सकें। जब तक हम कमर्शियल रूप से सफल नहीं होंगे, तब तक वितरक हमें हमारी मर्जी की शो टाइमिंग नहीं देंगे। मैं ये देख रहा हूं कि चाहे हमें कम शो ही मिलें लेकिन वो शाम के शोज़ हों या प्रमुख समय (रात) के शो हों जब लोग जाते ही हैं। क्षेत्रीय फिल्मों के लिए राष्ट्रीय स्तर पर रिलीज का इतिहास आमतौर पर अच्छा नहीं रहा है। ऐसी जिन फिल्मों ने अच्छा प्रदर्शन किया है वे वो फिल्में रही हैं जिन्होंने छोटे स्तर पर शुरू किया और बाद में फैल गईं। तो ये सब कर्नाटक में तिथि की सफलता पर निर्भर करता है। अगर ये कमर्शियली सफल रही तो हम निश्चित तौर पर और जगह भी रिलीज करेंगे। मैं खास तौर पर चाहता हूं कि अंतत: इसे प्रमुख शहरों में ला पाऊं। निश्चित तौर पर मुंबई, चेन्नई, हैदराबाद, दिल्ली और अन्य बड़े शहर। हमारे वितरक बहुत रुचि ले रहे हैं कि हम एक-एक करके कदम बढ़ाएं और मैं सहमत हूं कि हमारे जैसी फिल्म के लिए यही सही रास्ता है।

क्योंकि शिप ऑफ थिसीयस जैसी कुछ फिल्मों ने हाल के वर्षों में अंतरराष्ट्रीय सम्मान पाया है और थियेटर्स तक पहुंची हैं..
हां, हालांकि उन्होंने पूंजीगत सफलता नहीं पाई है..

लेकिन बड़ी फिल्मों के समानांतर रिलीज हो पाना पहले यूं नहीं हो पाता था। जैसे आपकी फिल्म ने बाहुबली: द बिगिनिंग और बजरंगी भाईजान जैसी भीमकाय फिल्मों के साथ नेशनल अवॉर्ड पाया है। दर्शकों के बीच अब इन फिल्मों का फर्क मिट रहा है।
जी, सही है।

आपने तिथि बनाई, चैतन्य तम्हाणे ने कोर्ट या चाहें आनंद गांधी हों जिन्होंने शिप ऑफ थिसीयस बनाई.. आप लोग अचानक ही आए। न जाने इतने वर्षों से कहां, क्या कर रहे थे। फिर एकाएक अपनी ऐसी फिल्में ले आए जो रचनात्मक रूप से बहुत-बहुत अलग थीं और जिन प्रक्रियाओं के साथ आप लोगों ने बनाईं, वो भी। जैसे, आपने फिल्म बिलकुल अलग प्रक्रिया से बनाई। आमतौर पर कहानी और स्क्रीनप्ले पहले आता है और बाद में निर्माता से मिला जाता है और बाद में कास्टिंग होती है, फिर लोकेशन ढूंढ़ी जाती है लेकिन आप पहले एक गांव (नोडेकोप्लु, जिला मंड्या, कर्नाटक) गए। फिर लोगों से मिले। फिर पात्र ढूंढ़े। फिर कहानी और स्क्रिप्ट आई।  ये विशेष तरीका था। यहां तक कि फिल्म स्कूल से पढ़ते हुए भी आपको ऐसा तरीका नहीं सिखाया गया होगा।  आप जैसे फिल्मकारों का ये दृष्टिकोण क्या है?
मुझे लगता है कि इसके पीछे कुछ वजहें हैं। पहली, डिजिटल माध्यम लोगों को उस लागत पर फिल्म बनाने की अनुमति दे रहा है जो किफायती है। जिससे निर्माता ऐसे आइडियाज़ पर जोखिम ले पा रहे हैं जो अन्यथा कर पाना संभव न था। अगर बजट बड़ा न हो तो मेरे हिसाब से तिथि हम फिल्म फुटेज पर बना ही नहीं सकते। क्योंकि फिल्म फुटेज की बर्बादी और 100 ग्रामीण अभिनेताओं के साथ आप जोखिम नहीं ले सकते। ये संभव नहीं। ये उन प्रमुख कारणों में से है जिससे कुछ ऐसा घटित कर पाने की क्षमता हो पाती है। और संभवत: कोर्ट जैसी फिल्म के साथ भी ये सही बैठता है। इसमें भी बहुत सारे टेक-रीटेक हुए थे। इस स्थिति में किसी इंडिपेंडेंट फिल्म को फिल्म रील पर शूट कर पाना संभव ही नहीं है। गैर-पेशेवर अभिनेताओं के साथ काम करने और उन्हें सिनेमाई परदे पर लाने में अब तकनीक बहुत मदद कर रही है।
   ये एक बात है। दूसरी वजह ये है कि ऐसी फिल्में जो सफल हो पाई हैं उनके पीछे ऐसे निर्माता थे जिन्होंने बिना किसी शर्त पूरे मनोयोग से अपना समर्थन दिया। जैसे चैतन्य के साथ विवेक (गॉम्बर) थे। उन्होंने चैतन्य के दृष्टिकोण में अपना भरोसा रखा और उन्हें पूरा समर्थन दिया। ये फिल्में ऐसी हैं जो बनानी आसान नहीं हैं और उनके लिए आपको किसी निर्लिप्त भाव वाले निर्माता की जरूरत पड़ती है। ऐसे बहुत-बहुत फिल्मकार हैं जिनके पास कुशलता है लेकिन जब ऐसी (तिथि) कहानी हो और आप शूट कर रहे हों और जब तक आप बनाने के जटिल और मौलिक रास्ते को सोच पाते हो आपका समय पूरा हो चुका होता है। मैं शिप ऑफ थिसीयस के बारे में बहुत ज्यादा तो कुछ नहीं जानता लेकिन इसे बनाने में बरसों लगे। मुझे लगता है फिल्म 2 से 3 साल तक धन जुटाने में लगी रही। तो चाबी यही है कि लंबे समय तक ऐसी परियोजनाओं में जुटे रह सकें और निर्माता का बेशर्त समर्थन मिले।
   तीसरी वजह ये है कि हमारी प्रक्रियाएं इससे तय होती हैं कि एक खास किस्म की फिल्ममेकिंग के पीछे इरादा क्या है? तो अगर मैं पहले स्क्रिप्ट लिख लेता और फिर किसी गांव में जाकर स्क्रिप्ट की परिस्थितियों का मेल बैठाने की कोशिश करता तो ऐसा नहीं कर पाता। क्योंकि आप उन ग्रामीणों को उस झुकाव तक नहीं ले जा सकते जहां वे कोई और ही इंसान बन जाएं और ऐसा करना हमारे इरादा भी नहीं है। अगर मुझे पेशेवर एक्टर्स मिलते तो मैं एक बुरी फिल्म बनाकर उठता। ऐसा होना ही चाहिए कि गैर-पेशेवर अभिनेता आपके स्क्रीनप्ले को सूचित करें। किसी भी गैर-पेशेवर एक्टर वाली फिल्म में ये मूलभूत ही है कि उन एक्टर्स के व्यक्तित्व और उनका मनोविज्ञान आपको बताए कि उनका किरदार कैसे लिखा जाना है। या तो ऐसा हो, नहीं तो फिर आप महीनों, महीनों तक कास्टिंग करते रहें.. जैसे कोर्ट ने महीनों, महीनों कास्टिंग की। हजारों और हजारों ऑडिशन लिए गए। ये कुछ ऐसे तत्व हैं जो फिल्म की मौलिक और अपरंपरागत प्रक्रियाओं में योगदान देते हैं और मौजूदा से जरा अलग होते हैं।

और दर्शकों का क्या? जिस गति और स्तर तक फिल्ममेकर विकसित हो रहे हैं क्या दर्शक भी उतना बदले हैं या पहले जैसे ही बने हुए हैं?
ये विशुद्ध रूप से इस कारण से कि हमारे यहां 100 करोड़ से ज्यादा लोग हैं और ये दुनिया के सबसे युवा देशों में शुमार होता है। मुझे लगता है हमारे यहां पॉपुलर कल्चर काफी ज्यादा उदार और असंकीर्ण है, जो ऐसा होने दे रहा है। और इस प्रकार के कंटेंट के लिए बाजार भी तैयार हो चुका है। आमतौर पर हम विशुद्ध कमर्शियल फिल्मों के कल्चर से ही आते हैं जहां पर कहानी कहने के खास तरीके को स्टैंडर्ड बना दिया गया है लेकिन फिर भी बदलाव हो रहा है। खासतौर पर इसलिए क्योंकि जैसे मैंने कहा हम एक बहुत युवा देश हैं और नई पीढ़ी की तादाद काफी है। हमारे यहां सबसे ज्यादा जनसंख्या 20 से 30 के आयुवर्ग की है। उनका जायका अभी निर्मित हो रहा है, बदल रहा है। चूंकि ये इतना युवा देश है तो चीजें बदल रही हैं। स्वाद के हिसाब से भी इंटरनेट के जरिए हमारी अंतरराष्ट्रीय विषय-वस्तु तक पहुंच है। अब ऐसी फिल्में विदेशों में ही सीमित नहीं है और हम सिर्फ अपने तक ही सिमटे नहीं रह गए हैं। एक समय ऐसा था जब हम सिर्फ बॉलीवुड या क्षेत्रीय भाषा वाला सिनेमा देखते थे लेकिन इंटरनेट के कारण अब स्थिति वैसी नहीं है। लोग दुनिया भर का सिनेमा देख रहे हैं।
   हमारे यहां ऐसे अंग्रेजी चैनल हैं जो ऐसी फिल्में दिखा रहे हैं जो सिर्फ हॉलीवुड की नहीं हैं। अलग-अलग दिशाओं से नए जायकों की पैदावार हो रही है। तो दर्शक भी बदल रहे हैं। हालांकि बड़ा जमीनी जन-समूह नहीं बदल रहे। अगर तिथि जैसी फिल्मों को एक कमर्शियल वितरक ले रहा है और उसकी कमर्शियल रिलीज हो रही है तो इसका मतलब है कि इस उद्योग ने ऐसे दर्शक तो पैदा किए हैं। अब इंटरनेट भी बराबरी की जमीन तैयार कर रहा है, वो आर्ट का लोकतंत्रीकरण कर रहा है। जनसमूह अब दक्ष और विशेषज्ञ हो चुके हैं। सिनेमा में और मांग कर रहे हैं। वो बहुत ज्यादा उपभोक्तावादी होते जा रहे हैं, इस लिहाज से कि वे चुनने के लिए विकल्प चाहते हैं। मैं कभी भी कमर्शियल सिनेमा के खिलाफ नहीं रहा हूं। मैं बस वैरायटी चाहता हूं। सिनेमाघरों में कमर्शियल स्तर पर वैरायटी। जैसे कि फूड कोर्ट होते हैं जहां हर तरह के व्यंजन का विकल्प होता है। जब आप एक मल्टीप्लेक्स जाते हैं तो आपके पास एक विशुद्ध कमर्शियल फिल्म देखने का विकल्प भी होना चाहिए, एक एिनमेटेड फिल्म का भी और एक इंडिपेंडेंट फिल्म का भी। चॉयस हमेशा वहां होनी चाहिए। इन सबका सह-अस्तित्व होना चाहिए।

मान लें कला के लोकतंत्रीकरण के बाद, आज से 20-30 साल बाद जब वो आदर्श स्थिति फिल्म निर्माण विधा में आए तो वो क्या हो?
ऐसी स्थिति जहां निर्माता कम शर्तों के साथ मौजूद हो। अगर आप एक निर्माता हैं और निर्देशक का साथ मुक्त भाव से दें तो वही कुंजी है। क्योंकि मुझे लगता है हम एक इंटस्ट्री के तौर पर वहां जूझ रहे हैं कि निर्माता कला के दृष्टिकोण से नहीं बल्कि धन के दृष्टिकोण से निर्देशक को सहारा देते हैं। मैं ये कह रहा हूं कि आप निर्माता हैं तो किसी भी डायरेक्टर को ही चुन लीजिए, कोई ऐसा ले लीजिए आपके हिसाब से जिसके नजरिए में कमर्शियल तत्व हैं। एक निर्माता के तौर पर ये आपका अधिकार क्षेत्र है कि ऐसा निर्देशक चुनें जो आपको ठीक लगे लेकिन फिर आपको उसे पूरा सपोर्ट देना होगा और आपको ये समझना होगा कि ये क्षेत्र गुणवत्ता का है, यही पहला कदम होना चाहिए और यहीं पहुंचने में हम संघर्ष कर रहे हैं। आप सीधे आकर ये नहीं कह सकते कि फिल्म को 10 मिनट छोटा कर दो। आप ऐसा कर सकते हैं लेकिन आर्ट की देखरेख की भावना के साथ और ये अभी भी हमारे देश में होता नहीं है।
   दूसरी चीज है वितरण अधिकार। अच्छे कंटेंट से संचालित होने वाली फिल्मों या कथ्य उन्मुख फिल्मों के वितरण की समस्या आती है। ये चिकन और एग वाली स्थित है। वितरक आपका साथ तभी देगा जब फिल्म को दर्शक स्वीकार करें, दर्शक उसे तभी स्वीकार करते हैं जब आप थीम मुताबिक चुनो.. और उनकी यही जड़ता बनी हुई है। तो मेरे लिए आदर्श स्थिति वो होगी जब निर्माता अपने निर्देशक को निष्काम भाव से सपोर्ट करे और उसमें पूरा भरोसा जताए। चाहे उसके लिए किसी ऐसे को चुन लोग जिसका दिमाग कमर्शियल हिसाब से सोचता हो लेकिन फिर उसे पूरी तरह समर्थन दो। और वितरकों को फिल्म चुननी चाहिए जब वे उसके कंटेंट में विश्वास रखते हों। कलात्मक फिल्म को भी ऐसे ही बेचो जैसे किसी कमर्शियल फिल्म को बेचोगे। और धीरे-धीरे लोगों का स्वाद बदलेगा। एक कम से कम नियंत्रण वाली फिल्म इंडस्ट्री बहुत फायदे की होगी। जो एक तरह से सेक्युलर हो, जहां जियो और जीने दो वाली बात हो।
  मैं ये पूरी यकीन से सोचता हूं कि इंटरनेट आने वाले पांच से दस बरसों में फिल्म वितरण को पूरी तरह से बदल देगा। अभी वैश्विक वितरण व्यवस्था की योजना में सिनेमाघर जहां खड़े हैं, वो हाल पूरी तरह बदल जाएगा। जैसे, सभी ए-लेवल के फिल्म फेस्टिवल, स्टूडियोज, नेटफ्लिक्स और अन्य सभी मंच पारंपरिक वितरकों को पूरी तरह बेदखल कर दे रहे हैं। अब सारी अर्थव्यवस्था इंटरनेट पर आ गई है। और जब अर्थव्यवस्था इंटरनेट पर है तो बहुत सारी चीजें बदल जाती हैं। इंटरनेट का इस्तेमाल करते हुए आप हजारों फिल्मों से महज एक क्लिक की दूरी पर होते हो। इस अनुभव को पाने के लिए आप जो प्रयास अभी करते हैं वो काफी अलग है जैसे आप पैसे देते हैं, कार में बैठते हैं, थियेटर जाते हैं। तो जड़ता का जाना जरूरी है। और कंटेंट का लोकतंत्रीकरण इस लिहाज से इंटरनेट से होगा। वितरण के मंच भी बदलेंगे। एक फिल्ममेकर होने के लिए ये बहुत अच्छा वक्त है। मैं सोच रहा था कि अगर 20 साल पहले पैदा हुआ होता तो कुछ भी समान न होता।

मार्क जकरबर्ग ने भी वर्चुअल रिएलिटी के आविष्कार ऑक्युलस रिफ्ट में धन (2 बिलियन डॉलर में खरीदा) लगाया है जो वीडियो देखने के अनुभव को बिलकुल बदल देगा..
हां, बिलकुल। आनंद गांधी भी इसमें पूरी तरह लगे हैं। मैंने हाल ही में बॉम्बे में उनके साथ वक्त बिताया और वो ये महाकाय रिग्स बना रहे हैं और पूरी तरह वर्चुअल रिएलिटी पर काम कर रहे हैं। मुझे लगता है कि ये निश्चित तौर पर भविष्य होगा कि हम आर्ट का अनुभव कैसे लेते हैं। ये छोटे से शुरुआत करेगा लेकिन बाद में एक नया अनुभव और अपने आप में नया माध्यम बन जाएगा।

आर्ट में आविष्कार की हद तक ऐसे प्रयत्न हो रहे हैं। जैसे आपने तिथि की एक तरह से खोज ही की। या फिर स्वीडिश बैंड विंतरगेतान (Wintergatan) का काम। जैसे इन लड़कों ने एक ट्रैक बनाने के लिए अनोखी वैज्ञानिक मशीन बनाई जिसे बनाने में 11 महीने लगे।
हां, है न ये पागलपन (हंसते है).. मार्बल्स के स्वर..

ऐसे तमाम प्रयोगी लोगों का नाम इतिहास में लिखा जाएगा कि ये अपने समय के ऐसे रचनाकार थे और बिलकुल नए तरीके से सोच रहे थे। क्योंकि अभी हमारे दिमाग रेडीमेड रास्तों पर ही डेरा डाले हैं। जब भी हमें रचनात्मकता में कोई संदर्भ लेना होता है तो हम सैकड़ों या हजारों साल पहले की कृतियों पर चले जाते हैं। अगर हमें संगीत पर बात करनी है तो हम क्लासिकल (दक्षिण भारतीय, हिंदुस्तानी) के बारे में बात करने लगते हैं लेकिन हम मौजूदा संगीत से ऐसे संदर्भ नहीं दे पाते क्योंकि मौजूदा समय में कोई ऐसी रचना नहीं कर रहा। तिथि में आपने कुछ अपने मुताबिक ही रचा है जिसमें कोई स्टार नहीं है, कोई गाना उस लिहाज से नहीं है, इसमें काम कर रहे लोगों को कोई मैथड एक्टिंग भी नहीं आती, वो नवाजुद्दीन सिद्दीकी या इरफान खान जैसे मंझे अभिनेता भी नहीं हैं, आप खुद भी पहली बार के निर्देशक हैं, उम्र में भी कम हैं लेकिन फिल्म ऐसी रचकर लाए हैं जिसमें एक भी नोट हिला हुआ नहीं है। मौजूदा परिदृश्य में युवा लोगों के जेहन में चीजों की खोज करने और रचने की प्रवृति को कैसे देखा जा सकता है? कला और तकनीक में वे गुजरे वर्षों की प्रक्रियाओं को अपना नहीं रहे बल्कि अपने ही आविष्कार कर रहे हैं।
एक तो ये कि पुराने ढांचों के कारण हमारे भीतर के कलाकारों को अपनी आवाज नहीं मिल पाई थी, इंडस्ट्री और इसके स्ट्रक्चर्स की बात हमने की थी। फिल्म को आवश्यक रूप से कभी विशुद्ध आर्ट नहीं माना गया। शायद 70 के दशक में माना गया है तो समानांतर सिनेमा का आंदोलन शुरू हुआ था लेकिन बाद में वो भी बिजनेस बनकर रह गया। इस गतिरोध को तोड़ने में हम आर्टिस्ट लोगों की बड़ी रुचि है। जैसे कि किताबें लिखी जाती हैं। ये बहुत रोचक है कि कैसे जादुई यथार्थवाद (Magic realism) को सिनेमा का जॉनर नहीं माना जाता। और मैं कहूंगा वो सिर्फ इसलिए क्योंकि निर्माता इस श्रेणी की फिल्मों में धन नहीं लगाते। जबकि लेखक अपने कमरों में बैठे इन पर किताबें लिख रहे हैं। फिल्मों में जादुई यथार्थवाद क्या करता है कि ये आपको ज्यादा रचनात्मक बनने का अवसर देता है, अगर आप नायकत्व (Heroism) पर फिल्में बना रहे हैं तो ऐसा नहीं कर पाते हैं। तो आर्टिस्ट लोगों में रचनात्मकता के प्रति एक अंतर्निहित झुकव होता है। मुझे लगता है अब ऐसे निर्माता हैं जो समग्र भाव से साथ दे रहे हैं। और आपके पास कुछ नया आजमाने की जगह है और आप अपने अंदर के कलाकार को ऐसा करने देते हैं। तो ये निश्चित रूप से एक प्रमुख वजह है।
   एक अन्य बात और है कि दुनिया में हर साल बहुत सी फिल्में बनती हैं। जैसे किसी ने मुझे आंकड़ा बताया था जो गलत भी हो सकता है कि हर साल अच्छी प्रोडक्शन वैल्यू की और अच्छे निर्देशकों की करीब 600 फिल्में रिलीज होती हैं। हर साल 15,000 फिल्में बनती हैं। अगर हम भारत की बात करें तो यहां स्थिति और भी दीवानगी भरी है। यहां हर साल हजारों फिल्में बनती है जो खास नहीं हैं। अगर सालाना 15,000 वैश्विक फिल्मों की बात करें तो उनमें से 50 के करीब फिल्में ही हैं जो सिनेमाघरों में रिलीज और लोगों के बीच लोकप्रियता के लिहाज से वर्ल्ड सिनेमा सक्सेस बन पाती हैं। जैसे इस साल सन ऑफ सॉल (Son of saul), मस्टैंग (Mustang) और एम्ब्रेस ऑफ द सरपेंट (Embrace of the serpent)। दुनिया की उन 15,000 फिल्मों में से आप करीब ऐसी 50 फिल्मों को हटके गिन सकते हो। अब अगर आप मौलिक नहीं होंगे तो फिर उन 15,000 फिल्मों से आपको क्या बात अलग करती है? तो ये कुछ आर्ट की बात है और कुछ विश्व परिस्थिति को समझने की बात है। तो आपको खुद को अपनी हदों के पार धकेलना होगा, मौलिक होना होगा, समझदार होना होगा और जो भी रचने जा रहे हैं उसे लेकर ईमानदार होना होगा।
   अगर आप रचनात्मक और मौलिक होकर ऐसी एक्सपेरिमेंटल फिल्म बना देते हैं जो किसी आर्ट इंस्टॉलेशन जैसी है तो आप सिनेमाघरों तक नहीं पहुंच पाएंगे, ये असंभव होगा। लेकिन अगर आप मौलिक होंगे और एक अलग तरीके की कथानक आधारित फिल्म बनाएंगे तो उन 15,000 फिल्मों से अलग हो पाने का रास्ता बन पाएगा। और शायद उन 20 फिल्मों में भी शामिल हो सकते हैं जो विश्व स्तर पर असर डालती हैं। इसी तरह भारत में, मुझे लगता है ऐसी ही चीजें हैं जो लोगों को तय पैमाने से भी आगे जाने और अलग चीजें आजमाने की ओर धकेल रही हैं। जिस किस्म की मौलिक फिल्में आ रही हैं उससे मैं ये महसूस कर रहा हूं कि अगले पांच साल में परिणाम और बेहतर से बेहतर होते जाएंगे। 
   मैं ये भी सोचता हूं कि इंडिपेंडेंट फिल्मों के मुल्क के तौर पर हम अभी शुरुआत ही कर रहे हैं। जैसे हमारी इंडी फिल्में अभी भी पूरी तरह स्वतंत्र नहीं हैं। वे अभी भी ऑटरनुमा (auteuristic) नहीं हैं। कोर्ट ऐसी फिल्म है जो पूरी तरह ऑटरनिर्मित थी। पूरी तरह। निश्चित तौर पर इसके साथ ही एक ऑटर (चैतन्य तम्हाणे) का जन्म हुआ है। ये बहुत ही विशुद्ध और बहुत ही बढ़िया तरीके से बनाई गई है। लेकिन मैं कहूंगा कि आम इंडी फिल्म सर्किट अभी भी भावुक है और उसमें दर्शक पाने की चाह बनी हुई है। लेकिन एक ऑटर वो है जो दर्शकों की इज्जत जरूर करता है लेकिन वो फिल्में उनके लिए नहीं बनाता है।

क्या आप कर्नाटक फिल्म उद्योग के लोगों के साथ फिल्म बनाएंगे? उन्होंने आपकी बहुत तारीफ की है। आपको कर्नाटक का गौरव कहते हैं। हालांकि वे आपकी फिल्ममेकिंग के बिलकुल विपरीत हैं। क्या आपको लगता है कि तिथि उन्हें अलग तरीके से फिल्म बनाने के लिए प्रेरित करेगी? क्या आप कर्नाटक फिल्मों के सितारों के साथ काम करेंगे?
एक करियर की अवधि में कुछ भी हो सकता है। मैं आमतौर पर मौजूदा पल में ही समर्पित रहता हूं। जैसे अभी मैं जो कर रहा हूं। वैसे सामान्य तौर पर मैं किसी एक इंडस्ट्री में यकीन नहीं रखता। मैं इंडस्ट्री के आधार पर सोचता भी नहीं हूं चाहे वो कर्नाटक हो या राष्ट्रीय स्तर पर। मैं जैसी फिल्में बनाता हूं उन्हीं के लिहाज से सोचता हूं। मैं कभी किसी भी चीज से उत्प्रेरित हो जाऊंगा और महसूस करूंगा कि यही वो चीज है जो मैं करना चाहता हूं और उसे बनाने के लिए जो भी रास्ता या आभियांत्रिकी चाहिए वो करना शुरू कर दूंगा। लेकिन तब तक किसी फिल्म उद्योग में काम करना बड़ा मुश्किल है जब तक वे मुझे मेरी मर्जी की फिल्म बनाने में मदद न करें। और अभी ऐसा संभव कम ही लगता है। मैं फिल्में बनाने का काम किसी पूंजीगत प्राप्ति या किसी और चीज के लिए नहीं कर रहा हूं। मैं ये आर्ट के लिए कर रहा हूं। मैं जागरूकता के साथ रचित कला को पसंद करता हूं। इस संदर्भ में कि मैं जानता था कि तिथि ऐसी फिल्म है जिसे पसंद किया जा सकता है और उसी लिए मैंने उसे एक खास तरीके बनाया। मैं इसे फनी बनाना चाहता था। हम जानते थे कि लोगों को हंसना पसंद है। अगर आप ये जानते हैं तो महसूस कर लेंगे कि आपकी फिल्म की तैनाती कैसे कर सकते हैं ताकि ये सफल हो सके। ये नहीं कि ये कला में योगदान दे बल्कि कैसे ये आर्थिक ढांचे वाली दुनिया में सफल हो सके। आपके सवाल का जवाब दूं तो मूलत: ये निर्भर करता है कि फिल्म का आइडिया क्या है? बाकी सब कुछ उल्टे क्रम में सोच (backward engineered) लेता हूं। अगर फिल्म का आइडिया गैर-पेशेवरों के साथ काम करने को कहेगा तो मैं उनके साथ काम करूंगा। अगर आइडिया कहता है कि मुझे रेगिस्तान में जाकर सिर्फ एक आदमी के साथ अपनी फिल्म बनानी है तो मैं बनाऊंगा। ये सब निर्भर करता है कि विचार को क्या दरकार है।

आप कैसे तय करते हैं कि संबंधित पल में जो आइडिया आपको आया वो अंतिम है? और वो उस अंतिम रचना में तब्दील हो ही जाएगा जैसे आप कल्पना कर रहे हैं। आपके जेहन में कई आइडिया होते हैं आप किसी एक को कैसे तय करते हैं? चुनने का पैमाना क्या है? या ये सिर्फ गट फीलिंग होती है?
मुझे लगता है ये गट फीलिंग ही है। निजी रूप से देखें तो अलग-अलग लोगों की अलग प्रक्रियाएं होती हैं। मैं सिर्फ एक ही आइडिया पर पूरी तरह फिक्स हो जाता हूं। मैं जब एक आइडिया खड़ा कर रहा होता हूं तो खुद को अन्य विचारों पर मंडराने नहीं देता हूं। मैं खुद को कहीं भी और जाने की अनुमति नहीं देता। मैं सिर्फ और सिर्फ एक आइडिया के बारे में सोचता हूं कि उसे बनाऊंगा कैसे? शुरुआत एक दृश्य से भी हो सकती है, एक फीलिंग से भी हो सकती है और फिर उसे आगे निर्मित करने की प्रक्रिया होती है। बेहद सूक्ष्म आइडियाज़ के निर्माण से ये शुरू होता है। मैं अनुराग कश्यप जैसे फिल्मकारों को भी जानता हूं जो इस प्रक्रिया में बहुत ही प्रतिभाशाली और विरले हैं। वो इतनी तेजी से काम करते हैं और इतनी मजेदार फिल्में बनाते हैं। मुझे उनकी प्रक्रियाएं बहुत पसंद है। लेकिन मैं उन जितना कुशल और गतिशील नहीं हूं। मैं धीरे-धीरे सोचता हूं। और आगे बढ़ता हूं। मैं कुछ भी लिखकर उसे रद्दी में नहीं फेंकता। बंद नहीं करता। कभी नहीं। अगर मैं कुछ लिखता हूं और मुझे वो पसंद नहीं आता तो मैं उसे दोबारा लिखता हूं। 
   मेरी निजी प्रक्रिया ये हुई कि गट फीलिंग से पहला आइडिया आता है और फिर सूक्ष्म आइडियाज़ का एक अनुशासित निर्माण होता है और कुछ वक्त तक मैं पीछे मुड़कर नहीं देखता। जैसे मैंने 18-19 की उम्र में एक नॉवेल लिखा था। वो तिनके से शुरू किया था और उसे खत्म करना आसान नहीं था। मैंने उसकी हर चीज को बार-बार लिखा। हर अध्याय को। मुझे इसे लिखने में 3 साल लगे। ये मेरे जीवन का पहला इतना लंबा लेखन था और मुझे बड़ी मुश्किल हुई थी। लेकिन मैंने अधूरा नहीं छोड़ा, पूरा किया। मैं कभी चीजों को यूं जाने नहीं देता हूं। ये बहुत जरूरी है कि आप एक बार किसी चीज को लेकर प्रतिबद्धता जता दें तो फिर उसे पूरा करें।

अगर मैं 25 के करीब हूं और किसी भी आर्ट फॉर्म में अपना करियर शुरू कर रहा हूं और जब मैं रचनात्मक फैसले ले रहा हूं तो मुझे लगता है कि ऐसी एक अंदरूनी व्यवस्था भीतर है जो मुझे ये काम सक्षमता से करने दे रही है। ये व्यवस्था या ताकत उस रचनात्मक महौल से भी आती है जो बचपन में हमें मिलता है। माता-पिता ने हमें जो कहानियां सुनाई हो, हमें फिल्में दिखाने ले गए हों। हमारे पूर्व जीवन में ऐसी क्रियाओं से हम उम्दा फैसले इस उम्र में जाकर ले पाते हैं। जैसे आपने कहा कि एक खास स्पष्टता चीजों को लेकर है और एक बार जो शुरू करते हैं उसे खत्म करते ही हैं। आपके जीवन में ये मूल्य और व्यवस्था कैसे आई?
मेरा पूरा परिवार ही परफेक्शनिस्ट लोगों का है। हम लोगों पर कभी दबाव नहीं रहा कि अपने इस परफेक्शन को किसी खास क्षेत्र में ही भेजना है। मैं कलाकारों के परिवार से नहीं आता हूं लेकिन वहां विचार ये रहा है कि एक बार जो भी चीज हम उठाएं तो उसे पूरे समर्पण के साथ करें। मेरी मां (अनीता रेड्‌डी, पद्मश्री) सोशल वर्कर हैं। मैं ऐसे किसी को नहीं जानता जो उनसे ज्यादा काम करता हो। काम को लेकर उनके मूल्य पागलपन की हद तक हैं। उनके अंदर बहुत सारी ऊर्जा है। हमारी परवरिश ऐसे हुई और हममें ये विकसित किया गया कि हम हटके हो सकते हैं लेकिन जो भी करेंगे वो अपने सर्वश्रेष्ठ, कड़ी मेहनत और अनुशासन के साथ। मैं कुछ भी बन सकता था। विज्ञान का क्षेत्र ले सकता था। अर्थशास्त्री बन सकता था। उस दौरान भी मेरा अंदाज इसी तरह का होता।

आपके पिता और भाई? उनसे क्या प्रेरणा मिली?
बहुत। मेरे पिता (प्रताप रेड्‌डी) तिथि में पहले निर्माता भी हैं। हम एक अध्यात्म-उन्मुख परिवार हैं। अाध्यात्मिकता इस हिसाब से नहीं कि किसी धर्म से जुड़े हैं बल्कि अपने भीतर की ओर एक यात्रा। मेरे पिता स्पिरिचुअली बहुत केंद्रित हैं। मेरे जीवन के सबसे स्थिर, अपनी जड़ों में केंद्रित और बेफिक्र लोगों में वे हैं। मेेरे जीवन में बेपनाह स्थिरता उनसे आती है। चाहे कोई भी संकट आ जाए उनको कोई फर्क नहीं पड़ता, उनकी स्पिरिचुअल ताकत की वजह से। मेरे भाई (सिद्धार्थ रेड्‌डी) के साथ भी ऐसा ही है। वो भी आर्टिस्ट हैं। वो वाइल्डलाइफ फोटोग्राफी करते हैं। स्टॉक मार्केट में भी हैं। वो भी अाध्यात्मिक हैं। अाध्यात्मिक वातावरण कला में पवित्रता और विचारों में पवित्रता लाता है। चीजों की ओर देखने का बहुत ही सीधा और सपट तरीका, बहुत जटिल नहीं, बहुत दुनियावी नहीं। इसी से एक किस्म का खुलापन आता है। मेरी बहन (पूजा रेड्‌डी नाकामूरा) भी हैं जो पूरी तरह अलग हैं। उनके पास भाषा विज्ञान (Linguistics) में पीएचडी है। वो अमेरिका में हैं। तो हम पांच लोगों का परिवार है। खुश रहते हैं, खुश रहने देते हैं। इस वातावरण से सारा फर्क पड़ा। खासतौर पर बचपन के उन अनुभवों के बिना आज ये जज़्बा और खुशी नहीं होती।

बचपन में कॉमिक बुक्स, कहानियां, संगीत किस पर जोर था?
म्यूजिक से तो मैं आज भी प्यार करता हूं। ये ऐसी कला है जो मुझे सबसे ज्यादा भावुक करती है। संभवत: फिल्मों से भी ज्यादा।

आप साज भी बजाते हैं।
हां, मैं तबला बजाता हूं। अपने लिए बजाते हुए आनंद लेता हूं। आर्ट फॉर्म के तौर पर मैं संगीत का सबसे ज्यादा अहसानमंद हूं।

ये तिथि की धुनों में दिखता भी है जो बहुत अलग है। फिल्म देखने के अनुभव और कहानी को अलग ही आवरण दे देता है। पर अन्य साहित्य और फिल्मों में क्या पसंद रहा?
मैं पढ़ता बहुत था। इतनी फिल्में नहीं देखी थीं। पढ़ने में मुझे जादुई यथार्थवाद बहुत पसंद रहा है। ये जॉनर मुझे बहुत लुभाता है। अपनी फिल्मों में भी मैं इसे निश्चित तौर पर टटोलना चाहूंगा। मुझे लगता कि अपने सिनेमा में इसे ज्यादा एक्सप्लोर नहीं किया गया है और दर्शकों को ये सही रूप में समझ भी नहीं आता। लेकिन लोगों को चम्मच से तो वो नहीं खिला सकते न जो वो देखना चाहते हैं। बहुत से लोग रहे हैं जो जब मैजिक रियलिज़्म में सफल रहे हैं तो उन्होंने बहुत ही अच्छा किया है। मुराकामी (Haruki Murakami), मार्केज़ (Gabriel García Márquez), येन मार्टल ( Yann Martel), इटालो कैल्वीनो (Italo Calvino) कुछ ऐसे लोग हैं जो बहुत ही ताकतवर मूड रचते हैं, और उनका यथार्थ उनके कलात्मक मनोवेग के लिए इतना मौलिक है कि उनके जैसे कोई नहीं कर सकता। इन लोगों की दुनियाएं भी बेहद विशेष तरह की हैं। जैसे लाइफ ऑफ पाई की दुनिया ऐसी है जो कभी उस तरह से फिर नहीं रची जा सकी है। ये जैसे लिखी गई है उसमें भी सच्ची है और जैसे प्रस्तुत की गई है उसे लेकर भी सच्ची है। इसका स्वरूप (form) से बहुत लेना देना है। जैसे मुझे लगता है कि मैजिक रियलिज़्म में फॉर्म और कंटेंट समान रूप से महत्वपूर्ण हैं। मैं ये नहीं कहता कि कंटेंट महत्वपूर्ण नहीं है लेकिन ऐसा भी नहीं है कि सिर्फ कंटेंट से संचालित होने लगें और फॉर्म जरूरी न लगे। इन लोगों का फॉर्म और कथानक का संतुलन मुझे बहुत-बहुत पसंद है। मैं इसे अपनी आने वाली परियोजनाओं में काफी बरतूंगा। तिथि में जितना किया है उससे भी ज्यादा। तिथि ज्यादा यथार्थवादी है और ऐसे ही हमने इस बनाया लेकिन मैं खुश होऊंगा अगर इसे बहुत निजी रूप में एक्सप्लोर कर पाया तो।

मैजिक रियलिज़्म जॉनर की कौन सी फिल्में आपको सबसे अच्छी लगती हैं?
कहना कठिन है। इस सवाल से मैं हमेशा जूझने लगता हूं। मैं बताता हूं कि मैजिक रियलिज़्म में कुछ उल्लेखनीय फिल्में हैं जो मेरी पसंदीदा नहीं हैं। जैसे Eternal Sunshine of the Spotless Mind (2004) उल्लेखनीय है। Groundhog Day (1993) उल्लेखनीय है। मुझे ऐसा भी लगता है कि In the Mood for Love (2000) जादुई यथार्थवाद है। हालांकि ये नहीं है लेकिन जैसे ये चरम पर जाती है वो बहुत ताकतवर है। मियाज़ाकी (Hayao Miyazaki) के कुछ एनिमेशन हैं मैजिक रियलिज़्म के दायरे में हैं। मैजिक रियलिज़्म और फैंटेसी के बीच बड़ी महीन रेखा है। अब मैड मैक्स (Mad Max 1979-2015) जैसी फिल्म को लें जिसे मैं शायद फैंटेसी की ओर जाता हुआ देखता हूं लेकिन इसे मैजिक रियलिज़्म कहा जाता है। इसमें कई तत्व ऐसे हैं जो फैंटेसी जॉनर में आते हैं। बहुत से ईस्टर्न यूरोपियन सिनेमा में मैजिक रियलिज़्म के तत्व हैं। मुझे महीन मैजिक रियलिज़्म पसंद है जो परत में चलता है न कि फैला हुआ। मैंने मैजिक रियलिज़्म पर शॉर्ट फिल्में बनाई हैं। "बसंत’ (Jaro, 2013) चैक गणराज्य में स्थित थी, "पंख’ (Ika, 2012) तेलुगु में थी। इन्हें देखेंगे तो जान पाएंगे कि मैजिक रियलिज़्म में मेरी रुचि किसमें हैं। एक आर्टिस्ट के तौर पर इसमें मैं क्या ढूंढ़ना चाहता हूं। तिथि में ये उसकी लय और चीजों में नजर आता है।

आपने कहा कि जीवन के शुरुआती वर्षों में ज्यादा फिल्में नहीं देखी, तो जब विश्व सिनेमा से वास्ता पड़ा तो किन फिल्मों ने आपको बहुत प्रभावित किया?
जैसे बहुत से फिल्मकार कहते हैं कि उन्होंने रेजिंग बुल (Raging Bull, 1980) या कोई एक फिल्म 10 बार देखी और उनकी जिदंगी बदल गई। ईमानदारी से कहूं तो मेरे लिए कोई ऐसी एक फिल्म नहीं थी जिसने मेरी जिंदगी बदल दी। जब मैं सेंट स्टीफंस में पढ़ने लगा तो मैंने अलग-अलग तरह की बौद्धिक फिल्में देखीं और लेखन देखा। तब मैं वर्ल्ड सिनेमा से थोड़ा-बहुत परिचित हुआ ही था। पहली फिल्म जो मैंने देखी वो ईरानी थी। बहुत से लोग वर्ल्ड सिनेमा में अपनी शुरुआत ईरानी फिल्मों से ही करते हैं। मैंने तुर्की की भी कुछ फिल्में देखीं। ऐसी फिल्मों में आप लोगों को इस आर्ट फॉर्म पर बिलकुल अलग तरीके से काम करते देखते हैं और आप पाते हैं कि उनके लिए एक फिल्म कितनी अहमियत रखती है। गस वन सांत (Gus Van Sant) की शुरुआती फिल्में मैंने देखी। मेरे मन में उन्हें लेकर बड़ी इज्जत जन्मी। मुझे याद है उन्हें देखते हुए मैं सोचता था कि इस आदमी में माद्दा है। उनकी फिल्मों का ढांचा ऐसा होता है कि .. जैसे उनकी एक फिल्म है एलीफेंट (Elephant, 2003) जो मुझे इतनी ज्यादा प्रिय नहीं है लेकिन ऐसी फिल्म बनाने में बहुत जिगरा लगता है। आपके पास जिगरा होना चाहिए कि किसी को 70 मिनट तक बोर करो और आखिरी 3 मिनट में शॉक कर दो। फिर मैंने वॉन्ग कार-वाय (Wong Kar-wai) की फिल्में देखनी शुरू कीं जो इतनी काव्यात्मक थीं, कथ्य-हीन से स्वरूप वाली जहां चीन में स्थित फिल्म में वे स्पेन का म्यूजिक देते हैं। ऐसी चीजें सिनेमा क्या होता है इसे लेकर आपके विश्व दर्शन को फैलाव देती हैं। वहीं आप जब हॉलीवुड या ऐसी आम फिल्में देखते हुए बड़े होते हैं तो ऐसा नहीं हो पाता। मैंने धीरे-धीरे फिर खुद को निर्मित करना शुरू किया। धीरे-धीरे मैंने सोचना शुरू किया कि मेरी स्टाइल वाले फिल्मकार कौन हैं और मैं किनकी ओर आकृष्ट होता हूं? ये फिल्मकार ऐसे हैं जो एक-दूसरे को कॉपी नहीं करते। जैसे वॉन्ग कार-वाय जैसा कोई नहीं है, हेनेके (Michael Haneke) जैसा कोई नहीं है।

तिथि को लेकर सबसे अच्छी तारीफ आपने कौन सी पाई है?
फ्रांसिस फोर्ड कोपोला (Francis Ford Coppola) को ये बहुत पसंद आई। उन्होंने मुझसे कहा कि वे सेंचुरी गवडा बनना चाहते हैं। ये मेरे लिए सबसे कूल पल था। कोपोला की अपोकलिप्स नाओ (Apocalypse Now, 1979) और द गॉडफादर (The Godfather 1972-1990) ने एक लिहाज से मॉडर्न क्लासिकल सिनेमा रचा था। वे इसके अग्रदूतों में रहे हैं। उन्होंने अपनी फिल्में भयावह परिस्थितियों में बनाई हैं। जैसे द गॉडफादर को देखें तो लगता है कि ये बहुत ही व्यवस्थित और लयबद्ध प्रोडक्शन है लेकिन ये सबसे अधिक बिखरे हुए, कोलाहल भरे और बगैर-समर्थन वाले प्रोडक्शंस में से था। लेकिन फिल्म देखते हुए ऐसा नहीं लगता। उनके अलावा (15वें माराखेच इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल) ज्यूरी में जॉन पियेर ज़नेत (Jean-Pierre Jeunet) भी थे। ये मोरक्को की बात है। उनकी एमिली (Amélie, 2001) भी एक ऐसी फिल्म है जो मैंने वर्ल्ड सिनेमा दायरे में शुरू-शुरू में देखी थी। सबसे कलात्मक फिल्मों में से एक। कुछ लिहाज से कॉमेडी को लोग जॉनर में ही नहीं गिनते। उन्हें लगता है कि कॉमेडी करते हुए आपको कलात्मक होने की जरूरत नहीं है। कि आपको बस जोक मारने हैं लेकिन ये कतई सच नहीं है। एमिली इसका सबूत है। मुझे लगता है कि एमिली को बनाना एक बहुत जटिल काम रहा होगा। ये बहुत ही यथार्थपरक है और बिलकुल भी आसान नहीं है।

अपनी नई फिल्म (Distant Vision) के साथ भी वे सबको चौंकाने वाले हैं। ये पांच साल में बनेगी और 500 पन्नों लंबी इसकी स्क्रिप्ट है। ये भी एक इटैलियन फैमिली की चार पीढ़ियों की कहानी है।
हां, वो इस बारे में बात कर रहे थे। उन्होंने कहा था कि वे लाइव परफॉर्मेंस जैसा कुछ शूट कर रहे हैं। फिल्म कई लाइ‌व कैमरा के बीच घटित होगी। पूरी फिल्म लाइव दिखाई जाएगी। वे अब भी खुद को अपनी क्षमताओं से परे धकेल रहे हैं और ये ही मजा है, वरना जीवन पूरी तरह बोरिंग हो जाए।

जैसे आपने कहा कॉमेडी को गंभीरता से नहीं लिया जाता है। जब 2012 में एक ऑडिटोरियम में गुरविंदर सिंह की अन्ने घोड़े दा दान देख रहा था तो लोग सबसे गंभीर और पीड़ादायक मौकों पर हंस रहे थे। उसमें डार्क ह्यूमर है जिस पर हंसा नहीं जाता। तिथि एक अलग फिल्म है। लेकिन पूछना चाहता हूं कि एक डायरेक्टर के तौर पर आप किसानों और ग्रामीणों की दशा को कितना महसूस करते हैं? ग्रामीणों की कठिनाइयां बनाम कॉमेडी जो हम दिखा रहे हैं तिथि में, इससे हम हासिल क्या कर रहे हैं सिवा कलाकत्मक रूप से एक मजेदार फिल्म देने के?
मैं समझ रहा हूं आप क्या कह रहे हैं। मैं आर्ट में नैतिकता से दूर ही रहता हूं। कहानी में तीन मुख्य किरदार हैं और उन्हें एक खास तरीके से इरादतन एक-दूसरे का विरोधाभासी रखा गया है। भौतिकवाद (materialism) और अभौतिकवाद (non-materialism) पर भी इसमें टिप्प्णी है। कई बातों में एक बात यह भी है कि फिल्म सिर्फ गांव-केंद्रित नहीं मानव-केंद्रित भी है। आप भौतिकतावादी ढंग से किसी चीज के पीछे हो तो ये कई मायनों में आत्म-विनाशकारी है। यही फिल्म के सूत्रधार के साथ होता है। अगर आप फिल्म के किरदारों से खुद को थोड़ा अलग करके देख सकें तो उस स्थिति में होने के अलावा आप बहुत आत्म-शक्ति भी पा सकते हैं।
   हम कभी भी राजनीतिक वकतव्य देने के इच्छुक नहीं थे, हम मानवीय टिप्पणी कर रहे थे। ये सिर्फ स्थिति ही थी कि हम किसानों के साथ काम कर रहे थे। कोई राजनीतिक इरादा न था। सिर्फ एक इरादा था और मानवीय परिस्थितियों पर टिप्पणी के लिहाज से इस फिल्म में सार्वभौमिकता है। मैंने कभी भी उन संघर्षों को महसूस नहीं किया जब मैं वहां गया.. ये जीवन जीने का एक तरीका था। जिस क्षेत्र में हमने शूट किया वो उपजाऊ जमीन वाला था और उनके यहां खेती की संस्कृति है और वे अच्छा कर रहे हैं। हम उस संस्कृति के प्रति ईमानदार बने रहे। ये हमारे शहरों से अलग दुनिया थी। वहां कोई कठिनाई नहीं थी।
  ये बहुत ही अपने में सिमटा समुदाय था और वे बहुत मजबूत थे। वे लाउड थे, खुश थे, उनके जीवन में सकारात्मकता थी और इसे फिल्म में होना ही था। सामाजिक मुद्दों पर बनी फिल्में अच्छी और उपयोगी हैं लेकिन कई बार ये नेगेटिव भी हो सकता है। हमारे देश और उसकी संस्कृति में इतनी सकारात्मकता है और ये बहुत ही सूक्ष्म स्तर पर है और उसे भी सामने लाया जाना जरूरी है। है न? हमें अच्छे की ओर भी देखने की जरूरत है। इस कहानी में कुछ कभी न भूले जा सकने वाले पात्र हैं और फिल्म की स्क्रिप्ट लिखने की प्रक्रिया में हमने बहुत कुछ सीखा। मुझे लगता है उन्हें देखने के बाद उनसे कुछ ग्रहण किया जा सकता है। खासकर के फिल्म के दो पात्रों से। तिथि एक सादगी है और मानव स्थिति पर टिप्पणी है। ये राजनीतिक चीज नहीं है।

आप सही हैं कि हमारे गांव हमें सकारात्मकता देते हैं, हम बहुत कुछ सीखते हैं वहां के जीवन जीने के तरीके से जिसे फिल्मों में ज्यादा टटोला नहीं गया है। लेकिन वहां जाित भेद है, ऐसी परंपराएं हैं जो माननी ही पड़ती हैं। जैसे आप प्राग में पढ़े हैं, वहां की सभ्यता में एक किस्म की निजी स्वतंत्रता है। क्या ये ठीक है कि गांवों में वैयक्तिकता या आजादी नहीं है? क्या शहर वैयक्तिकता, आजादी देते हैं, प्रगतिवादी होने देते हैं? गांवों का विचार समुदाय पर आधारित है, निजता पर नहीं। आप जब तिथि बना रहे थे तो मंड्या में सकारात्मकता देखी लेकिन उन परंपराओं का क्या जैसे कोई मर गया है तो 12 दिनों तक भला एक गरीब परिवार मिठाई और भोज की व्यवस्था कहां से करेगा? आदमी रोता है और कर्ज लेकर शोक के दिनों में देसी घी का भोज पूरे गांव के लिए आयोजित करता है। आपको लगता है कि किसी सुधार की जरूरत है? या जो भी जीवन अभी वहां है वो अच्छा है?
ये एक रोचक सवाल है लेकिन मैं आर्ट की ओर ऐसे नहीं बढ़ता हूं। मैं पॉजिटिव चीजें ही लेना पसंद करता हूं। मुझे लगता है कि गांवों में सकारात्मकता है और वो शहरों से ज्यादा है। जैसे समुदायायिकता का मजबूत भाव होने के कई फायदे हैं। लोग गांव में ज्यादा आत्म-निर्भर हैं। वहां विषमताएं या असमानताएं इतनी नहीं हैं जितनी कि शहरों में है। शहरों में गैर-बराबरी भयंकर है। गांव में लोग तकरीबन समान स्तरों पर ही हैं जो कि पॉजिटिव बात है। ऐसी कई अच्छी चीजें गांवों में हैं। मुझे लगता है कि कृषक समुदाय भी एक विकसित समुदाय है। मुझे लगता है कि शहरों में हम लोग अति-उपभोक्तावादी हो गए हैं। निजी तौर पर अगर आप मुझसे पूछें और जिस स्पिरिचुअल परिवार से मैं आता हूं, तो मुझे लगता है कि सबसे सही और एकमात्र रास्ता भीतर ही है। यदि हर इंसान अपने भीतर की यात्रा करे तो समाज की बहुत सी समस्याएं चाहे वो गांव में हों या शहर में हल हो जाएंगी। फिल्म को भी मानवीय स्तर पर मैं ऐसा ही अहसास देना चाहता था।
Raam Reddy with Ere Gowda.

अपने दोस्त ऐरे गवडा के बारे में बताएं जो फिल्म को रचने में आपके भागीदार हैं?
बहुत गहरा रिश्ता है हमारा। फिल्म बनाना आमतौर पर बहुत ही जटिल प्रक्रिया है लेकिन हमारे बेजोड़ साथ से ये आसान हुआ। हम दोनों के दिमागों ने एक-दूसरे का बेहतरी से साथ दिया। ऐरे बहुत अच्छा लेखक है। हम बहुत सालों के दोस्त हैं। हमारी दोस्ती किन्हीं कर्मों का ही फल लगती है क्योंकि हम अलग-अलग पृष्ठभूमि से आते हैं और उसका दोस्ती पर कहीं असर नहीं पड़ा। हम लोगों ने तिथि मिलकर बनाई है। फिल्म देखते हुए आपको हमारा रिश्ता भी नजर आएगा। हास्य को जैसे हमने बुना है, किरदार जैसे हैं, उनमें बहुत सारा मैं भी हूं, बहुत सारा वो भी है। वो ग्रामीण जीवन को बहुत भीतर से जानता है और उसने जितनी संभव थी उतनी प्रामाणिकता दी। इसी कारण फिल्म बहुत ईमानदार और पर्यवेक्षणीय (observational) बनी। इसमें जो ईमानदारी है उसमें कोई मसाला नहीं है। ये दुनिया जैसी थी हमने वैसी ही कैप्चर की है। ऐरे उसी गांव से हैं जिसमें हमने शूट किया और जहां के सब किरदार है।

निराश और हतोत्साहित होते हैं तो हौसला पाने के लिए क्या करते हैं? आपके जीवन दर्शन के केंद्र में क्या है?
मेरे जीवन दर्शन के केंद्र में ये है कि जो ये पल है इसी में जिओ। जब आप मौजूदा पल में ही जीने लगते हैं तो आप बुझते नहीं हैं। ये समझा पाना कठिन है, ये हर बार संभव नहीं लेकिन आप तभी बुझ जाते हैं जब मौजूदा पल से बाहर सोच रहे होते हैं। आप या तो अतीत में मनन कर रहे होते हैं या फिर भविष्य को लेकर बेचैन होते हैं। मैं हमेशा इसी पल पर ध्यान केंद्रित करता हूं। इसमें बहुत ताकत है। इसके अलावा मेरा ये भरोसा भी है कि हर चीज नहीं होने वाली है, हर बार सफलता नहीं मिलने वाली है लेकिन अगर आप अपने दिल के प्रति ईमानदार रहें और फिर फेल हों तो उसे स्वीकार करना आसान होता है बजाय उसके कि आपको दिल मना कर रहा हो और आप वो काम करते जाएं। इसका कोई परिमाप नहीं है लेकिन जो भी आ रहा है सामने, उसे आप लेते जाएं।

वाकई?
भारत वो देश है जिसने शून्य की संकल्पना की। हम सबसे प्राचीन और बुद्धिमत्तापूर्ण सभ्यताओं में से हैं। भीतर की ओर यात्रा के लिहाज से हमारे इतिहास में किसी भी अन्य स्थान के मुकाबले ज्यादा गहराई है। और मुझे लगता है कि अभी हम ऐसा देश हैं जो बहुत ज्यादा बाहर की ओर देखने लगे हैं। अगर हम अपनी जड़ों की ओर लौटें तो वहां बहुत समझदारी मिलेगी। जैसे 10 या 15 हजार साल पू्र्व या 5000 साल पूर्व जब योग की रचना की गई।
The other three generations in the film.

Raam Reddy, 26, is from Bengaluru. He is a very talented Indian film writer and director. His first feature film Thithi has been very very exciting. It has won many prestigious awards all over the world including the Golden Leopard at the Locarno I'ntl Film Fest in 2015 and a National Award this year for the Best Kannada Film. The film opens today in Karnataka.
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