Friday, May 29, 2015

मैं नहीं कहता तब करप्शन अपवाद था, पर अब तो माहौल फ़िल्म (जाने भी दो यारो) से बहुत ज्यादा ब्लैक है: कुंदन शाह


 Q & A. .Kundan Shah, Writer-director of – Jaane Bhi Do Yaaro, Kabhi Ha Kabhi Na.
  
Naseeruddin & Satish Shah in the epic Mahabharata scene from JBDY.

सईद अख़्तर मिर्जा ने 1980 में फ़िल्म ‘अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है’ का निर्देशन किया था। एफटीआईआई में उनके साथ पढ़े कुंदन शाह को भी गुस्सा आता था। इस फ़िल्म में सहायक निर्देशक रहे कुंदन ने बाद में अपना गुस्सा पूरी गंभीरता से हंसा-हंसाकर ‘जाने भी दो यारो’ के जरिए निकाला। 1983 में दोस्तों की अनूठी कोशिशों और धारा के उलट बनी इस व्यंग्य विनोद प्रधान फ़िल्म ने समय के साथ बहुत अलग मुकाम फ़िल्म इतिहास में पा लिया है। इसकी पूरी प्रक्रिया और यात्रा के बारे में फ़िल्म ब्लॉगर जय अर्जुन सिंह ने अपनी किताब में काफी विस्तार से लिखा है। अब 32 साल होने को आ रहे हैं, कुंदन शाह अभी भी गुस्से में हैं।

उनकी नई फ़िल्म है ‘पी से पीएम तक’। इसमें मीनाक्षी दीक्षित नाम की अभिनेत्री ने एक ऐसी वेश्या की भूमिका निभाई है जो प्रधान मंत्री पद का चुनाव लड़ने तक का सफर करती है। फ़िल्म शुक्रवार को रिलीज हो चुकी है। केंद्रीय फ़िल्म प्रमाणन बोर्ड ने फ़िल्म में से उन चर्चित नामों को हटा दिया है जिन पर व्यंग्य किया या नहीं किया गया था। जैसे, सलमान खान, जयललिता और सुब्रत रॉय। लेकिन अथक प्रयास के बाद फ़िल्म आ गई है। इस राजनीतिक व्यंग्य के बारे में कुंदन का अनुरोध है कि दिमाग लगाकर देखें। ट्रेलर देखकर लगता है कि ‘जाने भी..’ की तरह इस फ़िल्म की बुनियादी बात भी संभवत: अभी लोग अपनी हंसी में ही उड़ा देंगे। खेदजनक है। उन जैसे निर्देशकों की हमें जरूरत है।

कुंदन ने बीते तीन दशकों में और भी उल्लेखनीय काम किया है। उन्होंने ‘नुक्कड़’ (1986), ‘वागले की दुनिया’ (1988), ‘परसाई कहते हैं’ (2006) जैसे धारावाहिक बनाए हैं जो बेहद सार्थक रहे हैं। वे विधु विनोद चोपड़ा की 1985 में आई गंभीर फ़िल्म ‘ख़ामोश’ की लेखन और निर्देशन टीम का हिस्सा भी रहे। शाहरुख खान को लेकर उन्होंने 1993 में ‘कभी हां कभी ना’ जैसी फ़िल्म बनाई। वो शाहरुख की संभवत: अकेली फ़िल्म है जिसमें हीरो होते हुए भी अंत में वे हार जाते हैं। ‘क्या कहना’, ‘दिल है तुम्हारा’, ‘हम तो मोहब्बत करेगा’, ‘एक से बढ़कर एक’, ‘तीन बहनें’ कुंदन द्वारा निर्देशित अन्य फिल्में हैं।

उनसे बातचीत:

‘पी से पीएम तक’ बनाने की जरूरत कब महसूस हुई?
20 साल हो गए।

कहां से पनपा आइडिया?
देखिए मेरी सारी कहानियां न्यूज़पेपर्स से आती हैं। आप पढ़ते हैं, गुस्सा आ जाता है। एक आइडिया आया था कि जो ये पूरा पॉलिटिकल माहौल है, उसको कैसे बताया जाए? अचानक आइडिया आया कि प्रॉस्टिट्यूट (वेश्या) के किरदार को एक मेटाफर (रूपक) के तौर पर यूज़ करते हैं। कैसे वो एक बायइलेक्शन (उपचुनाव) में फंस जाती है और चार दिन में चीफ मिनिस्टर बन जाती है। उपचुनाव के चक्रव्यूह में कुछ ऐसी-ऐसी चीजें हो जाती हैं। उसे चीफ मिनिस्टर नहीं बनना है, न ही पॉलिटिक्स जॉइन करना है लेकिन कैसे वो बन जाती है। आगे की पीएम बनने की उसकी जर्नी क्या होती है। हालांकि वो पीएम बनती नहीं है।

20 साल तक अपने मूल किस्से को संजो कर रखना मुश्किल नहीं था?
मैंने कुछ सात साल पहले एक लाइन लिखी थी। दो पॉलिटिशियंस डिसकस कर रहे हैं कि “ये तो बहुत बड़ा झूठ होगा”। दूसरा बोला, “तो क्या हुआ, झूठ बोलो, सरेआम बोलो, छाती ठोक कर बोलो। लेकिन ऐसे बोलो कि लोग मंत्रमुग्ध हो जाएं”। यही आज की राजनीति है। मेरे ख़याल से वो आज भी वैलिड है। आप एक चीज का एसेंस (मूल तत्व) पकड़ते हैं, पर्सनैलिटी को नहीं पकड़ते हैं। जो एसेंस है आपके आसपास का वो स्क्रिप्ट को जिंदा रखता है। मैंने जब लिखी 1995 में तब ‘सेज’ (स्पेशल इकोनॉमिक जोन) का मामला गरम था। फिर वो मेरे ख़याल से ठंडा हो गया। अब वापस गरम हो रहा है। तो क्या है कि वो चीज बनी रहती है।

ये बड़ा अचरज है कि हम तीन घंटे की फ़िल्म देखते हैं या पांच मिनट की कहानी सुनते है फिर आगे बढ़ जाते हैं नई चीज कंज्यूम करने। लेकिन आप अपनी स्क्रिप्ट के साथ इतना लंबा वक्त बिताते हैं, रात बिताते हैं, दिन बिताते हैं। वो फीलिंग क्या होती है, अरुचि या कुछ और? क्यों जुड़े रहते हैं?
मैंने इसे लिखने के बीच में दूसरी फ़िल्में भी बनाईं। लेकिन उसका जो बर्थ आइडिया था वो 20 साल पहले का था। क्या होता है, आइडिया एक्साइटिंग रहता है तो आप उसपे काम करते रहते हैं। आप सोचते हैं। कभी बनाने का मौका मिलता है। क्योंकि मेरे हिसाब से ये यूनीक आइडिया है वर्ल्ड सिनेमा में कि एक प्रॉस्टिट्यूट जिसको कुछ लेना-देना नहीं है, वो बेचारी, उसके अड्डे पे रेड हो जाती है तो वो भागती है। कोई और शहर में जाती है और वहां एक बायइलेक्शन होता है और वहां वो फंस जाती है। और चार दिन में सीएम बन जाती है। तो ये जो प्रिमाइज (आधार) है वो इतना एबसर्ड (अजीब) है, इतना इललॉजिकल (अतार्किक) है, इतना इंट्रेस्टिंग है कि आपको वो अलाइव (जिंदा) रखता है। जैसे आपने जैन डायरीज (हवाला केस) के बारे में सुना होगा। जो एक डायरी मिली थी मि. जैन की जिसमें लिखा था कि किसको कितना पैसा दिया गया है। तो उसपे एक आइडिया आया। फ़िल्म जब बनेगी तब बनेगी। कि मि. जैन को पकड़ लिया है और वो हैलीकॉप्टर में है। उसे बोला जाता है कि कैसे भी साक्ष्य नष्ट कर दो। तो वो डायरी उठा के फेंक देते हैं। वो जाके एक खेत में गिरती है। वो न जाने कौन सा खेत है, न जाने कौन सा ट्राइबल एरिया है वहां जाकर गिरती है। और अब सब लोग उस डायरी को ढूंढ़ रहे हैं। तो इस तरह के आइडिया आप लेते हैं और वो आपको एक्साइट करते रहते हैं। उसको अपनी वास्तविकता से जोड़ते हैं।

ऐसे जितने भी पॉलिटिकल घपले हैं, इस हिसाब से देखें तो आपके पास स्टोरीज़ अनाप-शनाप हो सकती हैं?
बहुत हैं बहुत।

भारत के राजनीतिज्ञों ने इतना क्रिएटिव कंटेंट रखा हुआ है.. 
(खिलखिलाते हैं) बिलकुल। ..

आपके लिए बड़ी दुविधा होती होगी कि किसको उठाएं और किसको छोड़ें। ऐसा कभी होता है?
अभी आपको एक और आइडिया सुनाता हूं। हजारों आइडियाज़ हैं। एक आदमी है उसका एक्सीडेंट हो जाता है। दो एक्सीडेंट होते हैं अलग-अलग अंतराल में। उसकी याद्दाश्त चली गई है। उन दो एक्सीडेंट के बीच अंतर है वो तीन महीना है, छह महीना है या तीन साल है। वो दूसरे एक्सीडेंट से उठता है। पहला एक्सीडेंट हुआ उससे पहले वो फक्कड़ था और अब उसके पास 300 करोड़ है। लेकिन उसके पास 300 करोड़ आया कहां से। लोग उसके आस-पास घूम रहे हैं और उसको कुछ याद नहीं है। अब वो पता कर रहा है कि उसके पास 300 करोड़ कहां से आया। और ये उसकी अपनी गिल्ट (अपराधबोध) की यात्रा है। वो रिवर्स है “हार्ट ऑफ डार्कनेस” (जोसेफ कॉनराड की 1899 में प्रकाशित कहानी, जिस पर 1979 में फ्रांसिस फोर्ड कोपोला ने “अपोकलिप्स नाओ” बनाई) का। उसकी जरा सी याद्दाश्त आए बगैर भी स्क्रीनप्ले पूरा है। तो आइडिया आते हैं। मेरी सारी फ़िल्में न्यूज़पेपर्स से ही आती हैं। ‘जाने भी दो यारो’ से लेकर, ‘थ्री सिस्टर्स’ (तीन बहनें) है, ‘क्या कहना’ है। वहां भी मैंने कुछ न्यूजपेपर्स से लिया था।

पिछली बात हिमांशु शर्मा से हुई थी। उनसे पूछा कि सुबह अखबार पढ़ते हैं या ऑनलाइन खबरें टटोलते हैं तो दिल्ली में बाघ के बाड़े में गिरा आदमी, नेट न्यूट्रैलिटी, राडिया टेप्स, घपले.. इन खबरों पर आपके भीतर का लेखक कैसे रिएक्ट करता है। उन्होंने कहा कि वे एक लेखक के तौर पर इन खबरों को नहीं देखते, एक इंसान या नागरिक के तौर पर देखते हैं।
जहां तक मैं अपने आपको देखता हूं, एक आर्टिस्ट के तौर पर मैं रिएलिटी से इतना जुड़ा हूं कि हमारी जिंदगी में ये सारी चीजें आ जाती हैं। कॉरपोरेटाइजेशन, उसके विक्टिम कहें, फायदे कहो.. हर चीज आ जाती है। आप समझ रहे हैं न। ‘प्यासा’ (1957) का एंड में जो है.. गुरुदत्त बोलता है, “तुम चलोगी मेरे साथ”? या ‘प्रतिद्वंदी’ (1970) सत्यजीत रे का जो गांव चला जाता है। लेकिन आज आप गांव नहीं जा सकते। वहां की भी सच्चाई वही है जो शहर की है। आप भाग नहीं सकते, आपकी जो हकीकत है उससे।

इतनी निराश करने वाली, असल खबरें आप सोचते हैं कि आदमी का पागल होना तय है, उसके बावजूद आप बनाते कॉमेडीज़ हैं।
‘पी से पीएम तक’ का कंटेंट जितना ब्लैक है, उसकी ट्रीटमेंट उतनी ही ब्राइट है। वो संतुलित ऐसे किया है। क्योंकि मेरे पास एक ही हथियार है.. वो है कॉमेडी। उस कॉमेडी को यूज़ करके, सटायर को यूज़ करके आप कैसे वो सबजेक्ट को ऑडियंस के लिए रोचक बना पाते हैं। उसे मजा आए और वो कुछ सोचे। आप जब फ़िल्म देखते हैं तो लोग बोलते हैं अपना दिमाग घर पर रखो, इसमें हम बोलते हैं कि आप प्लीज़ दिमाग अपना लेके आइए। दिमाग से फील कीजिए और दिल से सोचिए।

जैसे मौजूदा सरकार है या अन्यथा भी राजनेताओं के सांप्रदायिक विचार होते हैं.. उसे लेकर बहुत कम कहानियां आती हैं। उस सांप्रदायिक पक्ष पर भी सोचा है आपने पिछले 20 साल में? या ज्यादातर पूंजीवाद और उपभोक्तावाद पर आपका दिमाग ज्यादा खराब होता है?
क्या होता है न.. आपकी बात सही है.. हर डायरेक्टर की एक पर्सनैलिटी होती है। आपकी बात बिलकुल सही है कि जो सांप्रदायिकता है या जो भी हुआ है। बात सही है। पर ओवरऑल आप वो चीज पकड़ते हैं जो आपको अपील करे। लेकिन इसका ये मतलब नहीं है कि आप उसे लेकर चिंतिंत नहीं हैं या उसके बारे में सोचते नहीं हैं कि जो हो रहा है वो नहीं होना चाहिए। एक जिम्मेदार नागरिक के तौर पर वो सोचना भी चाहिए।

A still from P Se PM Tak.
‘पी से पीएम तक’ की केंद्रीय पात्र वेश्या है। आपने कॉमेडी का सहारा लेते हुए लोगों के सामने एक टिप्पणी करने की कोशिश की है लेकिन क्या ऐसा नहीं है कि जो सबसे आधारभूत दर्शक हमारा है जो किसी भी बात पर हंसने लगता है। ऐसा नहीं है कि वेश्या के किरदार पर वो उस लिहाज से हंसने लगेगा जैसे हमारा समाज उसे अपमानजनक ढंग से देखता ही है। ये डर नहीं कि वो दर्शक व्यंग्य को उल्टा ही ले ले?
नहीं, नहीं ऐसा नहीं हो सकता। आप अभी उसे बाहर से देख रहे हैं। वो मेरी सूत्रधार है, वो मेरी हीरोइन है हालांकि वो एक प्रॉस्टिट्यूट की भूमिका निभा रही है। देखिए, उसकी लाइफ तो इतनी पाप से भरी हुई है तो क्या कर सकते हैं। और पाप वो नहीं करना चाहती है लेकिन उसे करने पड़ते हैं। लेकिन फिर भी वो मेरी सूत्रधार है। उसको इस अंदाज से पेश करना मेरा काम है। जो आप कह रहे हैं उसका सवाल ही नहीं उठता कि ऐसा फील करेंगे लोग।

पॉलिटिकल कॉमेडीज जितनी भी हैं या हिंदी के बेहद काबिल व्यंग्यकारों की लेखनी है, क्या उनका कभी राजनेताओं की मोटी चमड़ी पर कोई असर हुआ है? आपने बीते 30-40 साल में देखा है क्या? प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से?
इनडायरेक्टली तो निश्चित तौर पर होता है। लेकिन क्या होता है कि ये एक स्तर पर ही असर डालता है। अब खाली मैं एक फ़िल्म बना दूं तो उससे समाज बदल नहीं सकता। लेकिन वो मेरा कर्तव्य है कि मैं कुछ बनाऊं जो समाज से जुड़ा हुआ है। और खासतौर पर आज के लिए। आज का सोचते हुए। क्योंकि आज हम इतने जुड़े हैं कि ग्लोबलाइजेशन है, ये है वो है। आप मुझे एक बात समझाइए आप पत्रकार हैं। आपने, हम लोगों ने एफडीआई (प्रत्यक्ष विदेशी निवेश) इंश्योरेंस में बढ़ा दिया है। कितना पर्सेंट बढ़ाया है आपको पता है? बताइए ना...

जी 49 फीसदी कर दिया है..
और कहां से किया। 25 से किया। क्यों किया? क्या है ऐसी चीज इंश्योरेंस जो हमको बाहर की टेक्नोलॉजी देगी? आप मुझे बताएं किसी न्यूजपेपर ने उठाया? आपने रिपोर्टर के तौर पर ये प्रश्न उठाया? क्यों नहीं उठाया है? क्या फायदा है इसमें? जो 25 से 49 पर्सेंट हुआ है वो इंश्योरेंस में क्या चीज है? आप मुझे बताइए ना...

कोई चीज नहीं है..
इंश्योरेंस में आप पैसे लेते हैं सबसे। करोड़ों से लो और हजारों में दो। तो इसमें हमको कौन सी एफडीआई की जरूरत है यार। किसी मिनिस्टर ने, किसी न्यूजपेपर ने ये सवाल उठाया है ये मुझे बताइए..

नहीं उठाया है..
क्यों नहीं उठाया है? क्या आप नहीं समझते ये बात।

समझते हैं..
तो ये देश के लिए हानिकारक है न?

बिलकुल..
तो फिर चुप क्यों रहते हैं? तो ऐसी बहुत सी चीजें हैं। मेरे कहने का मतलब ये है कि अभी आप नहीं उठा रहे हैं लेकिन एक वर्ग है जो इसकी बहुत भारी तरीके से कीमत चुकाता है। जितना करप्शन हो.. अभी ये मोदी साहब कहते हैं कि नहीं मैं खाऊंगा नहीं, और न खाने दूंगा लेकिन यहां महाराष्ट्र में तो फड़नवीस (देवेंद्र, सीएम) साहब हैं जिन्होंने डीपी (विकास योजना) प्लान ऐसा बनाया है कि यार हमको मुश्किल ही हो जाएगी यार। अगर इतनी बड़ी-बड़ी बिल्डिंगें बनने लगीं, न ही रास्ते हैं, न ही कुछ है, कैसे होने वाला है ये सब। वो सोचते हैं रिएल एस्टेट चलता है तो उससे इकोनॉमी को आगे बढ़ाएंगे। उनका यही सोचना है। इकोनॉमी को फिलिप (प्रोत्साहन) मिले ऐसा वो सोच तो रहे हैं तो गलत सोच रहे हैं। सही क्या सोचना है वो उनको पता नहीं है। शायद। मैं छोटा आदमी हूं। लेकिन मेरा एक ड्यूटी बन गया है कि मैं भी आज इकोनॉमिक्स पढ़ूं। अब मैं लिट्रेचर पढ़ता ही नहीं हूं, अब मैं इकोनॉमिक्स ही पढ़ता हूं। मेरा लाइफ इकोनॉमिक्स से ही संचालित होता है।

आपने अपनी शुरुआती फ़िल्म से लेकर आज तक जो भी बताने की कोशिश की है, चेताने की कोशिश की है, आपको नहीं लगता कि प्रोसेस इतना इर्रिवर्सिबल (न मोड़ा जा सकने वाला) हो गया है बीते सालों में कि अब तो नष्ट होना ही तय है?
इसका जवाब तो देना बहुत मुश्किल है। क्या होता है न.. आपने वो ‘नीरोज़ गेस्ट्स’ डॉक्युमेंट्री देखी है न। पी. साईंनाथ ने जो बनाई है। एक नीरो था। रोमन सम्राट था। इतना अंधाधुंधी थी उसके राज में। तो क्या होता है न कि आप जो हिस्टोरिकल पीरियड देखते हैं ... 1947 में हमको आजादी मिली.. 65 से ज्यादा साल हो गए। लेकिन आपने इतने से वक्त में पूरी मानवता का समझ लिया है कि हम समझ ही नहीं सकते? हिंदुस्तान में वही हो रहा है जो पूरे विश्व में हो रहा है। हम ये मान लेते हैं जो इतने साल में है वो बदल ही नहीं सकता। कि ये तो खराब होगा और। आप यही सोच रहे हैं ना..

जी..
ऐसा आर्टिस्ट नहीं सोचता। वो पूरा हिस्टोरिकल दृष्टिकोण में सोचता है न। 65 साल को आप बोलते हैं कि ये ही सच है। और तो कोई सच ही नहीं है, बस ये ही है। ऐसा ही होगा। कम्युनल ही होंगे। लोग मरेंगे। करप्शन होगा। तो अभी मैं क्या जवाब दूंगा? इसकी कीमत कोई न कोई तो चुका रहा है न। जब आपको पांच करोड़ की रिश्वत मिलती है, ओवरऑल इकोनॉमी में किसी से तो पांच करोड़ छिन रहे हैं न.. जो आपको ऐसे ही मिल गए। तो कोई तो तबका होगा जो इसकी प्राइस पे कर रहा है। इसकी कीमत अदा कर रहा है। आप समझ रहे हैं न। एक आर्टिस्ट के तौर पर हम तो ऐसे ही सोचेंगे न।

लेकिन आपके इतना पॉजिटिव होने की क्या वजह है .. कि अंततः चीजें हो सकता है ठीक हो जाएं।
अब मैं आपको उल्टा बात बोलूं? मैं टेलीविजन पर इतनी बार सुन रहा हूं कि अगर हम चेंज नहीं लाएंगे तो the country is driving for a revolution आपने सुना है ये। एम. जे. अकबर ने बोला है।

जी.. जो बीजेपी में आ गए हैं अब।
अब बीजेपी है या जो भी है, थोड़ा अकल वाला आदमी है। उसका लैंड एक्विजिशन (भूमि अधिग्रहण) के बारे में ये कहना था कि भई चलो हम आगे बढ़ते हैं, यार इंडस्ट्री को डालते हैं लेकिन वो जब बोलते हैं तो उसका मतलब क्या होता है। जब आदमी के पास रोटी नहीं रहेगी, कुछ नहीं रहेगा तो वो करेगा क्या। वो न्यूज़पेपर में नहीं आता है इतना। वो क्यूं बोल रहे हैं कि रेवोल्यूशन आएगा? किस आधार पर बोल रहे हैं?

जी..
नहीं नहीं वो क्या न्यूज़पेपर पढ़ के बोल रहे हैं?

वैसे वो न्यूज़ बिजनेस में ही हैं तो उस हिसाब से बोल रहे हैं
वो वो बोल रहे हैं जो न्यूज़ में नहीं आता है पर हकीकत है।

मैं यही तो बोल रहा हूं कि जब न्यूज में चीजें छप नहीं रहीं..
नहीं नहीं, आप हमसे ये हक मत छीनो कि हम क्या बोल सकते हैं या मॉरल स्टैंड लेना है या वैल्यू की बात ही करनी है।

नहीं नहीं मैं...
नहीं नहीं। आप मुझे टटोल रहे हैं तो मैं कहता हूं कि आज ऑनेस्ट रहना एक बहुत बड़ी लग्जरी है। अखबारों के मालिक कोल माइंस डालते हैं तो कॉरपोरेटाइजेशन से जुड़े हुए हैं न, उन चीजों से? क्या आप अपनी नौकरी छोड़ दोगे? अगर आप अवेयर हैं तो वही है। फ़िल्म आपको जागरूक करना चाहती है। कि भई हम ऐसे हैं तो क्या किया जाए? कैसे करें इसको?

मैं पूछता हूं ताकि या तो आशा मिल जाए या निराशा मिल जाए। क्योंकि सबसे जरूरी खबरें आज दबी हैं और जो नॉन-इश्यू है वो...
हां, अभी आप ही बोल रहे हैं...

मैं खुद बोल रहा हूं
जब हम न्यूज़पेपर पढ़ते हैं तो ये पढ़ते हैं कि लाइन्स के बीच में क्या है। तो लाइन्स के बीच में हमें तो हकीकत मिलने वाली नहीं है।

देखिए अन्य अखबारों की तो बात नहीं कर रहा लेकिन जैसे द हिंदु है। द इंडियन एक्सप्रेस है। द हिंदु में सबसे भरोसेमंद चेहरे थे वो चले गए। तीन-चार जो बेहद विश्वसनीय थे।
पी. साईंनाथ..

पी. साईंनाथ ने छोड़ दिया, प्रवीण स्वामी ने छोड़ दिया, उन लोगों ने छोड़ दिया

करेक्ट

वो कहते हैं कि अब प्रेस रिलीज बेस्ड हो गया है सारा। और प्रेस रिलीज ही लगानी है तो हमारी क्या जरूरत है। 8 रुपया 9 रुपया देकर भी द हिंदु मंगाने को तैयार हैं, दो रुपये का अखबार छोड़ के। इंडियन एक्सप्रेस में भी चीजें बदल चुकी हैं।
सही बात है आपकी लेकिन पी. साईंनाथ तो नहीं बदल गया है न।

वैकल्पिक मंच पर आ गए हैं
यार वो क्या है न, एक लग्जरी है मैं मानता हूं। लेकिन हम 70 साल को पूरी दुनिया के ये नहीं कह सकते कि ये ही सच्चाई है। आज की सच्चाई भी यही है और कल की सच्चाई भी यही रहेगी, ये सोचना गलत है।

उस संदर्भ में आप कह रहे हैं कि जैसे पूरी दुनिया हजारों साल से है तो हजारों बार उतार-चढ़ाव का चक्र रहा है.. ये प्रक्रियाएं रही हैं..
जब आफत आती है तो आप सोचते हैं लेकिन.. । मैं ये नहीं बोलता हूं कि नया सूरज उगेगा.. कम्युनिस्ट बातें नहीं कह रहा हूं लेकिन हम एक डार्क पीरियड को बोलते हैं कि यही सच्चाई है तो गड़बड़ हो जाते हैं। तो हम तो यही मानते हैं और कोशिश कर रहे हैं। एक नई चीज सामने लाने की कोशिश कर रहे हैं। और क्या कर सकता है आदमी। हमारे पास एक ही हथियार है ऑडियंस तक पहुंचने का वो है कॉमेडी।

पारंपरिक राजनीतिक दलों को लेकर व्यंग्य और उनकी हंसी-किरकिरी हम हमेशा देखते आए हैं। लेकिन आम आदमी पार्टी की बात करें तो आप कैसे लेते हैं दो साल में इनकी मेकिंग...
आम आदमी पार्टी ने जो संसद व विधायी सीटें जीतीं वो आम आदमी पार्टी की जीत नहीं है, वो किसकी जीत है आप मुझे बताइए ना? वो लोगों की जीत है। पीपल। लोग। लोगों की जीत है। वो (पार्टी) फेल हुए, उन्होंने (लोगों) बोला “हम एक और चांस देंगे। आप ऑनेस्ट रहिए, पांच साल में कुछ मत करिए हम समझेंगे, लगेगा कोई और नहीं है तो हम आपको ही रखेंगे”। देखिए जनता ने कितना साफ-साफ बताया है यार। और न ही उसमें किसी ने मुसलमान के तौर पर वोट किया, न ही उसमें ईसाई के तौर पर किया, न ही उसमें सिख के तौर पर किसी ने वोट किया। Aam Aadmi is not Kejriwal alone, या प्रशांत भूषण या जो भी है। Aam Aadmi is the people yaar.. क्या.. क्या तमाचा मारा है यार लोगों ने? तो जीत लोगों की होनी चाहिए न? आपको एक उत्साह होना चाहिए, एक बहुत बड़ी आशा होनी चाहिए। हम समझते हैं बदलाव नहीं होगा, अब ये बीजेपी हिल गई न? नहीं, बीजेपी हिल गई या नहीं? और सब लोगों को सच्चाई मालूम पड़ गई क्योंकि लोग सच के साथ हैं। बहुत मुश्किल हो गया है यार लोगों के लिए। पानी टैंकर से आता है। माफिया है। ये लोग कैसे जिएंगे यार। हमारा जो वॉचमैन है वो पूछता है आज मोदी साहब ने क्या कहा? मोदी साहब उसके लिए खुदा बन गए हैं। मोदी हो या जो भी हो आप समझ रहे हैं न। कब वो आदमी ऐसा सवाल करता है जब बिचारा गिरा हुआ है।

Ravi Baswani as Sudhir & Naseer as Vinod in the film.
32 साल पहले सुधीर-विनोद हारे थे, तरनेजा-आहूजा जीते थे? अब 2015 में आपके जेहन में समाज कैसा है? वो ही लोग जीत रहे हैं, वो ही लोग हार रहे हैं?
तब क्या है, मैं नहीं कहता कि करप्शन अपवाद था। लेकिन अभी तो सब माहौल ही बदल गया है। ये फ़िल्म (जाने भी दो यारो) से बहुत-बहुत ज्यादा ब्लैक है। जो हम कहना चाहते थे तब वो बहुत ब्लैक था लेकिन अब तो आप बात करेंगे तो लोग आपका टेबल छोड़कर चले जाएंगे। वैल्यू की बात करते हैं लोग टेबल छोड़कर चले जाते हैं। कहते हैं, इस आदमी से क्या बात करें। आप समझ रहे हैं? आप समझ रहे हैं?

जी..
क्योंकि सब समझ रहे हैं, ऐसा ये 70 साल में हो गया तो अब वही चलेगा। मेरे ख़याल से ऐसा नहीं है। ये भी कि टेक्नोलॉजी अपना बदलाव ला रही है। अभी वो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस है जिससे बहुत बड़ा धक्का आने वाला है। ऑटोमेशन है। रोबोटिक्स है। उससे बिचारा वर्कर और भी रिडंडेंट (बेकार) हो जाएगा। तो जब तक उसके लिए चारा (रास्ता) और नहीं बनेगा तो ये समस्या है बहुत। भई, टेक्नोलॉजी अपने लेवल पर चलेगी। टेक्नोलॉजी को आप रोक नहीं सकते। देखो, इकोनॉमिक्स टेक्नोलॉजी से जुड़ा हुआ है। टेक्नोलॉजी और इकोनॉमिक्स फ़िल्म से जुड़ा हुआ है। उससे वो जो फ़िल्म बनाता है वो जुड़ा हुआ है। आज की तारीख में हम सब एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। वो ये फ़िल्म दिखा रही है। मुझे ये लगता है।

‘जाने भी दो यारो’ में हम बात करते हैं बिल्डर-राजनेता-पुलिस की आपराधिक गुटबंदी की। शहरी बसावट की बात करते हैं जो तेजी से बदल रही है। फ्लाइओवर बन रहा है। आर्थिक असमानता है। ईमानदारी कितनी मुश्किल है, बेईमानी कितनी आसान है। सिहर जाते हैं वो सब देख कर। हम जब इसे बता रहे हैं तो क्या ये इतना अनिवार्य है हम हंसा कर ही बताएं? क्योंकि जिस पर बीतती है उससे मिलकर जानें कि कितना क्रूर है मामला उसके साथ। मैं इसे गलत नहीं कह रहा लेकिन क्या ये दर्शक बहुत घमंडी है जो कहता है I don’t care? मैंने पैसा दिया है मुझे हंसा के ही ये चीज बताओ? जबकि उसी के काम की चीज बताई जा रही है।
 आपका सवाल बहुत वैलिड है लेकिन क्या होता है न कि अभी.. ये आपका सवाल बहुत ही वैलिड है.. पर आप ये सवाल पूछिए कि आपका न्यूज़पेपर ये काम क्यों नहीं करता? क्यों ये सवाल नहीं उठाता? आपका टेलीविजन ये क्यों नहीं करता? आपकी गवर्नमेंट ये क्यों नहीं करती? आपके मंत्री ये क्यों नहीं करते? तो क्या होता है न हम भी इन सबसे जुड़े हुए हैं। अगर ये पाबंदियां न होतीं तो शायद हम अपना एक्सप्रेशन बदल देते। आप ये कहना चाहते हैं कि क्यों डायरेक्ट नहीं हो सकते? क्यों ये एजिटेटेड प्रोपोगैंडा (गुस्सैल रवैया) आप नहीं कर सकते। एजिटेटेड हैं ना कि चेंज आना चाहिए? उसके लिए क्या करना चाहिए? सही है आपका सवाल। डॉक्युमेंट्री भी ऐसी बनती हैं। लेकिन जब आप फ़िल्म बनाते हैं तो अलग होता है। आप उसमें इतना पैसा खर्च करते हैं तो आपको वायेबल (व्यावहारिक) होना है। लोगों तक बात पहुंचानी है। .. डॉक्युमेंट्री आप फ्री में दिखाएंगे टेलीविजन पे। अगर फ़िल्म फ्री में दिखाएंगे तो मैं बना दूंगा ऐसी फ़िल्म।

‘जाने भी दो यारो’ के समय में कॉमेडी जो थी और लोगों ने खुद को जैसे एंटरटेन किया उससे, आज के दर्शक उस कॉमिक सेंस को उतनी ही ताजगी से लेंगे या उनमें कोई बदलाव 20-30 साल में आप पाते हैं?
नहीं, ऐसा नहीं है। ये सवाल, सवाल ही नहीं है। ऑडियंस हर चीज के लिए है भाई। जहां आप सच्चाई की बात करेंगे वहां ऑडियंस क्यों नहीं होगी? आप ये सोचते हैं कि जो डेविड धवन का दर्शक है वो ही आपकी फ़िल्म देखने आएगा? क्यों आप ऐसा मान लेते हैं? या ऐसा क्यों सोचते हैं कि जो डेविड धवन की फ़िल्म देख रहे हैं वो आपकी फ़िल्म देखकर एंजॉय नहीं कर सकते? सबसे प्योर चीज है ऑडियंस। अगर आपकी फ़िल्म फ्लॉप होती है किसी कारणवश। मैं ये नहीं कर रहा हूं कि हमेशा फ़िल्म खराब है इसलिए फ्लॉप होती है। लेकिन ऑडियंस बहुत प्योर होती है। वो बिचारी पैइसा देकर आती है तो वो करेगी वो। बहुत सी फ़िल्में हैं जो चलती हैं, बहुत सी फ़िल्में हैं तो तारीफ पाती हैं। अलग-अलग कारणों से।

अगर मैं गोविंदा की फ़िल्में देखकर हंसा, आपकी देखकर हंसा लेकिन जो घर के युवा बच्चे हैं उनका कॉमेडी को लेकर नया टेस्ट ऐसा है कि शायद हमें इस कंटेंट के लिए हेय दृष्टि से देखे। कि इतनी प्रिटेंशस चीजें आप क्यों देख रहे हो?
नहीं नहीं। वो बच्चे एंजॉय करेंगे। इन फैक्ट आज का स्टैंडर्ड मापने का पैमाना ‘सब टीवी’ हो गया है। SAB TV is becoming the definition of humor.. तो वो बहुत मुश्किल है न। कॉमेडी कॉमेडी होती है। वहां ‘सब टीवी’ तो आपको ठूंस रहा है। आपके मुंह के अंदर वो ठूंस रहा है। कि लो लो लो, ये कॉमेडी है। एक वीक में वो आपको छह बार वो प्रोग्राम दिखाते हैं। और ऐसे आठ प्रोग्राम रोज दिखाते हैं। बोलते हैं ये हम कॉमेडी कर रहे हैं आप हंसो। तो अभी क्या, ऑडियंस वही लेती है जो उनको मिलता है।

जैसे केले के छिलके पर फिसलकर कोई गिरता था तो उस पर हम हंसते थे? आज फ़िल्म में ऐसे दृश्य काम करेंगे? दूसरों के दुख का हमारा मनोरंजन हो जाना, क्या अब भी है?
नहीं, नहीं ऐसा नहीं है। एक चीज रिपीट होगी तो वो काम नहीं करेगी। उसको अलग लेवल पे यूज़ करेंगे। अभी जब केले के छिलके का जिक्र ही कर दिया है तो मेरी फ़िल्म में (पी से पीएम तक) केले के छिलके हैं (खिलखिलाते हैं)।

मुझे नहीं पता था..
हां, मैंने यूज़ किए हैं छिलके। अभी वो अच्छे लगें, नहीं लगे वो मुझे नहीं मालूम। अलग तरीके से किया है। किसी को मजा आया तो ठीक है नहीं तो हम गलत है। ... अब जैसे परसाई (हरिशंकर) है। क्या परसाई को आज पढ़कर नहीं एंजॉय कर सकते। वो आज भी इतने वैलिड हैं यार। मुझे दूरदर्शन ने बोला था आप परसाई पर एक सीरियल बनाओ। तेरह कहानियां। उसमें एक कहानी में है कि डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट घोषणा करता है जो भी राशन ब्लैक में रखेगा, जमा करेगा, उस पर हम छापा मारेंगे। तो परसाई जी का कैरेक्टर जाता है डीएम के पास और बोलता है सर ये आदमी है, इसने इतना माल अपने गोदाम में रखा है आप रेड कीजिए। बोले, “वैरी गुड, गुड इनफॉर्मेशन”। उसे बाद में मालूम चलता है कि गोदाम वाले को उन्होंने नोटिस भेजी है, “कि भई हमें खबर मिली है कि आपने इतना माल रखा है क्या ये सही है”? परसाई का किरदार बोला, “ये आप क्या कर रहे हो। माल हटा देगा वो”। तो डीएम बोलता है, “नहीं नहीं हमको तो प्रोसीजर से जाना पड़ेगा न”। तो अभी मुझे बताओ ये कैसे हो रहा है? ये दोबारा हो रहा है आपकी जिंदगी में। आप पत्रकार हैं मुझे बताइए कौन कर रहा है और कहां हो रहा है। मुझे बताइए..। फेल हो जाएंगे आप..

अ..
रोज आ रहा है यार। तो आप क्या पेपर पढ़ते हैं!

नहीं पढ़ता जी..
ये है ब्लैक मनी का। हम रेड कर देंगे, हम ये करेंगे, हम वो करेंगे। ये परसाई सामने आ रहे हैं आपके। आ रहे हैं कि नहीं? वो जेटली (अरुण) परसाई बन रहे है। डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट। हंसी नहीं आती आपको? वो रोज बोल रहे हैं “हम ये कर देंगे.. उसके पास ब्लैक मनी है हम ऐसा करेंगे”। ये सब तुम ऐसे ही बोल रहे हो। कोई जेल नहीं जाएगा। कोई कुछ नहीं होगा। ये कॉन्ग्रेस को बोलते हैं क्रोनी कैपिटलिस्ट थी तो ये कौन से कम हैं यार। अभी पब्लिक को थोड़ा झांसे में रखना है तो अपने-अपने लेवल पर कर रहे हैं। उनका ये ... कौन सा स्वच्छ भारत हो रहा है डेढ़ साल में @#$*...

कुछ नहीं हुआ..
कुछ नहीं हुआ है एक साल में.. 2019-20 तक कर देगा क्या वो? बोलते हैं न कि सपने देखने में क्या बुराई है। मोदी जी तो यही बोलेंगे। कौन स्वच्छ.. पहले स्वच्छ दिमाग करो यार। ..खैर, फ़िल्म पर आते हैं। हमने दिल से बनाई है और ऑडियंस से कहते हैं कि प्लीज़ दिमाग साथ में लेकर आइए। हमारा मानना है कि जब थियेटर से बाहर जाएंगे तो फ़िल्म आपके साथ जाएगी। हमने कोशिश की है। एक बहुत छोटी फ़िल्म है। हमारे पास न ही स्टार हैं, न ही कुछ है। खाली कॉमेडी है, एक ही हथियार। आप आके देखिए क्या है। अरे प्रॉस्टिट्यूट को इसलिए सलेक्ट किया है कि वो हमारे समाज के सबसे नीचे के तबके की है। एकदम नीचे की है। जबकि पॉलिटिशियन कितने गंदे हैं ये दिखाने के लिए फ़िल्म है। रूपक के स्तर पर इस्तेमाल किया है। और वो प्रॉस्टिट्यूट है उसकी ट्रैजेडी है, क्योंकि हर प्रॉस्टिट्यूट की एक ट्रैजेडी है। उसके जीवन में इतना दुख भरा हुआ है। क्योंकि पॉलिटिकल मेटाफर यूज़ कर रहे हैं तो उससे कॉमेडी करवाई है, उससे स्लैपस्टिक करवाई है। और ट्रीटमेंट टोटल ब्राइट है। जितनी उसकी लाइफ डार्क है, जितना उसका सबजैक्ट डार्क है, जो हम कहना चाहते हैं डार्क है, उसी को दिखाने की कोशिश की है दोस्त।

‘तनु वेड्स मनु रिटर्न्स’ देखने गया था। दस मिनट हुए थे शुरू हुए। मेरे पास दो युवक बैठे थे। तभी टिकट वाला आया। छह-सात औरतों और बच्चों की सीटें दिखा रहा था। उसने उन लड़कों से कहा, “तुम अपने टिकट दिखाओ”। वो कहते हैं “तुमसे पहले एक आदमी था, उसने बोला था टिकट उसे दिखा दी, उसने हमको बिठा दिया”। तो उसने कहा “दोबारा दिखाओ मैं नया आदमी हूं अभी आया हूं”। तो टिकट वो धीरे-धीरे निकाल रहे थे। उसने पूछा “तुम कौन सी फ़िल्म देखने आए हो, तो कहते हैं हमको तो गब्बर देखनी है”। उसने कहा, “गब्बर देखनी है तो तनु वेड्स मनु रिटर्न्स में क्यों बैठा है दस मिनट हो गए तेरा अक्षय कुमार दिखा क्या?”
(खिलखिलाते हैं)...

चौंक गया अपने साथी दर्शकों को देखकर ...
नहीं नहीं, इसमें सबको मत गिनो। एक अलग वाकया सबको डिफाइन नहीं करता। लेकिन अच्छा है ये वाकया अच्छा है। (हंसते हैं)

लेकिन फ़िल्मों से इतर भी हालात बहुत निराशाजनक हैं
नहीं, नहीं ठीक होगा। यहां मुंबई में तो हालात बहुत ही खराब हैं। मैं एक किस्सा बताता हूं। जब निर्भया वाला मामला हुआ तो टाइम्स ऑफ इंडिया ने एक खबर छापी कि वडाला में – वडाला हमारा बंबई में एक सबर्ब है, जैसे बांद्रा है वैसे वडाला है – वहां एक लड़का और लड़की बस में ट्रैवल कर रहे थे। लड़के और लड़की में कुछ अनबन हो गई और लड़की नीचे उतर गई। पता नहीं वो बॉयफ्रेंड- गर्लफ्रेंड थे या दोस्त थे कॉलेज के .. वो बात मायने नहीं रखती .. तो लड़का उसके पीछे जा रहा था उसको मनाने के लिए। आगे पांच लोग खड़े थे। पांच लोग खड़े थे और वो देख रहे थे। वो लड़की को देख रहे हैं, फिर बोल रहे हैं.. “मान जा मान जा, हम भी तो खड़े हैं लाइन में, कमी है तो सिर्फ एक सरिए की”। ………..आप सुन रहे हैं।

…सुन रहा हूं बिलकुल सुन रहा हूं
“कमी है तो…” …ये लोग में इतनी सिकनेस (बीमारी) कैसे पैदा हो गई? आपने देखी निर्भया पर (लेस्ली उडविन की डॉक्युमेंट्री ‘इंडियाज़ डॉटर’).. आपको लिखना चाहिए उस पर। वो फ़िल्म सब स्कूल में दिखानी चाहिए ये मेरा मानना है। बैन कर दी गवर्नमेंट ने। लेकिन उसमें सबसे समझ वाली बात उस साइकेट्रिस्ट ने कही है। वो बोल रहा है कि यार ये लोग सिक नहीं हैं मेंटली, ये लोग एंटी-सोशल लोग हैं। ये जहां रहते हैं वहां औरतों को ऐसे ही ट्रीट किया जाता है। नॉट एग्जैक्टली ये.. पर वो जो देखते हैं वैसे ही ट्रीट करते हैं वो लोग एंटी सोशल हैं। वो जो साइकेट्रिस्ट ने बात कही वो किसी न नहीं छापी। ये क्राइम भी सामाजिक वजहों से आ जाता है। एक हर्ष मंदर का आर्टिकल आया था जब निर्भया का केस चल रहा था कि Who are these boys who did this? और ये डॉक्युमेंट्री कुछ तीन दृष्टिकोण से बताती है। कि बिचारी वो लड़की.. वो तो बहुत बड़ी ट्रैजेडी ही है यार। लेकिन क्यों हुआ ये? आप फांसी दे देंगे, ये कर देंगे, वो कर देंगे.. उससे क्या। यार क्यों करते हैं लोग वो आप नहीं सोचते। “करेंगे तो हम मारेंगे..” ये सोचते हैं। क्राइम क्यों हो रहा है ये तो कहेंगे तो फंस जाएंगे क्योंकि इसमें फिर समाज को सुधारना पड़ेगा खुद को सुधारना पड़ेगा गवर्नमेंट को बहुत काम करना पड़ेगा। तो गवर्नमेंट छोटा काम कर देती है और चलो।

यहीं पर फ़िल्मों के लिए मन में बहुत सम्मान होता है। जैसे ‘आशीर्वाद’ (1968) फ़िल्म आपने देखी होगी अशोक कुमार की...
हां देखी है.. एक और फ़िल्म बनाई थी ऋषिकेश मुखर्जी ने ‘सत्यकाम’। वो फ़िल्म देखकर मेरे दोस्त (रंजित कपूर, ‘जाने भी दो यारो’ के सह-लेखक) की जिंदगी बदल गई। वो क्राइम करने जा रहा था, उसको वो फ़िल्म देखनी ही नहीं थी उसको कोई एंटरटेनमेंट वाली देखनी थी। पर वो फ़िल्म देखी उसने तो बोला “ये मैं क्या करने जा रहा हूं?” पिक्चर देखके उसने रास्ता बदल लिया। और जब ऋषिकेश मुखर्जी को सालों बाद पता चला कि एक आदमी ने अपनी जिंदगी का रास्ता बदल लिया तो वो इतने खुश हो गए कि मैं क्या बताऊं आपको। और मेरा दोस्त इसके बाद ही फ़िल्म इंडस्ट्री में आया। तो आप सोचिए ...

आप देखिए ‘आशीर्वाद’ कितनी अकल देती है। उसमें प्रांगण में खुले घूमते या अन्यथा कैदियों के बारे में जेलर (अभि भट्टाचार्य) और डॉक्टर (संजीव कुमार) जैसे पात्र विचार रखते हैं कि वे कोई शेर भालू हैं जो पिंजरे में बंद रखे जाएं। जेल के बारे में ये ही तो भ्रांति है। जैसे शरीर के रोगों के लिए अस्पताल है, वैसे ही मानसिक बीमारी के लिए जेल है। आदमी यहां आता है ताकि समाज और परिवार से दूर अपने साथ एकांत में वक्त बिता सके और फिर समाज में लौट सके। कितनी सार्थक-सुलझी सोच देकर जाने वाले थे हमारे फ़िल्मकार...
ऐसी फ़िल्में बनना बहुत जरूरी है। जैसे देखो, एक शरीर को ख़ुराक़ चाहिए, रोटी चाहिए, दाल चाहिए। वैसे भी दिमाग को भी कुछ तो चाहिए न ख़ुराक़। तो ऐसी फ़िल्में बनना जरूरी है। ऐसे न्यूजपेपर की जरूरत है, ऐसे लोगों की जरूरत है। बहुत से लोग बिचारे काम कर रहे हैं यार। अब हम भी एक हैं यार। तुम बोलोगे बदलाव नहीं आया तो नहीं आया यार। कोशिश तो करते हैं।

 आप किसपे लिखते हैं? की-बोर्ड पर या पेन से?
अरे साब मैं बहुत फास्ट टाइपिस्ट हूं। मेरे पिताजी ने बोला था, “टाइपिंग सीखो भूखे नहीं मरोगे”। तब उस जमाने में सीखा। अब भी मैं हिंदी में भी टाइप करता हूं दोनों हाथों की पांचों अंगुलियों से। अच्छा टाइपिस्ट हूं। अच्छी स्पीड भी है। कंप्यूटर पर लिखता हूं।

आप कौन सी फ़िल्मों को देखकर सबसे ज्यादा हंसे हैं?
बहुत सी फ़िल्में हैं। एक है.. फ्रैंकली में पहली या दूसरी बार बता रहा हूं जहां से मुझे डेड बॉडी का आइडिया “जाने भी दो यारो” में आया था वो एक फ़िल्म है “डेथ ऑफ अ ब्यूरोक्रैट” (1966)। क्यूबन फ़िल्म है मेरे ख़याल से। उसमें क्या हो जाता है कि वो आदमी मर जाता है। तो उसका जो पेंशन कार्ड है वो दफनाते वक्त साथ चला जाता है। अब कार्ड चाहिए तो बोलते हैं कि दफनाया है उससे बाहर निकालना पड़ेगा। उसे बाहर निकालने का जो पूरा ब्यूरोक्रैटिक प्रोसेस है तो पूरी ब्यूरोक्रेसी है यार उसमें। इसे देखकर बहुत हंसा। बहुत सी और भी फ़िल्में हैं जो आपको हंसाती हैं साथ ही सोचने पे मजबूर करती हैं। एक और पुरानी फ़िल्म है स्टैनली कुबरिक की “डॉ. स्ट्रेंजलव ऑरः हाउ आई लर्न्ड टु स्टॉप वरिंग एंड लव द बॉम्ब” (1964)।

जो बच्चे एफटीआईआई (भारतीय फ़िल्म एवं टेलीविजन संस्थान, पुणे) में एडमिशन नहीं ले सकते वो सेल्फ-स्कूलिंग कैसे कर सकते हैं?
आजकल तो फ़िल्म इंस्टिट्यूट इंटरनेट पर भी हैं। बहुत से लोग हैं जो फ़िल्मों से ही फ़िल्ममेकिंग सीखे हैं। जब आप फ़िल्म को देखते हैं फ़िल्म एप्रीसिएशन सीखना पड़ेगा। जैसे एक डॉक्टर डेड बॉडी लेकर परीक्षण करता है कि उसकी धमनियां कहां हैं, ये कहां है, वो कहां है? काट के वो देखते हैं। वैसे ही फ़िल्म का पूरा विश्लेषण करना पड़ेगा। कि ये सीन क्या करता है? ये डायलॉग क्यों है? ये पूरा डीटेल में खुद से पूछना पड़ेगा। फिर उसको मालूम पड़ेगा कि ये क्यों कैसे बनी है फ़िल्म? नहीं तो बस आप ऊपर से देख लेते हैं कि ये हो जाता है लेकिन फ़िल्म क्षेत्र में आने के लिए आपको पूरा फ़िल्म विश्लेषण करना पड़ेगा। ये सारी चीजें आज इंटरनेट पे हैं। बहुत सारे फ़िल्म इंस्टिट्यूट हैं इंटरनेट पर वो बताएंगे कि आपको क्या करना है। फिर आप करेंगे वो देखेंगे कि कैसा है।

लेकिन क्या वो महंगा नहीं होगा?
अरे वो फ्री है। मैं सब मोफत का बात कर रहा हूं। बहुत सारी हिंदी स्क्रिप्ट्स भी ऑनलाइन हैं अभी।

“जाने भी..” को छोड़ दें तो कौन सी पॉलिटिकल सटायर आपको पसंद आई है?
एक थी “तेरे बिन लादेन”। वो अच्छी है। उसमें मुझे सेकेंड हाफ में अच्छा लगा। कि वो पूरा सीआईए को इनवॉल्व करता है। एक झूठा लादेन पैदा करता है। वो फंस जाते हैं और सीआईए आ जाती है। बस अंत गड़बड़ था कि आप क्या कटाक्ष कर रहे हैं, व्यंग्य कर रहे हैं अमेरिका पर, लादेन के जरिए। और लादेन ही अमेरिका पहुंच जाता है। तो लगता है कि यार ये कहां हो गया।

“फंस गए रे ओबामा” ?
उसमें वो था न किडनैप, फिर और किडनैप। अच्छी है कॉमेडी के लेवल पर। मैंने देखी नहीं है। उसमें जो आर्टिस्ट है वो जबरदस्त है। संजय मिश्रा। जिन्होंने “आंखों देखी” की। जबरदस्त आर्टिस्ट है।

आर्टिस्ट आमतौर पर सनकी होते हैं। आपको दोस्त और परिवार वाले किस श्रेणी में रखते हैं?
ये तो उन्हीं से पूछना पड़ेगा। कभी-कभी परिचित या एक्टर या एक्ट्रेस बोल देते हैं कि सर तो वैसे हैं, पर मुझे लगता है मैं सही हूं। वैसे ये जवाब बहुत मुश्किल है।

जो युवा फ़िल्मों में आ रहे हैं उनके सामने क्या दो ही रास्ते हैं?
एक कमर्शियल फ़िल्में बनाओ या सार्थक फ़िल्में बनाकर भूखे रहो? कुछ और विकल्प है? देखो रास्ता तो अपना ढूंढ़ना पड़ेगा। सफलता की कोई गारंटी नहीं है। फ़िल्म लाइन में यही है। क्योंकि एक डायरेक्टर बनता है तो सौ खो जाते हैं। निर्णय तो आपको लेना पड़ेगा। कमजोर दिल वाले हैं वो खो जाते हैं। जो बनते हैं बन जाते हैं, जो नहीं बन सकते नहीं बनते। ये ट्रैजेडी ही है। क्या करें?

Kundan Shah is most known for his classic comedy Jaane Bhi Do Yaaro (1983). His other notable works are - TV series Wagle Ki Duniya (1988) and Nukkad (1986), Parsai Kehte Hain. He's also made Bollywood films such as Kya Kehna (2000) and Dil Hai Tumhara (2002). His most recent film P Se PM Tak released on 29 May. Like Jaane Bhi.. it is a political satire.
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Thursday, May 21, 2015

कुछ नहीं है, सब औसत काम कर रहे हैं.. जिसको जो समझ में आ रहा है, कर रहा है.. बस ; मुझे नहीं लगता एक भी शख्स ऐसा है जो पेज टर्निंग काम कर रहा है: हिमांशु शर्मा


 Q & A. .Himanshu Sharma, Writer of – Tanu Weds Manu, TWM Returns, Ranjhanaa.
 
Kangana Ranaut, in a still from Tanu Weds Manu Returns.
‘क्वीन’ के बाद कंगना रणौत को पीछे मुड़कर नहीं देखना पड़ा। उन्हें शीर्ष कलाकारों ने निजी तौर पर बधाई दी। अपनी कतार में आने का आभास दिया। लेकिन ‘तनु वेड्स मनु’ न होती तो ‘क्वीन’ भी न होती और कंगना को सकारात्मक छवि नहीं मिलती। एक बाग़ी, खिलंदड़, वर्जित कार्य करने वाले ऐसी नायिका पहले यूं न दिखी। बदल रहे वक्त में हिमांशु शर्मा ने तनु का पात्र सही टाइमिंग से लिखा। हालांकि फिल्म के अंत को लेकर आपत्तियां हैं लेकिन शुरुआत के लिए ही सही फिल्म उपलब्धि थी। बहुत समय बाद लोकगीतों वाली मिठास “तब मन्नू भय्या का करिहैं” गाने में चखी गई। कानपुर या अन्य उत्तर भारतीय शहरों के मध्यम वर्गीय लोगों और उनके संतोषों का चित्रण भी मौलिक तरीके से पेश हुआ।

बाद में निर्देशक आनंद राय के साथ हिमांशु की लेखनी ‘रांझणा’ लेकर आई। बनारस और दिल्ली स्थित देसी पात्रों की कहानी। अब ‘तनु वेड्स मनु’ रिटर्न्स ला रहे हैं। शुक्रवार 22 मई को रिलीज से पहले हिमांशु से बात हुई। वे मृदुभाषी, खुले, विनम्र, आत्म-विश्वासी और चतुर हैं। वे लखनऊ से ताल्लुक रखते हैं। दिल्ली में कॉलेज की पढ़ाई कर चुके हैं। ‘टशन’ में उन्होंने असिस्टेंट डायरेक्टर के तौर पर सीमित काम किया। फिर फिल्म लेखन की ओर मुड़ गए। ‘तनु वेड्स मनु रिटर्न्स’ के बाद वे आनंद के साथ एक अन्य फिल्म पर काम करेंगे। वे बतौर निर्देशक भी एक फिल्म बनाएंगे। ये भी लखनऊ में ही स्थित होगी। स्क्रिप्ट लिख रहे हैं। आने वाले पांच-छह वर्षों के लिए उनके जेहन में कुछ कहानियां हैं।

उनसे बातचीत:

संक्षेप में या विस्तार से अपनी अब तक की जर्नी को कैसे देखते हैं?
मुझे लगता है अभी मैंने जीवन में उतना काम किया नहीं है। कि मुड़कर देखूं और सोचूं कि जर्नी कैसी रही है। मेरे पास बहुत बॉडी ऑफ वर्क नहीं है। किसी एक लेवल पर निरंतरता के साथ अच्छा काम करने के लिए आपको कुछ और फिल्में चाहिए होती हैं। जितने भी बड़े राइटर्स हैं उनका एक बॉडी ऑफ वर्क रहा है। मुझे नहीं पता कि अभी मेरी जर्नी को जर्नी कहा भी जाना चाहिए या नहीं। ये महज तीसरी फिल्म है मेरी जो मैंने लिखी है। ये जरूर कहूंगा कि पहली फिल्म में भी वही लिखा जो मुझे ठीक लगा कि हां ये मजा दे रहा है, या ये मुझे उदास कर रहा है, या ये मुझे हंसा रहा है। मुझे हंसा रही है तो कहानी सबको हंसाएगी, उसी उम्मीद के साथ मैंने कोई भी अपना काम किया है। तो ‘रांझणा’ और ‘तनु मनु-1’ तक तो ठीक ही लग रहा है मामला। अब बाकी इसमें देखते हैं कितना पसंद आता है सबको।

आपकी पहली फिल्म थी ‘स्ट्रेंजर्स’, उसका एक डायलॉग है (जिमी शेरगिल का किरदार बोलता है), “मुझे लगता है कि लिखने में और शिट करने में कोई खास फर्क नहीं होता। ये एक ही चीज है। जो आपको परेशान कर रहा है वो सब आप निकाल देते हो। ये भी राइटिंग के साथ है”..
(हंसते हुए) दरअसल वो कॉन्सेप्ट मेरा था लेकिन उसे लिखा मेरे एक दोस्त हैं गौरव सिन्हा उन्होंने था। स्क्रीनप्ले और डायलॉग्स पूरे उनके थे। लेकिन, हां वो बड़ी अजीब लाइन है..

मैं इस संदर्भ में पूछ रहा था कि ‘तनु वेड्स मनु’ लिखने से पहले क्या कुछ परेशान कर रहा था या सिर्फ लोगों का मनोरंजन करना था?
कोई ऐसी नीड नहीं थी। पढ़ रहा था दिल्ली में। यहां काम ढूंढ़ रहा था। असिस्टेंट डायरेक्टर बना। वाहियात किस्म का असिस्टेंट डायरेक्टर था मैं। बहुत ही बुरा। मैंने ‘टशन’ में असिस्ट किया विजय कृष्ण आचार्य जी को। उस दौरान मुझे लगा कि भई ये काम तो नहीं हो सकता। अगर मुझे फिल्म डायरेक्ट करनी हो और मुझे ऐसा एडी (असिस्टेंट डायरेक्टर) मिले तो मैं तो गोली मार देता। मैं बहुत ही बुरा था। मेरे पास और कोई चॉइस नहीं थी। लिखने का मन था तो उसके बाद लगा कि भई एडीगिरी तो नहीं हो सकती। तो लिखना शुरू किया फिर ‘तनु वेड्स मनु’ लिखी। ठीक रहा उसका हिसाब-किताब। तो ‘रांझणा’ लिखी फिर। ऐसा कुछ नहीं था कि उथल पुथल चल रही है कहानी कहने की या कुछ बात बोलने की। ऐसा नहीं है। वो बड़ा मजबूरी का काम था। कि भईया ये काम नहीं हो सकता, ये काम कर लो। हां, ‘राझंणा’ के वक्त... मैं ये जरूर कहूंगा कि ‘तनु-मनु’ लिखने के बाद मैं जिस जगह खुद को, अपने दिमाग को, मन को पा रहा था वहां मैं कुछ ऐसा अटेंप्ट करना चाहता था जो इमोशन और ड्रामा के लिहाज से बहुत ओवरवेल्मिंग (भावुक, जोरदार) हो। तो वो कहानी बहुत दिल से निकली। क्योंकि सब कह रहे थे कि ‘तनु मनु’ चल गई है तो तुम्हे ‘टू’ (सीक्वल) लिखनी चाहिए। या कुछ इस जॉनर (श्रेणी) का लिखना चाहिए। लेकिन मैं ‘रांझणा’ लिखना चाहता था और वो बहुत इमोशनल नीड थी मेरी। वो कहानी आजमाने की। ‘तनु मनु’ लिखते वक्त मैं सिर्फ असिस्टेंट डायरेक्शन से भागना चाहता था।

तनु का किरदार आपने क्यों रचा? क्योंकि जैसे सिंगल स्क्रीन के आधारभूत दर्शक को तब देखा, वो एक बार के लिए चकरा गया कि ये लड़की कर क्या रही है? इस लड़के से इतना बुरा सलूक क्यों कर रही है? और हम इतनी बिगड़ी हीरोइन वाली फिल्म क्यों देख रहे हैं? इससे पहले हीरोइन उन्होंने ऐसी देखी थी मसलन, दक्षिण की तकरीबन सभी फिल्मों की जो अपनी मूर्खता और नाज़-नखरे से हीरो को रिझाती रहती है और दर्शक भी खुश होता है। वो भी ये समझता है कि मैं राजकुमार हूं और ये मुझे एंटरटेनमेंट दे रही है। कमर्शियल सिनेमा के उन पारंपरिक दर्शकों के बारे में सोचा था कि लिख रहे हैं और प्रतिक्रिया कैसी आएगी?
औरत या मर्द होने से पहले इंसानी तौर पर आप उस चीज को देखें तो मुझे ऐसा कोई बहुत चमत्कारिक काम नहीं लग रहा था। मतलब मेरी खुद की कॉलेज के टाइम में ऐसी बहुत सी दोस्त रही हैं। और एक छोटा सा एनार्किक नेचर होना या एक तरीके की खुदपसंदी कहना ज्यादा बेहतर होगा इसे.. खुदपसंदी ऐसी है कि बाकी कुछ दिखाई नहीं दे रहा है। तो मुझे ये बड़ा नेचुरल, बहुत ह्यूमेन लगा। बहुत ही आम लड़की जैसा लगा। और मुझे लगता है बहुत सारी चीजें हमारी फिल्मी समझ से बनती हैं। क्योंकि हमने ऐसा खुद देखा है तो वही लिख रहे हैं। या वही बना रहे हैं। अपना जो देखा है आप उसे एक बार ट्राई तो करिए। और मेरा ये सिंपल रूल है कि आपको खुद ये काम करते हुए मजा आ रहा है ... मैं कोई प्रशिक्षित राइटर नहीं हूं, मैंने कहीं से कोई ट्रेनिंग नहीं ली है ऐसे ही काम चल रहा है भगवान भरोसे - तो उसमें ये है कि एक सीन के बाद दूसरा सीन देखने में अगर मुझे मजा आ रहा है तो बाकी लोगों को भी आएगा यार। मैं थोड़े ही न मार्स (मंगल) से आया हूं। जमीन से ही उठा हुआ इंसान हूं। लखनऊ में परवरिश हुई। 120-130 करोड़ की जनता के बारे में सोचकर अपना काम करेंगे तो कनेक्ट करेगा। मैंने जब तनु का किरदार लिखा तो मेरे मन में ऐसा नहीं था कि ओ, मैं बड़ा पाथब्रेकिंग कुछ लिख रहा हूं। मुझे यही आता था। मुझे ये ही लड़की पता थी। मुझे ये ही लड़की लिखनी थी। उसके अलावा कुछ और लिखने के काबिल भी नहीं था। तो आई थिंक उसमें कोई प्लानिंग नहीं थी ऐसी। मुझे जो समझ में आया मैंने वो काम किया। अब बाकी वो दस में से छह लोगों को पसंद आया है कि दो लोगों को, वो अलग बात है।

फिल्म की आलोचना भी हुई। कौन सी आलोचना आपको उचित लगी? लगा कि आपको आने वाले काम में कुछ बेहतर करने में मदद करेगी?
ज्यादातर क्रिटिकल इवैल्युएशन (आलोचनात्मक मूल्यांकन) पर ध्यान देना मैं बेहतर समझता हूं। जो चीज पसंद आई वो तो बहुत अच्छी बात है, हमें थैंकफुल होना चाहिए। लेकिन पसंद आई ये दोबारा, बार-बार पढ़कर के आप क्या कर लेंगे? उस पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए कि कौन सी चीजों ने काम नहीं किया। बहुत सारी शिकायतें थीं, अच्छे-खासे लोगों ने दिक्कतें जताई थीं। चाहे वो ‘रांझणा’ हो या ‘तनु मनु’ हो, दोनों में ही ऐसा हुआ। ..पर मुझे लगता है एक क्रिटीक और एक राइटर में फर्क होता है। मुझे लगता है एक क्रिटीक का एक ऑब्जेक्टिव व्यू (वस्तुपरक नजरिया) होता है। एक लिट्ररेरी डिसकोर्स के साथ वो उसको देखता है या समझ उसकी एक अलग तरीके की होती है बनिस्पत उस शख्स के जो खुद लिख रहा है। मुझे नहीं लगता कि दुनिया में कोई अनबायस्ड राइटिंग (पूर्वाग्रह-रहित लेखन) होती है। आपका झुकाव कहीं न कहीं होगा! बिलकुल होगा! आपका अपना अनुभव, आपका अपना चरित्र झलकेगा और वो होना चाहिए। आप निबंध नहीं लिख रहे। आप एक कहानी लिख रहे हैं। तो उसमें कुछ अच्छी चीजें भी होंगी और कुछ बुरी चीजें भी होंगी। और मुझे लगता है वो इमपरफेक्शन जो है वो भी आपका ही हिस्सा है। उससे आप घबराएं मत। उससे दिल छोटा करने की जरूरत नहीं है। हां, ये भी है कि आप मुंह भी न मोड़े उस आलोचना से। आपको लगता है कि आपकी राइटिंग में आगे क्राफ्ट के लिहाझ से आलोचना मदद कर पाएगी तो आप निश्चित तौर पर उसे समझें।

एक आलोचना ये रही कि अंत में आखिर आपने तनु को संस्कारी बना ही दिया? शादी ही आखिरी रास्ता रखा? अगर आप उसे वैसा ही रहने देते तो क्या ये फिल्म खास नहीं हो जाती?
रैट्रोस्पेक्ट में सोचूं तो हां बिलकुल, कहानी को ऐसे भी रखा जा सकता था। मेरे दिमाग में नहीं आया। शायद मुझे यही करते हुए ज्यादा यकीन आ रहा था अपनी कहानी पर। देखिए साब, इसी कहानी को कोई एक राइटर दूसरे तरीके से लिखेगा, एक डायरेक्टर दूसरे तरीके से बनाएगा। इसी कहानी को मैं इस तरीके से लिखना पसंद करूंगा और आनंद राय इसी तरीके से बनाना पसंद करेंगे। तभी तो इतनी मात्रा में भिन्न-भिन्न फिल्में हैं। क्योंकि इतने सारे दृष्टिकोण हैं। मुझे लगता है ऐसा हो सकता था लेकिन हो तो कुछ भी सकता था। होने को क्या नहीं हो सकता? किसी भी कहानी में। मैंने वही लिखा जिसमें मेरा खुद का भरोसा था।

तनु के किरदार को लेकर कंगना ने आपसे क्या चर्चा की? और आमतौर पर फिल्म के कलाकार स्क्रीनराइटर से मिलकर अपने रोल को कितना समझते हैं?
बिलकुल, एक्टर्स मिलते हैं, चर्चा करते हैं। एक्टर्स अमूमन अब खुल गए हैं। उनमें एक स्तर की इंटेलिजेंस, स्मार्टनेस, दृष्टिकोण, मैक्रो लेवल पर कहानी को समझने की ताकत ... ये आई है। बढ़ी है। आपने भी देखा होगा कि अचानक से जो स्टार परसोना हुआ करता था वो बदला है। सोशल मीडिया के उदय के बाद से। एक कनेक्ट अलग हुआ है, स्टार्स का। उनका तरीका अलग हुआ है अपने दर्शकों से बात करने का। मुझे नहीं लगता कि अब कोई भी सिंहासन पर ऊपर बैठा है जिस पर 60 और 70 के दशक में स्टार्स बैठा करते थे। आज की डेट में ट्विटर पर आप अमिताभ बच्चन साहब को भी बोल देते हैं, शाहरुख साहब को भी आप कुछ बोल देते हैं, रणबीर कपूर से भी आप कुछ बोल सकते हैं। और वो जवाब भी देते हैं आपको। इनकी अप्रोच बहुत बदली है अपने स्टारडम को लेकर। इसी का परिणाम मैक्रो लेवल पर कहानी में उनकी दिलचस्पी के रूप में आया है। कंगना जी की बात करूं तो उनकी कहानी को लेकर बहुत अच्छी समझ है। किरदार को लेकर हमारी पहली फिल्म में भी बात हुई थी। बहुत खुलकर बात हुई। उन्होंने अपने बिंदु रखे। वो सारी बातें जो उन्हें लग रही थीं। और स्क्रिप्ट ही है, कुरआन तो है नहीं कि ऊपर से लिखकर आई है। जिस एक्टर को परफॉर्म करना है वो स्क्रिप्ट से कम्फर्टेबल होना चाहिए। एक बात मोटा-मोटी समझ में आ गई उसके बाद लाइन्स तो बदली जा सकती हैं।

एक लेखक या निर्देशक (भविष्य के) के तौर पर आपकी आंखों में आज के किन एक्टर्स के देखकर चमक आती है जो आपके किरदारों को एक अलग ही धरातल पर ले जा सकते हैं?
मुझे लगता है कि रणबीर कपूर बहुत कमाल के एक्टर हैं। उनसे मिलना भी हुआ है। मुझे जितनी समझ उनकी दिखती है या उनके काम में दिखती है वो बेदाग़ है। वो बहुत नया काम कर रहे हैं। भविष्य में अगर उनके काबिल स्क्रिप्ट हुई तो जरूर उनके साथ काम करना चाहूंगा।

‘तनु वेड्स मनु’ की तेलुगु रीमेक ‘मि. पेल्लीकोडुकू’ से आप कितने संतुष्ट थे? क्या आपको नहीं लगता उसमें आपके पात्रों की सेंसेबिलिटीज इतनी बदल गई थीं कि मर गई थीं?
मैंने ट्रेलर देखा था उसका। मुझे लगा कि यार बेकार में पैसे खर्च किए और राइट्स लिए। ऐसे ही बना लेना चाहिए था। ये तो वो फिल्म है ही नहीं। आपने यूं ही पैसे खर्च कर दिए।

‘तनु वेड्स मनु रिटर्न्स’ की कहानी वाकई में आपको कहनी थी कि कमर्शियल वजहों से ही लिखी?
मुझे कहनी ही थी। मजेदार बात बताता हूं आपको। ‘तनु मनु’ के बाद सबने बोला कि ये काम कर रही है तुम पार्ट-2 लिख दो। लेकिन कुछ दिमाग में आ ही नहीं रहा था। मैंने कहा क्या लिख दो? खत्म है ये कहानी। तब मैं ‘रांझणा’ लिखना चाहता था। लिखी। फिर ‘रांझणा’ के दौरान दिमाग में ये कहानी आई। एक कॉन्सेप्ट बना। मुझे लगा कि हां यार ये मजेदार है। ये कहानी कही जा सकती है और मेरा कहने का मन है। इसमें एक पैसे की भी दूसरी बात नहीं थी। अगर कमर्शियल पहलू की वजह से बनानी होती तो मैं तुरंत ही बना देता। ‘तनु मनु-1’ के बाद ये आ जाती। ‘रांझणा’ बनाने के बाद जब लगा कि इस दुनिया में जाया जा सकता है तभी गए। वरना मैं कहां से लिख लेता। जबरदस्ती की कहानी तो दिखाई दे जाती।

Characters of Datto and Manu in a scene from the film.
इसमें दत्तो का किरदार आपने हरियाणा का ही क्यों लिया, किसी और प्रदेश का रख सकते थे?
आप फिल्म देखेंगे तो बिलकुल समझ आएगा कि ये हरियाणा से ही क्यों है। ये कहीं और की नहीं हो सकती थी। ये बहुत नेचुरल और ऑर्गेनिक तरीके से आया, ज्यादा गणित लगानी ही नहीं पड़ी। कि ये कहां की हो, अरे इसे वहां का बना दें तो ज्यादा मजा आएगा। ऐसा बिलकुल नहीं था। मुझे लगता है कोई भी कहानी अपना चरित्र और अपनी पृष्ठभूमि खुद ही बता देती है। ‘रांझणा’ जैसी कहानी लखनऊ में नहीं घट सकती थी, ‘तनु मनु’ जैसी कहानी बनारस में नहीं घट सकती थी। क्योंकि बनारस उतनी इंटेंसिटी देता है जो ‘रांझणा’ में थी। एक इमोशनल ओवरवेल्मिंगनेस देता है। और कुंदन का चरित्र जो है वो लखनऊ में नहीं पाया जाता। वो बनारस की पैदाइश है। वो बनारस में ही पनप सकता है। ‘तनु मनु’ की कहानी भी लखनऊ में ही सेट हो सकती थी। इसलिए दत्तो का कैरेक्टर सिर्फ हरियाणा से ही आ सकता था। मेरी समझ से कम से कम। तो बहुत नैचुरली आया है वो। इसके लिए मैंने कोई एक पैसे का गणित नहीं लगाया है।

पिछली ‘तनु..’ में ‘जुगनी..’ गाना रखा गया था, इसमें भी ‘बन्नो..’ गाने में नायिका के लिए संबोधन जुगनी है। क्या जुगनी का कोई संदर्भ है, कोई बैक स्टोरी है?
जुगनी तो हमारा फोक का ही गाना है पंजाब का। और जुगनी किसी भी संदर्भ में बहुत तरीके से इस्तेमाल की गई है। वो कभी आपकी माशूका होती है, कभी कुछ और होती है, कभी सिर्फ एक विचार होती है। आपको जो बात कहनी है, वो हर बात जुगनी कह सकती है। जुगनी का कोई चेहरा नहीं है। वो विचारात्मक लेवल पर ऑपरेट करने वाली टर्म है। आपको अगर डर लग रहा है सीधे कहने में तो जुगनी के नाम पर कह दीजिए। चाहे आरिफ लोहार हों या पंजाब के दूसरे लोक गायक हों, उनके द्वारा जुगनी का अलग-अलग तरह से, अलग-अलग रेनडिशन में अलग-अलग बात के लिए इस्तेमाल किया गया है। ये तो बहुत पारंपरिक विचार है। कि जुगनी है जो ये बात कह सकती है। जुगनी कौन है, मुझे लगता है ये तो किसी को नहीं पता।

पहली फिल्म में आपने ‘जुगनी..’ गाना रखा, सीक्वल में ‘बन्नो..’ गाना है। इन पुराने गीतों को रिवाइव करने की वजहें थीं?
‘बन्नो..’ ये रहा कि कनिष्क और वायु जो फिल्म के म्यूजिक डायरेक्टर हैं, हमसे फिल्म के मिड में मिले। बहुत सारे म्यूजिक डायरेक्टर्स अपना कुछ-कुछ भेज रहे थे। साथ काम करने का मन था सभी का। ये गाना सुनते ही हम लोगों को बड़ा मजेदार लगा। और फिल्म की दुनिया का लगा। ऐसा नहीं लग रहा था कि अरे, जबरदस्ती कोई गाना ठूसना पड़ रहा है। बहुत नेचुरल ऑर्गेनिक तरीके से वो उस फिल्म में घुल रहा था। तो ले लिया। और एक ट्रेडिशनल वैल्यू भी थी उसकी। फोक बेस्ड गाना है वो।

पहली फिल्म में ‘रंगरेज..’ गाना था इसमें ‘घणी बावरी..’ है... क्या आपको लगता है धुन प्रधान भविष्य में लिरिक्स बचे रह पाएंगे?
राजशेखर जो लिरिक्स लिखते हैं हमारे, वे कॉलेज के वक्त से साथ हैं हमारे। हमेशा उन्होंने विचार पर गाना लिखा है। शब्दावली पर वो आदमी उतना निर्भर नहीं रहता जितना विचार पर रहता है। उनसे हमेशा एक नया थॉट मिलता रहा है चाहे वो ‘रंगरेज..’ हो, ‘घणी बावरी..’ या ‘ओ साथी मेरे..’ जो सोनू जी ने गाया है। वो विचार प्रधान लिखते आए हैं और हमें भी वही जंचता है। कुछ बात जैसी बात हो तो आप बोलिए।

‘बन्नो..’ गाने में बोल हैं – ‘बन्नो तेरा स्वैगर लागे सेक्सी..’ यहां सेक्सी शब्द के मायने क्या हैं?
मेरे लिए सेक्सी का अर्थ था तेवर। एक टशन जो होता है न। बन्नो की इस स्वैगर में टशन है यार। एक बात है इसमें। एक उम्फ फैक्टर है। तो मुझे लगता है हमने उसे यूं लिया था।

‘रांझणा’ में एक दृश्य है जहां जेएनयू (जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली) में धनुष को स्टूडेंट घेर लेते हैं कि वो चोर है। और सुबह तक बैठकर ये जान पाते हैं कि वो चोर क्यों बना क्योंकि वो गरीब है? क्या ये तंज जरूरी था और क्या जेएनयू में होने वाली बौद्धिक चर्चाओं को आप सतही और खोखली मानते हैं?
नहीं, नहीं ये वाकया सच में हुआ है। मैं जेएनयू या वहां के बौद्धिक एलीट या नॉन-एलीट, या शिक्षाविदों के खिलाफ हूं ऐसी कोई बात नहीं है। पर ये वाकया (फिल्म वाला) वहां घटा है और मुझे पता है इसीलिए मैंने उसको लिखा।

मतलब ओवरऑल जेएनयू या वहां के विचारों का ये प्रतिनिधित्व नहीं करता?
मुझे लगता है हिंदुस्तान का सबसे प्रेमियर इंस्टिट्यूट है वो। वहां से जितने लोग निकले हैं उनकी राजनीतिक समझ और उनका योगदान अभूतपूर्व है। इसके लिए तो उन्हें किसी के सर्टिफिकेट की जरूरत नहीं है। उस किस्से से कोई लेना देना नहीं था। वो चरित्र जो अभय देओल का था मुझे लगा कि ये इस दुनिया में एक अच्छापन देगा।

आनंद से आप पहली बार कब मिले थे? आप दोनों इतने लंबे भागीदार किन कारणों से बन पाए?
मैं 2004 में पहली बार उनसे मिला था। वो एक कंपनी में कुछ नौकरी टाइप वाला काम कर रहे थे। उससे पहले उन्होंने बहुत सारा टेलीविजन किया था। और अब उन्होंने अपना टेलीविजन करना छोड़ दिया था, वो प्रोड्यूस भी कर रहे थे, डायरेक्ट भी कर रहे थे और काफी अच्छा कर रहे थे। पर वो भी उकता गए उसी काम को करते हुए। वो भी ऐसे ही घूम रहे थे। मैं 2004 में बॉम्बे पहुंचा ही था। उनसे मुलाकात हुई तो उन्होंने कहा कि फिल्म तो यार ऐसी कुछ है नहीं पर मैं बनाने की कोशिश कर रहा हूं। बाकी तुम बता दो तुम्हारा खर्चा कितने में चल जाएगा महीने में। मैं उतने का जुगाड़ करवा देता हूं तुम्हारा और कुछ करते हैं साथ में। तो उस तरीके से शुरू हुआ। बट, मुझे लगता है वो एसोसिएशन चलने का एक बहुत बड़ा कारण ये रहा कि मैं कभी भी कमीशन्ड राइटिंग नहीं कर पाया। कि मतलब किसी का एक सबजेक्ट हो और आप बस स्क्रीनप्ले लिख दीजिए, डायलॉग लिख दीजिए। शायद इसीलिए न मैं बाहर काम भी नहीं कर पाया। मैं वही लिख सकता हूं जो मेरा मन है। और आनंद अपना मूड बना लेते हैं वही काम करने का जो मेरा मन है। तो अगर इसके बाद मेरा मन एक एक्शन फिल्म लिखने का है तो दो-तीन महीने में ही जब तक मैं इस कहानी पर काम कर रहा होऊंगा वो अपना मन बना लेंगे कि अगली एक्शन बनानी है। एक तरीके से उनका मन नहीं होता मेरा मन हो जाता है कि किस जॉनर में काम करना चाहिए। मेरा मन था ‘रांझणा’ करने का और उन्होंने अपने मन में उस तरीके से ढाल लिया। एक ट्रैजिक कहानी लिखने का मेरा मन था, वो उनका नहीं था पर वो ढाल लेते हैं खुद को। और वो उस तरह के नहीं कि बोले, दस सीन हो गए आओ बैठ कर बात करें। नहीं। पूरी स्क्रिप्ट जब मैं सुनाता हूं तब वो सुनते हैं। निश्चित तौर पर हम रोज मिलते हैं, रोज ऑफिस में बैठकर बातें होती हैं। खाना साथ हो जाता है। उन सबके चलते एक बातचीत रहती है। वो दुनिया मैं उनको दिखा देता हूं। पर जो सीन-दर-सीन प्रोग्रैशन कहानी का वो उन्हें बाद में ही पता चलता है। और उस पर मुझे नहीं याद उन्होंने कभी कोई बदलाव बताए हों, उन्हें दिक्कत लगी हो। लेकिन उनको जो चीज करनी होती है उसे वो करते हैं। यही सबसे बड़ी वजह है कि हम बहुत अच्छे से घुलते हैं। मुझे इसीलिए उनके साथ काम करने में हमेशा मजा आया है।

Himanshu with Anand.
दोनों में कोई रचनात्मक मतभेद नहीं होते? होते हैं तो सुलझाते कैसे हैं?
होते हैं बिलकुल होते हैं, जैसे सबके साथ होते हैं। वो जिस किस्म के डायरेक्टर हैं उन्हें जोर किसी चीज पर अच्छा नहीं लगता। जैसे, आपको लगता है कि कहानी में बहुत भारी ट्विस्ट है, वो उसे ऐसे पेश करते हैं जैसे कोई बात ही न हो। और जो आपको एवेंई सी बात लगती है उसे वे बड़ा बना देते हैं। तो उनका एक बड़ा रोचक तरीका है काम करने का। उससे कई बार नाइत्तेफाकी रहती है मेरी। उन चीजों को लेकर हमारी कई बार बहस हुई है। लेकिन वो ज्यादा-कम बहस तक ही रही है। उसकी वजह से ऐसा कोई अंतर नहीं आ गया।

वो कौन सी घटना, किताब या बात थी जिससे आप फुल टाइम राइटर बने?
सच बताऊं तो ऐसा कुछ न था। ऐसा तो था नहीं कि मैं बड़ा इलाहाबाद का कलेक्टर लगा था और छोड़कर आ गया। कॉलेज खत्म किया। फिर एक साल एनडीटीवी में काम किया। वहां एक हेल्थ शो लिखता था मैं। नॉन-फिक्शन काम में मजा नहीं आया, बॉम्बे आ गया। कुछ दोस्त आ रहे थे। उनके साथ आ गया। कुछ दिन असिस्टेंट डायरेक्शन किया। उसमें लगा कि यार ये काम मेरी सर्वश्रेष्ठ कोशिश नहीं है। .. फिर लिखने का मन था। कि यार लिख सकता हूं कोई कहानी। कहानियों के प्रति एक रूझान रहा है। लिट्रेचर का स्टूडेंट रहा हूं। तो उस तरीके से एक झुकाव था लिखने पे। मेरे पास ऐसा कोई भारी कारण नहीं है कि मैं क्यों लिख रहा हूं और न मैं सोचता हूं इस तरीके से। मुझे कतई नहीं लगता कि बड़ा भारी काम आप कर रहे हैं फिल्में बनाके। इससे बेहतर और जरूरी काम भी हैं दुनिया में। अभी मेरी किसी से यही बात हो रही थी कि इतना घमंड और इतना इतराना, ये किस बात का? आप पेट्रोल नहीं पैदा कर रहे न। स्टील नहीं बना रहे। देश आप पर निर्भर नहीं है। आप अच्छे समय के दोस्त हैं। आप लेजर (आनंद, विलासिता) बिजनेस में हैं। जब लोगों के पेट भरे होंगे, उनको तब आपकी याद आएगी। पहले बंदर नाचता था, भालू नाचता था। अब आप ये करके दिखा दीजिए।

अपने परिवार के बारे में कुछ बताएं। और परवरिश के दौरान की वो चीजें या वाकये जिन्होंने आपको आज ऐसा बनाया?
मैं एकमात्र हूं घर में जो फिल्मों में हूं। बाकी मेरे घर में सारे ही गवर्नमेंट जॉब्स में रहे। मेरे पिताजी उत्तर प्रदेश पर्यटन विभाग में थे। दो साल पहले रिटायर हुए। मेरी मम्मी हाउसवाइफ हैं। मैं सबसे बड़ा हूं बच्चों में, उसके बाद एक बहन है और एक भाई है। बहन मेरी सिंगापुर में सेटल्ड है और भाई इंजीनियर है। और आप यकीन जानिए ग्रैजुएशन सैकेंड ईयर तक मैं यूपीएससी की तैयारी कर रहा था। पर उस दौरान मैं थियेटर भी करने लगा था। किरोड़ीमल कॉलेज में जहां से मैंने अपना ग्रैजुएशन किया। वहां उनका थियेटर ग्रुप था द प्लेयर्स। एमेच्योर लेवल का ग्रुप है ये। प्रफेशनल नाटक नहीं होते। पर वो तीन साल मेरी जिंदगी के निर्णायक बिंदु हैं। वहां पर जाकर बहुत सीखा। वहां स्टाफ एडवाइजर थे केवल अरोड़ा। उन्होंने द प्लेयर्स के सारे ही लोगों की जिंदगी को बहुत प्रभावित किया। उससे पहले लखनऊ में ही मैंने स्कूलिंग की थी। पर वहां आकर के... वो आपको ये नहीं बताते कि कैसे बेहतर एक्टर बन जाएं या कैसे बेहतर राइटर बन जाएं या कैसे बेहतर स्टेज डायरेक्टर बन जाएं लेकिन एक बेहतर इंसान बनना, एक बेहतर सोच आना वो उस संस्था ने जरूर सिखाया। हम सभी को। राजशेखर जो हमारी फिल्म के गीतकार हैं, वो भी वहीं से हैं। और काफी लोग हैं। विजय कृष्ण आचार्य वहीं से हैं। कबीर खान जो हैं, वो वही से हैं। तो बहुत कमाल के वो तीन साल गुजरे मेरे। और उसमें काफी कुछ बदला। उससे पहले निश्चित तौर पर एक जबान, एक लहजा, स्मॉल टाउन की तमीज़ लखनऊ से ही आई। उस सिटी का बहुत एहसानमंद हूं।

बचपन में आप क्या पढ़ते थे? लिट्रेचर, कॉमिक्स? मम्मी या दादी-नाना कुछ कहानी सुनाते थे?
हम लखनऊ में रहते थे। मेरे दादा-दादी, मतलब मेरे पिताजी दिल्ली से हैं। मम्मी मेरठ से हैं। हम मई-जून की छुट्टियों में वहां जाया करते थे। कॉमिक मैंने बहुत पढ़ी। हिंदी कॉमिक्स मतलब ध्रुव, नागराज, चाचा चौधरी उसे पढ़ने के लिए मैं बहुत पिटा हूं। और उस समय यकीन जानिए सपने में भी नहीं था कि फिल्म्स या फिल्म राइटिंग या फिल्म डायरेक्शन या इस तरीके के क्षेत्र में जाना कुछ नहीं था। मुझे लगता है कि आज के दौर में इतने एवेन्यूज यंग जेनरेशन को पता हैं पर तब 90 के दशक में डॉक्टर, इंजीनियर और यूपीएससी के अलावा क्या होता था? मसलन, जर्नलिज्म को ही ले लीजिए। कौन बोलता था कि मैं जर्नलिस्ट बनना चाहता हूं? ये इतने सारे विकल्प, एवेन्यूज बहुत बाद की बातें हैं।

अवचेतन (सब-कॉन्शियस) में आप वो जो कॉमिक्स बचपन में पढ़ते थे, आज जब लिखने बैठते हैं तो बहुत हेल्प होती है। कि अंततः ऐसे ही आप रच पाते हैं चीजें। इतना सब पढ़ा है, वो न पढ़ा होता तो शायद न लिख पाते।
हां, आई एम श्योर। सब-कॉन्शियस लेवल पर ऐसा जरूर होगा। लेकिन मैंने कभी इस पर ध्यान नहीं दिया कि मैं किन कारणों से ऐसा कर पा रहा हूं या नहीं कर पा रहा हूं। मुझे लगता है कि एक किस्सागोई वाली जो बात होती है वो उत्तर प्रदेश में आपको दिख जाएगी। टोटैलिटी में आप कह सकते हैं कि यूपी का आदमी बड़ा आलसी होता है और बातों में बड़ा मजा आता है उसे।

प्रतिभाशाली भी होते हैं।
बस वो थोड़े मेहनती हो जाएं तो बहुत अच्छा होगा। मैं उस मामले में टिपिकल यूपी से ही बिलॉन्ग करता हूं। खासा आलसी इंसान हूं। पर हां, वो किस्सागोई की बात होती हैं न कि बैठे हैं चाय पी रहे हैं और सरकारें बन गईं, सरकारें गिर गईं बातों में हीं।

आपको लेकर माता-पिता के कुछ सपने थे जो फिल्मों में आने से टूटे? और जब फिल्मों में आने का उन्हें कहा तो उनकी प्रतिक्रिया क्या थी?
सारे ही लोग चाहते थे कि यूपीएसी दो और यूपीएससी तुम्हे सीरियसली करना चाहिए। पर मेरे पिताजी काफी लिबरल टाइप के आदमी हैं। बहुत सज्जन इंसान हैं, बहुत पेशेंट हैं। उन्होंने मेरे को एक ही बात बोली थी जो बहुत सही थी कि देखो बेटा तुम लाइफ में जो कर रहे हो, ठीक है कर लो। तुम्हारी अपनी सोच है। पर बात ये है कि कल को अगर फिल्म इंडस्ट्री में जाकर के तुम बहुत नाम कमाओ और अवॉर्ड मिले तुम्हे तो तुम स्टेज पर मेरा नाम मत लेना। पर अगर तुम भीख मांग रहे हुए वहां वीटी स्टेशन पे तो भी मेरा मत लेना। तब ये न बोलना कि यार पिताजी आप तो उमर में बड़े थे, आपको समझाना चाहिए था। अपनी फेलियर के भी तुम जिम्मेदार होगे, अपनी सक्सेस के भी तुम्ही होगे। बाकी जो मन लगे तुम समझदार हो, जो करना है करो।

मां ने कुछ नहीं कहा?
मम्मी का इतना कोई विरोध नहीं रहा।

आप लखनऊ में थे, दिल्ली में थे, फिल्में देखते थे, बाहर से जो सम्मोहन होता था, आज अंदर आने के बाद और फिल्ममेकिंग की मशीनी प्रक्रिया से गुजरने के बाद क्या वो सम्मोहन आज भी बना हुआ है? या अब थोड़ी सी सामान्य हो गई है चीजें?
मुझे बड़ा मजा आता था गोविंदा की फिल्में देखने में। और यश जी की फिल्में देखने में। मैं ‘दीवार’ जैसी फिल्म, ‘शोले’ जैसी फिल्म या जो सुभाष घई का सिनेमा हुआ करता था उन पर पलता था। ‘राम लखन’ और ‘कालीचरण’। मतलब मुझे ये हाइप वाले ड्रामा बड़ा मजा देते थे। पर ऐसा नहीं था कि मैं ये करना चाहता हूं। मुझे मजा आ रहा है देखने में हां ठीक है, बाकी काम तो आपको अपना कुछ करना ही होगा जीवन में। तब कभी दिमाग में भी नहीं था कि फिल्म्स बनाएंगे, फिल्म्स लिखेंगे या फिल्म्स में काम करेंगे। और अभी भी आप यकीन जानिए मैं इस जगह को (मुंबई फिल्म उद्योग) को उस तरह बिलॉन्ग भी नहीं करता। बड़ा सेक्लूजन टाइप है। मतलब अभी भी मेरे वही दोस्त हैं जो कॉलेज के टाइम से हुआ करते थे। अभी भी मेरा कोई नया सर्किट यहां बना नहीं है। अपना जो समझ में आता है, जो बातों में लगता है, एक-दूसरे से जो कहानी कहने में मजा आता है, बस उसी पे काम कर रहा हूं मैं और वही लिखता हूं। बाकी मुझे लगता है ये बड़ा ... क्या कहेंगे उसे, नकली शायद ज्यादा सख्त शब्द हो जाए, पर बड़ा भ्रम है जी ये बहुत सारा। आप चाहें तो दिन की तीन फिल्मी पार्टी रोजमर्रा के हिसाब से जा सकते हैं पर बात ये है कि आपको कहना है ये काम? मतलब आप वहां जाएं, हंसें, बोलें लेकिन कुछ अर्थ बनानी चाहिए चीजें। अभी भी जो गैदरिंग का सेंस है वो पुराने दोस्तों के साथ बैठना, बातें करना, चाय पीना उसी से आता है। मैं काफी संतुष्ट हूं। ऐसी कोई ख्वाहिश नहीं है मेरी। कि अरे ये दुनिया कुछ उस तरह से एक्सप्लोर की जाए।

फिल्में बनाने वाले लोग मुंबई में रहते हैं, महानगरीय जीवन-शैली उनकी होती है लेकिन प्रेरणा जो उनकी होती है वो छोटे शहरों से आती है। ऐसा क्यों होता है? और आप शायद मुंबई में पले-बढ़े होते तो ऐसी चीज (तनु मनु, रांझणा) शायद दे ही नहीं पाते।
बिलकुल। लेकिन तब शायद मैं कोई और कहानियां दे रहा होता। आप देखिए, यहीं पर छोटे शहरों की कहानियां भी बन रही हैं और बड़े शहरों की भी कहानियां बन रही हैं। आप जोया अख्तर का काम देखिए। बहुत अच्छा काम है उनका। चाहे उनकी पिछली फिल्म ‘जिंदगी न मिलेगी दोबारा’ हो या अब ‘दिल धड़कने दो’। अब जोया जहां से आती हैं, उनको वही दुनिया पता है। वो गर्मी की छुट्टियों में स्पेन ही जाती थीं। हम मेरठ जाते थे। आप मेरठ को ज्यादा बेहतर समझते होंगे। वो पैरिस, स्पेन और रोम को ज्यादा बेहतर समझती हैं। तो वो ईमानदारी से वहां की दुनिया पेश कर रही हैं। हम ये बात बता देते हैं कि यार मेरठ में लड़का ऐसे बोलता है और इन-इन चीजों से गुजरता है। सो सबकी अलग दुनिया है। बहुत सारी कहानियां हैं इस दुनिया में तो। कोई कहीं की सुनाता है, कोई कहीं की।

आप आने वाले समय में निर्देशन भी करना चाहते हैं तो ये अर्बन, एलिटिस्ट कहानियों में आपकी रुचि है।
अच्छी कहानी में हमेशा इंट्रेस्ट रहेगा। अच्छी कहानी चाहे किसी भी दुनिया से आए आपको मजा आता है। जरूरी थोड़े ही है कि आप उस दुनिया को जानें। बैटमैन को कोई जानता थोड़े ही है या किसी का दोस्त बैटमैन है। पर मजा आता है। तो किसी भी दुनिया की कहानी हो, अच्छे तरीके से पेश की जाएगी तो क्यों नहीं मजा आएगा। आगे कोई एक अर्बन सेटअप में कहानी समझ आती है तो मैं बिलकुल लिखूंगा। बिलकुल उसको डायरेक्ट करना चाहूंगा। पर अभी जिस कहानी पर मैं काम कर रहा हूं और जो मैंने सोचा कि इससे डायरेक्शन शुरू करूंगा वो लखनऊ में सेट है। क्योंकि वो दुनिया मुझे ज्यादा करीब की जान पड़ती है।

क्या फिल्में समाज पर असर डालती हैं? अच्छा या बुरा?
मुझे लगता है इतना बड़ा कुछ है नहीं फिल्म कि समाज बदलने की ताकत रखे। ऐसा कुछ नहीं है। मुझे नहीं जान पड़ता है। हां बाकी ये जरूर है कि एक तरह का प्रतिबिंब जरूर होता है। आप किसी भी एक देश के समकालीन समय की फिल्म देखकर के उस समय की सेंसेबिलिटी जरूर समझ सकते हैं। हम सब अपने समय की ही उपज हैं। ऐसा तो है नहीं कि फिल्म देखने वाले अलग दुनिया से आ रहे हैं और बनाने वाले अलग दुनिया से। आ तो सब एक ही दुनिया से रहे हैं। तो उन मेकर्स की सेंसेबिलिटीज या बेचैनी कह लीजिए या उनकी चिंता कह लीजिए, या उनकी समझ कह लीजिए या नजरिया कह लीजिए। वो आपको जरूर समझ में आता है उस वक्त का। उस वक्त का एथोज समझ में आ जाता है उस वक्त की कहानियां देखकर के। इसीलिए सत्तर में ‘दीवार’ जैसी कहानियां बनती हैं। एक गैंग्स्टर का ग्लोरिफिकेशन दिखता है। या एक स्मगलर का। क्योंकि वो एक फेज था। हम आजादी के बाद डिसइल्यूज़न्ड (मोहभंग) थे। क्योंकि हमें नहीं समझ आ रहा था। हमें लगा था कि आजादी के बाद सबके पेट भरे होंगे। जैसे कुछ चमत्कार हो जाएगा। पर कुछ नहीं हुआ और वो 20 साल में समझ आने लगा। गोरे साहब की जगह भूरे साहब आ गए। वो फिल्मों में झलकने लगा। आज जितनी फिल्में आ रही हैं उससे आपको आज के समय की समझ मिल सकती है। सामाजिक, राजनीतिक समझ। मुझे नहीं लगता कि ये इतना भारी काम है कि कोई फिल्म आकर सामाजिक परिवर्तन ला सके। और एक बात बताऊं इतना कोई बेहतरीन काम भी नहीं हो रहा। ऐसा नहीं है कि पिछले हफ्ते ‘मुगलेआजम’ आई और अगले हफ्ते ‘कैसेब्लांका’ आ जाएगी। ऐसा नहीं है। बहुत ही औसत काम हो रहा है इंडस्ट्री में। पर बात ये है कि हम इतने वक्त से बिरियानी के पैसे लेकर के खिचड़ी खिला रहे हैं न लोगों को कि हल्का सा एक पुलाव भी बड़ा खुश कर जाता है। आप सोचिए कितना सस्ता वर्ड हो गया है ...कल्ट क्लासिक। अरे ये फिल्म तो कल्ट है। अच्छा? अगले फ्राइडे फिर एक कल्ट आ जाएगी। तो ये तो हालत हो गई है। और ये मैं अपने को सबसे पहले गिनकर बोल रहा हूं। मैं भी कोई बड़ा भारी ऐसा काम नहीं कर पा रहा कि दुनिया को लगे भई इन्होंने तो कुछ बड़ा बदल दिया। कुछ नहीं है, सब औसत काम कर रहे है। जिसको जो समझ में आ रहा है, कर रहा है। बस। मुझे नहीं लगता कि एक भी शख्स ऐसा है जो पेज टर्निंग वाला काम कर रहा है कि अरे ऐतिहासिक है ये।

लेखक पैदा होते हैं कि बनते हैं?
मुझे लगता है कि तीन फिल्में लिखकर के इसका जवाब देना बड़ा कठिन है। तीन ही हैं आखिरकार। मेरा कोई ऐसा बॉडी ऑफ वर्क नहीं है कि मैं अपनी एक एकेडेमिक समझ बना पाऊं।

टैरेंस मलिक ने तो पांच बनाई हैं चालीस साल में।
वो है, वो है, पर मुझे नहीं लगता कि अभी मैं उस स्थान पर हूं। मैं खुद अभी बहुत चीजों से जूझ रहा हूं। मैं खुद अपने ही काम से कई बार बोर हो जाता हूं। मुझे लगता है वही दुनिया, वही एक से सीन, वही सोच, वही अप्रोच.. कुछ बदलना चाहिए। मैं अभी अपने काम को लेकर बड़ा चिंतित रहता हूं कि कुछ ऐसा हो पाए कि यार किसी और को बाद में लगे खुद को लगे कि कुछ हुआ। तो अभी मैं अपने जीवन और करियर में इन बातों पर ध्यान लगा रहा हूं। बाकी तो ये बड़े बुढ़ापे के सवाल हैं। कि राइटर पैदा होता है कि बनता है। ठीक है साब, दस हजार काम होते हैं तो एक राइटर भी होता है।

आप अखबार पढ़ते होंगे। ऑनलाइन देखते होंगे। जितनी भी खबरें आती हैं। मसलन, दिल्ली के चिड़ियाघर में बाघ के पिंजरे में एक युवक के गिरने की घटना है, उसके हाथ जोड़ने की तस्वीर है, आईएसआईएस के रोज आने वाले बिहैडिंग के वीडियो हैं, धर्मांधता है, सेंसर बोर्ड है या नेट न्यूट्रैलिटी है। जब इन्हें देखते हैं तो आपके अंदर का लेखक कितनी जल्दी सक्रिय हो जाता है?
नहीं वो लेखक से उतना लेना-देना नहीं है। देश के नागरिक या मानव के तौर पर देखते हैं। उस पर विचार करते हैं। वो बहुत ह्यूमेन ग्राउंड पर असर डालता है। राइटर बाद में आता है। दुनिया ऐसे तो नहीं जी जा सकती कि कोई आपसे अपना दुख-दर्द बांट रहा है और आप अचानक से बोलें कि यार ये तो बड़ी अच्छी कहानी है। पहला रिएक्शन तो यही होता है कि सब ठीक हो जाएगा, तू चिंता मत कर भाई। तो मेरा तो वही रहता है बाकी कुछ कहानियां हैं तो अगले पांच साल तक मुझे बिजी रखने के काबिल हैं। तो अभी तो डरा हुआ नहीं हूं इतना। कहानी का उतना कोई अभाव नहीं है। जब होगा तब पेपरों को उस तरीके से पढ़ना शुरू किया जाएगा।

क्या आप अपने साथ डायरी रखते हैं, नोट लेने या अनुभव लिखने करने के लिए?
काश ये काम मुझे आते। काश मैं इतना सीरियसली अपने काम को ले रहा होता। मैंने तो आपको बोला न, खासा लेजी राइटर हूं और खासा लेजी इंसान हूं। अपना बिस्तर, अपना सोफा, अपनी चाय, अपनी खिड़की, अपनी एक गजल बड़े गुलाम अली साहब की.. उसमें मैं बड़ा खुश रहता हूं। लिखाई मेरे दिमाग में तब शुरू होती है जब मुझे लगता है कि भाई अब आनंद राय मतलब मर जाएगा अगर नहीं दिया कुछ तो। तो मैं तभी उठता हूं। पर हर फिल्म के दौरान भी लिख ही रहा होता हूं और हर फिल्म के अंत में ये वादा करता हूं खुद से और आनंद राय से कि खबरदार जो आज के बाद तुमने मुझे इस तरह पुश किया तो। अब मैं स्क्रिप्ट खत्म करूंगा और तभी तुम बनाना। तो मैं चाहता हूं कि थोड़ा अनुशासन हो राइटिंग में। मुझे लगता है उस अनुशासन की कमी ही मुझे मार रही है बहुत-बहुत वक्त से। और.. मेरा एडिटर भी यही बोलता है कि हिमांशु मुझे तुम्हारा टैलेंट नहीं चाहिए मुझे तुम्हारी मेहनत चाहिए। मैं थोड़ा कम मेहनती इंसान हूं।

राइटर्स ब्लॉक (रचनात्मक गतिरोध) आता है तो क्या करते हैं?
आता है। कई बार आप दीवार से सिर मारते रहिए। एक जगह अगर आपका चरित्र अटक गया तो अटक गया। और ये जो बातें होती हैं न जो आपने भी सुनी होंगी और मैंने भी सुनी कि “इस दुनिया में आ जाइए फिर आपको चरित्र बताएगा कि उसको कहां जाना है”। कोई किरदार आपको नहीं बताएगा। वो वहीं साला खड़ा रहेगा जहां पर आपने उसे छोड़ा है। आप ही को ले जाना हैं जहां उसे ले जाना चाहते हैं। वो खुद कुछ नहीं करेगा। लेकिन राइटर्स ब्लॉक बड़ा जरूरी होता है। जब तक आप उस डेड एंड पर जाकर नहीं खड़े होंगे कि जहां पर आपको लगे कि यार अब यहां से कहां निकलूं। अब वापस भागूं या इस दीवार को तोड़ कर के आगे बढ़ूं या साइड में भग जाऊं। जितना तकलीफ वो आपको देगा, उतना ही मजा आपकी स्क्रिप्ट में झलकेगा। अगर आप उस ब्लॉक तक पहुंचे हैं तो आपके साथ ऑडियंस भी तो पहुंचेगी न? मैं हमेशा कहता हूं जब फाइनली आप चंदन (सिनेमा, मुंबई) में फिल्म देखते हैं न, एक सिंगलप्लेक्स में, आपको वहां जाकर समझ आता है कि जो लोग बैठकर फिल्म देख रहे हैं वे ज्यादा बेहतर लेखक, एडिटर और निर्देशक हैं। वे आपको बताएंगे। परदे पर सीन देखकर लगता है कि ओ शिट, ये सीन न तीस सेकेंड पहले कट जाना चाहिए था। या ये लाइन मेरी वर्क नहीं कर रही है यहां जो मुझे लग रहा था करेगी। आप अपना काम थियेटर में देखिए, सारी गलतफहमियां, सारे मुगालते दो मिनट नहीं लगते दूर होने में। जब पीछे से आवाज आती है न “रील नंबर छह पे नहीं सात पे थी, अबे आगे बढ़ाओ”, आपको समझ में आ जाता है सारा मामला। ये जो टर्म हैं न, पब्लिक..। पब्लिक कुछ नहीं होती। आप उन्हीं का हिस्सा हैं। जब आप ट्रैफिक में होते हैं आपको लगता है न कितना ट्रैफिक है। लेकिन आपकी साइड वाली के लिए आप ट्रैफिक हैं।

फिल्म एडिट करते समय या हर डिपार्टमेंट द्वारा काम करते समय निर्देशक या निर्माता बताता है कि हमें ये उस दर्शक को लक्ष्य करके तैयार करना है। जबकि वो दर्शक कभी किसी को मिला ही नहीं, उसे किसी ने देखा ही नहीं है। न जाने कौन सा दर्शक, कहां, किस जेहनियत के साथ, किस मानसिक अवस्था, कितने ज्ञान के साथ क्या पसंद करेगा। तो उसे ढूंढ़ पाना या उसे लेकर एक मैच्योर जगह पहुंच पाना ये कभी हो नहीं पाया। लिखते समय क्या आप उस दर्शक को ढूंढ़ पाए हैं?
नहीं, बिलकुल नहीं। और उस पर ज्यादा सोच लगानी भी नहीं चाहिए। आप वही काम कर सकते हैं जो आपको आता है। ऐसा तो नहीं है न कि किसी एक फिल्म को लिखने के लिए मैं राजकुमार हीरानी से गुद्दी उधार ले सकता हूं? अगर ले सकता तो ले लेता। आप काम वही करेंगे जो आपको आता है, जो आपकी गुद्दी आपको बताएगी, जो आपका विवेक आपको बताएगा, जो आपका दिल आपको कहेगा। आप जितनी ईमानदारी से वो अटेंप्ट कर सकें आप बस वो करें। आप मेहनत करने की कोशिश करें। ईमानदार रहें। आप झूठ न बोलें। न खुद से न किसी और से। आप वो काम करें जो आपको अच्छा लगता है। क्योंकि आपको अच्छा लगेगा न तो हो सकता है चार-पांच और लोगों को अच्छा लगे। अगर आप ज्यादा चतुर बनेंगे तो वो जो तीन-चार लोगों को पसंद आने की गुंजाइश थी वो भी खत्म समझो। आप वो लिखिए जो आपको लिखने का मन है, बाकी आपके पास चारा क्या है। कम से कम वो तो तमीज से लिख दीजिए।

वो स्क्रिप्ट जो आपको बेदाग़ लगती हैं?
‘दीवार’। सलीम-जावेद साहब का जितना भी काम है वो। वो बहुत पके हुए और पुख़्ता राइटर्स हैं। उनका सेंस ऑफ ड्रामा, स्टोरी, कैरेक्टर। ‘दीवार’ वॉटरटाइट है। उसमें से एक सीन भी हटाना... मतलब सीन हटाना तो बहुत बड़ी बात है, मुझे नहीं लगता कि उसे आप किसी तरीके से भी बदल सकते हैं। असंभव है। आप उसमें से कोई भी सीन हटाकर देखें। कुछ मिस कर देंगे आप। उसके परे मुझे कुछ नहीं दिखता। हिंदी सिनेमा में ऐतिहासिक स्क्रीनप्ले का उदाहरण है ‘दीवार’। टॉम स्टॉपार्ड ने एक स्क्रिप्ट लिखी थी जिस पर फिल्म बनी ‘शेक्सपीयर इन लव’ (1998)। वो भी वॉटरटाइट स्क्रीनप्ले था। विदेशी में ये कमाल लगती है।

आकांक्षी फिल्म राइटर्स के लिए वो नियम जो उन्हें अपनी राइटिंग टेबल के आगे चिपकाने चाहिए।
सबसे पहले तो वो टेबल पर बैठें, क्योंकि मैं तो टेबल पर भी नहीं बैठ रहा। और दूसरी चीज, मुझे लगता है ईमानदारी। आप पूरी ईमानदारी से सही, गलत, अच्छा, बुरा, गुड-बैड-अग्ली जो भी आता है आप ईमानदारी से कह दें। ये एकमात्र चीज है जिसका मैं पालन करता हूं।

फिल्म राइटर बनने के लिए फिल्म स्कूल जाना जरूरी है?
मैं तो नहीं गया हूं। पर.. जाना चाहिए, यकीन है कुछ रोचक ही सीखने को मिलता होगा वहां।

इस साल की कोई उत्साहित करने वाली फिल्म देखी है? समकालीन लेखकों में कौन अच्छे लगते हैं?
मुझे कमाल की लगी ‘बदलापुर’। इस साल मैं ज्यादा फिल्में नहीं देख पाया पर ‘बदलापुर’ मुझे आउटस्टैंडिंग फिल्म लगी। और बहुत अच्छी राइटिंग लगी उसकी। वैसे भी मुझे श्रीराम सर का काम हमेशा ही अच्छा लगा है। मैंने उन्हें काफी लंबा मैसेज भी किया। और जैसे वो हैं, उन्होंने एक लाइन में उत्तर दिया, ‘थैंक यू हिमांशु’।

आने वाली फिल्में कौन सी हैं। आनंद राय के साथ ही हैं?
जी, आनंद के साथ ही है। मैं अगली फिल्म भी आनंद के लिए ही लिख रहा हूं। और एक स्क्रिप्ट है जिस पर मैं अपने लिए काम कर रहा हूं। ये दो ही हैं अभी।

आनंद के साथ फिल्म किस श्रेणी यानी जॉनर की है?
रोमैंटिक ड्रामा है। जिसमें वे काफी अच्छे हैं। मैं भी अभी उसी में ही ऑपरेट कर रहा हूं।

एक फिल्म आपकी सलमान के साथ भी है?
हम उनसे मिले। बहुत मजेदार रही मुलाकात। देख रहे हैं अभी वो बहुत बिजी हैं, उनके कमिटमेंट।

जिंदगी का फलसफा क्या है? जो निराशा में भी उठ खड़ा होने और आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है?
जिंदगी चरणों में आती है। और अच्छा टाइम नहीं रुकता तो बुरा क्यों रुकेगा। जूझना चाहिए। आप इसीलिए पैदा हुए हैं कि चीजों से जूझें।

जब आप फिल्मों में आना चाहते थे तो न जाने कितने किस्से थे जो आपको कहने थे, न जाने कितनी फिल्में आपको बनानी थी, अब जब आ गए हैं तो ऐसा नहीं लगता एकदम खाली हो गए हैं?
ये मेरी लाइफ में सबसे बड़ा डर है यकीन जानिए। ये कि एक दिन मैं सोकर उठूंगा और मेरे पास कोई कहानी नहीं होगी। कि आप खाली हो गए। और जब आप खाली हो जाएं न, तो बेहतर है चुप बैठें। बेकार में कहानियां न सुनाएं। बाकी ऐसी कोई दिक्कत नहीं है, लखनऊ में घर है अच्छा और शहर बहुत पसंद आता है। जहां से आए हैं वापस लौट जाएंगे। कोई दिक्कत नहीं है। लेकिन अभी तीन-चार कहानियां हैं जो पांच-छह साल तो बिजी रख देंगी। उनको लेकर मैं एक्साइटेड हूं, मुझे अच्छा लग रहा है उनके बारे में सोचकर के।

राइटर्स में आपके ऑलटाइम फेवरेट कौन हैं?
हिंदी साहित्य का स्टूडेंट रहा हूं। प्रेमचंद को बहुत पढ़ा मैंने। भारतीय लेखकों में मुझे निर्मल वर्मा बहुत पसंद हैं। धर्मवीर भारती बहुत पसंद हैं और उनकी ‘गुनाहों का देवता’ जो है उसका बहुत ज्यादा प्रभाव रहा मुझ पर। बाकी आजकल एक बहुत धमाल किताब ‘फ्रीडम एट मिडनाइट’ (1975) पढ़ रहा हूं। ज्यादा पढ़ नहीं पा रहा लेकिन सोचा हुआ है पढ़ाई करनी है फिर से लगकर। वापस दिल्ली यूनिवर्सिटी मोड में आने का विचार है मेरा।


Himanshu Sharma is a young film writer from India. He's from Lucknow, at present based in Mumbai. He's written three successful Hindi films so far - Tanu Weds Manu (2011), Ranjhanaa (2013), Tanu Weds Manu Returns (2015). The last one released on May 22 this year. For all the three films he has collaborated with director Anand Rai. He's writing two more scripts at the moment. One of them will be directed by Rai and the other one will be his directorial debut. Both will be romantic dramas situated in Lucknow.
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