Thursday, July 18, 2013

शोएब मंसूर की ‘बोल’ के बाद अब पाकिस्तान से आ रही है ‘जिंदा भाग’; बातें निर्देशकों मीनू गौड़ व फरज़ाद नबी से

 Q & A. .Meenu Gaur & Farjad Nabi, director duo of Pakistani film “Zinda Bhaag”.

Farjad Nabi and Meenu Gaur, during the shooting of "Zinda Bhaag."
भारी टैक्स और सेंसरशिप के बीच छटपटाती पाकिस्तान की फ़िल्म इंडस्ट्री में बनीं तो ‘जट्ट दे गंडासे’ जैसी ही फ़िल्में, जैसी भारतीय पंजाब में काफी वक्त तक बनती रहीं। इस बीच भारत में बैठकर हमें अगर पाकिस्तानी सिनेमा की ख़ैरियत मिलती रही तो सबीहा सुमर की फ़िल्म ‘ख़ामोश पानी’ (2003) से, शोएब मंसूर की ‘ख़ुदा के लिए’ (2007) से और मेहरीन जब्बार की ‘रामचंद पाकिस्तानी’ (2008) से। बेहद अच्छी फ़िल्में रहीं। दो साल पहले मंसूर की ही फ़िल्म ‘बोल’ भी आई। कोई भी दर्शक, चाहे वो मामूली समझ-बूझ वाला हो या बेहद बुद्धिजीवी, ऐसा नहीं था जिसे इस फ़िल्म ने भीतर तक नहीं छुआ। जब-जब ‘बोल’ की बात आज भी होती है, आदर के साथ होती है। पाकिस्तानी सिनेमा को वहां से आगे ले जाने की कोशिश करती एक और फ़िल्म तैयार है। नाम है ‘जिंदा भाग’। वहां के सिनेमा के लिए ये वही काम कर सकती है जो भारतीय सिनेमा के लिए ‘खोसला का घोंसला’ ने किया।

इस फ़िल्म को बनाया है प्रोड्यूसर मज़हर ज़ैदी और डायरेक्टर द्वय फरज़ाद नबी और मीनू गौड़ ने। अपनी ही मेहनत, सोच और छोटी-छोटी संघर्ष भरी कोशिशों से इन्होंने एक परिपूर्ण फ़िल्म बनाने का ख़्वाब देखा है। फ़िल्म की कहानी तीन पाकिस्तानी लड़कों की है जो अपनी-अपनी जिदंगी की परेशानियों को दूर करने और समृद्ध होने के ख़्वाबों को पाने के लिए ‘डंकी मार्ग’ यानी गैर-कानूनी इमिग्रेशन का रास्ता अख़्तियार करते हैं। बेहद सच्ची परिस्थितियों और सार्थक मनोरंजन के बीच ही फ़िल्म को रखने की कोशिश की गई है। नसीरूद्दीन शाह भी एक प्रमुख भूमिका कर रहे हैं। इसमें ‘बोल’ में दकियानूसी ख़्यालों वाले पिता की बेहतरीन भूमिका करने वाले मंजर सहबई भी थोड़ी देर के लिए नजर आएंगे। फ़िल्म में एक अभिनेत्री और तीन नए अभिनेता (आमना इल्यास, खुर्रम पतरास, सलमान अहमद ख़ान, जोएब) केंद्रीय भूमिकाओं में हैं। संगीत साहिर अली बग्गा ने दिया है जो पंजाबी फ़िल्म ‘विरसा’ का लोकप्रिय गीत “मैं तैनू समझावां की...” गा चुके हैं। ‘जिंदा भाग’ के गाने राहत फतेह अली ख़ान, आरिफ लोहार, अमानत अली और सलीमा जव्वाद ने गाए हैं।

प्रोड्यूसर मज़हर और फरज़ाद पहले जर्नलिस्ट रहे हैं, बाद में फ़िल्म निर्माण में आ गए। गंभीर मिजाज के फरज़ाद को उनकी डॉक्युमेंट्री ‘नुसरत इमारत से निकल गए हैं... लेकिन कब?’ (Nusrat has Left the Building... But When?) और ‘प्रोफेसर का यकीन कोई नहीं करता’ (No One Believes the Professor) के लिए जाना जाता है। इसे साउथ एशिया में कई पुरस्कार मिले। इसके अलावा उनके लिखे पंजाबी स्टेज प्ले ‘अन्ही चुन्नी दी टिक्की’ (Bread of Chaff & Husk) और ‘जीभो जानी दी कहानी’ (The Story of Jeebho Jani) हाल ही में प्रकाशित हुए हैं। वहीं मीनू भारत की ही रहने वाली हैं। मज़हर से शादी के बाद वह पांच साल से कराची और लंदन के बीच बसेरा करती हैं। वह जामिया मिल्लिया इस्लामिया, दिल्ली से पढ़ी हैं। 2010 में उन्होंने लंदन विश्वविद्यालय से फ़िल्म और मीडिया स्टडीज में पीएचडी की। इसके लिए उन्हें फेलिक्स स्कॉलरशिप और चार्ल्स वॉलेस स्कॉलरशिप प्राप्त हुई। वह एक पुरस्कृत डॉक्युमेंट्री फ़िल्म ‘पैराडाइज ऑन अ रिवर ऑफ हेल’ (Paradise On A River Of Hell) का निर्देशन कर चुकी हैं।

अपनी फ़िल्म को अगले महीने यानी अगस्त तक पाकिस्तान, पश्चिमी देशों और भारत में रिलीज करने की योजना बना रहे फरज़ाद और मीनू से बातचीत हुई:

Poster of the movie.
 Q.. जिंदा भाग का ‘आइडिया’ सबसे पहले कब आया? किस्सा क्या था?
फरज़ाद नबीः जब आप गैर-कानूनी अप्रवासियों (इमिग्रेशन) की कहानियां सुनते हैं तो फैक्ट और फिक्शन की लाइन मिटती चली जाती है। इन कहानियों में हीरोइज़्म और ट्रैजेडी आपस में उलझते होते हैं। जब हमने अपने दोस्तों से ऐसी कहानियां इकट्ठी कीं तो हमारे लिए सबसे बड़ा सवाल था कि वो कौन सी जरूरत, ख़्वाहिश या दबाव हैं जो हमारे मुल्क (भारत, पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका) के नौजवान लड़कों को गैर-कानूनी इमिग्रेशन या ‘डंकी का रास्ता’ चुनने पे मजबूर करते हैं। इसी सवाल के जवाब में ये स्क्रिप्ट लिखी गई।
मीनू गौड़ः हमारी फ़िल्म ‘जिंदा भाग’ एक साउथ एशिया फ़िल्म प्रोजेक्ट के साथ जुड़ी है, जिसकी थीम मैस्क्युलिनिटी है। जब हम इस फ़िल्म की रिसर्च पर निकले तो हमें एहसास हुआ कि अपनी जान पे खेल के, डंकी के रास्ते फॉरेन जाने को मर्दानगी का इज़हार माना जाता है। इस नज़रिए में जिदंगी को एक जुए के तौर पर बरता जाता है और नौजवान लड़के हर समय किसी शॉर्टकट या जैकपॉट की ताक में रहते हैं। रिसर्च के दौरान हमें इन लड़कों की खीझ का अंदाजा हुआ। आज के दौर में सक्सेस और सक्सेसफुल होने का प्रैशर एक तरफ और दूसरी तरफ ये एहसास कि हर जायज रास्ता आपके लिए बंद है, हमारी फ़िल्म इसके दरमियां की कहानी बयां करती है।

 Q.. उस कहानी को स्क्रिप्ट की शक्ल देने तक आप दोनों में क्या विमर्श चले? फ़िल्म और उसके संदेश के पीछे पूरी बहस क्या रही?
 मीनूः असल मैं स्टोरी और स्क्रिप्ट साथ-साथ डिवेलप हुए। कुछ राइटर्स के पास पहले स्टोरी होती है और कुछ को पता नहीं होता कि ये स्टोरी क्या दिशा लेगी। हमारे पास शुरू में कुछ सीन्स थे, पूरे-पूरे, डायलॉग्स समेत। हमें फिर बाकी सीन तक पहुंचने का रास्ता बनाना पड़ता। आई थिंक, ये तरीका ज्यादा मुश्किल है और अगली बार हमने ठान ली कि पहले कहानी और फिर सीन और डायलॉग्स की डीटेल। लेकिन हमारे इस तरीके का फायदा ये था कि हमें हर डायलॉग और सीन के पीछे बहुत खास मोटिवेशंस सोचने पड़ते। शायद ज्यादा स्पॉनटेनियस भी था ये प्रोसेस। एक राइटर के तौर पर बहुत संतुष्टि होती है जब आप ये नहीं जानते कि आपके कैरेक्टर्स अब क्या करने लगेंगे। इस प्रोसेस में ज्यादा एक्साइटमेंट भी होती है और ये ज्यादा तकलीफ भरा भी होता है।
फरज़ादः मैसेज पर ये स्पष्टता थी कि फ़िल्म की आवाज असली होनी चाहिए, नक़ली नहीं। कुछ कैरेक्टर्स मुक़म्मल तौर पर रीराइट हुए क्योंकि उनकी आवाज स्वाभाविक नहीं थी। फिर स्ट्रक्चर के ऊपर बहुत मेहनत हुई क्योंकि इस फ़िल्म के ढांचे में एक बहुत अनोखा तत्व है जो देखिएगा, अभी ज्यादा नहीं कह सकता।

 Q.. क्या ऐसा भी है कि फरज़ाद ने कहानी के तीन लड़कों की हरकतें, अदाएं और सोच बचपन या जवानी के असल दोस्तों से पाई? और कहानी की बड़बोली हीरोइन के चारित्रिक गुण मीनू ने अपनी किसी सहेली में देखे और याद रखे?
फरज़ादः ऐसा सख़्त विभाजन तो बिल्कुल नहीं था। तमाम किरदार एक मुसलसल बहाव का हिस्सा हैं। कभी मुझे कोई आइडिया आता तो मीनू उसको शेप करतीं, और कभी मीनू के आइडिया को मैं शक्ल देता। अंत में ये किसी को याद भी नहीं रहता कि आइडिया किसका था और लाइन्स किसकी। ये हमारी ताकत है।
मीनूः हर राइटर अपने आस-पास के लोगों से प्रेरित किरदार और व्यक्तित्व लिखते हैं। लेकिन लिखने के प्रोसेस के दौरान वो किरदार इतने तब्दील हो जाते हैं कि फिर पहचाने नहीं जाते। एक कैरेक्टर सिर्फ एक रियल पर्सन से नहीं बल्कि सैकड़ों लोगों को मिला के बनता है। तो रुबीना के किरदार के डीटेल्स एक से ज्यादा लोगों से प्रेरित हैं। जब कल्पना उस प्रेरणा पे काम शुरू करती है तो ओरिजिनल प्रेरणा बहुत पीछे छूटती जाती है।

 Q.. नसीरूद्दीन शाह को कैसे प्रस्ताव भेजा? क्या उन्हें लेने से सबका ध्यान सिर्फ उन्हीं पर केंद्रित होकर नहीं रह जाएगा?
मीनूः जब हम ‘पहलवान’ का किरदार लिख रहे थे तो हमें पता था कि इस रोल को सिर्फ और सिर्फ एक बहुत पहुंचे हुए एक्टर अदा कर सकते हैं। ये एक मुश्किल रोल था। जब हम सोचने लगे तो बस बार-बार नसीरूद्दीन शाह साहब का ही जिक्र होता। फिर हमने तय किया कि हमें अपनी स्क्रिप्ट उन्हें भेजनी चाहिए। हमें उम्मीद नहीं थी कि कोई जवाब आएगा। मैं आज तक हैरान हूं कि नसीर साहब ने एक डाक में आई हुई स्क्रिप्ट पढ़ी।
फरज़ादः इसमें हमारे प्रोड्यूसर मज़हर ज़ैदी का भी बड़ा रोल है। जब हमने उन्हें कहा कि हम इस रोल में नसीर साहब को देखते हैं तो उन्होंने हमें हतोत्साहित करने के बजाय कहीं से नसीर साहब का पता निकाला और स्क्रिप्ट भेजी। जब नसीर साहब ने स्क्रिप्ट पढ़ी तो बहुत प्रेरित हुए और कहा कि “ये मैं जरूर करूंगा क्योंकि ये रोल लाखों में एक है”। सेट पर वो सबको साथ लेकर चले जिससे हमारे नए एक्टर्स का आत्म-विश्वास बहुत बढ़ा। फ़िल्म देखते हुए बिल्कुल भी ध्यान इस तरफ नहीं जाता कि नसीर साहब एक स्टार हैं।

 Q.. “मैं आपको रसगुल्ले की मिठास से ज्यादा, इमली की खटास से ज्यादा और पाकिस्तान में करप्शन से ज्यादा प्यार करती हूं,” …ऐसे डायलॉग का जन्म कैसे हुआ? कितनी आजादी से लिख पाए?
फरज़ादः जिसको कहते हैं न, असली घटनाओं से प्रेरित, बस इस डायलॉग की उत्पत्ति भी कुछ ऐसी ही रही। जो पहले दीवारों की पुताई से लिखे होते थे, अब टेक्स्ट मैसेज हो गए हैं।
मीनूः हमारी ये कोशिश थी कि हम उस भाषा में लिखें जो कि लाहौर के किसी मुहल्ले की एक पीढ़ी की नेचुरल ज़बान लगे, ऑथेंटिक लगे। इसके लिए हमने अपने एक्टर्स के साथ बहुत वर्कशॉप कीं, इम्प्रोवाइजेशन किए। इसी वजह से हमने ये फैसला भी लिया कि हम प्रफेशनल एक्टर्स को कास्ट नहीं करेंगे, मेन लीड में ऐसे लड़कों को कास्ट करेंगे जो उसी मुहल्ले से हों और उसी पर्सनैलिटी के हों, जिस तरह के हमारे तीन लीड कैरेक्टर हैं। फिर हमने बहुत ऑडिशन किया और सलेक्शन के बाद दो महीने तक वर्कशॉप और रिहर्सल्स भी किए। इनमें एक वर्कशॉप नसीर साहब ने भी करवाई। कुल-मिलाकर हम ये कहानी उसी तरह और उसी अंतरंगता के साथ परदे पर लाना चाहते थे जिस तरह हमने खुद उसे देखा... एक दोस्त, कजिन या पड़ोसी की कहानी।

 Q.. अपनी फ़िल्म के लिए आप लोग कैसा संगीत चाहते थे? उसके लिए साहिर अली बग्गा पहली पसंद कैसे बने?
फरज़ादः ‘जिंदा भाग’ का संगीत परिस्थितिजन्य है और कहानी के नैरेटिव को आगे लेकर बढ़ता है। हमने हर गाने की सिचुएशन विस्तार से सोची हुई थी और हमारे पास काफी संदर्भ भी थे कि किस किस्म का साउंड चाहते हैं। ये बग्गा का कमाल है कि उसने स्क्रिप्ट के मुताबिक म्यूजिक बनाया और सिंगर्स चुने।
मीनूः फरज़ाद और मैं दोनों ही पुरानी फ़िल्मों और गानों के फैन हैं। और फिर एक जमाना था जब लॉलीवुड एक फलती-फूलती इंडस्ट्री थी। मैडम नूरजहां और मेहदी हसन जैसे प्लेबैक सिंगर थे। हम दोनों की सोच है कि फिल्मी गानों का जो कायापलट हुआ है हाल ही के सालों में, वो अकल्पनीय है। गानों को ‘आइटम’ की तरह ट्रीट किया जाता है। फ़िल्म कोई वैरायटी शो तो नहीं कि उसमें आइटम हों। पुरानी फ़िल्मों के गाने उन हालातों या इमोशंस को जाहिर करते थे जिनको आप डायलॉग के जरिए नहीं कह सकते थे। जैसे कि एक निचले या गरीब वर्ग का इंसान अमीरों की ओर तंज करे, या कोई आध्यात्मिक असमंजस (spiritual dilemma) हो, या प्यार की बात हो। हम फिल्मी गानों के उस दौर को रेफरेंस रख कर चलना चाहते थे। बग्गा का ये कमाल है कि वो इस सोच को और भी आगे तक लेकर गए। उन्होंने पूरी तरह लाइव इंस्ट्रूमेंट्स से हमारी फ़िल्म का म्यूजिक तैयार किया है।

 Q.. पोस्ट-प्रोडक्शन इंडिया में कहां किया? अब जब बेहद कम टेक्निकल संसाधनों में भी एडिटिंग, डबिंग, साउंड मिक्सिंग और पोस्ट-प्रोडक्शन हो जाता है, फिर इस काम के लिए पाकिस्तान क्या उपयुक्त स्थान नहीं था? इससे पोस्ट-प्रोडक्शन सुविधाओं को भी वहां बढ़ावा मिलता।
फरज़ादः कुछ पोस्ट-प्रोडक्शन मुंबई में हुआ और कुछ कराची में। इनमें से कई सुविधाएं पाकिस्तान में उपलब्ध नहीं हैं। आमतौर पर डायरेक्टर्स बैंकॉक जाते हैं, हमने इंडिया इसलिए चुना क्योंकि वो सस्ता विकल्प था और हमारी ज़बान और सिनेमैटिक परंपरा एक हैं, तो साथ काम करना ज्यादा आसान होता है और मजा भी ज्यादा आता है।

 Q.. इंडिया में ‘बैंड बाजा बारात’, ‘विकी डोनर’ और ‘मेरे डैड की मारूति’ जैसी फ़िल्में बनी हैं। उन जैसी ही गति, शोख़पन, चटख़पन, गली-मुहल्ले वाले डायलॉग और चुस्त किरदार ‘जिंदा भाग’ में भी हैं। आपको क्या लगता है, मौजूदा दौर के सिनेमा में ये विशेषताएं और गति तमाम मुल्कों में एक साथ क्यों नज़र आ रही हैं?
फरज़ादः चुस्त और सुस्त में थोड़ा ही फर्क है और वो है कंटेंट का। अंत में तो आपको कहानी सुनानी है और अगर कहानी कमजोर है तो जितनी मर्जी चाहें चुस्ती कर लें आपकी फ़िल्म सुस्त ही रहेगी।
मीनूः शायद इन सब मुल्क में यंगर जेनरेशन फ़िल्म बना रही है और वो सब ऐसी कहानियां कहना चाहते हैं जिनका रिश्ता उनके खुद की रोजमर्रा की जिंदगी से हो?

 Q.. बचपन में कौन सी फ़िल्में आपने सबसे पहले देखी थीं और क्या तब जरा भी लगा कि ये सम्मोहन आपकी जिंदगी का अहम हिस्सा बनेगा? छुटपन में किन डायरेक्टर्स की फ़िल्में पसंद थीं, कौन सी फ़िल्में पसंद थीं?
फरज़ादः सबसे पहले तो सिनेमा की प्रेरणा मुझे म्यूजिक से मिली जो आज भी मिलती है। जहां तक फ़िल्ममेकर्स का ताल्लुक है, किसी एक का नाम लेना मुश्किल है। एक जमाने में जर्मन सिनेमा से मैं बहुत प्रेरित था, फिर ईरानी फ़िल्मों का दौर आया। क्यूबन सिनेमा बहुत कम देखा है लेकिन हमेशा कुछ नया होता है उसमें। आजकल फिर पुरानी पाकिस्तानी फ़िल्मों की तरफ वापसी है। तो ये सफर जारी रहता है। लेकिन इन सब प्रेरणाओं को लेकर हमें अपनी कहानियां अपने तरीके से कहनी हैं। अगर सब टैरेंटीनो, कोपोला या तारकोवस्की बनना चाहेंगे तो फिर क्या बनेगा। जिस तरह बॉलीवुड और हॉलीवुड की अलग-अलग जॉनर वाली फिल्मों से समान उम्मीदें होती हैं, उसी तरह यूरोपियन आर्ट सिनेमा का भी एक तय ढांचा या टेम्पलेट है। इस साल मैं बर्लिनैल गया तो हैरान था कि कितनी ज्यादा फ़िल्में अलग-अलग मुल्कों से होने के बावजूद भी एक हूबहू टेम्पलेट पे बनीं थीं। ये फंदे हैं जिनसे बचना एक फ़िल्ममेकर का संघर्ष है।
मीनूः हमारे घर में बहुत ज्यादा फ़िल्में देखी जाती थीं। बॉम्बे की फ़िल्में भीं और आर्ट फ़िल्म भी। शुरू से ही काफी थियेटर वगैरह से जुड़ाव रहा। हाई स्कूल के टाइम से ही काफी वर्ल्ड सिनेमा देखना शुरू कर दिया था लेकिन कॉलेज में ये और सीरियस पैशन बन गया। वहां फ़िल्म क्लब मैं हम हर नए डायरेक्टर को आज़माते थे। सैली पॉटर की ‘ऑरलैंडो’ (Orlando, 1992) जब देखी तब याद पड़ता है कि स्क्रीनिंग के बाद ये फीलिंग थी कि काश ये फ़िल्म बनाने में मेरा भी कोई छोटा-मोटा हाथ होता। सिनेमा डायरेक्टर्स तो बहुत सारे हैं जिनकी फ़िल्में इंस्पायर करती हैं। कई ऐसे भी हैं जिनकी फ़िल्में बहुत ज्यादा पसंद हैं और मैं जब फ़िल्म पढ़ती हूं तो उनको ही पढ़ना पसंद करती हूं जैसे कि आजकल हेनिके साहब (Michael Haneke) की फ़िल्में... लेकिन उसका ये मतलब नहीं कि मैं उन्हीं की तरह की फ़िल्में बनाना चाहती हूं।

Mazhar Zaidi, producer of the movie.
 Q.. आप दोनों में जब रचनात्मक मतभेद (creative differences) होते हैं तो कैसे सुलझाते हैं? दूसरे शब्दों में पूछूं तो जब दो लोग एक क्रिएटिव चीज को बनाने में साथ होते हैं तो तालमेल बनाए रखने का फंडा क्या है?
फरज़ादः क्रिएटिव डिफरेंस की टर्म का उस वक्त इस्तेमाल होता है जब आपके अहंकार का मसला बन जाए कोई बात। असल क्रिएटिविटी में ईगो की कोई जगह नहीं होती। ये बहुत प्रैक्टिकल और रियल प्रोसेस है। जब आप इस प्रोसेस में होते हैं तो एक एनर्जी आपको ड्राइव कर रही होती है और आप एक ही विजन की तरफ जा रहे होते हैं। फिर उसमें चाहे जो भी डिसकशन हो उसका नतीजा पॉजिटिव ही होता है। मीनू के साथ भी काम कुछ इस बेसिस पर होता है इसलिए हम बहुत डीटेल में हर चीज को तोड़कर दोबारा जोड़ सकते हैं। और जैसे कि मैंने पहले कहा, हम एक-दूसरे के आइडियाज को एक कदम आगे ले जाते हैं, पूरा करते हैं।
मीनूः मज़हर (ज़ैदी) और फरज़ाद पहले से ही साथ काम करते थे। उन्होंने मटीला रिकॉर्ड्स साथ शुरू की और काफी आर्टिस्ट्स को रिकॉर्ड किया। हम सब साथ मिलके अपने आइडियाज डिसकस किया करते थे और फिर हमने कुछ फ़िल्में साथ शुरू कर दीं। फ़िल्म तो एक साथ काम करने वाली चीज ही होती है। डायरेक्टर उसका एक छोटा पुर्ज़ा है। ट्रफो (Francois Traffaut) की डे फॉर नाइट (Day for Night, 1973) या फैलिनी (Federico Fellini) की इंटरविस्ता (Intervista, 1987) देखें, मेरी ये बात सही तौर पर जाहिर हो जाएगी कि आप कितने ही बड़े ऑटर क्यों न हों, फ़िल्म मेकिंग का मूल तो सहभागिता ही होता है। ये एक तथ्य है कि कई हजार चीजें आपकी फ़िल्म में, सेट पर मौजूद दूसरे लोगों के छोटे-छोटे प्रयासों से, होती हैं। इसलिए फरज़ाद और मैं बहुत आसानी से साथ काम कर लेते हैं क्योंकि हम हमारे आइडियाज, स्क्रिप्ट या फ़िल्म को निजी संपत्ति की तरह नहीं लेते।

 Q.. जिंदगी का लक्ष्य क्या है?
मीनूः अपनी फ़िल्म स्क्रीन तक पहुंचाना और उसके बाद अपनी दूसरी फ़िल्म बनाना!

“Zinda Bhaag (2013)” - Watch the trailer here:

Nusrat has Left the Building...But When?” - Watch Farjad Nabi's documentary here:

“Paradise On A River Of Hell” - Watch Meenu Gaur's documentary here:

Slated to release in August, 2013 ‘Zinda Bhaag’ is a Pakistani feature film directed by Meenu Gaur and Farjad Nabi. Meenu was born in India. She did her PhD in Film and Media Studies from the University of London in 2010. She received the Felix scholarship and Charles Wallace Scholarship for the same. She is also the director of award winning documentary film, 'Paradise on a River of Hell'. After her marriage with Mazhar Zaidi, producer of Zinda Bhaag, Meenu now lives in London and Karachi. Farjad Nabi has directed documentaries including ‘Nusrat has Left the Building... But When?’ and ‘No One Believes the Professor’, which won awards at Film South Asia. He has also documented the work of Lahore film industry’s last poster artist in The Final Touch. His Punjabi stage play ‘Annhi Chunni di Tikki’ (Bread of Chaff & Husk) and ‘Jeebho Jani di Kahani’ (The Story of Jeebho Jani) has been recently published.

For updates here is the Facebook page of the movie.

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Wednesday, July 17, 2013

मानो मत, जानोः “कित्ते मिल वे माही” ...अभूतपूर्व पंजाब

हॉली और बॉली वुडों ने दावा किया कि दुनिया बस वही है जो उन्होंने दिखाई... बहुत बड़ा झूठ बोला, क्योंकि दुनिया तो वह नहीं है। दुनिया का सच तो हिलाने, हैराने, हड़बड़ाने और होश में लाने वाला है, और उसे दस्तावेज़ किया तो सिर्फ डॉक्युमेंट्री फ़िल्मों ने। “मानो मत, जानो” ऐसी ही एक श्रंखला है जिसमें भारत और विश्व की अऩूठे धरातल वाली अविश्वसनीय और परिवर्तनकारी डॉक्युमेंट्रीज पढ़ व देख सकेंगे।

 Documentary. .Where the twain shall meet (2005), by Ajay Bhardwaj.

“ जो लड़ना नहीं जाणदे
  जो लड़ना नहीं चौंदे ...
  ... ओ ग़ुलाम बणा लये जांदे ने ”
           - लाल सिंह दिल, क्रांतिकारी कवि और दलित
              जीवन के बाद के वर्षों में इस्लाम अपना लिया

Lal Singh Dil, in a still.
उस दुपहरी में अपने पड़ोसी के साथ ऐसे पार्क में बैठे लाल सिंह दिल, जहां कोई न आता हो। जरा नशे में, पर होश वालों से लाख होश में। वहां का सूखापन और गर्मी जलाने लगती है, उन्हें नहीं मुझ दर्शक को। वो तपन महसूस करवा जाना अजय भारद्वाज की इस फ़िल्म की कलात्मक सफलता है, कथ्यात्मक सफलता है और जितनी किस्म की भी सफलता हो सकती है, है। इस डॉक्युमेंट्री को मैं कभी भूल नहीं पाऊंगा। कभी नहीं। लाल सिंह दिल जैसे साक्षात्कारदेयी और उनके उस दोस्त और पड़ोसी शिव जैसा साक्षात्कारकर्ता मैंने कभी नहीं देखा। विश्व सिनेमा के सबसे प्रभावी साक्षात्कार दृश्यों में वो एक है। अभिनव, अद्भुत, दुर्लभ।

लाल सिंह के विचार आक्रामक हैं। वो देश के उन तमाम समझदार लोगों के प्रतिनिधि हैं जो इसी समाज में हमारे मुहल्लों-गलियों में रहते हैं, पर चूंकि वैचारिक समझ का स्तर सत्य के बेहद करीब होने की वजह से उनका रहन-सहन और एकाकीपन समाज के लोगों की नासमझ नजरों को चुभता है, तो हम एक बच्चे के तौर पर या व्यस्क के तौर पर उनके करीब तक कभी नहीं जा पाते। कभी उनसे पूछ नहीं पाते कि ये दुनिया असल में क्या है? हमारे इस संसार में आने का व्यापक उद्देश्य क्या है? हमारे समाज ऐसे क्यों हैं? ये समाज की प्रतिष्ठासूचक इबारतें कैसे तोड़ी या मोड़ी जा सकती हैं? कैसे इंसान और मानवीय बनाए जा सकते हैं? काश, हम छुटपन में ऐसे किसी लाल सिंह दिल के पास बैठते तो एक बेहतर इंसान होते। समाजी भेदभाव के भविष्य पर दार्शनिक और दमपुख़्त यकीन भरी नजरें लिए एक मौके पर वे कहते भी है न,

“ जद बोहत सारे सूरज मर जाणगे
 तां तुहाडा जुग आवेगा...” 
  When many suns die
  Your era will dawn...

‘कित्ते मिल वे माही’ हमें उस पंजाब में ले जाती है, जहां पहले कोई न लेकर गया। पंजाबी फ़िल्मों, उनके ब्रैंडेड नायकों, यो यो गायकों और पंजाबियों की समृद्ध-मनोरंजनकारी राष्ट्रीय छवि ने हमेशा उस पंजाब को लोगों की नजरों से दूर रखा। जाहिर है उनके लिए वो पंजाब अस्तित्व ही नहीं रखता। सन् 47 के रक्तरंजित बंटवारे के बाद इस पंजाब में न के बराबर मुस्लिम पंजाबी बचे। उनके पीछे रह गईं तो बस सूफी संतों की समाधियां। डॉक्युमेंट्री बताती है कि ये सूफी फकीरों की मजारें आज भी फल-फूल रही हैं। खासतौर पर समाजी बराबरी में नीचे समझे जाने वाले भूमिहीन दलितों के बीच, जो आबादी का 30 फीसदी हैं। जैसे, बी.एस. बल्ली कव्वाल पासलेवाले पहली पीढ़ी के कव्वाल हैं। उनके पिता मजदूरी करते थे और इन्होंने उस सूफी परंपरा को संभाल लिया। सूफी और दलितों का ये मेल आश्चर्य देता है। और इसे सिर्फ धार्मिक बदलाव नहीं कहा जा सकता, ये सामाजिक जागृति का भी संकेत है। महिला-पुरुष का भेद भी यहां मिटता है। जैसे, हम सोफीपिंड गांव में संत प्रीतम दास की मजार देखते हैं, जो दुनिया कूच करने से पहले अपने यहां झाड़ू निकालने वाली अनुयायी चन्नी को गद्दीनशीं कर चन्नी शाह बना गए।

फ़िल्म का महत्वपूर्ण हिस्सा 1913 से 1947 तक गदर आंदोलन के नेता रहे बाबा भगत सिंह बिल्गा भी हैं। उन्हें देखना विरला अनुभव देता है। वे और लाल सिंह दिल फ़िल्म बनने के चार साल बाद 2009 में चल बसे। ऐसे में जो हम देख रहे हैं उसका महत्व अगले हजार सालों के लिए बढ़ जाता है। डॉक्युमेंट्री के आखिर में लाल सिंह ये मार्मिक और अत्यधिक समझदारी भरी पंक्तियां सुनाते हैं...

“ सामान, जद मेरे बच्चेयां नूं सामान मिल गया होऊ
 तां उनाने की की उसारेया होवेगा…
 ... बाग़
 ... फसलां
 ... कमालां चो कमाल पैदा कीता होवेगा उनाने
 जद मेरे बच्चेयां नूं समान मिल गया होऊ
 जद मेरे बच्चेयां नूं समान मिल गया होऊ ”

(कृपया ajayunmukt@gmail.com पर संपर्क करके अजय भारद्वाज से उनकी 'पंजाब त्रयी' की डीवीडी जरूर मंगवाएं, अपनी विषय-वस्तु के लिहाज से वो अमूल्य है)

“Where The Twain Shall Meet” - Watch an extended trailer here:

Punjab was partitioned on religious lines amidst widespread bloodshed in 1947, and today there are hardly any Punjabi Muslims left in the Indian Punjab. Yet, the Sufi shrines in the Indian part of Punjab continue to thrive, particularly among so-called ‘low’ caste Dalits that constitutes more than 30% of its population. Kitte Mil Ve Mahi explores for the first time this unique bond between Dalits and Sufism in India. In doing so it unfolds a spiritual universe that is both healing and emancipatory. Journeying through the Doaba region of Punjab dotted with shrines of sufi saints and mystics a window opens onto the aspirations of Dalits to carve out their own space. This quest gives birth to ‘little traditions’ that are deeply spiritual as they are intensely political.

Enter an unacknowledged world of Sufism where Dalits worship and tend to the Sufi Shrines. Listen to B.S. Balli Qawwal Paslewale – a first generation Qawwal from this tradition. Join a fascinating dialogue with Lal Singh Dil – radical poet, Dalit, convert to Islam. A living legend of the Gadar movement, Bhagat Singh Bilga, affirms the new Dalit consciousness. The interplay of voices mosaic that is Kitte Mil Ver Mahi (where the twain shall meet), while contending the dominant perception of Punjab’s heritage, lyrically hint at the triple marginalisation of Dalits: economic, amidst the agricultural boom that is the modern Punjab; religious, in the contesting ground of its ‘major’ faiths; and ideological, in the intellectual construction of their identity.

(Users in India and International institutions, can contact Ajay Bhardwaj at ajayunmukt@gmail.com for the DVDs (English subtitles). You can join his facebook page to keep updated of his documentary screenings in a city near you.)

Monday, July 15, 2013

मानो मत, जानोः “एक मिनट का मौन” ...बलिदानों के लिए

हॉली और बॉली वुडों ने दावा किया कि दुनिया बस वही है जो उन्होंने दिखाई... बहुत बड़ा झूठ बोला, क्योंकि दुनिया तो वह नहीं है। दुनिया का सच तो हिलाने, हैराने, हड़बड़ाने और होश में लाने वाला है, और उसे दस्तावेज़ किया तो सिर्फ डॉक्युमेंट्री फिल्मों ने। “मानो मत, जानो” ऐसी ही एक श्रंखला है जिसमें भारत और विश्व की अऩूठे धरातल वाली अविश्वसनीय और परिवर्तनकारी डॉक्युमेंट्रीज पढ़ व देख सकेंगे।

 Documentary...A Minute of Silence (1997), by Ajay Bhardwaj.

Chandrashekhar in a still from the film.
1997 में 31 मार्च की शाम, बिहार के सीवान ज़िले में नुक्कड़ सभाएं कर रहे चंद्रशेखर प्रसाद को जे.पी. चौक पर गोली मार दी गई। वह जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से पढ़े युवा छात्र नेता थे। अपने गृह ज़िले लौटे थे क्योंकि बेहतर दुनिया बनाने का जो ज्ञान ऊंची-ऊंची बातों और मोटी-मोटी किताबों से लिया था, उसे फैंसी कैंपस की बजाय बुनियादी स्तर पर ही जाकर उपजाना था। सीवान के खौफज़दा माहौल में जहां सांसद शहाबुद्दीन का आंतक था, चंद्रशेखर ने आवाज बुलंद की थी। स्थानीय स्तर पर इतने अनूठे, तार्किक और खुले विचारों के सिर्फ दो ही नतीजे निकलने थे। पहला था बदलाव हो जाना, राजनीति में अपराधीकरण खत्म हो जाना और दूसरा था मृत्यु।

इस बार भी हत्यारा उतना ही अलोकतांत्रिक और अपराधी था जितना कि 1989 में पहली जनवरी को लेखक और रंगकर्मी सफ़दर हाशमी की नुक्कड़ नाटक ‘हल्ला बोल’ के बीच हत्या करने वाला स्थानीय कॉन्ग्रेसी नेता। आज़ाद भारत में इन दो युवा कार्यकर्ताओं की हत्या ने भय के माहौल को और भी बढ़ाया है। लेकिन हौंसला आया है तो उसके बाद देश में हुए व्यापक प्रदर्शनों से। जिनके वो सबसे करीबी थे, वो ही आंसू पौंछकर सबसे आगे डटे थे। सफ़दर की मौत के दो दिन बाद उनकी पत्नी मॉलोयश्री ‘जन नाट्य मंच’ के साथ उसी जगह पर वापस लौटीं और उस अधूरे नुक्कड़ नाटक को पूरा किया। उसी तरह चंद्रशेखर की बूढ़ी मां ने अविश्वसनीय हौंसला दिखाते हुए बिना कमजोर पड़े, दोषियों को सरेआम फांसी देने की मांग की। हर रैली में वह दौड़-दौड़कर आगे बढ़ीं।

चंद्रशेखर प्रसाद की हत्या के बाद दिल्ली, सीवान और देश में बने गुस्से के माहौल को निर्देशक अजय भारद्वाज की ये डॉक्युमेंट्री बेहतर समझ से दस्तावेज़ करती है। स्वर सिर्फ शोक के नहीं होते बल्कि उस बलिदान की सम्मानजनक प्रतिक्रिया वाले भी होते हैं। फ़िल्म के बीच-बीच में बहुत बार खुद चंद्रशेखर को सुनने का मौका मिलता है, उनके व्यक्तित्व और विचारों को समझने का मौका मिलता है जो कि दीर्घकाल में न जाने कितने युवाओं के काम आ सकता है। फ़िल्म के शुरू में चंद्रशेखर और अन्य गांव वालों के शवों वाले दृश्य भौचक्का करते हैं, शहरों में बैठों का मानवीय समाज में रहने का भरम टूटता है। ‘एक मिनट का मौन’ देखना अपने असल समाजों के प्रति जागरूक होना है। अजय ने बनाकर कर्तव्य निभाया है, हमें सीखकर, लागू करके इस्तेमाल को सार्थक करना है।

“A Minute of Silence - Watch the full documentary here:

It was a late afternoon in Siwan, a small town in the Indian state of Bihar. A young leader, after already having addressed four street corner meetings, is on his way to JP Chowk to address another, quite unmindful of his apparently impossible dreams in a very cynical present. He is sighted by some associates of a local Member of Parliament, a notorious mafia Don. The young leader is Chandrashekhar Prasad. Seconds later he is killed.

The news spreads. Reaches Jawaharlal Nehru University in Delhi. The premier institute of whose students’ union Chandrashekhar was twice the president. There is an anger, a fury which refuses to subside…The Government refuses to respond. The apathy and ignoble silence so uniquely its hallmark and preserve. This apathy, this grief, this indifference, this hurt. This is what ‘Ek Minute Ka Maun’ sets to establish. Piecing together scenes from the agitation and combining with it the portrait of Chandrashekhar. The man and the leader, the rebel and the dreamer. An unwitting pawn, but a willing activist, caught in the spidery web of criminal – political nexus. But dreams do not die after Chandu. They live on, still hopeful, still optimistic. Very much like him.

(Users in India and International institutions, can contact Ajay Bhardwaj at ajayunmukt@gmail.com for the DVDs (English subtitles). You can join his facebook page to keep updated of his documentary screenings in a city near you.)

Saturday, July 13, 2013

मेरा प्रोसेस बस इतना है कि पहले कुछ सोचता हूं और जब किसी चीज के प्रति एक्साइटेड होने लगता हूं तो अपने आप एक अनुशासन आ जाता हैः रितेश बत्रा

 Q & A. .Ritesh Batra, film director (Dabba/The Lunchbox).
 
Irfan Khan, in a Still from 'Dabba' (The Lunchbox).
‘डब्बा’ या ‘द लंचबॉक्स’ के बारे में सुना है?
… झलक देखें यहां, यहां भी

इस साल कान अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव-2013 में इस फ़िल्म को बड़ी सराहना मिली है। वहां इसे क्रिटिक्स वीक में दिखाया गया। रॉटरडैम अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव के सिनेमार्ट-2012 में इसे ऑनरेबल जूरी मेंशन दिया गया। मुंबई और न्यू यॉर्क में रहने वाले फ़िल्म लेखक और निर्देशक रितेश बत्रा की ये पहली फीचर फ़िल्म है। उन्होंने इससे पहले तीन पुरस्कृत लघु फ़िल्में बनाईं हैं। ये हैं ‘द मॉर्निंग रिचुअल’, ‘ग़रीब नवाज की टैक्सी’ और ‘कैफे रेग्युलर, कायरो’। दो को साक्षात्कार के अंत में देख सकते हैं। 2009 में उनकी फ़िल्म पटकथा ‘द स्टोरी ऑफ राम’ को सनडांस राइटर्स एंड डायरेक्टर्स लैब में चुना गया। उन्हें सनडांस टाइम वॉर्नर स्टोरीटेलिंग फैलो और एननबर्ग फैलो बनने का गौरव हासिल हुआ।

अब तक दुनिया की 27 टैरेटरी में प्रदर्शन के लिए खरीदी जा चुकी ‘डब्बा’ का निर्माण 15 भारतीय और विदेशी निर्माणकर्ताओं ने मिलकर किया है। भारत से सिख्या एंटरटेनमेंट, डीएआर मोशन पिक्चर्स और नेशनल फ़िल्म डिवेलपमेंट कॉरपोरेशन (एनएफडीसी) और बाहर एएसएपी फिल्म्स (फ्रांस), रोहफ़िल्म (जर्मनी), ऑस्कर जीत चुके फ़िल्मकार दानिस तानोविक व फ्रांस सरकार ने इसमें वित्त लगाया है। ‘पैरानॉर्मल एक्टिविटी-2’ (2010) में सिनेमैटोग्राफर रह चुके माइकल सिमोन्स ने ‘डब्बा’ का छायांकन किया है।

कहानी बेहद सरल और महीन है। ईला (निमरत कौर) एक मध्यमवर्गीय गृहिणी है। भावहीन पति के दिल तक पेट के रस्ते पहुंचने की कोशिश में वह खास लंच बनाकर भेजती है। पर होता ये है कि वो डब्बा पहुंचता है साजन फर्नांडिस (इरफान खान) के पास। साजन विधुर है, क्लेम्स डिपार्टमेंट में काम करता है, रिटायर होने वाला है। मुंबई ने और जिंदगी ने उससे सपने और अपने छीने हैं इसलिए वह जीवन से ही ख़फा सा है। अपनी जमीन पर खेलते बच्चों को भगाता रहता है और शून्य में रहता है। जब ईला जानती है कि डब्बा पति के पास नहीं पहुंचा तो वह अगले दिन खाली डब्बे में एक पर्ची लिखकर भेजती है। जवाब आता है। यहां से ईला और साजन अपने भावों का भार लिख-लिख कर उतारते हैं। इन दोनों के अलावा कहानी में असलम शेख़ (नवाजुद्दीन सिद्दीकी) भी है। वह खुशमिजाज और ढेरों सपने देखने वाला बंदा है। रिटायर होने के बाद साजन फर्नांडिस की जगह लेने वाला है इसलिए उनसे काम सीख रहा है।

‘डब्बा’ हमारे दौर की ऐसी फ़िल्म है जिसे तमाम महाकाय फ़िल्मों के बीच पूरे महत्व के साथ खींचकर देखा जाना चाहिए। अंतरराष्ट्रीय निर्माताओं के साथ भागीदारी के लिहाज से ‘डब्बा’ नई शुरुआत है। उच्च गुणवत्ता वाली एक बेहद सरल स्क्रिप्ट होने के लिहाज से भी ये विशेष है। भारतीय फीचर फ़िल्मों के प्रति विश्व के नजरिए को बदलने में जो कोशिश बीते एक-दो साल में कुछ फ़िल्मों ने की है, उसे रितेश की ‘डब्बा’ मीलों आगे ले जाएगी। पूरे विश्व सहित फ़िल्म भारत में भी जल्द ही प्रदर्शित होगी। जब भी हो जरूर देखें, अन्यथा आज नहीं तो 15-20 साल बाद, देरी से, खोजेंगे जरूर।

रितेश बत्रा से तुरत-फुरत में बातचीत हुई। बीते दिनों में जितने भी फ़िल्म विधा के लोगों से बातचीत हुई है उनमें ये पहले ऐसे रहे जिनका पूरा का पूरा ध्यान स्क्रिप्ट पर रहता है, फ़िल्म तकनीक पर या भारतीय, गैर-भारतीय फ़िल्मकारों की शैली के उन पर असर पर आता भी है तो बहुत बाद में, अन्यथा नहीं आता। प्रस्तुत हैः

फैमिली कहां से है आपकी? आपका जन्म कहां हुआ?
बॉम्बे में ही पैदा हुआ हूं, यहीं बड़ा हुआ हूं। मेरे फादर मर्चेंट नेवी में थे, मां योग टीचर हैं। बांद्रा में रहता हूं। बंटवारे के वक्त लाहौर, मुल्तान से मेरे दादा-दादी और नाना-नानी आए थे।

फ़िल्मों की सबसे पहली यादें बचपन की सी हैं? कौन सी देखी? लगा था कि फ़िल्मकार बनेंगे?
फ़िल्मों में काम करने की कोई संभावना नहीं थी। फ़िल्में अच्छी लगती थीं, लिखना अच्छा लगता था। लेकिन आपको पता है कि 80 और 90 के दशक में भारत में फ़िल्मों में आगे बढ़ने और रोजगार बनाने की कोई संभावना कहां होती थी। पर जो भी आती थी देखते थे। गुरु दत्त की फ़िल्में बहुत अच्छी लगती थीं। ‘प्यासा’ हुई, ‘कागज के फूल’ हुई, उनका मजबूत प्रभाव था। वर्ल्ड सिनेमा की तो कोई जानकारी थी ही नहीं बड़े होते वक्त। हॉलीवुड फ़िल्में जो भी बॉम्बे में आती और लगती थीं, वो देखते थे। जब 19 साल का था तब भारत से बाहर पहली बार गया, इकोनॉमिक्स पढ़ने। वहां जाकर पहली बार सत्यजीत रे की फ़िल्में देखीं तो उनका बड़ा असर था। वैसे कोई इतना एक्सपोजर नहीं था यार ईमानदारी से। जो भी हिदीं फ़िल्म और इंग्लिश फ़िल्म आती वो देखते थे।

बचपन में क्या लिखने-पढ़ने का शौक था? उनके स्त्रोत क्या थे आपके पास?
बहुत ही ज्यादा पढ़ता था मैं। आप ‘लंच बॉक्स’ में भी देखेंगे तो साहित्य का असर नजर आएगा। मैं बचपन से ही बहुत आकर्षित था मैजिक रियलिज़्म से, लैटिन अमेरिकन लेखकों से, रूसी लेखकों से। मेरी साहित्य में ज्यादा रुचि थी और मूवीज में कम। अभी भी वैसा ही है, पढ़ता ज्यादा हूं और मूवीज कम ही देखता हूं।

जब छोटे थे तो घर पर क्या कोई कहानियां सुनाता था?
सुनाते तो नहीं थे पर मेरे नाना लखनऊ के एक अख़बार पायोनियर में कॉलम लिखते थे। वो बहुत पढ़ते थे और मुझे भी पढ़ने के हिसाब से कहानियां या नॉवेल सुझाते थे। पढ़ने को वो बहुत प्रोत्साहित करते थे।

स्कूल में आपके लंचबॉक्स में आमतौर पर क्या हुआ करता था?
हा हा हा। मेरे तो यार घर का खाना ही हुआ करता था। थोड़ा स्पाइसी होता था। चूंकि मेरी मदर बहुत स्पाइसी खाना बनाती हैं इसलिए मेरे लंच बॉक्स में से क्या है कि कोई खाता नहीं था। सब्जियां, परांठे और घर पर बनने वाला नॉर्मल पंजाबी खाना होता था। पर मिर्ची ज्यादा होती थी।

साहित्य और क्लासिक्स पढ़ते थे? क्या साथ में कॉमिक्स और पॉपुलर लिट्रेचर भी पढ़ते थे?
कॉमिक्स में तो कोई रुचि नहीं थी कभी भी, अभी भी नहीं है।

Ritesh Batra
घरवालों के क्या कुछ अलग सपने थे आपको लेकर? या वो भी खुश थे आपके फ़िल्ममेकर बनने के फैसले को लेकर?
उन्हें तो मैंने बहुत देर से बताया था। पहले तो मैंने तीन साल इकोनॉमिक्स पढ़ा। बिजनेस कंसल्टेंट था डिलॉयट के साथ। मैंने बाकायदा नौकरी की थी। बाद में वह नौकरी छोड़कर जब फ़िल्म स्कूल गया तब उन्हें बताया। जाहिर तौर पर उनके लिए तो बहुत बड़ा झटका था। उन्होंने सोचा नहीं था कि मैं ऐसा कुछ करूंगा।

कब तय किया कि फ़िल्में ही बनानी हैं?
मैं 25-26 का था तब तय किया कि मुझे कुछ करना पड़ेगा मूवीज में ही। तब मुझे राइटर बनना था। फ़िल्म राइटर बनना था। मुझे पता था कि जब तक पूरी तरह इनवेस्ट नहीं हो जाऊंगा, नहीं होगा। बाकी सारे दरवाजे बंद करने पड़ेंगे। उसके लिए एक ही रास्ता बचा था कि जॉब छोड़कर फ़िल्म स्कूल जॉइन कर लूं। न्यू यॉर्क यूनिवर्सिटी के टिश स्कूल ऑफ आर्ट्स फ़िल्म प्रोग्रैम में दाखिला लिया। पांच साल की पढ़ाई थी और बड़ा सघन और डूबकर पढ़ने वाला प्रोग्रैम था। उसे सिर्फ डेढ़ साल किया। सेकेंड ईयर में था तब एक स्क्रिप्ट मैंने लिखी थी जो सनडांस लैब (2009) में चुन ली गई। ये संस्थान बहुत पुराना है। स्टीवन सोडरबर्ग और क्वेंटिन टेरेंटीनों जैसे नामी फ़िल्मकारों की स्क्रिप्ट भी इस लैब से ही गई थी। तो राइटर्स लैब और डायरेक्टर्स लैब दोनों में चुन ली गई मेरी स्क्रिप्ट। इसमें टाइम लग रहा था और पढ़ाई करिकुलम बेस्ड हो रही थी तो मैंने फ़िल्म स्कूल छोड़ दिया। शॉर्ट फ़िल्में बनाने लगा।

यूं नौकरी छोड़ देने से और पढ़ने लगने से पैसे की दिक्कत नहीं हुई?
मेरी सेविंग काफी थी। तीन साल काम किया हुआ था, उस दौरान काफी पैसे बचाए थे। फिर फ़िल्म स्कूल भी तो एक-डेढ़ साल में ही छोड़ने का फैसला कर लिया था, इससे आगे की फीस पर खर्च नहीं करना पड़ा। मेरी वाइफ मैक्सिकन है। वो बहुत प्रोत्साहित करती थी। पेरेंट्स भी प्रोत्साहित करते कि लिखो। कहते थे कि जॉब होनी जरूरी है, फैमिली का ख़्याल रखना जरूरी है। अवसरों के लिहाज से लगता था कि जॉब नहीं छोड़ी होती तो इतने कमा रहा होता, इतना कम्फर्टेबल होता, या ट्रैवल कर पा रहा होता। तो वो सब नहीं कर पा रहा था लेकिन खाने और रहने के पैसे थे।

फ़िल्म स्कूल से निकलने के बाद शॉर्ट फ़िल्म और डॉक्युमेंट्री से कुछ-कुछ कमाने लगे थे या अभी भी आपको वित्तीय तौर पर स्थापित होना है?
नहीं यार, ये शॉर्ट फ़िल्म वगैरह बनाने में तो कोई कमाई नहीं होती। बस सनडैंस लैब का ठप्पा लग गया था तो मुझे बहुत सी मीटिंग लोगों से साथ मिलने लगी। तो मौके थे, टीवी (न्यू यॉर्क में) के लिए लिखने के, लेकिन मैंने वो सब किया नहीं क्योंकि मुझे मूवीज में ही रुचि थी। रास्ते से भटक जाता तो वापस पैसों के पीछे या किसी और चीज के पीछे भागने लगता। इसलिए तय किया कि शॉर्ट्स बनाऊंगा और अपनी लेखनी पर ध्यान केंद्रित करूंगा। तो ऐसी कोई कमाई नहीं हो रही थी, सिर्फ तीन-चार साल पहले मैंने एक शॉर्ट फ़िल्म बनाई थी, ‘कैफै रेग्युलर कायरो’ (Café Regular, Cairo)। उस शॉर्ट से मेरी कमाई हुई, उसे फ्रैंच-जर्मन ब्रॉडकास्टर्स ने खरीद लिया। तो उससे अर्निंग हुई, वैसे इतने साल कोई कमाई नहीं हुई।

पहली बार कब कैमरा हाथ में लिया और शूट करना शुरू किया?
फ़िल्म स्कूल के लिए 2005-06 में अप्लाई किया तो एप्लिकेशन के लिए एक शॉर्ट बनाई। तब पहली बार कुछ डायरेक्ट किया था। उसके बाद मैंने पांच और शॉर्ट बनाईं। एक फ़िल्म स्कूल में रहकर बनाई और चार स्कूल छोड़ने के बाद बनाईं।

न्यू यॉर्क यूनिवर्सिटी में फ़िल्म स्कूल वाले दिन कितने रचनात्मक और कितने तृप्त करने वाले थे?
काफी फुलफिलिंग थे। गहन (इंटेंस) थे। लेकिन राइटिंग करने का टाइम मिल नहीं रहा था और मेरे लिए सबसे जरूरी था कि लिखता रहूं और बेहतर लिखता रहूं। इसलिए मुझे जमा नहीं और छोड़ दिया। दूसरा बहुत ही महंगा भी था।

सनडांस का और फ़िल्मराइटिंग का आपको अनुभव है, तो बाकी राइटर्स या आकांक्षी लेखकों को काम की बातें बताना चाहेंगे?
सबसे बड़ी टिप तो मैं यही दूंगा कि किसी की सलाह नहीं सुनने की। क्योंकि हरेक का अपना प्रोसेस होता है, हरेक की अपनी जरूरत होती है और हरेक की अपनी मजबूती होती है। बहुत से डायरेक्टर्स की विजुअल सेंस बहुत मजबूत होती है, रिच होती है, कैरेक्टर डिवेलपमेंट के लिहाज से या राइटिंग के लिहाज से वे कुछ खास नहीं कर पाते। वहीं दूसरी ओर वूडी एलन जैसे भी फ़िल्म डायरेक्टर होते हैं जो सिर्फ ग्रेट राइटर हैं इसलिए लोग उनकी फ़िल्म देखने जाते हैं। तो बंदा खुद ही जानता है कि उसकी मजबूती क्या है, वह किस बात में खास है। उसे अपनी कमजोरी और मजबूती देखनी चाहिए। किसी की सलाह नहीं लेनी चाहिए। उसे ईमानदारी से सोचना चाहिए कि मेरे में क्या कमी है और मैं क्या बेहतर कर सकता हूं।

आपकी स्टोरीराइटिंग कैसे होती है? प्रोसेस क्या होता है?
मुझे तो यार लिखने में बहुत टाइम लगता है। ऐसा कोई प्रोसेस नहीं है कि पहले कुछ आइडिया आए फिर उस पर कुछ रिसर्च करना शुरू करें, वो वर्ल्ड से या कैरेक्टर बेस्ड हो। मुझे लगता है ये सब अंदर से आना चाहिए। मेरा प्रोसेस बस इतना है कि पहले मैं कुछ सोचता हूं। जब किसी चीज के प्रति एक्साइटेड होने लगता हूं तो अपने आप एक अनुशासन आ जाता है कि सुबह उठकर 8 से 11 या 8 से 12 या 8 से 2 बजे तक बैठकर लिखना है। तो इस तरह कहानी के एक खास स्तर तक पहुंचते ही अपने आप राइटिंग का डिसिप्लिन आ जाता है। मेरा राइटिंग प्रोसेस काफी लंबा होता है, महीने या साल लग जाते हैं।

‘डब्बा’ बुनियादी तौर पर बेहद सीधी फ़िल्म है, लेकिन फिर भी ये इतनी बड़ी हो सकती थी, क्या आपने लिखते वक्त सोचा था?
मुझे लगा कि लोगों को अच्छी लगेगी, इतनी अच्छी लगेगी नहीं सोचा था। अवॉर्ड मिलेंगे ये नहीं सोचा था। तब तो यही लगा कि अच्छी कहानी होगी और इसकी अच्छी शेल्फ लाइफ होगी और उसके बाद मुझे दूसरी फ़िल्में मिल जाएंगी। ये नहीं सोचा था कि इतने कम वक्त में इतना कुछ हो जाएगा।

शूट कितने दिन का था और कहां किया?
29 दिन का प्रिंसिपल शूट था फिर बाकी छह दिन हमने डिब्बे वालों को फॉलो किया था डॉक्युमेंट्री स्टाइल में। पूरी स्टोरी बॉम्बे में ही स्थित है और शूटिंग वहीं हुई सारी।

इरफान का किरदार जिस दफ्तर में काम करता है वो कहां है?
चर्चगेट में है, रेलवे का दफ्तर है।

Irfan and Nawaj, in a still from the movie.
इरफान और नवाज को पहले से जानते थे या फ़िल्म के सिलसिले में ही मुलाकात हुई?
नहीं, पहले से तो मैं किसी को नहीं जानता था। प्रोड्यूसर्स के जरिए उनसे संपर्क किया। उन्हें स्क्रिप्ट दी तो अच्छी लगी। एक बार मिला, उन्होंने हां बोल दिया। शूट से पहले तो बहुत बार मिले। कैरेक्टर्स डिस्कस किया। बाकी जान-पहचान शूटिंग के दौरान ही हुई।

इन दोनों में क्या खास बात लगी आपको?
दोनों ही इतने अच्छे एक्टर्स हैं, केंद्रित हैं, किरदार को अपना हिस्सा मानने लगते हैं, पर्सनली इनवॉल्व्ड हो जाते हैं। जो मैंने लिखा उसे दोनों ने और भी गहराई दे दी। उनके साथ काम करना तो बड़ी खुशी थी। मैंने बहुत सीखा उनसे।

सेट पर उनके होने की ऊर्जा महसूस होती थी?
वैसे दोनों ही बहुत रेग्युलर और विनम्र हैं। सेट पर तो काम पर ही ध्यान देते थे हम लोग। बातें करते थे कि कैसे और बेहतर बनाएं फ़िल्म को, कैसे जो मटीरियल हमारा है उसमें और गहराई में जाएं। हम लोग नई-नई चीजें ट्राई करते थे, विचार करते थे। उनके कद का कोई प्रैशर नहीं महसूस हुआ। उन्होंने भी कभी फील नहीं करने दिया कि वे इतने सक्सेसफुल हैं। मैंने कभी सोचा ही नहीं कि वो इतने फोकस्ड होंगे। लेकिन मुझे लगता है आप सही हैं, अब फ़िल्म के बाद जब सोचता हूं तो लगता है।

आप खाना अच्छा बनाते हैं। फ़िल्म में जो डिश नजर आती हैं वो आपने पकाई थीं?
नहीं नहीं, मैंने नहीं बनाई थीं। सेट पर एक पूरी टीम थी फूड स्टाइलिस्ट्स की। क्योंकि खाना अच्छा दिखना बहुत जरूरी था। बहुत सारे लोग इन्वॉल्व्ड थे हरेक शॉट के पीछे। हमारे पास बहुत अच्छे फूड स्टाइलिस्ट थे जो खाने का ध्यान रख रहे थे।

फ़िल्म के विजुअल्स को लेकर आपके और डीओपी (Michael Simmonds) के बीच क्या डिस्कशन होते थे?
दो महीने पहले से विचार-विमर्श चल रहा था। वो तभी न्यू यॉर्क से बॉम्बे आए थे। स्क्रिप्ट को टुकड़ों में तोड़ा था, हर लोकेशन के मल्टीपल प्लैन थे और पूरा शूटिंग प्लैन बनाया था। प्री-प्रोडक्शन मूवी का छह महीने पहले शुरू कर दिया था। फ़िल्म के किरदार मीना की कहानी उसके फ्लैट के अंदर ही चलती है। वो फ्लैट हमने शूट के चार महीने पहले देखा और तय कर लिया था। हम वहां रोज बैठते थे, चीजें डिस्कस करते थे। उसकी शूटिंग पहले कर ली। हरेक डिपार्टमेंट के साथ, प्रोडक्शन डिजाइनर के साथ, डीओपी के साथ, कॉस्ट्यूम्स के साथ तैयारी बहुत ज्यादा थी।

आप दोनों का विजुअल्स को लेकर विज़न क्या था?
चूंकि मूवी कैरेक्टर ड्रिवन है और मुंबई व फूड इसके महत्वपूर्ण कैरेक्टर हैं, तो मेरा सबसे बड़ा एजेंडा था स्क्रिप्ट को ब्रेकडाउन करना और डीओपी को मेरा निर्देश था कि किरदारों के साथ ज्यादा से ज्यादा बिताना है। उससे जरूरी चीजें कुछ न थी। फूड के अलग-अलग शॉट्स लेने या बॉम्बे के मादक शॉट्स लेने से ज्यादा जरूरी ये था। हम रात के 12-12 बजे तक कैरेक्टर्स के साथ वक्त बिताते थे।

फ़िल्म के म्यूजिक के बारे में बताएं।
ज्यादा है नहीं म्यूजिक तो। गाने हैं नहीं, बैकग्राउंड स्कोर भी बहुत सीमित है। साउंड डिजाइन का अहम रोल है। वो कैरेक्टर की यात्रा दिखाता है। इसके लिए मुख्यतः सिटी का साउंड और एनवायर्नमेंट का साउंड रखा गया है। मेरी बाकी मूवीज में भी ऐसे ही सोचा और किया है। डब्बा में 14 क्यू (cues – different part/pieces of soundtrack ) हैं और म्यूजिक बहुत ही अच्छा है। इसे जर्मन कंपोजर हैं मैक्स रिक्टर ने रचा है।

‘द स्टोरी ऑफ राम’ के बारे में बताएं।
एक स्क्रिप्ट है जिस पर मैं काम कर रहा हूं और ‘डब्बा’ के बाद उसी पर लौटना चाहूंगा। ये बहुत पहले से (2009) दिमाग में है, चूंकि मेरा राइटिंग प्रोसेस बहुत स्लो और थकाऊ है तो वक्त लगता है। इस पर अभी क्या बताऊं। जब हो जाएगी तब बताता हूं।

‘कैफे रेग्युलर कायरो’...
ये एक शॉर्ट फ़िल्म है जो मैंने कायरो में बनाई थी। उसके लिए मैंने कायरो में बहुत सारा वक्त बिताया। ‘लंचबॉक्स’ भी मैंने कायरो में ही लिखी थी।

“The Morning Ritual” – Watch here:

“Café Regular, Cairo” – Watch here:


Ritesh Batra was born and raised in Mumbai, and is now based in Mumbai and New York with his wife Claudia and baby girl Aisha. His feature script 'The Story of Ram' was part of the Sundance Screenwriters and Directors labs in 2009. His short films have been exhibited at many international film festivals and fine arts venues. His Arab language short 'Café Regular, Cairo', screened at over 40 international film festivals and won 12 awards. Café Regular was acquired by Franco-German broadcaster, Arte. His debut feature 'The Lunchbox' (English, Hindi) starring Irrfan Khan, Nawazuddin Siddique, and Nimrat Kaur, was shot on location in Mumbai in2012. 'The Lunchbox' premiered at the Semaine De La Critique (International Critics Week) at the 2013 Cannes International Film Festival to rave reviews. It won the Grand Rail d'Or Award and was acquired by Sony Pictures Classics.
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Thursday, July 11, 2013

भाग मिल्खा भागः राकेश मेहरा और फरहान अख़्तर से बातें

 Q & A. .Rakeysh Mehra (director) & Farhan Akhtar (actor), Bhaag Milkha Bhaag.

Farhan Akhtar with Rakeysh Omprakash Mehra, both looking at Milkha Singh. Photo: Jaswinder Singh

राकेश मेहरा से पिछली मुलाकात दो साल पहले हुई थी, तब वह अपनी निर्माण कंपनी की फिल्म ‘तीन थे भाई’ पर बात करने आए हुए थे। बातें बायोपिक बनाने के पीछे चलने वाले विचारों और ‘मिल्खा सिंह’ बनाने को लेकर उनकी सोच पर हुई। उसका संक्षिप्त अंश यहां पढ़ सकते हैं। जब उन्होंने मिल्खा सिंह की भूमिका के लिए फरहान अख़्तर का चयन कर लिया तो संयोग से कुछेक दिनों में फरहान से भी मुलाकात हुई। वे उस वक्त अपने निर्देशन में बनी 'डॉन-2' पर बात करने आए थे। बातचीत यहां पढ़ सकते हैं।

खैर, ‘भाग मिल्खा भाग’ आज रिलीज हो चुकी है। उससे एक दिन पहले राकेश और फरहान से बातचीत हुई। चंडीगढ़ में अपनी फिल्म का विशेष प्रीमियर मिल्खा सिंह और उनके परिवार की उपस्थिति में भारतीय सेना के लिए करने हेतु वे आए थे। पढ़ें कुछ अंशः

इस कहानी की कहानी

राकेश ओमप्रकाश मेहराः मिल्खा सिंह जी की जिंदगी से प्रेरित है ये कहानी। बचपन में मिल्खा सिंह की गाथा सुन-सुन के हम बड़े हुए। दो नाम होते थे, मिल्खा सिंह और दारा सिंह। आगे चलकर मौका मिला कि फ़िल्म बनानी है। तो मेरे एक मित्र हैं, उनके पास एक ऑटोबायोग्राफी मिली जो गुरुमुखी में थी और गुरुमुखी मुझे आती नहीं थी। हमारे प्रोड्यूसर हैं राजीव चंदन, उनके अंकल को आती थी पढ़नी। उन्होंने पहले दो-तीन पन्ने जब पढ़े, तो उसी में आग लग गई। मैंने कहा, यार रोक दीजिए। अपने दोस्त से मैंने कहा कि क्या मिल्खा सिंह से मिलवा सकते हैं। उन्होंने मीटिंग फिक्स करवाई। चंडीगढ़ आए, एक दिन बिताया। निम्मी आंटी (निर्मल कौर, मिल्खा सिंह की पत्नी) ने ऐसे घर पर रखा जैसे हम घर के ही हैं। पूरे दिन बातचीत हुई। जब मैं मुंबई के लिए वापस निकला तो अगले दो-चार महीने नींद उड़ गई थी क्योंकि मेरे लिए ये फैसला लेना बहुत मुश्किल काम होता है कि अगली फ़िल्म कौन सी बनेगी। जेहन में बातें चलती रहीं। फिर हम वापस आए मंजूरी लेने। उस वक्त जीव मिल्खा सिंह जी वहां थे। मिल्खा सर को बहुत सारे ऑफर आए, 50-50 लाख, एक-एक करोड़, डेढ़-डेढ़ करोड़। अब मिल्खा सर तो पिक्चर देखते नहीं, पर जीव रोज शाम को एक पिक्चर देखते हैं। उन्होंने बोला कि ये कहानी जाएगी तो राकेश को ही जाएगी और हम देंगे भी तो एक ही रुपये में देंगे। वो एक रुपया दस करोड़ रुपये से ज्यादा है, मेरी नजर में। उसके बदले भले आप सारा कुबेर का खजाना दे दो, वो भी कम है क्योंकि उस लाइफ की कोई कीमत लगाई नहीं जा सकती। हम 1960 का एक रुपये का नोट लेकर आए, वो मिला बड़ी मुश्किल से लेकिन मिल गया। उन्हें दिया। खैर, सारी बातों की एक बात ये है कि हमने फ़िल्म बनाई। फरहान ने एक्टिंग की, प्रसून ने लिखी। फिर भी हमने कुछ नहीं किया है। हमें ये मौका मिला, हमारे को चुना गया है, ये हमने नहीं चुना है। ये अपने आप हो जाती हैं चीजें, जबकि हमें लगता है हम कर रहे हैं। ये मौका मिला हमें, ये ही बड़ी बात है। हो सकता है कि हमसे कुछ छोटी-मोटी गलतियां हुई हों, पर हमने जान लगा दी है।

समयकाल

राकेशः ये कहानी 1947 से लेकर 1960 तक जाती है, फिर वहां रुक जाती है।

कितनी हकीकत, कितना फसाना

राकेशः एक फ़िल्म एक विजन होती है, संयुक्त प्रयास होता है। पहले उसे लिखा जाता है। जब गरम-गरम स्क्रिप्ट हाथ में आती है तो उसमें तस्वीरें डाली जाती हैं। वो कहते हैं न अंदाज-ए-बयां। एक शेर होगा तो आप अलग तरीके से पढ़ेंगे और मैं अलग तरीके से पढूंगा। फिर आर्ट डायरेक्टर के साथ और कैमरामैन के साथ बैठकर बात करने से स्पष्टता आ जाती है। स्क्रिप्ट फिर एक्टर्स को दी जाती है और एक्टर आकर सब बदल देते हैं। वो अपना लेकर आते हैं। ये मानवीय भावों का काम है। दर्शक सिनेमाघर आते हैं तो अपने इमोशन लेकर आते हैं और फ़िल्म में जोड़ते हैं। हम गाड़ियां तो बना नहीं रहे हैं कि एक गाड़ी बनाई और चल पड़ी तो वैसी ही दस लाख और बना दीं। तो मैं स्क्रिप्ट एक्टर के हाथ में देता हूं और तीन कदम पीछे होते हुए कैमरे के पीछे चला जाता हूं। एक्शन बोलता हूं और फिर सब उन पर है। इसमें अब वे अपना इंटरप्रिटेशन लाते हैं। कैमरामैन उसे अपनी नजरों से देखते हैं। फिर माल एडिटर के पास जाता है, वो अपने नजरिए से उसे काटता है। फ़िल्म बन जाती है तो ऑडियंस के सामने जाती है। अब हरेक ऑडियंस का हरेक मेंबर उसे अपनी अलग नजरों से देखता है। पूरी फ़िल्म के जितने दर्शक होते हैं उतने ही मायने हो जाते हैं।

मिल्खा सिंह निभाने का डर

फरहान अख़्तरः डर और नर्वसनेस जरूरी फैक्टर हैं। हम डरते हैं कि अनुशासन में रहें, चूकें नहीं। ये फिलॉसफी उन्हीं से ली। मिल्खा सिंह जी ने कहा कि मेहनत करो, काम करो। इसके अलावा जब आप ज़ोन में आ जाते हैं तो सब होता जाता है। डर को आप एक्साइटमेंट बना लेते हैं। मिल्खा सिंह दौड़े नहीं उड़े थे, वो इसलिए क्योंकि उन्होंने अपने डरों को पीछे छोड़ दिया था।

किरदार के साथ कोशिशें

फरहानः इस किरदार से न्याय करने की कोशिश तो पूरी की है, और एक एक्टर का काम ही होता है कि कहानी के इमोशनल कंटेंट को, चाहे वो फिक्शनल हो या नॉन-फिक्शनल, परदे पर ऐसे दर्शाए कि लोगों को लगे कि परदे पर भावों का पूरा बहाव देख रहे हैं। इस फ़िल्म में अपनी खुद की कल्पना के अलावा मैं मिल्खा सिंह जी से बात करके पहलू और भावनाएं डालता था। किसी एक्टर की जिंदगी में ऐसे मौके बहुत कम आते हैं जब ऐसे किसी इंसान पर फ़िल्म बने और वो रोल आप करें। ये लाइफ एक्सपीरियंस है। मिल्खा सिंह और उनकी जिंदगी से बहुत कुछ सीखने को मिला है।

निर्देशक का निर्देशन करना

राकेशः ये तो आप उल्टा बोल रहे हैं। देखिए न कि मैं कितना अक्लमंद था कि मैंने अपना सारा काम आसान कर लिया। जैसे, मैथ्स का पेपर देने जा रहा हूं और जो टीचर है उसको बोल दिया कि आप लिख दो पेपर। बतौर निर्देशक मेरा काम करने का स्टाइल ये है कि मैं किसी के काम में दखल नहीं देता। मैं ये नहीं कह सकता कि ये मत कीजिए, मैं कहता हूं कि ये करिए। क्योंकि इंटरप्रिटेशन तो एक्टर का ही होगा। मैं हर फैसला इंस्टिंक्ट से लेता हूं। मेरे अंदर की आवाज मुझे दिशा दिखाती है। फिर भी अगर कभी मुझे ऐसा लगा कि मेरे इंस्टिंक्ट मेरे से दूर हैं और मेरी अंदरूनी आवाज जवाब नहीं दे रही तो फरहान से अच्छा बाउंसिंग बोर्ड और क्या हो सकता था। उनसे बहुत मदद मिलती थी। ये बहुत अच्छी बात है कि आपकी टीम में एक ऐसे मेंबर भी हैं जो मेंबर ही नहीं है बल्कि स्तंभ हैं।

प्रोफाइल बेहतर होगा कि जिंदगी

राकेशः ये करियर डिफाइनिंग फ़िल्म नहीं है, ये तो लाइफ डिफाइनिंग फ़िल्म है। मेरी जिंदगी बदल गई है इस फ़िल्म से। फिर से परिभाषित हुई है।

वस्तुपरकता रखी कि भावावेश में छोड़ दी

राकेशः मैं इसके बारे में बहुत कुछ बोल सकता हूं। पर मेरी गुजारिश है कि आप फ़िल्म देखें, आपको सारे जवाब मिल जाएंगे। शॉर्ट में ये कहना चाहूंगा कि किरदार इतने असल हैं जितने हो सकते थे। जिंदगी के करीब हैं। वे ब्लैक एंड वाइट नहीं हैं, ग्रे हैं। पक्का ग्रे हैं। होना भी चाहिए। हम सभी होते हैं।

शारीरिक कोशिशें/मुश्किलें

फरहानः काम मुश्किल तब होता है जब करने में आपको मजा नहीं आ रहा हो। मजा आ रहा होता है तो कोई दिक्कत ही नहीं, सब हो जाता है। फ़िल्म का और मिल्खा जी का कद इतना बड़ा है कि उसके लिए कुछ भी करना पड़े तो कम है, इसलिए जितना भी किया कम ही था।

इस किरदार से निकलने की प्रक्रिया

फरहानः मुश्किल है, क्योंकि बहुत इमोशनल इनवेस्टमेंट हुआ है। जिन लोगों के साथ काम किया है, उन्हें मिस करूंगा। लेकिन ये भी जरूरी है कि आप हमेशा अपने आप को याद दिलाएं कि इन सब चीजों के बाद आप एक कलाकार हैं , एक एक्टर हैं। आगे बढ़ने के लिए आपको कुछ ऐसी चीजें पीछे भी छोड़नी पड़ेंगी। अगर आप वहीं रह गए इमोशनली, तो आगे कैसे बढ़ेंगे, कुछ नया करने की कोशिश कैसे करेंगे, कुछ और पाने की कोशिश कैसे करेंगे। ये लड़ाई है और लड़नी पड़ती है इसलिए मैंने इसके बाद एक फ़िल्म की है ‘शादी के साइड इफेक्ट्स’। उसने भी मेरी बड़ी मदद की आगे बढ़ने में क्योंकि बहुत ही अलग किरदार था और दूसरे कास्ट और क्रू के साथ काम करने का मौका मिला। लेकिन ‘भाग मिल्खा भाग’ दुर्लभ अनुभव है। किरदार और फ़िल्म से लगाव का ऐसा अनुभव इससे पहले मेरे साथ ‘लक्ष्य’ के टाइम पर हुआ था। उस वक्त भी यादें और भाव मेरे साथ ही रुक गए थे। इस फ़िल्म में भी ऐसा ही हुआ। आशा करता हूं कि जिंदगी में ऐसी स्क्रिप्ट या कहानी फिर से आ सके जो मुझे ठीक वैसा ही महसूस करवाए जैसा ‘भाग मिल्खा भाग’ ने करवाया है।

सेना और मिल्खा सिंह

राकेशः मिल्खा सर की जिंदगी का बहुत अहम हिस्सा सेना रही। बचपन में उनके सिर के ऊपर न तो मां-बाप का साया था, न रहने को जगह थी, न पहनने को कपड़े थे, हाथ में चाकू था, कोयला-गेहूं-चीनी चुराते थे। तिहाड़ तक गए। पर उन्होंने एक मकसद बनाया कि इज्जत की रोटी खानी, मेहनत की कमाई खानी। तिहाड़ जेल में उनके सामने डाकू और खूनी भी आए और वो उनके साथ भी जा सकते थे, पर उन्होंने तय किया कि आर्मी में जाना है। तीन साल उन्होंने कोशिश की और चौथे साल में उनका चयन हुआ। आर्मी ने मिल्खा सिंह को पहचाना और हीरे को तराशा। बाद में दुनिया में जाकर मिल्खा सर ने अपना परचम लहराया, तिरंगा लहराया। वो हर बात में कहते हैं कि मैं जो भी हूं आर्मी की वजह से हूं। ये हम सब की खुशनसीबी है। ये बोलते हुए मेरे रौंगटे खड़े रहे हैं कि जहां से हमने शुरू की थी ये जर्नी। आज हम उसी शहर (चंडीगढ़) में वापस हैं। और इस बात के कितने बड़े मायने होते हैं ये मैं बोल तो गया हूं पर मुझे भी नहीं मालूम। बोलते-बोलते मुझे बड़ी अजीब सी फीलिंग आ रही है, दिल भी थोड़ा बैठ रहा है। ये फ़िल्म हम आर्मी को समर्पित कर रहे हैं।

Rakeysh Omprakash Mehra is an Indian filmmaker. He has directed Bhaag Milkha Bhaag (2013), Rang De Basanti (2006), Delhi-6 (2009) and Aks (2001). Farhan Akhtar is an Indian film director and actor. He made his directorial debut with Dil Chahta Hai (2001). Then he directed Lakshya (2004), Don (2006), and Don-2 (2011). He has acted in Rock on!! (2008) and Zindagi Na Milegi Dobara (2011). In Bhaag Milkha Bhaag he has portrayed Milkha Singh, an athlete.

Bhaag Milkha Bhaag released on July 12, 2013.
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Sunday, July 7, 2013

अब तक जितना भी विकास (evolution) हुआ है विचार का, अगर एक फ़िल्म उसे एक कदम आगे नहीं ले जाती तो उसके होने का मेरे लिए कोई मतलब नहीं हैः आनंद गांधी

 Q & A. .Anand Gandhi, film director (Ship of Theseus).

Official poster of 'Ship of Theseus.'

आनंद गांधी कौन हैं?

इन फ़िल्मकार का एक रोचक रूप देखना हो तो आगे बढ़ने से पहले Doppelgänger देखें, हैरत होगी।

वह 1980 में पैदा हुए तो इस हिसाब से 32 के हो गए हैं। मराठी रंगमंच में उन्होंने कई नाटक लिखे। 2000 के बाद टेलीविज़न के लिए उन्होंने लिखना शुरू किया। वह ‘क्योंकि सास भी कभी बहू थी’ के डायलॉग और ‘कहानी घर घर की’ के स्क्रीनप्ले लिखने वाली टीम का हिस्सा थे। 2003 में उन्होंने अपनी पहली फ़िल्म ‘राइट हियर राइट नाओ’ (1, 2) बनाई। तीन साल बाद आनंद ने पांच अध्याय वाली फ़िल्म ‘कंटिन्युअम’ (हंगर, ट्रेड एंड लव, डेथ, एनलाइटनमेंट, कंटिन्युअम) बनाई।

पिछले साल वह अपनी पहली फीचर फ़िल्म ‘शिप ऑफ थिसीयस’ लेकर आए। एक ऐसी फ़िल्म जो विश्व के तमाम सम्मानित फ़िल्म समारोहों में जाकर आई है और सबको चौंका कर आई है। ‘धोबी घाट’ की निर्देशिका किरण राव और यूटीवी मोशन पिक्चर्स, आनंद की निर्माण कंपनी रीसाइकिलवाला फिल्म्स के साथ मिलकर इसे प्रदर्शित करने जा रहे हैं। मुंबई, दिल्ली, पुणे, कोलकाता और बेंगलुरु के सिनेमाघरों में फ़िल्म 19 जुलाई को लगेगी। अलग सोच वाली फ़िल्मों के प्रदर्शन में आने वाली समस्याओं को देखते हुए ‘शिप ऑफ थिसीयस’ के साथ एक नया रास्ता शुरू किया गया है। इसमें इस फ़िल्म को देखने के इच्छुक बाकी भारतीय शहरों के दर्शक-प्रशंसक इस फेसबुक पन्ने पर जाकर अपना वोट डाल सकते हैं। अगर पर्याप्त मात्रा रही तो मांग आने वाले शहर में भी फ़िल्म लगाई जाएगी।

फ़िल्म तीन कहानियों और कई सारे प्रश्नों से मिलकर बनी है। इसके विजुअल और विचार मिलकर दर्शकों की नैतिकता, बुद्धिमत्ता, यथार्थ, विज्ञान और मानवीयता में जाते हैं। भारत में फ़िल्में तो हर किस्म और गुणवत्ता की बनी हैं, लेकिन ‘शिप..’ इस लिहाज से अनोखी है कि जो बातें और तर्क अब तक सिर्फ बुद्धिजीवियों की बैठकों, शैक्षणिक हलकों और बेहद एक्सपेरिमेंटल सिनेमा में आ पाती थीं, वे चुंबकीय स्वरूप में हमारे हिस्से आती है। इसके रचियता आनंद गांधी से ये बेहद विस्तृत बातचीत फ़िल्म के निर्माण पर तो बात करती ही है, उससे भी कहीं ज्यादा आनंद के निर्देशक मन के निर्माण की प्रक्रिया में जाती है। आप जानते हैं कि उनके ज़ेहन में क्या चलता है। उनकी सोच का स्तर क्या है। उनका समाज के लेकर नज़रिया क्या है। और आगे उनसे क्या अपेक्षा की जा सकती है।

और भी बहुत कुछ इस वार्ता में पाएंगे। प्रस्तुत हैः

अभी क्या करने में व्यस्त हैं?
मेरी जो दूसरी फ़िल्म है उसकी एडिटिंग और पोस्ट प्रोडक्शन चल रहा है। ‘तुम्बाड’ नाम है। मैंने प्रोड्यूस की है और राही बरवे ने डायरेक्ट की है। सोहम शाह जो एक्टर-प्रोड्यूसर हैं हमारी सारी फ़िल्मों में, हम लोगों ने मिलकर अपनी प्रोडक्शन कंपनी रीसाइकिलवाला फिल्म्स के अंतर्गत इसे बनाया है।

‘तुम्बाड’ कब तक रिलीज होगी?
शायद सितंबर तक।

‘शिप ऑफ थीसियस’ किन-किन फ़िल्म फेस्ट में जाकर आ चुकी है?
टोरंटो, लंदन, टोक्यो, ब्रिसबेन, मुंबई, दुबई, रोटरडैम, बर्लिन... और भी जगह गई है और सारे फेस्ट में कुछ न कुछ अवॉर्ड मिले हैं।

ये फ़िल्म है क्या?
‘शिप ऑफ थीसियस’ तीन कहानियों से बनी हुई है। फ़िल्म का शीर्षक एक थॉट एक्सपेरिमेंट है। इसका मूल प्रश्न यह है कि थीसियस ने एक जहाज बनाया था जिसका एक सदी के बाद हरेक पुर्जा बदल दिया गया था। जब हर पुर्जा बदल दिया गया है तो अब वह नया जहाज है कि पुराना वाला है? अगर कहें कि नया जहाज है तो वो कब शिप ऑफ थीसियस होना खत्म हुआ और कब नया जहाज होना शुरू हुआ? वो रेखा कहां बनाई जा सकती है? यही कॉन्सेप्ट इंसानों पर भी लागू करें और इस दृष्टिकोण से देखें तो सात साल में इंसान का हर पुर्जा भी बदल जाता है। हर सेल, हर कण रिप्लेस हो जाता है। ये बदलाव सिर्फ फिजीकल नहीं है, मटीरियोलॉजिकल, साइकोलॉजिकल हर प्रकार से इंसान बदलता है। हर सेल जो आपके शरीर में आज है वो सात साल पहले नहीं था, तो क्या आप अभी भी वही इंसान हो, ये प्रश्न उठता है। मूल प्रश्न फ़िल्म में आइडेंटिटी और परिवर्तन का है। आप कौन हो? क्या है जो सतत परिवर्तन में है? आप जो हो और आपके आसपास जो ब्रम्हांड है, उसके बीच का ये रिश्ता क्या है, ये संबंध क्या है? ये सारी बात तीन कहानियों के जरिए की गई है। पहली कहानी एक अंधी फोटोग्राफर के बारे में है। वह एक ईजिप्शियन लड़की है। मुंबई में रहती है। वह जीनियस है। बहुत ही खूबसूरती से अपने आसपास की दुनिया को तस्वीरों में उतार पाती है। हम उसे और उसके प्रोसेस को समझने की कोशिश करते हैं कि किस तरह वह उसमें खुद को ढाल पाती है। दूसरी कहानी एक साधु की है। वह शास्त्री ज्यादा और साधु कम है। वह पंडित हैं और बहुत पढ़े-लिखे, एकेडमिक हैं। उन्होंने पूरी जिंदगी एनिमल राइट्स वायलेशंस के खिलाफ याचिकाएं डाली हैं और लड़ी हैं। अभी वह खुद बीमार हैं और उनको वो दवाइयां लेनी हैं जो कहीं न कहीं पशु हिंसा से बनी हैं। तो अगर वह दवाइयां ले लेते हैं तो अब तक जो लड़ाइयां उन्होंने लड़ी हैं, वो सारी व्यर्थ हो जाती हैं। तो वो दवाइयां नहीं लेते हैं और कहीं न कहीं मृत्यु की ओर जाने लगते हैं। और जैसे ही मृत्यु नजदीक आती है, वो सारे विचार जो कहीं न कहीं स्थित हो चुके थे, वो एक बार फिर से प्रश्न बन जाते हैं। तीसरी कहानी एक स्टॉक ब्रोकर के बारे में है। उसकी दुनिया बहुत ही सिमटी है, वह बहुत ही सीमित है। उसका अपनी नानी मां के साथ बहुत ही अलग प्रकार का रिश्ता है। नानी मां की दुनिया बहुत ही विस्तृत है, उनकी दुनिया बहुत ही खुली हुई है और वो हमेशा चाहती हैं कि वह लड़का भी अपनी दुनिया खोले और जीवन के साथ जुड़े किसी तरह से। फिर एक मौका आता है जब पता चलता है कि इस स्टॉक ब्रोकर का किडनी ट्रांसप्लांट हुआ है। जब वह अपनी नानी मां का ख़्याल रख रहा होता है तो अस्पताल में एक ऐसे व्यक्ति से मिलता है जिसकी किडनी चुराई गई है। पहले उसे लगता है कि कहीं उसे ही तो चुराई हुई किडनी नहीं मिली। फिर डॉक्टर्स, एनजीओ और बाकी सब लोग उसे आश्वासन देते हैं कि उसे चुराई हुई किडनी नहीं मिली, उसे एक मरे हुए आदमी की किडनी मिली है। यहां उसमें जिज्ञासा हो उठती है कि फिर ये चुराई हुई किडनी किसे गई है। अब उस चुराई हुई किडनी को ढूंढने के लिए वह और उसका दोस्त एक पुलिस स्टेशन से दूसरे पुलिस स्टेशन जाते हैं। वहां उसे उस आदमी का पता मिलता है जिसे चुराई हुई किडनी मिली है। और उस आदमी से मिलने वह स्वीडन, स्टॉकहोम जाता है। वहां जाकर वह उस आदमी से मिलता है और उसके आमने-सामने होता है। उस आमने-सामने के बारे में ये तीसरी कहानी है। और ये तीनों कहानियां कहीं न कहीं एक जगह पर जाकर मिलती हैं। जहां ये सारे सवाल एक बड़ा सवाल बनते हैं।

जैसे मणिरत्नम की ‘युवा’ में भी था कि कुछ किरदारों की स्टोरी मिलती है। वासन बाला की ‘पैडलर्स’ में भी यूं ही कई किरदार और उनके मानसिक गलियारों में टहलते इंडिविजुअलिस्टिक सवाल हैं। इसी तरीके से निशिकांत कामत की ‘मुंबई मेरी जान’ में किरदारों की कहानियां भी इसी तरह की थीं। तो ये जो मल्टी स्टोरीज होती हैं ये क्यों आकर्षित करती हैं? हां, इनका रोचक होना और पसंद किया जाना तकरीबन निश्चित होता है। हमारी एक दर्शक के रूप में और आपकी एक फ़िल्मकार के रूप में इनके प्रति इस आकर्षण की वजह क्या होती है?
देखिए, मुझे ऐसा लगता है कि किसी भी बात को परिपूर्ण तरीके से समझने और परिपूर्ण तरीके से कहने के लिए उसके आसपास की बहुत सारी कहानियों को कहने की जरूरत होती है। खासकर के अगर हम ओरिएंटल ट्रेडिशन देखें, जो पूरब का स्टोरीटेलिंग ट्रेडिशन है, उसके कोई भी नैरेटिव्ज़ देखें, तो वो सारे नॉनलीनियर मल्टी नैरेटिव्ज़ हैं। कि अगर पूछें कि महाभारत कहां से शुरू होती है, तो न मैं और न आप बहुत ही छाती ठोककर कह सकते हैं कि महाभारत यहां से शुरू होती है। उसका कारण ये है कि जैसे ही मैं आपको बताना शुरू करता हूं कि भारतवर्ष की कहानी ये है, कि एक राजा भारत हुआ करता था, तो आप कहोगे नहीं उससे पहले तो कहीं सूर्य की कहानी थी और सूर्य के पुत्र की कहानी थी, और आप कहोगे नहीं उससे पहले तो कुछ साधु बात कर रहे थे, वो बात करके बता रहे थे कि वेदव्यास नाम के एक ऋषि हैं जो एक कहानी लिख रहे हैं, तो आप कहोगे नहीं उससे भी पहले एक कहानी शुरू होती है जहां पर हजारों घोड़ों की बात कही गई है और हजारों हाथियों की बात कही गई है। तो बात हो ही नहीं पाएगी। इसका कारण यह है कि किसी भी चीज़ को ठीक तरह से समझने के लिए, एक होलिस्टिक व्यू लाने के लिए, मेरा मानना ये है कि बहुत सी कहानियों को कहना जरूरी होता है। किसी भी चीज का एक पूर्ण दृष्टिकोण प्राप्त करने के लिए, पूर्ण दर्शन प्राप्त करने के लिए ये बहुत जरूरी है कि हम बहुत सारे दृष्टिकोणों से उसे देखें। और जब हम इतने सारे एंगल से चीजों को देखते हैं तब कहीं न कहीं हम नजदीक पहुंचते हैं उस ... वो हाथी और सात अंधों की बात है कहीं न कहीं। कि हम वो सात अंधे लोग हैं और एक हाथी को समझने या देखने की कोशिश कर रहे हैं। अब अगर मैं उसका कान पकड़कर कह दूं कि हाथी तो पंखे जैसा प्राणी है, या उसका पैर पकड़कर मैं कह दूं कि यार ये तो खंभे जैसा प्राणी है, उसकी पूंछ पकड़कर कह दूं कि ये तो सांप जैसा प्राणी है। तो पूरा सच मैं कभी नहीं कह पाऊंगा। पर इन सारे सत्यों को मैं जोड़ लूं एक सत्य में, और मैं कहूं कि यार कान उसके पंखे जैसे हैं, पैर उसके खंभे जैसे हैं, पूंछ उसकी सांप जैसी है... तो कहीं न कहीं मैं हाथी का एक रूप प्रकट कर पाऊंगा। जो मल्टीपल नैरेटिव स्टोरी होती हैं वो इसलिए होती हैं कि वो हमें और नजदीक ले जाती है उस हाथी के रूप के।

थीसियस का पौराणिक संदर्भ फ़िल्म बनने के बाद आया या शुरू करने से पहले इसे आधार बनाया और ऊपर एक-एक चीज जोड़नी शुरू की? या ये बीच में आया या फ़िल्म बनने के बाद इसके नाम को आपने जोड़ा और आपको लगा कि इन सभी कहानियों में ‘शिप ऑफ थीसियस’ का दर्शन फिट हो रहा है?
नहीं, मेरे लिए हमेशा दार्शनिक बात (philosophical paradigm) पहले आती है। दर्शन का जो प्रश्न होता है वो सबके बीचों-बीच होता है, वहां से हमेशा मेरे लिए कहानी शुरू होती है। जो प्रश्न है और जो फिलोसॉफिकल प्रश्न है, वहां से मेरी कहानी शुरू होती है और फिर उसके आसपास हमेशा कहानियां बनती हैं। उन प्रश्नों को अच्छी तरह पूछने का तरीका क्या है, वो कौन से रूपक या मेटाफर हैं जिनके इस्तेमाल से मैं ये कहानी अच्छी तरह बता पाऊंगा, उस हिसाब से मैं आगे की कहानियां बनाता हूं। टाइटल सबसे पहले आया था, उसके बाद सारी कहानियां आईं।

बड़ी चौंकाने वाली चीज ये है कि ज़्यूस, थीसियस और पसाइडन को लेकर हॉलीवुड में इतनी स्टोरीज यूज़ हुई हैं कमर्शियल बिग बजट में, लेकिन उनकी मिट्टी पलीद कर दी गई है। जैसे तरसेम सिंह की ‘इम्मॉर्टल्स’ जो एक-दो साल पहले आई थी, उसमें कुछ था नहीं। वहीं आपकी इस फ़िल्म में इतनी चीजें और विचार हैं कि बैचेनी होती है। ये क्या वजह है कि अरबों रुपये लगाने के बावजूद एक ढेले भर का दर्शन उनमें नहीं आ पाता और आप बिना किसी मोटे पैसे के इतने विचार डाल देते हैं? ये क्यों होता है हमारी फ़िल्ममेकिंग में?
यार मुझे लगता है कि जितना ज्यादा पैसा लगाया जाए एक फ़िल्म में, उतना डर बढ़ जाता है। उतना ही स्टूडियो वाले आ जाते हैं, दुकानदार आ जाते हैं जो बड़ी-बड़ी दुकानें खोलकर बैठे हैं। जिनका कोई गहरा रिश्ता नहीं है विचार के साथ या कला के साथ या संस्कृति के साथ। मैं एक जगह पर बोलने गया था। कोमल नाहटा मॉडरेटर थे। प्रकाश झा और सुधीर मिश्रा भी बुलाए गए थे। और वहां कुछ ऐसा ही प्रश्न खड़ा हुआ कि ऐसा क्यों होता है? और क्यों ऐसी फ़िल्में बिकती भी हैं? तो मैंने एक प्रश्न पूछा कि आप में से कितने लोग ये कहेंगे कि आपकी मां मैकडॉनल्ड से बेहतर खाना बनाती हैं, और सबके हाथ खड़े हो गए। पर मैकडॉनल्ड सबसे ज्यादा बिकता है। तो हम सभी शिकार हैं निर्मित सहमति (manufactured consent) के। वो सहमति धीरे-धीरे कई सालों में मैन्युफैक्चर की गई है। उस सहमति के पीछे कोई सत्य नहीं है, उसके पीछे कोई तथ्य नहीं है। वो धीरे-धीरे दबा-दबाकर मैन्युफैक्चर की गई है, बहुत ही बेवकूफी से चीजें बेचने के लिए। एक देश जिसके ज्यादातर लोग ब्राउन हैं, उनको गोरापन बेचने के लिए, उनको तेल वाला सड़ा हुआ खाना बेचने के लिए, उनको शक्कर वाले चीज़ बेचने के लिए जो उनकी सेहत के लिए बहुत हानिकारक हैं। वो सारी चीजें जो सामाजिक सेहत के लिए, वैचारिक सेहत के लिए, आध्यात्मिक सेहत के लिए हानिकारक हैं उन्हें बेचने के लिए सारी की सारी चीजें मैन्युफैक्चर की गईं हैं। तो जो ये अरबों रुपये लगाकर बेचते हैं, उनको वही बेचते रहना पड़ता है, जो आसान है और हानिकारक हैं। उनको पॉपकॉर्न ही बेचना है, वो गाजर का जूस या करेले का जूस नहीं बेच पाएंगे। तो एक तो ऐसे में इस सत्य के नजदीक जाना उनके लिए बहुत मुश्किल हो जाता है, बहुत हानिकारक हो जाता है और बहुत ही डरावना हो जाता है। जो हमारे जैसे लोगों के लिए बिल्कुल भी डरावना नहीं होता। हमारी तो खोज ही वही है, हम तो सिर पर कफन बांधकर निकले हैं तो हमें तो ढूंढना है। हमें तो खोजकर रहना है कि यार ये क्या है और क्यों है? मेरा मानना है कि अगर बुद्ध जिंदा होते तो शायद वो भी फ़िल्म बनाते। क्योंकि ये बहुत-बहुत पावरफुल टूल है सत्य की खोज के लिए। ये एक बहुत ही परफैक्ट प्रतिबिंब खड़ा करता है अपने जीवन का और अपने ब्रम्हांड का। ये इतना शक्तिशाली टूल है कि इसके अंदर सब आ जाता है। साहित्य आ जाता है, विचार आ जाता है, संगीत आ जाता है, रंग आ जाता है, इसके अंदर विज्ञान आ जाता है, अध्यात्म आ जाता है, सबकुछ आ जाता है, एक-एक चीज आ जाती है। इसे मैं जीवन का बहुत ही जबरदस्त शक्तिशाली टूल कह सकता हूं। अब तक जितना भी विकास (evolution) हुआ है विचार का, पिछले तीन-चार हजार साल में, अगर एक फ़िल्म उस इवोल्यूशन को एक कदम आगे नहीं ले जाती है तो उस फ़िल्म के होने का मेरे लिए कोई मतलब नहीं है। मुझे लगता है कि एक फ़िल्ममेकर का काम या मेरा काम है कम से कम कि बुद्ध से लेकर, डार्विन से लेकर, आइंस्टाइन से लेकर, डॉकिन्स तक जिन लोगों ने भी काम किया है उन सारे लोगों का काम एक कदम आगे ले जाऊं मैं।

इतनी अलग सोच वाला फ़िल्ममेकर होने के नाते आपके सामने दिक्कत ये आ जाती है कि आपके समकालीन जो बना रहे हैं, जो कमा रहे हैं, जिस तरह का रहन-सहन शुरू कर रह हैं, वही आपको भी करना पड़ता है। क्योंकि मैंने बहुत से फ़िल्ममेकर्स देखें हैं जिनकी दाढ़ी अजीब सी बढ़ी होती है लेकिन जैसे-जैसे वो आगे बढ़ते जाते हैं उनकी दाढ़ी सैटल होने लगती है, एकदम सेट करवा लेते हैं और उनके चश्मे अलग हो जाते हैं, उनकी जैकेट्स अलग हो जाती हैं, और वो, वो सारी बातें कहना छोड़ देते हैं जो उन्होंने कहनी शुरू की थी।
जी बिल्कुल...

आप कब तक संघर्ष करते रहेंगे इस तथ्य के साथ कि जिस क्षेत्र में आप हैं, उसमें पैसा तो आपको खींचेगा ही खींचेगा। कि भई एक एपिक बनानी है और फिलोसॉफिकल एपिक बनानी है, लेकिन पैसा चाहिए और वो ही दुकानदार आ जाएंगे जैसे ही आप इस बारे में सोचेंगे या बताएंगे। उसमें कैसे आप डिगेंगे नहीं, उसके लिए क्या जाब्ता किया है अब तक?
आपकी बात बिल्कुल सही है। कई बार इस पड़ाव और दोराहे पर आकर मैं रुका हूं। ये पहली बार नहीं है। मैं 19 की उम्र से लिख रहा हूं। हर बार कोशिश की है कि जो मेरा उच्चतर उद्देश्य है... और ये बात भी है कि मेरा संघर्ष आसान होता गया है। ये अपनी बात पर जिद्दी होकर अड़ने से भी आसान हुआ है। जो अब से छह-सात साल पहले का संघर्ष था मेरा, वो आज नहीं है। चीजें आसान हुईं हैं। लोगों ने देखा है मेरा काम और कहा है कि हां यार, इसे पैसे दे दो, ये कुछ न कुछ कर लेगा। आज से 10-12 साल पहले मैं टेलीविज़न के लिए लिखता था। टेलीविज़न सीरियल लिखता था। तब लिखते-लिखते ये ख़्याल आया कि जो मैं कर रहा हूं उससे कहीं न कहीं अपनी समग्र बुद्धि (collective intelligence) को हानि पहुंचा रहा हूं। पहले ही हमारी कलेक्टिव इंटेलिजेंस पर सवाल खड़े हैं। पहले ही हमारे यहां पब्लिक डिस्कोर्स नहीं है। पहले ही हमारे यहां एक सामाजिक डिबेट नहीं है, एक वार्तालाप नहीं है। मुझे कहीं न कहीं लगने लगा कि जो कर रहा हूं वो गलत कर रहा हूं। जो कलेक्टिव इंटेलिजेंस है इस मुल्क की, उसे मैं छिछला कर रहा हूं, बेइज्जत कर रहा हूं और उस निर्मित सहमति को बढ़ाने में योगदान दे रहा हूं। तो मैंने वो काम छोड़ दिया। तब से मैंने नहीं किया है वो काम वापस। मैंने 19 की उम्र में लास्ट किया था, फिर कई ऑफर आए लेकिन कभी नहीं किया वापस। उसके बाद ऐसे वक्त भी आए जब बहुत ही गरीबी रही और लगा कि इससे अच्छा तो कर लेता। पर कहीं न कहीं वो फैसला ले पाया हूं और खुश होकर ले पाया हूं। आज से सात-आठ साल पहले जब मैंने टेलीविज़न छोड़ दिया था और कहा था कि अब कभी नहीं करूंगा टेलीविज़न तो मेरे आसपास दोस्त थे जो कर रहे थे। टेलीविज़न, कमर्शियल फ़िल्में कर रहे थे, ऐसी सभी चीजें कर रहे थे जिनसे मुझे सिर्फ सिरदर्दी ही नहीं थी बल्कि दुख भी था। मैं अपने सिद्धांतों की वजह से नहीं कर पा रहा था। जो सिर्फ मेरे सिद्धांत थे, उसमें कोई बहुत बड़ी महान बात नहीं कह रहा हूं। ये बस मेरे लिए जरूरी था।

और मैंने कहीं न कहीं अपनी बोली लगाई कि यार मेरे सामने जिंदगी के ये 10 साल हैं जिनमें मैं खोज कर पाऊंगा, विचार कर पाऊंगा, एक्सप्लोर कर पाऊंगा, इन्वेंट कर पाऊंगा और अपने आप को एनलाइटन (प्रकाशमान) कर पाऊंगा, मैं घूम पाऊंगा, लोगों से मिल पाऊंगा, वो सब कर पाऊंगा जो मुझे करना है। मैं बेहतर कलाकार बन पाऊंगा, बेहतर इंसान बन पाऊंगा, बेहतर लोगों से मिल पाऊंगा। एक तरफ ये है और दूसरी तरफ ये है कि वो सब काम करता रहूंगा जो बाकी सब कर रहे हैं और अंत में मैं कुछ पैसे कमा लूंगा। तो मैंने जिदंगी के इन दस सालों की बोली लगाई दिमाग में। मैंने कहा क्या होगी इनकी बोली। पांच करोड़, सात करोड़, दस करोड़। सोचा, यार पचास करोड़ भी इसके लिए काफी नहीं हैं। बहुत ही हल्का लगा वो पचास करोड़। तो उसे मैं बहुत फायदा समझता हूं, खुशकिस्मती समझता हूं अपने लिए कि मैं वो ऐसा कर पाया। जो नहीं कर पाते हैं मैं उन पर कोई टीका-टिप्पणी नहीं कर सकता हूं क्योंकि उनमें बहुत सारे तो मेरे दोस्त ही हैं जो नहीं कर पाए। नहीं ले पाए वो फैसला। मेरी खुशकिस्मती थी कि ले पाया। कि मैं उस संघर्ष में से निकल आया। अभी जब पीछे मुड़कर देखता हूं तो मेरे पास वो दस साल का खजाना है जिसका हर एक दिन मैं जिया हूं। जिसके हर एक दिन में मैंने संशोधन किया है, प्रयास किया है। मैं घूमा हूं, बहुत ही अद्भुत लोगों के साथ उठा हूं बैठा हूं, मैंने चीजें इन्वेंट की हैं, मैं चीजें समझ पाया हूं। ये तो बहुत ही बड़ा खजाना है जिसके सामने आज की तारीख में मेरे पास पांच-सात करोड़ ज्यादा कम होते तो कोई फर्क नहीं पड़ता। और आज की तारीख में मेरे पास सबकुछ है। मेरे पास बढ़िया सा घर है, गाड़ी है, सब चीजें लोगों ने दे दी हैं। कहीं न कहीं वो फकीरी वाली पैदाइश और परवरिश है। मैं 14 साल की उम्र तक एक झोंपड़े में रहता था। उसकी वजह से कहीं न कहीं वो अपरिग्रह रहा है। चीजों को लेकर एक फकीरी रही है। खुशनसीब हूं कि वो मुझे मिली है। मैं चीजों के साथ आसानी से अटैच नहीं होता हूं। मेरे लिए चीजों को छोड़ना बहुत ही आसान होता है।

मुझे डर है कि कहीं इनटू द वाइल्ड (Into the Wild, 2007) वाले लड़के (क्रिस्टोफर) की तरह आप निकल न जाएं कभी और मिले न आपकी लाश कभी...
हा हा हा... नहीं यार मैं काम करना चाहता हूं, बहुत काम करना चाहता हूं। मैं अपना रोल प्रासंगिक बनाना चाहता हूं। मैं चाहता हूं कि थोड़ी चीजें बदल पाऊं। मैं चाहता हूं कि थोड़ी सी खूबसूरती ला पाऊं, थोड़ा सा विचार ला पाऊं। आसपास में बहुत गंदगी है। मैं चाहता हूं कि थोड़ा सा उसमें बदलाव ला पाऊं।

फ़िल्ममेकिंग के अरविंद केजरीवाल बनना चाहते हैं आप? कोशिश कर रहे हैं?
बिल्कुल, बिल्कुल।

कितना हो पाएगा?
केजरीवाल से मैं सहमत हूं यार। मैं चाहता हूं कि ऐसे चार-पांच लोग खड़े हो जाएं तो मजा आ जाएगा।

हालांकि सोशल मीडिया में लोग उनकी टांग खींचते हैं...
मैं भी बीस चीजें ढूंढ सकता हूं जिनसे असहमत होऊंगा। ठीक है यार, डिसअग्री करेंगे हम। असहमत होने के लिए वो प्लैटफॉर्म तो बनाने दो उसे। अभी तो प्लैटफॉर्म ही नहीं है, हम किससे असहमत हों। मनमोहन सिंह से क्या असहमत होंगे। उनका तो एग्रीमेंट ही डिसअग्रीमेंट है। नरेंद्र मोदी के साथ क्या डिसअग्रीमेंट करेंगे हम लोग, है न। केजरीवाल से साथ असहमत भी हो सकते हैं हम लोग, ठीक है। हम असहमत होकर भी साथ एक प्लैटफॉर्म बना सकते हैं। जिसमें अलग-अलग विचार खड़े करके एक प्लैटफॉर्म तो बनाए वो। तो टांग खींचना तो बहुत ही आसान है। चार कमियां हैं तो बहुत ही आसान हैं देख पाना। मुझे लगता है कि अभी बहुत ही ज्यादा जरूरत है उन चीजों की। खासकर के प्रशांत भूषण। प्रशांत भूषण पर मुझे पूरा भरोसा है।

अच्छा, लौटते हैं ‘शिप ऑफ थीसियस’ पर। कब शुरू की? कितना वक्त लग? और क्या मुश्किलें पेश आईं?
2008 से शुरुआत हुई। उस साल कुछ दूसरे कॉन्सेप्ट भी थे जो मैं बनाना चाहता था। 2009 में इसकी राइटिंग शुरू हुई। 2010 में शूट हुई। 2011 में पोस्ट प्रॉडक्शन हुआ जो अगले साल तक चलता रहा। 2012 में टोरंटो फ़िल्म फेस्टिवल में इसका प्रीमियर हुआ। बनाने में वही प्रॉब्लम आए तो हर इंडि (Independent) फ़िल्ममेकर को आते हैं और शायद थोड़े ज्यादा, क्योंकि मुश्किल फ़िल्म थी। सिर्फ हिंदुस्तानी ऑडियंस के लिए ही नहीं पर बाहर की ऑडियंस के लिए भी मुश्किल ही है, इतनी आसान फ़िल्म नहीं है। ये फ़िल्म आपकी हिस्सेदारी चाहती है, आपको बिल्कुल पैसिवली पॉपकॉर्न नहीं खिलाती है। आपको सीधे बैठकर ढाई घंटे इसमें हिस्सा लेना होता है, मेडिटेट करना पड़ता है। एक किस्म से योग है। तो जाहिर तौर पर मुश्किलें थीं। सबसे पहली तो यही थी कि इसके लिए पैसे कौन देगा। फिर कहूंगा, मैं बहुत ही प्रिविलेज्ड हूं। दुनिया के चंद आर्ट फ़िल्ममेकर इतने खुशकिस्मत होंगे जितना मैं हूं। मुझे बहुत ही आसानी से इतने अच्छे पार्टनर मिल गए, सोहम शाह जैसा पार्टनर बहुत आसानी से मिल गया। कहीं न कहीं हम दोनों एक-दूसरे को तुरंत समझ गए और तय किया कि जिंदगी भर साथ में फ़िल्में बनाएंगे। सोहम का काम जिसने भी देखा है मेरी फ़िल्म में, उसके साथ काम करना चाहता है। दीपा मेहता ले लो, अशीम अहलुवालिया (Miss Lovely) ले लो, सब ने मैसेज किया... अनिल कपूर ले लो, हर किसी ने कहा कि सोहम बहुत ही कमाल का एक्टर है। आमिर ने तारीफ की सोहम की। इससे उसके लिए फ़िल्में बना पाना और उनमें काम कर पाना आसान होगा। उसकी और भी फ़िल्में आ रही हैं। ‘तुम्बाड’ में भी उसने मुख्य भूमिका निभाई है, राही की फ़िल्म में। मेरे लिए आसान यह हुआ कि सोहम जैसा कमाल का पार्टनर मिल गया इसलिए मैं बहुत चीजों से बच गया। बड़े-बड़े कॉरपोरेट हाउस के बच गया, बड़े प्रोडक्शन हाउस से बच गया, जो शायद इस ‘शिप ऑफ थिसीयस’ को उस वक्त नहीं समझ पाते। अब ये फ़िल्म बन गई है तो वो सब समझ पा रहे हैं, सब खुश हैं और आनंद लेकर देख रहे हैं। अच्छी बातें कह रहे हैं फ़िल्म के बारे में। नहीं बनी होती तो शायद बहुत कम लोग जान पाते कि ये कैसी फ़िल्म बनती और क्या बनती। मुश्किल यही थी, क्योंकि बहुत ही नई भाषा बनानी थी फ़िल्म की, वो सिर्फ हिंदुस्तान की ही नहीं, अगर आप वर्ल्ड सिनेमा को भी देख लो तो उनके लिए भी नई भाषा है। एक इन्वेंशन के साथ जो मुश्किलें आती हैं, वही यहां भी थीं।

Anand & DoP Pankaj. Photo: Shriti Banerjee
फ़िल्म में जितने भी विजुअल हैं उन्हें पन्नों पर लिखने के बाद व्यवस्थित तौर पर शूट करना शुरू किया था, या चार-पांच साल में अलग-अलग मौकों पर उन्हें आपने दिमाग में सोच लिया था?
डीओपी (director of photography) पंकज कुमार बहुत ही करीब से जुड़ा हुआ है मेरे साथ। हम हमेशा साथ में सोचते हैं, बहुत सारा वक्त बिताते हैं, विचारों को एक-दूसरे से बांटते हैं, एक-दूसरे को चैलेंज करते हैं, सवाल करते हैं, तर्क करते हैं, फ़िल्में डिकंस्ट्रक्ट करते हैं, समझते हैं। साथ में ये हमारी बहुत ही लंबी यात्रा रही है। मेरी शॉर्ट फ़िल्म ‘कंटिन्यूअम’ भी पंकज ने शूट की थी। ‘कंटिन्यूअम’ के बाद से ही हम विचारों और कहानियों को बांटते थे। बहुत ही शुरुआती स्तर पर यह होता है कि जब मैं स्क्रिप्ट लिखता हूं, उसमें सारे के सारे विजुअल्स समाहित होते हैं। तो जो विजुअल लैंग्वेज है स्क्रिप्ट की, वह लिखने के दौरान आधी तो तैयार हो गई होती है, क्योंकि उसे डीओपी के साथ डिस्कस करके ही लिखता हूं। उसके बाद हम लोग रिहर्सल्स करते हैं, एक्टर्स कास्ट होना शुरू होते हैं, लोकेशन ढूंढना शुरू करते हैं... तो बाकी जो विजुअल लैंग्वेज है वो बनना शुरू हो जाती है।

‘शिप ऑफ थीसियस’ में आप जिस प्लेन पर जाकर बात कर रहे हैं चाहे फोटोग्रफिक लाइट हो, रिएलिटी का एग्जिस्टेंस हो, मृत्यु हो... वो धरातल आपकी सोच में कब आया, क्यों आया और कैसे आया?
ये बहुत ही लंबी यात्रा रही है। बचपन से शुरू हो गई थी। सेक्युलर परिवार में पैदा हुआ। काफी सादे लोअर-वर्किंग-मिडिल क्लास मूल्य और विचार थे। 12-13 की उम्र में वास्ता धर्म से, ईश्वर से हो गया था। बहुत सारे प्रश्न उठ रहे थे, बहुत सारे विचार क्लियर हो रहे थे। जैसे, पता चल गया था कि ये जो पूरी माइथोलॉजी है, उसके पीछे इंसानों के डर हैं। उन डरों ने भगवान को जन्म दिया है। जिन विचारों या डरों ने इस सारे कॉन्सेप्ट को जन्म दिया है। बहुत शुरुआती उम्र में मैंने सोचना शुरू कर दिया था कि जो ट्रांससेंडेंस है, अमरत्व के जितने विचार हैं, वो उस डर की पैदाइश हैं। उस मृत्यु के भय की पैदाइश है जो मानव, ईश्वर, नरक, स्वर्ग, पुनर्जन्म... जैसे विचारों को जन्म देता है। क्योंकि मृत्यु का जो भय है वो बहुत ही भयानक है। 13-14 की उम्र से ही मृत्यु के भय को मैंने सींगों से पकड़ा है। उससे टकराया हूं। अमरत्व के कॉन्सेप्ट से बहुत जुड़ा रहा हूं। मैं एक फ़िल्म बना रहा हूं इस विषय पर जिसका वर्किंग टाइटल है, ‘अ बैटर प्लेस’। उसका केंद्रीय विचार यही है कि पिछली 13,000 साल की सिविलाइजेशन में, सभ्यता में, एक झूठ जो बार-बार बोला गया है, दोहराया गया, जिस झूठ के लिए लाखों लोगों की बलि दी गई है, वो झूठ है ‘अ बैटर प्लेस’। कि इससे ज्यादा बेहतर एक जगह कहीं और है। उससे बड़ा कोई झूठ नहीं बोला गया है। और कहीं न कहीं ये सारे प्रश्न मेरे मन में उठने लगे थे। यात्रा तब से शुरू हो गई थी। 16-17 साल की उम्र में मैंने हिंदुस्तान के बाहर के कुछ फिलॉसफर पढ़ लिए थे और एक स्पिरिचुअल शॉपिंग पर निकल पड़ा था, देश भर। अलग-अलग जगहों पर जाकर रहा था। कुछ आश्रमों में रहा था, कुछ लोगों से मिला था। इस वजह से यात्रा तो बहुत पहले शुरू हो गई थी। कॉलेज छोड़ दिया क्योंकि कॉलेज एजुकेशन बहुत ही असंतुष्टिदायक थी। यह तय किया कि मैं अपनी एजुकेशन खुद डिजाइन करूंगा। इस वजह से बहुत जल्दी अपनी एजुकेशन डिजाइन कर पाया। जो सारी चीजें सीखना चाहता था सीख पाया। ज्यादा ध्यान दिया मैंने इवोल्यूशनरी साइकॉलजी पर, फिलॉसफी पर। ये सोच मेरे पहले के नाटक बने, मेरी पहले की शॉर्ट फ़िल्में बनी और अभी ‘शिप ऑफ थीसियस’।

आप कभी आश्रमों में रहे, लोगों से बात की... तो एक बहुत बारीक रेखा है, धार्मिक होने में, धर्म का ज्ञान ढूंढने में और ऐसा करते हुए उसके साथ रहने में... जैसे आप आश्रम में रह भी रहे हैं लेकिन मूर्ति पूजा हुई या लोगों को बरगलाने वाला धर्म हुआ या भगवान का अस्तित्व हुआ, इन सबका विरोध भी कर रहे हैं या उसी जगह रहकर उस चीज को भीतर से जानने की कोशिश भी कर रहे हैं। तो उस दौर में जब आप रह रहे थे या लोगों से मिल कर या उनका हिस्सा बनकर उनसे मिल रहे थे तो ऐसा नहीं था कि यार कुछ करप्ट तो नहीं हो जाएगा थोड़ा सा मेरे भीतर या मुझे वो थोड़ा सा उस तरफ खींच लेंगे या कहीं भिड़ जाऊंगा उनसे मैं, गुस्सा हो जाऊंगा...?
मेरे लिए समझना और चीजों को बहुत ही शैक्षणिक तरीके से तोड़ना, उनके सत्य के पीछे के सत्य के पीछे के सत्य तक पहुंचना... बहुत ही जरूरी था। मैं जब किसी को भी पढ़ना शुरू करता तो मानकर चलता था कि सत्य यहां से मिलेगा मुझे। मैंने जब पहली बार जे. कृष्णमूर्ति को पढ़ा तो ये सोचकर बिल्कुल नहीं पढ़ा कि यार इस सत्य में मुझे बहुत सारी खामियां मिलेंगी, या इस सत्य में मुझे बहुत सारी धोखाधड़ी मिलेगी। मैंने ये सोचकर पढ़ा कि यार शायद इस बंदे को कुछ पता था और शायद इससे मुझे कुछ पता चल जाएगा। जब भी मैं कुछ पढ़ाई करता था या लिखाई करता था या सोचता था या लोगों से मिलता था तो बहुत ही समर्पण के साथ और बहुत ही ईमानदारी के साथ और बहुत ही विनम्र जिज्ञासा के साथ मिलता था। और उस प्रोसेस में प्योरिटी भी रहती है क्योंकि मुझे अंततः जब-जब लगा कि इसमें ये-ये खामियां हैं, ये गलतियां हैं उनके प्रति आत्मानुभूति (empathy) रही है। जो मेरी फ़िल्मों में भी दिखेगी आपको। उन सारे लोगों के लिए आत्मानुभूति रही है जिन्होंने सत्य खोजने की कोशिश की है और उसके बाद भले ही फेल हुए हैं। मेरी नजरों में वो फेल हुए हैं लेकिन उनके लिए बहुत आत्मानुभूति है। इस वजह से कि यार उसने कोशिश की और उस वजह से वो दो कदम आगे बढ़ पाया। मैं एक इकोनॉमिस्ट को पढ़ रहा था, मैट रिडली। वह एडम स्मिथ और कार्ल मार्क्स को गालियां दे रहा था, सबको गालियां दे रहा था। और एक बिंदु पर आकर उसने बहुत ही इंट्रेस्टिंग बात कही। उसने कहा कि “मैं ये दावा नहीं कर रहा हूं कि आई एम स्मार्टर देन एडम स्मिथ, पर एडम स्मिथ के ऊपर मुझे एक बेनिफिट ये है कि मैंने एडम स्मिथ को पढ़ा है। एडम स्मिथ के पास वो लाभ नहीं था कि उन्होंने एडम स्मिथ को पढ़ा हुआ था”। तो मेरे पास वो बेनिफिट है, बुद्ध के ऊपर, महावीर के ऊपर, आइंस्टाइन के ऊपर, डार्विन के ऊपर, डॉकिन्स के ऊपर... कि मैंने इन लोगों को पढ़ा है। तो अभी मुझे पहिया बनाने की जरूरत नहीं है, अब मुझे साइकिल बनाने की जरूरत नहीं है, मुझे मर्सिडीज बनाने की जरूरत नहीं है, मुझे जेट बनाने की जरूरत नहीं है। ये सब बन चुका है। इनके बाद जो आएगा उसे बनाने में मैं अपना पूरा प्रयास लगा सकता हूं।

क्या जो आपने कहा है या जो विचार बताए हैं, फ़िल्म के संदर्भ में उनको जानने के लिए हमको भी उन्हीं किताबों और विचारों में डूबना होगा जिनमें आप डूबे कभी?
मुझे लगता है उन किताबों में डूबे होंगे तो फ़िल्म के और पहलू आपको दिख पाएंगे। अगर नहीं भी डूबे होंगे तो कोई बात नहीं। जैसे, अभी जो लोग देख रहे हैं। लंदन में सदरलैंड ज्यूरी ने स्पेशल अवॉर्ड दिया, टोकयो में बेस्ट आर्टिस्टिक फ़िल्म का अवॉर्ड दिया, मुंबई में टेक्निकल एक्सिलेंस का अवॉर्ड दिया, दुबई में बेस्ट एक्ट्रेस का अवॉर्ड दिया। पूरी दुनिया में फ़िल्म को पसंद किया गया है। रिव्यूअर्स ने पूरी दुनिया में अच्छी रेटिंग दी है। दर्शकों ने आकर मुझे गले लगाया है। मुझे लगता है कि ये एक आसान फ़िल्म भी है और एक मुश्किल फ़िल्म भी है। आपकी जितनी यात्रा रही होगी, आप उतना गहराई में कनेक्ट कर पाओगे फ़िल्म के साथ। और आपकी वह यात्रा नहीं भी शुरू हुई होगी तो मेरा मानना ऐसा है, इसमें मैं शायद गलत भी हो सकता हूं हालांकि कहीं न कहीं मेरा ये मानना मुझे भी सही लगने लगा है, कि ये फ़िल्म उस यात्रा की वो शुरुआत हो सकती है।

ऐसे अनूठे धरातल वाली कौन सी फ़िल्में और फ़िल्मकार आपको बहुत पसंद हैं?
बेला तार (Béla Tarr) हैं, निश्चित तौर पर। रॉय एंडरसन (Roy Andersson) स्वीडन के फ़िल्ममेकर हैं जो इस सूची में पक्के तौर पर हैं। उनकी ‘सॉन्ग्स फ्रॉम द सैंकेड फ्लोर’ (Songs from the Second Floor, 2000) बहुत ही प्रचंड अद्भुत फ़िल्म है। माइकल हेनिके (Michael Haneke) जाहिर तौर पर, खासकर के उनकी ‘द सेवंथ कॉन्टिनेंट’ (The Seventh Continent, 1989) जो बहुत ही नजदीक है मेरे सवालों के। वह और उनकी ‘द वाइट रिबन’ (The White Ribbon, 2009) मेरी सबसे पसंदीदा फ़िल्मों में से हैं। बेला तार की जो ‘द टुरिन हॉर्स’ (The Turin Horse, 2011) थी वो मेरे ख्याल से प्रचंड अद्भुत फ़िल्म थी। और जो साउंड डिजाइनर हैं ‘द टुरिन हॉर्स’ के गाबोर इरदेई (Gábor ifj. Erdélyi), वो ही मेरी फ़िल्म के भी साउंड डिजाइनर हैं। गाबोर का ऐसा कहना है, अगर आप गाबोर से बात करेंगे तो वो आपको बता पाएंगे क्यों, कि “द टुरीन हॉर्स एक प्रश्न है और शिप ऑफ थिसीयस उसका जवाब है”। मेरे लिए ये बहुत बड़ी तारीफ है। इसे सीधे-सीधे स्वीकार कर लूं तो मेरा बहुत घमंडी होना होगा। पता नहीं स्वीकार करना चाहिए कि नहीं। पर ऑब्जेक्टिवली बताऊं तो कहीं न कहीं सच भी है कि ‘शिप ऑफ थिसीयस’ में ऐसे बहुत से जवाब हैं जिनके प्रश्न ‘द टुरिन हॉर्स’ में होते हैं। किश्लोवस्की (Krzysztof Kieślowski) का सारा ही काम मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण है। मेरी फेवरेट किश्लोवस्की फ़िल्म ‘अ शॉर्ट फ़िल्म अबाउट किलिंग’ (A Short Film About Killing,1988) है। उसे जितना छीलो उतनी ही परतें निकलती हैं। किश्लोवस्की की ह्यूमैनिटी, उसकी ऑब्जर्वेशन, उसका छोटे-छोटे किस्सों में अध्यात्म बुनना, मेरे लिए महत्वपूर्ण रहा है। तारकोस्की (Andrei Tarkovsky) के वातावरण में अध्यात्म ढूंढना मेरे लिए महत्वपूर्ण रहा है। बर्गमैन (Ingmar Bergman) की कहानियां बहुत महत्वपूर्ण रही हैं। बर्गमैन अपने पात्रों को जैसे ट्रीट करते हैं, उनके भीतर से जैसे संवाद आते हैं, उसके साथ मुझे बहुत दिक्कत है, क्योंकि ऐसा करते हुए वो बहुत ही आसान तरीका ढूंढते हैं चीजों को बताने का। मुझे पसंद नहीं जब चीजों को इतनी आसानी से बता दिया जाए। पर उन्होंने जैसे विषयों को लिया है, जिस तरह से मुश्किलों को पर्सोनिफाइ किया है, जिस तरह से किस्से सुनाए हैं, वो मुझे बहुत पसंद हैं। बहुत कंटेंपरेरी फ़िल्ममेकर्स में लार्ज वॉन् त्रियेर (Lars von Trier) की फ़िल्में मुझे हिट एंड मिस होती हैं जो कई बार बहुत अंदर तक पहुंचती है और कई बार बाहर से ही टकराकर चली जाती हैं। उनकी ‘डॉगविल’ (Dogville, 2003) मुझे बहुत पसंद है जो बहुत ही आध्यात्मिक तौर पर काम करती है मेरे लिए।

कोरियन फ़िल्ममेकर्स में...
यार कोरियन फ़िल्ममेकर्स मुझे इतने ज्यादा पसंद नहीं हैं सच बताऊं तो। वो अच्छा बैलेंस ले आते हैं, कमर्शियल फ़िल्मों को थोड़ा और ठीक बना देते हैं ताकि शर्मिंदा करने वाला न हो, ऑफेंडिंग न हो, पर इनका कोई बहुत फैन नहीं हूं। न किम कि-डूक (Ki-duk Kim) का इतना बड़ा फैन हूं, न ही जॉन हू बॉन्ग (Bong Joon-ho) का फैन कह सकता हूं। उनकी वैसे दो-तीन चीजें अच्छी दिखीं है, पर ऐसी एक भी फ़िल्म नहीं है जो मुझे पूरी तरह से पसंद हो। ‘स्प्रिंग समर...’ (Spring, Summer, Fall, Winter... and Spring, 2003) के कुछ-कुछ हिस्से पसंद हैं पर वो पूरी तरह से पसंद नहीं है मुझे। क्योंकि बनाने की बहुत ही कोशिश होती है उसमें। जॉन हू बॉन्ग का जो ह्यूमर है, जिस तरह से वो विडंबना ढूंढता है ‘मेमोरीज ऑफ मर्डर’ (Memories of Murder, 2003) में, वो विडंबनाएं दरअसल पसंद हैं मुझे, लेकिन वो विडंबना तो आज हर कोई कर ही रहा है। अभी मैंने किम कि-डूक की नई फ़िल्म ‘पिएटा’ (Pietà) देखी। ठीक लगी, तो दो-चार आइडियाज उसमें अच्छे थे। उसमें जो लैंडस्केप रचा था वो ठीक था, लेकिन इतनी गज़ब नहीं थी।

इंडिपेंडेंट सिनेमा पर बीते एक-दो साल के जिन नए फ़िल्ममेकर्स से बात हुई है, उन्हें निराशा है कि कोई सपोर्ट नहीं है, बन जाए तो वितरण में हजार झंझट, लोग लेते नहीं हैं, फिर उन्हें किन सिनेमाघरों में लगाएं क्योंकि अलग से हॉल नहीं हैं। स्वतंत्र सिनेमा को भारत में प्रोत्साहित करने की क्या कोशिश हो सकती है? कैसे मदद कर सकते हैं, क्या ढांचा बना सकते हैं?
मैं बहुत आशावादी हूं तो निराशा के साथ खुद को ज्यादा जोड़कर भी नहीं देखता हूं। ये तो जाहिर है, कि हां भई मुश्किल है, पर वो इतनी बड़ी निराशा नहीं है। वो इतना भी मुश्किल नहीं है कि सिर्फ उसके ही बारे में बात की जाए। मुझे थोड़ा सा गुस्सा आने लगता है जब इंडि फ़िल्ममेकर्स सिर्फ यही बात करते हैं। पैसा नहीं है, डिस्ट्रीब्यूटर्स नहीं हैं, ये नहीं है... नहीं है तो फ़िल्में भी कहां आती हैं। फ़िल्में भी तो नहीं थीं अब तक। ये तो पहली बार है कि दो-चार फ़िल्में आई हैं। बीस-चालीस फ़िल्में आएंगी तब हम बात कर पाएंगे इस बारे में। दर्शकों को हमें बताना पड़ेगा, घर-घर जाकर। मेरा ये मानना है कि बहुत प्रचंड ऑडियंस है इंडिया में जो तरस गई है ऐसा सिनेमा देखने के लिए जो उनके लिए प्रासंगिक है, उनके लिए अच्छा है। मैंने तो आज तक जितने भी लोगों से बात की है, उनकी ये प्रतिक्रिया रही है कि यार हमें तो ऐसी फ़िल्म देखनी है। जब प्रोड्यूसर और वितरक यह कहते हैं कि “ये उन लोगों को समझ में नहीं आएगी” तो ये पता नहीं किन लोगों की बात करते हैं। किन लोगों को समझ में नहीं आएगी? क्या वो मानते हैं कि उनको समझ में नहीं आएगी? और क्या वो ऐसा मानते हैं कि वो पूरे हिंदुस्तान की जनता से ज्यादा बुद्धिमान हैं, ज्यादा ज्ञानी हैं। ये जो पूरा चक्कर चला हुआ है न कि यार समझ में नहीं आएगा, लोग स्वीकार नहीं करेंगे.. इस बात को मैं थोड़ा चेतावनी के साथ देखता हूं। लोग तो देखना चाहते हैं, निश्चित तौर पर देखना चाहते हैं, अब ये हमारे सिर पर है कि लोगों तक कैसे पहुंचाएं। इसके लिए हम नहीं निर्भर रह सकते उन लोगों पर जो... अब जैसे हमने आईफोन अगर बनाया है तो उसे उन जगहों पर तो नहीं लेकर जा सकते न जहां एमटीएनएल के फोन बिकते हैं, उसके लिए तो एक नई चेन की बनानी पड़ेगी, उसके लिए एक नए तरीके से लोगों तक पहुंचना पड़ेगा। अगर एक नए तरीके का प्रोडक्ट बन रहा है तो उसका वितरण भी नए तरीके से करने पड़ेगा। वो ढूंढना पड़ेगा। हम सबको मेहनत करके वो बनाना पड़ेगा।

आपने शुरू में कहा कि अपनी एजुकेशन को खुद डिजाइन किया। वो डिजाइनिंग कैसी रही? कितना वक्त लग गया फ़िल्मों से जुड़ी सारी तपस्या करने में?
कुल मिलाकर उतना ही टाइम लगा जितना एक सर्जन को लगता है, या किसी आर्किटेक्ट को तैयार होने में लगता है। जिंदगी के 10 साल लगते हैं मुझे लगता है तकरीबन, जिसमें आपको तपस्या करनी पड़ती है, अभ्यास करना पड़ता है। मेरी जिदंगी में भी संभवतः वह 10 साल का अभ्यास रहा है। 16 की उम्र में मैंने निश्चय किया कि फ़िल्में बनानी हैं जिंदगी में। 19 की उम्र में कुछ नाटक बनाए और कुछ टेलीविज़न सीरीज लिखी। 20-21 साल की उम्र में कुछ और पढ़ाई की। 22 की उम्र में पहली शॉर्ट फ़िल्म बनाई। उसके साथ ही दुनिया घूम पाया। 26 की उम्र में दूसरी शॉर्ट फ़िल्म बनाई। यहां आते-आते थोड़ी दुनिया और घूम पाया, देख पाया। इस दौरान सिर्फ फ़िल्मों का ही नहीं हर चीज का अभ्यास रहा। जैसे आपने मल्टीपल नैरेटिव की बात कही, तो एक मल्टी फेसेटेड एजुकेशन भी रही। मेरा ये मानना है कि एक फ़िल्ममेकर की बहुत सारी-बहुत सारी स्पेशलाइजेशन होनी चाहिए। सोशयोलॉजी में, साइकोलॉजी में, एन्थ्रोपोलॉजी में, इकोनॉमिक्स में, पॉलिटिक्स में... इन सभी चीजों में उसका बहुत ही गहरा अभ्यास होना चाहिए। उसके अलावा जाहिर तौर पर क्राफ्टमैनशिप में। सिनेमैटोग्राफी में, फोटोग्राफी में, आर्ट में, पेंटिंग में, थियेटर में, इन सारी चीजों में एक फ़िल्ममेकर का अभ्यास बहुत पक्का होना चाहिए। मेरा वो 10-12 साल का अभ्यास रहा जिसमें एक-एक करके चीजें जुटती गईं। लगता है कि थोड़ी सी तैयारी हो रखी है जिससे मैं फ़िल्में बनाऊंगा।

आपने इतने विषयों का नाम लिया, क्या 12 साल पर्याप्त थे क्राफ्टमैनशिप और उन तमाम विषयों के लिए? क्योंकि हरेक की इतनी ज्यादा ब्रांचेज खुलती जाती हैं कि...
जैसे-जैसे मैं बनाता गया, तैयार होता गया। जैसे, मेरी पहली फ़िल्म देखोगे तो पाओगे कि मैं बहुत सारी चीजों के लिए तैयार नहीं था। मैंने 22 साल की उम्र में बनाई ‘राइट हियर राइट नाओ’। उसमें फिर भी आपको लगेगा कि थोड़ा कच्चापन है। एक यंग आदमी वाला कच्चापन है। मैं बस उसे ही पक्का करता गया।

आनंद गांधी को जिंदगी में आगे कैसे विषयों पर फ़िल्में बनानी हैं?
ऐसे ही सब्जेक्ट जो अब तक एक्सप्लोर किए हैं। ट्रांसेंडेंस (अमरत्व) के बारे में, उन कॉन्सेप्ट्स के बारे में जो मेरे लिए बहुत ही प्रासंगिक हैं, मृत्यु के बारे में, रोगों के बारे में, उम्र के बारे में, बढ़ती उम्र के बारे में, संस्थानों के बारे में, शासनों और सत्ताओं के बारे में। मैं बहुत ही उत्सुक हूं उन विषयों को लेकर जिन पर अभी स्क्रिप्ट्स लिख रहा हूं। उनमें एक है कि क्या हम एक ग्रैंड यूनफाइड थ्योरी (grand unified theory) कभी ढूंढ पाएंगे? बहुत ही महत्वपूर्ण प्रश्न है, जिसका जवाब ढूंढना चाहता हूं। इस बारे में बहुत आकर्षित हूं। इल्यूजन (भ्रम/भ्रांतियां) कैसे बनाए गए, उनसे बहुत प्रभावित हूं। मैं अपने आप को विज्ञान और फिलॉसफी दोनों का स्टूडेंट मानता हूं तो जो भी विषय मुझे ये दोनों और भी पढ़ा पाएं और ज्यादा समझा पाएं, विज्ञान के दृष्टिकोण से चीजों को, उन सारे सब्जेक्ट्स को मैं ज्यादा एक्सप्लोर करना चाहूंगा।

दीर्घकाल में बॉलीवुड होना चाहेंगे या हिंदी सिनेमा ही कहलाना पसंद करेंगे खुद को?
अपने आप को न मैं भाषा में सीमित कर पाता हूं, न बजट में सीमित कर पाता हूं। मैं खुद को बस सब्जेक्ट्स में सीमित कर पाता हूं कि ये सारे विषय हैं जिनको लेकर फ़िल्में बनाऊंगा। अभी मैं दो-तीन स्क्रिप्ट डिवेलप कर रहा हूं जिनके बजट 20 से 40 करोड़ के होंगे। तो जब ये फ़िल्में बनेंगी तो निश्चित तौर पर न हिंदी होगी न इंडि होगी। ये वैश्विक और अंतरराष्ट्रीय फ़िल्में होंगी जिनमें इंग्लिश भाषा होगी, यूरोपियन भाषाएं होंगी, हिंदी होगी। जैसे ‘शिप ऑफ थिसीयस’ है। वो 40 प्रतिशत हिंदी है, 40 प्रतिशत अंग्रेजी है और बाकी 20 प्रतिशत अरबी और स्वीडिश हैं। मैं हमेशा मानता हूं कि जो भी किरदार बना रहा हूं उसे अपनी भाषा में बोलना चाहिए। मुझे हमेशा से खटका है कि आप एक तमिल कैरेक्टर दिखाते हो जो अपने ही एक्सेंट में हिंदी में बात करता है। ऐसा मैं कभी नहीं करूंगा। आपने ‘राइट हियर राइट नाओ’ देखी है, मेरी पहली शॉर्ट फ़िल्म, मैं तब से ही यह करता आया हूं और वो ही मैं जिंदगी भर करता रहूंगा कि जहां का पात्र होगा वो वहीं की भाषा बोलेगा। अगर स्वीडन का पात्र होगा तो वो स्वीडिश में बात करेगा, अगर बिहार का पात्र है तो वो छोटा नागपुरी में बात करेगा या भोजपुरी में बात करेगा।

आपने वैसे बता दिया है कि 16 की उम्र में फ़िल्में बनाना तय किया, थोड़ा सा उस साल के बारे में बताएं कि ऐसा क्या था कि कह दिया फ़िल्में ही बनानी हैं? क्योंकि वो एक मुश्किल टाइम होता है तय करना।
बचपन से ही तय कर लिया था कहीं न कहीं। बचपन से दो-चार चीजें तय की थीं। 4-5 साल की उम्र में यह कर लिया था कि जोकर बनना है। ‘मेरा नाम जोकर’ देखकर तय किया था कि जोकर बनना है। फिर ये तय किया था कि वैज्ञानिक बनना है। बहुत ही समर्पण के साथ एक वैज्ञानिक बनना चाहता था। दिन-रात उसी के सपने देखता था और हर वक्त वैज्ञानिक बनने की ही बातें करता था। और बहुत समर्पण के साथ जादूगर बनना था। उसके बाद बहुत साल तक स्कूल टाइम में एक्टर बनने का समर्पण था। ये सब एक साथ था। वैज्ञानिक भी बनना था, एक्टर भी बनना था, जोकर भी बनना था, जादूगर भी बनना था, फिलॉसफर भी बनना था, कलाकार भी बनना था। जब 14-15 का हुआ तो समझ में आने लगा कि यार फ़िल्म एक जगह है जहां पर आप वैज्ञानिक, फिलॉसफर, कलाकार, लेखक, सबकुछ बन सकते हो। तो 16 की उम्र तक वो विचार स्थापित हो गया कि सबकुछ यहीं बन सकते हो।

घरवाले नहीं कहते कि ये फील्ड छोड़ दो, कुछ और ढंग का कर लो? कौन हैं परिवार में?
मेरी माताजी बहुत ही बड़ी दीवानी रही हैं पॉपुलर कल्चर की। मेरी परवरिश रंगमंच पर हुई। बहुत रंगमंच दिखाया गया है बचपन से। माताजी रंगमंच, सिनेमा, साहित्य और खासकर पापुलर साहित्य बहुत पसंद करती हैं। वो जब पढ़ती और देखती थीं तो मुझे साथ-साथ दिखाती थीं। बचपन से बड़े होते वक्त तक हमेशा मेरे हीरोज वैज्ञानिक थे और पोएट्स थे। उन्हें बहुत ही ऊंचे दर्जे पर देखा जाता था। मेरी मां लेखकों, कवियों और कलाकारों को विस्मय के साथ देखती थीं। लगता है वो सेलिब्रेशन मेरे अंदर गया है। मेरी नानी मां और मां ने मुझे बड़ा किया है। मां सिंगल मदर रहीं। जब मैं 7 साल का था तब वह पिता से अलग हो गईं। मुझे बड़ा करते वक्त नानी और मां के हीरोज बड़े इंट्रेस्टिंग किस्म के लोग होते थे। मेरी नानी मां के सारे के सारे हीरो साधु और संत थे, दुनिया भर के, जिनको वह पढ़ती थीं और जिनके बारे में वह हमेशा बातें करती थीं। मां के हीरो बहुत सारे हुआ करते थे, खासतौर पर पोएट्स और राइटर्स। तो बचपन से वो बात अंदर चली गई कि कूल होता है ऐसा बनना। प्रैक्टिकली मेरी मां और नानी मां यही चाहते थे कि बड़ा होकर कुछ सी.ए. – एम.बी.ए. टाइप बन जाऊं। लेकिन जो अंदरूनी तौर पर बनने-बनता देखने की ख्वाहिश थी वो पहले ही अंदर जा चुकी थी। कोई मुश्किल नहीं हुई जब मैंने तय किया कि इस ओर जाने वाला हूं। मेरे पर विश्वास बहुत था सबका। ऐसा हमेशा माना गया कि मुझे पता है मैं क्या कर रहा हूं। क्योंकि मैं सिंगल चाइल्ड था, जिसे सिंगल मदर ने पाला-पोसा था और आर्थिक दरिद्रता में। इस वजह से मैं 7 की उम्र में ही मैच्योर हो गया था। चीजों को समझने लगा था। इस वजह से सब को मेरे ऊपर विश्वास भी जल्दी आ गया था। इसलिए जब मैंने फैसला लिया तो इतनी दिक्कत नहीं हुई। थोड़े-बहुत सवाल उठे कि क्या करेगा कैसे करेगा। थोड़ी शंकाएं उठीं, पर उन शंकाओं के लिए ज्यादा जगह नहीं थी। वो निगोशियेबल ही नहीं था।

इस उम्र के बाद अपने पिता को एक व्यक्ति के तौर पर आप कैसे याद करते हैं? क्या रुचियां थीं उनकी?
मैं उनको ज्यादा जानता नहीं था। मैं 6-7 साल का था जब माता-पिता अलग हो गए। जब मैं 12-13 का था तब वो चल बसे किसी जेनेटिक डिसऑर्डर की वजह से। मुझे कुछ-कुछ चीजें पता हैं उनके बारे में। 6-7 साल तक की कुछ याद्दाश्त है। तो मेरी दुनिया मेरी माताजी, मेरी नानी मां और नाना थे। फिर जब मैं 15 का था तो मेरी माताजी ने पुनर्विवाह किया तो मेरे ये डैड भी इस दुनिया का हिस्सा बन गए। मैं खुशकिस्मत था कि पैसे की तंगी होते हुए भी बहुत सी दूसरी चीजें आस-पास थीं। विचार था, खुद्दारी थी।

लेकिन अगर जिदंगी में वो चीजें नहीं होती तो आज हम ऐसे होते ही नहीं, जो हैं, बिल्कुल सतही हो जाते...
बिल्कुल। ... मेरी नानी मां ने तो मेरे सीरियल्स में एक्ट करना भी शुरू कर दिया और वो बहुत फेमस हो गईं। वो जब भी गांवों या छोटे शहरों में जाती हैं तो लोग जमा हो जाते हैं, उनकी तस्वीरें खींचने के लिए।

आपके लिखे कौन से सीरियल में उन्होंने एक्ट किया है?
सीरियल तो मैंने बहुत ही घटिया लिखे तो आप मेरी नानी मां को देखिए। एक तो ‘क्योंकि सास भी कभी बहू थी’ में। और भी एक-दो सीरियल में जिनका नाम मुझे याद नहीं है। ‘क्योंकि सास...’ में उन्होंने गोदावरी दादी का रोल किया था, जो कॉमिकल रिलीफ के लिए आती थीं। वह जरा ऊंचा सुनती थीं या कुछ अजीबोगरीब सुनती थीं।

निराशा के पल आते हैं क्या? आते हैं तो कौन सी फ़िल्में देखते हैं जो सब भुला देती हैं?
4-5 साल से तो मैं बहुत व्यस्त रहा हूं अपनी फ़िल्मों पर काम करने में। ऐसी किताबें कुछ जरूर हैं। कुछ लेखक हैं जिनसे मैं बहुत प्रेरित हो जाता हूं। रिचर्ड डॉकिन्स हैं, उनके विचारों से बहुत प्रेरित हो जाता हूं और लगता है फिर से लिखने लगूं। एक फ़िल्म है जो मैं बार-बार देख लेता हूं और जो मेरा गिल्टी प्लेजर है, कोई 30-35 बार जिंदगी में अब तक देख ली होगी, जिसकी एक-एक लाइन मुझे याद है, जो मैं अकसर देख ही लेता हूं... वो है ‘द मेट्रिक्स’ (The Matrix, 1999)। कुछ बहुत ही हल्की-फुल्की सी हैं और मुझे पसंद हैं, कैमरन क्रो (Cameron Crowe) की ‘ऑलमोस्ट फेमस’ (Almost Famous, 2000)। वो कहीं न कहीं मेरी मां की कहानी है इसलिए मुझे बहुत पसंद आती है। ‘गुड विल हंटिंग’ (Good Will Hunting, 1997) मुझे बहुत पसंद आई है। वो मुझे बहुत एंटरटेनिंग लगती है। मुझे मेरे और मेरे दोस्तों की कहानी लगती है।

‘द मेट्रिक्स’ की तर्ज पर क्या ‘लूपर’, ‘किलिंग देम सॉफ्टली’ और ‘द डार्क नाइट राइजेज’ पसंद आई?
‘द डार्क नाइट राइजेज’ तो मुझे बहुत घटिया लगी थी...

पर उसमें जो ‘ऑक्युपाई वॉल स्ट्रीट’ वाला विचार था...
लेकिन वो ऐसी इमेज छोड़ती है न, कि बहुत आसान होता है आजकल करना। और हर कमर्शियल फ़िल्म इतना तो कर ही लेती है। वो भाषा तो पहले से ही सेट कर दी गई है। इतना टिपिकल रहा नहीं है। ‘लूपर’ मैंने देखी नहीं है। देख लेता हूं अगर आप कह रहे हैं तो। ‘किलिंग देम सॉफ्टली’ भी नहीं देखी है क्योंकि अपनी फ़िल्म को लेकर बहुत बिजी था।

‘इनसेप्शन’ कैसी लगी?
‘इनसेप्शन’ तो बहुत ही घटिया है यार। बहुत आसान है।

लेकिन नोलन की फ़िल्म जब भी आती है, विश्व भर में उनके प्रशंसकों के रौंगटे खड़े हो जाते हैं?
क्या पता, लेकिन ‘इनसेप्शन’ एक वैसी फ़िल्म है कि देखने के बाद आपको लगता है कि आप इंटेलिजेंट हो लेकिन क्या पता आप इंटेलिजेंट हो कि नहीं, क्योंकि उसमें इतना आसान करके दिया जा रहा है सबकुछ। इतना परोसा गया है। ऐसे कोई उसमें कठिन कॉन्सेप्ट नहीं हैं, पर ऐसा बनाया गया है कि लगता है आप बहुत की कठिन कॉन्सेप्ट को समझ रहे हो और उस बात की आपको खुशी होती है। तो वो मैनप्युलेटिव स्ट्रक्चर बनाना तो मुझे बहुत ही आसान लगता है। वो मैं बचपन में बहुत बनाता था अपने नाटकों में। जिससे दर्शकों को लगे कि यार मैंने कुछ बहुत ही अद्भुत देख लिया है, बहुत ही इंटेलिजेंट देख लिया है जबकि वो बहुत ही आसानी से परोसा गया होता है आपको। ‘इनसेप्शन’ में कोई भी कॉन्सेप्ट जो खोला गया था उसे पूरा नहीं किया गया था। कॉन्सेप्ट को पूरा करना ही मुश्किल होता है, खोल देना तो बहुत ही आसान बात होती है। ‘इनसेप्शन’ में जिस पैराडॉक्सिकल आर्ट की बात की गई थी उसका कुछ यूज नहीं था। दिखाया गया कि वो बस घूम रहे हैं, घूम रहे हैं। वो तो बहुत ही आसान होता है। कोई चीज अंदर फैंक देना और दर्शक को लगता रहे कि यार कुछ प्रचंड अद्भुत देख लिया है और उसी कॉन्सेप्ट को बार-बार फ़िल्म में घुमाते रहना ताकि आपको लगे कि हां, आपने कोई कॉन्सेप्ट समझ लिया है। ज्यादा मुश्किल होता है उनको जोड़ना, उनको एक कॉहरेंट (सुसंगत) फ़िल्म में तब्दील कर पाना।

अडूर गोपालकृष्णन, रे, बेनेगल, निहलाणी, जैसे जितने भी हिंदी, मलयाली, मराठी, बांग्ला, कन्नड़ फ़िल्मकार हुए हैं, आप इन लोगों के काम को कैसे देखते हैं? क्या आज उनकी प्रासंगिकता उतनी ही है?
मैं जब यंग था तब ये लोग मेरे लिए बहुत जरूरी थे। पर कुल मिलाकर औसत ही रही हैं उनकी फ़िल्में। दुर्भाग्य से एक भी फ़िल्ममेकर ऐसा नहीं है जिसके काम को देखकर कह सकूं कि ये मेरे लिए आदि और अंत है। सत्यजीत रे अकेले ऐसे हैं जो उस क्षेत्र में कुछ नजदीक आते हैं। उनकी चार-पांच फ़िल्में ऐसी रही हैं जिनका मेरी परवरिश, पढ़ाई और सिनेमा की क्राफ्टमैनशिप सीखने में योगदान रहा है। बाकी किसी हिंदुस्तानी फ़िल्ममेकर से मेरा ऐसा रिश्ता नहीं बन पाया है, जो मैं बहुत मिस करता हूं। मैं 16-17-18 की उम्र में प्रभावित था, इन लोगों के काम को देखता था, निहलाणी और श्याम बेनेगल और अडूर गोपालकृष्णन और जॉन अब्राहम और कुमार साहनी और मणि कौल के। मैंने पहली बार जब कमल (स्वरूप) का काम देखा था, जब पहली बार ‘ओम-दर-ब-दर’ (1988) देखी तो लगा कि ये क्या अद्भुत फ़िल्म है। इन सब चीजों से मैं प्रभावित था एक जमाने में। 20 साल की उम्र तक। पर वो संबंध टिक नहीं पाया है। किसी इंडियन साहित्यकार और फ़िल्मकार के साथ मेरा ऐसा संबंध हो, इसे बहुत मिस करता हूं।

बचपन की सम्मोहक फ़िल्में जो अब भी याद हैं। आज भले ही बचकानी लगती हैं पर उस बचकानेपन को आप दरकिनार करते हैं क्योंकि उन फ़िल्मों को आपने उस वक्त देखा था जब आप कुछ नहीं जानते थे?
अभी मैं इन्हें देख पाऊंगा कि नहीं, पर बचपन की मेरी फेवरेट फ़िल्में थीं, ‘मेरा नाम जोकर’, ‘जागते रहो’, ‘उत्सव’ (गिरीष कर्नाड), ‘दीवार’ और ‘कर्मा’। ये सारी बचपन की फेवरेट फ़िल्में थीं जिनको देखकर लगता था कि यार ऐसी होनी चाहिए फ़िल्में।

सर्वकालिक पसंद वाली भारतीय और विदेशी फ़िल्में जो सभी को देखनी चाहिए।
इंडियन फ़िल्मों में तो सर्वकालिक ‘अप्पू ट्रिलजी’ (The Apu Trilogy, 1955-1959) ही रहेगी। उनको एक फ़िल्म बनाकर देखना चाहूंगा। दुनिया भर की फ़िल्मों में बता सकता हूं जो कभी हिली नहीं ज़ेहन से, जब से देखी तब से वैसी ही प्रभावशाली बनी हुई हैं। ‘अ शॉर्ट फ़िल्म अबाउट किलिंग’ (A Short Film About Killing,1988) किश्लोवस्की की, तारकोवस्की की ‘सोलारिस’ (Solaris, 1972), रॉय एंडरसन की ‘सॉन्ग्स फ्रॉम द सैकेंड फ्लोर’ (Songs from the Second Floor, 2000), माइकल हेनिके की ‘द वाइट रिबन’ (The White Ribbon, 2009) और बेला तार की ‘वर्कमाइंस्टर हार्मनीज’ (Werckmeister Harmonies, 2000)।

वैसे तो आपने नाम लिया डॉकिन्स का लेकिन फिलॉसफी में ओशो या कृष्णमूर्ति या गीता या एल्डस हक्सले या दीपक चोपड़ा... किसको आपने पढ़ा है?
इन सभी को पढ़ा है। 16-17 साल की उम्र में उठता था कृष्णमूर्ति (Jiddu Krishnamurti) के साथ, बैठता था हक्सले (Aldous Huxley) के साथ और रसल (Bertrand Russell) और स्पेंसर (Herbert Spencer) के साथ। ये सभी बहुत बड़े प्रेरणास्त्रोत थे। बहुत महत्वपूर्ण प्रेरणाएं थी ये। 15 साल की उम्र में कुछ और लोग थे, उस उम्र में फिलोसॉफिकल प्रेरणा अयान रेंड (Ayn Rand), गांधी (Mahatma Gandhi) और जॉन डॉनी (John Donne) थे। फिलॉसफी की प्रेरणा फिक्शन से शुरू हुई थी, फिर नॉन-फिक्शन पर गई। जहां हक्सले, कृष्णमूर्ति और ओशो को कुछ-कुछ पढ़ा था। ओशो के साथ संबंध पहले से ही ठीक-ठाक था क्योंकि 17 की उम्र तक जो मैं पढ़ चुका था उससे कहीं न कहीं जानता था वो क्या कह रहे थे। ओशो को पढ़कर कभी ये नहीं लगा कि यार कुछ ऐसा सुना या देखा है जो पहले नहीं पता था। यानी तब तक वो बातें मेरे लिए ज्यादा नई नहीं रही थीं। पर कबीर के साथ का रिश्ता हमेशा कायम रहा है। अभी भी उनसे कुछ मिल जाता है। क्योंकि वो कविता है, रूपक है। क्योंकि वो उसका विस्तार है, वो खुला हुआ है वो कहीं पर भी जा सकता है। कबीर से वो इक फकीरी वाली दोस्ती भी है। यहां तक कि डॉकिन्स (Richard Dawkins) को भी जब तक पढ़ा, ईमानदारी से बताऊं तो तब तक फिलोसॉफिकली कोई ऐसी बात नहीं रही थी जो बाकी रह गई थी। डॉकिन्स को पढ़कर जो माइक्रोबायोलॉजी और इवोल्यूशनरी साइकोलॉजी के बारे में चीजें समझ में आईं और उसकी वजह से बाद में डेनिस ब्रे (Dennis Bray) से जो इवोल्यूशनरी साइकोलॉजी के बारे में चीजें समझ में आईं। तो डॉकिन्स से ज्यादा महत्वपूर्ण मेरे लिए डेनिस ब्रे हैं जिन्होंने ‘वेटवेयर’ (Wetware: A Computer in Every Living Cell, 2009) नाम की किताब लिखी है। डेनिस भी माइक्रोबायोलॉजिस्ट हैं जो बहुत महत्वपूर्ण हैं मेरे लिए। लुई थॉमस (Lewis Thomas) बहुत महत्वपूर्ण हैं उन्होंने ‘द लाइव्ज ऑफ अ सेल’ (The Lives of a Cell: Notes of a Biology Watcher, 1974) नाम की किताब लिखी थी। तो डॉकिन्स, डेनिस और लुई फिलॉसफी में एक विज्ञान वाला हिस्सा भरते हैं जो कॉन्सेप्चुअल आइडिया है क्योंकि फिलोसॉफिकली आइडिया तो मैं एक्सप्लोर कर चुका था।

इन जितने भी दार्शनिकों को पढ़ते हैं तो कई बार ऐसा हो जाता है कि आदमी का दिमाग खराब हो जाता है, कि यार ये क्या बात कर रहे हैं, इतना ठगा गया हूं क्या मैं? इनके पीछे चलूं क्या मैं? या क्या वो पहुंचाएगा या वो नहीं पहुंचाएगा? या उसके बीच जोन्सटाउन जैसी घटना भी हो जाती है और आदमी को लगता है कि यार ये तो कुछ और ही चीजें हैं, ये तो कहीं और ही ले जा रहे हैं। क्या ये उलझाते ज्यादा हैं या रास्ता ज्यादा दिखाते हैं?
रास्ता तो यार मैं खुद ही ढूंढ रहा था अपना, खुद ही बना रहा था। मेरे लिए तो प्रासंगिक था ही नहीं कि कौन क्या दिखा रहा है मुझे। मेरे लिए तो प्रासंगिक ये था कि तथ्य कौन बता रहा है मुझे। जो चीजें तथ्यपरक (फैक्चुअल) नहीं थीं उन्हें मैं निकालता चला गया। जो चीजें तथ्यपरक थीं उन्हें रखता गया और अपनी खुद की फिलॉसफी बनाता गया। वैसे भी मैंने कभी भी किसी को फॉलो नहीं किया था। संस्थानों के साथ मुझे बचपन से ही दिक्कत रही है। मेरी एक दोस्त हाल ही में एक कहानी लिख रही थी कि जिसमें वह एक ऑब्जर्वेशन कर रही थी कि सार्त (Jean-Paul Sartre) से लेकर नीत्शे (Friedrich Nietzsche) से लेकर सुकरात (Socrates) जैसे महान फिलॉसफर्स में एक चीज कॉमन रही है कि इनमें से किसी के भी बाप नहीं थे। ये सभी या तो अनाथ थे या सिंगल मदर द्वारा पाले-पोसे गए थे। तो इस वजह से हुआ होगा कि बचपन से ही उनमें एक फादर फिगर या संस्थान के आगे आज्ञाकारी होने की आदत नहीं रही होगी। माता भी संस्थान होती है, बहुत बड़ी संस्थान होती है पर बहुत अलग प्रकार की होती है, पर बहुत ही फ्लूइड होती है। तो हो सकता है मनोवैज्ञानिक रूप से मेरे साथ भी वही हुआ हो। एस्टैबलिशमेंट के साथ कभी कोई रिश्ता बना नहीं पाया हूं मैं। इसलिए ऐसा कभी रहा नहीं है कि कोई मुझे गुमराह कर देगा या कोई मुझे रास्ता दिखा देगा। बेहद स्वतंत्र रहा हूं मैं।

आपने कहा कि जो तथ्यपरक आपको मिला उसे पकड़ा और बाकी छोड़ा, इसे किसी उदाहरण के साथ समझाएं...
जैन विचार और बौद्ध विचार, ये दो 17 की उम्र में मेरे विचारों को आकार देने में बहुत मददगार रहे। अभी जैन विचार में बहुत से ऐसे विचार हैं जो फैक्चुअल हैं, बहुत से ऐसे विचार हैं जिनका सत्य से कोई लेना-देना नहीं है। उस माइथोलॉजी को बनाने के पीछे दूसरे कारण हैं। सोशल बैलेंस लाना कारण है, पॉलिटिकल बैलेंस लाना कारण है। जैसे, जैन विचार में ये भी बात है कि प्रकृति की ओर जिम्मेदार होना एक कॉज-कॉन्सीक्वेंस रिलेशनशिप (cause-consequence relationship) बनाएगा, नहीं करेंगे तो आप पर प्रकोप होंगे, जो तार्किक तौर पर जांचा जा सकता है, समझा जा सकता है। अब इसमें ये विचार भी है कि भई मेरू पर्वत हैं और उसके इर्द-गिर्द पूरी पृथ्वी घूम रही है, पूरा ब्रह्मांड घूम रहा है, जहां सात नरक हैं सात स्वर्ग हैं। तो ये बिल्कुल ही तथ्यपरक बात नहीं है। ये एक मेटाफर है, एक रूपक है जिसका एक संबंध रहा होगा तब के विचारकों के पास। लेकिन इसका मेरे साथ कोई संबंध नहीं है तो मैं इसे छोड़ सकता हूं। उसमें मेरे लिए जब जो वैलिड था, साबित करने योग्य था, उसे मैं लेता गया। उसके बाद उस पूरे विचारशास्त्र की ही जरूरत नहीं रही मुझे। उसमें से जो सत्य था वो मैंने ले लिया था और मैं आगे बढ़ चला। यात्रा हमेशा ये वाली रही है। मैंने खुद को न कभी जैन कहा है, न बौद्ध कहा है, न हिंदु कहा है, न वैदिक कहा है। संस्थानों के साथ मुझे बचपन से ही दिक्कत रही है। न मैं कभी ओशो पंथी बना हूं न जे. कृष्णमूर्ति का अनुयायी बना हूं। मैं पहली बार कृष्णमूर्ति की बायोग्राफी पढ़ रहा था पुपुल जयकर की लिखी। तब 16-17 साल का था। उसमें कृष्णमूर्ति ने एक बात कही थी जो मुझे लगा कि यार ये तो बढ़िया है, इस आदमी ने कह दी। उन्होंने कहा था कि “अगर आप मेरे पीछे आओगे तो सत्य के पीछे नहीं जा पाओगे” (If you follow me, you’ll cease to follow the truth)। जब उन्होंने खुद ने ये बात कह दी तो मेरी ही बेवकूफी होगी अगर फॉलो किया तो। ओशो आश्रम गया था, वही अपने स्पिरिचुअल शॉपिंग के दिनों में। वहां मैंने एक टेप निकालकर सब को दिखाई, वह वीडियो टेप आज भी उस आश्रम में है, जिसमें ओशो ने कहा है कि “ये तो प्रेम मिलाप है, हम लोग साथ में मिलकर मजे ले रहे हैं, मस्ती कर रहे हैं। मेरे जाने के बाद, अगर मुझसे प्यार है आपको तो आप एक चीज मेरे लिए कर लेना, (If you really love me then just do one thing for me when I die, disperse…) ...सब अपने-अपने घर बोरिया-बिस्तरा बांधकर चले जाना। कोई आश्रम मत करना कोई दुकान मत खोलना”। तो ये बात तो जो आधे भी समझते हों उनके लिए उसने कह दी कि मेरे बाद कोई दुकानें मत खोलना। क्योंकि उसमें कहीं न कहीं सड़न आ जाती है, कहीं न कहीं विचार इवॉल्व होना थम जाता है। थ्योरी ऑफ ग्रैविटी गलत नही है। अगर सेब जमीन पर गिर रहा है तो क्यों गिर रहा है, वो प्रश्न सही है। उस प्रश्न के तुरंत बाद जो जवाब आता है कि भई क्योंकि ये गुरुत्वाकर्षण है। जो बड़ी बॉडी है वो छोटी बॉडी को अट्रैक्ट करती है इसलिए। वो गलत नहीं है पर वो अधूरा है। वो क्यों अधूरा है ये आइंस्टीन बताता है। उस प्रश्न का जवाब गुरुत्वाकर्षण होने में नहीं है। गुरुत्वाकर्षण जवाब होना ऐसा मान लेना है कि ये फंडामेंटल लॉ है प्रकृति का। जबकि वो फंडामेंटल लॉ नहीं है। प्रकृति का फंडामेंटल लॉ रिलेटिविटी है। शायद वो भी नहीं है, पर रिलेटिविटी ज्यादा क्रिस्पर लॉ है। रिलेटिविटी ने हमें कई दूसरी चीजें समझाईं। उससे ग्रैविटी गलत साबित नहीं होती है बल्कि वह इनकॉरपोरेट (समाहित) होती है। तो जो मैं मैट रिडली की बात बता रहा था कि मैं ये नहीं कहता कि कृष्णमूर्ति से स्मार्टर हूं पर मेरे पास ये फायदा है कि मैंने कृष्णमूर्ति को पढ़ा है। और मैं ये कह सकता हूं कि ये सब चीजें छोड़कर के एक बड़ा सच बनता हैं।

फ़िल्म ‘गाइड’ में आखिरी दृश्यों में राजू भगवा ओढ़े दर्शन वाली बातें कहता है। ‘शिप ऑफ थिसीयस’ से पहले कौन सी हिंदी फ़िल्मों में प्रभावी दर्शन आपको याद आता है?
दुर्भाग्य से मैंने ‘गाइड’ देखी नहीं है और ‘गाइड’ शायद वो फ़िल्म हो सकती हो, चूंकि देखी नहीं है तो ज्यादा क्या कह पाऊंगा। ऐसी अन्य कोई फ़िल्म मेरे ध्यान में आ नहीं रही है। अगर आप याद दिलाओ तो शायद बता सकूं। ऐसी कोई याद नहीं आ रही है जहां पर कोई बहुत ही महान संवाद हुआ हो।

‘सारांश’ में आखिरी दृश्य में जब पार्क में वह बूढ़ा जोड़ा बैठा होता है और कहता है कि “मौत आती है लेकिन जिंदगी चलती रहती है”, बेहद महीन स्तर पर वह है...
उस महीन स्तर पर तो तकरीबन हर हिंदी फ़िल्म में है। राज कपूर की फ़िल्मों में है। जो मैंने बचपन की फेवरेट्स बताईं ‘मेरा नाम जोकर’ या ‘उत्सव’... उतना तो उनमें और हर फ़िल्म में था। हर अच्छी फ़िल्म में कहीं न कहीं। मतलब वो गानों में भी जीवन के पहलू आ जाते हैं। जैसे हरियाली और रास्ता। फ़िल्म बहुत वाहियात थी पर गानों में बातें थीं। उतनी फिलॉसफी तो हिंदी फ़िल्मी गानों में अकसर रहती ही थी।

मैं कुछ शब्द बोलूंगा, आप उनसे क्या समझते हैं, एक शब्द में उत्तर दें...
मौत – चैलेंज
जिंदगी - प्रोसेस
पैसा – इररेलेवेंट टूल
नग्नता - सच्चाई
गालियां - जरूरी
खून – बहता लाल
दोस्ती - गहराई
फांसी – रिवेंज ऑफ स्टेट
फलसफा – लगातार बदलता

अपनी जिंदगी के फलसफे को थोड़ा और बताएं।
मैं मीनिंग ढूंढना चाहता हूं। फलसफा मेरा यही है कि मैं फलसफा ढूंढना चाहता हूं। चाहता हूं उसे इस तरह ढूंढ लूं कि इस्तेमाल हो सके जिदंगी बरकरार रखने में। जिदंगी से मेरा मतलब है कॉस्मिक लाइफ। मैं चाहता हूं कि जिंदगी बरकरार रहे, ब्रम्हांड में। और मुझे लगता है कि सही तरीके से उस फलसफे को ढूंढने से हम ऐसी जिंदगी बरकरार रख पाएंगे।

‘शिप...’ अब तक इतने फ़िल्म समारोहों में गई है, इतने लोगों ने देखी है तो फ़िल्म को लेकर सबसे खास तारीफ आपको किन-किन ने दी, जो छू गई?
फेसबुक पर किसी ने टिप्पणी की थी, हालांकि वो मेरे मुंह से मेरी ही तारीफ हो गई लेकिन उसे लेकर मैंने गर्व महसूस किया, कहीं न कहीं गाबोर वाली ही बात उसमें थी, जिसमें उसने कहा था कि “ये कमेंट उन सभी लोगों के लिए है जो आंसू बहा रहे थे ये सुनकर कि बेला टार रिटायर हुए हैं, उन्हें ग़मज़दा होने की जरूरत नहीं है क्योंकि अभी आनंद गांधी फ़िल्म बना रहे हैं”। ये मुझे बहुत ही प्रचंड बात लगी थी कि ये क्या कह दिया।

‘शिप...’ लोगों तक पहुंचेगी या इस फ़िल्म तक लोगों को खुद पहुंचना होगा?
दोनों। मुझे लगता है बीच में आना पड़ेगा। मैं लेकर आ रहा हूं लोगों तक। इस महीने रिलीज कर रहे हैं और अच्छी तरह रिलीज कर रहे हैं ताकि ऐसा न हो कि कुछ लोग ही देख पाएं। अब तक जितनी भी आर्ट हाउस फ़िल्में हुई हैं हमारे देश में, उनमें संभवतः ये सबसे बड़ी रिलीज होगी। हम पूरी कोशिश कर रहे हैं कि बीच तक आएं, बाकी रास्ता तय करने की मेहनत लोगों को करनी पड़ेगी।

क्योंकि अगर ज्यादा लोगों को नहीं दिखा पाए तो दोनों ही पक्षों को हानि होगी...
मुझे लगता है कि अंततः लोग देखेंगे ही देखेंगे। अंततः जिसको देखनी है वो फ़िल्म देख ही लेगा किसी न किसी तरह से। इस फ़िल्म की शेल्फ लाइफ भी बड़ी है। थोड़े सालों तक ये जीती रहेगी और लोग तब तक देख लेंगे।

Still from 'Ship of Theseus.' The movie is shot entirely on Canon EOS 1D MK4 DSLR Camera.
Anand Gandhi's 'Ship of Theseus' has surprised many prominent filmmakers and viewers in India. It has changed the perception of Indian films across the world via many International Film Festivals. Title of the movie is a thought experiment. It alludes to Theseus’ paradox, most notably recorded in Life of Theseus, wherein the Greek philosopher Plutarch inquires whether a ship that has been restored by replacing all its parts, remains the same ship.

Behind the movie is An unusual photographer grapples with the loss of her intuitive brilliance as an aftermath of a clinical procedure; an erudite monk confronting an ethical dilemma with a long held ideology, has to choose between principle and death; and a young stockbroker, following the trail of a stolen kidney, learns how intricate morality could be. Following the separate strands of their philosophical journeys, and their eventual convergence, Anand's movie explores questions of identity, justice, beauty, meaning and death.

Anand began his writing career in 2000 with popular TV show ‘Kyunki Saas Bhi Kabhi Bahu Thi’ (dialogues) and ‘Kahaani Ghar Ghar Kii’ (screenplay). Before 'Ship...,' Anand made 'Right Here, Right Now' (2003) and 'Continuum' (2006). Now, 'Ship of Theseus' is slated to release on July 19, 2013.
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