Monday, December 31, 2012

मीडियागत अपार्थाइड झेल रहे ‘उन’ अमेरिकियों की कथा

:: अमेरिकन हार्ट :: 1993 :: निर्देशक मार्टिन बेल :: कलाकार जेफ ब्रिजेज व एडवर्ड फरलॉन्ग ::
Seen in the poster, in their roles, Jeff and Edward.
 ‘अमेरिकन हार्ट’ के निर्देशक मार्टिन बेल की पत्नी मैरी ने सीएटल की गलियों में विचरने वाले बच्चों की तस्वीरें खींची। उनका ये फोटो-आलेख लाइफ मैगजीन में छपा। ‘स्ट्रीटवाइज’ शीर्षक से। बाद में मार्टिन ने इसी नाम से इसी विषय पर एक डॉक्युमेंट्री फिल्म बनाई, जिसके बारे में हम फिर जरूर बात करेंगे। फीचर फिल्म उसका तीसरा रूप रही। जेफ ब्रिजेज के जो ‘द बिग लेबोवस्की’ और ‘द ट्रू ग्रिट’ वाले लोकप्रिय लुक्स हैं, उससे बिल्कुल अलग हैं वह ‘अमेरिकन हार्ट’ में। उघाड़े, लंबी पतली बाहों, लंबे बालों और लंबी मूछों में छोटे-छोटे टी-शर्ट और बेलबॉटम पैंट्स में वह गली के आवारा लगते ही हैं। जाहिर है ये छवि हिप्पियों वाली ज्यादा है। कहानी में वह जेल से छूट कर आए हैं, अपने 12 साल के बेटे के साथ वक्त बिता रहे हैं। पर हैं वैसे ही। बाप-बेटे का अद्भुत रिश्ता तो है ही, पर सड़क पर गलियों में पलने वाले बच्चों की कहानी ज्यादा है। गैर-अमेरिकी लगने वाली फिल्म है। कमाल।

फिल्म में 12 साल के लड़के की भूमिका एडवर्ड फरलॉन्ग ने निभाई है जो ‘टर्मिनेटर 2: जजमेंट डे’ में साराह कॉनर के लड़के जॉन कॉनर बने थे। दोनों ही फिल्मों के वक्त वह बाल कलाकार थे। असल जिंदगी में विडंबना देखिए कि आज एडवर्ड की लाइफ कुछ वैसी ही है जैसी इस फिल्म में जेफ ब्रिजेज निभाते हैं। एडवर्ड 36 के हो गए हैं, उनके एक छोटा बेटा है और वाइफ ने तलाक के लिए फाइल कर दिया है। ड्रग्स लेने के लिए भी वह कई बार पकड़े गए हैं। 2001 में एक मैगजीन को उन्होंने कहा कि उनके पास कुछ नहीं बचा है। समझ नहीं आता कि इस फिल्म में ऐसे ही किरदार में जेफ को ऑब्जर्व करने के बाद भी वह क्यों नहीं सही राह चल पाए? उन्हें ड्रग्स की आदत कहां से लगी? अचरज है।

फिल्म की कहानी संवदेनशील है। रॉ है। धूसर है। बाप-बेटे का रिश्ता भी हकीकत भरा है। हां, भारतीय सेंसेबिलिटी के हिसाब से हो सकता है हमें ज्यादा ही फ्रेंक लगे। पर है नहीं। ‘अमेरिकी’ की एक ऐसी तस्वीर फिल्म दिखाती है जो बाहरी मुल्कों में कभी ‘सीएनएन’ और ‘बीबीसी’ जैसे जरियों से बाहर नहीं जा पाई। अगर ऐसी दस-बारह फिल्में लाइन में बन जातीं तो एक सच सामने आ जाता कि धनप्रधान व्यवस्था वाला समाज बनने से आर्थिक खाई कितनी चौड़ी होती जाती है। हम भी तो अब वैसे ही होने जा रहे हैं। अब हमने अपने राज छिपाने शुरू कर दिए हैं। हम फिल्में बना रहे हैं, खूब बना रहे हैं, पर कितनी ऐसी हैं जो आर्थिक असमानता को लेकर नीति-निर्माण करने की जरूरतों को जगाने के लिहाज से बना रहे हैं। अब हम मॉल दिखाते (बुड्ढा होगा तेरा बाप) हैं, फॉरेन ट्रिप्स (जिंदगी न मिलेगी दोबारा) दिखाते हैं, उनकी जरूरतें जगाते हैं, अंग्रेजी टाइटल और उसी व्यवस्था वाली मानसिकता की बातें करते हैं। हम पंच-पंचायतों की बातें सिर्फ प्रियदर्शन की फिल्मों में ही देखते हैं। बाकी तो मुंबई या दूसरे महानगरों में ही जीते हैं। साउथ की फिल्मों में लुंगियां, धोतियां, पंचायतें, सरपंच, खेती सब दिखाते हैं पर बेहद अजीब नकली तरीके से। वह भी हिंदी सिनेमा या हॉलीवुड को कॉपी करने वाले अंदाज में ही सब करते हैं। बाला बनाते तो हैं पर हिंसक किस्म की अलग फिल्में।

हमने भी अपनी गरीबी छिपानी शुरू कर दी है, जैसे वेस्ट का मीडिया पहले छिपाया करता था। ‘अमेरिकन हार्ट’ इन लिहाजों से एक नायाब फिल्म है। ये अमेरिका के ऐसे वर्गों की प्रतिनिधि फिल्म है जो मीडियागत अपार्थाइड झेल रहे हैं, उन्हें जैसे हॉलीवुड फिल्मों से बैन कर दिया गया है। नजर आ भी जाते हैं तो ‘ब्रूस ऑलमाइटी’ में भीख मांगते भगवान के रूप में, भलमनसाहत का फैंसी संदेश दिलवाए जाते हुए। काश, किज्लोवस्की “अ शॉर्ट फिल्म अबाऊट पूवर्टी” भी बना जाते।
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गजेंद्र सिंह भाटी

Wednesday, December 26, 2012

निकोलस जरैकी की आर्बिट्राजः हिरना समझ-बूझ बन चरना

Richard Gere in a still from Nicholas Jarecki's 'Arbitrage.'

'लाल जूतों वाली लड़की', 'कुबड़ा', 'पानी में आग', 'दिल्ली के दरिंदे', 'नीला फूल', 'मैं उससे प्यार करता था', 'नन्हा राजू', 'सोफिया माई लव', 'घर-गृहस्थी', 'खूनी बाज़', 'परोपकारी शरमन', 'गैंग्स ऑफ लुधियाना', 'ग़रीबनवाज', 'डेंजर्स ऑफ पोएट्री', 'अल्वा ने बनाया गाजर का हलवा', 'वीर दुर्गादास राठौड़', 'चंचल चितवन', 'हो जाता है प्यार', 'मेरे सपनों की मल्लिका', 'आखिरी इम्तिहान', 'घबराना नहीं', 'इनडीसेंट वूमन', 'प्ले डे', 'ही विल किल यू' और 'बस गई अब बस करो'। फिल्म का नाम चाहे कोई भी हो, अलग छाप लगाता है। हर नाम, हर दर्शक के मानस रसायनों में अलग चित्रों को लिए घुलता है। जिसे अंग्रेजी ज्यादा न आती हो और ‘आर्बिट्राज’ देखने जाना हो तो वह इस शब्द के पहले अक्षर में आती ‘अ’ की ध्वनि में कुछ सकारात्मक महसूस करेगा या फिल्म कैसी होगी इसको लेकर न्यूट्रल उम्मीदें रखेगा। जो जरा ज्यादा जानता हो और कभी आर्बिट्ररी अदालतों के बारे में सुना हो तो कुछ पंच-पंचायती या बीच-बचाव का अंदाजा लगाएगा। फिर वो जो जानते हैं कि आर्बिट्राज का मतलब उस किस्म के बड़े कारोबारी मुनाफे से होता है जो एक जैसी परिसंपत्तियों या लेन-देन के बीच छोटे अंतर से उठाया गया होता है, हालांकि ये तरीका नैतिक नहीं होता। हम जब फिल्म देखते हैं तो इसके मुख्य किरदार रॉबर्ट मिलर (रिचर्ड गेयर) को जिंदगी के हर मोर्चे पर, चाहे वो कारोबार हो या रिश्ते, ऐसे ही आर्बिट्राज करते पाते हैं। उसकी आदर्श और सफल अमेरिकन बिजनेसमैन होने की विराट छवि के पीछे खोई हुई नैतिकता है, कारोबारी घपले हैं और रिश्तों में आई दरारें हैं। मगर निर्देशक निकोलस जरैकी अपनी इस कहानी में उसे आर्बिट्राज करने देते हैं। उसे इन गलत मुनाफों को कमाने देते हैं। उसे जीतने देते हैं। पर हर सौदा एक टूटन छोड़ जाता है। रॉबर्ट इंडिया और सकल विश्व में बनने वाली बिलियनेयर्स की सूची के हरेक नाम की कम-ज्यादा कहानी है। वो सभी जो आदर्श कारोबारी की छवि ओढ़े हैं, समाज में अपनी रसूख की कमान पूरे गर्व के साथ खींचे हैं और जिनकी कालिख कभी लोगों के सामने नहीं आ पाती, वो रॉबर्ट हैं। 2008 में वॉल स्ट्रीट भरभराकर ऐसे ही लोगों की वजह से गिरी, भारत में हाल ही में उभरे घोटालों में ऐसे ही कारोबारी हाथ शामिल रहे। सब कानून की पकड़ से दूर आर्बिट्राज कर रहे हैं।

कुरुक्षेत्र के युद्ध में धृतराष्ट्र को अधर्म (दुर्योधन) का साथ छोड़ने का उपदेश देते हुए महात्मा विदुर कहते हैं, “हरणं च परस्वानां परदाराभिमर्शनम्। सुह्रदश्च परित्यागस्त्रयो दोषाः क्षयावहाः”।। जिसका अर्थ होता है कि ‘महाराज, दूसरे का धन छीनना, परस्त्री से संबंध रखना और सच्चे मित्र को त्याग देना, ये तीनों ही भयंकर दोष हैं जो विनाशकारी हैं’। पर रॉबर्ट की बिजनेस वाली दुनिया में जो विनाशकारी है वही रिस्क टेकिंग है। जो भयंकर दोष है वही आर्बिट्राज है। और उसे ऐसे तमाम सौदे पूरे करने हैं। उसकी कहानी कुछ यूं है। वह न्यू यॉर्क का धनी हैज फंड कारोबारी है। समाज में उसकी इज्जत है, आइकॉनिक छवि है। घर पर भरा-पूरा परिवार है जो उसे बेहद प्यार करता है, उसके 60वें जन्मदिन की तैयारी करके बैठा है। वह घर लौटता है और नातियों को प्यार करता है। अपनी सुंदर योग्य बेटी (ब्रिट मारलिंग) और जमाई को थैंक यू कहता है। पत्नी एलन (सूजन सैरेंडन) को किस करता है। सब खाने की मेज पर बैठते हैं और हंसी-खुशी वाली बातें होती हैं। एक आम दर्शक या नागरिक अपने यहां के बिजनेसमैन को इतना ही जानता है। ये कहानी इसके बाद जिस रॉबर्ट से हमें मिलाती है वो अनदेखा है। रात को वह पत्नी को बेड पर सोता छोड़ तैयार हो निकल जाता है। वह जाता है जूली (लीएतितिया कास्टा) के पास। ये खूबसूरत जवान फ्रेंच आर्टिस्ट शादी के बाहर उस जैसे कारोबारियों और धनिकों की आवश्यकता है। घर पर बेटी-बीवी को तमाम अच्छे शब्दों और उपहारों से खुश करता है तो यहां जूली के न बिकने वाले आर्टवर्क को ऊंचे दामों पर लगातार खरीदता रहता है, ताकि उसे सहेज सके। यहां इनका प्रणय होता है। रॉबर्ट किसी देश में बहुत सारा रूपया लगा चुका है। मगर अब उस मुल्क में हालात कुछ और हैं और उसका पैसा डूब चुका है। वह इन 400 मिलियन डॉलर की भरपाई कंपनी के खातों में हेर-फेर करके करता है। इससे पहले कि निवेशक, उसकी बेटी या खरीदार कंपनी पर बकाया इस रकम के बारे में जाने वह अपने वेंचर कैपिटल कारोबार का विलय एक बड़े बैंक के साथ कर देना चाहता है। पर अंतिम आंकड़ों को लेकर बातचीत बार-बार पटरी से उतर रही है। यहां तक रॉबर्ट के पास करने को पर्याप्त कलाबाजियां हैं, पर भूचाल आना बाकी है। अब कुछ ऐसा होता है कि एक अपराध उससे अनजाने में हो जाता है और न्यू यॉर्क पुलिस का एक ईमानदार डिटेक्टिव माइकल ब्रायर (टिम रॉथ) उसके पीछे पड़ जाता है।

जरैकी अपने इस किरदार को जीतने देते हैं लेकिन बताते हैं कि ये जीत रिश्तों में बड़ी टूटन छोड़ जाती है। एक-एक रिश्ते में। पत्नी एलन वैसे तो पहले भी एक रईस कारोबारी की बीवी होने के साथ आई शर्तों से वाकिफ होती है और चुप होती है, पर जब बात आर-पार की आती है तो वह रॉबर्ट से अपनी बेटी के लिए पद और पर्याप्त पैसे मांगती है। वह मना कर देता है तो एलन कहती है, “पुलिस मुझसे बात करने की कोशिश कर रही है और मैं तुम्हारे लिए झूठ नहीं बोलने वाली”। कुछ रुककर वह फिर कहती है, “आखिर तुम्हें कितने रुपये चाहिए? क्या तुम कब्र में भी सबसे रईस आदमी होना चाहते हो?” ब्रूक पिता के कारोबार की सीएफओ है। अब तक वह खुद को पिता का उत्तराधिकारी समझती है पर जब खातों में हेर-फेर का पता चलता है और ये भी कि ये पिता ने ही किए हैं तो वह भाव विह्अल हो जाती है। रॉबर्ट उसे वजह बताता है पर वह सहज नहीं हो पाती। गुस्से में कहती है कि “आपने ये किया कैसे, आपके साथ मुझे भी जेल हो सकती है”। रॉबर्ट कहता है, “नहीं तुम्हें कुछ नहीं होगा”। वह कहती है, “मैं इस कंपनी में आपकी हिस्सेदार हूं, मैं भी दोषी पाई जाऊंगी”। तो वह कहता है, “नहीं, तुम मेरे साथ काम नहीं करती हो तुम मेरे नीचे काम करती हो”। बेटी का आत्मविश्वास और भ्रम यहां चूर-चूर हो जाता है। हालांकि रॉबर्ट एक पिता के तौर पर उसे बचाने के उद्देश्य से भी ये कहता है कि तुम मेरे साथ नहीं मेरे अंडर काम करती हो, पर ब्रूक को ठेस लगती है। फिल्म में आखिरी सीन में जब एक डिनर पार्टी में बड़ी घोषणा की जाती है और अपने पिता के बारे में ब्रूक भाषण पढ़ती है और उन्हें सम्मानित करते हुए स्टेज पर बुलाती है तो दोनों औपचारिक किस करते हैं और वहां ब्रूक के चेहरे पर नब्ज की तरह उभरता तनाव इन सभी घरेलू रिश्तों के अंत की तस्वीर होता है। रॉबर्ट रिश्ते हार जाता है।

फिल्म के प्रभावी किरदारों में टिम रॉथ हैं जो पहले ‘रिजरवॉयर डॉग्स’, ‘पल्प फिक्शन’ और ‘द इनक्रेडेबल हल्क’ में नजर आ चुके हैं। एक पिद्दी सी सैलरी पाने वाले डिटेक्टिव होते हुए वह अरबपति रॉबर्ट मिलर का पेशाब रोक देते हैं। जब ब्रायर बने वह रॉबर्ट के पास तफ्तीश के लिए जाते हैं तो पूछते हैं, “ये आपके माथे पर क्या हुआ”। रॉबर्ट कहता है, “कुछ नहीं, दवाइयों वाली अलमारी से टकरा गया”। तो उस अनजानेपन से वह जवाब देता है, जिसमें दोनों ही जानते हैं कि सच दोनों को पता है कि “हां, मेरे साथ भी जब ऐसे होता है तो बड़ा बुरा लगता है”। कहानी में इस अदने से जांच अधिकारी का न झुकना और सच को सामने लाने में जुटे रहना अच्छी बात है। ये और बात है कि रॉबर्ट उसे सफल नहीं होने देता। केस में एक जगह वह टिम और पुलिस विभाग को अदालती फटकार दिलवा देता है तो दर्शक खुश होते हैं जबकि असल अपराधी रॉबर्ट होता है। फिल्म में अच्छे-बुरे की पहचान और दर्शकों की सहानुभूति का गलत को चुनना परेशान करने वाला चलन रहा है और रहेगा।

जैसा कि हम बात कर चुके हैं रॉबर्ट आदर्श अमेरिकी कारोबारी की छवि रखता है। सेल्फ मेड है। हो सकता है अमेरिकी संदर्भों में उसके आर्बिट्राज सही भी हों। पर रिचर्ड गेयर अपने इस किरदार की पर्सनैलिटी की तहों में काफी ब्यौरा छोड़ जाते हैं। सेल्समेन और सेल्सगर्ल्स के इस युग में सभी को आर्थिक सफलता के लिए डेल कार्नेगी या उन जैसों की लिखी सैंकड़ों रेडीमेड व्यक्तित्व निर्माण की किताबें मुहैया हैं, जिनमें सबको चेहरे पर खुश करना सिखाया जाता है। “सर आपने आज क्या शर्ट पहनी है”... “कल तो जो आपने कहा न, कमाल था”... “आपने जो अपने आर्टिकल में लिखा वो मुझे... उसकी याद दिलाता है”। रॉबर्ट मिलर भी इन्हीं सूत्रों से सफल बना है। वो सूत्र जो ऊपर-ऊपर बिन्नैस और रिश्तों को सुपरहिट तरीके से कामयाब रखना सिखाते हैं, पर उतनी ही गहराई में जड़ें खोखली करते हैं। क्योंकि पर्सनैलिटी डिवेलपमेंट वाले इसका जवाब नहीं देते कि आखिर जब रॉबर्ट ने भी ये नियम सीखे थे तो क्यों बुरे वक्त में फैमिली ने उसका साथ न दिया? क्यों उसने रिश्तों में वफा नहीं बरती? क्यों उसमें सच को कहने की हिम्मत नहीं बची?

खैर, अगर अब उसके उद्योगपति लोक-व्यवहार को देखें तो वह जरा कम सहनशील हो चुका है। जैसे अपनी आलीशान महंगी कार में बैठकर वह फोन पर अपने अर्दली से कहता है, “बस पता लगाओ कि मेफिल ने हमें अभी तक फोन क्यों नहीं किया है?” तो वह जवाब देता है, “लेकिन मैं कैसे पता लगाऊं”। इस पर रॉबर्ट जरा भड़ककर कहता है, “अरे यार, क्या हर चीज मुझे खुद ही करनी पड़ेगी क्या, बस पता लगाओ। ...लगाओ यार, ...प्लीज। थैंक यू”। ये फटकार वाली लाइन आखिर में जो ‘प्लीज’ और ‘थैंक यू’ शब्द लिए होती है, ये चाशनी का काम करते हैं और लोक-व्यवहार की कला को कायम रखते हैं। जब बैंक के प्रतिनिधि से बात करने एक नियत जगह पर पहुंचता है तो मुश्किल हालातों में नहीं हो पा रहे विलय का गुस्सा उतारते हुए कहता है, “मैं ग्रेसी चौक का शहंशाह हूं (आई एम द ऑरेकल ऑफ ग्रेसी स्क्वेयर), मैं तुम्हारे पास नहीं गया था तुम मेरे पास आए थे...” पर जब सामने वाला कहता है, “रॉबर्ट मुझे लगता है हम बेकार बात कर रहे हैं (उसकी अरुचि दिखने लगती है, हो सकता है वह उठकर ही चला जाए)” तो तुरंत अपना रुख बदलते हुए रॉबर्ट कहता है, “अच्छा छोड़ो, छोड़ो, डील को भी भूल जाओ...”। यूं कहकर वह बात बदल देता है और बाद में उसी बिंदु पर घूमकर ज्यादा बेहतरी से आता है।

निकोलस जरैकी की ये पहली फीचर फिल्म है, इससे पहले वह टीवी सिरीज और डॉक्युमेंट्री फिल्मों व फीचर फिल्मों के तकनीकी पक्ष से जुड़े रहे हैं। वह मशहूर जरैकी परिवार से हैं। उनके माता-पिता दोनों न्यू यॉर्क में ही कमोडिटी ट्रेडर रहे हैं। आर्थिक जगत की कहानी का विचार उन्हें इसी पृष्ठभूमि से आया। उनके तीन भाई हैं। एक एंड्रयू जो फिल्म पोर्टल और वेबसाइट ‘मूवीफोन’ के सह-संस्थापक रहे हैं और जिन्होंने 2003 की मशहूर डॉक्युमेंट्री ‘कैप्चरिंग द फ्रीडमैन्स’ बनाई थी। दूसरे हैं थॉमस जो वित्त अधिकारी हैं। तीसरे हैं यूजीन जो खासतौर पर अपनी डॉक्युमेंट्री फिल्मों के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने ‘वाइ वी फाइट’, ‘फीक्रोनॉमिक्स’ और ‘द हाउस वी लिव इन’ जैसी कई चर्चित डॉक्युमेंट्री बनाई हैं।

प्रतिभाशाली निकोलस ने अपने बूते बिना बड़े हॉलीवुड स्टूडियो के सहयोग के आर्बिट्राज बनाई है। रिचर्ड गेयर और सूजन सैरेंडन समेत सभी अदाकारों के पास ये स्क्रिप्ट लेकर जाना उनके लिए किसी सपने से कम न था। वह गए, सबने स्क्रिप्ट पर भरोसा किया, उन्हें परखा और हां की। किसी भी लिहाज से अमेरिका की बाकी मुख्यधारा की फिल्मों से कम न नजर आने वाली ये फिल्म पूरी तरह चुस्त है और सबसे प्रभावी है इसकी निर्देशकीय प्रस्तुति। सभी वॉल स्ट्रीट फिल्मों के स्टीरियोटाइप्स से परे ये फिल्म देखने और समझने में जितनी आसान है, थ्रिल के पैमाने पर उतनी ही इक्कीस। अगर किसी युवा को महत्वाकांक्षी फिल्म बनानी हो और बजट का भय हो तो उसे आर्बिट्राज देखनी चाहिए जो उसे हौसला देगी और सिखाएगी कि कहानी और स्क्रिप्ट है तो सब कर लोगे। अमेरिकी फिल्मों के आने वाले चमकते चेहरों में निकोलस का नाम पक्का है। वह कसावट और अभिनव रंगों से भरी फिल्में बनाएंगे क्योंकि उनकी फिल्मी व्याकरण का आधार बहुत मजबूत है। बस जितने धाकड़ विषय, उतनी उम्दा फिल्में।
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गजेंद्र सिंह भाटी

Thursday, December 20, 2012

100 करोड़ की कमाई बकवास बात हैः अभिषेक कपूर

‘रॉक ऑन’ के पांच साल बाद अपनी फिल्म ‘काई पो चे’ लेकर आ रहे निर्देशक अभिषेक कपूर से बातचीत। अगले साल फरवरी में रिलीज होने वाली इस फिल्म में राज कुमार यादव, सुशांत राजपूत, अमित साध और अमृता पुरी जैसे चेहरे नजर आएंगे।

Raj Kumar Yadav, Sushant Rajput and Amit sadh seen in movie's official poster

अभिषेक कपूर से मैं पहली बार सितंबर, 2010 में मिला था। ‘फीयर फैक्टर: खतरों के खिलाड़ी-3’ में वह प्रतिभागी थे। कार्यक्रम के बारे में बात करने वह अपने सह-प्रतिभागी शब्बीर अहलुवालिया के साथ चंडीगढ़, हमारे दफ्तर पहुंचे थे। मुख्यतः उस कार्यक्रम से जुड़े सवाल पूछते हुए मेरे मन में चल रहा था, कि ये वही है जिसने ‘रॉक ऑन’ का निर्देशन किया था? क्या हो गया है इसे? क्यों किसी टीवी कार्यक्रम के करतबों में खुद को जाया कर रहा है? पर वह जिंदगी को लेकर ज्यादा शिकायती नहीं लगे, तो ज्यादा नहीं टटोला। ऐसा नहीं था कि निर्देशन ही उनका इलाका रहा था। अभिनय से उनका गहरा नाता पहले था। 1995 में आई फिल्म ‘आशिक मस्ताने’ की छोटी सी भूमिका को छोड़ दें तो दो हिंदी फिल्मों में बतौर हीरो वह दिख चुके थे। पहली थी ‘उफ ये मोहब्बत’, जिसमें वह ट्विंकल खन्ना के लिए बौद्ध मठों में “उतरा न दिल में कोई इस दिलरुबा के बाद...” गाना गाते हुए एक टिपिकल हिंदी फिल्म हीरो वाले स्टेप्स करते आज भी याद आते हैं। दूसरी थी 2000 में आई ‘शिकार’। दोनों ही फिल्में नहीं चलीं और एक उगते अभिनेता का सूरज ढल गया। 2004 तक आते-आते उन्होंने यश चोपड़ा की फिल्म ‘वीर-जारा’ का स्क्रीनप्ले लिखा। इसके दो साल बाद बॉक्सिंग की कहानी को लेकर सोहेल खान के साथ ‘आर्यन’ बनाई। वह अब निर्देशक बन गए थे। पर संघर्ष जारी रहा। फिल्म नहीं चली। दो साल बाद बतौर निर्देशक उनकी दूसरी फिल्म ‘रॉक ऑन’ लगी। यहां से उनके लिए दुनिया बिल्कुल बदल गई थी। इस फिल्म ने लोगों के दिल में खास जगह बनाई, फरहान अख्तर को बतौर अभिनेता पहला मंच देते हुए स्थापित भी किया, अर्जुन रामपाल को उनके मॉडल वाले पट्टे से मुक्ति देते हुए ‘जो मेस्केरेनहैस’ जैसा यादगार किरदार दिया और अगले साल दो राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीते। उनसे अब दूसरी बार बातें हो रही थीं। वजह थी ‘काई पो चे’। चेतन भगत के अंग्रेजी उपन्यास ‘3 मिसटेक्स ऑफ माई लाइफ’ की कहानी पर बनाई गई ये फिल्म 22 फरवरी, 2013 को भारत और बाहर लगनी प्रस्तावित है।
 
तो इस बार उन्हें देख रहा था बदले स्वरूप में। गालों पर घनी काली दाढ़ी छा चुकी थी। बीच-बीच में कुछ सफेद बाल निकल आए थे। आंखों पर जॉन लूक गोदार जैसे ऑटरों के माफिक काला चश्मा लगा था। बातों में निर्देशकों वाली खनक ज्यादा थी। समझदारी थी। इस अवतरण के इतर वह ट्विटर पर जॉन लेनिन, जी. बी. शॉ और विलियम ब्लेक को उद्धरित करने लगे थे। उनके निर्देशक दिमाग को जरा और समझने की इच्छा हो तो कुछ वक्त ट्विटर पर ही हो आ सकते हैं। यहां वह ज्यादातर दर्शन की बात करते हुए लिखते हैं... “रचनात्मकता तब जिंदा हो उठती है जब हम अपने आराम के दायरे से बाहर निकलते हैं. जब हम डर के भ्रम को तोड़ डालते हैं. प्रदीप्ति बस उसी के बाद है. जादुई!” और... “ये जो दो गहरी सांसों के बीच हम आराम पाते हैं न, कई बार पूरे दिन में बस वही एक सबसे जरूरी चीज होती है.” सपट भावों को बिना छाने, आने देने की प्रवृति भी कभी उनमें नजर आती है। मसलन... “आहहहह!! मैंने अपना बटुआ खो दिया.. लग रहा है कि मैं एक मूर्ख हूं... मुझे वो वापस चाहिए.. हे विश्व क्या तुम सुन रहे हो!” या “एयरपोर्ट पर आज मेरा सबसे बुरा अनुभव रहा.. थाई एयरवेज तुम्हारी ऐसी की तैसी...” सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर भी वह भावुक और समझदार टिप्पणी करते हैं। इसमें इजरायल-फिलीस्तीन हिंसा है तो कसाब की फांसी भी। “इजरायली और फिलीस्तीनी जो एक-दूसरे के साथ कर रहे हैं उसे देख दिल टूटा जाता है। हालात बेहद नाजुक लग रहे हैं। दुआ है कि अक्लमंदी बरपे”। और  “कसाब को लटकाने को लेकर लोगों की खुशी को मैं समझ नहीं पा रहा हूं। इससे न तो हो चुके नुकसान की भरपाई हो पाएगी, न ही अपने पड़ोसी मुल्क के साथ अपनी मुश्किलों को दूर करने में हमें मदद मिलेगी”। उनकी निजी जिंदगी, बीते अफेयर और एकता कपूर के ममेरे भाई होने के पेशेवर फायदों वाले सवालों से ज्यादा रुचिकर है एक निर्देशक वाले मन में झांकना। क्योंकि इससे ज्यादा बेहतरी से पता चलता है कि ‘काई पो चे’ बनाने वाला व्यक्तित्व भावुक, तार्किक, शैक्षणिक और बौद्धिक तौर पर कैसा है, और वही जानना जरूरी भी है।
Abhishek Kapoor, In conversation.

तो, काई पो चे! सबसे पहली तो अनूठा नाम रखने की बात और इस तीन शब्दों वाले नाम के मायने। अभिषेक बताने लगते हैं, “जब पतंग कटती है तो गुजरात में काटने वाला चिल्लाता है काई पो चे। यानि कि वो काटा। इस नाम में मुझे जिस किस्म की ऊर्जा महसूस हुई, किसी दूसरे नाम में नहीं हो सकती थी। ऊर्जा भरा नाम इसलिए भी जरूरी था क्योंकि युवा मन और यूथ की फिल्म है। कहानी के केंद्र में ढेर सारी एनर्जी है। फिल्म की पृष्ठभूमि गुजरात है तो ये नाम सटीक बैठता है। एक अहम निहित अर्थ ये भी है कि फिल्म की थीम में जैसे तीन यारों की दोस्ती एक बिंदु पर टूटती है, वैसे ही है पतंगों का कटना। दोनों ही बातों में एक किस्म का सांकेतिक जुड़ाव है”। पहले ऐसा भी बताया जा रहा था कि फिल्म चेतन के ही अंग्रेजी उपन्यास ‘टू स्टेट्स’ पर बन रही है, मगर ऐसा नहीं हुआ। इस बारे में अभिषेक बताते हैं कि उन्हें ‘टू स्टेट्स’ और ‘3 मिसटेक्स...’ में से कोई एक कहानी चुननी थी। ऐसे में उन्होंने दूसरे उपन्यास की कहानी इसलिए चुनी क्योंकि बतौर फिल्मकार दूसरी कहानी में बदलाव करने की गुंजाइश ज्यादा थी। इसमें लव स्टोरी भी थी, भूकंप भी, पॉलिटिक्स भी और दोस्ती भी। और जाहिर है उन्हें दोस्ती ने सबसे ज्यादा प्रभावित किया, तो फिल्म की मुख्य थीम दोस्ती हो गई। जब ये तय हो गया तो लिखने की बारी आई। हालांकि ‘रॉक ऑन’ सफल रही थी पर उसके पहले उनकी राह में काफी संघर्ष रहा, ये वह यहां स्वीकारते हैं। जब ‘काई पो चे’ को लेकर बाकी योजनाएं बन गई तो उन्होंने 8-10 महीने की छुट्टी ली और फिल्मी प्रारुप में इस कहानी को लिखा। वह कहते हैं, “जब आप किताब या उपन्यास को एडेप्ट करते हो फिल्मी स्क्रीनप्ले में, तो बहुत टाइम लगता है। खुद को दीन-दुनिया से पूरी तरह काटना पड़ता है”।

ये कहानी तीन अमदावादी (अहमदाबादी) लड़कों और नई सदी के नए भारत में उनके सपनों, आकांक्षाओं, टूटन और मिलन की है। मगर तीनों ही किरदारों में अभिषेक ने नए चेहरों को चुना। ईशान, ओमी और गोविंद के ये किरदार निभाए हैं टीवी के ज्ञात चेहरे सुशांत सिंह राजपूत, बिग बॉस में नीरू बाजवा (अब स्थापित पंजाबी हिरोइन) की तस्वीर लिए फफकते रहने वाले अमित साध और इन दिनों बहुत ही तेजी से शानदार फिल्मों में नजर आ रहे राज कुमार यादव (लव सेक्स और धोखा, रागिनी एमएमएस, गैंग्स ऑफ वासेपुर-2, शैतान, चिटगॉन्ग, तलाश, काई पो चे और इनके इतर एक बहुत ही महत्वपूर्ण फिल्म, शाहिद) ने। किसी स्थापित अभिनेता को नहीं लेने की इस बात पर अभिषेक बोले, “ऐसा नहीं है कि मैंने बड़े स्टार्स को इन भूमिकाओं में लेने के बारे में सोचा नहीं था। मैंने सोचा था। मगर जब आप तीन लड़कों की कहानी कह रहे हो और बात एक खास उम्र समूह की कर रहे हो तो फिर उम्रदराज अभिनेता लेने संभव न थे। और फिर मेरे प्रॉड्यूसर्स ने भी इस मामले में पूरी आजादी दी कि मन की कास्टिंग कर सकूं। इस दौरान मैंने कई एक्टर देखे। फिल्म शुरू होने से पहले मैंने डेढ़ साल कास्टिंग करने की चाह में बिता दिए। भई नॉवेल था तो अलग कास्ट होनी भी तो बहुत जरूरी थी। तभी मैंने इन लड़कों को देखा। जब टीवी पर ये नजर आए तो मुझे वही एनर्जी नजर आई जो मेरी फिल्म के किरदारों में होनी थी”।

इस दौरान वह उस सवाल को खारिज कर देते हैं जो फिल्म की रिलीज से पहले बहुत ओर से पूछे जा रहे हैं। कि भला टीवी वाले एक्टर एक बड़ी हिंदी फिल्म में गहन-गंभीर एक्टिंग कैसे दे पाएंगे? अभिषेक कहते हैं कि टीवी वालों की एक्टिंग को किसी अलग श्रेणी में बांटना बकवास बात है। टेलिविजन पर बहुत सारे लोग काम कर रहे हैं, सभी टेलेंटेड हैं और काम को लेकर बेहद ईमानदार हैं। वह उस 100 करोड़ क्लब वाली फिल्मों के सवाल पर भी नाखुश नजर आते हैं। ये राहत की बात है कि इस आंकड़े के पागलपन के बीच बतौर निर्देशक उनका ये जवाब स्पीडब्रैकर का काम करता है। वह बोलते हैं, “100 करोड़ रुपये की कमाई करने का दबाव मुझे बकवास बात लगती है। मुझे समझ नहीं आता कि ये 100 करोड़-100 करोड़ है क्या? क्यों है? हर तरह की फिल्म होती है और फिल्म अपनी कमाई से बेहतर नहीं होती है। कुछ फिल्मों ने कमाई कर ली तो आखिर बाकियों को भी उसमें छलांग लगाने के लिए क्यों कहा जा रहा है?” बात जब एक और स्टीरियोटिपिकल या सांचे में ढले सतही सवाल (आइटम नंबर) पर आती है तो वह शांत होकर कहते हैं, “जबर्दस्ती का लफड़ा फिल्म पर भारी पड़ सकता है। और फिर ऐसी चीजें सेंसिबल फिल्मों के कथानक को बहुत ज्यादा बाधित करती हैं। हमारी फिल्म एक संजीदा कोशिश है और उसमें कोई ऐसा खतरा हम नहीं उठा सकते थे। हालांकि फिल्म में गाने जरूर होंगे। पर अलग तरीके से और अलग संदर्भों में होंगे”। फिल्म में संगीत अमित त्रिवेदी का है। अभिषेक गुजराती किरदारों के टीवी और फिल्मों में इन दिनों किए जाने वाले स्टीरियोटिपिकल चित्रण से जुड़ी चिंता पर आश्वस्त करते हैं। कहते हैं, “गुजराती लोगों का जैसा घिसा हुआ चित्रण किया जाता है, मैं आपको पूरी तरह भरोसा दिलाता हूं कि इस फिल्म में कतई नहीं होगा”।

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गजेंद्र सिंह भाटी