Friday, September 21, 2012

आर्थिक नस्लभेद पर आज चाहिए कई ‘अ ड्राई वाइट सीजन’

अ ड्राई वाइट सीजन (1989) निर्देशकः यूजैन पाल्सी कास्टः डोनल्ड सदरलैंड, मर्लन ब्रैंडो, जेक्स मोकाइ, जैनेट सूजमैन, जुरजेन प्रॉचनाओ, सुजैना हार्कर, सूजन सैरेनडन दक्षिण अफ्रीकी उपन्यासकार आंद्रे फिलिपस ब्रिंक के 1979 में लिखे नॉवेल ‘अ ड्राई वाइट सीजन’ पर आधारित
Characters of Gordon Ngubene and his son, Ben (Right) and his son Johan.

दक्षिण अफ्रीका में अपार्थाइड या नस्लभेद के दौरान की अच्छी गाथा। स्कूल में सम्मानित टीचर, साउथ अफ्रीका में रहने वाले और अफ्रीका को रहने लायक बनाने वाला होने का दावा करते समाज के ही गोरे सदस्य हैं बेन दु त्वा (डोनल्ड सदरलैंड)। समाज में नस्लभेद का खूनी दौर है। काले लोग उठाकर मारे जा रहे हैं, सीधा विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं तो कुचले जा रहे हैं।

बेन की बीवी और बेटी सब खिलाफ हैं कालों के। उसके अश्वेत माली के बेटे को पहले पीटा जाता है, फिर मार दिया जाता है, फिर माली को गिरफ्तार किया जाता है, उसे भी पैशाचिक पीड़ाएं देने के बाद मार दिया जाता है, बाद में कहा जाता है कि उसने आत्महत्या कर ली... तो इन सब से बेन का दिल बदल जाता है। उसे इस वक्त लगने लगता है कि ये वो अफ्रीका तो है ही नहीं जिसमें वह इतने साल से रहता है या उसे रहने लायक मानता है। अपने माली की मौत के जिम्मेदार पुलिसवालों के खिलाफ वह केस दायर करता। वह बड़े मानवाधिकारवादी वकील इयान मैकिंजी (मर्लन ब्रैंडो) के पास जाता है जो जानता है कि नस्लभेद की हकीकत क्या है और कचहरियों की हकीकत क्या है। खैर, वह बेन की तसल्ली के लिए केस लड़ता है। अपने रोल के प्रति मर्लन का रवैया अद्भुत है। एक औसत वकील के सारे पैमानों और सांचों के बिल्कुल उलट। ऐसा यूनीक वकील फिल्मों में बहुत कम हुआ है जो इतने खूनी और हत्यारे माहौल वाले तथ्यों की बात करते हुए बर्फ जितना शांत है। कुर्सी पर विपरीत दिशा में मुंह करके बैठे होने पर भी गवाह से वह कैसे बात करता है, कैसे जज को संबोधित करता है बिना उनकी ओर देखे, कैसे अपना शांतचित्त बनाकर रखता है। ये सब विशेष है। फिल्मों से सन्यास ले चुके ब्रैंडो फिल्म की सार्थकता देखकर ही ये रोल निभाने को लौटे थे।

Brando with director Palsy.
डोनल्ड सदरलैंड फिल्म को पूरा संभालते हैं। डायरेक्टर यूजैन पाल्सी खुद अश्वेत हैं और वह अपनी जिंदगी में सिर्फ ये एक ही फिल्म बनाने के लिए जानी जाती हैं, अगर मैं गलत नहीं हूं तो। उनका जन्म ही ये कहानी कहने के लिए हुआ था। डोनल्ड के किरदार बेन दु त्वा में हिंसा की भावना नहीं है, बस एक बार वह पिस्टल तान देता है डर के मारे अपनी सुरक्षा के लिए, अन्यथा पूरी फिल्म में शांत रहता है। बीवी सूजन (जैनेट सुजमैन) के तानों के आगे भी, बेटी सुजेत (सुजैना हार्कर) के अपशब्दों के आगे भी, अपने गोरे समाज के रवैये के प्रति भी। हां, एक मौके पर वह अपने स्कूल के प्रिंसिपल को थप्पड़ जड़ देता है जब वह उसे और उसके बेटे को देशद्रोही कहता है। नस्लभेद पर बनी चंद खूबसूरत फिल्मों में से एक ये भी है। कहानी में इतनी संतुलित कि मिसाल। नस्लभेद जैसे मुद्दों पर किस विषय को फिल्म में कैसे ढालना है, दो घंटे की स्क्रिप्ट मं कहां से क्या उठाना है, क्या साबित करना है, वगैरह सब कवर होता है। ज्यादा ध्यान कहानी कहने पर रहता है और उसी साधारणता की वजह से फिल्म पचने लायक बनती है।

बेन का बेटा जोहान (रोवेन एल्म्स) भी आकर्षक लगता है। छोटा है पर अपने पिता पर उसे गर्व है। साम्यवाद, श्वेत, अश्वेत की डिबेट में वह समझता है कि सही क्या है। जैसे उसका पिता बार-बार उन लोगों को ये कहता है कि मैं सच के साथ हूं, जो भी उसे पूछते हैं कि तुम हमारे साथ हो कि उनके। वैसे ही बेटा समझता है कि उसके पिता कुछ बहुत अच्छा कर रहे हैं, जिसमें उसकी मां और बहन तक पिता का साथ नहीं दे रहीं। उसे सही का पता इतने में ही चल जाता है कि फिल्म के शुरुआती चार मिनट के क्रेडिट्स वाले सीन में वह जिस अश्वेत लड़के के साथ खेल रहा होता है वो मारा जाता है और अंत तक केस का आधार वही रहता है। फिल्म का सूत्रवाक्य ही जैसे ये है। कि अगर बेन फिल्म के आखिर में मारा भी जाए तो अपने बेटे में उसने पर्याप्त संस्कार डालें हैं कि वह उनकी विरासत को कायम रखेगा और अश्वेत भाइयों की ओर से लड़ना जारी रखेगा। ये जाहिर भी इस बात से हो जाता है जब बेन अपनी बेटी की चालाकी को समझकर उसे नकली कागज देकर भेजता है सहेजने के लिए और जब वह उन्हें लेकर सीधे पुलिसवाले के पास पहुंच जाती है, तब डोनल्ड का बेटा अपनी साइकिल पर असली डॉक्युमेंट अखबार के दफ्तर में पहुंचा रहा होता है। वह नस्लभेद के खिलाफ इस बड़ी लड़ाई और शानदार योगदान में बड़ा भागीदार होता है, इतनी कम उम्र में।

A French Poster of the movie.
ये फिल्म जरूर देखें। आज भी समाज कुछ वैसा ही है, जहां अगर कोई कुछ कड़वी सच्ची बड़ी बात बोलना चाहता है तो उसे बोलने नहीं दिया जाता। सब साथ मिल चुके हैं। कोई सवाल ही पैदा नहीं होता कि हकीकत सामने आ भी पाएगी। आप नहीं ला सकते। अरविंद रो-रोकर मर जाएंगे, हजारे आंदोलन में जान दे देंगे तो भी राजनेताओं और कॉरपोरेट्स की भ्रष्ट नीतियां कभी लोगों के सामने नहीं आ पाएंगी। संभवत, अगले 100 साल हमारा खून जब चूस लिया जाएगा तब कहीं कोई जूलियन पैदा होगा और वो कहीं से कागज निकाल-निकालकर सबकी करनी उघाड़ेगा और दुनिया सच जानेगी। ‘अ ड्राई वाइट सीजन’ कुछ ऐसा सोशल रियलिस्ट ड्रामा है जैसी 1969 में आई कोस्टा गेवरास की राजनीतिक रहस्य रोमांच कथा ‘जेड’ थी, जिस पर दिबाकर ने हाल ही में ‘शंघाई’ बनाई। हो सकता है कोई ‘अ ड्राई वाइट सीजन’ से प्रेरणा लेकर हिंदुस्तानी समाज के भीतर विद्यमान भेदभाव कथा कहे तो लोग संदर्भ के लिए यूजैन पाल्सी की फिल्म पर लौटकर जाएं।
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गजेंद्र सिंह भाटी

Saturday, September 15, 2012

जोकर बनाने की विडंबना और पागलपन की परिभाषा

शिरीष कुंदर की  फिल्म ‘जोकर’ पर कुछ लंबित शब्द

एक नई चीज, उदित नारायण ने बहुत दिन बाद गाना गाया है... “जुगनू बनके तू जगमगा जहां...” हालांकि ये उनके ‘बॉर्डर’, ‘लगान’ और ‘1942 अ लव स्टोरी’ के मधुर स्वरों से बहुत बिखरा और बहुत पीछे है। ऐसा गाना है जिसे सुनने का दिल न करे। बोल ऐसे हैं कि कोई मतलब प्रकट नहीं होता। लिखे हैं शिरीष कुंदर ने। निर्देशन, सह-निर्माण, संपादन, लेखन और बैकग्राउंड म्यूजिक (और भी न जाने क्या-क्या) सब उन्हीं ने किया है। या तो उन्हें दूसरे लोगों की काबिलियत पर यकीन नहीं है या फिर ऑटर बनने की रेस में वह फ्रांसुआ त्रफो और ज्यां लूक गोदार से काफी आगे निकल चुके हैं। खैर, नो हार्ड फीलिंग्स। उनके ट्वीट बड़े रोचक होते हैं। सामाजिक, सार्थक, हंसीले, तंजभरे, टेढ़े, स्पष्ट, बेबाक, ईमानदार और लापरवाह। लेकिन फिलहाल हम बात कर रहे हैं ‘जोकर’ की...

महीनों पहले आई न्यू यॉर्क टाइम्स की 2012 में प्रदर्शित होने वाली बहुप्रतीक्षित फिल्मों की सूची में एक हिंदी फिल्म भी थी। ‘जोकर’। बहुप्रतीक्षा थी कि जबरदस्त पटकथा वाली ये एक आश्चर्य में डाल देने वाली साई-फाई (साइंस फिक्शन) होगी। जब तक फिल्म का पहला पोस्टर बाहर न आया था, सभी को यही लग रहा था। मगर एक फिल्मी किसान वाले अच्छे से धोए-इस्त्री किए परिवेश में जब अक्षय कुमार पहली बार पोस्टर में नजर आए तो व्यक्तिगत तौर पर अंदाजा हो गया था कि ‘सॉरी वो इसे नहीं बचा सके’। हुआ वही, ‘मृत्यु’। इसे नहीं बचाया जा सका। क्यों नहीं बचाया जा सका? इस पर आगे बढ़ने से पहले शिरीष कुंदर की ‘जोकर’ की सबसे अच्छी तीन बातें:-

  • पागलों के गांव से अगस्त्य के अमेरिका तक पहुंचने का विचार कुछ वैसा ही है जैसे गांवों में अभावों या देश के किसी भी अविकसित इलाके से निकले हर पीढ़ी के युवा का पढ़ाई-लिखाई करके लायकी तक पहुंचने का होता है। ये सांकेतिक है। ऐसा सोचा जा सकता है। हो सकता है पटकथा लिखते हुए फिल्मकार ने ये बड़ी शिद्दत से सोचा है, हो सकता है उसने बिल्कुल भी नहीं सोचा है। पर फिल्म में ये (अपरिवक्वता से फिल्माई) अच्छी बात है।
  • अमेरिका से आए हैं तो कोई प्रोजेक्ट लगाने के लिए ही आए होंगे? पानी... अच्छा मिनरल वॉटर प्लांट? कोई भी एनआरआई भारत आता है और किसी सरकारी नुमाइंदे या राजनेता से मिलता है तो उनकी यही धारणा उसके बारे में होती है। मसलन, सुभाष कपूर के निर्देशन में बनी फिल्म ‘फंस गए रे ओबामा’ में दिवालिया हो चुके रजत कपूर के किरदार का भारत आना और वहां उन्हें डॉलरपति समझकर अगुवा कर लिया जाना। ये धारणा और हकीकत (अपरिवक्वता से फिल्माई) दिखाई जानी अच्छी है।
  • जब पगलापुर में बिजली आने की घोषणा कर दी जाती है और वहां दूर-दूर से आए लोगों का मेला जुटना शुरू होता है तो एक गाना आता है। उसमें फ्रिज बेचने वाली दुकानों और बाजारवाद की आंशिक आलोचना की गई लगती है, जो सार्थक है।

...पर अंततः ये सब बिखरा है।

फिल्म शुरू होती है कैलिफोर्निया से। अगस्त्य (अक्षय कुमार) यहां एक वैज्ञानिक है। परधरती पर जीवन की खोज कर रहा है। एलियंस से संपर्क करने की मशीन बना रहा है। यहां राकेश रोशन और ‘कोई मिल गया’ की याद आती है, जब अगस्त्य कहता है, “या तो बाहर कोई दुनिया नहीं है, या मेरे पास वो मशीन नहीं है जिससे एलियंस से संपर्क हो सके”। खैर, हम नए संदर्भ तो पाल ही नहीं सकते। ले दे के दो-तीन तो हैं। बहरहाल, जो रिसर्च के लिए अगस्त्य को पैसा दे रहे हैं उन्हें नतीजे चाहिए। इस प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए उसके पास एक महीना है। थका-हारा ये एनआरआई घर पहुंचता है। घर पर उसकी गर्लफ्रेंड-कम-वाइफ दीवा (सोनाक्षी सिन्हा) इंतजार कर रही होती है। इस खबर के साथ कि इंडिया से अगस्त्य के भाई का फोन आया था कि उसके पिता की तबीयत बहुत खराब है, फौरन चले आओ। दोनों भारत निकलते हैं। अलग-अलग परिवहन से पगलापुर पहुंचते हैं। जगह जो भारत के नक्शे पर नहीं है। कहा जाता है कि इसी वजह से यहां कोई भी आधारभूत ढांचा नहीं है। इसे पागलों का गांव बताया जाता है। यहां आते-आते मुझे आशंका होने लगती है कि पगलापुर नाम से शुरू की गई ये कॉमेडी उनके साले साहब साजिद खान की फिल्मों (हे बेबी, हाउसफुल, हाउसफुल-2) की कॉमेडी की दिशा में ही जा रही है। एनिमेटेड चैपलिन सी, गिरते-पड़ते किरदारों वाली, अजीब शाब्दिक मसखरी वाली और ऊल-जुलूल।

अगस्त्य और दीवा पैदल गांव में प्रवेश कर रहे हैं कि उन्हें छोटा भाई बब्बन (श्रेयस तलपडे) दिखता है। वह कालिदास की तरह जिस डाल पर बैठा होता है, उसे ही काट रहा होता है। बाद में दिखता है कि वही नहीं बहुत से दूसरे गांव वाले भी ऐसा ही कर रहे हैं और बाद में सभी डाल कटने पर नीचे गिर जाते हैं। ठीक है, ऐसा हो सकता है, हम हंस भी सकते हैं, पर फिर पूरे संवाद, घटनाक्रम, कहानी में उसी किस्म का सेंस बनना चाहिए। जो नहीं बनता। श्रेयस के किरदार की भाषा जेम्स कैमरून की फिल्म ‘अवतार’ के नावी की तरह बनाने की कोशिश की गई है। पर श्रेयस बार-बार कुल तीन-चार शब्दों को ही बोल-बोलकर हंसाना चाहते हैं और ऐसा हो नहीं पता।

आगे बढ़ने पर खुले में बच्चों को पढ़ा रहे मास्टरजी (असरानी) दिखते हैं। वह बच्चों को अंग्रेजी पढ़ा रहे होते हैं। बच्चों को कहते हैं, “जोर से बोलो”, तो बच्चे बोलते हैं, “जय माता दी”, इस पर मास्टरजी कहते हैं “अरे पहाड़ा जोर से बोलो”। इतनी बार सार्वजनिक दायरे में इस चुटकुले को सुना-सुनाया जा चुका होगा पर फिल्म में इस्तेमाल कर लिया जाता है। असरानी का ये किरदार अंग्रेजी की टांग मरोड़कर बोलता है। जब वह कहते हैं “हेयर हेयर रिमेन्स”... तो उसका मतलब होता है ‘बाल-बाल बचे’। इसी पाठशाला से पढ़कर साइंटिस्ट बना है सत्तू (अगस्त्य का गांव का नाम)।

मास्टरजी के दो अंग्रेजी के जुमले भी पढ़ते चलें...
“हाइडिंग रोड़” (ये छुपा हुआ रास्ता है)
“डोन्ड फ्लाइ आवर जोक्स” (तुम हमारा मजाक उड़ा रहे हो)

हिंदी फिल्मों में अंग्रेजी न बोल पाकर किरदारों ने बहुत से अंग्रेजों को हंसाया है। इनमें सबसे कामयाब मानें तो हाल में संजय मिश्रा के किरदार रहे हैं। वह ‘गोलमाल-3’ जैसी फिल्मों में जिस अंग्रेजी शब्द का इस्तेमाल करते हैं उसकी स्पेलिंग गलत बोलते हैं और लोग हंसते हैं। ऐसा उनका किरदार अनवरत एक समान करता है, कहीं भी बिना किसी भटकाव के। पर मास्टरजी तो एक टूटती कलम से लिखे गए किरदार हैं, ये शुरू के दो मौकों पर हंसा देते हैं तो पटकथाकार आगे फर्जीवाड़ा करके निकल जाता है।

पगलापुर के किरदारों के परिचय के मौके पर लोग हंसते हैं। मुझे लगता है, लोग पागल शब्द से जोड़कर देखते हैं हर घटना, किस्से और आदमी को। फिल्म के किरदारों की हरकतों पर लोग ज्यादा हंसते हैं क्योंकि कहीं न कहीं उनके दिमाग की परतों में सिनेमा के पागल किरदारों और उनपर हंसने की प्रवृत्ति हावी है। यहां जब कह दिया जाता है कि ये पगलापुर के लोग हैं और इनका खौफ इतना है कि एक बार एक अंग्रेज अधिकारी जो भारत के नक्शे पर गावों और कस्बों को दर्ज कर रहा होता है, उन्हें आता देख गांव के बाहर से ही अपनी गाड़ी मुड़वा लेता है। पर असल मायनों में ‘पागल’, ‘ग्रामीण’, ‘हंसोड़’ और ‘भोले’... इन चार शब्दों में शिरीष ने कोई फर्क नहीं किया है। कहीं पर जो ग्रामीण भर है वो पागल लगता है, कहीं पर जो पागल है वो महज ग्रामीण लगता है। कहीं वो बस भोले लगते हैं पागल नहीं, कहीं वो बस हंसा देना चाहते हैं कमतर नहीं होना चाहते। पर यहीं किरदारों-शब्दों का निरूपण न करने की बेपरवाह प्रवृत्ति नाखुश करती है और फिल्म को मृत्यु की ओर ले जाती है।

कहानी आगे बढ़ाते हैं। पिता के पास पहुंचने पर अगस्त्य को पता चलता है कि वह तो बिल्कुल ठीक हैं (हालांकि यहां तक उन्हें पागल बताया जाता है)। जब नाराज होकर वह निकलने लगता है तो पिता (दर्शन जरीवाला) रोकते हैं और समझाते हैं कि इतने साल से उनका गांव नक्शे पर नहीं है, कोई सरकारी मदद और विकास उन तक नहीं पहुंचता, चूंकि तुम पढ़-लिखकर आगे बढ़े हो तो गांव के अपने भाइयों को भी इस दलदल से निकालो (दलदल, जिसे सभी काफी एंजॉय करते प्रतीत होते हैं)। ये सुनकर अगस्त्य रुक जाता है। यहां तक ‘सबकुछ ठीक है’, ‘अच्छा है’, ‘बहुत बुरा है’, ‘ऐसा क्यों’, ‘अरे यार’, ‘अरे शिरीष’, ‘धत्त’, ‘स्टूपिड’... ये विचार मन में चल रहे होते हैं। फिल्म खत्म होने तक सभी नैराश्य में तब्दील हो जाते हैं।

जानते हैं कुछ जिज्ञासाएं और बिंदुपरक बातें जो शिरीष की इस कोशिश को सम्मान नहीं दिला पातीं:-

  • यहां सब पागल हैं फिर भी इनकी बातों को सीरियसली लेकर अगस्त्य गांव क्यों चला आता है? और फिर बब्बन तो बोल भी नहीं सकता, फिर अगस्त्य का कौनसा भाई कैलिफोर्निया दीवा से फोन पर बात करता है? चलो बात किसी ने भी की हो, पर अगस्त्य को तो पता है न कि उसका भाई आम भाषा में बोल नहीं सकता। इतना सब न सोचने और गांव चले आने पर अक्षय के किरदार का नाराज होना।
  • एक तरफ हमें यकीन दिलाया जा रहा है कि ये पागलों का गांव है। इसका नाम तक किसी ने नहीं सुना और यहां कोई आता नहीं है। फिर अक्षय-सोनाक्षी के किरदार जिस दिन पहुंचते हैं, उस रात पगलापुर में शानदार आलीशान ग्लैमरस आइटम सॉन्ग का आयोजन किया जाता है। यहां बिजली नहीं है, पानी नहीं है, आधारभूत ढांचा नहीं है पर आइटम सॉन्ग के लिए दुरुस्त लड़कियां-सेट और रोशनी आ जाती है। यहां पढ़ने के लिए रोशनी नहीं है पर इस गाने के सेट को देखिए जो चित्रांगदा सिंह से ज्यादा दमक रहा होता है। कहते हैं यहां पढ़ाई ही नहीं है, पर गाने के लिरिक्स देखिए। पीछे खड़े सैंकड़ों डांसर देखिए। अगर ये गांव के ही हैं तो पागल क्यों नहीं? दिखने में तो बस ज्यादातर खूबसूरत लड़कियां हैं या फिर गे या वृहन्नला।
  • यहां सब घर टूटे हैं, खंडहर से हैं। पर अक्षय-सोनाक्षी एकदम साफ-सुथरे हैं। उन्होंने गांव पहुंचने के बाद मुंह कहां धोया, नाश्ता क्या किया? रात तक पता नहीं चलता। (ये सब वो चीजें हैं जो फिल्म के सेट पर चीजों के मैनेज करते डायरेक्टर की टेंशन में नहीं आती कि छूट जाएं। ये वो चीजें हैं जो पटकथा लिखने की टेबल पर ही लिखी जाती हैं। अगर आप सैंकड़ों घंटे एक एनिमेटेड एलियन बनाने में लगा सकते हैं तो इन मूल चीजों को दुरुस्त करने में क्यों नहीं?)
  • श्रेयस और विंदू के कपड़े और अभिनय। इनका क्लीन शेव्ड चेहरा, सामान्य रूप से कटे बाल, न जाने किस काल के किसानी कपड़े और जिंदगी के पहले स्कूल प्ले सी एक्टिंग क्या नाव में बड़े-बड़े छेद नहीं हैं?
  • प्रिंस के कुएं में गिरने की बात को इतने साल बाद फिल्म में संदर्भ के तौर पर लिया जाना। क्या उसके बाद कोई बच्चा कुएं में नहीं गिरा? उसे क्यों नहीं लिया जा सकता था?
  • जहां बिजली नहीं है वहां टीवी या मल्टीप्लेक्स के होने का तो सवाल ही नहीं उठता। ऐसे में एक दृश्य में बब्बन बने श्रेयस 2001 में आई आशुतोष गोवारिकर द्वारा निर्देशित फिल्म ‘लगान’ के गीत “घनन घनन घन घिर आए बदरा” को अपनी एलियन सी भाषा में गुनगुना रहे होते हैं। ये कैसे?
  • ये अभावों से ग्रस्त इलाका है। बिजली नहीं है तो ट्यूबवेल होने का सवाल ही पैदा नहीं होता। नहरी खेती के लिहाज से भी सरकारी फाइलों में पानी की बारी का यहां के खेतों में आ पाना संभव नहीं है। जब कोई विकल्प ही नहीं है तो क्या मान लें कि महज बरसाती खेती करके पगलापुर के लोगों ने आलीशान फसलें खड़ी कर रखी हैं? ऐसे लोगों ने जो कथित तौर पर पागल हैं। जिन्हें अपने घर पर सफेदी करने तक का शऊर नहीं है।
  • बिन बिजली अगस्त्य का एप्पल का लेपटॉप यहां कैसे चार्ज होता है?
  • लोकल नेता गांव के लिए बिजली की घोषणा भर करता है कि बस मेक्डी, लैपटॉप और कोका कोला जैसे ब्रैंड के जगमगाते होर्डिंग तुरंत लग जाते हैं (तुरंत कायापलट हो जाता है) कैसे? इतने बड़े ब्रैंड इतनी अंदरुनी जगह पर कैसे पहुंच जाते हैं? क्या इंतजार कर रहे होते हैं? (अगर इस तथ्य को सांकेतिक तौर पर लिया गया है तो भी फिल्म में यूं फिट नहीं होता) और फिर पगलापुर के सब लोग अजीब सी घड़ियां, गॉगल्स, जूते और कलरफुल जैकेट तो गांव में ब्रैंड्स के आने से पहले ही पहनने लग जाते हैं।
  • अमेरिकी साइंटिस्ट और अगस्त्य के प्रतिस्पर्धी साइमन को ढूंढने अमेरिकी गुप्तचर एजेंसी एफबीआई के हैलीकॉप्टर्स पगलापुर के आसमान में उड़ते नजर आते हैं। क्या पगलापुर भारतीय टैरेटरी में नहीं आता है? क्या ये अफगानिस्तान या क्यूबा की खाड़ी है कि अमेरिकी लोगो लगे हैलीकॉप्टर इस तरह खुले तौर पर कभी भी घुस आएं? भारतीय वायुसेना क्या ऐसे वक्त में सांप-सीढ़ी खेल रही होती है?
  • जमीन से तेल निकलता है तो क्या उससे कोई नहाता है? फिर यहां सब गांववाले क्यों नहाते हैं?

फिल्म में ऐसे कई और सवाल भी बनते हैं, पर इतनों से चित्र स्पष्ट होता है। ये कैसी विडंबना है कि शिरीष बड़े सपने देखते हैं और उनका पालन करते वक्त न जाने क्या गलतियां कर बैठते हैं कि ख्वाबों का एक-एक पंख टूटकर बिखर जाता है। वह कहीं बाजारवाद की सफल आलोचना कर पाते हैं तो कहीं पर विकास की अवधारणा को रत्तीभर भी नहीं समझ पाते। ‘जोकर’ के आखिर में वह दिखाते हैं कि पगलापुर की जमीन के नीचे बह रहा तेल फूट पड़ा है और अब विकास होगा। क्या तेल निकलना किसी जगह के लिए विकास का प्रतीक होता है? एक इंसान, विचारक और फिल्मकार के तौर पर वह क्या समाज और विकास के मॉडल की इतनी ही समझ रखते हैं? जितनी निराशाजनक ये डेढ़ घंटे की फिल्म है उतना ही ये असमझियां। इससे अच्छा तो तेल और खून से सनी डेनियल डे लुइस के अभिनय वाली ‘देयर विल बी ब्लड’ देखना है जो तेल के कुओं वाली जगहों और तेल से नहाए लोगों पर धारदार टिप्पणी करती है। और ‘जोकर’ हंसते-हंसते भी सामाजिक-आर्थिक विद्रूपताओं का कान नहीं मरोड़ पाती।
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गजेंद्र सिंह भाटी

Wednesday, September 5, 2012

टाइगर हिंदी सिनेमा में महत्वपूर्ण हस्ताक्षर नहीं है, बस एक फिल्म है, जिसे देखनी थी देख ली, जिसे देखनी है देख लेगा

“In the dark world of intelligence and espionage, there are shadows without faces, and faces without names. Governments fight shadow battles through these soldiers of the unknown. Battles have no rules, No limits. Nobody on the outside knows what goes on in these secret organizations. All information is guarded in the name of National security. But, some stories escape the fiercely guarded classified files. Stories that become legends. This is a film about one such story, a story that is spoken about only in hushed whispers. A story that shook the very foundation of this dark world. But like all reports that come out of this uncertain world, nobody will ever confirm those events. It may or may not have happened. This story is about an agent named TIGER. It may now be told...”

गंभीर प्राक्कथन। पढ़ने के बाद हमारी भौंहे किसी रहस्य-रोमांच और बुद्धिमत्ता भरी कहानी को देखने के लिए खुद को तैयार करती हैं। उम्मीद करती हैं कि कोई ‘बोर्न आइडेंटिटी’ माफिक चतुर पटकथा रास्ते में जरूर आएगी। चूंकि ‘काबुल एक्सप्रेस’ जैसी सहज फिल्म बनाने वाले (मिसाल में ‘न्यू यॉर्क’ को न जोड़ें) कबीर खान का निर्देशन है और कहानी को इंडिया के असली जासूस गंगानगर मूल के रविंद्र कौशिक (उनका छद्म नाम ‘ब्लैक टाइगर’ था) की जिंदगी पर आधारित बताया जाता रहा, तो यहां तक दर्शक को भी सहज रहने और फिल्म देखकर कुछ नया पाने की उम्मीद करने का पूरा अधिकार रहता है। मगर जब फिल्म के जासूसी किरदार टाइगर के साथ सलमान खान का नाम जुड़ता है तभी से ये प्राक्कथन और गंभीरता की उम्मीदें खत्म करनी पड़ती हैं। यहां से स्क्रिप्ट, निर्देशक और टाइगर का किरदार गौण हो जाता है और सलमान खान व उनके तथाकथित प्रशंसक मुख्य हो जाते हैं। तो फिल्म देखने के तमाम मानदंड यहां बदलते हैं।

‘वॉन्टेड’, ‘दबंग’, ‘रेडी’ और ‘बॉडीगार्ड’ के बाद ‘एक था टाइगर’ भी बंधे-बंधाए सूत्रों और अपेक्षाओं के साथ आती है। (बंधे-बंधाए सूत्र और अपेक्षाएः- कहानी शुरू होगी। हीरो, हीरोइन, विलेन, हीरो का मिशन और बाकी कुछ चीजें स्थापित होंगी। थोड़ी देर में केंद्र में हो जाएंगी हीरो-हीरोइन की नोक-झोंक, बार-बार मिलना, गाने गाना, डायलॉगबाजी और चुहलबाजी। फिर वफादार दर्शक सलमान भाई और उनकी प्रचलित अठखेलियों के आगोश में कहकहे लगाएगा। काफी देर बाद हीरो से विलेन मिलेगा। या फिर कहानी का मुख्य बिंदु, गाड़ी चल पड़ेगी और फिल्म आगे बढ़कर खत्म हो जाएगी।) और उन पैमानों पर ‘एक था टाइगर’ अव्वल आती है। कोई शिकायत नहीं रहती। पर काली कलम लेकर काले अक्षर उकेरे जाने हमेशा जरूरी रहे हैं। तो...

‘एक था टाइगर’ की सबसे चतुर चीज वो लगती है जब क्यूबा की धरती पर गाना गाते सलमान और कटरीना से ध्यान हटाकर कैमरा एक दीवार की तरफ केंद्रित होता है। इस दीवार पर वहां की भाषा में साम्यवादी क्रांतिकारी हीरो चे गुवेरा का एक कथन लिखा होता है, जिसका अर्थ होता है, “जिस मुहब्बत में दीवानगी नहीं, वो मुहब्बत ही नहीं”। सही कहूं तो इस उक्ति के चतुर इस्तेमाल के अलावा न तो मुहब्बत कहीं नजर आती है, न दीवानगी। नजर आता है तो बेहद चतुराई से फिल्माया गया (चतुर यूं कि इसे देखते हुए ज्यादातर वक्त ये लगता है कि इन स्टंट्स में सलमान खान ने बॉडी डबल का इस्तेमाल नहीं किया है, बल्कि सारी विस्मयकारी उछल-कूद मोरक्को जैसी लगने वाली (उत्तरी इराक) किसी विदेशी धरती पर उन्होंने खुद की है) फिल्म का ओपनिंग एक्शन सीक्वेंस। सब्जी बाजार, छतों, खिड़कियों, सड़कों और भीड़ के बीच कारीगरी भरी एडिटिंग और छायांकन के अलावा अगर कोई इन एक्शन को ध्यान से देखेगा तो पाएगा कि सलमान की ही काठी का कोई नौजवान ये सीन कर रहा है। जहां कहीं सामने की ओर से भागते सलमान दिखते हैं, वहां कंप्यूटर ग्राफिक्स से किसी बॉडी डबल के चेहरे पर सलमान का मुखौटा लगाया होता है। जैसा बहुत बरस पहले एक कोल्ड ड्रिंक के विज्ञापन में सचिन और उनका मुखौटा लगाए बच्चे नजर आए थे। बहुत बारीकी से देखें तो आसानी से फर्क जान पाएंगे। जब बात स्टंट की हो रही है तो फिल्म में ट्रैन में लड़ने वाला सीक्वेंस पूरी तरह हवा-हवाई है, यानी ऐसा असंभव स्टंट जो काल्पनिक कहानी में भी संभव तरीके से नहीं फिल्माया लगता। वहीं सबसे आखिर में एक चार्टर्ड हवाई यान के समानांतर मोटरसाइकिल दौड़ाकर उछलना और यान को पकड़ना, बेहद प्रभावी दृश्य है। असंभव है, पर फिल्माने के तार्किक तरीके से संभव हो जाता है।
विदेशी मिशन पर जाने और हीरोइक करतब करने के अलावा टाइगर (सामाजिक जीवन में उसका नाम ये नहीं है) की दिल्ली की औसत कॉलोनी में रहने वाली लाइफ भी है। सुबह किसी आम आदमी की तरह ही, वह अपने दरवाजे पर पतीला पकड़े खड़ा होता है, पतीले में दूधवाला दूध गिरा रहा होता है। वहां बनियान पहने टाइगर के पहलवानी रूप और दर्शकों के सब-कॉन्शियस माइंड में पसरे सलमान खान के ऑरा का मिलन सा हो रहा होता हैं। यहां पर कुछ ग्लैमर टूटता है तो दर्शक इसे बदलाव के तौर पर लेते हैं कि देखो दिल्ली के रियलिस्टिक मोहल्ले में खड़ा है सलमान। जब फिल्म में बतौर डायरेक्टर कबीर खान और लेखक नीलेश मिश्रा जुड़े हों तो दिल्ली का वास्तविक रूप कुछ तौर पर शामिल करने की कोशिश तो दिखनी ही थी। ये और बात है कि वो वास्तविकता सही से नहीं आ पाई।

कहानी यहां से ट्रिनिटी कॉलेज पहुंचती है। रॉ प्रमुख शेनॉय (गिरीष कर्नाड) टाइगर को एक नए मिशन पर यहां भेजता है। उसे यहां ट्रिनिटी में पढ़ा रहे एक छद्म प्रफेसर (रोशन सेठ) पर नजर रखनी है। पैंट, शर्ट, कोट और टाई पहने ये जेंटलमैन कैंपस में पहुंचते हैं। इस दौरान टाइगर को पेशाब की हाजत होती है, पर वक्त नहीं मिलता, प्रफेसर निकल जाते हैं। तो झाड़ियों में मुक्त होने गया टाइगर साइकिल ले फिर प्रफेसर के पीछे भागता है। यहां हल्के में निकलने से पहले ये तथ्य भी सही से सामने आता है कि एक असल जासूस की जिंदगी कितनी मुश्किल होती है। प्रफेसर के पीछे जाने पर उनके घर की शिनाख्त बाहर से टाइगर कर लेता है। यहां उसे मिलती है जोया (कटरीना कैफ) जो प्रफेसर के घर में आ-जा सकने वाले अकेली शख्स है। रात में टाइगर जोया के हॉस्टल पहुंच जाता है।

वह खिड़की से देखती है कि टाइगर सामने बेंच पर लेटा है तो उसके कमरे में आने को बोलती है जो एक मंजिल ऊपर होता है। जोया टाइगर को पाइप पर चढ़कर आने को बोलती है तो वह उसके देखते सामने नहीं चढ़ता। लगता है, अपनी रॉ एजेंट होने की पहचान गुप्त रखना चाहता है और एकदम से पाइप पकड़कर चढ़ गया तो जोया को शक होगा कि ये राइटर तो हो नहीं सकता। पर आगे ऐसा नहीं होता। वह चढ़ जाता है। धीरे-धीरे वह जोया के मोह में यूं पड़ता है कि अपनी लेखक होने की छवि गढ़ने पर ध्यान नहीं देता और प्यार में पड़ता जाता है। दोनों के बीच एक रिश्ता बनता जाता है। एक सीन में जब टाइगर जोया को किताब उपहार में देता है तो वह रोने लगती है। वह पूछता है, कि रो क्यों रही हो तो जोया कहती है कि किसी की याद आ गई। फिल्म में यही एक खास जगह होती है, जहां सलमान के भाव बेहद प्राकृतिक लगते हैं।

ऐसे कुछेक मौकों पर वह अपनी पारंपरिक छवि से जरा अलग होते हैं, पर बीच-बीच में पुराने टोटके आते जाते हैं। मसलन, कोई टाइगर को कुछ पूछता है तो वह सोचने लगता है। उसके सोचने के भीतर एक जासूस के काम की मुश्किलों को दर्शकों के सामने मजाकिया तरीके से परोसा जाता है। कभी सोचने में उसके पीछे कुत्ते दौड़ रहे होते हैं तो कभी चाइनीज, अंग्रेज, बुर्केवाली और दूसरे किस्म की अंगरक्षक खूबसूरत लड़कियां। फिल्म में कटरीना के आमसूत्र के विज्ञापन मुताबिक रस से भरे होठ सबसे प्रॉमिनेंट रहते हैं। बंजारा... गाने में उनके होठ पर कैमरा इतनी मादकता से केंद्रित होता है कि लगता है उनमें कोई बड़ा सा इंजेक्शन घौंपा गया है। फिल्म का ये सबसे बुरा वक्त होता है।

तकनीकी तौर पर कुछ गड़बड़ियां भी रहती हैं। भारत-पाक के नुमाइंदे जब इस्तांबुल में मिलते हैं तो वहां इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया के लोग दौड़कर भीतर आते हैं और तुरंत सवाल पूछने लगते हैं। असल में ऐसा कहीं नहीं होता। सुरक्षा कारणों से डेलेगेट्स और प्रेस के बीच एक कोड ऑफ कंडक्ट होता है। प्रेस को एक नियत जगह पर खड़ा होना या बैठना होता है। वो वहीं से खड़े होकर अनुशासन से सवाल पूछ सकते हैं। कॉन्फ्रेंस में लाल बॉर्डर वाली काली सलवार-कमीज पहने सिर पर चुन्नी डाले कटरीना पाकिस्तानी विदेश मंत्री हिना रब्बानी सी ज्यादा लगती हैं और किसी आईएसआई एजेंट सी कम। वैसे हो भी सकता है क्योंकि सीक्रेट एजेंट तो कोई भी हो सकता है।
बाद में फिल्म क्यूबा पहुंचती है। जहां अपनी-अपनी गुप्तचर एजेंसियों को धता बता, अपने प्यार के पर फैलाए जोया-टाइगर चले आते हैं। पहले हिंदी फिल्मों में यूं क्यूबा नहीं आया गया है। संदर्भ के लिहाज से (दोनों किरदारों का दुनिया के खूबसूरत टूरिस्ट स्पॉट पर यूं भटकना) फिल्म यहां एंजलीना जॉली की ‘सॉल्ट’ और उनकी-जॉनी डेप की ‘द टूरिस्ट’ जैसी भी लगती है। पर खूबसूरत लोकेशन पर जाने से काम नहीं चलता। हवाना, क्यूबा जाने को एयरपोर्ट पर भेस बदलकर खड़ी कटरीना की नाक और सलमान की दाढ़ी खूब नकली लगती है, समझ नहीं आता कि उन्होंने इस रफ मेकअप को फाइनल प्रिंट में स्वीकार कैसे कर लिया। वह मेकअप लरत-लरज गिरता लगता है।

इस साल मार्च में ‘एजेंट विनोद’ आई थी। हॉलीवुड की बॉन्ड और जेसन बॉर्न फिल्मों के जवाब में। अब आई है ‘एक था टाइगर’। हालांकि इस लीग से तो ये फिल्म तुरंत बाहर हो जाती है, पर भारत के कस्बाई दर्शकों के लिए ठीक-ठाक मनोरंजन लेकर आती है। हिंदी सिनेमा में सीधे तौर पर फिल्म का कोई महत्वपूर्ण योगदान नहीं रहेगा। न ही प्रस्तुति और कहानी कहने के ढंग में कोई अनूठापन है। बस ये एक फिल्म है, सलमान खान की फिल्म, कटरीना कैफ की फिल्म, जिन्हें देखनी थी थियेटर में देखी, जिन्हें फिर देखनी है जल्दी ही टीवी प्रीमियर में देख पाएंगे। इससे ज्यादा बात करने को कबीर खान की ‘एक था टाइगर’ में कुछ है नहीं।
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गजेंद्र सिंह भाटी