Thursday, August 30, 2012

"मरने से पहले दस अच्छी फिल्में बनाना चाहती हूं बस"

शोनाली बोस से बातचीत, राष्ट्रीय पुरस्कार जीतने वाली फिल्म 'अमु' की निर्देशक

शोनाली बोस ने 1984 के दंगों पर 2005 में एक फिल्म बनाई थी। नाम था ‘अमु’। बेहद सराही गई। उस साल फिल्म को नेशनल अवॉर्ड मिला। इस साल के शुरू में ‘अमु’ और अपनी नई स्क्रिप्ट ‘मार्गरिटा, विद अ स्ट्रॉ’ के लिए शोनाली को दुनिया का बड़ा प्रतिष्ठित ‘सनडांस-महिंद्रा फिल्ममेकिंग अवॉर्ड-2012’ दिया गया। पहली बार किसी इंडियन का यह अवॉर्ड मिला था। इसके अलावा 1930 के चिटगॉन्ग विद्रोह पर लिखी उनकी फिल्म ‘चिटगॉन्ग’ भी रिलीज को तैयार है। इसे शोनाली के नासा में साइंटिस्ट हस्बैंड देबब्रत ने डायरेक्ट किया है। उनसे काफी वक्त पहले बातचीत हुई। वह ऐसी इंसान हैं जिनसे जिंदगी और उसके किसी भी पहलू पर गर्मजोशी से बात की जा सकती है। कोई चीज उन्हें दबाती नहीं, कोई विषय उन्होंने भटकाता नहीं और तमाम मुश्किलों के बीच वह जरा भी मुरझाती नहीं। दो साल पहले उनके 16 साल के बेटे ईशान की मृत्यु हो गई। जिस वैल्स ग्रूम्समैन कंपनी के दाढ़ी-मूंछ ट्रिमर को इस्तेमाल करते हुए ईशान की जान गई आज उसके खिलाफ शोनाली और बेदब्रत लॉस एंजेल्स के कोर्ट में केस लड़ रहे हैं। प्रस्तुत है शोनाली से हुई बातचीत के कुछ अंशः

आपको सनडांस और महिंद्रा का संयुक्त अवॉर्ड मिला। ये अवॉर्ड कितना बड़ा है, क्या है?
ग्लोबल अवॉर्ड है। वर्ल्ड सिनेमा में योगदान देने के लिए पहली बार किसी भारतीय को यानी मुझे दिया गया है। दुनिया के चारों कोनों से लोगों को मिला, पहली फिल्म ‘अमु’ और अगली फिल्म की स्क्रिप्ट के लिए मिला है। ‘अमु’ मेरी सबसे प्यारी फिल्म रही है तो उसके लिए भी मिला इसकी खुशी ज्यादा है।

‘मार्गरिटा, विद अ स्ट्रॉ’ क्या है, कहानी जेहन में कैसे आई?
इसका आइडिया मुझे जनवरी 2010 में आया। जनवरी में पटकथा लिखनी शुरू की और जून तक पूरी कर दी। लैला की कहानी है। उसका शानदार-हंसोड़ दिमाग एक अवज्ञाकारी देह में फंसा है। वह बार-बार प्यार में पड़ती है, यौन संबंध बनाना चाहती है और बॉलीवुड सॉन्गराइटर बनना चाहती है।

इसकी कास्टिंग को लेकर कौन-कौन दिमाग में हैं?
18 साल की लड़की के लीड रोल में कोई बिल्कुल नई लड़की होगी। एक पावरफुल रोल है उसमें विद्या बालन के लिए ट्राई कर रहे हैं।

Poster of 'Amu'
छह-सात साल बाद अब अमु को देखती हैं तो फिल्म आपको कितनी कमजोर या मजबूत लगती है?
अमु मेरे बच्चे जैसी हैं। एक मां अपने बच्चे को किन आंखों से देखें... पर ओवरऑल प्राइड और लव की फीलिंग है। अभी भी मुझे हर रोज मेल आते हैं, लोग कहते हैं कि आई लव्ड इट। वो मेरी शुरुआत थी।

कबीर के रोल में अंकुर खन्ना भी फिल्म में थे। उन्हें आपने कहां से कास्ट किया। वृंदा कारत को कैसे लिया?
वृंदा मेरी मौसी हैं, मां जैसी हैं, नहीं तो वो नहीं करती। मैं हमेशा नया फेस चाह रही थी। मुझे मालूम था कि वो बड़ी कमाल एक्ट्रैस हैं। वो पहले थियेटर में थीं, फिर राजनीति में चली गईं। मैं तो उनके साथ रहती ही हूं। तो मुझे पता था कि वो राइट पर्सन थी। मैंने मुश्किल से मनाया। मुझे याद है फिल्म देखने के बाद नसीरुद्दीन शाह ने फोन करके कहा कि ये किसी भी इंडियन एक्टर का बेस्ट परफॉर्मेंस था अब तक का, किसी भी फिल्म में। जहां तक अंकुर को लेने का सवाल है, तो मुझे प्रैशर था कि एक्टर में शाहरुख को लो या बड़े स्टार को लो, पर मैं नया एक्टर लेना चाहती थी। ऐसा लड़का चाहती थी जो वलनरेबल (कुछ कमजोर) हो इसलिए उन्हें लिया। अंकुर मुंबई के हैं, कलकत्ता में बड़े हुए, दिल्ली यूनिवर्सिटी में पढ़े। कोंकणा के बैचमेट थे, साथ एक्टिंग करते थे। तब वो कोंकणा के बॉयफ्रैंड थे। वैसे वो खुद डायरेक्टर भी हैं।

और कोंकणा सेन शर्मा फिल्म में कैसे आईं?
कजोरी का किरदार कोई इंडियन-अमेरिकन ही निभा सकती थी। मैंने एक हजार लड़कियों को ऑडिशन किया था। दूसरे रोल के लिए बड़े लोगों को भी अप्रोच किया। अपर्णा सेन से भी संपर्क किया। उन्होंने कहा कि मैं तो पहले ही एक फिल्म डायरेक्ट कर रही हूं इसलिए ये रोल नहीं कर पाऊंगी। फिर उन्होंने पूछा कि लड़की के रोल में किसे ले रही हो? मैंने कहा, ऐसा-ऐसा रोल है और ढूंढ रही हूं तो उन्होंने अपनी बेटी कोंकणा का नाम सुझाया। मैंने सोचा, हद है, मैं मां को लेने आई और ये बेटी को थोप रही है। फिर मैं वहां से निकली। कुछ दिन बाद मैंने अपर्णा मासी को फोन किया और कोंकणा को स्क्रिप्ट देने के लिए कहा। फिर ऑडिशन के लिए उन्हें दिल्ली बुलाया। पर मैंने कहा कि रहना मेरे ही घर पर होगा क्योंकि होटल वगैरह का खर्च नहीं दे सकती। तो इस तरह कोंकणा फिल्म में आईं।

अमु के बाद दूसरी फिल्म में इतना वक्त क्यों लिया?
‘चिटगॉन्ग’ 2009 में शुरू की। उससे पहले ‘अमु’ 2007 में अमेरिका में रिलीज हुई। हमारे लिए नॉर्थ अमेरिका की रिलीज बहुत जरूरी थी। तो बड़ी मेहनत थी। चूंकि फिल्म वहां की सिख कम्युनिटी के सहारे और मदद से बनी थी इसलिए उन्हें दिखानी जरूरी थी। ऊपर से मैं ‘अमु’ को डाऊनटाउन में रिलीज करना चाहती थी, वहां जहां मैनस्ट्रीम अंग्रेजी फिल्में रिलीज होती हैं। तो 2007 में यूएस-कैनेडा रिलीज था। ‘चिटगॉन्ग’ को मैं और मेरे हस्बैंड देबब्रत साथ मिलकर डायरेक्ट करना चाहते थे, फिर हमने फैसला लिया कि वो ही करेंगे। ताकि लोग उसे शोनाली की फिल्म न बताएं।
Shonali with Bedabrata

देबब्रत के बारे में कुछ बताएं?
वह नासा के टॉप साइंटिस्ट हैं। आपके सेलफोन में जो कैमरा होता है उसका चिप उन्होंने ही डिजाइन किया था। आईआईटी पासआउट थे। सत्यजीत रे, रित्विक घटक का प्रभाव था उनपर कलकत्ता में पलते-बढ़ते हुए। ‘अमु’ की मेकिंग में पूरे वक्त वो मेरे साथ थे।

आप फिल्ममेकर पहले हैं कि सोशल एक्टिविस्ट? क्या किसी फिल्ममेकर को फिल्में बनाते हुए इतना मजबूती से सामाजिक और पॉलिटिकल मुद्दों पर कमेंट करना चाहिए जितना आपने ‘अमु’ के वक्त किया?
मैं एक्टिविस्ट ही हूं। 18 की थी जब 1984 दंगों के बाद मंगोलपुरी-त्रिलोकपुरी कैंप्स में जाती थी। भोपाल गैस ट्रैजेडी में भी दिल्ली से ही हिस्सा लिया। मिरांडा की स्टूडेंट बॉडी में एक्टिव थी। तब कई लड़कियों और औरतों के साथ ईव टीजिंग होती थी तो उसका विरोध मैंने किया और कार्रवाही शुरू करवाई जो पहले दिल्ली में नहीं होती थी। ये छोटा सा मुद्दा है पर बता रही हूं कि जुड़ी थी। मैंने देखा कि हर कैंप में सिख रो-रोकर बता रहे थे कि हमारे हिंदु पड़ोसियों ने हमें बचाया। जबकि अखबार में आता है कि ये स्वतः ही हुआ। पढ़कर मैं चकित थी। जब हम ‘अमु’ शूट कर रहे थे तो जगदीश टाइटलर ने हमें डराया कि शूट बंद करो। पर हमने कहा कि नहीं बंद करेंगे। हमने हथियारबंद होकर सामना किया। दो रिंग बनाई शूट के इर्द-गिर्द। मुझे अब भी धमकियां मिलती हैं। फिल्म को सेंसर बोर्ड ने ए सर्टिफिकेट दिया। वो लाइन मिटा दी जिसमें दंगों में शामिल छह जनों का जिक्र होता है। एक बार हमने फिल्म सरदार पटेल स्कूल में प्रीमियर की, वहां बच्चों ने पूछा कि मैम हमें क्यों नहीं बताया गया अपने पास्ट के बारे में। फिल्म को नेशनल अवॉर्ड मिला पर कितने अफसोस की बात है कि इसे किसी चैनल पर दिखाने की मंजूरी नहीं है।

आप खुद कैसी फिल्में देखना पसंद करती हैं?
फेवरेट है ‘चक दे इंडिया’। मुझे हिंदी फिल्मों से प्यार है। मेरे लिए परफैक्ट वो है जो पूरी तरह एंटरटेनिंग हो और मैसेज भी दे। ‘चक दे’ में शाहरुख ने शानदार परफॉर्मेंस दिया, सब लड़कियां नई थी। तो ये खास हो जाता है। ‘बंटी और बबली’ भी पसंद है। उसमें छोटी पॉलिटिकल चीजें हैं, लगता है कि इनके पीछे कुछ थॉट था, एंटी- एस्टेबलिशमेंट वगैरह। ‘कुछ-कुछ होता है’ और ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ भी खूब पसंद हैं। आई लव करन। ‘धोबी घाट’ और ‘उड़ान’ देखकर भी खुशी होती है। कोई भी इंडियन अच्छी फिल्म बनाए तो मैं बड़ी खुश होती हूं।

वर्ल्ड सिनेमा में कौन फेवरेट हैं?
सनडांस में जैसे एक फिल्म थी, ‘बीस्ट ऑफ द सदर्न वाइल्ड’, उसे शायद अगले साल ऑस्कर मिले। ये फिल्म सनडांस की लैब से ही निकली है। वह कोई 20 साल का डायरेक्टर (बेन जेटलिन) था, तो मुझे कुछ-कुछ शर्म भी आई कि कैसे खुद को फिल्ममेकर समझती हूं। इतने यंग लड़के ने क्या ब्रिलियंट फिल्म बनाई है। मैं तो कहीं से भी उसके बराबर नहीं।

कमर्शियल इंडियन सिनेमा में कौन पसंद?
90 पर्सेंट तो मिडियोकर हैं, मुझे आप मिडियोकर का हिंदी शब्द बताइए। ... कुछ भी अच्छा नहीं हो रहा कमर्शियल सिनेमा में। इतनी शानदार कहानियां हमारे देश में हैं तो बनाते क्यों नहीं। स्टूपिड फिल्मों में चालीस-पचास करोड़ लगा देते हैं। पर अच्छी स्टोरी में पैसे नहीं लगाते हैं, क्यों? ‘अमु’ बनाई तो उस वक्त लोगों ने तारीफ की, अच्छी फिल्म बनाएंगे तो तारीफ करेंगे ही, हां, लेकिन निर्माता नहीं हैं। कमर्शियल और आर्ट हाउस दोनों में। पहले आर्टहाउस मूवमेंट में एनएफडीसी ने भी हाथ बंटाया, पर अब ये सब कुछ नहीं कर पाते। अगर हम हजारों फिल्में साल में बनाते हैं तो ऐसा न हो कि उनमें से सिर्फ चार-पांच ही अच्छी हो। ऐसा नहीं है कि टैलेंट नहीं है, पर उसका यूज नहीं हो पा रहा।

मौजूदा वक्त में आपके पसंदीदा फिल्ममेकर कौन हैं और क्यों?
दिबाकर बैनर्जी ने तीन प्यारी फिल्में बनाईं। मुझे ‘खोसला का घोंसला’ बहुत अजीज है। पॉलिटिकल फिल्म है। ‘पीपली लाइव’ भी पॉलिटिकल फिल्म है।

आने वाले वक्त में कैसी फिल्में बनाना चाहती हैं?
जैसे मेरी तीन फिल्मों के सब्जेक्ट तैयार हैं। सब राजनीतिक नहीं है, पर मैं रियल लाइफ सिचुएशन पसंद करती हूं। अलग-अलग तरीकों की पॉलिटिकल फिल्में पसंद करती हूं। जैसे एक क्राइम ड्रामा है जिसमें यूएस में पुलिस और एफबीआई की इमेज कितनी अच्छी है, कितनी बुरी ये दिखाने की कोशिश है। क्योंकि मैं जानती हूं कि अमेरिका में वो क्या तरीके आजमाते हैं। 9-11 के बाद उन्होंने लोगों पर नजर रखी, सिविल राइट्स का पतन हुआ। उनकी हर फिल्म के अंत में ऐसे मुद्दों में वो अच्छे आदमी बन जाते हैं। मेरी फिल्म में हकीकत होगी। पॉलिटिकल रिएलिटी। अब चोर पुलिस की कहानी में आप पुलिस कैसे दिखाओगे। मैं पंजाब की पुलिस भी जानती हूं और अमेरिका की भी। सिस्टम की भी बात है कि वो कैसे हैं। और भी दूसरे सब्जेक्ट हैं।

निजी जिंदगी कैसी चल रही है?
मेरे बच्चे हमेशा मेरी प्राथमिकता हैं। जिदंगी में कुछ वक्त पहले एक दुर्घटना हुई। मेरा 16 साल का बच्चा गुजर गया। तो अमेरिका से मैं इंडिया आ गई। पर मेरे पति को वहीं रहना है उन यादों के साथ। सनडांस में भी मैं गई लॉस एंजेल्स, तो कुछ पलों के लिए इमोशनल हो गई। बस मैं फंक्शन में गिरी ही नहीं। ईशान का जन्म हुआ तब मैं फिल्म स्कूल के पहले साल में थी। तो मां बनने का अनुभव और फिल्में साथ-साथ रही। मैं नही चाहती थी कि बच्चों को बैबी सिटर के पास रखूं। मैं किसी रेस में नहीं थी। मैं मरने से पहले दस अच्छी फिल्में बनाना चाहती हूं। बस। आप कभी सपने में भी नहीं सोचते कि आपका बच्चा आपकी आंखों के आगे दम तोड़ेगा। अब ‘मार्गरिटा...’ भी बनाऊंगी तो अपने बेटे की स्कूल छुट्टियों में। मैं कॉम्प्रोमाइज नहीं करूंगी। न बच्चों के लेवल पर और न ही फिल्म मेकिंग के लेवल पर।

इंडियन सिनेमा में आपके हिसाब से क्या मिसिंग है जो होना चाहिए, या सब कुछ सही है?
हमें सेंसर बोर्ड से छुटकारा पाने की जरूरत है, ये संस्थान पॉलिटिकल है पूरी तरह। हमारा मजाक उड़ाता है। उसके बावजूद देखिए कि आज औरतें कैसे ड्रेस करती हैं। मैं अपने बच्चों को नहीं दिखाना चाहूंगी ये सब। बीड़ी जलइले... गाने को देखिए.. कैसे कमर मटकाती है हीरोइन, पर बच्चे देख रहे हैं। फिर क्या मतलब सेंसर का। नेशनल मूवमेंट होना चाहिए उसे हटाने का। दूसरा प्रोड्यूसर्स को जागना चाहिए और दर्शकों को कोसना बंद करना चाहिए। ‘पीपली...’ भी बनी थी और लोगों ने देखी। ‘खेलें हम जी जान से’ पचास करोड़ में बनती है और लोग पसंद नहीं करते, पर प्रॉड्यूसर्स का पैसा लगता हैं। ‘वाट्स योर राशि’ के बाद भी आशुतोष को फिल्म बनाने के पैसे दिए गए। तो दर्शकों को मत कोसो, प्रोड्यूसर घटिया फिल्मों पर पैसे फैंक रहे हैं। राइटिंग तो अच्छी होनी चाहिए न। सनडांस के लेखकों से लिखवा दो। मैं हूं, फ्री में लिख दूंगी।
Although there couldn't be any talk on the movie, but, here is the poster.
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गजेंद्र सिंह भाटी

Wednesday, August 29, 2012

दोस्ती और हिम्मत के सहारे परिवार को बचाने निकला मैनी

फिल्म: आइस ऐज - कॉन्टिनेंटल ड्रिफ्ट (4)
निर्देशकः स्टीव मार्टीनो और माइक थर्मियेर
आवाजः रे रोमानो, क्वीन लटीफा, डेनिस लियरी, जॉन लेगुइजामो, पीटर डिंकलेज, वैंडा साइक्स
स्टारः तीन, 3.0
इस साल नवंबर में होने जा रहे अमेरिकी राष्ट्रपति चुनावों के मुख्य उम्मीदवार बराक ओबामा और मिट रोम्नी ने वोटरों में अपनी फैमिलीमैन वाली छवि गढ़ी है। गढ़ रहे हैं। डेनवर में बैटमैन मूवी के प्रीमियर पर हुए शूटआउट के बाद पीड़ितों के लिए दोनों ने संदेश भी जारी किए तो संबोधन में अपनी पत्नी का नाम पहले लिया, खुद का बाद में। बार-बार वो ‘वी आर अ फैमिली’ कहते रहे। ‘आइस ऐज-4’ के निर्माता भी इसी द ग्रेट अमेरिकन फैमिली वाली थीम के साथ बच्चों और परिवारों के लिए ये सुपरहिट श्रंखला वाली एनिमेशन मूवी लाए हैं। इसमें सबसे ज्यादा मनोरंजक है सिड (सदी का सबसे एंटरटेनिंग एनिमेशन कैरेक्टर) और उसकी दादी। सिड को तो उसके घरवाले पहले ही सूना छोड़ गए थे, यहां बूढ़ी-आफत जैसी दादी को भी सिड के गले डाल जाते हैं। मगर दोनों बेपरवाह हैं। आदर्श टेंशनमुक्त जीव हैं। यहां तक कि समुद्री लुटेरों के बीच फंस जाने पर भी दादी बड़बड़ाती रहती है, ‘वॉट अ लवली वेकेशन’। फिल्म में पीचेज और नन्हे लुइस की अनूठी दोस्ती भी है। बेचारा स्क्रैट (मेल गिलहरी) यहां भी बलूत के फल के लालच में बार-बार फंसता रहता है। चीखता रहता है और लोग हंसते रहते हैं।

पिछली फिल्म में प्रागैतिहासिक हाथी मैनी (रे रोमानो) और उसकी वाइफ ऐली (क्वीन लटीफा) के बेटी हुई थी। पीचेज। अब वो टीनएजर हो चुकी है। वह बाहर निकलना और पार्टी करना चाहती है, हैंडसम जुल्फों वाले टीनएज हाथी ईथन पर उसका क्रश है, पर मैनी को बेटी की सेफ्टी की चिंता होती है, इसलिए उसे कहीं जाने नहीं देता, ओवरप्रोटेक्टिव पिता है। नाराज होकर पीचेज कहती है कि मुझे अफसोस है कि आप मेरे पिता हैं। इतने में द्वीप में भूकंप आ जाता है, धरती शिफ्ट होने लगती है। अब मैनी अपनी फैमिली से बिछड़ चुका है। समंदर में बर्फ के टुकड़े पर उसके साथ उसके बेस्ट फ्रेंड डिएगो (डेनिस लियरी) और सिड (जॉन लेगुइजामो) हैं, और हां, सिड की 80 साल की दादी भी है। अब उसे समंदर के लुटेरों (शक्तिशाली-शातिर बंदर कैप्टन गट और उसकी गैंग) से बचते हुए अपने परिवार तक पहुंचना है।

डायरेक्टर माइक थर्मियेर और स्टीव मार्टीनो की इस फिल्म में उतने उतार-चढ़ाव नहीं हैं जितने होने थे। ऊपर से फिल्म डेढ़ घंटे से भी छोटी है, जो काफी कम है। टेक्नीकली कहीं भी कमजोर नहीं है। थ्रीडी वर्जन में कुछ भी हैरतअंगेज एनिमेशन नहीं हैं, तो टूडी भी चल सकती थी। बहरहाल ‘आइस ऐज-4’ जरूर देखें। ये दोस्ती, हिम्मत, टेंशनमुक्त जिंदगी और परिवार की परवाह करने के शानदार सबक देती है।
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गजेंद्र सिंह भाटी

Sunday, August 26, 2012

बाला की ‘नंदा’: बहुत कुछ जो संप्रेषित नहीं हो पाया

नंदा हजारों बच्चों-युवकों की हूबहू भौतिक जीवन-यात्रा हो न हो, वह निश्चिततः हिंदुस्तान के बाल सुधार गृहों में परिस्थितियों द्वारा धकेल दिए गए बच्चों-किशोरों का मानस ग्रंथ जरूर है, उनका नियति पथ जरूर है
Bala, On set of one of his earlier movies.
हिसाब से सिनेमा संसार में 26 अगस्त का दिन उत्सव की तरह मनाया जाना चाहिए। 1955 में इसी दिन सत्यजीत रे ने सैंकड़ों फिल्मकारों की प्रेरणा और भारत का गौरव बनने वाली अपनी फिल्म ‘पाथेर पांचाली' रिलीज की थी। थियेटर में इस बंगाली फिल्म के चढ़ने के बाद भारतीय सिनेमा में कुछ भी पहले सा नहीं रहा था। पिछले महीने ब्रिटिश फिल्म इंस्टिट्यूट की सिने मैगजीन ‘साइट एंड साउंड’ की विश्व की 50 सर्वश्रेष्ठ फिल्मों वाली सूची (विवादित) भी आई। सूची में ‘पाथेर पांचाली’ को 42वां स्थान मिला। मगर अभी मैं ‘पाथेर पांचाली’ की बात नहीं करूंगा। रे और उनकी फिल्म दोनों ही फिल्मकारी का उत्सव हैं और उस उत्सव का हिस्सा है हरेक वो फिल्म जो पागलपन और ढेर सारे तूफान के साथ बनाई गई है। दक्षिण भारत के तमिल सिनेमा में एक ऐसा ही एक तूफान है बाला

46 साल के बाला फिल्म निर्देशक हैं, स्क्रिप्ट खुद लिखते हैं और अब निर्माण भी खुद ही करने लगे हैं। बहुत कम बात करते हैं। ज्यादा साक्षात्कार नहीं देते। बस फिल्म बनाते हैं, और जब बनाते हैं तो समीक्षकों के लिए उत्साह का मौका होता है, उनके पास बातें करने और लिखने के लिए बहुत कुछ होने वाला होता है। क्योंकि बाला की फिल्मों की हिंसा या विवादास्पद निरुपण के लिए चाहे बुराई हो या अद्भुत फिल्ममेकिंग के लिए तारीफ, निस्संदेह महत्व के मामले में उस वक्त उसके आसपास भी कोई दूसरी फिल्म नहीं होती है। 1999 में पहली ही फिल्म ‘सेतु’ ने बेस्ट तमिल फीचर फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार जीता। अभिनेता विक्रम (हिंदी फिल्म ‘रावण’ में नजर आए) सबकी आंखों के तारे बन गए, आखिर कब-कब किसी को ऐसा मेहनत से बनाया गया किरदार निभाने को मिलता है। जिस किसी ने भी सतीश कौशिक द्वारा निर्देशित ‘तेरे नाम’ देखी है, उसे एक बार ‘सेतु’ जरूर देखनी चाहिए, ताकि मूल फिल्म की तीक्ष्णता और विक्रम का बाला के सीधे निर्देशों पश्चात उपजा अभिनय अनुभव कर सकें। सतीश की रीमेक में वह नहीं आ पाता।

एक साल बाद आई, ‘नंदा’, तमिल सिनेमा के एक और अभिनेता सूर्या (रामगोपाल वर्मा की ‘रक्तचरित्र-2’ में सूरी बने थे) के सितारे को चमकाते हुए। ‘नंदा’ वैसे तो महेश मांजरेकर की ‘वास्तव’ से प्रेरित थी, पर आंशिक तौर पर। फिल्म में ‘अग्निपथ’ भी थी और बाला का अपना नजरिया और प्रस्तुतिकरण भी। अगली फिल्म ‘पीथामगन’ में सूर्या और विक्रम दोनों ही थे। उल्लेखनीय रही। मगर चौंकाया ‘नान कडवल’ ने। 2009 में रिलीज हुई इस फिल्म के लिए बाला राष्ट्रपति प्रतिभा देवीसिंह पाटील से बेस्ट डायरेक्शन के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार ग्रहण करते नजर आए। तीन साल की कठोर मेहनत और अघोरी जैसे कठोर मन के साथ बनाई बाला की ये फिल्म स्क्रिप्टवाइज इतनी उत्कृष्ट है कि कलेजा फाड़ देती है, पर अपनी विषय-वस्तु की वजह से फिल्म को आलोचकों ने उठा-उठाकर पटका। बाला की ‘नान कडवल’ पर ही मैं सबसे पहले लिखना चाहता था, पर नहीं, अभी बात कर रहा हूं ‘नंदा’ के बारे में।

सारी कोशिश फिल्म के किरदारों के भीतर और उनके मन में चल रही चीजों को ढूंढने और उनका अनुमान लगाने की है। ये पकड़ने की है कि किरदार गढ़ते और फिल्माते वक्त निर्देशक कितना अधिक इमोशनल हुआ होगा? उसने कितना कुछ सोचा होगा, जो शायद पर्दे पर संप्रेषित नहीं हो पाया? न ही इतना सब-कॉन्शियस परतों वाला विचार लोगों तक पहुंच पाता है, वो तो हमेशा के लिए पटकथा लिखने वाले या फिर फिल्म के निर्देशक के साथ ही पीछे छूट जाता है। ‘नंदा’ पर ये कुछेक शब्द इन्हीं मायनों के साथ लिख रहा हूं।

Actor Surya as Nandha, a still from the movie where he's talking to his sister.

काले-पके होठ, छोटे-छोटे बाल, साधारण से शर्ट-पैंट, पथरीला बाहरी आवरण, नीली-गहरी-बड़ी-बड़ी आंखें और औसत कद काठी। ये नंदा (सूर्या) का बाहरी आवरण है। जैसे शिवा (नागार्जुन) या सत्या (जे.डी.चक्रवर्ती) का अपनी-अपनी फिल्मी कहानियों में होता है। सख्त, अल्पभाषी, नैतिक, विस्फोटक, बागी, हिम्मती, एक्सपेरिमेंटल, साधारण, हिंसक। ऐसे किरदार तमाम दुनिया की कहानियों (‘ड्राइव’ – रायन गोजलिंग, ‘ट्रांसपोर्टर’ – जेसन स्टेथम) के सबसे ज्यादा पसंद किए जाने वाले रहस्यमयी लोग होते हैं। मगर उन किरदारों के विपरीत, दिखने में कोई दस-बारह साल का नंदा, कहीं बाहर से नहीं बल्कि अपने घर से ही हिंसक हो जाना शुरू होता है।

गूंगी-बहरी मां के आंचल में सिमट जाने को आतुर रहने वाला प्यारा बेटा, जब देखता है कि बाप उसकी और मां की गैरमाजूदगी में घर दूसरी औरत के साथ था (पहले भी माहौल में ये आधार बन सा चुका होता है) तो उसकी आंखों की पुतलियां और भी फैल जाती है। बड़ी - बड़ी मोटी आंखों से उसके भीतर उफन रहे दावानल का अंदाजा होने लगता है। फिर अगले एक-दो मिनट में कुछ ऐसा होता है कि उसके एक प्रहार से उसका पिता मारा जाता है। मां, अपने चौगुने हो चुके कष्टों पर आंसू बहा भी पाए उससे पहले ही उसे नंदा की आंखों में सदैव कायम रहने वाली हिंसा नजर आती है। वह उससे ज्यादा डर जाती है। उसे लगता है कि इतनी क्रूर नीली आंखें उसके बेटे की तो नहीं हो सकती। ये तो कोई हत्यारा ही है। शायद यहीं पर उसकी ममता जल्दबाजी कर जाती है क्योंकि अगर उस वक्त वह नंदा को फिर से अपनी ममतामयी छाया में लौटा लाती तो शायद अंत उतना बुरा न तैयार हो रहा होता।

असल में भी हिंदुस्तान और तमाम मुल्कों में अपराध के बचपन की यही कहानी होती है। काश! कोई उस वक्त हो जब अपराध का बीज जन्म ले! उस वक्त जब कोई हिंसा का पथ ले! उस वक्त जब कोई सदा के लिए नाशवान राह पर चल पड़े!... उस वक्त कोई हो जो उसे रोक ले। प्यार से, ममता से, धोखे से, छल से, फुसलावे से। बस रोक ले। नंदा की मां (राजश्री) नहीं रोक पाती। इस मां की तरफ से बरती गई यही सबसे बड़ी भूल होती है। दूसरी भूल, जब वह नंदा से मिलने जेल जाती है और वहां भी दुर्योगवश वह (जेल में ये उसकी पहली और आखिरी हिंसा दिखाई जाती है) अपने बेटे को किसी दूसरे लड़के को पीटते हुए पाती है।

वैसे भूल का दूसरा पहलू ये भी है कि नंदा की मां होने के अलावा वह एक गूंगी- बहरी स्त्री भी है, भीतर ही भीतर घुट रही, पति के प्यार से वंचित। वह एक बीवी भी रही, वह एक छोटी सी बच्ची की मां भी है। वह एक ऐसे समाज में भी रहती है जहां रोज दो वक्त का भोजन जुटाने के लिए उसे कितनी मेहनत करनी पड़ती है। वैसे तमिल एक्ट्रेस राजश्री के निभाए इस किरदार और बाला की फिल्म की इस मां के साथ ट्रैजेडी यही है कि उसके मन का दर्द जानने वाले दर्शक न के बराबर होंगे, उनके लिए सरसरी तौर पर फिल्म देखकर समझना ही तुरत-फुरत वाला चारा बचता है।

तो शुरुआत के लिहाज से नंदा हमारी फिल्मी कहानियों के सत्या और शिवा से यूं अलग है। हां, वह मां के प्यार के लिए सदा यूं ही तरसता है जैसे ‘अग्निपथ’ का विजय (अमिताभ या फिर ऋतिक) तरसता रहता है। मैं मानना चाहूंगा कि बाला, 1990 में आई मुकुल आनंद की ‘अग्निपथ’ के पक्के दीवाने रहे होंगे। क्योंकि नंदा और उसकी मां का रिश्ता हूबहू वैसा ही है जैसा मुकुल आनंद की फिल्म में मां सुहासिनी चौहान (रोहिणी हट्टंगडी) और बेटे विजय (अमिताभ) के बीच होता है। सुहासिनी विजय के हिंसक रास्ते से इत्तेफाक नहीं रखती, पर विजय को मांडवा चाहिए। वो मांडवा जहां उसके आदर्शों-सिद्धांतों पर चलने वाले शिक्षक पिता दीनानाथ को चरित्रहीन करार देकर मार डाला जाता है। विजय को गलत होकर उस दुनिया को जीतना है, जो जरूरत के वक्त ‘उसके सही’ का साथ नहीं दे पाई। उसे हर उस पेट्रोल पंप को आग लगा देनी है जहां उसकी या किसी भी मां की आबरू पर हाथ डाला गया।

इन मायनों में नंदा चाहे अलग हो जाता है, अन्यथा वह विजय दीनानाथ चौहान ही है। उसे अपनी मां के हाथ से जिंदगी में बस एक बार दाल-भात खाना है। पुरानी फिल्म में अमिताभ का यादगार खाने की मेज पर मां से बातचीत का दृश्य ले लें, या फिर ऋतिक रोशन करण मल्होत्रा की ‘अग्निपथ’ में ज्यों खाते हैं, नंदा भी यूं ही एक बार मां से झगड़ता है। वह जबरन उसके हाथ में दाल-भात देकर खाने की कोशिश करता है। जाहिर है ये उन दोनों ‘अग्निपथ’ फिल्मों का प्रतिकृति दृश्य है। ये मजबूत विजुअल संवाद हैं। इसी बीच नंदा की कहानी से कहीं न कहीं जुड़ने की कोशिश करती है महेश मांजरेकर की ‘वास्तव’। चूंकि 1999 में ‘वास्तव’ की रिलीज के एक साल बाद ही नंदा भी लगी थी, तो सीधे तौर पर उसे ‘वास्तव’ के ज्यादा करीब ही माना जाता है। समानताएं भी हैं। ‘वास्तव’ और ‘नंदा’ का पटाक्षेप एक सा है। शांता (रीमा लागू) अपने बेटे रघु (संजय दत्त) को आखिर में अपने हाथ से खाना खिला ही देती है, जैसे कि नंदा की मां उसे।

खाना खिलाने वाला ये दृश्य बेहद मार्मिक दृश्य है। बेटे की चाहत पूरी हो रही है। आज मां उसे अपने हाथ से खाना खिला रही है। बरसों बाद अपने हाथ से वह नंदा को पहला कोर दे रही है जबकि वह बौखलाया है, उसके पैर जमीन पर नहीं है, वह खाना खा रहा है, प्यार की भूख तृप्त होगी। मां खिलाती है.. पर ये क्या पहले निवाले को मुंह में लेते ही उसके मन में कुछ चलता है। इतने वक्त और इस निवाले के बीच जो हुआ वह चलता है। विचार करता है, समझ जाता है कि उसकी अपनी मां उसे जहर खिला रही है। मां दूसरा कोर दे रही है और वह फिर भी खा रहा है, रो रहा है, आंखों से आंसू बह रहे हैं। कि, देखो मेरी ही मां मुझे मार देना चाहती है। इस वक्त उसके दिमाग में ये भी चल रहा हो सकता है कि कितना नफरत करती होगी न वो मुझसे। इस वक्त वह ये भी सोच रहा हो सकता है कि जिंदगी भर के हिंसा भरे माहौल और असामान्य जीवन से वह मुझे मुक्ति दे रही है। वह ये भी सोच रहा हो सकता है कि नंदा, खा ले, मां के हाथ का निवाला है, जहर भी हो तो भी खा ले, क्या पता ये फिर मिले न मिले?

इस वक्त नंदा के भीतर जो भी हो रहा होता है, उसकी गूंगी-बहरी और पत्थर हो चुकी मां के भीतर जो भी हो रहा होता है, वह भावनाओं और आंसुओं का परमाणु विस्फोट सा होता है। ऐसा दुख जिसकी कल्पना भी कर पाना असंभव है। आज के असंवेदनशील समाज में तो बिल्कुल ही असंभव। पर बाला ये सब फिल्माकर दिखाते हैं। मैं इस आखिरी सीन को हिंदी सिनेमा के कुछ सबसे बेहतरीन (सिर्फ सिनेमैटिक सुंदरता के लिहाज से नहीं) भावनात्मक कोलाहल वाले पलों के रूप में याद रखूंगा। ऐसे सीन और यहां तक पहुंचने की कहानी की परिणीति हमारी कहानियों में बहुत कम रची गई है।

फिल्म को सबसे अधिक मानवीय और सम्प्रेषक बनाता है लोडुकू पंडी (लंगड़ पांडे) का किरदार। इसे निभाया है करुणास ने। तमिल फिल्मों के हास्य अभिनेता। उनका लंगड़ाकर दौड़ने के अंदाज में चलना और गाने गाना और गोल-गोल घूमना ये सब वो मैनरिज्म हैं जो उनके निर्देशक बाला और उनके इम्प्रोवाइजेशन से निकले लगते हैं। बाला ने तमाम किरादारों के व्यावहारिक लुक के बीच लोडुकू पंडी के किरदार पर भी एक खास रंग-रूप रख छोड़ा है। जैसे उसके सीधे तरफ की कनपट्टी पर एक छोटी सी चोटी लटकी रहती है। ऐसे किरदार इस किस्म की चोटियों के साथ हमारे गांव-देहात में होते हैं। वो ऐसी चोटियां या बाल क्यों रखते हैं इसकी वजह तो नहीं बता सकता है पर फिल्मी भाषा में ऐसे पेंतरे काम करते हैं, उसपर भी अगर बाला जैसा निर्देशक हो और अपने कथ्य को गंभीरता और आसान तरीके से आगे बढ़ाए तो ये पेंतरे या युक्तियां दर्शकों पर अमिट असर छोड़ती है। घर जाने के बाद भी लोग ऐसे किरदार को और उसके लुक को नहीं भूलते। ऐसे लुक और मैनरिज्म (जो मौलिक है) की वजह से ही एक करुणास, दर्शकों के लिए कोई तमिल हास्य अभिनेता नहीं रह जाता है, वह उनके लिए नंदा नाम के एक लड़के का दोस्त लोडुकू पंडी हो जाता है।

यह नंदा का बेहद हंसोड़ और जिंदादिल किस्म का दोस्त है, जिसे चोरी करने की बड़ी अच्छी आदत है। अच्छी यूं कि लोग हंसते हैं, बुरी यूं कि मूलतः वह अपराध करता है। पर इसी बीच मद्देनजर दृश्य वह भी है जहां लोडुकू नंदा और कल्याणी (लैला) के लिए स्टोव पर रोटियां बना रहा होता है। घर ईंटों का है। कोई सुख सुविधा नहीं है। वह बिल्कुल साधारण है। उसकी कोई महत्वाकांक्षा रईस बनने की नहीं है। वह तो बस अपने सुख - सुविधाहीन जीवन में भी किसी न किसी कारण से खुश रहना चाहता है। न वो कभी किसी लड़की पर बुरी नजर डालता है। हर वक्त हंसता रहता है। कल्याणी के धर्मभाई का फर्ज अच्छे से निभाता है। ऐसे में अगर उसकी चोरियां आती हैं, तो वो सच्ची भी लगती हैं और उसके लिहाज से हमें हंसाती हैं। खैर, चोरी तो चोरी है और उसके लिए कानून भी है, लोगों को ही हमेशा चुनना होता है कि वो भावुक होकर उसे चोरी की सजा से बरी करके अपने दिल में जगह देना चाहते हैं कि कानूनी दिमाग से उसे चोर ही मानते हैं, उसके अलावा कुछ नहीं। अभी के लिए तो ये पुख्ता तौर पर कह सकता हूं कि विश्व के किसी भी सिनेमा के दर्शक अंततः भावुक ही होना पसंद करते हैं।
Official poster of Nandha, on it are seen the faces of Rajkiran and Surya.

नंदा पर पेरियावर (राजकिरण) की सरपरस्ती है। वो हिंदी या अमेरिकी फिल्मों की स्वाभाविक बुरे इंसान वाली छवि से बिल्कुल उलट है। वह राजाओं के परिवार से है। शहर की तकरीबन हर सार्वजनिक इस्तेमाल की जगह उसके दादा और पिता की बनाई हुई है। राजपाट चला गया तो सबकुछ सरकारी हक में चला गया। इस जगह में कहने को सरकार का नियम-कायदा चलता है, पर लोगों की असली मदद वही करता है। वह मुखिया है। एक अघोषित कानून (जो गैंगस्टर्स जैसा, या बुरा या मतलबी नहीं है) चलता है। वह स्थिर है। नंदा जब किशोर सुधार गृह से नौजवान बनकर लौटता है तो फिर से सामान्य सामाजिक जीवन में लौटना चाहता है, ताकि उसकी मां उसे स्वीकार कर ले। उसका सबसे प्यारा दोस्त लोडुकू पंडी कहता है कि “यार तू तो पढ़ाई लिखाई में होशियार भी है, आगे पढ़ ले। हम जैसे ही लोगों के बीच से ही निकला था वो, क्या नाम था उसका, मंडेला, उसे भी पढ़ाई ने ही रास्ता दिखाया था”। तो यहां नंदा कॉलेज जाने का मन बनाता है। पर प्रिंसिपल उसके जूवेनाइल होम की पृष्ठभूमि को देखते हुए कहता है कि “कॉलेज में तभी प्रवेश मिल पाएगा जब मुखिया जी कहेंगे”। मुखिया पहली ही नजर में नंदा को देखता है और कहता है “तुम्हें एडमिशन क्यों नहीं मिलेगा। जाओ, मैं तुम्हारे बारे में उनसे बात कर लूंगा”। इस तरह बिना किसी मानसिक भ्रष्टाचार और बुराई के वह नंदा का साथ देता है।

राजकिरण का ये किरदार श्रीलंकाई शरणार्थियों के मुददे पर भी एक पक्ष लेता है। (बाला की फिल्मों में जहां भी श्रीलंकाई तमिलों का जिक्र आता है, वहां वो उनका पक्ष लेते दिखाई देते हैं। इसकी एक बड़ी वजह ये भी है कि जिन दिग्गज सिनेमैटोग्राफर-डायेक्टर बालू महेंद्रा की फिल्मों में असिस्टेंट रहकर बाला ने फिल्मों का अमृत रहस्य जान लिया है, वो बालू श्रीलंकाई मूल के हैं। तो काफी वक्त साथ रहने का ये असर आता ही है।) जब उनकी मदद करने वाला कोई नहीं होता है और सिविल सर्वेंट हाथ पर हाथ धरकर सरकारी मंजूरी का इंतजार कर रहे होते हैं तब तत्क्षण मुखिया, नंदा और कुछ खाली बोट लेकर जाता है और सबको लेकर आता है। वह ट्रांजिट कैंपों में भी निस्वार्थ भाव से मदद करता रहता है। कॉलेज में जब एक लड़की की इज्जत लूटने की कोशिश कर रहा गुंडा लड़की के ही हाथों मारा जाता है तो नंदा उसे सबकी नजरों से बचाता है। लड़की का पिता बेटी को लेकर मुखिया के पास आता है। बेटी पर कोई केस तो नहीं कर देगा, उसने ये हत्या जानबूझकर तो नहीं की है, अपनी रक्षा में की है। ऐसी बातें कहता है। इस पर मुखिया उसके पिता को आश्वस्त करता है कि तुम जाओ तुम्हारी बेटी को कुछ नहीं होगा। जब बाद में नंदा की मां मुखिया के पास आती है और कहती है कि मुझे अपना बेटा बस जिंदा चाहिए, उसने पैदा होने के बाद से कभी कोई सुख नहीं देखा। मैं मेरे लिए नहीं, बस उसके और उसकी होने वाली बीवी के लिए चाहती हूं कि वो जीवित रहे। इन सभी मौकों पर मुखिया अपनी सत्यनिष्ठा को साबित करता है।

मुखिया के रोल में राजकिरण की गंभीर अदाकारी एक समुद्री एंकर का काम करती है। फिल्म के एक सिरे पर वह खड़े रहते हैं, उनके चेहरे पर ही नहीं भीतर भी मुखिया पलता है। जो सिद्धांतवादी है, और सिद्धांतों के लिए, दूसरों की मदद के लिए हिंसा का सहारा लेने से नहीं चूकता। हां, पर हिंसा फिजूल भी नहीं करता। राजकिरण खुद एक उम्दा अभिनेता और फिल्म निर्देशक हैं। तमिल फिल्मों में उनकी अदाकारी वैसी ही है जैसी हिंदी फिल्मों में अपनी चरित्र भूमिकाओं में अमरीश पुरी की होती है। मसलन, ‘विरासत’। मुझे आश्यर्च होता है कि हिंदी फिल्मों ने आज तक कभी उनका इस्तेमाल क्यों नहीं किया है?

बाला अगर अपनी रचनात्मक विस्फोट भरी फिल्म ‘नान कडवल’ (अहम ब्रह्मास्मि) में अघोरी रुद्रां (आर्या) के हाथों अंधी सुरीली भिखारिन हम्सावल्ली (पूजा उमाशंकर) को मानव जीवन से मुक्त करने जैसा विवादित शास्त्ररूप अर्थों वाला फैसला लेते हैं, तो सात-आठ साल पहले ‘नंदा’ में भी ये टिप्पणी नजर आ चुकी होती है। फिल्म का वो आखिरी मौका जब मुखिया और नंदा बातचीत कर रहे हैं, वो एकमात्र मौका जब मुखिया शराब पीकर अपनी नन्ही सी नातिन को अपने पास प्यार से बुलाता है और वो नहीं आती है, वो पहला और आखिरी मौका जब वो नंदा को अपने दर्शन वाला ज्ञान दे रहा होता है, कहता है, “इस धरती पर जब-जब पाप बढ़ेगा, हम और तुम अवतार लेंगे। इसमें कुछ भी बुरा नहीं है। ऊपर से कोई नीचे आता है तो अधर्म का नाश करने के लिए। तू इसीलिए ऊपर से आया है। और चिंता मत कर हर पल मैं तेरे साथ हूं, हमेशा, साए की तरह। समझ गया न”। जाहिर है हिंदी फिल्मों के और दक्षिण भारत की चार-पांच भाषाओं में बनने वाली मनोरंजक फिल्मों के नायक को अघोषित तौर पर अपने बारे में यही लगता है, कि वह ब्रह्म है। कि “यदा-यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत, अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम” भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हीं के लिए गीता के ज्ञान में कहा था। वैसे बाकी फिल्मों में ऐसा विश्लेषण की अनुमानित परतों में ही छिपा होता है (फिल्म समीक्षकों-आलोचकों के खोजने के लिए) कोई हीरो कहता या सोचता नहीं है, पर वह करता सबकुछ इसी आधार पर है। तो ये बाला का तरीका है। धर्म और शास्त्रों को संदर्भ तारीफ और आलोचना के स्वरों में साथ लेकर चलते हुए।

उनकी इस फिल्म में संगीत युवन शंकर राजा ने दिया है। वह दक्षिण भारत के शीर्ष संगीत निर्देशक इल्याराजा के बेटे हैं। फिल्म के शुरुआती हिस्से को उनका पार्श्व संगीत आधार देता है। वह बांसुरी और देसी साजों का सुमधुर इस्तेमाल करते हैं। ये संगीत कुछ वैसे ही साजों वाला है जो हमने ‘मिले सुर मेरा तुम्हारा’ जैसे टीवी विज्ञापनों को सुनते हुए महसूस किया होगा, या आजकल डीडी भारती में टीवी के स्वर्णिम युग के कार्यक्रमों का पुनर्प्रसारण देखते वक्त होता है। मगर फिल्म के आधे हिस्से तक पहुंचते-पहुंचते उनका संगीत जैसे गायब सा हो जाता है, जो गाने इस दौरान आते हैं उनमें से एक भी फिल्म के लिये ज्यादा मददगार नहीं होते। ये भी लगता है कि बाला ने फिल्म की वित्तीय सफलता को ध्यान में रखते हुए ये नाच-गाने डालें हों। फिल्म को समग्र रूप में देखें तो युवन का संगीत कहीं-कहीं उभरकर ढीला पड़ा दिखता है। फिर भी फिल्म को उत्साहजनक शुरुआत देने के लिए और उसका आधार मजबूत करने के लिए उनके बैकग्राउंड म्यूजिक को सराहा जा सकता है।
Surya as Nandha and Laila as Kalyani, a still from the movie.

सूर्या, राजकिरण और करुणास अगर फिल्म में मजबूत पहिए हैं तो मां की भूमिका में राजश्री और कल्याणी बनी लैला के रोल फिल्म की परिभाषा में कहीं जुड़ते नहीं हैं। ये वो किरदार हैं, जिनके भीतर काफी कुछ है, पर सतह (चेहरों पर) पर भावनात्मक स्पष्टता नहीं है। मसलन, नंदा की मां गूंगी और बहरी तो है ही, फिर उसका अपने बेटे से बात नहीं करना और उसका मुंह तक नहीं देखना, दोनों के बीच पूरा संचार तोड़ देता है। इसी वजह से मां के किरदार का कम्युनिकेशन दर्शकों से भी टूट जाता है। ‘वास्तव’ में रीमा लागू इस संचार की अहमियत बताती हैं। संभवतः नंदा की मां जिंदगी से इतनी निराश हैं या इतनी ज्यादा टूट चुकी हैं कि वह मुंह उठाकर यह तक नहीं देखना चाहतीं कि वह जिंदा भी हैं कि खत्म हो गईं। यहीं पर अभिनय करने वाले की दुविधा शुरू होती है। कि वह इस किरदार को आगे कैसे बढ़ाए? ऐसे हालत में जब एक किरदार दब रहा हो तो फ्रेम में आ रहा दूसरा किरदार टेकओवर कर लेता है। जैसे, मां के साथ वाले सीन में नंदा पर सबकी नजर स्वतः ही चली जाती हैं। पटाक्षेप वाले दृश्य में भी जहर खिलाती मां से ज्यादा नजर जानबूझकर जहर खा रहे दयापात्र बेटे पर जाती है। दक्षिण भारत की अब रिटायर हो चुकीं, तब की अच्छी-खासी अभिनेत्री लैला का किरदार चाहे डीग्लैम लुक वाला एक सीधी-सादी श्रीलंकाई रिफ्यूजी लड़की का हो, पर अंततः उनका इस्तेमाल भी वैसा ही होता है जैसा किसी भी कमर्शियल हिंदी-तमिल फिल्म में ग्लैमरस हीरोइन का होता है। पहले ही सीन में जब एक द्वीप पर बड़ी तादाद में श्रीलंकाई रिफ्यूजी मरने के लिए छोड़ दिए जाते हैं, तो वहीं भीड़ में लेटी हुई कल्याणी नजर आती है। बस यही वो मौका होता है जब फिल्म उसके रोल को गरिमा देती है। इसके बाद सबकुछ किसी भी मसाला फिल्म की भांति होता जाता है।

इस फिल्म में भी बाला की सबसे बड़ी खासियत यही रहती है कि (गानों को छोड़कर) एक-एक फ्रेम गंभीरता से फिल्माया और एडिट किया गया है। कहीं पर भी रील का एक हिस्सा भी यूं ही नहीं छोड़ दिया गया है। एक-एक सीन सिनेमैटिक बुखार का फल लगता है। करीने से सजाया हुआ। अपने मुख्य किरदारों के उभार में भी बाला विशेषज्ञ हैं। उनके किरदार जब लड़ते भी हैं तो एक्शन धूसर और असली लगता है, कोई भी सीन केबल स्टंट वाला नहीं लगता। कॉलेज में गुंडे को पीटने वाला सीन अपवाद भी है और इस बात की तस्दीक भी।

नंदा को एक बार जरूर देखना चाहिए। यह ‘वास्तव’ और ‘अग्निपथ’ का निकोलस वाइंडिंग वेफ्न की फिल्म ‘ड्राइव’ जैसा ट्रीटमेंट लगती है। लगे भी क्यों न, ये उन्हीं बाला की फिल्म है, जिन्हें अनुराग कश्यप ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ के शुरुआती क्रेडिट्स में अपनी जड़ों की ओर लौटकर फिल्म बनाने की प्रेरणा देने के लिए खास धन्यवाद कहते हैं।
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गजेंद्र सिंह भाटी

Monday, August 20, 2012

उसने हमें हिम्मती होना सिखाया, पर उसे जिदंगी ने तोड़-मरोड़कर मार दियाः टोनी स्कॉट, अच्छा फिल्मकार, अच्छा इंसान, अलविदा (1944-2012)

लॉस एंजेल्स के ऊंचे पुल से कूदकर जान दे दी अमेरिका के नामी फिल्म डायरेक्टर टोनी स्कॉट ने

Tony made movies like 'The Last Boy Scout', 'True Romance' and 'Spy Game' too.
If you look at my body of work, there's always a dark side to my characters. They've always got a skeleton in the closet, they've always got a subtext. I like that. Whether it's Bruce Willis in Last Boy Scout or Denzel in this. I think fear, and there's two ways of looking at fear. The most frightening thing I do in my life is getting up and shooting movies. Commercials, movies, every morning I'm bolt upright on one hour two hours sleep, before the alarm clock goes off. That's a good thing. That fear motivates me, and I enjoy that fear. I'm perverse in that way. I do other things. I've rock climbed all my life. Whenever I finish a movie, I do multi-day ascents, I got hang on a wall in Yosemite. That fear is tangible. That's black and white. I can make this hold or that hold The other fear is intangible, it's very abstract, and that's more frightening.
Tony Scott, Before the release of ‘The Taking Of Pelham 1 2 3’

दिमाग़ पर अभी-अभी थंडर के देवता थोर का लोहे के पहाड़ सा हथौड़ा गिरा है। ऐसा नहीं हो सकता! इतना बुरा मजाक क्यों? सिनेमा जगत के लिए बड़ी, बहुत बड़ी दुख की ख़बर है। अमेरिका के बेहद प्रतिष्ठित फिल्मकार, जिनकी फिल्में देख-देखकर पूरी पीढ़ी जवान हुई है, वो “टोनी स्कॉट” नहीं रहे। नहीं रहे! कहने का जरा नम्र तरीका है, पर मृत्यु उतनी नम्र नहीं रही, उनके साथ। 68 बरस की उम्र में उन्होंने कैलिफॉर्निया के 6000 से भी ज्यादा फुट ऊंचे विंसेंट थॉमस ब्रिज से कूदकर जान दे दी। कारणों का पता नहीं चला है। पर सोचकर ही पीड़ा होती है कि वो क्या वजहें रही होंगी कि इतने मजबूत और मुश्किलों से जूझते असंभव परिस्थितियों में घिरे होने के बावजूद हर बार जीतकर दिखाने वाले किरदार अपनी फिल्मों में रचने वाले इस उम्दा फिल्मकार को यूं जान देनी पड़ी? ऐसे फिल्मकार को जिनकी फिल्म ‘टॉप गन’ देखकर सुनीता विलियम्स को फाइटर पायलेट बनने का जज्बा मिला, और उसी राह पर आगे बढ़ते हुए आज वह दूसरी बार अंतरिक्ष में हैं। यकीन करने को जी नहीं चाहता कि जिसने अपनी फिल्मों के जरिए लाखों लोगों को प्रेरणा दी, हिम्मती होना सिखाया, जिसकी फिल्में हौसला देती रहेंगी, उसे जिंदगी ने मार दिया। तोड़कर मार दिया (अच्छा हो कि तथ्य कुछ और ही निकलें)।

वैसे तो वह टीवी प्रोग्रैम्स के प्रोडक्शन में भी जुटे हुए थे, पर उनकी आखिरी फिल्म 2010 में आई थी, ‘अनस्टॉपेबल’। फिल्म में फ्रैंक (डेंजल वॉशिंगटन) अपनी हिम्मत और यकीन से, एक ऐसी बेकाबू मालवाहक रेलगाड़ी को रोककर दिखाता है जिसे रोकना लगभग नामुमकिन है। डेंजल वॉशिंगटन ने टोनी की कई दूसरी फिल्मों में ऐसे ही प्रेरणादायक रोल किए हैं। 1995 में आई शानदार फिल्म ‘क्रिमसन टाइड’ एक परमाणु हथियार लदी पनडुब्बी के भीतर दो ऑफिसर्स के बीच हो रही आदेशों को मानने न मानने की नैतिक-सात्यिक लड़ाई बताती है। एक निर्देशक के तौर पर फिल्म को टोनी ने बहुत अच्छे से बढ़ाया था। इसमें डेंजल का किरदार अपने कमांडिंग ऑफिसर (जीन हैकमैन ने निभाया) के सामने निडर होकर खड़ा नजर आता है, जो सेंट्रल बेस से आए संदेशों की गलत गणना करके रूस के विरुद्ध परमाणु हथियार छोड़ने के आदेश दे देता है।

‘द टेकिंग ऑफ फेलम 123’ भी रोमांचक फिल्म थी। टोनी की फिल्म का नायक (डेंजल) यहां न्यू यॉर्क सबवे स्टेशन की ट्रेन को कब्जाए आतंकियों से बंधक-वार्ता करता है, जो उसका काम नहीं है, फिर भी वह दूसरों की जान बचाने के लिए ये काम हाथ में लेता है। डेंजल को लेकर ही टोनी ने ‘देजा वू’ बनाई थी। जिन्होंने गिनी चुनी अंग्रेजी फिल्में भी देखी हैं, उन्होंने ‘देजा वू’ देखी होगी। एक ऑफिसर जो अपनी जान की परवाह किए बगैर एक असंभव कदम के तहत बीत चुके घटनाक्रमों में जाता है और एक लड़की की जान बचाता है। टोनी की 2004 में आई फिल्म ‘मैन ऑन फायर’ की बॉलीवुड रीमेक भी बनी थी अमिताभ बच्चन को लेकर ‘एक अजनबी’, जो बिल्कुल नहीं चली।

ब्रिटिश मूल के टोनी की 1986 में आई अमेरिकी एयरफोर्स की पृष्ठभूमि वाली फिल्म ‘टॉप गन’ (दूसरी फिल्म) ने अमेरिका के युवाओं को दीवाना कर दिया था। इस फिल्म के बाद हर कोई लूटेनेंट पीट मैवरिक (टॉम क्रूज) की तरह कावासाकी निन्जा 800 बाइक चलाना चाहता था, उनकी तरह रेबैन के एविएटर्स पहनना चाहता था, सेना में होते हुए भी हल्का सा बागी होना चाहता था और फाइटर पायलट बनना चाहता था। सुनीता विलियम्स की प्रेरणा की बात तो इस फिल्म के संदर्भ में मैं कर चुका हूं।

उनकी फिल्म ‘बेवरली हिल्स कॉप-2’ में अश्वेत अभिनेता ऐडी मर्फी अपराधियों से लड़ते हैं, उतनी ही मनोरंजनदार ‘द लास्ट बॉय स्काउट’ में डिटेक्टिव ब्रूस विलिस एक लड़की की हत्या की खतरे भरी गुत्थी सुलझाते हैं। ऐसी ही थीम पर बनी ‘एनिमी ऑफ द स्टेट’ में अश्वेत अभिनेता विल स्मिथ सत्ता में बैठे लोगों से और पूरे सिस्टम के संसाधनों से लड़ते हैं। टोनी की ज्यादातर फिल्मों में इंसान हर तरह की लड़ाई लड़ रहा होता है, फिर भी कभी घुटने नहीं टेकता। ‘एनिमी ऑफ द स्टेट’ तो अपने वक्त की बेहद अच्छी फिल्म थी। ऐसे वक्त में जब भारत में यूनीक आइडेंटिफिकेशन नंबर का काम बड़े स्तर पर चल रहा है, कोई 14 बरस पहले बन गई ये फिल्म उसके कई अनचाहे खतरों की तरफ इशारा करती है।

वह ब्रिटिश मूल के दिग्गज अमेरिकी फिल्मकार रिडली स्कॉट के छोटे भाई थे। दोनों भाइयों ने साथ भी काम किया। प्रोड्यूसर-डायरेक्टर की गद्दी आपस में बदली। रिडली स्कॉट की ‘प्रोमेथियस’ हाल ही में रिलीज हुई थी। रिडली वही हैं जिन्होंने 1979 में तब की अद्भुत ‘एलियन’ बनाई थी। बाकी लोग उन्होंने ‘ब्लैक हॉक डाउन’, ‘किंगडम ऑफ हैवन’, ‘ब्लेड रनर’ और ‘ग्लैडियेटर’ के डायरेक्टर के तौर पर जानते होंगे।

अपने पीछे टोनी दो बेटे और वाइफ छोड़ गए हैं। उनकी गाड़ी में पुलिस को सुसाइड नोट मिला है, जिसमें लिखे का खुलासा अभी नहीं किया गया है, पर भला और ड्रमैटिक क्या होगा। ये जरूर है कि खत में लिखे टोनी के शब्दों को जानकर और जान सकते हैं कि आखिर उन्होंने क्यों ऐसा किया होगा? जाने से पहले अपनी अंतिम स्क्रिप्ट में उन्होंने इतने वीर नायक के आत्महत्या करने की क्या वजहें लिखी होंगी? कुछ भी रही हों, मैं किसी भी वजह से संतुष्ट हो जाने या मान जाने को तैयार नहीं हूं ! गुजरे हफ्ते भारत के उल्लेखनीय-शानदार सिनेमैटोग्राफर अशोक मेहता (‘उत्सव’ और ‘बैंडिट क्वीन’ के यादगार चलचित्र दर्ज करने वाले) कैंसर से हार गए, अब टोनी स्कॉट।
Tony Scott and Denzel Washington, 2004, On the set of 'Man on Fire'.  Photo Courtesy: - 20th Century Fox & Regency Enterprises.
आप ससम्मान सराहे जाएंगे टोनी, याद किए जाएंगे, आपकी फिल्मों की रिपीट वैल्यू टीवी पर कभी नहीं घटेगी। वक्त के साथ आपके काम की कदर और बढ़ती जाएगी। अलविदा...
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गजेंद्र सिंह भाटी

Saturday, August 18, 2012

यूं तोड़ें फिल्में गढ़ने का डरावना कोडः भविष्य के सभी भारतीय पीटर जैक्सनों के लिए एक पत्र...

(कॉलम सीरियसली सिनेमा से)

कुछ जज्बेधारी, फिल्मों को एजुकेशनली देखते हैं। मरने से पहले खुद भी एक-दो फिल्म तो बनाकर ही मरना चाहते हैं। पर इनके सपनों और कहानियों का दम ये सोचते ही घुट जाता है कि बनाने के लिए बड़े कैमरे कहां से लाएंगे? सैंकड़ों लोगों की क्रू को महीनों तक कैसे देखेंगे-भालेंगे? प्रॉड्यूसर भला कौन बनेगा? फिर डिस्ट्रीब्यूटर और पब्लिसिटी के लफड़े। मतलब ऐसे प्रोसेस से कैसे पार पाएंगे? ... लेकिन बहुतों ने बहुतेरे तरीकों से फिल्में बनाकर फिल्ममेकिंग प्रोसेस के डरावने कोड को तोड़ा है।

मूलत: डॉक्युमेंट्री बनाने वाले नील माधव पांडा की फिल्म ‘आई एम कलाम’ की बात करते हैं। उन्होंने शूटिंग बीकानेर के भैंरू विलास में की। यहां एक्सीलेंट साज-ओ-सामान और लुक वाली सैंकड़ों हवेलियां हैं। औसत खर्चे में रुककर शूटिंग कर सकते हैं। लोकल आर्टिस्ट, ऊंटगाड़े और उम्दा लोकसंगीत आसानी से मिल जाते हैं। लोकेशन की बात करें तो यहां रेगिस्तानी लैंडस्केप में कैमरा किधर भी पैन करें एक अच्छा खासा शॉट बन जाता है। राजस्थान समेत देश के बाकी दूसरे राज्यों में भी ऐसी जगहें, म्यूजिक और ऑप्शन हैं। मतलब ये कि कम बजट, लोकेशन चुनने की स्मार्ट चॉयस और सिंपल स्टोरीटेलिंग से एक सार्थक और कमर्शियल फिल्म यूं बन जाती है।

अमेरिका में जितनी भी जॉम्बी (मृत दिमाग वाली चलती-फिरती खूनी लाशें) मूवीज बनी हैं उन्हें देखकर लगता है कि करोड़ों के बजट और बड़े स्टूडियोज की बैकिंग के बगैर ऐसी मूवी नहीं बना सकते। मगर मार्क प्राइस ने 2008 में बनाई। 18 महीनों में बनी 'कॉलिन' को मार्क ने स्टैंडर्ड डैफिनिशन वाले पैनासॉनिक मिनी-डीवी कैमकॉर्डर से शूट किया और एडिटिंग अपने होम पीसी पर की। इसके लिए उन्होंने एडोब प्रीमियर सॉफ्टवेयर इस्तेमाल किया। प्रमोशन के लिए उन्होंने फेसबुक और माइस्पेस का सहारा लिया। सृष्टि का न्याय देखिए, 2009 के कान फिल्म फेस्ट में 45 पाउंड की ‘कॉलिन’ की स्क्रीनिंग 750 लाख पाउंड की थ्रीडी फिल्म ‘अप’ के साथ हो रही थी।

फिल्म में दिखने वाले तकरीबन 100 जॉम्बी कैरेक्टर मार्क के दोस्त हैं और उनके हाथों में दिखते हथियार भी सब अपने-अपने घरों से लाए थे। मेकअप और एनिमेशन के लिए उन्होंने बहुत से ऐसे प्रफेशनल्स को मेल और खत भेजे। मार्क ने लिखा था कि फिल्म के लिए वह मेकअप का सामान और इंस्ट्रूमेंट भी नहीं मुहैया करा सकते। आर्टिस्टों को खुद लाना होगा। बस हर एनिमेटर और मेकअप आर्टिस्ट को अपनी मर्जी का जॉम्बी बनाने की छूट होगी। बदले में उन्हें फिल्म क्रेडिट और अपने पोर्टफोलियो में लगाने के लिए फिल्म की फुटेज मिलेगी।

आकांक्षी फिल्ममेकर्स को राह अब भी मुश्किल लगती है तो रामगोपाल वर्मा की 1999 में आई छोटी सी हॉरर मास्टरपीस ‘कौन’ की मिसाल लेते हैं। मनोज वाजपेयी, उर्मिला और सुशांत सिंह.. मोटा-मोटी बस तीन लोगों की कास्ट थी। कोई गाना भी नहीं था। बस अनुराग कश्यप की तरह आप भी अच्छी स्क्रिप्ट लिख लें और रामगोपाल जैसी स्मार्ट निर्देशकीय समझ लेकर चलें। पिछले साल मार्च में रिलीज हुई अपनी तेलुगू फिल्म ‘डोंगाला मुथा’ में भी रामू ने ये प्रयोग किया था। सिर्फ पांच दिनों में सात लोगों की क्रू के साथ उन्होंने फिल्म बनाई और ये बड़ी हिट रही। इसमें कैनन के हैंड हैल्ड कैमरा यूज हुए थे। मतलब ये भी एक फॉर्मेट है।

चिंता अगर लंबे शेड्यूल की है तो वो भी व्यर्थ है। ऋषिकेश मुखर्जी की राजेश खन्ना, अमिताभ बच्चन को लेकर बनाई कल्ट फिल्म ‘आनंद’ महज 20 दिन में शूट हो गई थी। सनी देओल जैसे बड़े स्टार की ‘मोहल्ला 80’ भी दो महीने के सीधे शेड्यूल में शूट हुई है। कारण रहे, स्क्रिप्ट पर अनुशासित मेहनत, सीधी कहानी और चंद्रप्रकाश द्विवेदी के निर्देशन की स्पष्टता। एक बार राजकुमार हीरानी ने कहा था कि उनकी ‘मुन्नाभाई एमबीबीएस’-‘लगे रहो मुन्नाभाई’ फिल्मों में कोई एक्स्ट्रा रील खर्च नहीं हुई थी। राजू अपने सीन्स पर होमवर्क इतना अच्छे से करते हैं कि एक भी ऐसा सीन शूट नहीं करना पड़ता जिसे एडिटिंग में काटना पड़े। तो ये सबक भी है।

पिछले साल सरताज सिंह पन्नू नाम के युवा ने भी 'सोच लो' जैसी अच्छी फिल्म बनाई थी। शूटिंग जैसलमेर की पथरीली सुंदर लैंडस्केप पर की। चूंकि फिल्म बनानी थी और खुद की कोई ट्रेनिंग नहीं थी इसलिए एक चतुराई बरती। एफटीआईआई के ताजा ग्रेजुएट्स, डायरेक्टर ऑफ फोटोग्रफी और टेक्नीशियंस को हायर किया। प्रॉडक्शन के लिए खुद की कंपनी सन इंटरनेशनल बना डाली। सार्थक दास गुप्ता ने अपनी अच्छी भली लाखों की पैकेज वाली कॉरपोरेट जॉब छोड़ दी और 2009 में 'द ग्रेट इंडियन बटरफ्लाई' बनाई। फिल्म की एब्सट्रैक्ट थीम पति-पत्नी के रिश्ते के इर्द-गिर्द घूमती थी। क्रिटीकली बहुत सराही गई। उनकी भी कोई ट्रेनिंग नहीं थी। पर सपना पूरा कर लिया।

एजुकेशनली फिल्में देखने और उन्हें बनाने के सपने पूरे कर डालने में पीटर जैक्सन (बैड टेस्ट), रॉबर्ट रॉड्रिग्स (अल मारियाची) और ओरेन पेली (पैरानॉर्मल एक्टिविटी) जैसे नाम भी आप फॉलो करेंगे तो बहुत प्रोत्साहित होंगे।

Peter Jackson, seen here, did all the mind blowing gory make-up and art-direction himself in BAD TASTE. 

हर अड़चन अनूठेपन और मौलिकता से दूर करें
  • देश के अंदरुनी इलाकों में शानदार लोकेशंस हैं, जो बेहद सस्ती हैं।
  • स्टैंडर्ड डैफिनिशन के मिनी डीवी कैमकॉर्डर से भी शूट कर सकते हैं।
  • लिट्रेचर या लोककथाओं पर आधारित टाइट स्क्रिप्ट रच सकते हैं। स्क्रिप्ट मजबूत है तो मतलब आधी फिल्म बन गई।
  • म्यूजिक के लिए एमेच्योर बैंड्स या लोक संगीत-गायकों की मदद लें।
  • एफटीआईआई-एनएसडी जैसे संस्थानों के स्टूडेंट्स से मदद ले सकते हैं। अपने दोस्तों या आसपास के जानकार लोगों से एक्टिंग करवा सकते हैं। ईरानी फिल्मों में गैर-पैशेवर एक्टर्स बहुत सफलता से फिट होते हैं।
  • फिल्म का प्रचार करने के लिए सोशल नेटवर्किंग साइट्स का सहारा ले सकते हैं। कई वेब पोर्टल तो पूरी तरह नए युवा फिल्मकारों को प्रमोट करने के जज्बे के साथ ही निशुल्क काम कर रहे हैं, उनसे संपर्क किया जा सकता है। मुख्यधारा के हिंदी और अंग्रेजी अखबारों में भी सिनेमा की बेहतरी और युवा फिल्मकारों की सहायता को आतुर पत्रकार हैं। उनके ब्लॉग, पर्सनल साइट, मेल पर संपर्क कर सकते हैं। मदद मिलेगी ही।
  • बाहर दर्जनों नामी फिल्म फेस्ट होते हैं, वहां अपनी फिल्म की डीवीडी मेल कर सकते हैं, उनसे संपर्क कर सकते हैं, जा सकते हैं। वहां सराहा जाने पर आत्मविश्वास दस-बीस गुना बढ़ जाता है।
अगर फिल्म मनोरंजन के पैमानों पर खरी उतरती है तो वितरकों और बड़े प्रॉड्यूसर्स से संपर्क कर सकते हैं। जैसे लॉर्ड ऑफ द रिंग्स फेम डायरेक्टर पीटर जैक्सन ने अपनी पहली (दोस्तों के साथ ऐसे ही जज्बे के साथ बिना संसाधनों और ट्रेनिंग के बनाई) ही फिल्म बैड टेस्ट (1987) बनाकर किया था। शॉर्ट फिल्म से 90 मिनट की फिल्म में तब्दील होने के बाद इसे न्यूजीलैंड के फिल्म कमीशन की वित्तीय मदद भी मिली। अंततः कान फिल्म समारोह में नजरों में चढ़ी ये फिल्म 12 मुल्कों में प्रदर्शन के लिए खरीद ली गई। 
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गजेंद्र सिंह भाटी

Saturday, August 4, 2012

क्यों सनी, पूजा और महेश भट्ट हमें उत्प्रेरित नहीं कर पाते!

फिल्म: जिस्म-2
निर्देशक: पूजा भट्ट
कास्ट: रणदीप हुड्डा, सनी लियोनी, अरुणोदय सिंह
स्टार: एक, 1.0
आगे कहानी के कुछ अंश का खुलासा भी है, ये ध्यान रखते हुए ही पढ़ें...
सेंसर और बाकी कैंचियों के बाद ‘जिस्म-2’ की विषय-वस्तु उतनी वयस्क नहीं रह गई है, जितनी किसी को उम्मीद हो सकती है। फिल्म में एक भी असहज करने वाला या रौंगटे खड़े करने वाला या यौन सुख देने वाला दृश्य नहीं है। हिसाब से ‘ए’ सर्टिफिकेट भी नहीं बनता... अगर मां-बहन की दो गालियों, मुख्य दृश्यों में सनी के अल्प वस्त्रों, पांच-छह स्मूच और नग्न पीठ पर तेल मसाज करने के एक दृश्य को छोड़ दें तो। अब फिल्म में एडल्ट भाव इतना ही रह जाता है कि सनी लियोनी नाम की इंडो-कैनेडियन पॉर्नस्टार एक हिंदी फिल्म में पहली बार नजर आ रही हैं (हालांकि दर्शकों को ये भूलकर सनी को वैसे ही देखना चाहिए जैसे उन्होंने ‘जन्नत-2’ में ईशा गुप्ता का या फिर ‘रॉकस्टार’ में नरगिस फाकरी को देखा था)। और यही भाव स्क्रिप्ट राइटर महेश भट्ट और निर्देशक पूजा भट्ट के लिए ‘जिस्म-2’ को बनाने का सबसे बड़ा उत्प्रेरक रहा। उन्हें लोगों की नसों में भी बस यही उत्प्रेरक भरकर काम चलाना था।

मगर हम उत्प्रेरित नहीं हुए। इसी जिस्मानी विषय वस्तु से चल रहा भट्ट निर्माण उद्योग ‘जिस्म-2’ को ‘जन्नत-2’, ‘राज’ और ‘मर्डर-2’ जितना अच्छा भी नहीं बना पाता। सिंगल स्क्रीन के दर्शकों को भी खुश नहीं कर पाया। दर्शक देखते हुए अपनी सीट पर ऊंघने लगते हैं, या फिर वो सनी की डबिंग, आंहों, कपड़ों और किसिंग दृश्यों की मजाक उड़ाते हैं। जाहिर है फिल्म एंगेज कर पाती तो दर्शक पूरे अनुशासन के साथ देखते। महज चार कलाकारों (सनी, अरुणोदय, रणदीप, आरिफ जकारिया) और एक आलीशान फार्महाउस की लोकेशन के भरोसे एक महात्वाकांक्षी कहानी को खींचने की कोशिश की जाती है। इसके अलावा फिल्म को जिन तत्वों का सहारा होता है वो हैं सनी लियोनी की देह, महेश भट्ट की लिखी कहानी और स्क्रिप्ट, शगुफ्ता रफीक के काव्यात्मक संवाद और यंग म्यूजिक डायरेक्टर अर्को मुखर्जी के गाने। अफसोस ये सब बैल बनकर भी फिल्म को खींच नहीं पाते। खैर, इन पर जाने से पहले आते हैं कहानी पर।

इज्ना (सनी) के पास इंटेलिजेंस ऑफिसर अयान (अरुणोदय) और उसके सीनियर गुरु (आरिफ जकारिया) मदद के लिए आते हैं। वह कबीर (रणदीप हुड्डा) नाम के बड़े अपराधी को पकडऩा चाहते हैं। उनके मुताबिक कबीर पहले उन्हीं के साथ काम करता था पर अब एक दुर्दांत हत्यारा बन चुका है और उसका नेटवर्क देश के लिए बहुत बड़ा खतरा है। वह इज्ना के पास इसलिए आए हैं क्योंकि एक वही है जो कबीर के सबसे करीब पहुंच सकती है और उसकी हार्ड ड्राइव में बंद गुप्त जानकारियां ला सकती है। क्योंकि एक वक्त (पांच-छह साल पहले) में इज्ना और कबीर एक-दूसरे के बेपनाह प्यार करते थे। इज्ना और अयान के बीच भी कुछ-कुछ प्यार जैसा है ये कहानी में महसूस होने लगता है। इज्ना इस मिशन का हिस्सा इसलिए नहीं बनना चाहती क्योंकि वह कबीर को बड़ी मुश्किल से भुला पाई है (जो बिना बताए एक रात उसे छोड़कर चला गया), दूसरा वो बहुत बड़ा हत्यारा है। खैर, वह मिशन का हिस्सा बनती है और कबीर के करीब जाती है। लेकिन यहीं से उलझने और प्यार की धक्का-मुक्की चालू हो जाती है। कबीर नहीं चाहता कि उसकी वजह से इज्ना को कोई तकलीफ हो और जिस जिंदगी को वह अभी जी रहा है उसमें इज्ना को सिर्फ दुख ही मिलेगा। कहानी में बस यही कहानी है। आखिर में जो जैसा है वो वैसा नहीं निकलता ये एक सरप्राइज करने वाली चीज है, पर इसे असरदार तरीके से प्रस्तुत नहीं किया जाता।

बात कलाकारों की। कहानी में अरुणोदय इंटेलिजेंस ऑफिसर बने हैं पर उनके हाव-भाव वैसे नहीं हैं। वह ज्यादा से ज्यादा इतना कर पाते हैं कि बीच-बीच में आरिफ जकारिया को सर (यस सर) कहते हुए सावधान की मुद्रा में खड़े हो जाते हैं। या फिर रोने लगते हैं, या फिर चिल्लाने लगते हैं, या फिर सहनशीलता की प्रतिमूर्ति बनकर सबकुछ सहन करते रहते हैं। अरुणोदय की जबान बहुत साफ है। अंग्रेजी का एक्सेंट भी और खालिस हिंदी-उर्दू जबान भी। पर किरदार में ब्यौरे और बारीकियों की काफी कमी है। उन्हें अपने किरदार की पृष्ठभूमि और अनोखे हावभाव की अध्ययन करना चाहिए था। अरुणोदय ने अयान के किरदार को अपनी तरफ से कुछ नहीं दिया है, बस उसे औसत बनाकर छोड़ दिया है, जो हिंदी सिनेमा की डिजिटल रीलों में कहीं न कहीं दबा रह जाएगा।

सनी लियोनी ने जिंदगी भर महज एक इमोशन देते हुए तमाम फिल्में की हैं। ऊंची-ऊंची गर्म आंहें। यहां भी पहले सीन से लेकर आखिर तक वह बस सांसों से ही एक्सप्रेशन देती हैं। पहले सीन में जब आरिफ और अरुणोदय के किरदार उनसे कबीर के बारे में बातें कर रहे होते हैं, तो तकरीबन पांच-छह मिनट से भी लंबे इस सीन में सनी असमंजस भरे चेहरे के साथ लंबी-लंबी सांसें लेती रहती हैं और बिखरे हाव-भाव दिखाती रहती हैं। उनका वॉयसओवर जिसने भी किया है, उसी अनुशासन से किया है जैसे कटरीना कैफ या नरगिस फाकरी का किया जाता रहा है। स्वर में कोई भाव नहीं निकलता। सबकुछ सपाट है।

रणदीप हुड्डा को आने वाले वक्त में बहुत फिल्में मिलने वाली हैं। क्योंकि उन्हें लगातार गंभीर, शारीरिक तौर पर हीरोइक से लगने वाले और एंग्री एटिट्यूड वाले रोल मिल रहे हैं। ‘रिस्क’, ‘जन्नत-2’, ‘साहिब बीवी और गैंगस्टर’ और ‘जिस्म-2’ के उदाहरण सामने हैं। वह कैजुअल टी-शर्ट पहनते हैं, जिसमें उनका चौड़ा ग्रीक देवताओं जैसा सीना और इमपरफेक्शन वाले परफेक्ट डोले दिखते रहते हैं। उनकी हल्की दाढ़ी-मूछें और साइड से खाली गाल और सिर पर कम बाल उन्हें रफ लुक देते हैं। मगर इस फिल्म के लिए उन्हें न जाने क्या ब्रीफ किया गया था कि सबकुछ व्यर्थ जाता है। फिल्म में उनके रोल को सहारा देने वाले कोई तथ्य और घटनाएं ही नहीं हैं।
इज्ना से उनके प्यार की मन में जो भी भावनाएं हैं, लोगों को नहीं पता चल पाती क्योंकि सबकुछ एब्सट्रैक्ट लगता है। जब इज्ना उनका दरवाजा खटखटाती है तो (दोनों छह-सात साल बाद एक-दूजे को देख रहे हैं) एक पल देखे बगैर वह मुंह पर दरवाजा बंद कर देते हैं। क्लाइमैक्स में उन्हें उनकी किताबों (नोम चोमस्की) वाली विचारधारा का दिखाया जाता है, पर जिसे देश और देश के असली दुश्मन अफसरों के खात्मे की इतनी चिंता है उसके रहने का मिजाज समझ नहीं आता। एक आलीशान फार्महाउस में कबीर रह रहा है, स्विट्जरलैंड में उसके अकाउंट में कभी न खत्म होने वाला पैसा है, वह हथियार बनाने वाली लॉबी से भिड़ रहा है पर फार्महाउस का इंटीरियर खास डिजाइन किया गया है। इसके एक विहंगम नीले रंग वाले अनोखे रोशनीदार कमरे में बैठकर वह सूफी अंदाज में डबल बास बजाते रहते हैं, दूसरे कमरे के इंटीरियर में लाल रंग प्रॉमिनेंट है। मुझे नहीं पता था कि देश के दुश्मनों से लडऩा और सिस्टम के खिलाफ क्रांति का बिुगल बजाना इतना वैभव भरा भी हो सकता है। जब ऐसी खामियां उभरती हैं तो तथाकथित एडल्ट ड्रामा मूवी बनाने की फिल्मकारों की मंशा पर संदेह होता है।

महेश भट्ट ने ‘जिस्म-2’ को ‘लास्ट टैंगो इन पैरिस’ का इंडियन जवाब बताया था। मगर न जाने उन्होंने कैसे मर्लन ब्रांडो और मारिया श्नाइडर के अभिनय की बराबरी रणदीप और सनी से कर दी। बड़बोलेपन से बड़ी फिल्में नहीं बनती, कथ्यात्मक और सिनेमैटिक होने से बनती हैं। उनकी स्क्रिप्ट में कुछ भी नहीं है। किरदारों के उठाव और ब्यौरे पर काम करने की बजाय उन्होंने बस इधर-उधर इम्प्रेस करने की कोशिश की है। जैसे, रणदीप का गुरुदत्त के जमाने का एक ब्लैक एंड वाइट गाना बजाना, या फिर अरुणोदय का सनी के किरदार को बारबरा टेलर ब्रेडफोर्ड का नॉवेल ‘प्लेइंग द गेम’ देना। जाहिर है इन दो-तीन तितरे-बितरे इनपुट से कोई मूवी कल्ट नहीं हो जाती।

व्यावहारिक तौर पर भी ये मूर्खतापूर्ण लगता है कि इतनी रेंज की बातें (वॉर लॉबी, विरोध, सिस्टम के खिलाफ व्यक्तिगत जंग, प्यार, जिस्म, जासूसी, लैपटॉप में बंद इनफॉर्मेशन, पॉर्नमूवीस्टार और भी बहुत कुछ) की जाती है, पर फिल्म सिर्फ एक फार्महाउस में पूरी कर ली जाती है। कबीर के इज्ना को छोड़कर जाने के बाद छह-सात साल उसने क्या किया? कैसे लड़ाई लड़ी? कैसे साथी बनाए? किस-किस को मारा? इज्ना को कितना याद रखा-कितना नहीं? उसका मकसद क्या है? उसने जुटाई इनफॉर्मेशन किसे सौंपने का प्लैन बनाया है? और ये फार्महाउस कहां से पाया है?... ये डीटेलिंग कहां है? महेश हमें किसी भी किरदार की कोई आदत नहीं बताते। कमजोरी नहीं बताते। हां, इतना कि अरुणोदय का किरदार इज्ना को चाहता है पर कह नहीं पाता, वह अपने गुरु का विरोध नहीं कर पाता। शुरू में इतना भरोसा करता है कि इज्ना को कबीर के करीब जाने को मनाता है पर फिर शक करने लगता है। हां, ऐसा असल जिंदगी में होता है, पर तर्क कहां है? सबकुछ एब्स्ट्रैक्ट क्यों है?

अगर महेश की नजर में ये सब ‘लास्ट टैंगों इन पैरिस’ की बराबरी है तो, ऐसा नहीं है। बस उन्होंने स्क्रिप्ट में कुछ समानताएं देखकर ये बात की है। मसलन, लंबे वक्त बात दो लोगों का फिर से मिलना और कैजुअल से-क्-स करना, फिर किसी का किसी को मार देना। जाहिर है ये वो महेश भट्ट नहीं हैं जिन्होंने ‘जख्म’ या ‘दुश्मन’ जैसी फिल्में (‘सारांश’ और ‘अर्थ’ का नाम तो ले ही नहीं रहा) लिखी थीं।

इतने के बाद एक दृश्य का जिक्र करना चाहूंगा जो शायद फिल्म में महेश ने इरादतन नहीं रखा हो पर इस तरीके से भी देखा जा सकता है...
रणदीप के एंट्री सीन में होटल के ऊपर से पटाखे (रॉकेट) आसमान में जा रहे हैं रोशनियां बिखेरते हुए फूट रहे हैं। पृष्ठभूमि में आवाज आ रही है रेगिस्तान में मंडराती चील सी। चीं... चीं...। कमतरी से ही सही इस आवाज का यहां अच्छा असर होता है। कबीर के बारे में अब तक फिल्म में एक बड़ा हत्यारा (पॉलिटिकल किलर) होने की हवा बनाई गई है, उसे कुछ-कुछ रहस्यमयी बताया गया है। इर्द-गिर्द भय का जो आवरण बनाना था उसमें ये चीं चीं वाली चील की आवाज असरदार और सांकेतिक लगती है। मगर तब तक फिल्म फ्लैशबैक में जा चुकी होती है जहां वह एक ईमानदार ऑफिसर हुआ करता था।

अब शगुफ्ता रफीक के डायलॉग। वह बहुत काव्यात्मक लिखती हैं। उनकी बातें ज्यादा ही कवियों-शायरों जैसी है। जाहिर है जब किरदार अपने मॉडर्न मुंह से ऐसे चालीस साल पुराने मुशायरों-बैठकों वाले एहसास की बातें बोलते हैं तो कुछ बेमेल सा लगता है। कुछ अतार्किक और संप्रेषणहीन लगता है। हालांकि चार-पांच डायलॉग ऐसे हैं जिनकी तारीफ कर सकते हैं।
मसलन, जब कबीर के लिए इज्ना खून से लिखा खत और गुलदस्ता लेकर आती है। खत पढ़ते हुए कबीर कहता है, ये क्या है? तुमने ऐसा क्यों किया? तो इज्ना कहती है...
सिर्फ एक ही शिकायत है अपने खून से,
कि ये मेरे एहसास जितना गहरा नहीं है...

इन्हीं के बीच बात आगे बढ़ती है... तो एक कहता है
ये इश्क नहीं पागलपन है
जवाब आता है,
जो पागल न कर दे वो इश्क ही क्या

एक सीन में कबीर ब्लैक एंड वाइट जमाने का एक गाना बजा रहा होता है तो इज्ना चौंकती है...
तो कबीर कहता है
पुराने गाने अच्छे लगते हैं मुझे,
हम सब अपना चलता-फिरता अतीत ही तो हैं...

एक मौके पर कबीर कहता है,
मौसम गुजर जाते हैं याद नहीं गुजरती

शुरू में अपनी प्रेम कहानी का जिक्र करते हुए इज्ना कहती है,
और एक दिन वो चला ही गया
छोड़ गया अपनी खुशबू
मेरे तन पे, मेरे कपड़ों पे

कुछ संवाद ऐसे भी हैं जो सैंकड़ों बार सुने-सुनाए जा चुके हैं, मसलन
और भी गम है जमाने में मोहब्बत से सिवा

फिल्म में सिर्फ म्यूजिक ऐसी चीज है जिसे आलोचना के दायरे से बाहर रखा जा सकता है। इस फिल्म को नए लड़के अर्को मुखर्जी (इनके नाम के आगे डॉ. की उपाधि भी लगी है) के कंपोज किए गाने ही संभालते हैं। ‘इश्क भी किया रे मौला…’ मजबूत गाना है, रसभरा है, इमोशन भरा है। इसके साथ ‘ये जिस्म है तो क्या’ भी पाकिस्तानी गायक अली अजमत ने गाया है। ‘ये कसूर मेरा है कि यकीन किया है, दिल तेरी ही खातिर रख छोड़ दिया है’ सोनू कक्कड़ ने गाया है। उनकी आवाज सपाट नहीं है, कई लहरों-परतों वाली है, इतनी कि सनी को गाने के वक्त खूबसूरत बनाती है। जब गाना शुरू होता है तो आप पहचानने की कोशिश करते हो कि ये कौन सी सिंगर है, पहले इसे कभी नहीं सुना।

पूजा भट्ट के निर्देशन में ही ऊपर के सारे तत्व कहीं न कहीं मिल जाते हैं। यानी अगर कहीं कुछ कसर रही तो जिम्मेदारी उन्हीं की बनती है। जैसे समझने के लिए, अगर मणिरत्नम या सुधीर मिश्रा अरुणोदय और सनी को लेकर कोई फिल्म बनाते तो दोनों एक्टर्स की लाइफ का बेस्ट काम होता। जैसे अगर इसी कहानी पर तिग्मांशु धूलिया फिल्म का निर्देशन करते तो स्वरूप ही कुछ और होता, जैसा ‘साहिब बीवी और गैंगस्टर’ का था। क्योंकि तिग्मांशु की उस फिल्म में भी कोई बड़े एक्टर नहीं थे, उसे भी खींचा तो बस तिग्मांशु की स्क्रिप्ट ने, डायलॉग ने और उनके निर्देशन ने। इसी लिहाज से पूजा बुरी निर्देशक साबित होती है।
उनकी नजरों से बची दो खामियां देखिए...
  • मौला... गाने में रणदीप की लिप सिंक। पहली लाइन गाने की वह सही से लिप सिंक करते हैं.. दूसरी लाइन में उनके होठ नहीं हिलते और कहीं से गाना बजता रहता है, तीसरी लाइन में फिर से रणदीप लिप सिंक करने लगते हैं। गाना खत्म होने तक ये गलती चलती रहती है। कभी लगता है हीरो गाना गा रहा है, कभी लगता है कि कहीं बज रहा है।
  • एक सीन में रणदीप घर का ताला खोलने के लिए चाबी का गुच्छा निकालते ही हैं कि सीढिय़ों के नीचे खड़ी सनी आहट देती है... वह रिवॉल्वर निकाल लेता है... फिर उससे बात करता है, वह कहती है यहीं बात करोगे.. तो वह अंदर आने के लिए कहते हुए दरवाजे को धक्का देता है.... यानी पता नहीं चल पाता कि ताला कब खुला। क्योंकि सीन तो बिना टूटे चल रहा है।
 हिंदी सिनेमा की हाल ही में आई बहुत सी दूसरी बचकानी फिल्मों में से एक ‘जिस्म-2’ भी रही है। अगर फिल्म में सनी लियोनी नहीं भी होती तो भी ये उतनी ही बुरी होती।
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गजेंद्र सिंह भाटी