Monday, May 21, 2012

संजय लीला भंसाली तो मुझसे भी ज्यादा कमर्शियल हैं, राउडी राठौड़ का टाइटल भी उन्होंने ही दिया थाः प्रभुदेवा

बातचीत  1 जून को रिलीज होने जा रही फिल्म के निर्देशक और मशहूर डांसर प्रभुदेवा से

 ‘सांवरिया’ और ‘गुजारिश’ के फ्लॉप होने के बाद संजय लीला भंसाली ने अपने असिस्टेंट राघव धर की कहानी ‘माई फ्रेंड पिंटो’ के निर्माण में पैसे लगाए। इस उम्मीद पर कि प्रतीक बब्बर और कल्कि कोचलिन को लेकर बनाई गोवन लिंगो वाली ये चैपलिनछाप कॉमेडी लोगों को पसंद आएगी और उनकी डूबत उबर जाएगी। पर फिल्म नहीं चली। इस दौरान प्रभुदेवा की बतौर निर्देशक हिंदी फिल्मों में या मुंबई के सिनेमा में ‘वॉन्टेड’ वाली करारी पहचान बन चुकी थी। कि... भई ये ऐसा निर्देशक है जो दक्षिण की ग्लैमराइज्ड-स्टायलाइज्ड मारधाड़ को भावनात्मक तार्किकता का जामा पहनाकर लोगों को थियेटर तक लाना जानता है। जो मुहावरा गढ़ने का अंदाज भारतीय सिनेमा में शुरू से रहा है, वह प्रभुदेवा कर पाते हैं। ‘दबंग’ बनाने वाले अभिनव की माफिक।

तो ‘खामोशी’, ‘ब्लैक’, ‘हम दिल दे चुके सनम’, ‘सांवरिया’ और ‘गुजारिश’ जैसी फिल्मों से कुछ-कुछ ऑटर थ्योरी में घुसते फिल्मकार संजय लीला भंसाली ने तब छुआ मारक वित्तअस्त्र ‘विक्रमारकुडू’। तेलुगू की इस सुपरहिट फिल्म को हिंदी में बनाने का जिम्मा उन्होंने दिया प्रभुदेवा को। नतीजा हाजिर है। ‘राउडी राठौड़’। कहानी वही है विक्रम राठौड़ वाली। जाहिर है।

अंदरूनी भारत में जो लोग 1993 के बाद एटीएन, डीडीवन और जी के म्यूजिक चैनल देखते हुए और ऑल इंडिया रेडियो सुनते हुए बड़े हुए हैं, उनके लिए प्रभुदेवा एक डायरेक्टर नहीं हैं। उनके लिए वह एक ऐसी छवि है जो ‘हम से है मुकाबला’ के एक गाने में ‘मुक्काला मुकाबला ओ हो होगा... ओ हो लैला...’ गा रहा होता है और गाने के आखिर में काऊबॉय अंदाज में पिस्टल की गोलियां चलती हैं और उस नृतक का सिर, कलाइयां और टखने गायब हो जाते हैं। उसके बाद भी वह पुतला नाचता रहता है। हमारे लिए प्रभुदेवा नाम का वह नृत्य निर्देशक और नृतक ‘उर्वशी-उर्वशी’ और ‘पट्टी रैप’ के अपरिमेय नृत्य के बाद इंडिया का माइकल जैक्सन हो गया था। ये मौका उन्हीं अपरिमेय से बात करने का था।

उनके नृत्य की तरह उनकी विनम्रता भी अपरिमेय सी है। ये इसी का एक और सबूत था कि सफल अभिनेता, निर्देशक और नृत्य निर्देशक होने के बावजूद अक्षय कुमार से जुड़ी हर बात में वह उन्हें अक्षय सर कहकर संबोधित करते हैं, जबकि उनका सफल करियर अक्षय से पहले ही शुरू हो गया था। पूछने पर तुरंत कहते हैं, “उनकी जगह कोई इंडस्ट्री में पांच साल पुराना भी होता तो उसे भी मैं सर ही कहता”। पूरी बातचीत में उनके जवाब यूं ही छोटे-छोटे रहते हैं। कुर्सी पर बैठते ही उन्होंने तुरंत एक के बाद एक, दो-तीन सैंडविच जल्दी-जल्दी खा लिए। किसी आम भूखे इंसान की तरह। उनके कपड़े भी वैसे ही होते हैं। तभी उनकी फिल्में भी आम इंसानों को सबसे ज्यादा लुभाती हैं। ये सब देखकर बहुत खुशी होती है।

आमतौर पर जो अभिनेता फिल्म निर्देशन (मसलन, अनुपम खेर और नसीरुद्दीन शाह) में उतरते हैं वो उससे तौबा कर लेते हैं, लेकिन प्रभु अलग मिट्टी के बने हैं। “मुझे डायरेक्शन पसंद है। इसमें टेंशन और क्रिेएटिविटी बहुत होती है, जो मुझे बहुत पसंद है”, वह कहते हैं। फिल्म के हिट होने की लालसा पर भी उनका जवाब बड़ा सीधा-सादा होता है। कहते हैं, “मैं भी नॉर्मल इंसान हूं। बाकी डायरेक्टर्स की तरह चाहता हूं कि मेरी फिल्म भी हिट हो। बस”। वह हम जैसे ही सीधे बंदे हैं और संजय लीला भंसाली सौंदर्य और सनक को लेकर अलग ही सेंस रखने वाले। संजय अपनी फिल्म को लेकर बेहद अधिकारात्मक हो जाते हैं। मगर प्रभु इस बात को झुठलाते हैं। वह कहते हैं, “पता नहीं लोगों ने उनके बारे में अलग धारणा बना रखी है, मुझे भी कहा कि वह अलग टाइप के इंसान हैं। पर ऐसा मुझे तो नहीं लगा। हकीकत में तो निर्माता होते हुए भी वह राउडी राठौड़ के सेट्स पर सिर्फ एक बार आए थे और वह भी बस आधे घंटे के लिए”। अब बात आती है, उनके घोर कमर्शियल और संजय के नॉन-कमर्शियल और ज्यादा ही आर्टिस्टिक मिजाज वाला होने के बीच। ऐसे में एक फिल्म क्या खिंचती नहीं रहती? इसके जवाब में वह कहते हैं, “संजय सर तो मुझसे भी ज्यादा कमर्शियल हैं। फिल्म को राउडी राठौड़ जैसा टाइटल भी उन्होंने ही दिया था”।

उन्हें देखते हुए लगता नहीं पर वह मानते हैं और मुझे आश्चर्य होता है कि तेलुगू और तमिल में बन रहे एक्सपेरिमेंटल सिनेमा पर भी वह नजर रखते हैं। चाहे वह नए फिल्मकार थियागराजन कुमारराजा की बनाई कमाल तमिल एक्शन फिल्म ‘अरण्य कांडम’ हो या फिर रामगोपाल वर्मा की कैनन के 5डी कैमरा से महज पांच दिन में बनी तेलुगू फिल्म ‘डोंगाला मुथा’ (वैसे डोंगाला मुथा का जिक्र आया है तो बता दूं कि इस फिल्म के मुख्य अभिनेता भी रवि तेजा ही हैं, वही रवि तेजा जिन्होंने ‘राउडी राठौड़’ की मूल फिल्म ‘विक्रमारकुडू’ में एसीपी विक्रम राठौड़ की भूमिका बेहतरीन तरीके से निभाई थी)। तो इस जिक्र पर प्रभु संक्षेप में कहते हैं कि हां, मैं ये सब देखता हूं। बड़ी अच्छी बात है कि नया काम हो रहा है, जो सिनेमा में नई चीजें लेकर आएगा।

मेरी रुचि प्रभुदेवा के बचपन और डांस की तरह झुकाव को जानने की होती है और वह बताते हैं, “पढ़ाई में अच्छा नहीं था। करियर का कुछ और ऑप्शन भी नहीं था। चूंकि मैं डांस को लेकर पागल था तो पिताजी से बोला। वो इंडस्ट्री में थे। उन्होंने पूछा क्या करना है तो मैंने बताया और मूवीज में आ गया”। प्रभु के पिता मुगुर सुंदर भी साउथ इंडियन फिल्मों के नामी कोरियोग्राफर रहे हैं। उनके भाई भी कोरियोग्राफर हैं।

‘राउडी राठौड़’ का निर्देशन करने के अलावा प्रभु, रैमो डिसूजा की फिल्म ‘एबीसीडी (एनी बडी कैन डांस)’ में भी अभिनय और डांस करते नजर आएंगे। रैमो की पिछली फिल्म ‘फालतू’ थी। ‘एबीसीडी’ में इंडिया के नामी नृतकों के साथ अमेरिका के डांस रिएलिटी शो की एक प्रतिस्पर्धी भी होंगी। प्रभुदेवा की बतौर डांसर वापसी कराने वाली ये फिल्म संभवत ‘स्टेप अप’ और ‘टेक द लीड’ की तर्ज पर होगी। खैर, बातों का यहीं अंत होता है। फिर कभी उनके अंतर्मुखी से बहुर्मुखी हो जाने और खूब लंबी गहरी बातें करने की उम्मीदों के साथ।

प्रभु से कुछौर प्रश्नोत्तर...
  • सर्वोत्तम नृत्य निर्देशन वाले गाने?
(गाना याद नहीं आता तो ट्यून गुनगुनाकर पूछते हैं कि ये कौन से गाने हैं, हिंट देता हूं और...) ‘डोला रे डोला रे’ (देवदास) और 'आज फिर जीने की तमन्ना है’ (गाइड)।

  • बॉलीवुड और टॉलीवुड को कैसे देखते हैं?
पहली काम करने के लिए मजेदार जगह है और दूसरी मेरा घर, जिसने मुझे बनाया।

  • कोई अगर पूछे कि आपकी फिल्म क्यों देखे तो?
क्योंकि इसमें अक्षय सर की एनर्जी है, गन्स है और फाइटिंग है। क्योंकि यह 'दबंग' के बाद सोनाक्षी सिन्हा की दूसरी फिल्म है। क्योंकि इसमें उन दोनों की कैमिस्ट्री बहुत कमाल की है। क्योंकि 'राउडी राठौड़' में मैं हूं।

  • कोरियाग्राफी अपने पिता से सीखी या खुद ही सीखे?
मैंने पिताजी के साथ काम किया। कुछ इसका भी फर्क पड़ा। दूसरा मैं उस इंडस्ट्री को अच्छे से जानता था। पर बाद में अच्छे से कोरियोग्राफी सीखी भी थी।

  • हिंदी फिल्मों के तीन सबसे बढ़िया डांसर, आपकी नजर में?
ऋतिक रौशन, माधुरी दीक्षित और श्रीदेवी मैम।

  • ‘वॉन्टेड’ के बाद सलमान खान के साथ काम नहीं किया?
मौका नहीं बना। वह बेहतरीन इंसान हैं। मुझे जब भी बुलाएंगे मैं हाजिर हो जाऊंगा।

  • क्या ‘राउडी राठौड़’ में अक्षय कुमार का डबल रोल 'डॉन’ के अमिताभ जैसा है?
(चौंकते हुए) पहले तो ये बताइए, आपको कहां से पता चल गया कि इसमें डबल रोल है। ....पर हां, डॉन से बिल्कुल अलग है।

  • अक्षय कुमार ने बहुत वक्त से एक्शन नहीं किया था?
पर ये शूटिंग में लगा ही नहीं। फाइट करते हुए तो वह 23-24 साल के लड़के जैसे बन जाते थे।

  • आपकी फिल्मों में एक्शन स्टायलाइज्ड और ग्लैमराइज्ड होता है, क्या बच्चों पर बुरा असर नहीं पड़ेगा?
पहले कभी इस तरह सोचा नहीं इस बारे में। मगर अब आपने कहा है तो आगे से जरूर ध्यान रखूंगा।

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गजेंद्र सिंह भाटी

Sunday, May 20, 2012

संवादों की मजबूती वाली एक अच्छी फिल्म 'जन्नत-2'

फिल्मः जन्नत-2
निर्देशकः कुणाल देशमुख
कास्टः इमरान हाशमी, रणदीप हुड्डा, मनीष चौधरी, एशा गुप्ता, मोहम्मद जीशान अयूब, बृजेंद्र काला
स्टारः तीन, 3.0
रेटिंगः ए (एडल्ट)  - गालियों का ध्यान रखें


इसे हथियारों की तस्करी पर बनी एक सस्ती फिल्म माना जा रहा था। इमरान हाशमी की बाकी फिल्मों जैसी ही एक और। कम से कम जरा एलीट किस्म की फिल्में पसंद करने वाले दर्शकों के मन में तो यही पूर्वापेक्षा थी। पर फिल्म बहुत मामलों में अलग हो जाती है। बहुत फर्क पड़ता है संजय मासूम के संवादों से। शुरू से ही इमरान अपने चपल संवादों और वैसे ही हंसी भरे हाव-भाव से अपने किरदार सोनू दिल्ली को बेहद संप्रेषित बनाते जाते हैं। कैसे, इन संवादों के जरिए देखते हैं। सोनू दिल्ली छोटे-मोटे हथियारों की गैर-कानूनी ब्रिकी करता है। ऐसे अपराधियों पर एसीपी प्रताप (रणदीप हुड्डा) की नजर है। उसे लगता है कि सोनू के जरिए वह हथियारों के सबसे बड़े आपूर्तिकर्ता तक पहुंच सकेगा। तो वह उसे दिल्ली के एक पुल पर बुलाता है। और इस मुलाकात में सोनू अनजान, भोला और ईमानदार आदमी बनते हुए कहता है... 
क्या बात कर रहे हो साहब
करीना कट पीस
इसी नाम से दुकान है जमना पार अपनी
कभी आ जाओ
अच्छी मलाई वाली चाय पिलाऊंगा...

पर जाहिर है खान नहीं मानता। वह हथकंडे अपनाता है। सोनू से पूछताछ करता रहता है, उसकी हथेली पर चाकू मारकर डराता है, उसे पुल से नीचे यमुना में लटका देने की कोशिश करता है, पर जैसे-तैसे बात निपटती है। यहां से सोनू अस्पताल पहुंचता है। बड़बड़ाता हुआ, हमें हंसाता हुआ। यहां डॉक्टर होते नहीं हैं, रात का वक्त होता है, ड्यूटी पर तकरीबन कोई नहीं होता। एक कमरे के आगे एक आदमी लाइन में लगा होता है। उसे हटाते हुए वह कहता है और हम चकित होते जाते हैं...
भाईसाहब, खून निकल रहा है
पहले मैं दिखा दूं, कहीं एड्स न हो जाए

भोली मक्कारी बरतते हुए वह डॉक्टर जाह्नवी सिंह तोमर के पास पहुंच जाता है। सीरियस मूड में, लंबे कद की खूबसूरत मॉडल जैसी डॉक्टर। अब यहां हाथ से बहते खून का दर्द मिट सा जाता है, और उसे मन ही मन प्यार हो जाता है। जाह्नवी हाथ पर पट्टी बांधते हुए पूछती है, वैसे तुम्हारे हाथ पर क्या हुआ... और वह (वैसे वह जाह्नवी से शुरू में झूठ नहीं बोलता, जैसा एक छोटा-मोटा अपराधी तो हर बात में आसानी से बोलता जाएगा) कहता है...
एक पुलिस वाले को गलतफहमी हो गई थी
उसने हाथ पर चाकू मारकर पुल पर उल्टा टांग दिया था
ये जो नए-नए पुल हैं न
कितने डेंजरस है आज समझ आ रहा है

मुझे इस डायलॉग में छिपा गहरा सेंस ऑफ ह्यूमर बहुत ज्यादा रास आया। भला कितनी बार ऐसा होता है जब चलताऊ किस्म की मूवीज में इतने गहरे निहितार्थ वाले संवाद डाले जाते हों। महानगरों में जो बड़े-बड़े कंक्रीट के फ्लाइओवर और छह लेन-आठ लेन सड़के बन रही हैं, उनपर तो आलोचनाओं की पोथियां लिखी जा रही हैं, जो विकास के मॉडल पर विमर्श करती हैं। मैं खुद इसे बहुत जरूरी विषय मानता हूं। पर यहां इमरान हाशमी की कमर्शियल सी फिल्म में, वो भी हंसी-भरे संवाद में यह कहना कि ये नए-नए पुल कितने डेंजरस हैं आज पता चल रहा है... औसत बात तो नहीं है। इमरान के हाव-भाव और मैनरिज्म इस फिल्म में कुछ बदले-बदले हैं। उन्होंने खुद के अभिनय में पहले की तुलना में बेहतरी लानी शुरू की लगता है, जिसकी परिणीति ‘शंघाई’ में जरूर होगी।

आते हैं रणदीप हुड्डा पर। उनका खुले बटन वाला लुक और चुस्ती से भागने वाला अंदाज उन्हें आम एसीपीयों में अलग बनाता है। उनका हर रात शराब पीना, फिर अपनी टीम के द्ददा (बृजेंद्र काला) से छुट्टे सिक्के मांगना, टेलीफोन बूथ में जाना और अपने ही घर में बार-बार फोन मिलाना, घंटी का बजना, बाद में मैसेज छोड़ने की प्रतिक्रिया देती टेलीफोन ऑपरेटर की आवाज का बार-बार आना। ये सब कहानी का एक अलग जायकेदार इमोशनल पहलू है। दरअसल प्रताप की जान से ज्यादा प्यारी वाइफ ऐसे ही किसी गैर-कानूनी हथियार से मारी गई थी, जिसके जिम्मेदार थे हथियारों के तस्कर। तो वह ऐसे रैकेट के पीछे पड़ा है। ‘रिस्क’ और ‘डी’ जैसी फिल्मों के बाद से उनके लिए ऐसे धीर-गंभीर और सपट रोल करना आसान हो गया है। हमें उन्हें ऐसी भूमिकाओं में स्वीकार करना भी। उनके हिस्से भी एक बड़ा अच्छा संवाद आता है। जब फिल्म के महत्वपूर्ण अंत की ओर जाते हुए सोनू दिल्ली कहीं पीछे न हट जाए, एसीपी प्रताप उसे कहता है...
जैसे मेरे सिर में अटकी हुई गोली मुझे मरने नहीं देती
वैसे ही बल्ली की मौत तुझे जीने नहीं देगी...

आगे बढ़ने से पहले संक्षेप में कहानी जान लेते हैं। पुरानी दिल्ली की गलियों में सोनू दिल्ली (इमरान हाशमी) कुत्ती कमीनी चीज के नाम से मशहूर है। वह और उसका जिगरी दोस्त बल्ली (मोहम्मद जीशान अयूब) छोटे-मोटे गैरकानूनी हथियार, शराब और पायरेटेड डीवीडी बेचने जैसा काम करते हैं। उन्हीं से उनकी लाइफ चलती है। सोनू को डॉक्टर जाह्नवी (एशा गुप्ता) से प्यार हो जाता है और यहीं से वह शरीफों वाली जिंदगी जीने का मन बना लेता है। मगर इससे पहले उसे एसीपी खान (रणदीप हुड्डा) की मदद करनी होगी, हथियारों के सबसे बड़े सप्लायर मंगल सिंह तोमर (मनीष चौधरी) तक पहुंचाने में। वह ऐसा करने भी लगता है, पर एक के बाद एक उसका रास्ता कठिन होता जाता है।

‘रॉकेट सिंह सेल्समैन ऑफ द ईयर’, ‘ब्लड मनी’ और टीवी सीरिज ‘पाउडर’ में दिखने वाले मनीष चौधरी ने इस फिल्म में हरियाणवी रूप धरा है। मंगल सिंह तोमर के रूप में वह उन्हीं मैनरिज्म के साथ नजर आते हैं, उसमें कोई फर्क नहीं आया है। हां, भाषा और उच्चारण में जरा बदलाव वह लाए हैं। सोनू से जब वह मिलते हैं तो कहते हैं...
हम दोनों की कुंडली मिलेगी
लगता है
शनि प्रबल है तेरा
लोहे में फायदा पहुंचाएगा...

हथियारों के इस गैरकानूनी धंधे को करने के पीछे की वजहों में खानदानी रसूख कायम रखने या पाने की न जाने मंगल सिंह की कौन सी कोशिश है। इसमें एक कम्युनिटी, जाति और धर्म की बात भी है। खैर, ये चीज भी नित्य-प्रतिदिन वाली नहीं है। एक सीन में सोनू को समझाते हुए मनीष का किरदार कुछ यूं बोलता है...
सन्यासी, अपराधी और लीडर
इन तीनों के रास्ते में रोड़ा होता है परिवार
इसलिए मैंने अपनी बीवी को मार दिया
क्योंकि मेरे लिए मिशन जरूरी था
पुरखों की कला का लोहा मनवाना था

फिल्म में मेरे पसंदीदा संवादों में एक वह है जिसमें एक इंस्पेक्टर एसीपी बने रणदीप के लिए कहता है (जब वह दारु पीकर अपनी मरी हुई वाइफ को फोन करने की कोशिश करता है) ...अढ़ाया पढ़ाया जाट फिर भी सौलह दूनी आठ।

पहले की फिल्मों में कहानी का लक्ष्य होता था दो दिलों के बीच प्यार होते दिखाना, फिर उसे पाने की लड़ाई और शादी के पहले क्या हुआ ये बताना। मगर ‘विकी डोनर’ और ‘जन्नत-2’ देखते वक्त महसूस होता है कि स्क्रिप्ट बेधड़क हो चली है। शादी इंटरवल से पहले ही हो जाती है। उसके बाद कुछ मोड़ आते हैं और हमें उससे एतराज नहीं होता। फिल्मों में रिसर्च के मामले में हाल ही में ‘पान सिंह तोमर’ का नाम लिया गया। ‘नो वन किल्ड जैसिका’ में भी कहानी पर शोध किया गया, हालांकि उसमें विषयवस्तु की कमी नहीं थी। ‘जन्नत-2’ के बारे में भी एक वरिष्ठ अभिनेता ने मुझसे एक साक्षात्कार में हाल ही कहा था कि इसके लिए निर्देशक कुणाल देशमुख ने काफी रिसर्च की है। हथियारों की तस्करी, गैरकानूनी मैन्युफैक्चरिंग की जगहों और उनसे जुड़े लोगों के बारे में।

फिल्म में गालियां बहुत है। आंशिक रूप से जे पी दत्ता की ‘लाइन ऑफ कंट्रोल’ में, सुधीर मिश्रा की ‘ये साली जिंदगी’ में और बाकी कई फिल्मों में पहले हम सुन चुके हैं, मगर इस फिल्म में बहुत हैं। अब ऐसा लगता है कि गालियों वाली फिल्मों के लिए अलग रेटिंग हो जानी चाहिए। क्योंकि फिल्मों की नई पौध में एक किस्म ऐसी है जो रिएलिटी को सिनेमा बना देने में यकीन रखती है और ऐसा करने पर रिएलिटी की बहुतेरी ऐसी चीजें भी इस लोकप्रिय माध्यम में आ जाती है जो सबको नहीं करनी चाहिए, पर लोग करते हैं। फिल्मों में गालियां न हो तो बहुत ही अच्छा, पर कम से कम उम्र को तो रेटिंग में डाला जा ही सकता है। ‘जन्नत-2’ में गालियां मानें तो थोपी नहीं लगतीं। जैसे किरदार हैं, वो जिंदगी के हर पल में ऐसे ही कर्स वर्ड बोलते हैं। और वो इस फिल्म में भी है। तकनीकी तौर पर कहीं कोई खामी नहीं लगती। फिल्म का अंत बड़ा हिम्मती है, पर चतुराई से समेटा गया है। कुल मिलाकर हम दो-ढाई घंटे के शो के बाद ठगा महसूस नहीं करते, न ही हमें कुछ भी फालूदा परोसा जाता है। हथियारों की तस्करी से ये कहानी बहुत आगे जाती है। फिल्म का नाम भी उपयुक्त नहीं है। बस सीक्वल बनाकर जन्नत ब्रैंड से कुछ फायदा दिलाने की कोशिश है, जो बेहद कमजोर बात है। आगे खुद देखें और जानें।
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गजेंद्र सिंह भाटी

रियल-फिल्मी के बीच स्मृतियों में नहीं आ पाती इशकजादे

फिल्मः इशकजादे
निर्देशकः हबीब फैजल
कास्टः परिणीति चोपड़ा, अर्जुन कपूर, अनिल रस्तोगी, रतन राठौड़
स्टारः ढाई, 2.5
चेतावनीः अगर आपने फिल्म नहीं देखी है, तो कृपया देखने के बाद ही आगे पढ़ें, क्योंकि कहानी आगे खोल दी गई है।

पूरी फिल्म में श्रेष्ठ है पहला दृश्य। जहां स्कूल से लौट रहे पांच-छह साल के बच्चे जोया और परमा एक दूसरे को बड़ी-बड़ी मासूम गालियां दे रहे हैं। “तेरा बाप सूअर, नहीं तेरा बाप सूअर। तू सूअर का पिल्ला, तू सूअर की बच्ची। तेरा बाप कुत्ता, तेरा बाप डॉग कुत्ता, तू डॉग कुत्ते का पिल्ला। यू ब्लडी फूल। नहीं, तू ब्लडीफूल”। साथ में रेल की पटरियां दौड़ रही हैं। पटरियों के साथ-साथ सड़क पर साइकिल रिक्शा, जिसमें लड़कियां बैठी हैं और लड़के पीछे पैदल चल रहे हैं। इनकी आपसी गालियां और कुत्ते-बिल्ली वाला झगड़ा रेल के गुजरने के सुर में धीमा होता जाता है।... इतना स्मृतिसहेजक दृश्य है कि रोम-रोम खुश और हैरान हो जाता है। छोटी जोया के रोल में इस बच्ची का अभिनय बरसों याद रहने वाला लगता है। इसके बाद पूरी फिल्म में स्मृतियों का सामान बस एकआध जगह ही है।

शुरू करते हैं कहानी के साथ। उत्तर भारत में कहीं बड़ा बंदूक-तमंचों वाला जिला है अल्मौड़। यहां के दो एमएलए कैंडिडेट हैं चौहान (अनिल रस्तोगी) और कुरैशी (रतन राठौड़)। इनके पॉलिटिकल बैर का असर शुरू से ही बच्चों परमा चौहान (अर्जुन) और जोया कुरैशी (परिणीति) पर भी रहा है। फिलहाल चुनाव की तैयारियां चल रही हैं और दोनों बच्चे भी इसमें जोरदार तरीके से शामिल हैं। जीतने के लिए कुछ भी करने को तैयार। पर इस बीच नोक-झोंक प्यार में बदल जाती है, जिसमें बीच में एक बड़ा पेंच आता है। इस पेंच के बाद में इनका प्यार हकीकत हो जाता है, पर भारतदेश में समाज, परिवार और परिवार की इज्जत नाम की चीजें भी होती हैं। फिर ऑनर किलिंग नाम की चीज भी है। यहां भी इनके परिवार वाले इनके परिवार को स्वीकार कर लें, यह असंभव ही हैं।

यशराज बैनर की हालिया फिल्मों में ‘बैंड बाजा बारात’ माफिक बुनावट दिखने लगी है। इनमें फ्रेम्स की डीटेलिंग और बुनियादी चीजों में रिएलिटी भरी होती है और कहानी में काल्पनिक वेल्डिंग वाले स्पर्श होते हैं। इससे किरदार, जगहें और इमोशन हमें हमारे बीच के ही असली लगने लगते हैं, पर कहानी में कहीं न कहीं कुछ नकली पैकेजिंग होती है। ‘इशकजादे’ भी हमें ऐसे ही असमंजस में डालती है। फिल्म में अल्मौड़, कुरैशी-चौहान फैमिली, एमएलए का चुनाव, कस्बाई सभ्यता और परमा-जोया-द्ददा जैसे नाम हमें बिल्कुल नए और असली लगते हैं, पर किरदारों का व्यवहार और उनकी कहानी ड्रामैटाइज्ड।

जैसे...
  • परमा को शादी के बाद अपना शरीर और आत्मा सौंप देने वाली जोया को जब लगता है कि उसे धोखा दिया गया है, तो उसके चेहरे पर ठगा जाने वाला भाव अद्भुत है। काया फट जाने को होती है। मगर जब वह परमा की मां के कमरे में होती है और उसे धोखे के बाद पहली बार मिलती है तो बदले की तीव्रता-तीक्ष्णता कुछ बिखरी और दिशाहीन लगती है।
  • वैसे परमा बिल्कुल सिरफिरा और गुस्सैल है। छोटी सी बात पर कैरोसीन डिपो वाले के झोपड़-गोदाम में आग लगा देता है। जरूरत न होते हुए भी कुरैशियों के हथियारबंद घर से चांद बेबी (गौहर खान) को उठा लाता है। ... अब जब दद्दा ने ही उसे इस किस्म का असभ्याचारी जानवर बनाया है तो इस बात पर परमा को थप्पड़ को जड़ देता है। और नाराज होने की बजाय परमा हंस क्यों पड़ता है?
  • मां की बातें उसके पल्ले क्यों नहीं पड़ती? वह मां का बेटा बनकर नहीं द्ददा का पोता बनकर क्यों रहता है?
  •  सबसे कचोटने वाली बात यह रहती है कि जब उसकी आंखों के सामने दादा उसकी मां को गोली मार देता है तो (हबीब फैजल उसे और जोया को जानवर कहकर परिभाषित करते हैं) वह गुस्से में वापस उसी क्षण दादा को गोलियों से क्यों नहीं भून देता? छोड़ क्यों देता है? क्यों फिल्म में यहां तक हमें यह नहीं समझाया गया है कि वह इतना सहनशील भी हो सकता है?
  • मरती मां कहती है, परमा अपनी गलती सुधार। और, शॉक की मनःस्थिति होते हुए भी न जाने कैसे वह अगले तीन-चार मिनट में कपड़े पहन, बैग और बाइक ले जोया को बचाने अल्मौड़ा की गलियों में आ जाता है। मां के मरने का गम इतना जल्दी मिट गया?
  • रुतबे वाले कुरैशी साहब की बेटी जोया को देखने और सगाई करने जावेद आए हैं। पार्टी रखी गई है। कोठे वाली चांद बेबी (गौहर खान) मर्दों के बीच नाच रही है। तभी सहेलियों का हाथ थामे जोया का प्रवेश होता है। अब सगाई समारोह के उपलक्ष्य में एक बड़े इज्जतदार-रसूखदार घर में नचनिया नाच ही रही है कि रिएलिटी फिल्म फिल्मी हो जाती है। चांद बेबी के साथ जोया भी नाचने लगती। चारों और मर्द हैं। जो मर्द चांद बेबी को हवस की नजर से देखकर नाच का लुत्फ उठा रहे, क्या वो जोया को भी ऐसे ही नहीं देखेंगे। ये सब उस स्थिति में हो रहा है कि अल्मौड़ एक दकियानूसी सामाजिक मनःस्थिति वाले लोगों का जिला है और कुरैशी साहब के घर का माहौल भी उतना ओपन नहीं है। तो जोया का नाचना अजीब लगता है। अगर यहां निर्देशक साहब उसे नचा सकते हैं तो फिल्म के क्लाइमैक्स में भी दोनों इशकजादों के इशक को भी कुछ फिल्मी बना देते। अगर कुरैशियों के घर में जोया नचनिया के साथ नाच सकती है तो उसके प्यार को भी तो कुरैशी साहब कुबूल कर रही सकते थे।
  • फिल्म के आखिरी सीन में गजब का विरोधाभास है। हमें बताया जा रहा है कि भारत में जोया और परमा जैसे प्यार करने वालों का यही हश्र होता है। यानी कि उन्हें जान ही देनी पड़ती है। मान लिया। मगर इतने रियलिस्टिक अंत के तरीके पर नजर डालिए। जोया और परमा ने एक दूसरे के पेट में पिस्टल लगा रखी है और एक के बाद एक गोलियां मार रहे हैं। त्वचा से गोली भीतर जा रही है और जोया का चेहरा शिकनहीन है। कोई अजीबपना नहीं, कोई दर्द नहीं, कोई ठेस सी नहीं, कोई असहजपना नहीं। वह मुस्कुरा रही है, मुस्कुरा रही है और मुस्कुरा रही है। अब बताइए थियेटर से बाहर क्या मुंह और क्या हासिल लेकर निकलें।

विस्तृत तौर पर फिल्म पर आऊं तो 'इशकजादे की कहानी में कब, कहां, क्या होगा, अनुमान नहीं लगा सकते। यहीं इसकी खासियत भी है। फिल्म अरिष्कृत, कच्ची और जिलों वाली जिंदगी सी धूल-मिट्टी भरी है। मसलन, पहले ही सीन में जीप में तीन लड़कों का मिट्टी का तेल लेने आना। मिट्टी का तेल कुरैशियों के यहां न जाए और चौहानों के यहां आए, इस बात पर डिपो वाले की झोंपड़ी फूंक देना। कमसकम मैदान के समानांतर बनी दीवार के पास की कच्ची सड़क पर बराबर दौड़ती जीप और उड़ती धूल से तो अपना-अपना जिला सभी को याद आ ही जाता है। परमा का चप्पल पहनकर जीप चलाना भी और दबंग लिखा लोअर पहनना भी। हां, भाषा के लिहाज से अर्जुन जरा भी अल्मौड़ के नहीं हो पाए हैं। शुरू में परमा और उसके दोनों दोस्तों को ‘तेरा आशिक झल्ला वल्ला...’ गाते देख भी अजीब लगता है क्योंकि तब तक उस गाने का कोई संदर्भ नहीं होता है।

निर्देशक हबीब फैजल और परिणीति चोपड़ा ने हिंदी सिनेमा को जोया के रूप में एक ऐसी लड़की दी है जिसके इमोशन गेहुंए रंग के हैं। परिणीति जैसे फ्रैश इमोशन मौजूदा वक्त की कोई भी हीरोइन शायद ही दे पाए। मसलन, स्मूच करते हुए, दो से एक होते हुए, तमंचा चलाते हुए और प्यार में ठगा महसूस करते हुए। अर्जुन कपूर का किरदार परमा कुछ जटिल है। उसके मन में क्या चल रहा है, आप जो चाहें अनुमान लगाएं, छूट है। पर कहीं स्क्रिप्ट के स्तर पर यह कैरेक्टर स्पष्ट नहीं हो पाया है, या हमें स्पष्टता से समझाया नहीं गया है। जिसके कुछ अंश ऊपर आ चुके हैं। पर कुल मिलाकर दोनों नए अभिनेताओं का काम आगे के लिहाज से ठीक-ठाक रहा है।

हबीब ने 'दो दूनी चार’ में राह सुझाई थी, मैसेज दिया था। पर 'इशकजादे’ में बस कमेंट किया है। एक्टिंग सबकी अच्छी है। मुश्किल इतनी ही है कि फिल्म सच्चाई और एंटरटेनिंग होने के बीच कन्फ्यूज होती झूलती है। आप चौंकते है, तारीफ करते हैं, पर टेंशन फ्री नहीं हो पाते। फन महसूस नहीं कर पाते। जैसी भी है इस कोशिश के लिए हबीब फैजल और पूरी कास्ट की हौसला अफजाई कर सकते हैं, तमाम सवालों के बीच।
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गजेंद्र सिंह भाटी

Saturday, May 19, 2012

वर्मा का डिपार्टमेंट खराब हो रहा है और हमारा टाइम

फिल्मः डिपार्टमेंट
निर्देशकः राम गोपाल वर्मा
कास्टः राणा डगुबाती, संजय दत्त, अमिताभ बच्चन, विजय राज, अभिमन्यु सिंह, मधु शालिनी, अंजना सुखानी, लक्ष्मी मांचू
स्टारः डेढ़, 1.5

‘शिवा’ 1990 में आई थी। रामगोपाल वर्मा की पहली हिंदी फिल्म। तब के बड़े स्टार नागार्जुन, वर्मा के सिनेमा सेंस से बड़े प्रभावित हुए थे और उन्होंने फिल्म के निर्माण में पैसा लगाया। मेरी नजर में ‘शिवा’ वर्मा की अब तक की सबसे पैनी सिनेमैटिक फिल्म है। कैमरा, कहानी, किरदारों की प्रस्तुति, उनकी इमेज मेकिंग, इमोशंस का उठाव और भराव और निर्देशन में ब्लंट फैसले... सब के सब बड़े संतुलित थे।

‘डिपार्टमेंट’ तक आते-आते मामला बिल्कुल उल्टा हो जाता है। सब सिनेमैटिक पहलुओं का संतुलन बुरी तरह बिगड़ जाता है। दर्शक थियेटर में जिस कहानी को सुनने आते हैं, उसकी जगह रामगोपाल उन्हें माचिस की डिबिया जितने छोटे कैमरों की करामातें दिखाते हैं। कहानी सुनाने की बजाय उनका पूरा ध्यान कैमरों को चाय की प्याली, पानी की गिलास, चाय के भगोने, डगुबाती के माथे, अमिताभ के हाथ, संजय की लात और पिस्टल पर बांधने में रहता है। हालांकि कैमरों से खेलने की उनकी इन्हीं आदतों ने उन्हें दूसरों से खास बनाया है। ‘नॉट अ लव स्टोरी’ और ‘डोंगाला मुथा’ को रामगोपाल ने कैनन 5डी से शूट किया, पारंपरिक मोटे-मोटे कैमरों को त्यागते हुए। अब ‘डिपार्टमेंट’ शूट हुई ईओएस 5डी कैमरों से। मैंने ‘रक्तचरित्र’ और ‘रक्तचरित्र-2’ के वक्त लिखा था कि फिल्ममेकिंग के स्टूडेंट्स इन फिल्मों से बहुत कुछ सीखेंगे, मगर ‘डिपार्टमेंट’ इस बात में बड़ा सबक है कि क्यों टेक्नीक के लिए स्टोरीटेलिंग और किरदारों को ताक पर नहीं रखना चाहिए।

आते हैं कहानी पर। ये मुंबई है। एनकाउंटर स्पेशलिस्ट महादेव (संजय) फिल्म शुरू करते हैं। सरकारी रजामंदी से वह डिपार्टमेंट नाम की एक टीम बनाते हैं, जो कानूनी होते हुए भी गैरकानूनी काम करती है। यानी सीधे अपराधियों का एनकाउंटर। वह बड़े काबिल मगर सस्पेंडेड इंस्पेक्टर शिव (डगुबाती) को भी टीम में लेते हैं। अब शिव इस बात को लेकर कन्फ्यूज है कि यहां कौन सही है और कौन गलत? क्योंकि महादेव एक गैंगस्टर मोहम्मद गौरी (जो कभी नजर ही नहीं आता) के लिए काम करता है। फिर अपनी जान बचाने के बदले में कभी गैंगस्टर रह चुके मिनिस्टर सरजीराव (अमिताभ) शिव को बुलाते हैं, उसे फ्लैट देते हैं और इशारों पर नचाने लगते हैं। कहानी में सावतिया (विजय राज) का गैंग भी है, जिसमें डीके (अभिमन्यु सिंह) और उसकी महबूबा नसीर (मधु शालिनी) बगावती तेवर अपनाए हुए हैं। कर्तव्य और करप्शन के खेल में फंसे किरदारों की कहानी मरती-मारती आगे बढ़ती है।

अभिमन्यु सिंह और विजय राज (संदर्भ के लिए विजयराज ‘जंगल’ में और अभिमन्यु ‘रक्तचरित्र’ में) का इतना शानदार इस्तेमाल हो सकता था, मगर दोनों के किरदार बोरियत भरी फूं फा ही करते रह जाते हैं। अमिताभ बच्चन ने ‘आग’ और ‘बुड्ढा होगा तेरा बाप’के बाद इस फिल्म में भी इतना अजीब बनने की कोशिश की है। या कहूं तो रामू ने उन्हें बनाने की कोशिश की है। मसलन, हाथ में घंटी बांधने वाला लॉजिक। बचकानेपन की इंतहा। मुझे अभी भी याद है जब रामगोपाल के असिस्टेंट रह चुके पुरी जगन्नाथ के निर्देशन में बनी ‘बुड्ढा होगा तेरा बाप’ रिलीज हुई थी और लोगों ने फिल्म को पसंद नहीं किया था, तब रामगोपाल ने वही ट्वीट किया था जिसमें उन्होंने कथित तौर पर अभिताभ बच्चन को प्यार से गंदी गालियां दी थी। उनके मुताबिक एक फैन के तौर पर साउथ में रहते हुए उनके और पुरी के मन में अमिताभ की जो फैंसी एंग्री यंग मैन वाली इमेज थी, उसे बुड्ढे के तौर पर फिल्म में सही से फिल्माया गया। जबकि बतौर आम दर्शक हमें ये तर्क हजम नहीं होता। वक्त बदला है, फिल्में भी और लोगों की सेंसेबिलिटीज भी। मगर रामगोपाल अडिग रहे हैं, चाहे वह सही हो या चाहे गलत। उन्होंने अपनी मर्जी की ही फिल्में बनाई है। इन लापरवाहियों का ही नतीजा है कि फिल्म दो घंटे से कुछ ज्यादा की होते हुए भी चार घंटे की लगने लगती है। इसके लिए 'अज्ञात’ लिखने वाले भी नीलेश गिरकर जिम्मेदार हैं, जिन्होंने ‘डिपार्टमेंट’ की कहानी, स्क्रीनप्ले और डायलॉग लिखे हैं। निराशाजनक। रही सही कसर संगीत पूरी कर देता है। कहीं तो ये म्यूजिक ‘सरकार’ और ‘सरकार राज’ में फिल्म को नए आयामों पर ले गया था पर यहां सिरदर्दी है। खासतौर पर फिल्म में डाला गया तथाकथित चर्चित आइटम सॉन्ग। गाना नहीं मीट की दुकान है।

वर्मा इसे एक सीधी-साधी फिल्म भी बनाने निकलते तो काफी था। पर इतना भी वह नहीं कर पाए। कोई आश्चर्य नहीं कि 'शिवा’ को लेकर उन्होंने अपने ब्लॉग में बहुत पहले लिखा था, “मुझे बस फिल्ममेकिंग में एंट्री लेनी थी, और उस वक्त मौका था, इसलिए बहुत सारी फिल्मों को कॉपी करके शिवा बना दी, ताकि बाद में अपने मन की फिल्में बना सकूं”। यही कहूंगा कि वह फिल्म अच्छी थी और अब जो वह अपने मन की कर रहे हैं वह लोगों के लिए व्यर्थ है। एक ऐसी ही व्यर्थ मन की चलाई चीज है डिपार्टमेंट, जिसे थियेटर में देख पाना बड़ा ही मुश्किल है। हां, टीवी पर प्रसारण के दौरान हो सकता है, खाली वक्त में कुछ अच्छी चीजें भी ढूंढी जा सकेंगी।
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गजेंद्र सिंह भाटी

Growing impatient with Shahrukh Khan!

An actor’s ego at times leads to unseemly situations at public places. ON the recent controversy where Shahrukh Khan allegedly misbehaved with the Wankhede stadium, Mumbai security staff after an IPL match. 



This is one race of people for whom psychoanalysis is of no use whatsoever. For the popular medium of cinema and its artisans at least, I’d agree with what Austrian neurologist Sigmund Freud says here, the man who gave us the discipline of psychoanalysis. It was at the time of Ketan Mehta’s "Maya Memsaab", around 1993. Shahrukh Khan threatened a journalist for writing an article about him, Deepa Sahi and Ketan Mehta booking a room in a hotel and rehearsing an intimate scene of the movie, later, which turned out to be the Maya Memsaab sex scene controversy. It was the only day of today’s King Khan’s life that he was jailed.

As if it wasn’t enough, he called that reporter and said something like this, “I’m going to come to your house right now and f*** you in front of your parents”, and he went, till the gates of his house, shouting and threatening. Don’t know about Tuesday’s Wankhede Stadium episode but the star was at best of his abusive language then. A year or two later Khan met with the same journalist at a party, hugging and saying sorry to him, realising that the article was written by someone else from the magazine.

I find it a curious case of ego. An artist’s ego. And if you don’t count cinema as an art, then call it an actor’s ego. If it creates ruckus at public places, it determines your ace on stage and before camera too. Remember Shia Labeouf, who was beaten to the ground by a shirtless man named Mike after a reported heated exchange inside a bar in Vancouver, Canada last October. It was said that Shia was pretty intoxicated, like it is being said about Shahrukh, which wasn’t proven by paparazzi though. The ego that got Shia punched in the head, made him the star actor of “Transformers: dark of the moon” too.

There is a long history, as to what we are talking about. Salman Khan and his on record brawls with media persons, charged by his artistic ego and anger were pretty regular until recently.

A few film journalists many times say about Amitabh Bachchan that you can’t be in talking terms and criticising him at the same time. He only likes the ones who admire him. You talk something that makes him unhappy and he’ll make sure you never get to interview him ever again.

This is with filmmakers too. Few days back, the director of "Char Din Ki Chandni" Samir Karnik lashed out at critics saying in saalon ko to bulana bhi nahi chahiye, in kutton ko to marna chahiye, mera hi popcorn khate hain aur meri hi film ko ek aur aadha star dete hain (these dogs and bastards must be beaten, must be banned, they eat my popcorn, watch my movie and give half or one star).

Neither Shahrukh nor Shia are bad human beings, it just that they have a responsibility in public sphere, which is time and again broken. And who’s accountable? Art, ego, stardom, human behaviour, consumerism, market, money or a highly intolerable society we’re living in? Maybe all. But, it doesn’t matter until we start talking about society as a whole, humanity as a whole. It all starts from here only.

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Gajendra Singh Bhati

Wednesday, May 16, 2012

रिसर्च वगैरह नहीं करती हूं, बस खुले मैदान में दौड़ लगा देती हूं: स्नेहा खानवलकर (साउंड ढूंढती टुंग-टुंग गर्ल)


स्नेहा खानवलकर को जान लेना इन दिनों एक बुद्धिभरा काम हो सकता है। अगर उन्हें जानेंगे तो आप ‘टुंग टुंग’ जैसी अद्भुत रचना सुनेंगे। फिर आप ‘जिया हो बिहार के लाला’ सुनेंगे और देखेंगे। मौजूदा वक्त की दो जोरदार-मजेदार चीजें। एमटीवी के संभवतः पहले जनोपयोगी कार्यक्रम ‘साउंड ट्रिपिन’ के प्रोमो जब टीवी पर आने लगे और उनमें जब वह पतली सी लड़की जगह जगह अपना रिकॉर्डर लिए दौड़ती और साउंड रिकॉर्ड करती दिखी, तो हर्ष हुआ। वह गन्ने का रस निकालने वाली मशीन, ट्रैक्टर की आवाज, किसी राहगीर का संवाद, लकड़ी पर रंदा घिसने की आवाज, पारंपरिक खराश भरी रेडियो अनाउंसर की आवाज और न जाने क्या-क्या अपने काले छोटे से उपकरण में कैद कर रही थी। नतीजतन बने चार-पांच सुंदरतम संगीतमयी गाने। साउंड ट्रिपिन का प्रारुप ये है कि ये बेहद प्रतिभाशाली और जज्बेधारी संगीतकार भारत की दस अंदरुनी और अति रंग-बिरंगी जगहों पर जाएंगी और वहां की आवाजों को कैद करके एक गीत की रचना करेंगी। शुरुआत हुई पंजाब से और गाड़ी पहुंची है कानपुर तक।

अब तक की कृतियों को आप सुन और देख सकते हैं। पंजाब में घूमकर बना टुंग टुंग, बनारस के घाटों पर राम राम, येल्लापुर (कर्नाटक) में बना येरे येरे पाउसा, गोवा में बना सुसेगाडो और कानपुर में फिंगर। सबकी आधे-आधे घंटे की मेकिंग तो रोचक है ही, बाद में तैयार होने वाला तीन-चार मिनट का गाना और भी ज्यादा। जिया हो बिहार के लाला अनुराग कश्यप की आने वाली फिल्म ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ का गाना है। म्यूजिक दिया है स्नेहा है। न सिर्फ इस गाने का बल्कि पांच-छह घंटे की दो भागों में बंटी इस फिल्म के एक-डेढ़ दर्जन दूसरे गानों का भी।

स्नेहा खानवलकर का नाम पहली बार सुनाई दिया था दिबाकर बैनर्जी की फिल्म ‘ओए लक्की लक्की ओए’ के रिलीज होने के बाद। उन्होंने इस नेशनल अवॉर्ड जीतने वाली फिल्म में संगीत दिया था। ‘तू राजा की राज दुलारी’ और ‘जुगनी’, फिल्म के लिए स्नेहा के बनाए दो उम्दा लम्हे थे, क्योंकि ये कोई आम गाने नहीं थे जिन्हें किसी भी गायक से गवा दिया गया। इन दोनों ही गानों के लिए स्नेहा पंजाब और हरियाणा घूमी, वहां से ऑडियो मटीरियल जुटाया और अंततः कुछ बेहद माटी से जुड़ी आवाजों को ढूंढकर ये गाने गवाए। बाद में उन्होंने ‘लव सेक्स और धोखा’ का संगीत तैयार किया।

भारतीय फिल्म संगीत के साथ हाल ही में हुई सबसे अच्छी घटनाओं में स्नेहा को गिना जा सकता है। वह वक्त के साथ फिल्मों में बदलने वाले संगीत को सीख रही हैं और सीखकर आई हैं। उनमें घूमकर आवाजें ढूंढने का चस्का है, जो मौजूदा वक्त में शायद किसी भी संगीतकार को नहीं है, सब साउंड सॉफ्टवेयरों के मरीज हैं। उनके घूमने से भारत के भीतर की आवाजें, धुनें सामने आ रही हैं। आप बस नजरों में रखिएगा, ये लड़की कुछ करेगी। स्नेहा से हुई एक लंबी बातचीत का एक छोटा सा अंश यहां प्रस्तुत हैः

अनुराग बड़े एक्साइटेड थे कि स्नेहा ने एक डेढ़ दर्जन ठेठ अंचल वाले गाने बनाए हैं 'गैंग्स ऑफ वासेपुर’ में...
फिल्म के हिसाब से बनाया और अनुराग लाइक्स इट। मैंने क्या किया कि फिल्म का बैकड्रॉप बिहार था तो सब बिहार बिहार ही कर दिया। पहले कभी वहां का म्यूजिक नहीं सुना था इसलिए सुन-सुनकर खुश हो रही थी। वहां बहुत आवाजें हैं। भिखारी ठाकुर जैसे उम्दा कवि वहां हुए हैं। बहुत मीठे लोग होते हैं। पंजाब में भी मीठे होते हैं, पर वहां (पंजाब) आप थोड़े गुस्से से भी गा सकते हैं।

'ओए लक्की...’, 'एलएसडी’ और अब 'गैंग्स...’ का म्यूजिक बनाने के दौरान ही आप नए साउंड ढूंढती गईं या फिर पहले ही तैयार थीं?
डिमांड सिर्फ 'ओए लक्की...’ के एक गाने में हुई थी। मुझे एक कविता ढूंढने को कहा गया था, जो ढूंढने निकली पंजाब में और मिली हरियाणा में। उस वक्त जो घूमते हुए सीखा, वो आज भी साथ है। मैं रिसर्च वगैरह नहीं करती हूं बस खुले मैदान में दौड़ लगा देती हूं। आप नुआंस (बारीकियां) चुनते हो। 'एलएसडी’ में टाइटल ट्रैक एक ही तरह का होना था, तो उसमें मैंने ढिश्क्याउऊं... करके शुरू किया। मुझे डायरेक्टर भी ऐसे मिले, जिनसे कह सकती थी कि ऐसा गाना बनाऊं और वो कहते, हां हां, बनाओ।

इतने घंटों की ऑडियो मटीरियल होती है, उनमें से सिर्फ कुछ नोट्स या पॉइंट लेने होते हैं और बाकी छोडऩे होते हैं...
ये कैसे करती हैं? बहुत मुश्किल होता है। आई एम ग्लैड कि आपने पूछा। किसी भी साउंड की मां बनकर सिर्फ उससे ही पूरा गाना बना सकते हो। जैसे, अगर कुछ बूदें भी रिकॉर्ड हुई हैं और उन्हीं से कुछ बनाया जाए तो उसकी फ्रीक्वेंसी तय करेगी कि रिदम या गाना कैसा होगा। जरा टेक्नीकल है समझाना।

प्रोग्रैम और पंजाब की यात्रा के बारे में बताने वाली थीं...
हां, मैं चार साल पहले 'ओए लक्की...’ के लिए पंजाब आई थी। तब लगा कि सब म्यूजिक एक्सप्लोर कर चुकी हूं। लेकिन 'टुंग टुंग’ बनाने के दौरान नए-नए साउंड मिलते ही गए। यहां के 76वें किला रायपुर रुरल ओलंपिक्स से लेकर जालंधर की क्रिकेट बैट फैक्ट्री तक में घूमी। शानदार साउंड मिले। ज्योति और सुल्ताना नूरां दो कमाल की सिंगर लड़कियां हैं। मैं उनसे चार साल पहले मिली थी, इस दौरान भी मिली। बड़ा मजा आया। उन्हीं के घर में स्टूडियो सेटअप लगाया और उन्हीं की आवाज में रिकॉर्डिंग की। गाने में तुंबी, अलगोजा और टड बजाने वाले प्लेयर्स को मैं नहीं भूली हूं। जैसे तुंबी के लिए चंडीगढ़ से तुरिया जी आए थे।

कैसे-कहां सीखा म्यूजिक डायरेक्शन?
बचपन में जितने भी गाने अच्छे लगते थे, मुझे आज भी उनका एक-एक पिक अप, इंटरल्यूड और फिलर याद है। इतना पैशन था। म्यूजिक के सॉफ्टवेयर खुद सीखे। मम्मी के घर ग्वालियर घराने में क्लासिकल सिंगिंग सुनकर बड़ी हुई। हमें बिठाकर सिखाया जाता था। त्यौहार के दिन सुबह चार बजे ही तानपुरा लग जाता था। दादाजी वगैरह के पास होते थे। पहले मजबूरन गाना पड़ता फिर अच्छा लगने लगा। मेरे बेसिक्स ठीक हो गए। पापा मेरे खूब गवाते थे। कहते कि नहीं-नहीं ऐसा गाओ। वो फोर्सफुली गवाया अब काम आ रहा है।

परवरिश के दौरान भीतर म्यूजिक कैसे पलता गया?
मम्मी की फैमिली का म्यूजिक करेक्ट सुर-ताल वाला था, करेक्ट प्रोजेक्शन घराना टाइप का। लेकिन हमसे 'बाजे रे मुरलिया’ गाने को कहा जाता था तो हम 'चप्पा चप्पा चरखा चले’ भी गाते थे, थाली बजाकर। 'तुनक तुनक तुन’ भी गाते थे। रहमान के गाने भी गवाए जाते थे, जैसे द जैंटलमैन का गाना 'मैं दीवाना आवारा पागल’। हम बहनें प्यारी-प्यारी हरकतें करती थीं। मराठी में शांता जी, ह्रदयनाथ मंगेशकर और भीमसेन जोशी का 'बाजे रे मुरलिया’ और कुमार गंधर्व के भजन गाते थे। मेरे यंग कजिन थे, जो बड़े थे वो हरिहरन की गजलें सुनते थे, बीटल्स को भी। मेरा इंटरनेशनल म्यूजिक को एक्सपोजर 10वीं के बाद हुआ क्योंकि इंदौर में ऐसा माहौल नहीं था। फिर धीरे-धीरे बॉलीवुड, इंग्लिश वाली जंगल बुक, फिडलर ऑन द रूफ.. ये सब। बड़ी हुई तो 12वीं में आने के बाद गिटार और कॉलेज वाला कनेक्शन यंग लड़कों के साथ समझ आने लगा। फिर मैंने सारी म्यूजिकल्स फिल्में सुननी शुरू की। डांस म्यूजिक सुनना शुरू किया।

फिल्में-कहानियां कौन सी पसंद है?
गो कॉमिक्स बहुत पसंद है। फिल्मों में 'प्यासा’ पसंद है। जिसे देखने के बाद कुछ दिन के लिए गुरुदत्त की तरह हो जाती हूं। कवियों की तरह बातें करती हूं। बुक्स में मुझे रोल्ड डाल (ब्रिटिश नॉवेलिस्ट) की अडल्ट शॉर्ट स्टोरीज और ग्राफिक नॉवेल बहुत पसंद है। यूशीहीरो तात्सूमी (जापानी मंगा आर्टिस्ट) को भी पढ़ती हूं।
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गजेंद्र सिंह भाटी

Wednesday, May 9, 2012

“मैं प्रियंका चोपड़ा के रूम का दरवाजा खटखटाकर कहा करता था मैम! शॉट रेडी”: अर्जुन कपूर

मुलाकात इशकजादे के मुख्य किरदारों परिणीति चोपड़ा और अर्जुन कपूर से


'इशकजादे’ के परमा और जोया के बीच कुत्ते-बिल्ली का बैर है, बचपन से, अल्मोड़ की गलियां इसकी गवाह हैं। अल्मोड़, जहां ये कहानी करवट बदलती है। क्रमशः अर्जुन कपूर और परिणीति चोपड़ा के निभाए इन दोनों किरदारों में जो कच्चापन है, जो शुरू में नफरत वाला भाव है, हर बात में एक-दूसरे का विरोध करने की इच्छा है और यह सब करने के बाद दोनों में जो अटूट प्रेम हो जाता है, वह उतना ही दुनियावी सत्य है जितना ‘रॉकस्टार’ फिल्म में दिखाई गई फिलॉसफी कि सच्चा संगीत तब निकलता है जब दिल टूटा हो, दर्द से भरा हो।

अपनी फिल्म के बारे में बातचीत करने जब अर्जुन और परिणीति मिलने पहुंचे तो उनकी नोक-झोंक और एक-दूसरे की बात को काटकर मजाक में उड़ाने में वही भाव छिपा था। उनकी फिल्म 11 मई को रिलीज हो रही है। हबीब फैजल की बतौर निर्देशक यह दूसरी फिल्म होगी। पहली थी 2010 की सर्वश्रेष्ठ फिल्म ‘दो दूनी चार’। हबीब ने ‘बैंड बाजा बारात’ की स्क्रिप्ट भी कुछ ऐसे ही किरदारों वाली लिखी थी। इन दोनों फिल्मों के ‘इशकजादे’ से किसी भी किस्म के जुड़ाव से जाहिर इनकार करते हुए अर्जुन और परिणीति कहते हैं कि “तीनों फिल्मों का कोई मेल नहीं है, हां, अगर समानता ढूंढें भी तो यही है कि हबीब अपनी फिल्मों के महिला किरदार बेहद मजबूत रखते हैं। ‘बैंड बाजा बारात’ में भी श्रुति कक्कड़ स्मार्ट है और नेतृत्व करती है। ‘इशकजादे’ में भी जोया बिल्कुल बागी सी बहादुर है”।

हबीब फैजल पहले जर्नलिस्ट थे। उनकी इस पृष्ठभूमि का फायदा उनकी हर फिल्म को होता है। किरदारों, उनके हाव-भाव, जगहों, उनके व्यष्टि विश्लेषण और चीजों की सहज आसान पैकेजिंग करने में वह सिद्धस्त हैं। यही वजह रही होगी कि इश्कजादे जैसी टर्म उन्होंने गढ़ी, उस पर उसे ठेठ स्पर्श देते हुए इशकजादे में बदल दिया। अर्जुन कहते हैं, “हबीब सर पहले एनडीटीवी में कैमरामेन थे, इस वजह से अपनी रिपोर्टिंग के दौरान वह भारत भर में घूमे, उन्हें देश की बहुत सारी जगहें अच्छे से पता है। फिल्म में अल्मोड़ जैसी छोटी जगह में इन दोनों किरदारों की कहानी तभी उन्होंने रखी। जब हमारी बात होती थी तो वह बताते थे कि अब छोटे शहर छोटे नहीं रह गए हैं। वो हर मामले में बड़े शहरों जैसे हो रहे हैं। दूसरा वहां फिल्में पहुंच रही हैं, ऐसे में वहीं किरदार और कहानी स्थापित कर पाना अब संभव हो गया है”।

फिल्म में अर्जुन और परिणीति के किरदारों में जो ठेठपना था, वह उनमें पहले से होगा यह तो मुश्किल लगता है, ऐसे में क्या हबीब ने उन्हें समझाया ही उसी तरीके से? इसके सीमित उत्तर में अर्जुन स्क्रिप्ट का रुख करते हैं। वह बताते हैं, “पहले ये फिल्म किसी और नाम से बनने वाली थी। कभी भी अगर आप स्क्रिप्ट पढ़ पाएं तो देखेंगे कि उसमें किरदारों का एक-एक ब्यौरा लिखा था, उसे पढ़ने के बाद कोई बात समझने को रह ही नहीं गई”।

प्रियंका चोपड़ा की चचेरी बहन परिणीति के लिए फिल्मों में आना अकल्पनीय था। पैदाइश हरियाणवी रही, वह अंबाला में जन्मी। ब्रिटेन से बिजनेस की पढ़ाई की। बाद में यशराज फिल्म्स की मार्केटिंग और पीआर कंसल्टेंट हो गईं। लगता है कि ऊर्जा से भरे रहने और किसी को भी अपने हीरोइनों वाले जलवे नहीं दिखाने का गुण उनमें पीआर और मार्केटिंग की उसी दुनिया से आया है। एक्ट्रेसेज की समझ के उलट उनमें पब्लिक रिलेशन के कई गुर रच-बस गए लगते हैं। फिर कोई तीन साल पहले उन्होंने फिल्मों में आने के बारे मे सोचा। उन्होंने ‘लेडीज वर्सेज रिकी बहल’ में डिंपल चड्ढा की अपनी पहली ही भूमिका में सबको प्रभावित किया और बेस्ट फीमेल डेब्यू का फिल्मफेयर अवॉर्ड पाया। अब जिन दो फिल्मों में वह नजर आ सकती हैं उनमें एक है प्रदीप सरकार की फिल्म और दूसरी का नाम है ‘एक वनीला दो परांठे’।

वहीं अर्जुन एक बड़ी फिल्म फैमिली से आते हैं। दादा सुरिंदर कपूर गीता बाली के सचिव थे फिर उन्होंने बहुत सी फिल्मों का निर्माण किया। खासतौर पर अनिल कपूर के अभिनय वाली। अर्जुन की कहानी उन स्टार पुत्र-पुत्रियों जैसी रही है जो एक वक्त में एक क्विंटल से भी ज्यादा वजनी होते हैं, बाहर से फिल्ममेकिंग की पढ़ाई करके आते हैं या अपने फैमिली फ्रेंड को उसकी फिल्म असिस्ट कर रहे होते हैं, बाद में किसी की प्रेरणा से उनका कायापलट होता है और एक दिन फिल्म लॉन्च होती है। जैसे सोनम कपूर, करण जौहर या फिर रणबीर कपूर। लेकिन इसके अलावा भी अर्जुन की निजी जिंदगी कुछ कष्टों से भरी रही है। उनके पिता बोनी कपूर हैं। श्रीदेवी के बोनी की जिंदगी में आने के बाद से अर्जुन ने मां मोना शौरी कपूर को टूटते-बिखरते और उबरते हुए देखा। हालांकि उनकी और उनकी बहन अंशुला की पिता के दूरियां नहीं रहीं। मोना की कैंसर से लड़ते हुए इस मार्च में मृत्यु हो गई। वह अपने बेटे की पहली फिल्म भी नहीं देख पाईं, जो उनका बहुत बड़ा सपना रहा होगा। फिल्म इंडस्ट्री में मोना की बहुत इज्जत थी। उनकी मृत्यु के बाद ट्विटर पर करण जौहर जैसे ज्यादातर सेलेब्रिटी लोगों ने खेद जताया, सार था, “यू विल बी मिस्ड मोना मैम”। मोना, मुंबई के फ्यूचर स्टूडियोज की सीईओ थीं, इनडोर शूटिंग का ये बहुत आलीशान स्टूडियो है। उन्होंने टीवी के लिए ‘युग’ और ‘विलायती बाबू’ से शो भी बनाए।

अपने पिता के प्रोडक्शन में बनी कई फिल्मों में अर्जुन असिस्टेंट प्रोड्यूसर रहे। जैसे ‘वॉन्टेड’, ‘नो एंट्री’ और ‘मिलेंगे-मिलेंगे’ में वह असिस्टेंट प्रोड्यूसर थे। इसके अलावा महज 17 साल की उम्र में वह मशहूर तेलुगू फिल्मकार कृष्णा वाम्सी के असिस्टेंट डायरेक्टर रहे। फिल्म थी करिश्मा कपूर और नाना पाटेकर अभिनीत ‘शक्तिःद पावर’। इसमें उनके चाचा संजय कपूर भी थे। अगले साल उन्होंने करण जौहर की फिल्म ‘कल हो न हो’ में निखिल आडवाणी को असिस्ट किया। फिर वह ‘सलाम-ए-इश्क’ में भी सहायक निर्देशक रहे। उनकी आने वाली फिल्म होगी ‘वायरस दीवान’।

वह दरअसल शुरू से ही निर्देशक बनना चाहते थे। इसलिए उन्होंने सेट्स पर रहना शुरू किया। फिल्ममेकिंग की प्रक्रिया से जुड़ी एक-एक चीज को समझना शुरू किया। मगर सलमान खान ने उन्हें देखा और कहा कि “तुम हीरो बनो, तुममें कुछ है”। अर्जुन कहते हैं, “सलमान सर ने एहसास दिलवाया। मैं उस वक्त 140 किलो का था, और मैंने खुद को बदलना शुरू किया”। वह कहते हैं कि “सलमान सर ने एक बार मुझे अर्जुन राणावत कहा था”। अपने असिस्टेंट से हीरो बन जाने की बात पर वह सहज भाव से स्पष्ट करते हैं, “मुझे याद है, मैं प्रियंका चोपड़ा के रूम का दरवाजा खटखटाकर कहता था “मैम! शॉट रेडी, और अब मेरी पहली फिल्म आ रही है। हीरो बनना नाइस फीलिंग है पर मैं इन सब लोगों के बीच ही बड़ा हुआ हूं, सब मुझे प्यार करते हैं”।

फिल्म के प्रोमो और अब तक की झलकियों से युवाओं में बीच उन्हें लेकर जिज्ञासा है, कुछ के लिए वह सुपरस्टार अभी से हो गए हैं। जैसे ट्विटर पर काफी युवा उनके साथ सुपरस्टार जोड़ते हैं। मगर इस बात पर वह एकदम अनजान आदमी की तरह आगे-पीछे मुड़कर देखते हैं, “सुपरस्टार? कौन मैं? नहीं नहीं। पता नहीं। आप ट्विटर का कह रहे हैं, मेरा तो वहां अकाउंट ही नहीं है। तो कैसे पता होगा?”।

परिणीति और अर्जुन से बात करते हुए एक नयापन सा लगता है। इनकी सोच में एक किस्म का सहजपना है। अपने साथी एक्टर्स को लेकर, रिलीज डेट को लेकर, एक्टर या स्टार बनने को लेकर और एक्सपेरिमेंटल सिनेमा को लेकर। मसलन, 11 मई को ‘इशकजादे’ के साथ ही करिश्मा कपूर की वापसी वाली फिल्म ‘डेंजरस इश्क’ भी रिलीज हो रही है। दोनों फिल्मों की भिड़ंत की बात पर दोनों का संयुक्त जवाब आता है, “क्या हो गया साथ रिलीज हो रही है तो। हमारे हिसाब से दर्शक दोनों फिल्में देख सकते हैं। देख सकते हैं न। वैसे भी इस अगले एक-दो वीक कोई बड़ी रिलीज नहीं है तो इस लिहाज से भी ये दो फिल्में ही हैं, तो दर्शक देख ही लेंगे। और, आखिर में बस पिक्चर अच्छी होनी चाहिए, यही जरूरी होता है”। उन्हें और परखने के लिए मैं सवाल करता हूं कि स्टार बनना है या अच्छा एक्टर कहलवाना है? जवाब तुरंत आ जाता है, “सर मुझे लगता है आप स्टार के तौर पर तभी स्वीकार किए जाते हैं, जब एक्टर अच्छे हों, कोई ऐसा स्टार नहीं होता जो बुरी एक्टिंग करता हो। तो दोनों चीजें विरोधाभासी हो ही नहीं पाती”, अर्जुन जवाब देते हैं और बाद में इसी बिंदु को परिणीति भी और समझाकर बताती हैं।

इन्हें परखने और जानने को अगली बात मन में ये भी थी कि इंडिपेंडेंट और एक्सपेरिमेंटल सिनेमा इनके फिल्म चुनने के ढांचे में क्या कभी कहीं फिट होगा? क्या उनकी पीढ़ी रोल चुनने को लेकर ज्यादा एक्सपेरिमेंटल और बेधड़क है? अर्जुन कहते हैं, “हां”। वह जवाब आगे बढ़ाते हैं, “इन दिनों रोल भी ऐसे ही हैं। उनमें कमर्शियल और नॉन-कमर्शियल वाला गैप भी कम हो रहा है। जैसे, सलमान भाई ने चुलबुल पांडे का रोल किया तो अनोखे अंदाज में। ऋतिक रोशन ने 'अग्निपथ’ में अपना रोल बड़े अच्छे से निभाया था, वो अमिताभ बच्चन वाली 'अग्निपथ’ के रोल से अलग था। अब लोग भी एक्टर नहीं कैरेक्टर देखते हैं तो जितना अलग किरदार हो हमारे लिए उतना ही अच्छा। हमारी जेनरेशन में रणबीर कपूर इसके बेहतरीन उदाहरण हैं। उन्होंने हर बार अलग रोल चुने हैं और लोगों ने पसंद भी किया है”।

हालांकि ये परिणीति की पहली फिल्म नहीं है, पर वह उत्साहित इतनी हैं कि पहली फिल्म हो। वह कहती हैं, “मुझे ‘लेडीज वर्सेज रिकी बहल’ के लिए अवॉर्ड मिला जिसकी बड़ी खुशी हुई। पर सही मायनों में ‘इशकजादे’ मेरी पहली फिल्म है। क्योंकि इसमें मेरा लीड रोल है। दूसरा ये रोल भी फुल फ्लेजेड है”।

बातचीत के बीच दोनों की चुहलबाजी चलती रहती है। उनके हर जवाब को अर्जुन मजाक में बिगाड़ने की कोशिश करते हैं। वह रुकती हैं, मना करती हैं, फिर बोलती हैं। कहीं-कहीं हंसी फूट पड़ती है। जब वह सैफ अली खान को अपना फेवरेट एक्टर बताती हैं तो अर्जुन नाराज (मजाक में) होते हुए कहते हैं कि “ये क्या मैं तुम्हारे पास बैठा हूं और..” तो वह कहती हैं, “नहीं मेरे सबसे फेवरेट एक्टर हैं सैफ अली खान। और फिर अर्जुन कपूर भी फेवरेट है, चलो यार इसका भी नाम ले लेती हूं, इसे भी खुश कर देती हूं”। पूरी बातचीत में कहीं भी दोनों की मीठी मजाकों वाली रस्साकशी थमती नहीं।

लेख के शुरू में मैंने इस फिल्म में हीरो-हीरोइन के बीच घोर नफरत के बाद घोर प्यार वाली बात कही थी, उसके बारे में ये दोनों भी अपनी समझ बताते हैं, “हेट इज वैरी इम्पॉर्टेंट फॉर सिनेमा। जितनी नफरत दो यंग कैरेक्टर एक-दूसरे से करते हैं, जब उनमें प्यार होता है तो उतना ही ज्यादा होता है। उसी डिग्री का होता है। दो किरदारों के बीच जब ऐसा होता है तो वो निभाने और देखने में बड़ा शानदार लगता है”।

इतनी बातचीत के दौरान ये कहीं भी नजर नहीं आता कि अर्जुन अपनी पहली फिल्म की रिलीज से पहले बात कर रहे हैं और उन्हें नर्वस होना चाहिए, जवाब देते वक्त अटकना चाहिए, थोड़ा डरना चाहिए। पर ऐसा कहीं हो नहीं रहा होता है। मैं पूछता हूं कि क्या अपनी फिल्म को लेकर आपने डर या नर्वसनेस या धुकधुकी नहीं है? क्योंकि चेहरे से तो बिल्कुल नहीं लग रहा। इतना पूछते ही वह नरम हो जाते हैं। उनका तना एटिट्यूड वाला चेहरा जरा झुक जाता है, चेहरे पर मुस्कान आ जाती है कि कहीं उनकी नब्ज पकड़ ली गई है। वह बोलने लगते हैं, “नहीं ऐसी बात नहीं है। मैं बिल्कुल नर्वस हूं। पर प्रेस के सामने तो ऐसी शक्ल बनाकर रखनी पड़ती है। (एनिमेटेड होकर) अब मैं उछलकर और गला फाड़कर तो कह नहीं सकता कि मैं एक्साइटेड हूं और नर्वस भी। पर...” उनके जवाब पर साथ ठहाके लगने लगते हैं।

बातों का अंत मैं उस सवाल से करना चाहता हूं, जो बड़ा संवेदनशील और दर्द जगाने वाला सा है। पर पूछ ही लेता हूं, कह देता हूं कि उचित समझें तो ही जवाब दें, कि क्या आपकी मां ने फिल्म के रशेज देखे थे, क्या वह खुश थीं? सवाल आधे रास्ते पहुंचा होता है कि वह कुछ गंभीर हो कह उठते हैं, “नहीं”। ... फिर वह कहते हैं, “मम्मी के बारे में सही वक्त होगा तो बोलूंगा। अभी नहीं। हां, लेकिन उन्होंने ट्रेलर देखा था ‘इशकजादे’ का और वह बड़ी खुश थीं”। अब मौका तस्वीरें खिंचवाने का होता है और हंसी-ठिठोली भरे पोज देने में दोनों खुद को डुबो लेते हैं। मन में एक बात आती है कि ये इनकी पहली फिल्म के रिलीज से पहले का वक्त है। कितने विनम्र लेकिन आत्मविश्वासी हैं दोनों। गुरुर का एक कण भी इन्हें छू नहीं गया है, क्या चार-पांच फिल्मों के आ जाने के बाद भी उनकी आंखों पर काला चश्मा नहीं चढ़ जाएगा, जो आज नहीं है। अभी तो लगता है नहीं...।

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गजेंद्र सिंह भाटी

Monday, May 7, 2012

तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीतने वाली फिल्म 'अन्ने घोड़े दा दान' के निर्देशक गुरविंदर सिंह से मुलाकात

 59वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में युवा निर्देशक गुरविंदर सिंह की फिल्म 'अन्ने घोड़े दा दान' को तीन पुरस्कार मिले। उऩ्हें बेस्ट डायरेक्टर और बेस्ट पंजाबी फिल्म का अवॉर्ड मिला, वहीं बेस्ट सिनेमैटोग्राफी के लिए सत्य राय नागपाल को पुरस्कार मिला। गुरविंदर विश्व सिनेमा में भारतीय और खासकर पंजाबी भाषा के योगदान को कटिबद्ध हैं, संभवतः वह गजब की फिल्में लेकर आएंगे। मिलिए गुरविंदर से और मौका मिले उनकी ये फिल्म जरूर देखें।


ये पंजाबी भाषा की पहली ऐसी फिल्म है जो विश्व सिनेमा कही जा सकती है। भारत का मान बढ़ाने वाली फिल्म। घोर आर्ट है। इतना कि जहां रोना चाहिए, वहां दर्शक हंसते हैं। दिल्ली के गुरविंदर सिंह 'फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया, पुणे' से फिल्ममेकिंग में ग्रेजुएशन कर चुके हैं। वहीं पढ़ते हुए उन्होंने पंजाबी साहित्यकार गुरदयाल सिंह के उपन्यास 'अन्ने घोड़े दा दान' पर फिल्म बनाने का आइडिया खुद में आरोपित कर लिया। एफटीआईआई से उन्हें जो दो छात्रवृत्तियां मिली उससे वह पंजाब घूमे। खासतौर पर पूर्वी पंजाब। वहां के लोक गायकों की जिदंगी को देखते हुए, उन्हें सुनते हैं। उन्हीं के मुख से गीतों के रूप में पंजाब की लोक गाथाओं को सुनते हुए। इन गायकों में कई नीची जाति के भी थे, पर गुरविंदर खासकर उनके साथ रहे।

दिल्ली के एक सिख परिवार में पलते-बढ़ते हुए उन्हें अपनी शहरी पहचान और पंजाबियत की जड़ों से जुड़ी घर के बुजुर्गों की सुनाई ऐतिहासिक कहानियों के बीच एक अकुलाहट नजर आती रही। शायद यही वजह रही कि पंजाबी भाषा में फिल्में बनाने का बेहद गुणवान फैसला उन्होंने लिया।

मौजूदा युवा आर्ट फिल्मकारों में वह सबसे जुदा इस लिहाज से भी हैं, कि वह दिग्गज दिवंगत फिल्मकार मणि कौल के शिष्य रहे हैं। वह उनकी विरासत एक तरीके से आगे बढ़ा रहे हैं। दरअसल 2006 में मणि कौल अपने हॉलैंड प्रवास के बाद भारत लौटे थे। गुरविंदर को पता चला तो वह दिल्ली से रवाना होकर मुंबई चले गए, ताकि उन्हें साथ रहकर उनसे सीख सकें। फिर एफटीआईआई में आयोजित हुई एक सिनेमा वर्कशॉप में गुरविंदर मणि के सहयोगी बने। वहां से संपर्क बढ़ा। वह मणि के साथ उनके घर भी रहे। इस फिल्म के विचार में मणि कौल भी इस लिहाज से शामिल थे कि वह फिल्म के क्रिएटिव प्रोड्यूसर रहे, ये और बात थी कि फिल्म के पूरा होने से पहले ही मणि चल बसे। पर उनके साथ रहकर अपने बारे में और अपनी तरह की फिल्मों के बारे में गुरविंदर को जीवन भर साथ आने वाले बातें पता चली। जाहिर है इतने बड़े कद के फिल्मकार के साथ आप रहते हैं तो आपमें भी कुछ शानदार गुण शुमार होते ही हैं। गुरविंदर की ये फिल्म दुनिया के कुछ बेहतरीन फिल्म समारोहों में जाकर आई है। 68वें वेनिस इंटरनेशनल फिल्म फेस्ट में फिल्म काफी सराही गई। इसके निर्माण में पैसा लगाया नेशनल फिल्म डिवेलपमेंट कॉरपोरेशन ने। फिल्म की शूटिंग भठिंडा और उसके करीब एक गांव में हुई। कास्ट में ज्यादातर लोग गांव के ही लोग थे।

गुरविंदर की इस फिल्म का मुझे बेसब्री से इंतजार था और संयोग से चंडीगढ़ में एक विशेष अकादमिक प्रीमियर के दौरान मुझे देखने का मौका मिला। विश्व सिनेमा वाली भाषा के लिहाज से बड़ी आधारभूत लेकिन विस्मयकारी फिल्म है। कम से कम संसाधन, लोकल लोगों से करवाया गया अभिनय, यथार्थ को दिखाने की जिद और फिल्मकारी में कुछ सूक्ष्म बातों पर खास ध्यान फिल्म की कुछ खासियतें हैं। ये एक आदर्श और सिनेमाई पंजाब नहीं दिखाती, बल्कि इसके उलट उन पंजाब के नागरिकों को अपनी कहानी का केंद्रीय किरदार बनाती है, जिनपर कभी फिल्म नहीं बनती। सामाजिक रूप से दबे कुचलों और हाशिये पर रखे गए शोषितों की जिंदगी यहां किसी सड़ते हुए घाव की तरह खुलती है। दर्शकों की प्रतिक्रियाएं बताती हैं कि वह कितने संवेदनशील हैं कि कितने असंवेदनशील। अपने समाज में पल रहे भेदभावों से कितने जान हैं और कितने अजान। कोई अचरज मुझे नहीं हुआ कि बेहद बुद्धिजीवी माने जाने वाले वह दर्शक रो पड़ने वाले दृश्यों में हंस पड़े। फिल्म के संप्रेषण की ये खामी भी है और खूबी भी।

निर्देशक के तौर पर गुरविंदर का बर्ताव फिल्म के किरदारों और कहानी के प्रति गंभीर शांति भरा है। उनका केंद्रीय किरदार जो प्रताड़ित है, मौन है। उसका धरा हुआ मौन बाकी किरदारों में भी पलता है। कहानी में प्रभुत्व भरे लोग भी आते हैं, पैसे वाले भी, कद्दावर भी, दबंग भी। उन्हें देख सिहरन होती है कि असली पंजाब में यही होता है। जो हकीकत है। असली पंजाबों में भी ऐसा ही भेदभाव और शोषण है और असली राजस्थानों में भी। किरदारों की जिदंगी की हर परत में घाव लगे हैं, और उन्होंने मौन रहकर वो घाव झेल लिए हैं।प्रीमियर के दौरान ही फिल्म के निर्देशक गुरविंदर सिंह से मुलाकात हुई। प्रस्तुत है उनसे हुई बातचीत के कुछ अंशः

आपका सिनेमा क्या है?
मैं वैसी फिल्में बनाता हूं जिनसे खुद को जुड़ा महसूस कर पाता हूं। फिल्ममेकिंग सीखते हुए मैंने जिस किस्म के सिनेमा को देखा और चाहा, वैसा ही बनाना भी चाहता हूं।

बड़े स्टार्स वाली फिल्में?
दोनों ही अलग हैं और दोनों होने चाहिए। उसमें कोई बुराई नहीं है। न ही स्टार्स के साथ काम करने में कोई दिक्कत है। मेरे लिए रूटेड रहना, अपनी जड़ों से जुड़े रहना सबसे जरूरी है। लेंग्वेज और रोजमर्रा की आम जिंदगी में बारीक से बारीक चीजें मेरे लिए बहुत मायने रखती हैं। जो ऑब्जर्वेशन और ट्रेनिंग से आती है और लोगों को देखकर आती है।

पर पैसे कैसे कमा पाएंगे?
मेरे लिए पैसा जरूरी नहीं हैं। बस वही करता हूं जो मुझे पसंद होता है। इस फिल्म को एनएफडीसी ने प्रोड्यूस किया है और अपनी तरह की फिल्म बनाने में उन्होंने मुझे पूरी आजादी दी। और, पैसे कमाना उनके लक्ष्यों में नहीं आता। पर हां, हम इसे पंजाब में रिलीज करने की कोशिश कर रहे हैं। जो काफी सीमित जगहों पर होगी, और इससे कोई ज्यादा कमर्शियल फायदे की भी उम्मीद नहीं है।

लोकप्रिय धारा की नहीं होने के अलावा क्या आपकी फिल्म चरम आर्ट नहीं हो जाती? लोग समझेंगे कैसे?
भले ही इस फिल्म की कमर्शियल वैल्यू कम हो और इसे लोगों को आगे बढ़कर समझना पड़े, पर एनआरआई ऑडियंस को टारगेट करने के नाम पर बहुत सारा कचरा भी बन रहा है, तो उसका क्या करेंगे? फिर इस फिल्म में क्या बुराई है।

जो गांव के आम लोग थे, एक्टर नहीं थे, उनसे एक्टिंग करवाना कैसा रहा? 
नहीं, कोई दिक्कत नहीं हुई क्योंकि वो अभिनय नहीं कर रहे थे खुद को ही प्ले कर रहे थे। ये फायदा था। क्योंकि नॉन-एक्टर एक्ट नहीं कर सकते है। बाकी काम कैमरे को करना होता है। ये इमेज कैप्चर करने की बात है। टाइम की बात है। आप दो घंटे में एक दिन की कहानी भी कह सकते हैं, दस दिन की भी और दस साल की भी। सब कुछ दो घंटे में हो सकता है। तो एक्टिंग से ज्यादा आप कैसे नरेट कर रहे हैं और क्या कह रहे हैं ये ज्यादा जरूरी है। और एक्टिंग कोई इश्यू नहीं है क्योंकि कोई भी एक्ट कर सकता है। ये उस किरदार के होने या बनने में है, कि आप वो हैं। फिल्म में मैंने अपने किरदारों से भी यही कहा कि आप जैसे हो वैसे ही रहो। जैसे चलते हैं, जैसे अपना लकड़ी पकडऩे का ढंग है, जैसे झुककर खड़े होते हैं, जैसी इंटेंसिटी लेकर आते हैं।
सिनेमा बड़ी इनट्यूटिव आर्ट है, बाकी सभी आर्ट से ज्यादा। जब आप ऑन सेट होते हैं तो उसी की प्रतिक्रिया देते हैं। लोगों के चेहरों, लोकेशन, कॉस्ट्यूम, टाइम को देख प्रतिक्रिया देते हैं। जैसे फिल्म में एक नॉन-एक्टर थे, वह जिस तरह लाठी पकड़कर चलते थे और झुककर खड़े हो जाते थे तो मैंने कहा कि ये तो बड़ा अच्छा पोज है यही करिए। आपको ऑब्जर्व करके देखना होता है, कैरेक्टर में खासियत ढूंढनी पड़ती है जो पहले यूज नहीं हुई है। ताकि कुछ भी स्टीरियटाइप न लगे।

वर्ल्ड सिनेमा में कौन प्रेरित करता है?
बहुत से लोग। जापान के याशुजीरो ओजू हैं, रॉबर्ट ब्रेसों हैं फ्रांस के, फैलिनी है वो बहुत अच्छे लगते हैं, हालांकि उनके जैसी फिल्में तो मैं नहीं बना सकता हूं। मैं खुद को ओजू के ज्यादा करीब समझता हूं। जिस तरह से वह फैमिली लाइफ दिखाते हैं, उससे मैं खुद के सिनेमा को काफी जोड़ पाता हूं। जैसे 'अन्ने घोड़े दा दान’ में रात के आधे घंटे या उससे ज्यादा का जो वक्त है, उसमें फैमिली है और रूम में ही सब चल रहा है, आकर मिलते हैं, बैठते हैं, जाते हैं। ऐसी कई चीजें है जिनमें मैं खुद को ओजू से जुड़ा पाता हूं।

क्या आपकी कोशिश है कि जब कमर्शियल हो चुके पंजाबी सिनेमा में आर्टिस्टिक स्टैंडर्ड ले आएंगे तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी लोग पंजाबी लेंग्वेज को इज्जत देने लगेंगे? सिनेमा स्टैंडर्ड जो यहां नहीं हैं वह आएंगे?
बिल्कुल। देखिए, स्टैंडर्ड बहुत बड़ी चीज है। मैंने फिल्में देखी हैं चीन से, ईरान से, जापान से। मैंने यहां का कोई लिट्रेचर नहीं पढ़ा हुआ। इन जगहों में कोई समानता नहीं हैं, पर एक रिस्पेक्ट है। मसलन, ईरान में मीडिया सिर्फ इस्लामिक फंडामैंटलिज्म की बात करता है, यू.एस. कॉन्फिल्क्ट की बात करता है, लोगों की तो वहां का मीडिया बात ही नहीं करता। पर उन लोगों की नॉर्मल जिंदगी कैसी है, चिंताएं कैसी हैं, वह सब तो हमारे जैसी ही हैं। ये सब चीजें तो सिनेमा दिखा सकता है, उस खूबसूरती को। तो मुझे ऐसे लगता है कि मैंने ईरान की गलियां तो देखी हुई हैं, चीन के गांव देखे हुए हैं, पर पंजाब के गांव आज तक नहीं देखे। वो तो सिर्फ एक अंदाजा है कि सरसों के खेत हैं और लोग नाच रहे हैं। तो ये कोई पंजाब थोड़े ही है। पंजाब में आपको कितने सरसों के खेत मिलते हैं? कितने लोग नाचते हुए दिखते हैं?

आपकी फिल्म में ऐसे बहुत से बारीक बिंदु हैं जहां लोग ह्यूमर ढूंढ लेते हैं और हंसते भी हैं। आपने जब बनाया था तो क्या चाह रहे थे कि लोग फिल्म के किरदारों के दुख-दर्द को समझें या उनपर हंसे तो भी चलेगा?
मैं काफी सरप्राइज हुआ कि लोग हंस रहे थे। पर ठीक है, इतना बुरा नहीं लगा। क्योंकि जो बारीकियां हैं वो लोग समझते हैं। बाहर (विदेशों में) लोग नहीं हंसते, पर यहां हंसे। इसमें इतना कुछ था भी नहीं कॉमिक।

फिल्म में एक कुत्ता होता है, एक उल्लू होता है और एक बकरी का पैर दूध के जग में चला जाता है। तीनों आपने करवाए या यूं ही हो गए?
उल्लू तो यूं ही मिल गया। जहां हम शूट कर रहे थे तो वहां पर किसी बच्चे ने आकर कहा कि वहां पर एक उल्लू है, आप उसका फोटो ले लीजिए। तो मैंने जाकर देखा वहां एक उल्लू बैठा हुआ था। मैंने ले लिया, कि देखते हैं कहां यूज होता है। कुत्ता तो हां, हमने रखा था। बाकी इन चीजों की आप योजना नहीं बना सकते हैं, ये तो शूटिंग के दौरान के वाकये होते हैं। यूं ही हो जाते हैं। कुछ अच्छे होते हैं जो काम आते हैं, कुछ आप यूज नहीं कर सकते। पर ये जो एक्सीडेंट होते हैं ये चूंकि प्लैन्ड नहीं होते इसलिए फ्रैश और खूबसूरत होते हैं। इसलिए मैं बहुत ज्यादा प्लैनिंग नहीं करता।

कितने एमएम पर शूट की?
35एमएम पर।

कितने दिन में?
45 दिन में शूटिंग पूरी कर ली थी।

कई इंटरनेशनल फिल्म फेस्ट में आपकी फिल्म जाकर आई है, रिस्पॉन्स कैसा रहा?
फिल्म दिखने में कैसी है लोग इसपर प्रतिक्रिया देते हैं। जैसे कुछ लोगों को हॉन्गकॉन्ग में अच्छी नहीं लगी। एक ज्यूरी मेंबर ने कहा कि उन्हें फिल्म बिल्कुल भी समझ नहीं आई और उन्होंने उसे आउटस्टैंडिंग रिमार्क नहीं दिए। वो समझ नहीं पाए कि क्या हो रहा है, क्योंकि बहुत से कल्चरल रेफरेंस होते हैं। तो ठीक है अगर आपके सिर के ऊपर से फिल्म जाती है तो। पर ये आगे बढ़कर समझने की बात है। फिल्ममेकर कैप्स्यूल की तरह कहानी स्पष्ट करके लोगों के लिए आसान कर देते हैं कि उन्हें समझ आए। पर मैंने ऐसा नहीं किया। चाहे इंडियन ऑडियंस के लिए या बाहर की ऑडियंस के लिए।

आपको ये नहीं लगता कि ज्यादा आर्टिस्टिक होने की एक खामी ये हो जाती है कि दर्शक बहुत कम और सीमित हो जाते हैं?
नहीं, ऐसा नहीं है। अब ऐसा तो नहीं है कि फिल्म को हमने सिर्फ आज के लिए ही बनाया है। ऐसा तो है नहीं कि फिल्म एक हफ्ता या दस दिन के लिए बनी है। कोई प्रॉडक्ट या टीवी प्रोग्रैम तो है नहीं कि इतने दिन चला और बंद हो गया। मैं तो चाहता हूं कि आने वाले पचास साल तक लोग इस फिल्म को देखें। और किस तरह देखेंगे ये एक अलग नजरिया होगा। एक ही आर्ट होता है और उसे पचास तरह से देखा जाता है। जैसे हम आज कुरोसावा की फिल्में देखते हैं। मुझे आज वो इतनी प्रभावी नहीं लगती जितनी पहले लगती थी। क्योंकि उसके बाद भी बहुत कुछ हो चुका है। तो सोचिए कि पचास साल में कितने लोग जुड़ जाते हैं। मैं इस तरह से सोचता हूं।

आगे भी फिल्में पंजाबी में ही बनाएंगे या हिंदी-इंग्लिश में भी?
पंजाबी में ही।

हमेशा?
वो तो नहीं पता पर अगली दो-तीन स्क्रिप्ट तो पंजाबी में ही हैं। जैसे, एक फिल्म पंजाबी और जर्मन में बना रहा हूं। कहानी माइग्रेशन पर है, ऐसे इंसान की जो पंजाब से जर्मनी में माइग्रेट कर रहा है। फिल्म के लिए प्रोड्यूसर अब ढूंढना शुरू करूंगा। एक 1984 की कहानी है, उसके लिए भी उम्मीद है कि फंड मिल जाएंगे और इस साल के आखिर तक शूट कर लूंगा। अभी फिल्म फेस्ट में जा रहा हूं, उसके बाद बर्लिन जाऊंगा ताकि अपनी फिल्म पर रिसर्च कर सकूं।

video
                             अन्ने घोड़े दा दान का ट्रेलर
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गजेंद्र सिंह भाटी

Saturday, May 5, 2012

पेट में जो कहानियां उछल रही हैं वो आपको अच्छा डायरेक्टर बनाती हैः आमिर खान

सत्यमेव जयते के शुरुआती तीन प्रोमो और आमिर के साथ हुए साक्षात्कार पर पिछले दिनों यहां लिखा था। चूंकि आज सुबह 11 बजे अपने कार्यक्रम के साथ वह हर घर पहुंचने वाले हैं, उनका साक्षात्कार लगा रहा हूं।

 कोई पांच महीने पहले अक्टूबर में, मुंबई में, आमिर से बात-मुलाकात हुई थी। उस वक्त उन्होंने ‘सत्यमेव जयते’ (तब नाम तय न हुआ था) और अपने टेलीविजन में आखिरकार आने की पहली घोषणा की थी। कम्युनिकेशन या सम्प्रेषण की कला में तो वह माहिरों के माहिर हैं ही। इसलिए बात करने में मिलनसार, मृदुभाषी, मुस्काते हुए और चतुर लगने ही थे। लगे भी। हालांकि इस आभा में कितना अभिनय था और कितनी असलियत ये जानता था। इस दौरान उन्होंने सवालों के चतुराई से जवाब दिए और बाद में मार्केटिंग को लेकर अपनी समझ शायद पहली बार इतने विस्तार से बताई। जो लोग फिल्में बनाना चाह रहे हैं, या बना रहे हैं या फिल्म लेखन कर रहे हैं उन्हें जरूर ही पढ़ना और समझने की कोशिश करनी चाहिए। क्योंकि आमिर ने अपनी हर फिल्म के साथ दर्शक खींचकर दिखाए हैं। प्रचार करने के तरीकों को लेकर उनकी बड़ी रोचक फिलॉसफी है। अपनी फिल्मों को आर्ट और कमर्शियल कहे जाने का जवाब भी वह देते हैं। गौर से पढ़ें:

आपकी मार्केटिंग शैलियों की बड़ी बातें होती हैं। विस्तार से बताएंगे कि प्रचार पर आपकी समझ क्या है, हर बार नया आइडिया कैसे ले आते हैं, जो चल भी पड़ता है?
....जब आप मुझे कहें कि अपनी जिंदगी का सबसे अच्छा वाकया सुनाओ, और यहां समझो पार्टी चल रही है, और हम लोग म्यूजिक सुन रहे हैं, खाना-वाना खा रहे हैं और आपको मैं बोलता हूं कि “यार कोई अपनी जिंदगी की कोई अच्छी कहानी बताएं”। तो आप सोचेंगे कि क्या बताऊं और फाइनली आप कहेंगे कि “यार हां, एक दफा मैं कैलकटा में था और वहां ये ये ये ये हुआ”। और आप अपनी कहानी ऐसे सुना देंगे। अब जरा कुछ अलग सिचुएशन की कल्पना कीजिए। कल्पना करिए कि वही पार्टी चल रही है, म्यूजिक चल रहा है, लोग खाना खा रहे हैं, वही जगह है। घंटी बजती है, एंड यू एंटर! मैं गेट खोलता हूं और आप आते हैं, कहते हैं “आमिर यू वोन्ट बिलीव वॉट हैपन्ड (तुम यकीन नहीं करोगे मेरे साथ क्या हुआ)! ऐसी अविश्वसनीय चीज मेरे साथ हुई। अरे, म्यूजिक बंद करो यार, मेरी बात सुनो तुम लोग”। .. वॉट योर डूंइग ऐट दैट टाइम इज मार्केटिंग (इस वक्त आप जो कर रहे होते है वही मार्केटिंग है)।

लोग मुझे हमेशा पूछते हैं कि आप नए डरेक्टरों के साथ काम करते हैं। या उन डरेक्टरों के साथ काम करते हैं जिनकी फिल्में अब तक कामयाब नहीं हुई हैं। और, आपके साथ वो इतनी कामयाब हो जाती हैं। तो क्या आप घोस्ट डायरेक्ट करते हैं? बिल्कुल, मैं घोस्ट डायरेक्ट नहीं करता हूं। मैं अपने काम का क्रेडिट किसी को नहीं दूंगा, बड़ा क्लियर हूं इस बारे में। तो कैसे वो फिल्में अच्छी बनती हैं, उसकी ये वजह है।

यहां मैंने दो चीजें कही हैं आपको।

एक ये कि डायरेक्टर वो होता है.. काम तो बहुत लोग जानते हैं, कैमरा कहां रखना है? एडिटिंग कैसे करनी है?.. टेक्नीकल चीजें बहुत सारे लोग जानते हैं और मैं आपको दस दिन में सिखा दूंगा। लेकिन क्या आपके पेट के अंदर कहानी है जो बाहर निकलने के लिए उछल रही है। वो आपको अच्छा डायरेक्टर बनाती है। तो जब आप दरवाजे से अंदर आते हैं और बोलते हैं “यार (ताली पीटते हुए), क्या मेरे साथ हुआ है, आप लोग बिलीव नहीं करोगे!” तो आपके अंदर एक कहानी है जो आप बोलना चाह रहे हो और वो आप अच्छी तरह बोलोगे। आप तरीका निकालोगे कि किस तरह अच्छी बोलूं। और जब लोग आपकी कहानी नहीं सुनेंगे और अपना खाना खाएंगे और म्यूजिक सुनेंगे तो आप सबसे बोलोगे, अरे म्यूजिक बंद करो यार! अरे नितिन मेरी बात सुन यार! सुन मेरे को। तो आप जो लोगों का ध्यान अपनी तरफ करोगे, वो क्या है, वही तो मार्केटिंग है।

तो ये मैंने बड़ा सिम्प्लीफाई करके बोला है। तो मैं फिल्में वही करता हूं जिसमें लगता है कि यार मजा आएगा करके। और, डायरेक्टर वो होता है, जिसकी कहानी होती है, जो कहानी बोलने के लिए तड़प रहा है, उसको मैं चुनता हूं। और जब तैयार होती है तो हम सब एक्साइटेड हैं और सबको बोलते हैं कि यार म्यूजिक बंद करो हमारे पास अच्छी कहानी है। वो ही तो मार्केटिंग है, और क्या मार्केटिंग है? आप समझे। तो वो एक्साइटमेंट हममें है, क्योंकि वो चीज हमनें बनाई है जो हम बनाना चाहते थे, और अब जो प्लेटफॉर्म अवेलेबल है उसका मैं इस्तेमाल कर रहा हूं। सब लोग कर रहे हैं मैं भी कर रहा हूं।

लेकिन फर्क क्या है? फर्क ये है कि मैंने कुछ बनाया है जिसके बारे में मैं एक्साइटेड हूं। अब आप ये सवाल जब ‘थ्री इडियट्स’ से पहले मुझे पूछते हैं तो कहते हैं यार ये क्लेवर जवाब दे रहा है। लेकिन अब आप सोचिए। ‘थ्री इडियट्स’ मैं बना चुका हूं। मैंने फिल्म देख ली। मैंने क्या बनाया मुझे मालूम है। हम सब ने एज अ टीम क्या बनाया है हमको मालूम है। अब हम उसको मार्केट करते हैं। तो हमारी एक्साइटमेंट लेवल जाहिर है एक लेवल की होगी और आप तक पहुंचेगी ही पहुंचेगी। और उसका और कुछ हो नहीं सकता।
 
3 ईडियट्स की प्रमोशन के दौरान भेष धरे आमिर वाराणसी में
इसमें स्ट्रैटजी...
स्ट्रैटजी इसमें कहां है भैया। यू गो विद योर हार्ट। जब मैंने और मेरी टीम ने ‘तारे जमीं पर’ बनाई है तो हम जानते हैं कि हमने क्या बनाया है। वी आर एक्साइटेड अबाउट इट। हां, हम नर्वस भी हैं क्योंकि कोई नहीं जानता आखिर में फिल्म कैसी होगी? लेकिन हम जानते हैं कि हमने जो बनाया है वो बहुत अच्छा मटीरियल है। जिस तरीके से आप मार्केट करते हैं वो आपको फील होता है, चाहे वो प्रोमो के थ्रू हो, चाहे वो गाने के थ्रू हो, चाहे वो इंटरव्यू के थ्रू हो। हर बार इनटेंजिबल कोई चीज है जो आपको टच करेगी। ‘रंग दे बसंती’ आप ले लीजिए, ‘लगान’ आप ले लीजिए। ये सब अलग-अलग वक्त थे। ‘लगान’ तो... मैं अब 12 साल की बात कर रहा हूं। मैं तो अपनी फिल्मों को शुरू से मार्केट करता आ रहा हूं। तब कोई टेलीविजन नहीं था, हम इसे छायागीत पर दिखाते थे। छायागीत पे हमने दिखाया था ‘कयामत से कयामत तक’ का गाना। तब कोई एंटरटेनमेंट चैनल नहीं था तो हम कैसे बताएं लोगों को? अंततः हम एक्साइटेड हैं और वो हमारी एक्साइटमेंट आप तक पहुंच रही है। देखिए, हर फिल्म का प्रोमो आता है। ऐसी तो कोई फिल्म नहीं है जो हमने ताले में बंद करके रिलीज की है। या किसी भी प्रोड्यूसर ने। हर फिल्म का प्रोमो आता है, हर फिल्म का प्रेस कॉन्फ्रेंस होता है, हर फिल्म म्यूजिक रिलीज करती है। जो नॉर्मल मार्केटिंग जिसको कहते हैं वो हर आदमी करता है वो मैं भी करता हूं। क्यों लोग एक फिल्म को देखते हैं और एक फिल्म को नहीं देखते?

जिस तरीके से आप मार्केट करते हैं...
इट्स नॉट द वे यू मार्केट द फिल्म। आप गलत बोल रहे हैं। आप मुझे क्रेडिट मत दो, आप गलत आदमी को क्रेडिट दे रहे हो। मैं बोल रहा हूं, उस मटीरियल में एक चीज है जिसकी वजह से मैं इंस्पायर हो रहा हूं। अब मैं उछल रहा हूं, मैं क्या करूं। मैं इतना एक्साइट हो रहा हूं कि वो आप तक पहुंच रहा है। इसमें (फिल्म या कंटेंट) अगर पावर नहीं है न, तो वो मुझमें नहीं आएगा। तो मैं भी बुझा-बुझा सा रहूंगा और आपको भी लगेगा कि यार इस दफा कुछ एक्साइटेड नहीं लग रहा है। अभी जिस शो में काम कर रहा हूं, मैं एक्साइटेड हूं इस शो के बारे में। क्योंकि इस दफा मैं कुछ अलग कर रहा हूं, हो सकता है मैं फेल हो जाऊं। पर मैं एक्साइटेड हूं इसके बारे में इसी लिए तो कर रहा हूं। तो मैं ये कह रहा हूं कि अगर अच्छी मार्केटिंग कर रहा हूं तो इसका मतलब ये नहीं है कि मैं क्लेवर हूं। आपको गलतफहमी हो रही है अगर आप ये सोचते हैं कि मैं क्लेवर हूं। आपको गलतफहमी हो रही है। मैं वही कर रहा हूं जो मुझे लगता है कि उस खास प्रॉडक्ट के लिए जरूरी है। ‘तारे जमीं पर’ की स्टोरी ही बिल्कुल अलग थी। मैं ‘तारे जमीं पर’ को वैसे मार्केट नहीं कर सकता था जैसे मैंने ‘गजनी’ को किया। ‘गजनी’ इज अ फिजीकल फिल्म। मेरे लिए मटीरियल हमेशा डिक्टेट करता है कि मैं कैसे मार्केट करूंगा फिल्म को। और, मटीरियल मुझसे खुद कहता है। मुझे उसके बाद सोचने की जरूरत नहीं पड़ती।

मौजूदा समाज को कैसे देखते हैं और ये कार्यक्रम उसमें कितना बदलाव लाएगा?
ज्यादा तो मैं क्या कह सकता हूं, पर ये जरूर है कि लाइफ में बदलाव आ रहा है। जब मैं लोगों से मिलता हूं तो मुझे लगता है कि खास किस्म का आइडियलिज्म लौट रहा है। ज्यादा से ज्यादा लोग ऊंचे लेवल की इंटेग्रिटी की लाइफ जीना चाहते हैं। और मैं यकीन भी करना चाहूंगा कि ऐसा हो रहा है। मैं ये नहीं कह सकता कि मैं ही कोई बड़ा बदलाव ले आउंगा, पर बदलाव हो रहा है। मैं अपने स्तर पर कुछ करता हूं, हो सकता है उससे लोगों की जिदंगी में कुछ चेंज आता है, कुछ नहीं आता। पर मैं इसकी घोषणा नहीं करना चाहूंगा।

किस किस्म का काम करते हैं, परिभाषित कर सकते हैं? आर्ट, कमर्शियल, प्रायोगिक?
मेरे काम को एक शब्द में डिफाइन कर पाना बड़ा मुश्किल काम होता है। लोग पूछते हैं कि आपकी फिल्म आर्ट फिल्म है कि कमर्शियल फिल्म। अब आप बताइए कि ‘तारे जमीं पर’ आर्ट फिल्म है कि कमर्शियल फिल्म। अगर आर्ट फिल्म बोलूंगा तो डिस्ट्रीब्यूटर बोलेंगे कि “नहीं साहब! हमने तो बहुत बनाए हैं"। कमर्शियल फिल्म बोलूंगा तो क्रिटीक्स बोलेंगे कि “नहीं साब! बड़ी आर्टिस्टिक फिल्म है"। अब ‘रंग दे बसंती’... पोस्टर में आप देखिए कि घोड़े पे आ रहा हूं मैं, अब ये बताइए कि आर्ट फिल्म है कि कमर्शियल। जब मैंने ये फिल्म साइन की तो मेरी छोटी बहन का फोन आया। और उस वक्त भगत सिंह की कहानी चार बार आ चुकी थी, फिल्मों में। तो फरहत मेरी छोटी बहन है जो उसका फोन आया, कि क्या हो रहा है आजकल। तो मैंने बोला “यार मैंने एक फिल्म साइन की है”। तो मेरी फैमिली में काफी सेलिब्रेशन होता है जब मैं फिल्म साइन करता हूं। अरे, आमिर ने फिल्म साइन कर ली, मुबारक हो मुबारक हो! उन्हें बहुत कम दफा सुनने को मिलती है ये न्यूज। तो मेरी बहन ने बोला, “अच्छा फिल्म साइन कर ली, कौन सी फिल्म साइन की”। मैंने कहा, “द फिफ्ट रीमेक ऑफ भगत सिंह”। तो वो बोली, “नहीं नहीं हाउ कुड यू मेक फिफ्थ रीमेक ऑफ भगत सिंह”। मैंने कहा नहीं, मैं तो कर रहा हूं। तो मैं कैसे डिस्क्राइब करूं।

टेलीविजन पर आजकल वही शो चलता है जिसमें तड़का लगा हो?
पता नहीं यार, पकवान भी अलग-अलग तरह के होते हैं। और, मैं तो बनाता ही अंदाजे से हूं। मेरी कोशिश ये रहती है कि उसका एक अलग डिसटिंक्ट स्वाद बरकरार रहे। अलग महक आए। वरना ये होता है कि हम जब कभी-कभी रेस्टोरेंट में जाते हैं, तो वहां हमको मसाला सेम मिलता है, हर डिश में वही मसाला है। यानी चाहे में बैंगन का भर्ता ऑर्डर करूं या कबाब, मसाला मुझे वही मिलना है। इसलिए मैं जो भी बनाता हूं कोशिश करता हूं कि उसमें अलग स्वाद आए, अलग महक आए। इस शो में भी वही कोशिश है करने की। आशा है लोगों को पसंद भी आएगा।

सत्यमेव जयते में क्या अलग है?
आज तक जितनी भी फिल्में मैंने की हैं, उनमें अलग-अलग किरदार निभाए हैं। और कुछ हद तक हर किरदार में आपको मैं भी कहीं न कहीं नजर आया होउंगा, पर ये पहली बार होगा कि मैं जो हूं, मैं जिस किस्म का इंसान हूं वैसा दिखूंगा, किसी टीवी शो के कैरेक्टर की तरह नहीं। पहली बार आपको आमिर खान यानी मेर पर्सनैलिटी देखने को मिलेगी।

खुद होस्ट बने हैं, आपका फेवरेट होस्ट कौन है?
बहुत सी चार्मिंग पर्सनैलिटी वाले लोग हैं। अमित जी, शाहरुख, रितिक, सलमान। मैं एक टाइम में सिद्धार्थ बासु के क्विज शो देखता था। खूब एंजॉय करता था। एक स्पोट्र्स होस्ट थे एस.आर. तलियाज, ऐसा ही कुछ नाम था उनका, जिन्हें मैं रियली एंजॉय किया करता था। वो अमेजिंग टेलीविजन होस्ट थे।

सत्यमेव जयते के बारे में...
# 22 सालों में मेरा सबसे महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट है।
# अगर जो सोचा है उसका दसवां हिस्सा भी पा लिया तो निहाल हो जाऊंगा।
# शो में मैं ट्रैवल करूंगा, कभी नहीं कर पाया तो लोग मुझ तक आएंगे।
# अगर शो के दौरान मेरे अंदर का असली आमिर फूट पड़े तो मुझे कोई एतराज नहीं है।
# मैंने उदय से कहा कि यार उदय, हम ये शो तो करेंगे पर आई वॉन्ट ऑल योर चैनल्स। क्योंकि इसे हर व्यक्ति देखे। और उसे देखना भी चाहिए। जिस वक्त हिंदी इंग्लिश में आएगा, उसी वक्त बाकी भाषाओं में भी साथ-साथ प्रसारित होगा।

कुछ केसर के पत्ते जो रह गए...
# अम्मी मुझे कहती है कि अभी तुम जो कमा रहे हो उसका चार गुना ज्यादा कमा सकते हो। पर मुझे प्राइस में इंट्रेस्ट नहीं है, मुझे काम इंट्रेस्ट करना चाहिए।
# अभी ‘द ड्यून सीरिज’ पढ़ रहा हूं।
# मैं चैनल बदलता रहता हूं। रुकता वहीं हूं जहां गोविंदा जी की फिल्में आ रही होती हैं। उनकी फिल्मों में ह्यूमर बहुत होता है।
# कभी अपनी ऑटोबायोग्रफी लिखना चाहूंगा। बहुत सी ऐसी चीजें भी उसमें लिखूंगा जो लोगों को नहीं पता हो।
# अभी (कुछ वक्त पहले) मेरे घर पर कंस्ट्रक्शन हो रहा है, इसलिए मैं और किरण अम्मी के साथ रह रहे हैं। टीवी पर जो अम्मी देखती हैं, वही देख लेता हूं।

भूली बिसरी पहली फिल्म ‘होली’ पर
सच मैं कहूं तो मुझे कोई आइडिया नहीं है। मैं तो ये भी भूल चुका हूं कि उसका पोस्टर कैसा दिखता था। वो फिल्म रिलीज ही नहीं हुई न। उसे नेशनल अवॉर्ड मिला तो वो टीवी पर दिखाई गई। जबरदस्ती (मजाकिया अंदाज में)। क्योंकि कोई देखना ही नहीं चाहता था। केतन ने और हमने बड़े प्यार से, चाव से बनाई थी।
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गजेंद्र सिंह भाटी

Thursday, May 3, 2012

नन्ही फिल्म ‘जस्ट दैट सॉर्ट ऑफ अ डे’ को बड़ा राष्ट्रीय पुरस्कारः बातचीत सृजन करने वाले नौजवान अभय कुमार से

 59वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार गुरुवार को दिए गए। शॉर्ट फिल्म ‘जस्ट दैट सॉर्ट ऑफ अ डे’ को उसके बेस्ट नरेशन और वॉयसओवर के लिए भी बेस्ट फिल्म का पुरस्कार मिला है। पुरस्कार ग्रहण किया योग्य एन अब्राहम ने। मिलते हैं फिल्म की संकल्पना करने वाले और उसे बनाने वाले अभय से...


मेरा घर,उड़ान, द एंड और जस्ट दैट सॉर्ट ऑफ अ डे अभय की बनाई कुछेक शॉर्ट फिल्में हैं। इन्हें यूट्यूब पर देखा जा सकता है। 26 साल के अभय फिल्में रैंडम यानी बेतरतीब तरीके से बनाते हैं। कागज पर खाका बनाकर या स्क्रिप्ट लिखकर काम नहीं करते। जब मन में आए कैमरा उठाकर निकल पड़ते हैं, शूट कर लेते हैं और उसके बाद सोचते हैं कि क्या बनाना है। मुझे उन्होंने अपने काम करने के तरीके के बारे में कुछ ऐसे ही बताया था। यह कुछ महीने पहले की ही बात है जब उनकी इस फिल्म ने न्यू यॉर्क इंडियन फिल्म फेस्टिवल में दुनिया भर की फिल्मों को हराकर बेस्ट शॉर्ट फिल्म का पुरस्कार जीता था। इससे पहले उनकी ये 13 मिनट की अनूठी हाइब्रिड फिल्म रॉटरडैम, रोजेनबर्ग, ट्रिबैका, गल्फ और बूसान फिल्म फेस्ट में जाकर आई थी। इसका प्रोमो देखने या जानने के इच्छुक यहां क्लिक कर सकते हैः

The imdb page: www.imdb.com/title/tt1733710
Promo 1: www.youtube.com/watch?v=wWt6TZ_BKfQ
Promo 2: www.vimeo.com/18322555

तो, उस दौरान ही अभय से बात हुई थी। तमाम असंभावनाओं के बीच वह लगे हुए थे, जायज सवाल और जायज गुस्सा भी उनमें था, पर संयमित। फिलहाल वह अपने नए प्रोजेक्ट मे व्यस्त हैं। कुछ नया कर रहे हैं और सार्थक भी, आशा है कि वह इसमें सफल होंगे और मन का कर पाएंगे। प्रस्तुत है उनसे तब हुई बातचीत के कुछ अंशः
 अपने बारे में?
मेरे पापा सिविल सर्वेंट हैं। चंडीगढ़ में ही पैदा हुआ। वहीं सेक्टर-7 में घर है। सेंट जोन्स स्कूल में पढ़ाई हुई। डीएवी कॉलेज से प्लस टू किया। फिर दिल्ली से मॉस कम्युनिकेशन की पढ़ाई की। घर में एक भाई है जो एम्स, दिल्ली में है। पापा की पोस्टिंग लुधियाना हो गई। मैं 2007 में बॉम्बे आ गया। तब से कुछेक फिल्ममेकर्स को असिस्ट कर चुका हूं। उनमें से एक थे अमोल पालेकर। उनके साथ काम किया। फिर मुंबई में रहते हुए अपने मन की फिल्में बनाने की कोशिश और जर्नी शुरू हुई। हाथ के हाथ पैसे भी बनाने थे तो ऐड फिल्में करने लगा। शॉर्ट फिल्म बनाने में उतना वक्त नहीं लगता, पर चूंकि ये नया मीडियम था तो लगा। अभी भी विज्ञापन फिल्में कर लेता हूं, कॉलेज वीडियो बना देता हूं, इधर-उधर फ्रीलांस कर लेता हूं। फैमिली भी कुछ परेशान रहती है, मां कहती है कि सिक्योरिटी नहीं है, ये काम छोड़ दो।

आइडिया कैसे आया हाइब्रिड फिल्म बनाने का?
हाइब्रिड मीडियम भारत में अभी तक किसी ने नहीं किया है। एक्सीडेंटली हमने कर लिया। मैं और मेरी टीम के दिमाग में आया। उस पर भी हम लोग एनिमेटर नहीं हैं। हमने एनिमेशन को रियल लाइफ में शूट नहीं किया है। हर फ्रेम हाथ से बनाया है। फिर दस साल में मीडियम इवॉल्व होता गया। ‘जस्ट दैट सॉर्ट ऑफ अ डे’ जब इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल्स में घूमने लगी तो पहली ऐसी इंडियन फिल्म हो गई जिसे एनिमेशन कैटेगरी में पुकारा जाने लगा। वह ऑफिशियली एनिमेशन फिल्म कही जाने लगी, जबकि हमें एनिमेशन आता भी नहीं है।

फिल्म को प्रोमो में गोविंद निहलाणी, शेखर कपूर, अमोल गुप्ते, शिवाजी चंद्रभूषण, राजकुमार गुप्ता, तनूजा चंद्रा और रजत कपूर जैसों ने खूब सराहा है, यह कैसे हुआ?
हमने सब बड़े फिल्ममेकर्स को डीवीडी भेजी और उनसे उनका छोटा सा रिव्यू मांगा। उन्होंने भेजा भी। ये इसलिए किया क्योंकि आम जनता को फिल्म सीधे दिखाएंगे तो उन्हें जिज्ञासा नहीं होगी। अगर इतने बड़े लोग देखें और अपनी राय के रूप में कुछ कहें तो उसका असर पड़ता है।

फिल्म फेस्ट में पहली बार गए हैं?
नहीं, मैंने पहले भी शॉर्ट फिल्में बनाई हैं। मामी फिल्म फेस्ट पिछले दो साल से जीत रहा हूं। ‘उड़ान’ नाम की मेरी जो फिल्म थी उस पर कॉन्ट्रोवर्सी भी हुई थी, दरअसल मैंने एक सम्मानित यंग डायरेक्टर को भी इसकी डीवीडी दी थी, उनकी तरफ से आगे कोई रिएक्शन नहीं आया, मगर कुछ वक्त में उनकी खुद की एक फिल्म आ गई, जो क्रिटिकली बहुत ज्यादा सराही गई, जिसकी कहानी पूरी तरह मेरी बनाई शॉर्ट फिल्म ‘उड़ान’ से प्रेरित थी। पर मैं विवादों में नहीं पड़ना चाहता इसलिए कुछ ज्यादा कहता नहीं हूं।

स्ट्रगल, और किसी को असिस्ट करने के बीच लाइफ कैसी है?
स्ट्रगल तो करना पड़ता है, करना पड़ेगा। लगता है कि बॉम्बे जाओ और किसी को असिस्ट करो, पर मैंने ऐसा नहीं किया। मुझे असिस्ट करना अच्छा नहीं लगा। अपना तरीका है। जहां तक लाइफ का सवाल है तो वह अचानक से नहीं बदली है। जैसे-जैसे लोगों ने मेरा काम देखा है, उनकी मेरे आने वाले काम को लेकर उम्मीदें बढ़ गई हैं। मगर मैं अब भी जूझता हूं। मन में आता रहता है कि क्या बॉम्बे छोड़ दूं, ऐसे अनेकों ख्यालों से जूझता रहता हूं। घर ढूंढना है, उसका किराया देना है, ये सब उफनता रहता है जेहन में।

तो निकट भविष्य में क्या करना है?
अभी तो काफी टाइम से शॉर्ट फिल्मों पर ही काम कर रहा हूं। अगला कदम ये होगा कि वेबसाइट बनाना चाहता हूं। ताकि लोगों से जुड़ पाऊं। पिछले दो साल में काफी लोगों ने मेरे काम को देखा है, पर मेरे बारे में वो नहीं जानते, लेकिन जानना चाहते हैं। तो इससे वो काम सधेगा। ‘जस्ट दैट...’ को मैंने 2000 से भी कम रुपये में बनाया है। आगे भी हम कम बजट में अच्छी विषय-वस्तु बनाना चाहते हैं। फिर सोचता हूं कि आखिरकार लंबी फीचर फिल्म बनाऊंगा। लेकिन लगता नहीं कि इंडिया में मेरे आइडिया पर कोई प्रोड्यूसर पैसा लगाएगा। मैं तो चाहता हूं कि आज ही फीचर पर काम शुरू कर दूं।

बचपन-जवानी के दोस्त क्या कहते हैं, कि ‘यार तू तो फिल्में बनाने लग गया’?
आधे से ज्यादा मेरे लुधियाना और चंडीगढ़ वाले दोस्तों को तो पता भी नहीं कि मैं क्या कर रहा हूं। एमएनसी में काम कर रहे हैं। कुछ अखबार में पढ़ते हैं जैसे हाल ही में ‘द हिंदू’ में एक आर्टिकल आया था। तो जब पढ़ते हैं तो सरप्राइज होते हैं।

आपकी टीम में कौन-कौन हैं और काम कैसे करते हैं?
तीन लोग हैं हम। मैं, मेरी असोसिएट डायरेक्टर अर्चना और म्यूजिक संभालने वाला शेन मेंडोसा। हमारी टीम इसी फिल्म से बनी। एक्टिंग तो मैं कर ही लेता हूं। कभी जल्दी शूट करना होता है तो एक्टर ढूंढना बड़ी प्रॉब्लम हो जाती है, इसलिए। फिल्म हैंडीकेम में शूट की है। काम चलता रहता है। फॉन्ट इक्विपमेंट नहीं हो तो भी, ऑडियो इक्विपमेंट नहीं हो तो भी है, लाइट न हो तो भी।

‘जस्ट दैट सॉर्ट...’ हो या आपकी पुरानी शॉर्ट फिल्म ‘द एंड’, सभी में एब्सट्रैक्ट बातें बहुत होती हैं, क्या फिल्मों की रुचि भी आपकी वैसी ही है?
मेरी फिल्म बहुत कॉम्पलिकेटेड हो सकती है, पर दूसरों की देखता हूं तो सिंपली देखता है। हमारी जेनरेशन की प्रॉब्लम रही है कि हॉलीवुड देखकर बड़े हुए हैं।

आपकी फिल्मों को प्रतिक्रियाएं कैसी मिली हैं?
मुझे लगता है कि मेरा काम अप्रीशिएट नहीं किया गया। न्यू यॉर्क गया, यूरोप गया। पर यहां आया तो वही दिक्कत, सिस्टम से लड़ना। ‘जस्ट दैट सॉर्ट...’ रिजेक्ट हो रही है, क्यों, नहीं पता।

हाल ही में कई बड़े बजट वाली बुरी बनी फिल्में आईं, जिनपर 40 से 80 करोड़ रुपये तक खर्च हुए, पर दर्शकों के लिए उनमें देखने को कुछ नहीं था। दूसरी ओर आप जैसे नए लड़के हैं जो नगण्य संसाधनों में फिल्में बना रहे हैं और दुनिया उस काम को सराह रही है।
जैसे, ‘डबल धमाल’ आती है। अनीस बज्मी की फिल्में तो लगता है कि ...मेरे मन में कुछ हो नहीं पाता है। मतलब, मैं सोच भी नहीं पाता हूं कि ये फिल्में बन भी कैसे जाती हैं। कोरियन या जापानी या थाई इंडस्ट्री को लीजिए। छोटे देश हैं पर उनकी बहुत रिस्पेक्ट और पहचान है। हमारी पहचान क्या बनी हुई है कि साहब, बॉलीवुड मतलब सॉन्ग और डांस। हमारे रीजनल सिनेमा में कमाल की फिल्में बन रही है, मसलन मराठी में।

मुंबई में कोई ग्रुप बना है?
नेटवर्किंग तो मैं कर ही नहीं पाता हूं। मुंबई में ले दे कर दो लोगों को जानता हूं, मेरी टीम के। वैसे अनुराग कश्यप से मिला था। उन्होंने कहा कि जरूरत हो तो बताना। विक्रमादित्य (मोटवाणी) से दोस्ती हुई।

क्या हो कि नए लड़कों या इंडिपेंडेंट फिल्मकारों को मदद हो जाए?
मेरे सिर्फ कूरियर-कूरियर का खर्चा एक लाख पड़ गया, ‘जस्ट दैट सॉर्ट...’ के दौरान। कूरियर और टेप्स जैसी फालतू चीजों में इतने रुपए लगा दिए। फिल्म मैंने दो हजार रुपए में बनाई। सोचिए एक लाख जोड़कर बनाता तो मैं कितनी अच्छी फिल्म बना लेता। बाहर के फिल्म फेस्ट में गया तो लोगों से मैंने पूछा, उन्होंने बताया कि उनके मुल्कों में फिल्म कॉरपोरेशन होती हैं। प्रोजेक्ट अच्छा होता है तो अच्छा खासा फंड देती हैं। अस्सी फीसदी ऊर्जा तो सिस्टम से लड़ने में चली जाती है। पूरी एनर्जी सिर्फ फिल्मों में लगा पाएं तो बहुत अच्छा परफॉर्म कर सकते हैं।
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गजेंद्र सिंह भाटी

Wednesday, May 2, 2012

वर्ष की दूसरी सर्वोत्कृष्ट फिल्म 'विकी डोनर', इट्स मैजिक!

फिल्मः विकी डोनर
निर्देशकः शुजित सरकार
कास्टः आयुष्मान खुराना, यामी गौतम, कमलेश गिल, डॉली अहलुवालिया, जतिन दास, अन्नू कपूर
स्टारः साढ़े तीन, 3.5


आमतौर पर बड़ी दिक्कत होती है। ऐसी फिल्मों के पहले और बाद में। पहले इनके प्रोमो कुछ-कुछ क्लीशे से लगते हैं। कि, कहीं वही पंजाबी एक्सेंट तो नहीं होगा? पटकथा लचर तो नहीं होगी? इतना एडल्ट मुद्दा कहीं हिट करवाने के शॉर्टकट के तौर पर तो नहीं चुन लिया गया है? ऐसे एडल्ट मुद्दे को गरिमामय ढंग से फिल्म में तब्दील किया जाएगा? क्योंकि यकीन मानिए बड़ी ‘गोलमाल’, ‘रास्कल्स’ और ‘क्या कूल हैं हम’ (अब क्या सुपरकूल हैं हम) झेली हैं। और, जब ये फिल्म आ जाती है, दिलों में बस जाती है तो दिक्कत ये होती है कि इसे शब्दों में बांधकर क्यों कम करें? क्योंकि ‘विकी डोनर’ जैसी फिल्म बस देखने और उस देखने की खुशी महसूस करने के लिए ही होती हैं। पर बात करनी तो पड़ेगी ही।

सबसे पहले फिल्म को टीवी, डीवीडी या थियेटर में देखने जा रहे लोगों के लिए।

‘विकी डोनर’ जोरदार फिल्म है। किसी भी वक्त मन को हल्का करने के लिए देखी जा सकने वाली फिल्म। दुनियावी तनावों से आपका ध्यान बंटाएगी। आप घरेलू परेशानियों को भूल जाएंगे। फिल्म खत्म होने पर ये भावना भी नहीं आती कि हम किस दुनिया में लौट आए। कि ये फिल्मी दुनिया महज तीन घंटे की ही क्यों होती है (इस जमाने में तो बस दो घंटे की ही होती है)। मैं आश्वस्त हूं ऐसे बहुत से बच्चे या युवा रहे होंगे जिन्होंने ‘कोई मिल गया’ देखी होगी। उन्होंने खुद को इस दुनिया में रोहित मेहरा (ऋतिक) सा कमजोर और सताया गया महसूस किया होगा। फिर कहानी में नीला जादू आता है (‘ई.टी.’ और ‘क्लोज्ड एनकाउंटर्स ऑफ द थर्ड काइंड’ की बदौलत निर्देशक राकेश रोशन लाने की सोचते हैं), वह आता है और अपनी परलौकिक शक्तियों से रोहित को एक छोटे से बच्चे वाले दिमाग से अतिचतुर और ह्रष्ट-पुष्ट बना देता है। फिर नीली कमीज और लाल पेंट पहने रोहित को सुबह अपने घर से निकलते देख बाल मन मोहित हो जाता है। क्लब में नाचने की चुनौती का जवाब देते हुए रोहित गाता है...

कच्चा नहीं कुछ भी
पक्का नहीं कुछ भी
होता है जो कुछ भी
सब खेल है
परदे के गिरते ही
परदे के उठते ही
बदला नहीं जो
बदल सकता है
ये कि, कच्चा नहीं कुछ भी
पक्का नहीं कुछ भी
होता है जो कुछ भी
सब खेल है
इट्स मैजिक...

इब्राहीम अश्क के लिखे इन बोलों में तमाम सिनेमाविधि, विधान और सम्मोहन का सार है। बात हर किसी के कच्चे, और कच्चे से पक्के हो जाने की भी है, जो रोहित होता है, हमारी फिल्मों के तमाम हीरो लोग होते हैं, कच्चे से पक्के। और, जो कुछ भी होता है सब खेल ही है। बात परदे पर आती है। जो कभी हमारी जिंदगियों (‘टैरी’ की तरह) में नहीं बदला वो सिनेमा का परदा उठते ही बदल जाता है। इट्स मैजिक। मैजिक की बदौलत खूबसूरत निशा (प्रीति जिंटा) को प्रभावित करने का सुख पाते हुए रोहित जो नाचता है कि सम्मोहित मन वाले दर्शकों का जीवन नरक हो जाता है, थियेटर से बाहर निकलते ही। कि यार जिदंगी बेकार है, कहीं जाकर मर जाएं तो ठीक रहे। काश, हम भी रोहित की तरह नाच पाते। काश मैं भी रोहित की तरह छह फुटा होता, मेरे भी डोले ऐसे होते, मेरी भी बॉडी ऐसी होती, मुझमें भी शक्तियां होती और मैं रोहित (सब-कॉन्शियस माइंड में ऋतिक रोशन जैसा डांस) की तरह नाच पाता।

यकीन जानिए आप हर ‘कोई मिल गया’, ‘कृष’, ‘वॉन्टेड’, ‘गजनी’, ‘थ्री इडियट्स’, ‘मिशन इम्पॉसिबल’ और ‘द अवेंजर्स’ से बाहर निकलते हुए यही सोचते हैं। काश, मैं भी ऐसा हो पाता। थियेटर की पार्किंग में पहुंचते हुए जब ये यकीन हो जाता है कि वो सपनीली दुनिया तो तीन घंटे ही चली और अब हम पथरीले रोजमर्रा के धरातल पर हैं, जहां सिर्फ महंगाई-चुनौतियां-दुश्वारियां-हतोत्साहन-पिटाई-गुंडागर्दी और निराशा है, तो मस्तिष्क की अखरोट सरीखी गलियों में तेजाब सा ज्वारभाटा उबलता है। एक आम इंसान और आम बच्चा और एक आम युवा होते हुए फिल्मी जीवन की तरह खुद को बदल न पाना, खास न हो पाना, ये कष्ट देता है।

उसी दौर में पिछले साल ‘दो दूनी चार’ आई थी, इस साल ‘विकी डोनर’ आई है। आप इन फिल्मों को देखकर निकलते हैं तो मनोरंजन वाली जरूरतें भी पूरी हो चुकी होती हैं और मस्तिष्क को तेजाबी ज्वारभाटा भी नहीं जलाता। सिनेमा में इससे राहत की बात कोई दूजी नहीं हो सकती। सिनेमा की इतनी खुशी की बात दूजी नहीं हो सकती। ये राहत और खुशी देती है ‘विकी डोनर’।

हम बात कर रहे थे फिल्म देखने जा रहे आप लोगों के लिए।

परिवार और बच्चों के साथ बैठकर देखने में आयुवर्ग के लिहाज से क्या आपत्ति हो सकती है स्पष्ट कर दूं। फिल्म में एक दो किसिंग सीन है। लिपलॉक, जो लिपलॉक जैसे हैं नहीं। हमारी फिल्मों और फिल्मकारों को स्टार मूवीज और ‘बोल्ड एंड द ब्यूटिफुल’ ने भारत रहते ही होठ से होठ मिलाने की जो आधुनिकता दी है, उसे सनसनी के इतर साधारण ढंग से ‘विकी डोनर’ में पिरोया देख व्यस्क खुश हो सकते हैं। परिवार के साथ बैठे सदस्यगण असहज होने लगेंगे, पर जब तक शर्म से मुंह लाल होने को होगा फिल्म आगे बढ़ चुकी होगी।

आगे स्पर्म यानी शुक्राणुओं और बच्चा पैदा करने वाली कुछ व्यस्क बातें हैं, जो युवाओं को सबसे ज्यादा समझ आएंगी। यानी युवाओं को सबसे ज्यादा हंसी आएगी, भई शुक्राणुओं की उम्र में उन्होंने अभी-अभी प्रवेश ही किया है। अब कमाई करते हैं, मल्टीप्लेक्स में जाना भी उनके हाथ है, और महानगरों में तो वीकेंड में मल्टीप्लेक्स जाकर नौ सौ-हजार रुपये टिकिट-पॉपकॉर्न-नाचौज-पेप्सी-बर्गर के कॉम्बो पर खर्च करना तो प्रथा बन गई है (ऐसी प्रथाएं जिन्हें तोड़ने के लिए अगली से अगली पीढ़ी के युवाओं को न जाने कितने पिंक-रेड-यैलो रेवोल्यूशन करने पड़ेंगे), इसलिए स्पर्म वाले जुमलों पर अपने पार्टनर के साथ फिल्म देखते हुए जोड़ों को खूब हंसी आएगी। हां, बच्चे जरूर शून्य महसूस करेंगे। पर बच्चों को भी मौजूदा मनोरंजन और मीडिया ने कम उम्र में ही एडल्ट कर दिया है, वे सब समझने लगे हैं। बाकी जो मध्यमवर्गीय दर्शकगण हैं, जिनमें साड़ी पहने भाभियां हैं, प्लेट वाली पेंट और चैक की शर्ट पहने भाईसाहब हैं, उनके छोटे-छोटे बच्चे बच्चियां हैं.. या मध्यमवर्गीय युवा हैं... ‘विकी डोनर’ के जुमलों पर उनके मुंह से हॉ... की आवाज भी निकलेगी ही।

फिल्म में 'फु**’, 'चेंप’, ‘भेन दा पकोड़ा’ और 'मेरी तो ले के रख ली आपने’ जैसे जुमले हैं, जो हंसाते हैं। हालांकि कई शब्द मर्यादित नहीं हैं, पर फिल्म में संदर्भ और हाव-भाव इतने प्राकृतिक है कि आलोचना करनी नहीं बनती। ‘विकी डोनर’ देखने वालों में शायद ही कोई होगा जो अपने दोस्त या साथी से इंटेलिजेंट स्पर्म, नॉटी स्पर्म, ग्रीडी स्पर्म और सैड स्पर्म जैसी बातें बोल हंस नहीं रहा होगा।

हालांकि मुझे 'तू आर्यन रेस है’ वाला डायलॉग अच्छा नहीं लगा। क्योंकि, ये हिंदोस्तान में नस्लों की श्रेष्ठता वाली बहस में कुछ लोगों को चुभता है और कुछ को झूठा गर्वीला अहसास देता है। पर हम आगे बढ़ते हैं।


संक्षेप में फिल्म की कहानी जानते हैं। दिल्ली में लाजपत नगर की रिफ्यूजी कॉलोनी में रहने वाले बेफिक्र लड़के विकी अरोड़ा (आयुष्मान) की कहानी है। घर में डॉली ब्यूटी पार्लर चलाने वाली कम उम्र में ही विधवा हो गई मां डॉली अरोड़ा (डॉली अहलुवालिया) हैं और दुनिया की सबसे प्यारी बीजी (कमलेश गिल)। विकी पर डॉ. बलदेव चड्ढा (अन्नू कपूर) नाम के फर्टिलिटी स्पेशलिस्ट की नजर पड़ती है। जिन्हें अपने पेशंट्स के लिए सक्सेसफुल काउंट वाले स्पर्म चाहिए। विकी में उन्हें उम्मीदें नजर आती हैं। विकी, तमाम ना-नुकुर के बाद डोनर बन भी जाता है, पर दुनिया से छिपाकर। उसकी जिंदगी में बैंक में काम करने वाली बंगाली लड़की आशिमा रॉय (यामी) आती है। मगर उससे ये राज छिपाना ही शायद आगे उन दोनों के रिश्ते को बिगाड़ जाता है।

‘विकी डोनर’ की एक छोटी सी महानता ये भी है कि यह स्पर्म डोनेशन के प्रति लोगों को जागरुक करती है। बड़ी ही आसानी से फिल्म राह भटक सकती थी, पर नहीं भटकती, सस्ती और ओछी नहीं होती, अपनी ही नजरों में नहीं गिरती। ये जागरुक करती है। एक महानता से पेट नहीं भरता तो दूसरी महानता के रूप में फिल्म का संदेश बच्चा गोद लेने का होता है। जिन निस्संतान और बंजर दंपतियों को विकल्प नहीं मिलता उन्हें फिल्म ऐसा आदर्श और व्यावहारिक समाज दिखाती है जहां स्पर्म डोनेशन की राह में जाने की बजाय बिन मां-बाप के बच्चों को गोद लिया जा सकता है। तो बच्चा अडॉप्ट करने का संदेश भी है।

चंडीगढ़ के आयुष्मान खुराना ‘रोडीज-2’ के ऑडिशन में 2004 में नजर आए। वह सीजन उन्होंने जीता भी। अपने डिंपल पड़ते गालों के साथ एमटीवी पर वीजेइंग करने लगे। बाद में टीवी के बड़े-बड़े कार्यक्रमों में इन्होंने अपनी एंकरिंग क्षमताओं और बेदाग उच्चारण से चौंकाया। हर बार वह माइक लेकर ‘म्यूजिक का महामुकाबला’ (साथ में ‘जस्ट डांस’, ‘इंडियाज गॉट टैलेंट’ और ‘एक्स्ट्रा इनिंग्स’ जैसे शो भी) जैसे शो में उतरे तो गायकों की बराबरी का तेज उनकी प्रस्तुति में था। उनमें कुछ था। पर जानते हैं, फिल्मों में सफल होने, न होने का फैसला आंखों की चमक से हर बार नहीं होता।

‘विकी डोनर’ में पहले ही सीन में जब विकी को उसकी मां डॉली छत पर बने उसके कमरे में जगाने आती हैं (बाहर धूप में बैठी विकी की बीजी को मत भूलिएगा) तो देखती हैं कि टीवी चोरी हो चुका है और विकी सो रहा है। अपने किरदार को सुगाढ्य करते हुए डॉली लाजपत नगर की डॉली ब्यूटी पार्लर वाली डॉली और विकी की मां (कम उम्र में विधवा हो चुकीं) मिसेज अरोड़ा बन जाती हैं। उनकी आवाज, अदा, अंदाज और किरदार के अध्ययन में गजब की ऊष्मा है। ऐसा ही कमलेश गिल ने अपने किरदार के साथ भी किया है। खैर, इस सीन में विकी को वह जगाती हैं, कुछ शोर मचाती हैं, विकी बने आयुष्मान उठते हैं, छत के ऊपर और दीवार से नीचे झांककर देखते हैं, “देख लो आपकी बेकार साड़ियों के सहारे कूदकर भाग गया, फिर भी मुझे बोल रहे हो” (अक्षरश नहीं)। वह अपनी लगातार बड़बड़ा-चिल्ला रही मां को जवाब देते हुए इधर-ऊधर देख रहे हैं और ऊधर दादी बनी कमलेश गिल (दिल्ली की शानदार थियेटर एक्टर, भगवान उन्हें लंबी उम्र बख्शे) अपने पोते का पक्ष ले रही हैं। अब इस सीन में देखिए। पहला तो आयुष्मान, डॉली और कमलेश का तालमेल कमाल का है। सीन की गति बनी रहती है, वह भी विशुद्ध यथार्थ के साथ। बाद में मां का बड़बड़ाना सुनने से ऊबा विकी उनका कुत्ता लेकर सीढ़ियां उतर जाने लगता है। मां डॉली की टोन तुरंत बदल जाती है, “अरे, इसे कहां ले जा रहा है, तू वापिस आजा, सुन तो सही”। फिर जब वह चला जाता है तो शायद ये कहना कि “मुझे मेरा टीवी चाहिए बस मैं कुछ नहीं जानती”। तब तक दादी अपनी बहू को साथ के साथ कोस चुकी होती हैं (सहनीय कोसना) जब डॉली सीढ़ियां उतरने लगती हैं तो दादी कहती है “सुन तो मुझे एक चाय तो बना दे”।

 .... अब आप क्या कहेंगे, इस सीन के बारे में। हिमाचल मूल की और विज्ञापन जगत की पृष्ठभूमि वाली जूही चतुर्वेदी फिल्म की जुबान हैं। उन्होंने ही कहानी, पटकथा और संवाद लिखे हैं। फिल्म की कहानी जिस दिल्ली के लाजपत नगर में बसी है, जूही काफी वक्त वहीं रही है। ऐसी ही डॉलियों, दादियों और विकियों के बीच। किसी भी लहजे और हाल में ‘विकी डोनर’ की आत्मा बनी पटकथा का श्रेय जूही के अलावा किसी दूसरे को नहीं दिया जा सकता। स्पर्म डोनेशन को और बच्चा गोद लेने को संदेश बना देना, रात में डॉली और उनकी सास के दारू पीते हुए अत्यधिक रोचक सीन गढ़ देना, विकी और आशिमा के परिवारवालों के बीच पंजू (पंजाबी) और बॉन्ग (बंगाली) को लेकर इतने कलाकारी भरे हिलाने वाले लेकिन मजाकिया हालात पैदा कर देना, बंगालियों से भंगड़ा करवा देना... ये सब जूही चतुर्वेदी की समझ से आया। वो ही लाईं। यहां तक कि एक छोटी सी चीज है। विकी और आशिमा चैट कर रहे हैं। विकी उसे ‘फिश’ लिखता है तो आशिमा का जवाब आता है ‘बटर चिकन’। एक-दूसरे को दिए इन नामों से दोनों के बंगाली-पंजाबी बैकग्राउंड तो पता चलते ही हैं, बल्कि संबोधनों के पुराने ढर्रे में भी ताजगी आती है।

एक और सीन में जूही की लेखनी की कल्पना करते हुए गौर कीजिए। आशिमा अपने घर आ चुकी है, विकी की शक्ल भी नहीं देखना चाहती। उसके पिता के रोल में (मरहूम महान उत्पल दत्त की याद दिलाते अनेकों-अनेक तारीफों के हकदार) एक्टर जयंत दास पहले तो कहते हैं कि “तुम इतनी आधुनिक होकर इन बातों को इश्यू बना रही हो कि विकी कभी स्पर्म डोनेशन किया करता था”। कुछ सीन बाद वह एक बार फिर अपनी बेटी से कहते हैं, “तुम विकी से इसलिए नाराज हो कि उसने तुम्हें बताया नहीं कि वह स्पर्म डोनेशन करता था, या इसलिए कि तुम कभी मां नहीं बन सकती लेकिन वह पिता बन सकता है”

देखिए, कितने रंग साथ घुल रहे हैं। इसी से फिल्म कमाल हो रही है। जूही के संवाद और स्थितियां हैं, जयंत दास - डॉली अहलुवालिया – आयुष्मान – कमलेश गिल – अन्नू कपूर – यामी का सहज अभिनय है और शुजित सरकार की दृष्टिकोण है। किरदारों की रंगत और रुख क्या रहना है, उनका निर्देशन बखूबी तय कर रहा है। 2004 में आई अपनी फिल्म ‘यहां’ के निर्देशन में भी उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी थी। वह एक अच्छी फिल्म थी, बस लोगों के दिलों तक पहुंच नहीं पाई। मगर ‘विकी डोनर’ के साथ शुजित को इंसाफ मिल गया है।

लंबे अरसे से फिल्मों में डॉली, जयंत और कमलेश गिल जैसे अदाकार और उन से किरदार नहीं आए थे। ‘विकी डोनर’ के साथ आए और तृप्ति दे गए। इसमें डॉ. चड्ढा की भूमिका में अन्नू कपूर को नहीं भूला जा सकता। उनके किरदार जैसे किरदार तो बहुत आए हैं, पर उनकी तरह निभाए किसी ने नहीं है। मैं शर्त लगाता हूं उनकी तरह कोई ‘भेन दा पकोड़ा’ या ‘भेन दा परौंठा’ कहकर दिखा दे। कोई स्पर्म के आगे अलग-अलग मूड के साथ इंटेलिजेंट, नॉटी, कन्फ्यूज्ड और अलग-अलग अलंकार लगाकर दिखा दे, कोई उनकी तरह “ये तो ऋषि मुनियों के टाइम से चला आ रहा है, पहले के जमाने में औरतों के बच्चे नहीं होते थे तो वो बाबाओं के पास जाती थी, बाबा बच्चे नहीं, बाबा ने कुछ नी करना, .... (हाथ से इशारे बनाते हुए).. लो हो गया..”। अन्नू कपूर को परदे पर देखना हमेशा आनंद होता है। भले ही ‘जमाई राजा’ में पल्टू के रोल में या ‘मिस्टर इंडिया’ में एडिटर गायतोंडे बने हुए... दर्जनों शानदार रोल ऐसे हैं जिनमें वह मुख्य किरदारों के बराबर खड़े दिखते हैं। ‘गर्दिश’ में भीख मांगने को बिजनेस बनाने वाले मनीषभाई हरीशभाई को क्यों भूलते हैं।

‘पान सिंह तोमर’ के बाद इस साल की दूसरी सबसे उत्कृष्ट प्यारी सी फिल्म है ‘विकी डोनर’। जरूर देखें।

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गजेंद्र सिंह भाटी