Monday, April 30, 2012

देवत्व बड़ी बात नहीं है मनुष्यत्व है: मानवीय गुणों वाली ऐसी ही पौराणिक फिल्म 'रैथ ऑफ द टाइटन्स'

फिल्म: रैथ ऑफ टाइटन्स
निर्देशक: जोनाथन लीब्समैन
कास्ट: सैम वर्थिंगटन, टॉबी कबेल, रोजमंड पाइक, लियाम नीसन, एडगर रमाइरेज, राल्फ फिएन्स
स्टार: साढ़े तीन, 3.5


मुझे डर था कि डायरेक्टर जोनाथन लीब्समैन की 'रैथ ऑफ द टाइटन्स' कहीं कुछ महीने पहले रिलीज हुई तरसेम सिंह की 'इममॉर्टल्स' जैसी ही न निकले। शुक्र था ऐसा नहीं हुआ। ये फिल्म भंयकर विजुअल इफैक्ट्स वाली है। इसमें ज्वालामुखी की आग से बना विशालकाय दानव क्रोनोस है। यहां हथौड़े के प्रहार देवताओं के सिरों पर पड़ते हैं, आवाज आती है जैसे कोई गाडिय़ा-लोहार बर्तन टांच रहा हो। यहां दो मुंह वाला आग उगलता प्राणी किमेरा मछुआरों के पूरे गांव में विनाश मचा देता है। टारटरस की जेल से निकले तीन धड़ और आधा दर्जन हाथों वाले खूनी पिशाच सेनाओं पर हमला बोलते हैं। ऐसा और भी बहुत कुछ है। मगर फिल्म में लीब्समैन ने हास्य को इतने सुंदर तरीके से पिरोया है, जो मैंने 'हैरी पॉटर', 'ट्रांसफॉर्मर्स' या किसी भी दूसरी पौराणिक सी लगने वाली थ्रीडी फिल्म में नहीं देखा है। ये बड़ी बात है।

मसलन, जब जंगल में पर्सियस का सामना मध्यनेत्र वाले ताड़ के पेड़ से भी लंबे मानवों से होता है। बाद में उन विशालकाय मानवों को पता चलता है कि वह देवताओं के राजा का पुत्र है, तो वो उसका साथ देते हैं। पर्वतों से होकर उनके गुजरने वाले सीन में एक महामानव अपना सिर ही मसलता रहता है, क्योंकि पर्सियस ने उसे सिर पर उसी जगह पीटा था। दूसरा, वह सीन, जहां क्वीन एंड्रोमडा के पास हीरे और ताज चुराने वाला एजेनॉर (देवता पसाइडन का बेटा) कैद है। फिल्म में वह सबसे फनी है। एक्टर टॉबी कबेल का शानदार काम। जब वह भूलभुलैया में खो जाता है तो वहां क्लूलेस होना या बड़बोला बनना या आखिरी सीन में पर्सियस के बेटे हेलियस को बुलाना (एंड्रोमडा के साथ पर्सियस की प्रेम कहानी बताने के अंदाज में), उससे बातें करना। टॉबी इस भारी-भरकम फिल्म को अपने मिजाज से इतना स्ट्रेस फ्री कर देते हैं कि मनोरंजनरसास्वादन करने की प्रक्रिया में हमें बतौर दर्शक कोई मशक्कत नहीं करनी पड़ती।

हास्य की बात करूं तो ब्रिटिश एक्टर बिल नाइली कहानी में तकनीक के देवता हेफेस्टस बने हैं। उनका पहला सीन बेहद रोचक और हंसाऊ है। बेहतरीन। इस सीन को देखकर अभिनय के छात्र कुछ बेहद बारीक और शानदार गुर सीख सकते हैं। पर्सियस, एजेनॉर और एंड्रोमडा आते हैं हेपेस्टस से मदद मांगने। जब वह उसके निवास स्थान में घुसते हैं तो वह बड़बड़ता हुआ आता है जैसे अंदर कोई और भी बैठा है। वह एक बात तीनों आगंतुकों से सुनता हैं तो उसका जवाब देने के लिए पीछे मुड़कर अंधेरे में किसी से पूछता है, कि वो ऐसा कह रहे हैं, करना है कि नहीं। हर बार सुनने और पूछकर बताने की प्रक्रिया दोहराता है। जबकि होता यह है कि अंदर कोई नहीं होता। वह तकनीक का देवता है पर रहता इस मजाकिया इंसानी अंदाज में है, जैसे कि हमारी फिल्मों में जगदीप और दिनेश हिंगोरानी रहा करते थे।

कहानी दो साल पहले आई 'क्लैश ऑफ द टाइटन्स' के बाद आगे बढ़ती है। जैसा कि सब जानते हैं पर्सियस (सैम वर्थिंगटन) देवताओं के राजा ज्यूस (लियाम नीसन) का बेटा है। वह अपने 10 साल के बेटे हेलियस का साथ पाने के लिए एक साधारण मछुआरा बनकर रह रहा है। एक दिन ज्यूस आकर पर्सियस से दुनिया की रक्षा करने को कहता है। क्योंकि पाताल में टारटरस जेल की दीवारें कमजोर हो रही हैं, जिसमें कई शैतान और राक्षस क्रोनोस कैद हैं। उन्हें आजाद कराने में ज्यूस का ही दूसरा बेटा युद्ध का देवता ऐरस (एडगर रमाइरेज) और ज्यूस का भाई पाताल का देवता हेडस (राल्फ फिएन्स) लगे हुए हैं। मगर पर्सियस मना कर देता है। वह अपनी आम इंसान वाली जिंदगी और बेटे के साथ को खोना नहीं चाहता है। मगर बाद में जब ज्यूस को पाताल में ऐरस और हेडस कैद कर लेते हैं तो पर्सियस के लिए लडऩे के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता। इस काम में उसे क्वीन एंड्रोमडा (रोजमंड पाइक) और एजेनॉर (टॉबी कबेल) का साथ मिलता है।

अपनी तकनीक और पौराणिक कहानी में यह फिल्म जितनी भारी है, अपने इंसानी होने में उतनी ही सरल। किरदारों का हंसना-हंसाना, गिरना-गिराना, पिटना-पीटना और गलतियां करना उसे महज विजुअल इफैक्ट वाले काल्पनिक किरदारों की कहानी ही नहीं रहने देता, ये सब दर्शकों को उनकी रोजमर्रा की भावनाओं जैसा ही लगने लगता है। इसी वजह से 'रैथ ऑफ...' उनके करीब हो जाती है।

लीब्समैन ने पिछले साल 'बैटलफील्ड: लॉस एंजेल्स' के निर्देशन में जितना निरुत्साहित किया था, 'रैथ ऑफ...' में उतना ही खुश। फिल्म बड़ी संतुलित है। शानदार विजुअल इफैक्ट्स हैं जो थ्रीडी में भी अंधेरे भरे नहीं लगते। इतने सारे किरदारों और पौराणिक पहलुओं के बावजूद फिल्म बड़ी आसान लगती है। दैत्यों, दानवों, पिशाचों, देवताओं, इंसानों और उडऩे वाले घोड़े (पर्सियस का काला घोड़ा पगेसस) की गाथा होने के बावजूद फिल्म में इमोशन बहुत सारे हैं, बहुत अच्छे से हैं।

हर बार थ्रीडी फिल्मों और महाइंसानी किरदारों वाली फिल्मों से मेरी शिकायत रहती है कि उनमें इमोशन नहीं हैं। यहां वह शिकायत काफी हद तक दूर होती है।
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गजेंद्र सिंह भाटी

Sunday, April 29, 2012

अल्हड़ ओल्ड फैशन्ड अवेंजर्सः आयरन मैन, थोर, हल्क, कैप्टन अमेरिका (हॉकआइ और ब्लैक विडो भी)

फिल्मः द अवेंजर्स
निर्देशकः जॉस वेडन
कास्टः मार्क रफैलो, रॉबर्ट डाउनी जूनियर, क्रिस हेम्सवर्थ, टॉम हिडलस्टन, स्कारलेट जोहानसन, क्रिस इवॉन्स, जैरेमी रैनर, सेमुअल एल. जैक्सन
स्टारः तीन, 3.0

' अवेंजर्स’ में खूब हंसा देने वाला सीन क्लाइमैक्स से जरा पहले आता है। न्यू यॉर्क में अवेंजर्स यानी मार्वल कॉमिक्स के सुपरहीरोज और अंतरिक्ष से आए चितौरी राक्षसों के बीच जंग छिड़ी हुई है। टोनी स्टार्क की गगनचुंबी इमारत स्टार्क टावर्स में सुपरविलेन लोकी और हल्क आमने-सामने खड़े हैं। हल्क उससे भिडऩे को होता है कि लोकी एक आम मनुष्य की ऐसी जुर्रत देख गुस्से में कहता है,रुको, तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई, तुम जानते हो मैं कौन हूं? मैं देवता हूं देवता, सबका राजा!” इस डायलॉग के बाद हम सच में दो सेकंड के लिए ठिठक जाते हैं। पर हमारा हल्क भी जवाब कहां देता है, वह तो बस बदमाशी करना जानता है। लोकी को उठाकर किसी बदमाश बच्चे की तरह जमीन पर पटक-पटककर मारता है। सब शॉक में हैं। कुटाई करके वह चला जाता है और लोकी जमीन में हो चुके गढ्ढे में पड़ा है। आंखें और मुंह विस्मय से खुला है। उसे यकीन नहीं हो रहा कि वह पिट गया। और, यहीं पर दर्शकों के हंस-हंसकर पेट में बल पड़ जाते हैं। फिल्म में ऐसे पलों की कमी है।

एक और सीन याद करूं तो वह भी हल्क उर्फ डॉ. ब्रूस बैनर (मार्क रफैलो) का ही है। जब इस युद्ध में अंतरिक्ष वाले छेद से विशालकाय जीवों का आना होता है तो सुपरहीरो कुछ पिछड़ते लगते हैं। इनमें कोई ऐसा नहीं है जो उन्हें रोक सके। ऐसे में एक टूटी सी बाइक पर आते हैं डॉ. ब्रूस (फिल्म में इन्हें हम पहले कलकत्ता की झुग्गियों में भारतीय गरीबों के बीच छिपकर सेवा करते देखते हैं), उनका आना मुश्किल था ऐसे में देख सब खुश होते हैं, तब तक एक उड़ता विशाल मशीनी प्राणी करीब आ चुका होता है। एक सुपरहीरो कहता है, “क्या तुम गुस्सा होने में देर नहीं कर रहे हो” (ब्रूस को हल्क बनने में वक्त लगता है क्योंकि जैसे जैसे उसे गुस्सा आता है वह विशाल होता जाता है) आखिरी बार पीछे मुड़कर देखते हुए ब्रूस बैनर कहते हैं,नहीं, तुम जानते हो क्यों? क्योंकि आई एम ऑलवेज एंग्री!” इतना कहने के अगले ही पल ब्रूस हरे महामानव हल्क में तब्दील हो जाता हैं। इस सीन में ये जो थ्रिल है, पहले औचक बड़ी स्थिति फिर इसमें चतुराई भरे संवाद का आना और बाद में तुरंत उसमें बड़े एक्शन का जुड़ते हुए शुरू हो जाना, ये पूरी फिल्म में उतना नहीं है जितना ‘द अवेंजर्स’ जैसी बड़ी कहानी में होना चाहिए था।

तो आते हैं कहानी पर, जो कुछ हद तक सपाट भी है। एक अमेरिकी रिसर्च केंद्र में असीमित ऊर्जा के भंडार टैसरैक्ट (वर्गाकार चमकती चीज) पर काम हो रहा है। मगर टैसरैक्ट खुद एक्टिवेट हो जाता है और अंतरिक्ष में उससे बने रास्ते से सुपरविलेन देवता लोकी (टॉम हिडलस्टन) धरती पर आ जाता है। वह टैसरैक्ट ले जाता है, ताकि अंतरिक्ष में बड़ा रास्ता बना सके और चितौरी राक्षसों की सेना उस रास्ते से आकर धरती का विनाश करने में उसकी मदद कर सके। हालात से निपटने के लिए गुप्त एजेंसी ‘शील्ड’ का डायरेक्टर फ्यूरी (सेमुअल एल. जैक्सन) 'अवेंजर्स मिशन’ फिर शुरू करता है। मानवता और अमेरिका को बचाने में अब हल्क (मार्क रफैलो), आयरन मैन (रॉबर्ट डाउनी जूनियर) और कैप्टन अमेरिका (क्रिस इवान्स) को बुलाया जाता है। ब्लैक विडो (स्कारलेट जोहानसन) और हॉकआइ (जैरेमी रेनर) के अलावा उनका साथ देगा लोकी का भाई और देवता थोर (क्रिस हेम्सवर्थ) भी।


‘द अवेंजर्स’ शुरू होती है सैमुअल जैक्सन के किरदार निक फ्यूरी से। शुरू के काफी हिस्से तक वह सूत्रधार बने रहते हैं, सब महानायकों को जुटाते हैं, काउंसिल से बात करते हैं और बाद में जब अवेंजर्स अपने-अपने घमंडों में मिशन भूल जाते हैं तो उन्हें इमोशनल पुश देते हैं। लेकिन इन सभी चरणों में कहीं भी सैमुअल के चेहरे पर शिफ्ट ऑफ एक्सप्रेशंस नहीं दिखता। चेहरा सपाट बना रहता है। रिसर्च सेंटर में टैसरैक्ट में अजीब सी एक्टिविटी होने लगी है, इतनी बड़ी खतरे की घंटी है, पर सैमुअल को हैरत नहीं होती। लोकी वहां प्रकट होकर डॉ. सेलविग (स्टेलन स्कार्सगार्द) और बार्टन (जैरेमी रेनर) को अपना गुलाम बना लेता है, दोनों सैमुअल के किरदार के दो सबसे महत्वपूर्ण आदमी है, लेकिन वह चौंकते नहीं हैं, किसी बीपीओ कंपनी के दफ्तर में घूमते बॉस की तरह हल्की-फुल्की भागादौड़ करते हैं। ये भागादौड़ी शब्द भी ज्यादा ही है क्योंकि उनके कदमों की रफ्तार एक-आध जगह ही फिल्म में तेज होती है, अन्यथा उनके शारीरिक हाव-भाव में भी कहीं बदलाव नहीं आता। सैमुअल का इस लिहाज से कम सक्रिय होना फिल्म को कमजोर करता है।

तमाम किरदारों में तीन सबसे रोचक हैं हल्क, थोर और आयरन मैन। क्योंकि तीनों सबसे मजबूत व्यक्तिगत कहानियों, ताकतों और एटिट्यूड के साथ आते हैं। हल्क और उसके मानवी रूप डॉ. ब्रूस बैनर में पर्याप्त विरोधाभास हैं। और इस बार मार्क रफैलो की व्यक्तिगत एक्टिंग स्टाइल भी इस कॉन्ट्रास्ट में इजाफा करती है। रफैलो जितना शांत, कमजोर और टूटे-टूटे से रहते हैं, हल्क बनने पर उनकी ये वलनरेबिलिटी उतनी ही बड़ी ताकत और गुस्से के भंडार में तब्दील हो जाती है। टॉनी स्टार्क के बारे में उन्हीं के शब्दों में ही कहें तो प्लेबॉय, जीनियस, दानी और अरबपति होने के अलावा वह आयरन मैन भी हैं। तमाम सुपरहीरो में वह सबसे संपूर्ण हैं। क्लाइमैक्स वाली लड़ाई भी उन्हीं की ईमारत स्टार्क टावर्स में होती है, टैसरैक्ट के राज भी वही जानते हैं, उन्हें ये भी पता है कि गुप्तचर एजेंसी शील्ड के डायरेक्टर निक फ्यूरी टैसरैक्ट को लेकर जनसंहार के हथियार बनाना चाह रहे हैं। इसके अलावा सब सुपरहीरो में वह अकेले ही हैं जिनके पास रणनीति है। कैप्टन अमेरिका के पास भी है पर जमीनी स्तर वाली, वह चितौरी राक्षसों को रोकने या अंतरिक्ष में टैसरैक्ट की किरणों से हुए छेद को बंद करने में कुछ नहीं कर सकते। ये कोई कर सकता है तो सिर्फ आयरन मैन। और वह करता भी है। चाहे शील्ड का विशालकाय हवाई यान बंद हो जाने पर उसके पंखे को धक्का देकर चलाने का असंभव सा काम हो या परमाणु मिसाइल को अंतरिक्ष में हुए छेद के रास्ते ब्रम्हांड में चितौरियों के यान में फोड़ आना हो, ये विरले काम आयरन मैन ही करता है। रॉबर्ट डाउनी जूनियर लोहे जैसी धातू वाले जितने भारी लगने वाले आयरन मैन सूट को पहनते हैं, अपने व्यवहार में उतने ही नम्र हैं। कुछेक बेहद गंभीर मौकों पर ही वह गंभीर होते हैं, अन्यथा माहौल को राजभोग जितना ठंडा और हल्का-फुल्का बनाए रखते हैं। ठंडे केसर की खुशबू और हरे पिस्ते के रंग सा सुकून भरा। तभी तो न्यू यॉर्क के एक बड़े से टावर की ओट से उड़ते आते वक्त अपने तमाम सुपरहीरो साथियों को जब वह कहते हैं किगाइज, आई एम ब्रिंगिंग पार्टी टु यू...” तो हम स्थिति में अंदर तक घुसे लगते हैं। और, अगले ही क्षण उनके मक्खी जैसे शरीर के पीछे पहाड़ जैसा दैत्याकार मशीनी जीव उड़ता आ रहा होता है... और अचानक से हमें महसूस होता है कि उतने आसान और आसानी से बोले गए संवाद के बाद जब लार्जर दैन लाइफ चीज की दृश्य में एंट्री हुई है तो हमें रोमांच हो आया है। क्षणिक ही सही। जब लगता है कि टोनी उर्फ आयरन मैन होश में नहीं आ रहा, मर गया है और हल्क जोर से चीखता है, तो वह एकदम से आंखें खोल देता है, कहता है, वॉट, वॉट हैपन्ड। तुममें से किसी ने मुझे किस तो नहीं किया!”

फिल्म में जब थंडर का देवता थोर आता है तो ढेर सारी ऊर्जा और संभावनाओं के साथ। क्योंकि वह अकेला ही है जो सीधे तौर पर लोकी (हालांकि थोर लोकी का गोद लिया भाई है और उसे सही रास्ते पर लाना चाहता है) का कचूमर निकाल सकता है। उसका हथौड़ा और मर्दानगी भरी आवाज याद दिलाती है कि ये डोगा, भेड़िया और नागराज जैसे मर्दाने-गंभीर और ठोस सुपरहीरो की रेंज का है। जो विशुद्ध संग्राम किया करते थे, कोई टीनएजर जोक करना या हंसी-मजाक करना कभी इन हीरोज के मिजाज में नहीं रहा। थोर दरअसल सुपरहीरो देवताओं की आखिरी पीढ़ी की धुंधली याद की तरह है जो कोई 50 साल पहले की कॉमिक्स में हमें नजर आने लगी थी, तब जब कॉमिक्स में चित्र इतने आकर्षक और चिकनी फिनिशिंग वाले नहीं होते थे। तब भारत में फैंटम और थोर जैसे अमेरिकी सुपरहीरो कुछ अलहदा किस्म के हुआ करते थे, हालांकि तब सुपरमैन और बैटमैन वगैरह भी थे। फिल्म में थोर को निभाने वाले क्रिस हेम्सवर्थ विशुद्ध सुपरहीरो काया वाले नौजवान हैं, जिनके चेहरे पर पर्याप्त पुरुषोचित परिवक्वता है। हल्क और आयरन मैन के साथ-साथ थोर के भी कुछ हैरतअंगेज विजुअल इफैक्ट फिल्म में हैं। पहले तो हल्क से भिड़ने वाला दृश्य, जहां दैत्याकार हल्क के आगे उनके इंसानी शरीर को देखते हुए भी हमें लगता है कि हां, थोर तो बराबर की ताकत वाला है। फिर वह दृश्य भी आता है जब हल्क थोर का हथौड़ा उठाने की कोशिश करता है, लेकिन हिला भी नहीं पाता। थोर का वह दृश्य भी हिला देने वाला है जब शील्ड के यान से लोकी थोर को लौहे के चैंबर समेत आसमान से नीचे फेंक देता है। लगता है कि इस चैंबर के धरती से भिड़ते ही थोर नष्ट हो जाएगा, पर वह सेंकड भर पहले निकल जाता है।

क्रिस हेम्सवर्थ के अलावा कैप्टन अमेरिका के रोल में क्रिस इवान्स का व्यक्तित्व भी भरा-पूरा है, बस जरा सी जकड़न कहीं न कहीं महसूस होती रहती है। शायद वह दूसरे सुपरहीरो जितने प्रैक्टिकल या जुमलों के साथ नहीं हैं, या शायद उनका कोई कहानी को उत्प्रेरित करने वाल अतीत नहीं है। शायद इसलिए भी कि उनके सुपरहीरो अवतार और इंसानी रूप में कभी कोई विरोधाभास नहीं रहा। मसलन, स्टार्क इतना जिंदादिल है इस बात के उलट कि दिल की जगह उसके सीने में रिएक्टर लगा है। जैरेमी रेनर आधी फिल्म गुजर जाने के बाद सुपरहीरोज के पाले में लौटते हैं और धनुर्धारी हॉकआइ के रूप में सामूहिक ताकत बढ़ाते हैं। ठीक उसी तरह सुपरहीरोज की फौज की अतिथि सी बनी नजर आती हैं ब्लैक विडो के रोल में स्कारलेट जोहानसन। उनके स्टंट सीन पर्याप्त हैं, हल्क को लेने कलकत्ता वही तो जाती हैं।

इतनी बड़ी महामूवी में कॉमिक्स और दर्शकों के बीच के रिश्ते को संकेतात्मक श्रद्धांजलि भी है। सैमुअल के साथ काम कर रहे एजेंट फिलिप कोउलसन (क्लार्क ग्रेग) के किरदार का वह अंश जहां एक फैन के तौर पर वह कैप्टन अमेरिका से बात करता है। जब वह, कैप्टन अमेरिका और नताशा रोमानोफ (ब्लैक विडो) विमान में जर्मनी जा रहे हैं। पहली बार अपने सुपरहीरो को करीब से देख एजेंट फिलिप नर्वस हो जाता है। अच्छा सीन है यह। यहां कैप्टन अमेरिका पूछता है कि कहीं मेरी धारियों और सितारों वाली ड्रेस ओल्ड फैशन्ड (पुरानी) तो नहीं लगेगी। जवाब में फिलिप (और भीतर बैठे एक-एक पुरानी कॉमिक्स के फैन के रूप में हम) कहता है, लोगों को शायद अभी कुछ ओल्ड फैशन्ड की ही जरूरत है
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गजेंद्र सिंह भाटी

Saturday, April 28, 2012

'हॉलीवुड एंडिंग' के वैल और 'तेज' के प्रियदर्शनः इनके ब्लॉकबस्टर प्रोजेक्ट के 'पहले और बाद' कितने समान

फिल्मः तेज
निर्देशकः प्रियदर्शन
कास्टः बोमन ईरानी, अनिल कपूर, अजय देवगन, मोहनलाल, समीरा रेड्डी, जायद खान, कंगना रनौत
स्टारः डेढ़, 1.5
नोटः पढ़ने में सब्र रखें, खासतौर पर शुरू में


You know who would be perfect to direct this...
...not that I relish the idea of working with him, but my ex-husband.

Val?

He's perfect for this material.

She's right. It's his kind of story.

I love Val, but with all due respect, he's a raving, incompetent psychotic.

He's not incompetent.

They should lock him up and throw away the key. Don't take that the wrong way.
We'll wind up $ ... million over budget and no picture to boot.
I did a picture with him at Firestone. He never fini...had a nervous breakdown.

He was under a lot of stress. We'd just broken up.

Honey, he was fired off a picture here at Galaxie before I took over.
They said his demands were outrageous.
The light had to be perfect. The sun had to be just right.
He demanded they replace the leading lady.
He wanted to reshoot dailies, fire the cameraman.
He got shingles. They shut down the picture and found another director.

You don't have to tell me.
I was married to him then. But that was years ago.

His best pictures were years ago. Then he became an artiste.

I am the last person to defend that craziness, because it drove me nuts.
But Val cares about movies. He was born to do this material.

Ellie, we're talking about shingles, headaches. Why open a can of worms?

He's mellowed, I'm telling you.
Who better to direct this? New York's in his marrow.
The opening scene of Woody Allen’s masterly made piece “Hollywood Ending”. The central character is Val played by Woody himself, a film director now reduced to directing cheap commercials. Val’s former wife (Tea Leoni) and her current boyfriend (Treat Williams) who’s a studio head, are talking about their next big budget blockbuster project.

2002 में आई वूडी एलन की फिल्म हॉलीवुड एंडिंग। वैल और उसकी फिल्ममेकिंग की कहानी। कभी शानदार फिल्में बनाने वाला वैल (वूडी) आज सस्ते विज्ञापन बना रहा है। अपनी जवान गर्लफ्रेंड और बाकी खर्चों के लिए। उसके भीतर बैठे फिल्मकार की धार को जंग लग चुकी है। ये फिल्म का पहला सीन है। वैल की पूर्व बीवी और उसे वैल से चुराने और जल्द शादी करने वाला बड़े हॉलीवुड स्टूडियो का मालिक इस सीन में हैं। दोनों अपनी न्यू यॉर्क की पृष्ठभूमि वाली अगली बड़े बजट वाली ब्लॉकबस्टर फिल्म के लिए निर्देशक के विकल्पों पर विचार कर रहे हैं और तभी ये बात होती है।

यहां एंट्री करवाते हैं प्रियदर्शन की। कभी प्रियन ने मास्टरपीस बनाए थे। मलयालम में बोइंग बोइंगऔर काला पानीजैसी दर्जनों फिल्में। हिंदी में विरासत, डोली सजा के रखना, मुस्कराहट’, हेरा फेरी और गर्दिश जैसी प्यारी कहानियां। 2007 में ही आई थी कांचीवरम, राष्ट्रीय पुरस्कार जीतते हुए, तमाम कसर पूरी करते हुए। मगर अब तेजतक आते-आते भावों पर उनकी पकड़ ढीली पड़ने लगी है। तो जो बातचीत वैल को लेकर उसकी वाइफ और स्टूडियो मालिक कर रहे हैं, उसमें हम प्रियन को रखते हैं और हॉलीवुड फिल्म प्रोजेक्ट की जगह ‘तेज’ को... तो ये ओपनिंग सीन बनता है...

वह डायरेक्ट करने के लिए परफेक्ट रहेगा...
कौन प्रियन?
इस मटीरियल के लिए वो परफैक्ट है.
हां, ये उसके टाइप की स्टोरी है.
मैं उसे पसंद करता हूं, पर पूरे सम्मान के साथ ये भी मानता हूं कि वह सनकी और अक्षम पागल है.
वह अक्षम नहीं है.
गलत मत मानना, पर उसे तो ताले में बंद करके चाबी खाड़ी में फेंक देनी चाहिए.
हम लोग करोड़ों लगा देंगे और रिलीज करने के लिए कोई फिल्म ही नहीं होगी.
मैंने उसके साथ एक फिल्म की थी... उससे पूरी ही नहीं हो पाई, उल्टे नर्वस ब्रेकडाउन और हो गया (यहां जाहिर है कि प्रियदर्शन फिल्में अधूरी नहीं छोड़ते, हां ज्यादा अपनी ही मलयाली फिल्मों का हिंदी रीमेक बनाते रहते हैं। अब नर्वस ब्रेकडाउन कितना होता है पता नहीं)
तब वो बहुत ज्यादा प्रेशर में था, हमारा तलाक हुआ ही था. (भूल जाइए, आगे बढ़ें)
हनी, मैंने गैलेक्सी (प्रोड्यूसर रतन जैन की कंपनी को रख लेते हैं गैलेक्सी की बजाय यहां) स्टूडियो को खरीदा उससे पहले ही उससे एक फिल्म वापिस ले ली गई थी. (जाहिर है ऐसा कम ही हुआ होगा)
उन्होंने कहा कि उसकी मांगें पागलों जैसी थीं.
रोशनी परफेक्ट होनी चाहिए, सूरज बस बिल्कुल सही होना चाहिए. उसने तो मांग की कि फिल्म की हीरोइन को बदल दो. वह नॉर्मल से शॉट को फिर से फिल्माना चाहता था, कैमरामैन को निकाल देना चाहता था. फिर उसे दाद हो गई. प्रोड्यूसर्स ने फिल्म बंद कर दी और दूसरा डायरेक्टर ढूंढा.
तुम्हें ये सब मुझसे कहने की जरूरत नहीं है. मैं उससे शादीशुदा तब थी. और ये बरसों पहले की बात है. ( लागू करें)
उसकी बेस्ट फिल्में सालों पहले थीं. फिर तो वह आर्टिस्ट बन गया.
देखो, उसके पागलपन की सफाई देने वाली मैं आखिरी इंसान हूं, क्योंकि उससे मेरा भी दिमाग खराब हो गया था. पर प्रियन फिल्मों की बहुत चिंता करता है. हमारी नई फिल्म को जो मटीरियल है, वह उसे ही करने के लिए जन्मा है.
ऐली (हम दर्शक) हम दाद और सिर दर्द की टेंशन की बात कर रहे हैं, उसको लेने का मतलब कीड़ों-मकोड़ों से भरा ढोल खोलना है, तुम ऐसा क्यों करना चाहती हो.
मैं कह रही हूं न कि वह अब विनम्र हो चुका है. फिर उससे बेहतर कौन है इस फिल्म को डायरेक्ट करने के लिए. न्यू यॉर्क तो (यहां लंदन) उसकी अस्थिमज्जा में बहता है.

वैल को आखिरकार वो फिल्म मिली और प्रियन को ‘तेज’। पर बाद में हॉलीवुड एंडिंग में कुछ यूं होता है कि जैसे-तैसे शूटिंग शुरू करने के बाद वैल की आंखों की रोशनी अल्पकाल के लिए चली जाती है। पर यह बात वह अपनी पूर्व बीवी और उसके होने वाले प्रोड्यूसर पति को नहीं बताना चाहता इसलिए अंदाज से ही फिल्म शूट करता रहता है। वो सीन वहां, ये यहां, कहां क्या एडिट करना है, कहां क्या इमोशन आ पाया है, कुछ भी एक भावनाओं पर विशेषज्ञता पाए निर्देशक की आंखों से तो हो ही नहीं पाता है। बाद में जब वैल की आंखों की रोशनी आ जाती है और फिल्म रिलीज होती है, वह भी देखता है और कहता हैकिस अंधे ने ये फिल्म बनाई है। अमेरिका से फांसी खा लेने की हद तक नेगेटिव रिव्यू आने के बाद एक आशा की किरण आती है... संदेशवाहक और वैल का दोस्त कहता है, तुम्हारी फिल्म. फ्रेंच लोगों ने तुम्हारी फिल्म पैरिस में देखी है। वो कह रहे हैं कि ऐसी महान अमेरिकी फिल्म बरसों में नहीं आई है। तुम्हें एक सच्चा आर्टिस्ट कहकर पुकारा जा रहा है। एक ग्रेट जीनियस

वैल बने वूडी कहते हैं... थैंक गॉड फ्रेंच एग्जिस्ट
‘तेज’ बनाने के बाद और क्रिटिक्स के रिव्यू और स्टार देखने के बाद प्रियदर्शन भी कह रहे होंगे, थैंक गॉड सिंगल स्क्रीन्स एग्जिस्ट।

तो अब प्योरली आते हैं ‘तेज’ पर। कैसी है फ़िल्म? क्या है फिल्म?

जब मैं यह कहता हूं कि प्रियदर्शन सिंगल स्क्रीन वाले दर्शकों को थैंक्स कह रहे होंगे, तो उसका मतलब यह है कि फिल्म उन्हें ही पसंद आएगी। वजह ये कि जिन दर्शकों ने डायरेक्टर टॉनी स्कॉट की पिछली दो फिल्मों 'अनस्टॉपेबल और ' टेकिंग ऑफ फेलम 123’ को नहीं देखा है, वह 'तेज’ देख सकते हैं। उन्हें फिल्म की बदली विदेशी पृष्ठभूमि, रेलवे के सेंट्रल रूम के अंदर काम करने का तरीका, ट्रेन में बम, फिर फिरौती की बात, विदेशी कॉप वाले अंदाज में अनिल कपूर की भागा-दौड़ी, समीरा रेड्डी का बाइक परहेवायर वाली मैलोरी के अंदाज में स्टंट सीन करना और जायद खान के बॉडी डबल का अनोखे अंदाज में लंदन की गलियों में दीवारें फांदते-कूदते भागना नया लगेगा। जिन्होंने डेंजल वॉशिंगटन अभिनीत दोनों फिल्में देखी हैं, उन्होंने तो ये एहसास जी रखा है। तो उनके लिए इस अधपकी, तकनीकी रूप से कहीं कमजोर और भावविहीन फिल्म को देखना भला किस काम का होगा। उनके लिए वक्त और मुद्रा दोनों बेकार करने से तो बेहतर यही होगा न कि 1994 में आई निर्देशक जेन बॉन की शानदार फिल्म स्पीड की डीवीडी लगाकर देख लें। हर बार वही आनंद, वही मनोरंजन और वही किस्सागोई का नशा इस फिल्म और इस जैसी दूसरी रेल-बस एक्शन थ्रिलर वाली फिल्मों में मिल ही जाता है, टीवी प्रसारण में भी पूरा पूरा।

बात ‘तेज’ की करें तो इसकी कहानी और नाम का कोई मेल नहीं है। न जाने किस तर्क से रखा गया। क्योंकि यहां तेज कुछ भी नहीं है। कहानी ये है कि आकाश (अजय) और निकिता (कंगना) की हिंदु मैरिज एक्ट से हुई शादी को इंग्लैड का कानून मान्यता नहीं देता, इसलिए आकाश को इंडिया डिपोर्ट कर देता है। जलालत के कुछ साल बाद वह लंदन लौटता है, बदला लेने के इरादों के साथ। इसमें उसका साथ देते हैं मेघा (समीरा) और आदिल (जायद), जिनकी आकाश ने कभी बहुत मदद की थी। खैर, अब लंदन से ग्लासगो जाने वाली ट्रेन में आकाश ने दो बम फिट कर दिए हैं, अगर स्पीड 60 किलोमीटर प्रति घंटा से कम हुई तो विस्फोट हो जाएगा। इस स्थिति से निपट रहे हैं रेलवे के हैड ट्रैफिक कंट्रोलर संजय रैना (बोमन), जिनकी बेटी (अविका गौर) भी ट्रेन पर है। वहीं रिटायर होने की अगली सुबह ही पुलिस डिपार्टमेंट अपने सुपर कॉप अर्जुन खन्ना (अनिल) को फिर ड्यूटी पर बुला लेता है।

कहानी में बेहद रुचि भरे किरदार हो सकते थे मलयाली एक्टर मोहनलाल (जो प्रियदर्शन की तकरीबन हर मलयाली फिल्म में रहे हैं), जिनका बिल्कुल भी इस्तेमाल नहीं हुआ। कुल जमा चार-पांच छोटे-छोटे मौकों पर वह नजर आते हैं और बेहद बारीक प्रदर्शन करते हुए। वह जोड़ते हैं, बांधते हैं, पर गुब्बारे में पहले से ही छेद होता है, और हवा की तरह फिल्म से उनका किरदार बाहर निकल जाता है। वह बम वाली ट्रेन पर होते हैं एक कैदी को ले जाते हुए और मुझे आश्चर्य हुआ कि ट्रेन के अंदर उन्हें और उनकी कोशिशों को लेकर कोई कहानी नहीं बनाई गई। जैसे किस्पीड में होता है।

काफी कम सीन में दिखी रोती-धोती कंगना एक दृश्य में अजय के किरदार को अपने पिता से मिलवाने लाई है। वह बाहर बैठा है और कंगना अंदर बात कर रही है। अपने पिता से बोलती है, पापा तमीज से बात कीजिए, आपसे तो ज्यादा पढ़ा लिखा है, इंजीनियर है यहां से हमें पता चलता है कि वह इंजीनियर है, क्योंकि इससे पहले तक फिल्म में अजय देवगन की इमेज बस प्रताड़ित, कमजोर इंसान की थी। उसके कुछ नहीं आता, कोई हीरोइक बात नहीं, बिल्कुल आम सा है, कमजोर सा तो लगता है। ये सब महसूस होने की वजह से लगा कि जब सात साल बाद भारत से ब्रिटेन लौटा है बदला लेने तो इंडिया में तो कहीं से सीखकर आया होगा न। मगर इंडिया में रहकर बदला लेने के लिए क्या रणनीति बनाई, कैसे तैयारी की, क्या किया वगैरह.. कुछ नहीं पता। मसलन, वेडनसडेमें भी नसीरुद्दीन शाह के किरदार को कोई तैयारी करते हुए नहीं दिखाया जाता, लेकिन फिल्म के आखिर में मुंबई के पुलिस कमिश्नर राठौड़ उससे पूछते हैं, बम बनाना कहां सीखा, तो किरदार कहता है,आप नेट पर जाकर बम टाइप कीजिए 239 ( जाने कितने) तरीके लिखे मिल जाएंगे, वहीं से सीखा है। तो इतने भर से हम संतुष्ट हो जाते हैं कि हां भई संभव है। अब अजय इंजीनियर हैं, तो उसमें उनकी विशेषज्ञताएं नहीं बताई गई हैं, न ही कहीं जिक्र आता है। वह एक प्राइवेट कंपनी चलाते थे उसके बारे में भी कुछ नहीं बताया गया है कि कंपनी वो कितनी स्मार्टली या मूर्खता से चला रहे थे, उस कंपनी में उनकी इंजीनियरिंग कितनी काम आ रही थी, तब उन्हें बम वगैरह का कितना पता था। या फिर एक फिरौती की तैयारी के लिए जो दिमाग चाहिए होता है वो कितना कारगर उनके पास था। अगर यह भी नहीं तो जो इंसान इमीग्रेशन नियमों को पूरा करने में मात खा जाता है वह एकाएक इतने हौसले वाला और योजना बनाने वाला कैसे हो जाता है। ये कहीं न कहीं दिखाना था, पर नहीं दिखाया गया। यही वजह है कि अजय देवगन का किरदार पूरी तरह बोरिंग और फालतू हो जाता है। रेग्युलर दर्शक उन्हें चाहते हैं इसलिए देखते जाने में कोई बुराई नहीं, पर देखकर कुछ भी एहसास नहीं होता है।

बोमन ईरानी के किरदार में कुछ-कुछ जान है। पहले अपनी बेटी को छोड़ने जाना, फिर कंट्रोल रूम में परेशान होते हुए योजना बनाना। यहां मुझे ऐसा लगा कि बोमन के पास करने के लिए क्षमताएं खूब थीं, पर प्रियदर्शन के पास दृष्टिकोण और विचार नहीं थे कि उनसे क्या करवाया जाएं। जैसेथ्री इडियट्स में राजकुमार हीराणी उनसे करवा ले जाते हैं। आईआईटी के एक प्रोफेसर के रोल में उनके दिखने का ढंग और उसपर अटल बिहारी वाजपेयी वाले अंदाज में जीभ को तालू से बार-बार लगाते हुए बोलने का अंदाज, ये सब निर्देशक के दृष्टिकोण से होता है। बोमन यहां भी कुछ वैसा कर सकते थे, पर पटकथा या निर्देशक करवाए तब तो।

अनिल कपूर सुंदर और छरहरे दिखते हैं, उनके सीन भी ठीक जाते हैं, पर कहीं कोई एंकर नहीं है, जहां किरदार का रोचक जहाज बेड़ा डाल सके। उनका अपनी वाइफ और बच्ची के साथ रिश्ता भी खोला नहीं गया है। उन्हें सीधा रिटायरमेंट के दिन में दिखाया गया है, पर पूरे कार्यकाल में वह कैसा कॉप रहा है और वह किस चीज को लेकर कुख्यात या विख्यात है यह भी नहीं बताया जाता है। जैसे फॉलिंग डाउन में भी एलएपीडी सार्जेंट प्रेंडरगास्ट (रॉबर्ट डूवाल) होता है, जो रिटायर होने वाला होता है। यह उसका आखिरी दिन होता है और सड़कों पर घूम रहे सिस्टम के खिलाफ हथियार का मुंह खोल चुके इंसान को ढूंढने का जिम्मा वह खुद उठाता है। उसका पारिवारिक चेहरा भी दिखाया जाता है। कैसे कुछ पागल सी बीवी दिन में कई बार दफ्तर में उसे फोन करती है, ये सारा जटिल रिश्ता फिल्म में खुलता है। ये भी उघड़ता है कि एक कॉप के तौर पर वह ताकरियर डेस्क के पीछे ही रहा है और उसकी पीठ पीछे दफ्तर में बातें भी होती है कि इसने आज तक न तो एक भी गिरफ्तारी की है और न ही किसी को गोली मारी है। तो ये इश्यू भी चलते हैं। यहां तक कि टेकिंग ऑफ फेलम 123’ में भी डेंजल वॉशिंगटन के किरदार वॉल्टर के एक सबवे कार कॉन्ट्रैक्ट में रिश्वत लेने का पेंच बीच में चलता रहता है। इस मामले में द बर्निंग ट्रेन आदर्श फिल्म थी। उसमें सब कुछ था। एक मजबूत कहानी थी। बहुत सारी भावनाएं, किरदारों के परिचय और उनके ऐसा होने की पर्याप्त वजहें थीं।

फिल्मों के विश्लेषण की बात आती है तो एक बड़ी छोटी और बारीक मगर महत्वपूर्ण चीज यहां भी दिखी। एक दृश्य में अनिल कपूर ने कहे मुताबिक फिरौती के रुपये एक वॉटरप्रूफ पीले केस में डालकर उसे तेज बहती नदी में डाल दिया है। थोड़ा आगे तैनात समीरा रेड्डी का किरदार अपने हवा भरी बोट में वह केस लाद लेती है और आगे बढ़ती है। तभी ऊपर पुलिस का हैलीकॉप्टर आ जाता है गोलियां बरसाते हुए। नाव पलट जाती है और लगता है वह मर गई। कुछ सेकेंड बाद वह केस और समीरा दोनों पानी की सतह पर उभरते हैं और पृष्ठभूमि में (किसी महत्वपूर्ण किरदार के जीवित बचने) राहत की सांस लेने वाला म्यूजिक बजता है, वैसा ही जैसा भले लोगों के जिंदा रहने पर होता है। सवाल यह है कि फिल्म में समीरा, अजय और जायद सही राह पर नहीं हैं, ऐसे में बतौर फिल्ममेकर आप यह फैसला कैसे कर सकते हैं कि गलत को बचाना है और इसीलिए जनता के मन में सहानुभूति विकसित करें।

तेज का मटीरियल भी निर्देशक प्रियदर्शन के लायक था और उनकी काबिलियत भी पूरे से जरा ज्यादा ही थी, मगर इस बार वह अपनी फिल्म के साथ औसत भी नहीं हो पाए हैं अच्छा होना तो दूर है।
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गजेंद्र सिंह भाटी

Thursday, April 26, 2012

“यार, लगता है विज्ञापन फिल्में नहीं करने के मेरे फैसले को सब ने गलत साबित कर दिया हैः अनिल कपूर”

इतनी सारी और इतनी भिन्न-भिन्न प्रकृति की फिल्में करने के बावजूद घोषित तौर पर अनिल कपूर शीर्ष अभिनेता नहीं कहे जाते। जबकि मैं मानता हूं कि मौजूदा वक्त में जिन्हें शीर्ष के दो-तीन अभिनेता माना जाता है, उनके मुकाबले अनिल लाख बेहतर हैं। कोई मुकाबला नहीं है। एक ओर “साहेब”, “वो सात दिन”, “चमेली की शादी” और “ईश्वर” जैसी हर सदी में पसंद की जाने वाली सदाबहार कृतियां हैं। समाज का प्रतिबिंब खुद में समाए ये फिल्में सादगी और स्वस्थ अभिनय से भरी हुई हैं। वहीं दूसरी ओर दिन के चारों पहर और सहस्त्रों मूडों में लगाकर देखी जा सकने वाली “राम लखन”, “कर्मा”, “मशाल”, “लाडला”, “बेटा”, “जमाई राजा”, “मिस्टर इंडिया”, “मेरी जंग”, “लोफर” और “तेजाब” हैं। हंसोड़, मसालेदार, गरिष्ठ, नमकीन, नशीली, इंद्रिय सुख देने वाली और न जाने क्या क्या। संपूर्ण फिल्में। वैसे तो ये टिकिट खिड़की पर भी खूब चलीं, पर करियर के किसी भी मोड़ पर ऐसा नहीं हुआ कि किसी फिल्म में अनिल कपूर की एक्टिंग और समर्पण पर किसी ने अंगुली उठाई हो। इस दौरान “परिंदा”, “लम्हे”, “1942: अ लव स्टोरी”, “विरासत” और “रूप की रानी चोरों का राजा” को कैसे भूल सकता हूं। कुछ और शानदार फिल्में। उम्दा फिल्में। “रूप की रानी चोरों का राजा” व्यक्तिगत बात है फिर कभी करेंगे, तभी समझ पाएंगे कि मेरी नजर में शानदार क्यों है। अनिल कपूर के बारे में काफी विस्तार से बातें की जा सकती हैं। 30-33 साल लगातार काम कर रहे हैं और छरहरे बने हुए हैं। “स्लमडॉग मिलियनेयर” तक आते आते उन पर उम्र का असर नहीं है। और “तेज” जैसी फिल्मों में इनके मनोरंजक प्रतीत होते चरित्र किरदारों ने सबकुछ ठीक माना जाए तो अभिनय के नए आसमान खोल दिए हैं। जितनी भांति की भूमिकाएं उतनी ही रोचक फिल्में आ सकती हैं। फिलहाल तो निर्देशक प्रियदर्शन की फिल्म “तेज” आज रिलीज हो रही है। इसमें अनिल कपूर के साथ अजय देवगन, मोहनलाल, कंगना रनौत, बोमन ईरानी, जायद खान और समीरा रेड्डी की भूमिकाएं हैं। इसी संदर्भ में अनिल से एक सामूहिक बैठक में बातचीत हुई। सामूहिक और तरह-तरह के सवालों के बीच अपने पोज और आवरण को लेकर वह पूरी तरह सचेत दिखे तो हर सवाल को जवाब उन्होंने श्रद्धा से देने की कोशिश की। कभी अत्यधिक विश्लेषणपरक सवाल-जवाबों का दौर चले तो बातों का खजाना निकलकर आ सकता है। फिलहाल के लिए पढ़िए बातचीत के कुछ अंशः

“स्पीड” और “द टेकिंग ऑफ फेलम 123” जैसी फिल्मों में जैसी गति और मनोरंजन है, क्या “तेज” में वैसा ही है या अलग है?
मुझे लगता है कि “तेज” में उन दोनों फिल्मों से ज्यादा है। “स्पीड” मैंने देखी है, फैनटेस्टिक फिल्म है। “टेकिंग ऑफ फेलम 123” भी अच्छी फिल्म है। ये दोनों अच्छी हैं, पर पक्के तौर पर “तेज” ज्यादा अच्छी है।

आपने बहुत सारी हिंदी फिल्मों में भी काम किया है, हॉलीवुड में भी काम कर चुके हैं। ऐसे में “तेज” क्या स्टाइल, एडिटिंग और लुक के लिहाज से एक चेंज है?
मैं हाल ही में लॉस एंजिल्स में था, वहां मैंने कुछ फिल्ममेकर्स को “तेज” के पोस्टर दिखाए तो उनको शॉक लगा। वो बोले, कि क्या वाकई ये हिदुंस्तानी फिल्म है। इतनी अच्छी है, तो उन्हें बढ़िया लगा। जब मैंने बताया कि इस फिल्म का बजट सौ करोड़ भी नहीं है, तो उन्हें और हैरानी हुई। कि इतने कम बजट में कैसे बन गई, वही फिल्म अगर हॉलीवुड में होती तो इसका बजट कम से कम होता 100 मिलियन। हमने कोशिश ये की कि कम से कम पैसे में एक ऐसी फिल्म बनाएं कि लोग देखें तो कहें कि ये किसी इंटरनेशनल फिल्म से कम नहीं है।

आप विज्ञापन क्यों नहीं करते हैं? क्या इसके पीछे एक वजह ये होती है कि एक एक्टर की छवि का रहस्य बना रहे?
यार मुझे तो अब लगता है कि ये सब लोगों ने मुझे गलत साबित कर दिया है। अमिताभ बच्चन, आमिर खान, शाहरुख खान अब मुझे लगता है कि सारे स्टार एड कर रहे हैं खूब पैसे भी कमा रहे हैं और इनकी पॉपुलैरिटी भी कम नहीं हो रही है। तो इन लोगों ने मुझे गलत साबित कर दिया है।

हाल ही में मैंने इमरान हाशमी से पूछा कि अनिल कपूर हैं वो विज्ञापन नहीं करते हैं, तो उन्होंने भी माना कि रहस्य बना रहे तो लंबे वक्त बाद आपकी फिल्म देखकर दर्शक भी खुश होता है। रोज-रोज देखेगा तो उसे क्या खुशी होगी?
सही बात है। मैंने भी यही सोचकर विज्ञापन नहीं किए। मगर बच्चे बोलते हैं कि आप चूक गए। मेरा बेटा बोलता है कि पापा आपने किया होता तो...।

“तेज” और उसका स्टायलाइज्ड एक्शन...
हम पहले की स्पष्ट थे कि हमें एक्शन इंटरनेशनल स्टैंडर्ड का चाहिए था। इसलिए इंटरनेशनल स्टंट डायरेक्टर लिया और डीओपी हमने लिया।

अजय देवगन की एक्शन स्टार वाली इमेज...
अजय शानदार फाइट एक्टर हैं। देखो, किसी खास परसोना और पर्सनैलिटी वाले इंसान पर ही एक्शन अच्छा लगता है और अजय उनमें से एक हैं।

शुरू में आपने भी किया है...
मैंने अपने करियर में काफी एक्शन किया है। “मशाल” मेरी पहली फिल्म थी जिसमें मैंने एक्शन किया था। उसमें एक्शन बड़ा रॉ और असरदार था। फिर मैंने कुछ ग्रेट टेक्नीशियन्स के साथ काम किया जो जैकी चैन और ब्रूस ली किस्म के एक्शन से प्रेरित थे, जिसे हमारे साउथ इंडियन कोरियोग्राफर्स ने बहुत अच्छे से सीख लिया। इनमें विजयन जैसे नाम है। जिन्हें आपने हाल ही में “दबंग” का एक्शन करते हुए देखा होगा। पर मैं तो विजयन के साथ 87-88 में “इंसाफ की आवाज” जैसी फिल्मों में काम कर चुका था। उनके साथ काम करने वाले मैं पहला हिंदी फिल्मों का एक्टर था। उनके और कई दूसरे एक्शन डायरेक्टर्स के साथ कई फिल्में कीं।

पुकार, ऩायक और अब तेज में...
“पुकार” स्टिक एक्शन था। “नायक” में साउथ इंडियन फिल्मों का मिक्स सा एक्शन था। अब “तेज” में जो एक्शन है वो कुछ ऊंचे स्तर का है, मेरे लिए भी। हैंड टू हैंड फिस्ट फाइट भी है मेरी और अजय की “तेज” में। एक्शन हमेशा इमोशन के साथ ही अच्छा लगता है। सिर्फ एक्शन ही करेंगे तो बड़ा बोरिंग हो जाएगा। जैसे “टशन” थी। उसमें एक्शन था पर वैसा इमोशन नहीं था, तो इफैक्टिव नहीं हो पाई। “परदेस” में एक्शन के पीछे इमोशन था। उसमें लड़ने के पीछे बहुत बड़ा उद्देश्य रहता है। अब ये मोटिवेटिंग फैक्टर कुछ भी हो सकता है। ये लव हो सकता है, फैमिली हो सकती है या देशभक्ति हो सकती है।

“तेज” में अपने रोल की तैयारी कैसे की?
हालांकि मेरे पास ऐसे रोल निभा चुके लोगों से मिलने का विकल्प भी था, पर मैंने अपने किरदार के लिए बहुत सारी किताबें पढ़ीं। जिनमें रियल पुलिस अफसरों, एंटी टैरेरिस्ट स्क्वॉड और कॉप्स के एक्सपीरियंस थे। मैंने जानने की कोशिश की कि अपराधियों से सवाल-जवाब करते हुए या दूसरे हालातों में वह कैसे व्यवहार करते हैं। मैंने किताबों से कई लाइनें बोली हैं। अपने कैरेक्टर के लिए मैंने स्क्रिप्टराइटर को भी कुछ लाइनें सुझाई, तो पूरे कैरेक्टराइजेशन में आप वो देखते हैं। कुछ बदलाव भी किए गए।

रोजाना आपको काम करने के लिए कौन सी चीज प्रोत्साहित करती है?
अगर आप प्यार और पैशन से कोई काम करते हैं तो एंजॉय करते हैं। कुछ लोग शराब एंजॉय करते हैं, कुछ सिगरेट पीना तो कुछ औरतों के साथ रहना या और भी बहुत कुछ। तो मेरे प्रफेशन में ये सब हैं। इन सब कामों को करने का मजा मुझे एक साथ इस जॉब में मिलता है। कोई जरूरी नहीं कि मैं ये सब करूं ही, पर इन सबका आनंद मिलता है। मतलब मैं ऐसे काम में हूं जहां मुझे ट्रैवल करने और नए-नए लोगों से मिलने का मौका मिलता है। जैसे अभी तुर्की जाऊंगा। फिर इस्तांबुल जहां मैं पहले कभी नहीं गया हूं, साइप्रस जाऊंगा। लॉस एंजिल्स में काम शुरू करने वाला हूं। तो ये प्रफेशन मुझे दुनिया भर में इतने लोगों से मिलने का मौका देता है। यही प्रोत्साहित करता है।

अजय के साथ काम करना...
मैंने सब शीर्ष एक्टर्स के साथ काम किया है। जब अपना करियर शुरू किया तो सबसे पहले जिन एक्टर्स के साथ काम किया उनमें जैकी श्रॉफ थे। हमने संभवतः 13-14 फिल्में साथ कीं। फिर सनी देओल के साथ, संजय दत्त, शाहरुख, अक्षय खन्ना... इन सबके साथ। सलमान के साथ मैंने तीन फिल्में की। टॉम क्रूज के साथ। और अब मैंने काम किया है अजय देवगन के साथ। तो जब आप इनके साथ होते हो तो आपको पता चलता है कि ये सब इतने बड़े स्टार क्यों हैं। क्यों लोग इन्हें इतना ज्यादा पसंद करते हैं? मुझे लगता है कि अपनी प्रफेशनल इमेज और बढ़िया एक्टिंग के इतर इनमें जो ऊंची ह्यूमन क्वालिटी है वो कहीं न कहीं लोगों से जुड़ती है, उन्हें छूती है। मैंने बहुत से लोगों और हीरो के साथ काम किया है। लोग उन्हें सराहते हैं और वो काम करते हैं। लेकिन ऐसा क्यों होता है कि उनमें से कुछ 15-20 ही लीडिंग मैन बनते हैं? क्यों ये ही लोगों से जुड़ते हैं? क्यों? कारण क्या है? क्यों ये इतने मैसिव स्टार्स बन जाते हैं? और लोग इन्हें देखने के लिए थियेटर में जमघट लगाते हैं? ये नॉर्मल लोग ही तो हैं। जब आप असल जिंदगी में इनसे मिलते हो तो ये बड़े साधारण इंसान हैं। ये भी बात करते हैं, इनके दो आंखें हैं, दो कान हैं, एक नाक है। वैसे ही खाना खाते हैं, पानी पीते हैं। उनके भी बीवी है बच्चा है। कुछ अलग होगा न उनमें, जो उन्हें कहीं न कहीं अलग खड़ा कर देता है। अजय वैसे ही एक्टर्स में से एक है। वह फैमिली मैन है। विवादों से दूर रहता है। अपने तक ही रहता है। एक स्टार के तौर पर अपनी पोजिशन को लेकर असुरक्षित नहीं है। भला ऐसे आदमी के साथ काम करके मजा क्यों नहीं आएगा। मुझे तो बड़ा शानदार लगा उसके साथ काम करके। एक कम्फर्ट लेवल था हम दोनों के बीच।

हर एक्टर अलग-अलग तरीके से अपनी फिल्म चुनता है। किसी फिल्म में काम करना है कि नहीं ये चुनने का आपका मापदंड क्या है?
ये स्टेट या परिस्थिति पर निर्भर करता है जिसमें आप हैं। जब करियर शुरू किया तो भिखारी था। ‘बैगर्स कान्ट भी चूजर्स’। तब मैंने बहुत कुछ किया। इंस्टॉलमेंट में काम किया, कई-कई कैरेक्टर एक साथ किए, छोटे रोल भी। मगर बाद में लाइफ की स्टेज बदली। बाद में अलग रोल आने लगे। आप खुशकिस्मत होते हो फिर आप बदलने लगते हैं। फिर आपके पास चुनने के विकल्प और अधिकार बढ़ जाते हैं। आप एक्सपेरिमेंट कर सकते हैं। कोई नया आदमी आता है स्क्रिप्ट लेकर तो पढ़कर शुरू कर सकते हैं। जैसे मेरे पास “विरासत” की स्क्रिप्ट आई। फिर मैं प्रियन (प्रियदर्शन) को बोर्ड पर लाया। बाकी टीम जुटाई। मैं प्रोड्यूसर को लाया। प्रोड्यूसर ने मुझे साइन नहीं किया मैंने प्रॉड्यूसर को साइन किया। तो ये निर्भर करता है कि आप कैसे हालात में हैं और फिल्म कैसी है। ये भी कि फिल्म को मार्केट और डिस्ट्रीब्यूट कौन करने वाला है।

मार्केटिंग वगैरह कितना मायने रखता है?
बहुत। क्या कंपनी मार्केटिंग कर सकती है? उनके पास क्या पूरे संसाधन हैं? पैसे हैं? क्या वो पूरे थियेटर ला पाएंगे? आपकी फिल्म पर जिसका हाथ है वो स्टूडियो कितना शक्तिशाली है ये बात बहुत मायने रखती है। अगर आपने एक गजब की शानदार फिल्म बना दी पर मार्केट करने के लिए सही इंसान नहीं है, तो सब खत्म हो जाएगा। जैसे “तनु वेड्स मनु” थी, कई दूसरी फिल्में रहीं या “पान सिंह तोमर”, ये डिब्बों में पड़ी थीं, कोई रिलीज नहीं कर रहा था। “खोसला का घोसला” जैसी फिल्में यूटीवी ने बनाई नहीं हैं, वो ट्रैडर्स हैं। फिल्में बनाने वाला और थियेटर ढूंढकर रिलीज करने वाला हो तो सब ठीक है। यश चोपड़ा फिल्में बनाते भी हैं और रिलीज भी करते हैं। लेकिन सब ऐसा नहीं कर सकते हैं न।

सोनम को बतौर अदाकारा आप कैसे आंकते हैं?
मैं सही इंसान नहीं हूं उसे अंकों में आंकने के लिए। क्योंकि अगर सच कहूंगा तो आप कहोगे कि बाप है इसलिए ऐसे कह रहा है। पिता के परिपेक्ष्य से कह रहा है। फिल्ममेकर के तौर पर भी कहूंगा तो आप मानेंगे नहीं। तो बेहतर यही है कि आप देखो, वह कैसी अभिनेत्री है, उसका परफॉर्मेंस कैसा रहा है, ऑब्जेक्टिवली देखो और तय करो। इसके बाद भी अगर मुझे आप एक फिल्ममेकर के तौर पर पूछें तो मैंने बहुत सारी लड़कियों के साथ काम किया है, उनकी तुलना में सोनम की संभावनाओं को खपाया नहीं गया है। वो बहुत कुछ कर सकती है। उसने अभी सिर्फ पांच फिल्में की, लेकिन इन पांच फिल्मों से खुद का नाम बनाया है। उसने अपनी स्थिति खुद बनाई है। बाकी की लड़कियों से वह बिल्कुल अलग है। अपने दिखने के लिहाज से या जिस तरह की फिल्में उसने की है उस लिहाज से। अभी उसे मेहनत करनी है और बहुत आगे जाना है।

क्या वह आपके पास किसी चीज को लेकर सलाह मांगने आती हैं या आप मार्गदर्शन करते हैं?
मैं मैंटोर नहीं हूं। ये कई चीजों का मेल है। मैंने बहुत तरह की फिल्में की हैं, मैं उसका पिता भी हूं, मैं उसका दोस्त भी हूं। और अभी जेनरेशन भी ऐसी है जो आजाद है अपने फैसले खुद ले सकती है। तो उन्हें वैसे ही रहने देना चाहिए।

प्रियदर्शन स्क्रिप्ट के साथ काम नहीं करते?
नहीं, ऐसा नहीं है। और इस बार तो स्क्रिप्ट दी थी उन्होंने। वह अच्छे निर्देशक हैं और उनके साथ ये मेरी तीसरी फिल्म है।

कुछ एक्सेंट इश्यू थे फिल्म में?
हां, मैंने सोचा कि मेरा किरदार ब्रिटिश कॉप है तो उसे कुछ एक्सेंट दूं। फिर सोचा कि नहीं यार, वो इंग्लिश है, पर उससे ज्यादा इंडियन है। और जब फाइनल रिजल्ट आया तो मुझे लगा कि मेरा फैसला सही था।

पद्मिनी कोल्हापुरे से लेकर मल्लिका सेहरावत तक के साथ काम किया है। पहले की अभिनेत्रियों और अब की अभिनेत्रियों में क्या फर्क नजर आता है?
मैं ऐसे नहीं सोचता हूं। जो अच्छा काम करती है वो अच्छी लगती है, जो अच्छा काम नहीं करती वो अच्छी नहीं लगती है। मैं खुशनसीब रहा हूं। मैंने काफी अच्छी एक्ट्रेस के साथ काम किया है। मैंने रेखा जी के साथ काम किया है, मैंने हेमामालिनी जी के साथ काम किया है, मैंने माधुरी, श्रीदेवी, ऐश्वर्या राय, काजोल, अमृता सिंह, पद्मिनी कोल्हापुरे, रति अग्निहोभी, पूनम ढिल्लों के साथ काम किया है। मैंने स्मिता पाटील जी के साथ काम किया है। कुछ इंटरनेशनल एक्ट्रेसेज के साथ काम किया है। कई एक्ट्रेस के साथ अभी काम कर रहा हूं, नई लड़कियों के साथ काम कर रहा हूं तो सारी अच्छी हैं। सारी अच्छी हैं।

अपनी फिल्म का रीमेक बनाना चाहेंगे?
मैं.....। काफी फिल्में हैं। शुरुआती फिल्में हैं। पर उनमें रीमेक में मैं तो 27-28 साल के नौजवान का रोल कर नहीं सकूंगा। इसलिए मुझे लगता नहीं कि मैं करना चाहूंगा रीमेक अपनी ही फिल्म का। क्योंकि इतने अच्छे-अच्छे सब्जेक्ट हैं, लोग हैं, डायरेक्टर हैं, तो मैं उनके साथ काम करना चाहूंगा। अभी कोई ऐसा ख्याल नहीं है। हां, दूसरे लोग कर सकते हैं मेरी किसी भी फिल्म का रीमेक। अगर उन्हें पसंद आता है तो।

चुस्त, तंदुरुस्त और ऊर्जावान कैसे रहते हैं इतना?
क्योंकि मैं ऐसा ही होना चाहता हूं। मैं एंजॉय करना चाहता हूं। और जो जितने ज्यादा साल फिट रहेगा वो उतना ही ज्यादा एंजॉय कर सकेगा। मैं चुस्त इसीलिए रहता हूं कि काम अच्छा कर सकूं और एंजॉय कर सकूं। ताकि कभी परांठे खाने हो तो परांठे का सकूं। मीठा खाना हो तो मीठा खा सकूं। बिरियानी दबाकर खा सकूं। कभी मन कर लिया तो थोड़ी शराब, ज्यादा नहीं, एक-दो पैग पी सकूं। मैं सारी जिदंगी ये सब कर सकूं। ये नहीं हो कि यार इसको डायबिटीज हो गया, हार्ट प्रॉब्लम हो गया, अभी ये नहीं खा सकता, वो नहीं खा सकता। अब मैं चल नहीं सकता, अब मैं वहां नहीं जा सकता, मैं एक्टिंग नहीं कर सकता, मैं ये नहीं कर सकता। मेरा एनर्जेटिक रहने का मकसद बहुत स्वार्थी सा है। लंबी से लंबी उम्र तक ये सब कर सकूं। मैं डायबिटीज का पेशंट नहीं होना चाहता। मेरे दादाजी जब 94 के थे तो वो छिपके मीठा खाते थे, तो मैं चाहता हूं कि मैं भी वही कर सकूं।
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गजेंद्र सिंह भाटी

Wednesday, April 25, 2012

"मायापुरी पढ़के अचानक ही नहीं चला आया था बॉम्बे, काम को पॉलिश करके आया था: पित्तोबाश"

पित्तोबाश त्रिपाठी ने राजकुमार हीरानी की फिल्म 'थ्री इडियट्स' में जूनियर स्टूडेंट का छोटा सा रोल किया था, याद करने के लिए शायद डीवीडी फॉरवर्ड करके देखना पड़े। मगर अगले साल उनकी दो ऐसी फिल्में आई जिन्होंने उनका करियर बदल कर रख दिया। पहली थी नील माधव पांडा की 'आई एम कलाम' और दूसरी राज निदिमोरू-कृष्णा डीके द्वारा निर्देशित 'शोर इन द सिटी'। दूसरी फिल्म में मंडूक के रोल के लिए उन्हें 'बेस्ट एक्टर इन अ कॉमिक रोल' के कई अवॉर्ड इस साल मिले। उड़ीसा के पित्तोबाश ने भुवनेश्वर से 12वीं तक की पढ़ाई की। फिर कोलकाता से इंजीनियरिंग करने के बाद पुणे के नामी संस्थान फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया से एक्टिंग में तीन साल का कोर्स किया। मुंबई में आने के छह महीने के भीतर उन्हें 'मिर्च' फिल्म में पहला रोल ऑफर हो गया था। उनकी आने वाली फिल्मों में शिरीष कुंदर की 'जोकर' और दिबाकर बैनर्जी की 'शंघाई' जैसे बड़े नाम हैं। दो दिन पहले ही उन्होंने अपने ड्रीम एक्टर अमिताभ बच्चन के साथ एक हेयर ऑयल की ऐड फिल्म शूट की है। प्रस्तुत हैं मौजूदा वक्त के कुछ बेहद काबिल युवा अभिनेताओं में से एक पित्तोबाश से बातचीत के कुछ अंश, विस्तृत बातों का कारवां भविष्य के गर्भ में कभी आने वाली विस्तृत साक्षात्कारों की श्रंखला में:

स्ट्रग्ल नहीं करना पड़ा?
इस प्रफेशन में असुरक्षाएं तो हमेशा रहेंगी, लेकिन आप आते हो। मैं मायापुरी पढ़के अचानक यूं ही नहीं आ गया था। इंजीनियरिंग पढऩे के साथ पांच साल थियेटर किया कोलकाता में। फिर तीन साल फिल्म ट्रेनिंग, पूना से। अपने काम को अच्छी तरह पॉलिश करके फिर मुंबई आया।

'आई एम कलाम' से लेकर 'शोर इन द सिटी' तक, हर किरदार अलग कैसे बना? अलग कैसे बनता है?
तीन चीज हैं, ऑब्जर्वेशन, इमैजिनेशन, कॉन्सनट्रैशन। आप चीजें ऑब्जर्व करते हो और कल्पना मिलाकर किरदार को एक रूप देते हो। फिर ध्यान केंद्रित करके परफॉर्म करते हो। यह तो मूल चीज हो गई। लेकिन घिसना तो पड़ेगा। उसी चीज को करते-करते आपकी वॉयस ट्रैनिंग होगी, इमैजिनेशन पावर तेज होगी, आप कैरेक्टराइजेशन करना भी समझेंगे।

रोल मिलने और शूटिंग शुरू होने के बीच क्या करते हैं?
मुझे किरदार का 90 फीसदी स्क्रिप्ट से मिलता है। बस पढ़ते रहिए। हर बार किरदार के बारे में नया जानेंगे। उसे जोड़ते रहिए और अपने किरदार का एक स्कैच सा बनाते रहिए। उसके पीछे की कहानी कि वह ऐसा क्यों हो गया है? फिर उसकी बॉडी लेंग्वेज, डायलेक्ट, लुक, एक्सेंट और सोच पर मेहनत होती है।

मैथड एक्टिंग करना और जैसे हो वैसे ही रिएक्ट करके एक्ट करना, इन दोनों शैलियों में फर्क है?
कई तरह की एक्टिंग स्कूल हैं। जैसे माइजनर (अमेरिकी थियेटर कलाकार) की अलग है। स्टैनिस्लावस्की (पहला एक्टिंग सिस्टम इजाद करने वाले) का मैथड भी है। मैं स्टैनिस्लावस्की मैथड फॉलो करता हूं। अभिनय की दुनिया में 90 फीसदी स्वीकार्य तरीका यही होता है। मैं हमेशा क्या करता हूं, कि मान लीजिए पुलिस का रोल मिला। तो मैं ऐसे नहीं सोचता हूं कि खुद पुलिस होता तो क्या करता। मैं सोचता हूं कि एक लाख पुलिस होती है और मैं उनमें से एक हूं तो मैं कैसे व्यवहार करूंगा।

मौजूदा अच्छे एक्टर?
कई हैं। मसलन 'शैतान' में जो लड़के थे, या जो लिक्विड था 'प्यार का पंचनामा' में।

'शोर इन द सिटी' के लिए जब बेस्ट कॉमिक रोल का अवॉर्ड आपको मिला तो शो एंकर कर रहे शाहरुख खान ने क्या कहा?
फंक्शन के बाद उन्होंने कहा कि तेरा नाम बड़ा मुश्किल है यार। पता नहीं मैंने उच्चारण सही किया था कि गलत। मैंने कहा, मुश्किल तो है पर इसीलिए तो आप शाहरुख खान हैं, क्योंकि आपने बिल्कुल सही बोला। उन्होंने बधाई दी और कहा कि तुम्हें सिल्वर स्क्रीन पर और भी ज्यादा देखना चाहता हूं।

कोई एक्टिंग में आना चाहे तो...
घास भी काटते हो तो ट्रेनिंग की जरूरत है। पहले पढ़ाई लिखाई करो, फिर अच्छी ट्रेनिंग लो, फिर आओ। ऐसे ही मुंह उठाकर चले आना गलत बात है। यहां कोई रिटायर नहीं होता। कि 200 सीटें हैं और 100 रिटायर हो गए और खाली हो गईं। मैं जिस दिन बॉम्बे इंडस्ट्री में आया तब भी अमिताभ बच्चन वहां थे, जितने लोग हैं वो सब थे, लेकिन आपको प्रूव करना पड़ेगा कि मैं भी आउंगा।

बिना इंस्टिट्यूट में ट्रेनिंग लिए नहीं आ सकते?
सीखने का मतलब सिर्फ यह नहीं कि इंस्टिट्यूट से ही आएं। कोई 15 साल थियेटर करके आते हैं कोई 10 साल। लेकिन फिल्म में आते हो तो मीडिया की ट्रेनिंग लेनी बहुत जरूरी है। करोड़ों रुपये खर्च होते हैं एक फिल्म में, अब कोई आपको सिखाने के लिए तो वहां बैठा नहीं है। एक शॉट रीटेक होता है आपकी वजह से, तो पांच लोग चिल्लाते हैं।

स्टार्स की औलादों के बारे में लोग कहते हैं कि उन्हें एक्टिंग नहीं आती। आपने तुषार के साथ 'शोर इन..' में काम किया। लगा नहीं कि यार इसे तो एक्टिंग नहीं आती?
अब फ्रेम में मेरा और तुषार दोनों का काम अच्छा था तभी तो उन्हें भी सराहा गया और फिल्म भी अच्छी गई। मैं कोशिश करता हूं कि किसी के साथ काम कर रहा हूं तो उस सीन में हम दोनों बेस्ट करें ताकि सीन अच्छा निकले।

भारत और वल्र्ड सिनेमा में ऐसी फिल्में जो आपको खूब पसंद हैं और लोगों को देखनी चाहिए?
एमेरोस पेरोस, सिटी ऑफ गॉड, बर्थ ऑफ नेशन, चिल्ड्रन ऑफ हैवन, राशोमोन, बाबेल, पल्प फिक्शन, कागज के फूल, गरम हवा, दो बीघा जमीन, मदर इंडिया, आवारा.

निर्देशकों में किसका काम पसंद है?
जॉनर के हिसाब से। थ्रिलर में श्रीराम राघवन इज द बेस्ट। कमाल। इंडियन सिनेमा में अगर आप थ्रिलर की बात करेंगे तो मैं उदाहरण दूंगा 'एक हसीना थी' का। डॉर्क जॉनर में विशाल भारद्वाज हैं। एंटरटेनमेंट और कंटेंट में राजकुमार हीरानी कमाल हैं।
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गजेंद्र सिंह भाटी

Tuesday, April 24, 2012

एक सीमेंट टायकून और उससे बदला लेने के लिए जर्नलिस्ट से दिल्ली की नंबर वन रां* बनी काव्या कृष्णा की कुछ जरूरी सी मगर अपूर्ण फिल्म

फिल्मः हेट स्टोरी
निर्देशकः विवेक अग्निहोत्री
कास्टः गुलशन देवय्या, पाओली दाम, निखिल द्विवेदी
स्टारः डेढ़, 1.5
याद नहीं, पिछली बार कब ऐसी नॉन-फैमिली फिल्म देखी थी, जिसकी शुरुआत देवी-देवता (यहां गणेश जी) की मूर्ति, अगरबत्ती के धुएं और 'वक्रतुंड महाकाय’ के उच्चारण के साथ हुई होगी। क्योंकि डायरेक्टर विवेक अग्निहोत्री की ए सर्टिफिकेट वाली 'हेट स्टोरी’ फैमिली और बच्चों के लिए कतई नहीं है। बाकियों के लिए भी थियेटर जाकर देखने लायक कुछ नहीं है। बेहद शानदार एक्टर गुलशन देवय्या ('देट गर्ल इन येलो बूट्स’ के धाकड़ किरदार चितयप्पा गौड़ा) फिल्म की एकमात्र देखने लायक चीज हैं। गुलशन यहां अन्यथा चुस्त पर्सनैलिटी वाले बिजनेसमैन सिद्धार्थ धनराजगीर बने हैं, जो पिता के सामने बहुत ज्यादा हकलाने लगते हैं। उनका हकलाना चाहे फिल्म में बेहद सांकेतिक और संदर्भात्मक वजहों से रखा गया हो, पर अंतत: फिजूल लगता है। गुलशन अपने किरदार को काफी कुछ देते हैं, पर 'चॉकलेट’ और 'दन दना दन गोल’ जैसी फिल्म बना चुके विवेक उसे ठीक दिशा नहीं दे पाते।

फिल्म की बेहतरीन और काम की चीज है बिजनेस की भीतरी दुनिया का गणित। एक सीमेंट कंपनी कैसे काम करती है? कैसे बिजनेस टायकून्स और उनके उत्तराधिकारी बच्चों का आपसी संवाद होता है? किस तरह राजनीति और गुंडों का पैसे के लिए यहां इस्तेमाल होता है? इस दुनिया में हाई प्रोफाइल वेश्याओं का रोल क्या होता है? (एक नामी वकील की मौजूदा से-क्-स सीडी का उदाहरण भी सामने है) ये भी कि दिल्ली से छत्तरपुर की ओर जाने वाले और दूजी किनारियों पर बने फार्म हाउसों में क्या-क्या होता है? इन सब चीजों को देखने के इच्छुक युवाओं के लिए फिल्म दर्शनीय है, श्रेयस्कर होगा डीवीडी पर देखना।

फिल्म में पाओली दाम काव्या कृष्णा नाम की ऐसी बिजनेस जर्नलिस्ट बनी हैं जो सिद्धार्थ (गुलशन दैवय्या) की कंपनी सीमेंटिक इन्फ्रा पर स्टिंग ऑपरेशन करती है। बदले में सिद्धार्थ उसे कॉफी पर बुलाता है और तीन-चार गुना ज्यादा सैलरी पर कंपनी में काम करने का ऑफर देता है। काव्या उसकी कंपनी में आ जाती है। पर काव्या का शारीरिक फायदा उठाने के बाद सिद्धार्थ उसे अपमानित कर बाहर निकालते हुए कहता है, 'आई फ* द पीपल, हू फ* विद मी’। टूट चुकी और छला महसूस कर रही काव्या को पता चलता है कि वह गर्भवती है। जब सिद्धार्थ को बताती है, तो वह उसे किडनैप करवाकर एनसीआर के किसी गांव में बने सरल नर्सिग होम में उसका गर्भपात तो करवाता ही है, साथ में उसे ताउम्र मां नहीं बन पाने लायक करवा देता है। अपने दोस्त विकी की मदद से मौत के मुंह से जिंदा लौटी काव्या सिद्धार्थ को बर्बाद करने की ठान लेती है। इसके लिए वह अपने जिस्म का इस्तेमाल करती है।

पाओली उन अभिनेत्रियों में से हैं जिन्होंने कपड़े त्यागकर बॉलीवुड में सफलता की सीढ़ी चढऩे का रास्ता चुना। उनका अभिनय ठीक-ठाक है पर नजरों में चढऩे लायक नहीं। हो सकता है वक्त के साथ बहुत सुधर जाए।

सिद्धार्थ द्वारा धक्के देकर बाहर निकाल दिए जाने के बाद फिल्म में वॉयस ऑफ इंडिया फेम हर्षित सक्सेना का बनाया गाना 'दिल, कांच सा, दिल, कांच सा, तोड़़ेया’ बजता रहता है। जो बड़ा मिसफिट लगता है। फिल्म में संदर्भ इंतकाम का चलना है और गाना चल रहा है प्यार में धोखा खाई प्रेमिका के लिए, जबकि उनमें प्यार तो कभी हुआ ही नहीं।

निखिल द्विवेदी को फिजूल खर्च किया गया है। क्लाइमैक्स में जामा मस्जिद के पास पुरानी दिल्ली की छतों और परांठे वाली गलियों से होकर भागने के अलावा उनके पास फिल्म में करने को कुछ भी नहीं था। निर्देशन के लिहाज से विवेक ने हो सकता है ईमानदार नीयत से व्यस्क दृश्यों को गढ़ा और प्रचारित भी किया हो, पर फिल्म का ढांचा कसा हुआ नहीं है। मैं आमतौर पर यह कहना पसंद नहीं करता कि फिल्म थोड़ी लंबी थी, पर यहां कहानी के कुछ घुमाव और दृश्य उसे लंबा बनाते हैं। कुछ बीस-पच्चीस मिनट छोटी कर देते तो फिर भी ठीक होता। एक अच्छी फिल्म नहीं बना पाने के बावजूद, इस विषय पर कोशिश करने के लिए विवेक अग्निहोत्री की हौसलाअफजाई।
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गजेंद्र सिंह भाटी

तासीर में सादगी वाली कहानी और एक शब्दावली जिसमें ढेरों मां की गालियां और यौन अंगों का जिक्र है

फिल्मः 21 जम्प स्ट्रीट
निर्देशकः फिल लॉर्ड और क्रिस मिलर
कास्टः जोना हिल, चैनिंग टेटम, डेव फ्रेंको, आइस क्यूब
स्टारः ढाई, 2.5
फिल लॉर्ड और क्रिस मिलर के निर्देशन में बनी '21 जम्प स्ट्रीट को लेकर दुविधा ये हो सकती है कि इसे कैसी फिल्म माना जाए। यह एक एडल्ट लेंग्वेज वाली फिल्म भी है जिसमें मां की गालियों और यौन अंगों से जुड़ी लंबी शब्दावली है। यह एक मस्ती भरी गंदी (मजाकिया लहजे में) कॉमेडी है जिसकी तासीर को सादगी भरा रखा गया है। इसमें अब तक आ चुकी हॉलीवुड कॉमेडी फिल्मों के जितने जाहिर स्टीरियोटाइप हो सकते हैं... हैं, उतनी ही ताजगी भी है। हो सकता है एक सीन में एक यार कहकहा लगाकर हंस पड़े तो पास बैठा दोस्त चुप ही रहे। पर ठीक है, बुरी नहीं है।

शुरू होते ही विचित्र लुक वाले मॉर्टन (जोना हिल) के दर्शन होते हैं। हाई स्कूल के बाकी बच्चों के बीच अपने सुनहरे बालों और ब्रेसिल्स वाले दांतों में वह अलग ही दिखता है। वह अपनी एक सुंदर क्लासमेट को प्रॉम नाइट में ले जाने के लिए पूछ रहा है, पर हमेशा की तरह घिग्गी बंध जाती है और अटक जाता है। उसे देख कुछ दूर खड़ा उतना ही विचित्र जेंको (चैनिंग टेटम) जोर जोर से हंस पड़ता है। दोनों ही साधारण छात्र हैं। मॉर्टन पढ़ने में अच्छा है पर कूल नहीं दिखता। जेंको कूल दिखता है, पर पढ़ने में जीरो है। खैर, सात साल कहानी आगे बढ़ती है। अब ये नजर आते हैं मेट्रोपॉलिटन पुलिस एकेडमी में। नए रंग-रूप में दोनों एक-दूजे को देख चौंक जाते हैं। ग्रेजुएशन की क्लास 123 में दोनों साथ हैं। दोस्ती हो जाती है। मॉर्टन जेंको की मदद मैथ्स और दूसरे लिखित कोर्स में करता है, वहीं जेंको उसे फिजिकली मजबूत बनाता है।
तो पासआउट होने के बाद दोनों की पहली तैनाती साइकिलों पर पार्क पेट्रोलिंग में होती हैं। इस दौरान ये एक ड्रग डीलर (डिरे लुइस) को पकड़ लेते हैं पर उसे मिरांडा राइट्स पढ़कर सुनाना भूल जाते हैं। मिरांडा राइट्स दरअसल वह नियम होते हैं जो गिरफ्तारी के दौरान हथकड़ी पहनाते वक्त आरोपी को सुनाने होते हैं (कि, तुम्हें चुप रहने का अधिकार है। जो भी तुम कहोगे वो तुम्हारे पक्ष में और तुम्हारे खिलाफ जा सकता है। तुम्हें एक वकील रखने का भी अधिकार है, अगर खुद नहीं अफॉर्ड कर सकते तो स्टेट तुम्हें मुहैया करवाएगा।)

इस गलती के लिए उन्हें 21 जम्प स्ट्रीट नाम की दूसरी गुप्त डिवीजन में भेज दिया जाता है। किसी चर्च जैसी लगने वाली इस जगह 21 जम्प स्ट्रीट में इन्हें यीशू की मूर्ति के नीचे किसी फादर की जगह खड़ा मिलता है कैप्टन डिकसन (आइस क्यूब) जो मुंह खोलता है और थोक के भाव मां-बहन और जननांगों से जुड़ी गालियां निकालता है। ये डिविजन हाई स्कूलों में अपने गुप्त अफसर भेजती है और ड्रग्स और दूसरे अपराधों का भंडा फोड़ करती है। इन्हें भी एक मिशन के लिए इन्हीं की हाई स्कूल में भेजा जाता है। जब ये जाते हैं तो देखते हैं कि कैंपस में बहुत कुछ बदल गया है।

फॉक्स नेटवर्क पर 1987 से शुरू हुई टीवी सीरिज '21 जम्प स्ट्रीट अमेरिका में टीनएजर्स के बीच बड़ी लोकप्रिय हुई थी। उतने ही सुपरहिट हुए थे उसमें काम करने वाले यंग जॉनी डेप। उस टीवी सीरिज के मुकाबले यह फिल्म ज्यादा मजाकिया है। सीरिज से दो-तीन नामी एक्टर्स कुछ पलों के लिए फिल्म में अवतरित होते हैं। एक बड़ा एक्टर सरप्राइज है। फिल्म का सह लेखन किया है इसमें अभिनय करने वाले जोना हिल ने। अभिनय में वह और टेटम मुझे एक्साइटिंग तो नहीं लगे पर नए लगे। हंसाते हैं। गालियां बकने वाले कैप्टन डिकसन के रोल में आइस क्यूब शुरू में ओवर एक्टिंग करते लगते हैं, बाद में दर्शकों को आदत हो जाती है। कुछ प्रभावी हैं एनवायर्नमेंट के लंबे लेक्चर देने और स्कूल में ड्रग बांटने वाले एरिक के रोल में डेव फ्रेंको की।
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गजेंद्र सिंह भाटी