Saturday, March 31, 2012

बगैर सम्मोहित करने वाले निर्मल इरादों के फिल्में पसंद आतीं तो ब्लड मनी भी जरूर सराही जाती

फिल्म: ब्लड मनी
निर्देशकः विशाल महादकर
कास्टः कुणाल खेमू, अमृता पुरी, मनीष चौधरी
स्टार: दो, 2.0

केपटाउन में आए और त्रिनिटी डायमंड्स जॉइन किए कुणाल को कुछ ही दिन हुए हैं। वह बड़ा आदमी बनने की अपनी रफ्तार से खुश है। पर बीवी आरजू उसे हैंसल और ग्रेटा (जर्मन लोक किरदार) की कहानी सुनाती है। कि कैसे अपनी सौतेली मां के जुल्मों को सहते हुए ये दोनों नन्हे-मुन्ने भाई-बहन एक जंगल पहुंचते हैं। जहां उन्हें चॉकलेट और कन्फेक्शनरी का बना घर दिखता है। वह लालच में आ जाते हैं। उन्हें नहीं पता कि उसी घर में एक चुड़ैल रहती है। उपेंद्र सिदये की लिखी 'ब्लड मनी’ की कहानी में हैंसल और ग्रैटा का ये बड़ा अच्छा संदर्भ है। कुणाल भी मुंबई की सड़कों की खाक छानने से लेकर साउथ अफ्रीका में एक महल जैसे बंगले तक पहुंचा है। हालांकि उसे नहीं पता कि इस लग्जरी के पीछे न जाने कितने लोगों का खून है और वह किस मुसीबत में फंस रहा है? डायरेक्टर विशाल महादकर की इस कोशिश की इज्जत ही मैं सिर्फ इस गलत रास्ते-सही रास्ते वाले संदेश की वजह से करूंगा। इसके अलावा फिल्म में ऐसा कुछ नहीं है कि आप उसके टीवी पर या डीवीडी आने तक का इंतजार न कर सकें। कुणाल खेमू बुरे अदाकार नहीं हैं, पर अभी सिर्फ खुद के बूते फिल्म चला पाने के लायक नहीं हुए हैं। उनकी सर्वश्रेष्ठ फिल्म आज भी 'जख्म ही है। अमृता पुरी स्वीट हैं बस, उनके अभिनय में कुछ नहीं है। मनीष चौधरी टीवी सीरीज 'पाउडर और 'रॉकेट सिंह जैसी फिल्म में बहुत प्रभावी लगे थे, पर यहां वह 'जूनियर’ और 'सुपर्ब’ जैसे शब्दों को बोलते हुए भी अमेरिकी एक्टर्स की फ्लॉप कॉपी लगते हैं। उनका अभिनय बहुत जड़वत हो गया है। गांभीर्य में भी कुछ घिसापन आ रहा है।

यहां कहानी बड़ी सीधी सी है। मुंबई का कुणाल (कुणाल खेमू) अपनी वाइफ आरजू (अमृता पुरी) के साथ केपटाउन आया है। एमबीए में डिस्टिंक्शन मिला था। अब त्रिनिटी डायमंड्स में जॉब लगी है, जिसका मालिक है जवेरी (मनीष चौधरी)। कुणाल को बड़ा आदमी बनना है इसलिए वह तेजी से आगे बढ़ रहा है। पर धीरे-धीरे उसकी शादीशुदा जिंदगी कड़वी होने लगती है और जानते-बूझते वह हीरों के इस गैरकानूनी धंधे में जानते हुए भी फंसता जाता है। वही हैंसल और ग्रेटा वाली बात है, चाहे वो चुड़ैल के घर में खड़े थे, पर उसके हाथ से चॉकलेट फिर भी खा रहे थे।

फिल्म में पूरी बहस इसी बात पर हो रही होती है कि या तो मुंबई में आप दो-दो नौकरियां करके जी लो अपने प्यार और खुशी के साथ या फिर केपटाउन में बड़े हीरा एक्सपोर्टर बन जाओ जिसके हाथ खून रंगे हैं। तो फटेहाल और आलीशान के बीच की बात थी। आखिर में जब कुणाल पहले ऑप्शन को चुनता है तो उसे किसी खूबसूरत (आलीशान) समंदर किनारे लकड़ी के बने घर में कुछ बच्चों और आरजू के साथ कहानी सुनाते हुए दिखाया जाता है। यानी उसे गरीब नहीं दिखाया गया है। तो ये एक बड़ा छल है। निर्देशक विशाल अगर फिल्म के अंत में कुछ ईमानदारी बरतते (या जो भी लोग ये क्लाइमैक्स तय करने की प्रक्रिया में शामिल थे) तो बेहतर होता। क्योंकि तब ये एक ठीक-ठाक संदेश देने वाली फिल्म हो सकती थी। ये भरोसा इसलिए पैदा होता है क्योंकि फिल्म में इसके संकेत है। एक सीन में जब आरजू की मैरिड लाइफ बिगड़ने लगती है तो वह कुणाल के दोस्त की वाइफ (मिया इवोन उयेदा) से मिलने जाती है। वहां जब दोनों की बात होती है तो वह बताती है कि पहले पहल उसे भी उन चीजों की आदत नहीं थी, पति के साथ उसका भी झगड़ा होता था, पर फिर मैंने आदत डाल ली। वह आरजू को कहती है कि ये लाइफस्टाइल आदत बन जाती है। इतनी कि कभी लौटकर मुंबई जाते हो, तो सड़क किनारे (देसी टूरिस्ट की तरह) बिसलेरी की बोतल लेकर घूमते हो, तुम्हें वहां गर्मी लगती है, पसीने की बदबू आती है और तुम लौटकर आना चाहते हो। यहां पटकथा में ये एहसास आता है कि हां, लिखने वाला कोई जमीनी हकीकत की समझ रखता है।

चंद डायलॉग
# बिजनेस ईमानदारी से नहीं होता। तुम मुझे एक सक्सेसफुल आदमी बताओ, मैं तुम्हें उसके दस गैरकानूनी काम बताता हूं।
# लोग ज्यादातर अच्छे होते हैं क्योंकि उन्हें बुरा बनने का मौका नहीं मिलता।
# मैं दुनिया को नहीं बदल सकता हूं, पर अपनी दुनिया बदल सकता हूं।

पॉइंट नोट करें मीलॉर्ड
# पहली जॉब में ही कुणाल को इतना बड़ा बंगला और टूरिस्ट की तरह अपनी वाइफ के साथ साउथ अफ्रीका में गाना गाने का वक्त कैसे मिल जाता है? ऐसा तो करोड़ों की कंपनियों के मालिकों के बंगले होते हैं।
# मनीष चौधरी के किरदार जवेरी को बाद में अंडरवल्र्ड डॉन जकारिया (मुस्लिम नाम) बताना इस धीमी फिल्म को तुरंत बासी और बेपरवाह बना देता है। साथ ही हम फिर उसी सांचे में बंधे ढर्रे में आ जाते हैं, जहां अंडरवल्र्ड डॉन बताने के लिए एक मुस्लिम सरनेस जोड़ा और काम बन गया। दर्शक मान गए कि हां भई जकारिया है तो स्वीकार कर लेते हैं कि कोई डॉन होगा।
*** *** *** *** ***
गजेंद्र सिंह भाटी

Wednesday, March 28, 2012

एजेंट 007, जेसन बॉर्न और ईथन हंट का परखनली शिशु विनोद, अपना लोकल जासूस बनने में उसे अभी वक्त लगेगा

फिल्मः एजेंट विनोद
निर्देशकः श्रीराम राघवन
कास्टः सैफ अली खान, करीना कपूर, प्रेम चोपड़ा, रवि किशन, राम कपूर, धृतिमान चैटर्जी, बी.पी.सिंह, आदिल हुसैन, आयुष्मान सिंह, जाकिर हुसैन
स्टारः ढाई, 2.5
ध्यानः फिल्म अगर नहीं देखी है, तो पहले देख लें, क्योंकि कहानी के कुछ मोड़ यहां जाहिर किए हैं

इरम परवीन बिलाल (करीना) रो रही है। उसके साथ रिसर्च एंड एनेलिसिस विंग (रॉ) का एजेंट विनोद (सैफ) है। वह पूछता है तो इरम आंसूओं के बीच कहती है, कि वह भी वो नहीं बनना चाहती थी जो नियति ने उसे बना दिया है। अब वह पाकिस्तान में अपने घर तक लौटकर नहीं जा सकती। उस पर ब्रिटेन में बॉम्ब ब्लास्ट करने और दर्जनों निर्दोष लोगों की हत्या करने का इल्जाम है जो उसने किया ही नहीं। विनोद उसके पास बैठकर सुनता है, फिर कहने लगता है, बचपन में मैं भी कुछ और बनना चाहता था। पर एक बार रस्सी वाले कैबिन में हम कहीं जा रहे थे, तभी कुछ गड़बड़ हुई और झूला बहुत मीटर ऊपर हवा में ही झूल गया। फिर थोड़ी देर में मैंने केबल पकड़ रखी थी, और हवा में लटक रहा था। उन आठ मिनटों ने मेरी जिंदगी बदल दी। प्रेसिडेंट वेंकटरमन ने मुझे मेडल दिया। मैं जिंदगी और मौत के बीच फिर से जाना चाहता हूं। मैं आज भी उस केबल हूं।

दरअसल एक बॉन्डनुमा फिल्म के बॉन्ड या कहें कि एजेंट से हमें यही उम्मीद होती भी है कि वो जिंदगी और मौत के बीच उस एडवेंचर भरे शून्य में जाए, बार-बार जाए, कुछ यूं जाए और निर्देशक भी उसे कुछ इस शैली में ले जाए कि हमें आनंद ही आनंद आए। खुशी की बात है कि निर्देशक श्रीराम राघवन को इस चीज का एहसास भी था कि जिंदगी और मौत के बीच का वो शून्य जरूरी है। पर दुख ये है कि वो शून्य और वो स्पेस फिल्म में सिद्ध तरीके से नहीं नजर आता। इसकी वजहें कई हैं। पहली तो ये कि एजेंट विनोद दिखने में भले ही सुंदर, रईसी के आलम वाले कपड़े पहनने वाला, कुछ हाजिर जवाब और हंसोड़ है, पर स्मार्ट नहीं है। यानि शतरंज की बाजी समझने वाला और यूं ही चलते-चलते उन्हें खेल जाने वाला नहीं है। उससे ज्यादा चालाक और शतरंज के खिलाड़ी सा हीरो तो 2010 में ही आई तमिल फिल्म रगड़ा का सत्या (नागार्जुन) है। सत्या गुंडों को हर पल हैरत में डालता रहता है। चकमा देने वालों को लगता है कि हमने उससे इतने करोड़ रुपये ठग लिए या किसी लड़की को लगता है कि उसने इमोशनल कहानी बनाकर सत्या के जरिए अपने भाई को खूंखार गुंडों के अड्डे से छुड़वा लिया, या किसी को लगता है कि उसकी बहन का अपहरण कर लिया है, अब उसे आना ही होगा। पर तब तक सत्या सौ मौहरे चल चुका होता है। वो करोड़ों रुपये उससे ठगे नहीं गए होते हैं, लड़की के भाई को उसने जानबूझकर अपने बड़े प्लैन के तहत छुड़वाया होता है और उसकी बहन को जिसने किडनैप करवाया होता है वो उसी के घर पहले ही बैठा होता है और उसकी कपकपी छुड़वाकर जाता है। कहानियों के पीछे इतनी कहानियां ये किरदार बनाता है कि दर्शक को उस पर फक्र होता है। सत्या चीजों को इतनी बारीकी से ऑब्जर्व करके चलता है कि अगले हजार कदमों के बाद क्या होगा उसने तय कर लिया होता है।

हमारा विनोद ऐसा नहीं है। आखिर में परमाणु बम को निष्क्रिय कर पाना उसके लिए इतना कठिन हो जाता है कि वह तुरंत हैलीकॉप्टर ले अपनी जान देने के दिल्ली के बाहर एक सूनसान फैक्ट्री की और उड़ चलता है। उसे कामयाबी मिलती है तो तब, जब जान देने से पहले इरम उसे कोड बताती है। सत्या सब अपने बूते करता है, कुछ भी दूसरे के बूते नहीं। एजेंट विनोद में वैसे तो सब कुछ है। अफगानिस्तान, मोरक्को, रूस, लंदन, केपटाउन, कराची, लंदन और नई दिल्ली की सुंदर लोकेशंस में घूमती ट्विस्ट भरी कहानी। क्रेडिट्स में आता सैफ के फनी डांस वाला फनी गाना 'प्यार की पुंगी बजा कर और कराची में एक दुल्हन सी सजी शानदार इमारत में करीना का मीठे लबों वाला मुजरा, 'यूं तो प्रेमी पचहत्तर हमारे, ले जा तू कर सतहत्तर इशारे, दिल मेरा मुफ्त का। ' फिल्म को श्रीराम राघवन जैसा निर्देशक भी मिला, जो पश्चिमी टोन वाली एक बॉन्ड फिल्म को अपनी तौर-तरीकों से इंडियन आत्मा देने की असफल कोशिश करता है। उनका एजेंट मुश्किल मौकों में महेंद्र संधू (1977 में आई फिल्म एजेंट विनोद में एजेंट विनोद बने थे एक्टर महेंद्र संधू, उसी फिल्म पर नई एजेंट विनोद का नाम रखा गया है) और विनोद खन्ना नाम के इंसानों की कहानियां गढ़कर उलझाता है। कुछ सीन में पृष्ठभूमि में हिंदी फिल्मों के क्लासिक गाने चलते हैं, स्थिति को अलबेली बनाते हैं। और भी कई चीजें हैं, पर फिल्म आनंद नहीं देती। खत्म होने के बाद आप खाली-खाली महसूस करते हैं। इसकी दूसरी वजह है स्क्रिप्ट में जरूरत से ज्यादा विदेशी लोकेशंस और पिछली एजेंट मूवीज की अच्छी चीजें डालने के कोशिश से उपजी टूटन।

फिल्म के पहले ही सीन में आप किसी मौत की घाटी में प्रवेश करते हैं। सूनसान रेगिस्तान में अफगानिस्तान में कहीं चिलचिलाती मूक धूप में चिल्लाती चीलों सा परिदृश्य है। गैर-आबादी वाले इस बियाबान में तीन-चार बगदादी फटेहाल सी दुकानें हैं। उनसे गुजरकर आता है एक लोहे का दरवाजा, जहां पत्थर चुनी दीवारों पर ओसामा बिन लादेन से दिखने वाले किसी शख्स का चित्र बनाया गया है। लगता है, अंदर कोई लश्कर-ए-तैयबा या दूसरे आतंकी गुट का कैंप है। पर भीतर तो जनरल लोखा (शाहबाज खान) है, जिसने विनोद को यहां कैद कर रखा। यहां मुझे 2002 में आई डाय अनादर डे के एजेंट 007 (पीयर्स ब्रॉसनन) की याद आ गई। उन्हें भी कुछ यूं ही (या फिर हमारे एजेंट विनोद को इनकी तरह) उत्तर कोरियाई जनरल मून बंधक बना लेता है। और, 14 महीने बाद एक दूसरे कैदी के बदले छोड़ा जाता है। यहां एजेंट विनोद में भी विनोद को छुड़ाने मेजर राजन (रवि किशन) भेजा गया है। ठीक जैसे हालिया मिशन इम्पॉसिबल घोस्ट प्रोटोकॉल में ईथन हंट को मॉस्को की जेल से छुड़ाने के लिए दूसरे एजेंट भेजे जाते हैं। खैर, ये समानताएं तो भारी मात्रा में आती रहेंगी। ये बॉन्ड, एजेंट और बॉर्न वाली तमाम कहानियां एजेंट विनोद में यूं ही समानांतर चलती है। इसमें कोई नई बात भी नहीं क्योंकि फिल्म से पहले प्रोड्यूसर सैफ अली खान और निर्देशक श्रीराम राघवन दोनों स्वीकार भी कर चुके हैं कि सारे जाने पहचाने संदर्भ मिलेंगे। हां, बस ढूंढने वाला चाहिए।

तो विनोद और राजन दोनों यहां से भाग छूटते हैं। राजन मोरक्को में अबु नाजर (राम कपूर) के पीछे किसी दूसरे मिशन में लग जाता है और विनोद अपने काम में। जब राजन मारा जाता है तो रॉ चीफ हसन नवाज (बी.पी.सिंह) विनोद को बुलाता है। ठीक वैसे ही जैसे ब्रिटिश सीक्रेट इंटेलिजेंस सर्विस की प्रमुख एम (हमारे रेफरेंस में जूडी डेंच वाली फिल्में) 007 को बुलाती रहती हैं। किसी दूसरे मिशन के बारे में बताने के लिए। तो अब एजेंट विनोद को राजन की हत्या के कारणों और उसके केस में जुटाए गए राज पता करने का मिशन सौंपा जाता है। हल्के फुल्के बिना किसी टेंशन देने वाले अंदाज में विनोद मोरक्को जाता है। जहां वह पहले अबु नाजर को पकड़ता है। वहां से किसी कोड 242 का पता चलता है। जो उसे मोरक्कन ड्रग डीलर डेविड कजान (प्रेम चोपड़ा उन पुराने अदाकारों में से हैं जिन्हें आप कोई भी रोल देंगे तो वो पूरी आश्वस्ति के साथ निभाएंगे। जैसे, कि रॉकेट सिंह सेल्समैन ऑफ ईयर में उनका हरप्रीत बने रणबीर के दादा पी.एस.बेदी का किरदार निभाना। यहां भी वो अपने ऊंट को गोली मारकर रोते हैं। इस उम्र में भी इतनी सारी फिल्में कर चुकने के बाद किसी महात्वाकांक्षी एक्टर की तरह अच्छे से रोते हैं।) और उसकी पर्सनल डॉक्टर रूबी (करीना) तक ले जाता है। खैर, तो हम स्टोरी में ज्यादा भीतर तक नहीं जाएंगे। ये सब कुछ पटकथा में मनोरंजन के लिहाज से चलता रहता है। सैफ का गनफायर करना और हाथ-पांव चलाना तो ठीक है, और वैसे भी ये स्टायलाइज्ड सीन इतने आम हो चुके हैं कि साउथ की फिल्मों में, हिंदी फिल्मों में (ताजा-ताजा देखें तो डॉन-2 और रा. वन) और अमेरिकी फिल्मों में कि देखकर कुछ समझ नहीं आता, बस सिनेमाघर में हम जितनी देर होते हैं, बस उतनी ही देर फालूदे की तरह हमारा दिमाग घुलता रहता है। कहां, क्या, सोचें, करें, चखे या समझे... कुछ पल्ले नहीं पड़ता। हम हिंदी फिल्मों को किसी जॉन कार्टर जैसी अमेरिकी थ्रीडी फिल्म की ओर पहुंचाने वाली कच्ची पगडंडी पर चलते देख रहे हैं। वहां पहुंच भी जाएंगे, तो किसी सालों पीछे पगडंडी पर खड़ी एजेंट विनोद को देखने जितना मजा ही आएगा।

तो इस फिल्म में सबकुछ रखने की कोशिश की गई है पर वो सिलसिलेवार या एक-दूसरे से जुड़ा नहीं लगता। यहां याद आती है किसी भावुक पड़ाव की। करीना के किरदार की जिदंगी में जितने भी भावुक पड़ाव हैं, वो बड़े गैरप्रभावी हैं। उन्हें शुरू में ब्रिटेन में धमाकों का आरोपी बनाकर दिखाना, फिर पाकिस्तानी एजेंट और फिर न जाने क्या क्या। ये सब हमें कुछ ऐसा बना देता है कि बाद में उनके किरदार इरम परवीन बिलाल के रोने का हम पर कोई असर नहीं पड़ता। करीना के संदर्भ में पूरी फिल्म में महज एक जगह पर दिल कहानी में रुचि दिखाने को राजी होता है। जब वह विनोद के साथ कराची एयरपोर्ट पर पाकिस्तानी सलवार कमीज में उतरती हैं, साथ में काले ही पठानी सूट में विनोद। पासपोर्ट ऑफिसर पूछता है यहां आने का कारण, तो विनोद जवाब देता है, जनाजे में शरीक होना है, जरा जल्दी कर देंगे तो मेहरबानी होगी। पीछे से गीली लाल आंखों के साथ करीना आगे आती हैं और आंसू छलकाती हैं। बाद में वह रिक्शे में कराची (फिल्म में) की गलियों से गुजरती हैं और अपने परिवारवालों को मिस करती है। फिल्म में यहां श्रीराम ने एक बड़ी कमी ये छोड़ी की करीना के किरदार के कोई भी रिश्तेदार नहीं दिखाए। दर्शकों से न तो इरम जुड़ पाई और न ही रूबी। भावुक होने के मोर्चे पर सैफ के पास भी कुछ नहीं है। उनकी तो कहीं आंखें भी नम नहीं होती। फिल्म में सर जग्दीश्वर मेल्टा बने धृतिमान चैटर्जी, कर्नल बने आदिल हुसैन और अंशुमान सिंह जैसे नए (धृतिमान नहीं) चेहरे हैं, जो फिल्म को रहस्यमयी रखने वाले किरदार बनते हैं, पर मैं किसी भी एक सीन को अपने साथ थियेटर से बाहर नहीं ला पाया।

हो सकता है कि टीवी पर इस फिल्म को बहुत वक्त बात नाउम्मीदी के माहौल में देखूं या बेहद लापरवाही भरे अंदाज में लेटे-चरते देखूं तो कुछ बेहतर लगेगी। पर वो तो बाकी बॉन्ड फिल्में भी लगेंगी, फिर एक हिंदी एजेंट मूवी के तौर पर इसने भला मेरा क्या फायदा किया होगा?
*** *** *** *** ***
गजेंद्र सिंह भाटी

Thursday, March 22, 2012

दर्शकों को लुभाना है तो मेहनत तो करनी ही पड़ेगीः सैफ अली खान (ओले ओले से एजेंट विनोद तक)

सैफ अली खान होने से पहले वह मेरे लिए कुछ मजबूत छवियां हैं। पहली में वह स्किन टाइट जींस, नुकीले जूतों, लंबे बालों और ढेर सारे छोकरेपन के साथ हीरोइन को प्रभावित करते नाच रहे हैं। गाना है...
जब
भी कोई लड़की देखूं मेरा दिल दीवाना बोले
ओले, ओले, ओले, ओले, ओले, ओले
गाओ तराना यारा झूम-झूम के हौले-हौले
ओले, ओले, ओले, ओले, ओले, ओले
मुझको लुभाती है जवानियां, मस्ती लुटाती जिंदगानियां
माने ना कहना पागल, मस्त पवन सा दिल ये बोले...

1994 में फिल्म ‘ये दिल्लगी’ में गायक अभिजीत की आवाज और विकी सहगल का किरदार सैफ को कितना लोकप्रिय कर गया, ये ओले ओले के बोल और उनके लड़कपन भरे चेहरे को जेहन से लगाए बैठी एक पूरी पीढ़ी बताएगी आपको। जो ‘एजेंट विनो’ देखने जाते वक्त 40 के हो चुके सैफ की उम्र की ओर बढ़ रही होगी। इसी दौर में शामिल हैं परंपरा भी,आशिक आवारा भी,मैं खिलाड़ी तू अनाड़ी भी, बंबई का बाबूभी औरतू चोर मैं सिपाही भी।

दूसरी छवि में हम तुम का करन कपूर भी है और दिल चाहता हैका समीर भी। दोनों ही में वह भले ही पश्चिमी अंदाज में भारतीय आम लड़कों वाले हाव-भाव अपनाकर हास्य सृजित करना चाह रहे थे, पर वक्त बीतने के साथ हमारे लिए समीक्षा से परे बस एक स्मृति बन गए है। एक जरूरी स्मृति। सैफ इन दो फिल्मी किरदारों के ऐसे स्मृति सेतू हैं जो लाखों नए-नवेले पापाओं को उनके कॉलेज और हाई स्कूल के दिनों की यादों से पवित्रता से जोड़ते हैं। दिल अठखेलियां करने लगता है।

तीसरी छवि में एक मल्लखंभ सा गड़ा किरदार है। जैसा फिर कभी न हुआ। लंगड़ा त्यागी। ओमकाराका ईश्वर लंगड़ा त्यागी। खैनी चबाने वाला, अंग्रेजी ओथैलो से निकला और पूर्वांचल के बीहड़ जैसे ओमकारा में घुसा धूसर किरदार। शायद सैफ की जिदंगी का अकेला इतना धूसर पात्र। सिहरन पैदा करता और सर्वस्वीकृत सा। सैफ अली खान एक एक्टर हैं इसकी सबसे बड़ी धमक यहीं सुनाई दी। लंगड़ा ने ही सुनाई। हालांकि एलओसी के कैप्टन अनुज नायर भी थे, बींग सायरस के सायरस मिस्त्री भी और एक हसीना थी के करन सिंह राठौड़ भी। उतने की कठोर। पर कठोरतम लंगड़ा।

ऐसा जरा-जरा सा लग रहा है कि एजेंट विनोद भी जरा-जरा सा भा जाएगा। हो सकता है मेरे जेहन में सैफ की चौथी छवि बनाए। गुंजाइश पक्की नहीं है, पर उम्मीद के बीज बोए हैं। क्योंकि प्रमोशन की इस भागमभाग में उन्हें ऐसे पहले नहीं देखा है। शायद ये जो पिछले एक साल में फिल्म रिलीज होने से पहले नागौर के पशु मेले जैसी प्रचार-प्रसार रैलियां अभिनेता और फिल्मकार मजबूरन निकाल रहे हैं, वो ढाई साल में बनी ‘एजेंट विनोद’ की वजह से सैफ पहली बार महसूस कर रहे थे। उनसे बहुत से साथियों के बीच सामूहिक बातचीत होनी थी। सामूहिक सवाल और उनके जवाब होने थे। सिलसिला शुरू हुआ। कुछ-कुछ वही हुआ। ये प्रचार की थकान थी कि बहुरंगी सवालों से उपजा सतहीपन कि उनके जवाब गहरे नहीं हो पाए। खुद को 'आशिक आवारादिनों से बतौर अभिनेता कैसे विकसित किया है? मेरे इस प्रश्न का उत्तर उन्होंने कितना घुमाकर दिया मैं जानता हूं। मैं उसे जवाब में गिनता ही नहीं हूं। उन्होंने अभिनय को शरीर, उम्र और सुंदरता से जोड़ कर छोड़ दिया। पर कोई शिकवा नहीं। व्यक्तिगत तौर पर वह ठीक हैं। ठीक व्यक्तित्व हैं। हाल ही में मुंबई के एक होटल में एक एनआरआई व्यवसायी से हुई उनकी लड़ाई और गिरफ्तारी वाली छवि के उलट। बातों का छोर लगातार श्रीराम राघवन के निर्देशन में बनी उनकी स्टाइलिश-हाई प्रोफाइल फिल्म 'एजेंट विनोद’ पर ही टिका रहा, जो आज शुक्रवार को सिनेमाघरों में लग गई है। इसलिए सवालों में ज्यादा कोई दूसरी किस्म नहीं है। पढ़िए बातचीत के संक्षिप्त अंशः

(शुरू करने से पहले कुछ बेहद जरूरीः हमने भी 1977 में एक इंडियन बॉन्ड वाली फिल्म बना ली थी। धार्मिक और संस्कारों से भरी फिल्में बनाने वाले श्री ताराचंद बड़जात्या के निर्माणघर राजश्री प्रॉडक्शंस से निकली थी ये पुरानी ‘एजेंट विनोद’। इस पहली इंडियन 'एजेंट विनोद’ में भारत के नामी वैज्ञानिक अजय सक्सेना का अपहरण हो जाता है। हमारी सीक्रेट सर्विस के चीफ इस केस को एक डैशिंग एजेंट के हवाले करते हैं। फिल्म में एजेंट विनोद बने थे पंजाबी फिल्मों के जाने-पहचाने चेहरे महेंद्र संधू। फिल्म में जगदीप भी चंदू जेम्स बॉन्ड के मजाकिया रोल में दिखे थे। महेंद्र संधू ने 1977 यानी इसी साल फिल्म 'विदेश’ में भी सीबीआई एजेंट विनोद का ही छोटा सा रोल किया था। तो आधिकारिक तौर पर वही एजेंट हुए। अब दूसरे विनोद हैं सैफ।)

श्रीराम राघवन के साथ आप पहले 'एक हसीना थीकर चुके हैं। उस फिल्म और 'एजेंट विनोददोनों में से आपको तृप्त करने वाली फिल्म कौन सी थी? तृप्त करने वाली तो 'एजेंट विनोद’ ही है। क्योंकि 'एक हसीना थी’ तो मेरे और श्रीराम के लिए एक तरह से ट्रैनिंग थी एजेंट विनोद को बनाने की। तब मैं और श्रीराम दोनों ही कुछ नया करने की कोशिशों में लगे थे।

आप फिल्म में एक जासूस बने हैं, एक दर्शक के तौर पर आपका पसंदीदा फिल्मी जासूस या बॉन्ड कौन हा है?
' बॉर्न आइडेंटिटी का एजेंट जेसन बॉर्न मेरा फेवरेट है। फिल्म का नहीं नॉवेल का जो रॉबर्ट लुडलम ने लिखा था। हालांकि बॉर्न आइडेंटिटी फिल्म सीरीज में मैट डेमन और उनसे पहले जेसन बॉर्न का किरदार निभाने वाले रिची चैंबरलेन भी अच्छे थे। मैं दोनों की एक्टिंग की कद्र करता हूं, पर मेरा फेवरेट बुक वाला जेसन बॉर्न है।

फिल्म में करीना क्या देसी बॉन्ड गर्ल बनी हैं?
मूवी में वह पाकिस्तानी बॉन्ड गर्ल बनी हैं। रशियन माफिया और एलटीटीई से जुड़ी लगती हैं। विनोद उसका बिल्कुल भरोसा नहीं करता। यहां उनमें रेट्रो एलीमेंट भी लगता है। वो प्रेम चोपड़ा की पर्सनल डॉक्टर हैं। साइड भी बदलती रहती है। उलझाती रहती हैं। बतौर एक्ट्रेस वह रोमैंटिक और बबली रोल में ज्यादा जमती हैं, उन्हें उस खांचे से निकाल ऐसे कठिन रोल में डालना लगने में आसान नहीं, पर उनकी योग्यता वाली अभिनेत्री के लिए ये कोई मुश्किल भी नहीं थी।

शीर्षक एजेंट विनोद ही क्यों रखा?
इस नाम पर पहले भी एक फिल्म बन चुकी है। वह काफी फनी थी। कुछ साइंटिस्ट किडनैप हो जाते हैं और एक जासूस एजेंट विनोद को मिशन मिलता है। इस फिल्म में पल्प फिक्शन मीट्स रेट्रो, डिटैक्टिव मूवीज वाली बात थी। एक ऐसी फिल्म जिसे देख आप किसी कॉमिक या कार्टून स्ट्रिप की कल्पना कर सकें। हमने राजश्री प्रॉड्क्शंस से बात की जिन्होंने 1977 वाली एजेंट विनोद बनाई थी। हमने पूछा कि क्या टाइटल यूज कर लें? हमारी एजेंट विनोद पर काम शुरू हुआ। एक वक्त स्क्रीनप्ले बदलने का सोचा। श्रीराम तमाम बॉन्ड फिल्मों वाले लुक के बावजूद स्क्रीनप्ले बिल्कुल ऑरिजिनल चाहते थे। खैर, फिल्म तैयार है। ये आपको इस जॉनर की पुरानी फिल्मों की याद दिलाती है। ये याद दिलाती है कि हम ऐसी फिल्में भी बनाते थे। ये पल्प फिक्शन भरी भी लगती है, रेट्रो फीलिंग भी देती है और कमर्शियल भी है। शीर्षक तो ऐसे ही अच्छे होते हैं। मिशन इम्पॉसिबल सीरिज की फिल्में तो बाद में बननी शुरू हुईं, पहले इसकी टीवी सीरिज आती थी। टीवी सीरिज से जब फिल्म बनाई गई तो शीर्षक मिशन इम्पॉसिबल ही रखा और उसका पल्पी एलीमेंट कुछ कम कर दिया गया।

विनोद बनना फिजीकली कितना रिस्की और चुनौती भरा था?
बहुत था। एक सीन में मुझे चोट लगी। हैंड स्विंग फट गया था। मैंने ऋतिक को कॉल किया। उसे बुलाया। उसने सलाह दी। कहा कि ऐसे दौड़ो, ऐसे रीटेक कर लो, यहां ध्यान रखो। ये सब चैलेंजिंग था। फन भी था। मैंने योग और डाइटिंग से खुद को फिट रखना चाहा। एक्चुअली ये सब इतना फनी भी नहीं था, सॉरी। काफी अनुशासित होकर सब करना पड़ा। ये जरूरत भी तो थी। एक जासूस को अंडरवेट और छरहरा होना चाहिए। जो कि यूं ही मैंटेन करना कठिन होता है। हां, फिल्म कोई लव स्टोरी हो तो सब आसानी से हो जाता है। हालांकि उसमें भी सुंदर दिखना पड़ता है। फिजीकली एजेंट विनोद जैसे रोल करना आसान नहीं होता। एक्शन करना और वो भी बिना ड्यूप्लीकेट के मुश्किल होता है। और, इसी वजह से मैं एक्शन हीरोज की बड़ी इज्जत करता हूं। अब ऑडियंस को इम्प्रेस करना है तो मेहनत तो करनी ही पड़ेगी। कोई बात नहीं।

आपने हाल ही कहा कि पांच साल इस फिल्म के सीक्वल बनाएंगे?
10-15 दिन से इतनी बकवास कर रहा हूं तो कुछ भी कहता हूं सुबह शाम। जैसे एक बार ये भी कह दिया था। अब कह तो दिया पर सीक्वल पब्लिक डिमांड से बनेगा, हमारे कहने से नहीं। एक बार मैंने एक डायरेक्टर से एक फिल्म के बारे में पूछा कि सीक्वल क्यों नहीं बनाते तो उन्होंने कहा, पागल हो, इंडिया में सीक्वल नहीं बनाया करते। पर अब तो फिल्म के नाम के आगे दो-तीन लगाकर हम बनाने लगे हैं।

करीना की जोड़ी किन एक्टर्स के साथ अच्छी लगती है?
सबके साथ। वह बहुत खूबसूरत है और सब एक्टर भी बड़े हैंडसम हैं तो सबके साथ। शाहरुख के साथ, इमरान, सलमान सबके साथ। किसके साथ उनकी जोड़ी सुंदर नहीं लगती।

श्रीराम राघवन का फिल्ममेकिंग वाला जायका कैसा है?
क्या बताऊं। पहले सीन में ही सोडियम पेंटोथॉल इंजेक्ट करके मुझसे पूछताछ कर रहे हैं। ऐसे हैं श्रीराम राघवन।

अगर विनोद बॉन्ड जैसा ही है तो इसमें इंडियन क्या है?
नहीं, ये बॉन्ड नहीं है, ये पूरा इंडियन कैरेक्टर है। पर जब आप ऐसी एजेंट्स वाली फिल्में बनाते हैं तो कुछ पहले बनी बॉन्ड मूवीज के जरूरी तत्व तो आ ही जाते हैं। जैसे इसमें मोरक्कन ड्रग डीलर्स हैं, रशियन माफिया है, साइबेरिया के सीन हैं। अब कोई जासूस होगा तो वो भला क्या करेगा। आतंकवाद, ड्रग्स, इंटरनेशनल मिशन और ढेर सारा एक्शन। यही सब तो करेगा न। हां, हमारे एजेंट तो रॉ वाले हैं, उनके बारे में खूब पढ़ा भी है पर उन्हें एजेंट के तौर पर कैसे पेश करें।

लेकिन नया करने की कोशिश भी तो की होगी?
थोड़ा नया है तो थोड़ी पुरानी चीजें हैं। एक्शन, अच्छा म्यूजिक, स्टायलिश लोकेशन, से-क-सी वीमन, ये सब होता है ऐसी फिल्मों में और हमारी फिल्म में भी है। श्रीराम ने बड़ी मेहनत की है इंडियन वर्जन बनाने की। जरा सी नकल भी आपको लगेगी तो निराश नहीं होंगे।

फिल्म के संगीत पर विवाद हुआ, धुन चुराने का आरोप लगा?
क्या आपने उस बैंड (ईरानी बैंड बैरोबेक्स कॉर्प ने फिल्म के म्यूजिक डायरेक्टर प्रीतम को लीगल नोटिस भेजा था कि उन्होंने उनकी धुन चुराकर पुंगी बजा कर... गाने में इस्तेमाल की) का मूल गाना सुना या देखा है। बस इंट्रो के बेसलाइन में दो नोट कॉमन हैं ईरानी गाने में, पर वो तो अमिताभ बच्चन की फिल्म लावारिस के गाने जिसकी बीवी मोटी गाने जैसे लगते हैं। मैं ईरानी म्यूजिक इंडस्ट्री की पूरी इज्जत करता हूं, पर उन बैंडवालों को क्या जरूरत थी कि मेरी फिल्म रिलीज होने से इतना पहले ही हल्ला करें। अगर उनका कारण जेनुइन था तो उन्होंने ये वक्त ही क्यों चुना। और फिर जरा सा असर तो म्यूजिक मेकिंग में चलता है न यार।
*** *** *** *** ***
गजेंद्र सिंह भाटी

Tuesday, March 20, 2012

गे अधिकारों को मजबूत करने वाले हाउस म्यूजिक के फ्रांसीसी पुरोधा डेविड गुएटा से बातचीतः शुरुआती संदर्भ माइक मिल्स की फिल्म 'बिगीनर्स' से

मौका: डेविड गुएटा का मार्च में हुआ पहला भारत दौरा

जिनके बारे में बात करने जा रहा हूं, उन पर आने से पहले एक लंबा रास्ता लेता हूं। बात करता हूं एक म्यूजिक और माहौल की। उस म्यूजिक और माहौल को समझने से पहले बात करते हैं 2010 में बनी फिल्म 'बिगीनर्स' की।

बेहद भद्र पुरुष, रूई सी मुलायम जबान बोलने वाले निर्देशक माइक मिल्स की ये फिल्म असल में उनके पिता की ही बायोग्रफी थी। फिल्म में उनके पिता का रोल निभाने वाले 82 साल के कैनेडियन अभिनेता क्रिस्टोफर प्लमर को इस साल फिल्म के लिए ही बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर का ऑस्कर मिला। पहली बार इस श्रेणी का ऑस्कर इतनी ज्यादा उम्र वाले व्यक्ति को गया। क्रिस्टोफर को भी जिदंगी का पहला एकेडमी अवॉर्ड मिला। तो 'बिगीनर्स' की कहानी एक पिता-पुत्र के बदलते रिश्तों के बारे में है। हैल (क्रिस्टोफर प्लमर) ने चालीस-पैंतालीस साल तक एक स्वस्थ और सुखी वैवाहिक जीवन अपनी पत्नी के साथ व्यतीत किया है। अब उनकी पत्नी नहीं रहीं। वह विधुर हो गए हैं। 70 से ज्यादा बरस के हैं। वह चाहते हैं कि अपने लैंगिक झुकाव के बारे में वह दुनिया से छिपाना बंद कर दें। वह गे हैं, समलैंगिक हैं, पुरुषों में रुचि रखते हैं। हालांकि इस तथ्य का हैल के संपूर्ण वैवाहिक जीवन पर रत्तीभर भी असर नहीं पड़ा। वह अपनी पत्नी से प्यार करते थे। तो अब वह अपने बेटे ऑलिवर (इवान मैकग्रैगर) को बताते हैं कि वह गे हैं और अपने गे होने को उम्र के बचे वक्त में खुलकर जीना चाहते हैं। मतलब समलैंगिक पुरुषों-युवकों के साथ न सिर्फ घूमना चाहते हैं, प्यार करना चाहते हैं बल्कि मैथुन करना चाहते हैं, संभव हुआ तो संभोग भी करना चाहते हैं।

अपनी मां की हालिया मौत से उबर रहा, अलग रह रहा ऑलिवर चौंकता है और पिता के इस नए सच को पचाने में अलग ही मानसिक स्थिति से गुजरने लगता है। खैर, हैल को कैंसर भी है। वह ज्यादा जिएगा भी नहीं। तो बाहैसियत अच्छे पुत्र ऑलिवर एक स्वस्थ मानस से फैसला लेता है और अपने पिता का समर्थन करता है। अब कैसे हैल नए युवकों को दोस्त बनाने की कोशिश करता है, बीच में अपनी बीमारी से लड़ता है और ऑलिवर अपनी उथल-पुथल से घिरी जिंदगी को समझने-सुलझाने की कोशिश करता है, यही कहानी है। बड़ी प्यारी, ईमानदार और इंसानी कहानी है। हमें बेहतर, सहनशील और सहिष्णु इंसान बनाती है ये फिल्म। तो इसी फिल्म का एक सीन कुछ इस तरह हैः

(ऑलिवर अपने बैडरूम में सो रहा है।)
तभी फोन बजता है। ऑलिवर जाग जाता है, वह बत्ती जलाता है, फोन का जवाब देता है, कैंसर की आखिरी स्टेज पर पहुंच चुका उसका पिता हैल बहुत ज्यादा उत्साह के साथ फोन के दूसरे सिरे से बात करता है।
ऑलिवरः हैलो?
हैलः ऑलिवर?
ऑलिवरः हां!
हैलः सॉरी तो क्यों कहूं कि मैंने तुम्हें जगा दिया.
मैं आज रात अकबर (उनका नया पुरुष मित्र) के वहां गया था.
ऑलिवरः आप गए थे?
(यहां बीच में... अकबर के वहां का दृश्य उभरता है, हैल और उसके दोस्त, ब्रायन और रॉबर्ट, एक भीड़ भरे गे क्लब में अपना रास्ता बनाते हुए आते हैं. हैल वहां सबसे ज्यादा उम्र का है, और शायद वहां पर सबसे ज्यादा उत्साहित व्यक्ति है.)

हैलः वहां वो लोग बड़ा शानदार ऊंची आवाज वाला म्यूजिक बजा रहे थे. वो क्या म्यूजिक था ऑलिवर?
ऑलिवरः शायद... हाउस म्यूजिक!
हैल एक हाथ से फोन कान पर लगाए, दूसरे हाथ से एक पैड और पेन उठाता है, ये लिखने के लिए।
हैलः हा-उ-स म्यू-जि-क (धीरे-धीरे मुंह से बोलते हुए पैड पर लिखता है)
(फिर से अकबर के वहां का सीन उभरता है.. कुछ यंग गे लड़के नाच रहे हैं. हैल किनारे खड़ा है, खुद ही नाच रहा है. हवा में हाथ खड़े किए हुए उंगलियों को नचाते हुए)

ऑलिवरः तो क्या आप वहां किसी से मिले?
उस खचाखच भरे बार में हैल अकेला ही ड्रिंक करता है...
हैलः बेटा, यंग गे आदमी दरअसल किसी बूढ़े गे आदमी के पास नहीं जाते.
(बातचीत खत्म होती है, ऑलिवर सोने जाता है और सीन खत्म हो जाता है)

तो जिस हाउस म्यूजिक नाम को दो शब्दों पर ये सीन जानदार बना हुआ है, मेरे आज के मेहमान भी उसी हाउस म्यूजिक के बड़े नाम है। उन्हें हाउस म्यूजिक की खोज करने वाला भी कहा जाता है। ये हैं डेविड गुएटा फिलहाल जानी पहचानी पत्रिका डीजे मैग-100 के लोकप्रियता नक्शे के मुताबिक विश्व के शीर्ष डीजे यानी डिस्क जॉकी। माने दुनिया के नंबर वन डीजे। डेविड फ्रेंच हाउस म्यूजिक बनाते हैं, रिकॉर्ड्स यानी एलबमों का निर्माण करते हैं, गाने लिखते हैं, गाते भी हैं और डीजेइंग करते हैं। उनके कई गाने और एलबम की प्रतियां पूरी दुनिया में लाखों की तादाद में बिकी है। कुछ तो सर्वाधिक। वह संगीत के ऑस्कर कहे जाने वाले ग्रैमी पुरस्कारों में भी अपने संगीत की वजह से साल 2012 समेत सात बार नामित हो चुके हैं।

फ्रांस के डेविड पॉप म्यूजिक बनाते हैं। इलेक्ट्रो और हिप-हॉप के फ्यूजन वाला। उनकी सृजित बीट्स के लाखों युवा दीवाने हैं। मुझे तो हालांकि ये सब ज्यादा नहीं भाता, पर हां, उनकी इलेक्ट्रॉनिक स्टाइल्स और डिजाइनिंग बड़ी चर्चित हैं। इसी में उनके डीजे होने की क्षमता नजर आती है। तो माइक मिल्स की फिल्म बिगीनर्स की बात का संदर्भ इस पूरे किस्से में जरूरी ही इस लिहाज से था कि डेविड ने वही हाउस म्यूजिक गढ़ा या जन्मा जिसके आधार में समलैंगिकों के अधिकार और उन्हें समाज में बाकियों जितनी बराबरी दिलाने का आंदोलन शुरू हुआ था।

जब फिल्म में 72 साल का कैंसर से जूझ रहा समलैंगिक हैल अपने बॉयफ्रेंड के पास से घर लौटकर आधी रात को अपने बेटे ऑलिवर को फोन लगाता है। कि, वो कौन सा म्यूजिक वहां बज रहा था, और ऑलिवर कहता है कि संभवतः हाउस म्यूजिक और बड़े चाव और बच्चे सी सीखने की नई-नई आई ललक से ये बुजुर्ग कॉपी पर लिखता है हा------ म्यू---जि----क। कितना दुर्लभ दृश्य। हमारे मुल्क में आर्टिकल 377 पर रुढ़िवादी सोच वाले करोड़ों हैं, जो बीचवाले बोलकर हमारे ही जैसे किन्हीं इंसानों की मजाक उड़ाते हैं। मैं लिख रहा हूं तो न जाने मेरे उनका पक्ष लेने को भी कैसे देखा जाए, पर मेरे लिए मुद्दा नहीं।

तो डेविड गुएटा इस महीने दिल्ली, पुणे और बेंगलुरु में प्रदर्शन करने पहली बार भारत आए थे। 9, 10 और 11 मार्च को उनका प्रदर्शन था। एक नामी शराब कंपनी की ओर से आयोजित इस इलेक्ट्रॉनिक मेले में पिछले साल ब्रिटेन के इसी म्यूजिक के दिग्गज आए थे। इस दूसरे एरिस्टॉफ इनवेजन फेस्टिवल में सिर्फ डेविड थे और उन्हें सुनकर झूमने वाले लाखों युवा। भारत में या तो डेविड गुएटा के आने पर चर्चा होती है या फिर इंडो-ब्रिटिश म्यूजिक कंपोजर और प्रोड्यूसर नितिन साहनी। मुझे सार्थकता के लिहाज से नितिन बेहतरीन लगते हैं। तो ई-वार्ता के जरिए बात हुई इस साल 2012 में फिर से दो ग्रैमी पुरस्कारों के लिए नामित डेविड गुएटा से। प्रस्तुत है वार्ता के बेहद संक्षिप्त अंशः
डीजेइंग कहां से सीखी?
यंग था तभी से क्लबों में डीजेइंग करने लगा था।

इंडिया के म्यूजिक पर।
सच कहूं तो इंडियन म्यूजिशियंस के बारे में इतना जानता नहीं हूं। पर जब तक इंडिया में रहूंगा यहां का ज्यादा म्यूजिक सुनूंगा।

डेविड गुएटा के पास बचपन, फैमिली और अपने दौर की क्या यादें हैं?
मुझमें हमेशा से म्यूजिक के प्रति पागलपन था। जब 12 साल का था तो फ्रांस में एक 'पायरेट रेडियो हुआ करता था। फ्रांस में ये एफएम रेडियो की शुरुआत थी। 80 का दशक था। तब फंक म्यूजिक था, डीजे लोग क्लबों में आते थे और म्यूजिक मिक्स करते थे। कोई प्रोग्रैम डायरेक्टर नहीं होते थे। डीजे अपनी मर्जी से कुछ भी प्ले करते थे और ये देख मैं दीवाना हो गया था। मेरे घर से कोई डीजे या क्लब में काम करने वाला नहीं था। ऊपर से 'पायरेट रेडियो’ जैसी चीजों की घरों में मनाही थी। तो बतौर टीनएजर मेरे लिए बड़ा एक्साइटिंग वक्त था। मैं उन डीजे लोगों की तरह मिक्सिंग करना चाहता था। इसलिए रोज स्कूल के बाद सीखना शुरू किया। जब 18 का हुआ तो मैंने हाउस म्यूजिक खोजा। फ्रांस में ऐसा म्यूजिक बजाने वाला मैं पहला डीजे था। मैं लंदन गया और वहां के रेव क्लब 'शूम’ के बीचोंबीच ब्रिटिश हाउस डीजे डैनी रैंपलिंग को प्ले करते हुए देखा। इस सीन ने मेरी जिंदगी बदल दी। हाउस म्यूजिक, म्यूजिक में भी क्रांति थी और समाज में भी क्योंकि इसने लोगों की सोच को खोला। ये म्यूजिक गे क्लबों में शुरू हुआ इसलिए ये एक-दूसरे को स्वीकार करने के बारे में था। जब नॉन-गे यानी सीधे सेक्सुअल झुकाव वाले लोगों ने हाउस म्यूजिक को स्वीकारा तो इसे देखने का तरीका बदल गया। हजारों यंगस्टर्स रेव और क्लबों में जाने के लिए मिलने लगे। ये रेडियो पर चलने वाला म्यूजिक नहीं था, बल्कि एक सीक्रेट कोड बन गया था।

ग्रैमी नामांकन पर।
ग्रैमी अवॉर्ड के लिए नॉमिनेट होना सम्मान की बात है। ये मेरा आठवां नामांकन रहा। इस बार हमारे म्यूजिक सीन पर खास ध्यान दिया गया है। म्यूजिक शोकेस करने के लिए उन्होंने अलग माहौल बनाया है। और डीजे स्क्रिलैक्स, यार, इस बार तो उसने कमाल कर दिया है!

फिल्मी, क्लासिकल और फोक म्यूजिक भी पसंद करते हैं?
हालांकि मेरी जड़ें डांस म्यूजिक में है, पर किंग्स ऑफ लियोन और कोल्डप्ले जैसे आर्टिस्ट भी मुझे प्रभावित करते हैं। निकी रोमैरो, एफ्रैजैक, स्क्रिलैक्स और एवीचि जैसे नए प्रॉड्यूसर भी अच्छे हैं। जो भी म्यूजिक के प्रति पैशनेट हैं, मुझे प्रेरित करते हैं। मुझे क्लबों से भी प्रेरणा मिलती है, कि कैसे वहां लोग अलग-अलग बीट पर प्रतिक्रिया देते हैं, कैसे वो नाचते हैं।

तुरत फुरत में कुछ और उनके बारे में....
# फरवरी 2012 में हुए ग्रैमी पुरस्कारों में डेविड को 'सनशाइन और 'नथिंग बट बीट के लिए दो ग्रैमी नामांकन मिले।
# यूरोप और अमेरिका में डेविड का काम धुंआधार बिकता है।
# इनके चर्चित एल्बम हैं, जस्ट लिटिल मोर लव (2002), गुएटा ब्लास्टर (2004), पॉप लाइफ (2007), वन लव (2009) और नथिंग बट बीट (2011)।
# डेविड के नए एलबम ‘नथिंग बट द बीट’ में 17 स्टार आर्टिस्ट दिखते हैं। इनमें स्नूप डॉग, लूडक्रिस, टिंबलैंड, विलियम, रैपर निकी मिनाज, लिल वेइन, आर एंड बी सुपरस्टार अशर, क्रिस ब्राउन और एकॉन शामिल हैं।
# ब्राजील के कोपाकबाना बीच पर हुई दुनिया की सबसे बड़ी न्यू ईयर पार्टी में उन्होंने 20 लाख फैन्स के सामने भी म्यूजिक प्ले किया था।

*** *** *** *** ***

गजेंद्र सिंह भाटी