रविवार, 20 मई 2012

रियल-फिल्मी के बीच स्मृतियों में नहीं आ पाती इशकजादे

फिल्मः इशकजादे
निर्देशकः हबीब फैजल
कास्टः परिणीति चोपड़ा, अर्जुन कपूर, अनिल रस्तोगी, रतन राठौड़
स्टारः ढाई, 2.5
चेतावनीः अगर आपने फिल्म नहीं देखी है, तो कृपया देखने के बाद ही आगे पढ़ें, क्योंकि कहानी आगे खोल दी गई है।

पूरी फिल्म में श्रेष्ठ है पहला दृश्य। जहां स्कूल से लौट रहे पांच-छह साल के बच्चे जोया और परमा एक दूसरे को बड़ी-बड़ी मासूम गालियां दे रहे हैं। “तेरा बाप सूअर, नहीं तेरा बाप सूअर। तू सूअर का पिल्ला, तू सूअर की बच्ची। तेरा बाप कुत्ता, तेरा बाप डॉग कुत्ता, तू डॉग कुत्ते का पिल्ला। यू ब्लडी फूल। नहीं, तू ब्लडीफूल”। साथ में रेल की पटरियां दौड़ रही हैं। पटरियों के साथ-साथ सड़क पर साइकिल रिक्शा, जिसमें लड़कियां बैठी हैं और लड़के पीछे पैदल चल रहे हैं। इनकी आपसी गालियां और कुत्ते-बिल्ली वाला झगड़ा रेल के गुजरने के सुर में धीमा होता जाता है।... इतना स्मृतिसहेजक दृश्य है कि रोम-रोम खुश और हैरान हो जाता है। छोटी जोया के रोल में इस बच्ची का अभिनय बरसों याद रहने वाला लगता है। इसके बाद पूरी फिल्म में स्मृतियों का सामान बस एकआध जगह ही है।

शुरू करते हैं कहानी के साथ। उत्तर भारत में कहीं बड़ा बंदूक-तमंचों वाला जिला है अल्मौड़। यहां के दो एमएलए कैंडिडेट हैं चौहान (अनिल रस्तोगी) और कुरैशी (रतन राठौड़)। इनके पॉलिटिकल बैर का असर शुरू से ही बच्चों परमा चौहान (अर्जुन) और जोया कुरैशी (परिणीति) पर भी रहा है। फिलहाल चुनाव की तैयारियां चल रही हैं और दोनों बच्चे भी इसमें जोरदार तरीके से शामिल हैं। जीतने के लिए कुछ भी करने को तैयार। पर इस बीच नोक-झोंक प्यार में बदल जाती है, जिसमें बीच में एक बड़ा पेंच आता है। इस पेंच के बाद में इनका प्यार हकीकत हो जाता है, पर भारतदेश में समाज, परिवार और परिवार की इज्जत नाम की चीजें भी होती हैं। फिर ऑनर किलिंग नाम की चीज भी है। यहां भी इनके परिवार वाले इनके परिवार को स्वीकार कर लें, यह असंभव ही हैं।

यशराज बैनर की हालिया फिल्मों में ‘बैंड बाजा बारात’ माफिक बुनावट दिखने लगी है। इनमें फ्रेम्स की डीटेलिंग और बुनियादी चीजों में रिएलिटी भरी होती है और कहानी में काल्पनिक वेल्डिंग वाले स्पर्श होते हैं। इससे किरदार, जगहें और इमोशन हमें हमारे बीच के ही असली लगने लगते हैं, पर कहानी में कहीं न कहीं कुछ नकली पैकेजिंग होती है। ‘इशकजादे’ भी हमें ऐसे ही असमंजस में डालती है। फिल्म में अल्मौड़, कुरैशी-चौहान फैमिली, एमएलए का चुनाव, कस्बाई सभ्यता और परमा-जोया-द्ददा जैसे नाम हमें बिल्कुल नए और असली लगते हैं, पर किरदारों का व्यवहार और उनकी कहानी ड्रामैटाइज्ड।

जैसे...
  • परमा को शादी के बाद अपना शरीर और आत्मा सौंप देने वाली जोया को जब लगता है कि उसे धोखा दिया गया है, तो उसके चेहरे पर ठगा जाने वाला भाव अद्भुत है। काया फट जाने को होती है। मगर जब वह परमा की मां के कमरे में होती है और उसे धोखे के बाद पहली बार मिलती है तो बदले की तीव्रता-तीक्ष्णता कुछ बिखरी और दिशाहीन लगती है।
  • वैसे परमा बिल्कुल सिरफिरा और गुस्सैल है। छोटी सी बात पर कैरोसीन डिपो वाले के झोपड़-गोदाम में आग लगा देता है। जरूरत न होते हुए भी कुरैशियों के हथियारबंद घर से चांद बेबी (गौहर खान) को उठा लाता है। ... अब जब दद्दा ने ही उसे इस किस्म का असभ्याचारी जानवर बनाया है तो इस बात पर परमा को थप्पड़ को जड़ देता है। और नाराज होने की बजाय परमा हंस क्यों पड़ता है?
  • मां की बातें उसके पल्ले क्यों नहीं पड़ती? वह मां का बेटा बनकर नहीं द्ददा का पोता बनकर क्यों रहता है?
  •  सबसे कचोटने वाली बात यह रहती है कि जब उसकी आंखों के सामने दादा उसकी मां को गोली मार देता है तो (हबीब फैजल उसे और जोया को जानवर कहकर परिभाषित करते हैं) वह गुस्से में वापस उसी क्षण दादा को गोलियों से क्यों नहीं भून देता? छोड़ क्यों देता है? क्यों फिल्म में यहां तक हमें यह नहीं समझाया गया है कि वह इतना सहनशील भी हो सकता है?
  • मरती मां कहती है, परमा अपनी गलती सुधार। और, शॉक की मनःस्थिति होते हुए भी न जाने कैसे वह अगले तीन-चार मिनट में कपड़े पहन, बैग और बाइक ले जोया को बचाने अल्मौड़ा की गलियों में आ जाता है। मां के मरने का गम इतना जल्दी मिट गया?
  • रुतबे वाले कुरैशी साहब की बेटी जोया को देखने और सगाई करने जावेद आए हैं। पार्टी रखी गई है। कोठे वाली चांद बेबी (गौहर खान) मर्दों के बीच नाच रही है। तभी सहेलियों का हाथ थामे जोया का प्रवेश होता है। अब सगाई समारोह के उपलक्ष्य में एक बड़े इज्जतदार-रसूखदार घर में नचनिया नाच ही रही है कि रिएलिटी फिल्म फिल्मी हो जाती है। चांद बेबी के साथ जोया भी नाचने लगती। चारों और मर्द हैं। जो मर्द चांद बेबी को हवस की नजर से देखकर नाच का लुत्फ उठा रहे, क्या वो जोया को भी ऐसे ही नहीं देखेंगे। ये सब उस स्थिति में हो रहा है कि अल्मौड़ एक दकियानूसी सामाजिक मनःस्थिति वाले लोगों का जिला है और कुरैशी साहब के घर का माहौल भी उतना ओपन नहीं है। तो जोया का नाचना अजीब लगता है। अगर यहां निर्देशक साहब उसे नचा सकते हैं तो फिल्म के क्लाइमैक्स में भी दोनों इशकजादों के इशक को भी कुछ फिल्मी बना देते। अगर कुरैशियों के घर में जोया नचनिया के साथ नाच सकती है तो उसके प्यार को भी तो कुरैशी साहब कुबूल कर रही सकते थे।
  • फिल्म के आखिरी सीन में गजब का विरोधाभास है। हमें बताया जा रहा है कि भारत में जोया और परमा जैसे प्यार करने वालों का यही हश्र होता है। यानी कि उन्हें जान ही देनी पड़ती है। मान लिया। मगर इतने रियलिस्टिक अंत के तरीके पर नजर डालिए। जोया और परमा ने एक दूसरे के पेट में पिस्टल लगा रखी है और एक के बाद एक गोलियां मार रहे हैं। त्वचा से गोली भीतर जा रही है और जोया का चेहरा शिकनहीन है। कोई अजीबपना नहीं, कोई दर्द नहीं, कोई ठेस सी नहीं, कोई असहजपना नहीं। वह मुस्कुरा रही है, मुस्कुरा रही है और मुस्कुरा रही है। अब बताइए थियेटर से बाहर क्या मुंह और क्या हासिल लेकर निकलें।

विस्तृत तौर पर फिल्म पर आऊं तो 'इशकजादे की कहानी में कब, कहां, क्या होगा, अनुमान नहीं लगा सकते। यहीं इसकी खासियत भी है। फिल्म अरिष्कृत, कच्ची और जिलों वाली जिंदगी सी धूल-मिट्टी भरी है। मसलन, पहले ही सीन में जीप में तीन लड़कों का मिट्टी का तेल लेने आना। मिट्टी का तेल कुरैशियों के यहां न जाए और चौहानों के यहां आए, इस बात पर डिपो वाले की झोंपड़ी फूंक देना। कमसकम मैदान के समानांतर बनी दीवार के पास की कच्ची सड़क पर बराबर दौड़ती जीप और उड़ती धूल से तो अपना-अपना जिला सभी को याद आ ही जाता है। परमा का चप्पल पहनकर जीप चलाना भी और दबंग लिखा लोअर पहनना भी। हां, भाषा के लिहाज से अर्जुन जरा भी अल्मौड़ के नहीं हो पाए हैं। शुरू में परमा और उसके दोनों दोस्तों को ‘तेरा आशिक झल्ला वल्ला...’ गाते देख भी अजीब लगता है क्योंकि तब तक उस गाने का कोई संदर्भ नहीं होता है।

निर्देशक हबीब फैजल और परिणीति चोपड़ा ने हिंदी सिनेमा को जोया के रूप में एक ऐसी लड़की दी है जिसके इमोशन गेहुंए रंग के हैं। परिणीति जैसे फ्रैश इमोशन मौजूदा वक्त की कोई भी हीरोइन शायद ही दे पाए। मसलन, स्मूच करते हुए, दो से एक होते हुए, तमंचा चलाते हुए और प्यार में ठगा महसूस करते हुए। अर्जुन कपूर का किरदार परमा कुछ जटिल है। उसके मन में क्या चल रहा है, आप जो चाहें अनुमान लगाएं, छूट है। पर कहीं स्क्रिप्ट के स्तर पर यह कैरेक्टर स्पष्ट नहीं हो पाया है, या हमें स्पष्टता से समझाया नहीं गया है। जिसके कुछ अंश ऊपर आ चुके हैं। पर कुल मिलाकर दोनों नए अभिनेताओं का काम आगे के लिहाज से ठीक-ठाक रहा है।

हबीब ने 'दो दूनी चार’ में राह सुझाई थी, मैसेज दिया था। पर 'इशकजादे’ में बस कमेंट किया है। एक्टिंग सबकी अच्छी है। मुश्किल इतनी ही है कि फिल्म सच्चाई और एंटरटेनिंग होने के बीच कन्फ्यूज होती झूलती है। आप चौंकते है, तारीफ करते हैं, पर टेंशन फ्री नहीं हो पाते। फन महसूस नहीं कर पाते। जैसी भी है इस कोशिश के लिए हबीब फैजल और पूरी कास्ट की हौसला अफजाई कर सकते हैं, तमाम सवालों के बीच।
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गजेंद्र सिंह भाटी