शुक्रवार, 23 मार्च 2012

दर्शकों को लुभाना है तो मेहनत तो करनी ही पड़ेगीः सैफ अली खान (ओले ओले से एजेंट विनोद तक)

सैफ अली खान होने से पहले वह मेरे लिए कुछ मजबूत छवियां हैं। पहली में वह स्किन टाइट जींस, नुकीले जूतों, लंबे बालों और ढेर सारे छोकरेपन के साथ हीरोइन को प्रभावित करते नाच रहे हैं। गाना है...
जब
भी कोई लड़की देखूं मेरा दिल दीवाना बोले
ओले, ओले, ओले, ओले, ओले, ओले
गाओ तराना यारा झूम-झूम के हौले-हौले
ओले, ओले, ओले, ओले, ओले, ओले
मुझको लुभाती है जवानियां, मस्ती लुटाती जिंदगानियां
माने ना कहना पागल, मस्त पवन सा दिल ये बोले...

1994 में फिल्म ‘ये दिल्लगी’ में गायक अभिजीत की आवाज और विकी सहगल का किरदार सैफ को कितना लोकप्रिय कर गया, ये ओले ओले के बोल और उनके लड़कपन भरे चेहरे को जेहन से लगाए बैठी एक पूरी पीढ़ी बताएगी आपको। जो ‘एजेंट विनो’ देखने जाते वक्त 40 के हो चुके सैफ की उम्र की ओर बढ़ रही होगी। इसी दौर में शामिल हैं परंपरा भी,आशिक आवारा भी,मैं खिलाड़ी तू अनाड़ी भी, बंबई का बाबूभी औरतू चोर मैं सिपाही भी।

दूसरी छवि में हम तुम का करन कपूर भी है और दिल चाहता हैका समीर भी। दोनों ही में वह भले ही पश्चिमी अंदाज में भारतीय आम लड़कों वाले हाव-भाव अपनाकर हास्य सृजित करना चाह रहे थे, पर वक्त बीतने के साथ हमारे लिए समीक्षा से परे बस एक स्मृति बन गए है। एक जरूरी स्मृति। सैफ इन दो फिल्मी किरदारों के ऐसे स्मृति सेतू हैं जो लाखों नए-नवेले पापाओं को उनके कॉलेज और हाई स्कूल के दिनों की यादों से पवित्रता से जोड़ते हैं। दिल अठखेलियां करने लगता है।

तीसरी छवि में एक मल्लखंभ सा गड़ा किरदार है। जैसा फिर कभी न हुआ। लंगड़ा त्यागी। ओमकाराका ईश्वर लंगड़ा त्यागी। खैनी चबाने वाला, अंग्रेजी ओथैलो से निकला और पूर्वांचल के बीहड़ जैसे ओमकारा में घुसा धूसर किरदार। शायद सैफ की जिदंगी का अकेला इतना धूसर पात्र। सिहरन पैदा करता और सर्वस्वीकृत सा। सैफ अली खान एक एक्टर हैं इसकी सबसे बड़ी धमक यहीं सुनाई दी। लंगड़ा ने ही सुनाई। हालांकि एलओसी के कैप्टन अनुज नायर भी थे, बींग सायरस के सायरस मिस्त्री भी और एक हसीना थी के करन सिंह राठौड़ भी। उतने की कठोर। पर कठोरतम लंगड़ा।

ऐसा जरा-जरा सा लग रहा है कि एजेंट विनोद भी जरा-जरा सा भा जाएगा। हो सकता है मेरे जेहन में सैफ की चौथी छवि बनाए। गुंजाइश पक्की नहीं है, पर उम्मीद के बीज बोए हैं। क्योंकि प्रमोशन की इस भागमभाग में उन्हें ऐसे पहले नहीं देखा है। शायद ये जो पिछले एक साल में फिल्म रिलीज होने से पहले नागौर के पशु मेले जैसी प्रचार-प्रसार रैलियां अभिनेता और फिल्मकार मजबूरन निकाल रहे हैं, वो ढाई साल में बनी ‘एजेंट विनोद’ की वजह से सैफ पहली बार महसूस कर रहे थे। उनसे बहुत से साथियों के बीच सामूहिक बातचीत होनी थी। सामूहिक सवाल और उनके जवाब होने थे। सिलसिला शुरू हुआ। कुछ-कुछ वही हुआ। ये प्रचार की थकान थी कि बहुरंगी सवालों से उपजा सतहीपन कि उनके जवाब गहरे नहीं हो पाए। खुद को 'आशिक आवारादिनों से बतौर अभिनेता कैसे विकसित किया है? मेरे इस प्रश्न का उत्तर उन्होंने कितना घुमाकर दिया मैं जानता हूं। मैं उसे जवाब में गिनता ही नहीं हूं। उन्होंने अभिनय को शरीर, उम्र और सुंदरता से जोड़ कर छोड़ दिया। पर कोई शिकवा नहीं। व्यक्तिगत तौर पर वह ठीक हैं। ठीक व्यक्तित्व हैं। हाल ही में मुंबई के एक होटल में एक एनआरआई व्यवसायी से हुई उनकी लड़ाई और गिरफ्तारी वाली छवि के उलट। बातों का छोर लगातार श्रीराम राघवन के निर्देशन में बनी उनकी स्टाइलिश-हाई प्रोफाइल फिल्म 'एजेंट विनोद’ पर ही टिका रहा, जो आज शुक्रवार को सिनेमाघरों में लग गई है। इसलिए सवालों में ज्यादा कोई दूसरी किस्म नहीं है। पढ़िए बातचीत के संक्षिप्त अंशः

(शुरू करने से पहले कुछ बेहद जरूरीः हमने भी 1977 में एक इंडियन बॉन्ड वाली फिल्म बना ली थी। धार्मिक और संस्कारों से भरी फिल्में बनाने वाले श्री ताराचंद बड़जात्या के निर्माणघर राजश्री प्रॉडक्शंस से निकली थी ये पुरानी ‘एजेंट विनोद’। इस पहली इंडियन 'एजेंट विनोद’ में भारत के नामी वैज्ञानिक अजय सक्सेना का अपहरण हो जाता है। हमारी सीक्रेट सर्विस के चीफ इस केस को एक डैशिंग एजेंट के हवाले करते हैं। फिल्म में एजेंट विनोद बने थे पंजाबी फिल्मों के जाने-पहचाने चेहरे महेंद्र संधू। फिल्म में जगदीप भी चंदू जेम्स बॉन्ड के मजाकिया रोल में दिखे थे। महेंद्र संधू ने 1977 यानी इसी साल फिल्म 'विदेश’ में भी सीबीआई एजेंट विनोद का ही छोटा सा रोल किया था। तो आधिकारिक तौर पर वही एजेंट हुए। अब दूसरे विनोद हैं सैफ।)

श्रीराम राघवन के साथ आप पहले 'एक हसीना थीकर चुके हैं। उस फिल्म और 'एजेंट विनोददोनों में से आपको तृप्त करने वाली फिल्म कौन सी थी? तृप्त करने वाली तो 'एजेंट विनोद’ ही है। क्योंकि 'एक हसीना थी’ तो मेरे और श्रीराम के लिए एक तरह से ट्रैनिंग थी एजेंट विनोद को बनाने की। तब मैं और श्रीराम दोनों ही कुछ नया करने की कोशिशों में लगे थे।

आप फिल्म में एक जासूस बने हैं, एक दर्शक के तौर पर आपका पसंदीदा फिल्मी जासूस या बॉन्ड कौन हा है?
' बॉर्न आइडेंटिटी का एजेंट जेसन बॉर्न मेरा फेवरेट है। फिल्म का नहीं नॉवेल का जो रॉबर्ट लुडलम ने लिखा था। हालांकि बॉर्न आइडेंटिटी फिल्म सीरीज में मैट डेमन और उनसे पहले जेसन बॉर्न का किरदार निभाने वाले रिची चैंबरलेन भी अच्छे थे। मैं दोनों की एक्टिंग की कद्र करता हूं, पर मेरा फेवरेट बुक वाला जेसन बॉर्न है।

फिल्म में करीना क्या देसी बॉन्ड गर्ल बनी हैं?
मूवी में वह पाकिस्तानी बॉन्ड गर्ल बनी हैं। रशियन माफिया और एलटीटीई से जुड़ी लगती हैं। विनोद उसका बिल्कुल भरोसा नहीं करता। यहां उनमें रेट्रो एलीमेंट भी लगता है। वो प्रेम चोपड़ा की पर्सनल डॉक्टर हैं। साइड भी बदलती रहती है। उलझाती रहती हैं। बतौर एक्ट्रेस वह रोमैंटिक और बबली रोल में ज्यादा जमती हैं, उन्हें उस खांचे से निकाल ऐसे कठिन रोल में डालना लगने में आसान नहीं, पर उनकी योग्यता वाली अभिनेत्री के लिए ये कोई मुश्किल भी नहीं थी।

शीर्षक एजेंट विनोद ही क्यों रखा?
इस नाम पर पहले भी एक फिल्म बन चुकी है। वह काफी फनी थी। कुछ साइंटिस्ट किडनैप हो जाते हैं और एक जासूस एजेंट विनोद को मिशन मिलता है। इस फिल्म में पल्प फिक्शन मीट्स रेट्रो, डिटैक्टिव मूवीज वाली बात थी। एक ऐसी फिल्म जिसे देख आप किसी कॉमिक या कार्टून स्ट्रिप की कल्पना कर सकें। हमने राजश्री प्रॉड्क्शंस से बात की जिन्होंने 1977 वाली एजेंट विनोद बनाई थी। हमने पूछा कि क्या टाइटल यूज कर लें? हमारी एजेंट विनोद पर काम शुरू हुआ। एक वक्त स्क्रीनप्ले बदलने का सोचा। श्रीराम तमाम बॉन्ड फिल्मों वाले लुक के बावजूद स्क्रीनप्ले बिल्कुल ऑरिजिनल चाहते थे। खैर, फिल्म तैयार है। ये आपको इस जॉनर की पुरानी फिल्मों की याद दिलाती है। ये याद दिलाती है कि हम ऐसी फिल्में भी बनाते थे। ये पल्प फिक्शन भरी भी लगती है, रेट्रो फीलिंग भी देती है और कमर्शियल भी है। शीर्षक तो ऐसे ही अच्छे होते हैं। मिशन इम्पॉसिबल सीरिज की फिल्में तो बाद में बननी शुरू हुईं, पहले इसकी टीवी सीरिज आती थी। टीवी सीरिज से जब फिल्म बनाई गई तो शीर्षक मिशन इम्पॉसिबल ही रखा और उसका पल्पी एलीमेंट कुछ कम कर दिया गया।

विनोद बनना फिजीकली कितना रिस्की और चुनौती भरा था?
बहुत था। एक सीन में मुझे चोट लगी। हैंड स्विंग फट गया था। मैंने ऋतिक को कॉल किया। उसे बुलाया। उसने सलाह दी। कहा कि ऐसे दौड़ो, ऐसे रीटेक कर लो, यहां ध्यान रखो। ये सब चैलेंजिंग था। फन भी था। मैंने योग और डाइटिंग से खुद को फिट रखना चाहा। एक्चुअली ये सब इतना फनी भी नहीं था, सॉरी। काफी अनुशासित होकर सब करना पड़ा। ये जरूरत भी तो थी। एक जासूस को अंडरवेट और छरहरा होना चाहिए। जो कि यूं ही मैंटेन करना कठिन होता है। हां, फिल्म कोई लव स्टोरी हो तो सब आसानी से हो जाता है। हालांकि उसमें भी सुंदर दिखना पड़ता है। फिजीकली एजेंट विनोद जैसे रोल करना आसान नहीं होता। एक्शन करना और वो भी बिना ड्यूप्लीकेट के मुश्किल होता है। और, इसी वजह से मैं एक्शन हीरोज की बड़ी इज्जत करता हूं। अब ऑडियंस को इम्प्रेस करना है तो मेहनत तो करनी ही पड़ेगी। कोई बात नहीं।

आपने हाल ही कहा कि पांच साल इस फिल्म के सीक्वल बनाएंगे?
10-15 दिन से इतनी बकवास कर रहा हूं तो कुछ भी कहता हूं सुबह शाम। जैसे एक बार ये भी कह दिया था। अब कह तो दिया पर सीक्वल पब्लिक डिमांड से बनेगा, हमारे कहने से नहीं। एक बार मैंने एक डायरेक्टर से एक फिल्म के बारे में पूछा कि सीक्वल क्यों नहीं बनाते तो उन्होंने कहा, पागल हो, इंडिया में सीक्वल नहीं बनाया करते। पर अब तो फिल्म के नाम के आगे दो-तीन लगाकर हम बनाने लगे हैं।

करीना की जोड़ी किन एक्टर्स के साथ अच्छी लगती है?
सबके साथ। वह बहुत खूबसूरत है और सब एक्टर भी बड़े हैंडसम हैं तो सबके साथ। शाहरुख के साथ, इमरान, सलमान सबके साथ। किसके साथ उनकी जोड़ी सुंदर नहीं लगती।

श्रीराम राघवन का फिल्ममेकिंग वाला जायका कैसा है?
क्या बताऊं। पहले सीन में ही सोडियम पेंटोथॉल इंजेक्ट करके मुझसे पूछताछ कर रहे हैं। ऐसे हैं श्रीराम राघवन।

अगर विनोद बॉन्ड जैसा ही है तो इसमें इंडियन क्या है?
नहीं, ये बॉन्ड नहीं है, ये पूरा इंडियन कैरेक्टर है। पर जब आप ऐसी एजेंट्स वाली फिल्में बनाते हैं तो कुछ पहले बनी बॉन्ड मूवीज के जरूरी तत्व तो आ ही जाते हैं। जैसे इसमें मोरक्कन ड्रग डीलर्स हैं, रशियन माफिया है, साइबेरिया के सीन हैं। अब कोई जासूस होगा तो वो भला क्या करेगा। आतंकवाद, ड्रग्स, इंटरनेशनल मिशन और ढेर सारा एक्शन। यही सब तो करेगा न। हां, हमारे एजेंट तो रॉ वाले हैं, उनके बारे में खूब पढ़ा भी है पर उन्हें एजेंट के तौर पर कैसे पेश करें।

लेकिन नया करने की कोशिश भी तो की होगी?
थोड़ा नया है तो थोड़ी पुरानी चीजें हैं। एक्शन, अच्छा म्यूजिक, स्टायलिश लोकेशन, से-क-सी वीमन, ये सब होता है ऐसी फिल्मों में और हमारी फिल्म में भी है। श्रीराम ने बड़ी मेहनत की है इंडियन वर्जन बनाने की। जरा सी नकल भी आपको लगेगी तो निराश नहीं होंगे।

फिल्म के संगीत पर विवाद हुआ, धुन चुराने का आरोप लगा?
क्या आपने उस बैंड (ईरानी बैंड बैरोबेक्स कॉर्प ने फिल्म के म्यूजिक डायरेक्टर प्रीतम को लीगल नोटिस भेजा था कि उन्होंने उनकी धुन चुराकर पुंगी बजा कर... गाने में इस्तेमाल की) का मूल गाना सुना या देखा है। बस इंट्रो के बेसलाइन में दो नोट कॉमन हैं ईरानी गाने में, पर वो तो अमिताभ बच्चन की फिल्म लावारिस के गाने जिसकी बीवी मोटी गाने जैसे लगते हैं। मैं ईरानी म्यूजिक इंडस्ट्री की पूरी इज्जत करता हूं, पर उन बैंडवालों को क्या जरूरत थी कि मेरी फिल्म रिलीज होने से इतना पहले ही हल्ला करें। अगर उनका कारण जेनुइन था तो उन्होंने ये वक्त ही क्यों चुना। और फिर जरा सा असर तो म्यूजिक मेकिंग में चलता है न यार।
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गजेंद्र सिंह भाटी