Saturday, December 31, 2011

पिटता, पीटता और हंसाता चलता वो जासूस शरलॉक होम्स

फिल्मः शरलॉक होम्स गेम ऑफ शैडोज (अंग्रेजी)
निर्देशकः गाय रिची
कास्टः रॉबर्ट डाउनी. जूनियर, जूट लॉ, जैरेड हैरिस, रैचल मैकएडम्स, स्टीफन फ्राई, नूमी रीपेस, पॉल एंडरसन, कैली रायली
स्टारः साढ़े तीन, 3.5डायरेक्टर गाय रिची की ये सीक्वल 'शरलॉक होम्स: गेम ऑफ शेडौज 2009 में उन्हीं के निर्देशन में आई पहली फिल्म से ज्यादा तेज, स्मार्ट और इंसानी लगती है। पूरे दो घंटे और कुछ मिनट हम आंखें परदे पर ही गड़ाए रखते हैं, कहीं बोरियत नहीं, कहीं घिसे-पिटे फिल्मी फॉर्म्युले नहीं। फिल्म का प्रस्तुतिकरण बहुत जगह रंग बदलता है, एक्सपेरिमेंटल लगता है। एक्शन सीक्वेंस में, स्लो मोशन वाले सीन में, तनाव भरे पलों में उपजते ह्यूमर में और हांस फ्लोरियन जिमर के रहस्य भरे बैकग्राउंड म्यूजिक में, फिल्म जायका बदलती चलती है। फिल्म जरूर देखें, मेरी सीधी हां है। मजा आएगा।

डाउनी जूनियर और जूड लॉ की जोड़ी पहले सी ही फ्रैश है। अब वॉटसन बने जूड की शादी का एंगल आ गया है, जिससे दोनों के बीच नोकझोंक होती है। मसलन, पुल के ऊपर से ट्रेन गुजर रही है और मारियाती के आदमियों ने हनीमून मनाने जा रहे वॉटसन और उसकी नवविवाहित वाइफ मैरी के डिब्बे पर हमला बोल दिया है। इस बीच औरत का रूप धरे होम्स आता है और मैरी को कई फुट नीचे नदी में फैंक देता है। यहां दर्शकों को हंसी आने लगती है, क्योंकि वॉटसन अपनी वाइफ को नीचे धकेलने के लिए उससे लड़ रहा है और होम्स कह रहा है कि डोंट वरी, फैंकते वक्त मेरी टाइमिंग बहुत अच्छी थी, उसे कुछ नहीं होगा। इस तरह ये शादी का रेफरेंस दोनों के बीच आता-जाता रहता है।

विलेन मारियाती बने जैरेड हैरिस लुक्स और अभिनय में गैरपारंपरिक लगते हैं। हीरो के तेज दिमाग को टक्कर देते हुए। उनका और होम्स का क्लाइमैक्स सीन देखिए। यहां दोनों दिमाग में ही गणित के मुश्किल सूत्र हल करने के अंदाज में शतरंज की चाल चल रहे हैं और लडऩे के एक-एक स्टेप को पहले ही प्रडिक्ट कर रहे हैं। हालांकि आखिर में किसका मोहरा हावी रहता है ये तो सस्पेंस है, पर तरीका इंट्रेस्टिंग है। होम्स तो सोचता भी ऐसे ही है। एक छोटे से सुराग से कुछ सेकंड में मन ही मन अगले दर्जनों स्टेप सोच लेना।

गाय रिची ने फिल्म में एक्शन सीक्वेंस में स्लो मोशन का चतुर इस्तेमाल किया है। चाहे, होम्स का हर लड़ाई से पहले स्लो मोशन में हर फाइट एक्शन को मन में सोचना हो या जंगलों में से होते हुए मारियाती के आदमियों से भागना। इस दौरान जो गोलियां और हथगोले छूट रहे हैं, वो हमें बड़ी धीमी रफ्तार में पेड़ों की छाल छीलते, मिट्टी उछालते और बाहें खरोंचते नजर आते हैं। मंत्रमुग्ध करते हुए।

डाउनी जूनियर होम्स के रोल में पानी की तरह घुले लगते हैं। हालांकि डाउनी दिखने में स्कॉटिश राइटर सर ऑर्थर कॉनन डॉयेल के इस काल्पनिक किरदार जैसे नहीं हैं। डॉयेल के स्कैच वाला होम्स ज्यादा बूढ़ा, पीछे खिसकी हेयरलाइन वाला और ज्यादा सनकी था, जबकि हमारे डाउनी जूनियर किरदार में अपने हाव-भाव डालते हैं, जो अच्छे लगते हैं। उनका बिना सोचे-समझे हर खतरे में टांग अड़ा देना, फिर कभी पिटना, कभी पीट देना, इस नामी जासूस को हमारे जैसा इंसानी ही लगता है। उनके ह्यूमर की टाइमिंग सौ साल पुराने इस किरदार को हमारे आज के टेस्ट के मुताबिक बनाती है।

फिल्म के छोटा सा सीन है, पर स्मृतियों में रह गया। होम्स के भाई माइकॉफ्ट का रोल कर रहे स्टीफन फ्राई अपने घर में सुबह-सुबह बिना कपड़ों के घूम रहे हैं और सामने वॉटसन की वाइफ मैरी आ जाती है, जो ये माजरा देख चकरा जाती है। अब खुद का नंगा होना तो माइकॉफ्ट के लिए तो जैसे कोई बात ही नहीं है, पर मैरी उसे देखने से बचते-बचाते हुए अपने पति की जानकारी उससे ले रही है।

सायों के खेल में होम्स और वॉटसन
हम 1891 के लंदन में हैं। ख्यात जासूस शरलॉक होम्स (रॉबर्ट डाउनी, जूनियर) इस बार मशहूर प्रफेसर और अपने पुराने दुश्मन मारियाती (जेरेड हैरिस) के खिलाफ सबूत जुटा रहा है। नामी डॉक्टर हॉफमैनस्टॉल और होम्स की लव इंट्रेस्ट इरीन एडलर (रैचेल मैकएडम्स) मारे जा चुके हैं। जब होम्स का दोस्त और जासूसी करतबों का साथी डॉ. वॉटसन (जूड लॉ) उससे मिलता है तो होम्स बताता है कि बहुत से कत्लों, आतंकी घटनाओं और कारोबारी अधिग्रहणों का सिरा मारियाती पर जाकर टिकता है। हालांकि वॉटसन मैरी (कैली रायली) से शादी कर रहा है, पर होम्स के मनाने पर वह इस केस में भी उसका साथ देता है और दोनों मारियाती को रोकने में जुटते हैं। इसी कहानी में एक घुमंतू लड़की सिम्जा (नूमी रीपेस), होम्स का भाई माइकॉफ्ट (स्टीफन फ्राई) और मारियाती का खास आदमी सबैश्चियन मोरान (पॉल एंडरसन) के किरदार भी आते हैं।
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गजेंद्र सिंह भाटी

Wednesday, December 28, 2011

माइनस सत्यदेव दुबे इंडियन थियेटर पूरा नहीं होता

" उनके बारे में खासतौर पर बहुत कुछ कहा जाएगा और कहा जाना चाहिए। क्योंकि भारतीय थियेटर में उनके जितनी लौहकाय-भीमकाय और हिमालयी छवि कुछेक ही हुई हैं। अपनी पूरी जिंदगी किसी एक पैशन में गुजार देना यूं ही नहीं आता। ये बड़े त्याग और बड़े रोग मांगता है। सत्यदेव दुबे फक्कड़ बनकर रहे। ज्ञान के मामले में उनसा कोई न था, पर उनके तरीके उतने ही देसी या कहें तो आर या पार वाले थे। छत्तीसगढ़ से आए लेकर महाराष्ट्रियन बनकर रहे। यहां उनके बारे में जरा सी बात करने का मतलब बस इतना ही है कि उनकी स्मृतियां हमारे बीच कायम रहे। हम उन्हें भूले न। क्योंकि ये उन लोगों में से थे जो सदियों में एक-आध बार होते है। और समाज को इतना कुछ देकर जाते हैं कि अगली कई सदियों का जाब्ता हो जाता है।"

सत्यदेव दुबे
1936-2011

'ब्लैक में देबराज साहनी नाम का सनकी और अप्रत्याशित तरीके अपनाने वाला एक गुरु था। लोगों के लिए अजीब, पर मिशेल मेक्नैली के लिए उसकी जिंदगी बदलने वाला टीचर। पंडित सत्यदेव दुबे भी एक ऐसे ही गुरु थे। मुंबई के थियेटर वर्ल्ड सबसे ऊंची पर्सनैलिटी, और इंडियन थियेटर की भी। बीते रविवार को 75 की उम्र में उनका निधन हो गया। हिंदी फिल्मों में आज के कई सुपर एक्टर हैं जिन्हें एक्टिंग की क ख ग उन्होंने ही सिखाई। अमरीश पुरी उनके ऑलटाइम फेवरेट स्टूडेंट रहे और पुरी खुद मानते थे कि एक्टिंग में उन्होंने सब-कुछ दुबे साहब से ही सीखा। थियेटर के नए आकांक्षी उनके सामने हाथ बांधकर जाते, दिल ऊपर नीचे होता रहता कि इस लैजेंड से कैसे बात हो पाएगी और न जाने वो क्या कह देंगे। पर बाद में सत्यदेव दुबे उनके सबसे करीबी फ्रेंड, पेरंट और गाइड हो जाते।

मेरा उनसे पहला परिचय गोविंद निहलानी की फिल्म 'आक्रोश से हुआ। ओमपुरी, नसीरुद्दीन शाह और अमरीश पुरी की एक्टिंग के साथ दिग्गज नाटककार विजय तेंडुलकर की कहानी और वहीं-कहीं डायलॉग के क्रेडिट में लिखा एक नाम, पंडित सत्यदेव दुबे। ये नाम श्याम बेनेगल की छह शानदार समानांतर फिल्मों में भी डायलॉग-स्क्रिप्ट लिखने के क्रेडिट में दिखता रहा। 'अंकुर’, 'निशांत’, 'भूमिका’, 'जुनून’, 'कलयुग और 'मंडी। इन कल्ट फिल्मों और भारत के थियेटर को माइनस सत्यदेव दुबे करके नहीं देख सकते।

मराठी
, इंग्लिश और हिंदी के नाटकों को उन्होंने अपने इंटरप्रिटेशन वाली भाषा दी। उनकी बोलचाल की भाषा बड़ी रंगीन थी। जब वो मीडिया के इंटरव्यू मांगने पर पैसे मांगते तो कुछ और नहीं बल्कि वो थियेटर को किसी की गरज नहीं करने वाला बना रहे होते थे। थियेटर को दिए अपने 50 सालों में उनका अपने और बाकियों के लिए एक ही मूलमंत्र रहा। पैशन। कि थियेटर को प्रमोशन, पब्लिसिटी या स्टार्स की नहीं बल्कि सिर्फ पैशन की जरूरत है। 'अंधा युग', 'शांतता कोर्ट चालू आहे', 'आधे अधूरे’, 'एंटीगॉन और अपने लिखे 'संभोग से सन्यास तक जैसे नाटकों में उनका निर्देशन बेदाग था। उनके जाने के बाद जो तस्वीरें दिखती या उभरती हैं उनमें दुबे जी के दाह संस्कार वाली जगह निराशा में सिर झुकाए बैठे नसीरुद्दीन शाह दिखते हैं, तो अर्थी को हाथ देते निर्देशक गोविंद निहलानी। ट्विटर पर अमिताभ बच्चन बताते हैं कि उन्हें 'दीवार’ में सत्यदेव दुबे के साथ काम करने का सौभाग्य मिला था। सौरभ शुक्ला कहते हैं कि मैं हमेशा उनकी हस्ती से खौफ खाता रहा। एक बार पार्टी में दूर नर्वस खड़ा रहा और वो आकर बोले कि मैंने तुम्हारी फिल्म इस रात की सुबह नहीं देखी, तुमने बड़ा अच्छा काम किया है।

ये
साल एक और लार्जर देन लाइफ नाम को अपने साथ ले जा रहा है, पर उनकी यादें और अमिट योगदान जेहन में सदा बने रहेंगे।
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ज्योति सभरवाल के साथ लिखी अपनी ऑटोबायोग्रफी ' एक्ट लाइफ में खुद के थियेटर डेज के दौरान अमरीश पुरी सत्यदेव दुबे का खासतौर पर जिक्र करते हैं। चूंकि दुबे साहब अमरीश को अपना फेवरेट स्टूडेंट मानते थे, तो पढ़िए कि इंडियन फिल्मों का ये सबसे कद्दावर विलेन और एक्टर अपने गुरू दुबे साहब के बारे में क्या लिखता है:

# मेरे साथ जो अगली अच्छी चीज हुई वो दुबे साहब थे। उन्हें हिंदी सेक्शन में नियुक्त किया गया। वो मॉलिएर के फ्रेंच प्ले 'स्कॉर्पियन’ के हिंदी ऐडप्टेशन 'बिच्छू’ को डायरेक्ट कर रहे थे। मैं उसमें लीड रोल कर रहा था। नवाब के घर का नौकर। 'बिच्छू’ के डायलॉग बड़े फनी और चतुराई भरे थे। अप्रत्यक्ष तौर पर दुबे साहब का मजाक उड़ाते हुए मैं उन्हें और भी फनी बना देता था।

# उन दिनों वो बड़े यंग और लड़कों जैसे लगते थे। बहुत सारे घुंघराले बाल वाला एक पतला नाटा बंदा। पहले मुझे उनसे निर्देश लेने में बड़ी दिक्कत हुई। कि कैसे इस लड़के को एक्टिंग में अपना टीचर और डायरेक्टर मानूं। फिर जब उनका निर्देशन सख्त हुआ तो मुझे वो बड़े सक्षम लगे। तालमेल बैठने के बाद मैं उनकी इज्जत करने लगा।

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उस गहन ट्रेनिंग कोर्स के दौरान दुबे साहब ने ज्यादा इंट्रेस्ट दिखाना शुरू किया। जब भी मैंने कोई पॉइंट मिस किया उन्होंने मुझे डांटा। मैं एक समर्पित स्टूडेंट की तरह उनके कहे मुताबिक काम कर रहा था। वो काफी इम्प्रेस हुए।

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अपने स्तर पर वो 1954 से इंग्लिश थियेटर ग्रुप से भी जुड़े थे। इसमें अल्काजी साहब, एलेक पदमसी, पर्ल पदमसी और ख्यात बुद्धिजीवी पी.डी.शिनॉय जैसे लोग थे। शिनॉय को दुबे साहब अपना गुरू मानते थे। शिनॉय बहुत ज्यादा ज्ञानवान थे, पर मैं कहूंगा कि दुबे साहब थियेटर के मामले में अंतिम आवाज और अथॉरिटी हैं। उनके परफेक्शन को छू सकने वाला कोई नहीं है।

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जब मराठी और गुजराती थियेटर के लोग दुबे साहब के संपर्क में आए तो वो उनके नाटकों के मूल तत्व को समझने की कोशिश कर रहे थे। कि कैसे दुबे साहब की थीम्स का इंटरप्रिटेशन बाकियों से बहुत अलग था। 1960 के बाद के वक्त में थियेटर में जो एक्सपेरिमेंटल मूवमेंट चल रहा था, उसके लिए जिम्मेदार लोगों में दुबे साहब ने भी बड़ी इज्जत कमाई। मुंबई में हिंदी, मराठी और इंग्लिश थियेटर को करीब से देखने के बाद मैं पाता हूं कि नाटकों के अपने अलग ही इंटरप्रिटेशन से उन्होंने नाटकों का पूरा ट्रेक ही बदल दिया। सिर्फ लाइन्स के मतलब को पकडऩे के लिए नहीं बल्कि उन लाइन्स के बीच क्या है, उसे पढऩे के लिए भी वो गहराई में जाते थे।

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अपने एक्टर्स से भी वो हमेशा यही चाहते थे कि प्ले को समझें। जल्द ही हमने कालिदास के प्ले 'आषाढ़ का एक दिन’ जिसे मोहन राकेश ने एडेप्ट किया था, उसे 1963 में मंचित किया। दुबे साहब तीस के भी नहीं हुए थे और इस
प्ले की गहरी परतों को समझना उनके लिए चैलेंजिंग रहा होगा।

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मुझे याद है एक बार दुबे साहब ने मुझे कहा, 'समर्पण बहुत जरूरी है।‘ उनका कहना था कि अगर वो किसी को ढालना या मोडऩा चाहते हैं तो उस व्यक्ति को उनके आगे पूरी तरह समर्पित होना होगा। संपूर्ण समर्पण।फोटो: चित्रा पालेकर, अमरीश पुरी और सत्यदेव दुबे

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गजेंद्र सिंह भाटी

Sunday, December 25, 2011

फ्रेंच रैंबो जैसे सिमोन को देखें, बाकी सब बुरा-भला

फिल्मः एल्विन एंड चिपमंक्स: चिपरैकेड
निर्देशकः माइक मिशेल
कास्टः जेसन ली, डेविड क्रॉस, जेनी स्लेट
वॉयसओवरः जस्टिन लॉन्ग, मैथ्यू ग्रे गब्लर, एलन टुडी, जेसी मैककॉर्टनी, क्रिस्टीना एपलगेट, एना फैरिस, एमी पूलर
स्टारः ढाई, 2.5
 सात साल पहले आई 'शार्क टेल’ से होते हुए इस साल की ' एडवेंचर्स ऑफ टिनटिन: सीक्रेट्स ऑफ यूनीकॉर्नऔर 'हैपी फीट-2’ तक पहुंचे तो ऐसी बहुत कम एनीमेशन फिल्में हुई हैं जो 'एल्विन एंड चिपमंक्स: चिपरैकेड जितनी बिखरी हुई हैं। या जिनकी स्क्रिप्ट इतनी कमजोर, या डायलॉग इतने उबाऊ हैं। शुरू इस तरह से होती है मानो किसी एनिमेशन फिल्म का शेष भाग टीवी ब्रेक के बाद हम देख रहे हैं। ओपनिंग किसी फिल्म सी नहीं महसूस होती।

'वेकेशन, ऑल आई एवर वॉन्टेड, वेकेशन गाते हुए सब चिपमंक शिप पर चढ़ जाते हैं। ब्रिटनी स्पीयर्स और लेडी गागा सी तड़कीली-भड़कीली ड्रेसेज और एटिट्यूड लिए चिपेट्स शुरू में ज्यादातर वक्त बात-बात पर नाचती रहती हैं। एल्विन की झल्ला देने वाली शरारतें भी खत्म नहीं होती। उस बीच डेव बने जेसन ली बड़े बुझे-बुझे लगते हैं। उन्हीं के दोस्त इयान बने एक्टर डेविड क्रॉस बतख की ड्रेस में परेशान ही करते हैं, हंसाना तो बहुत दूर की बात है। यहां तक आते-आते ऐसा लगता है जैसे स्क्रिप्ट को गाय चबा गई थी और जितनी बच पाई, उसी से फिल्म बना दी। टापू पर चिपमंक्स को वहां पर कुछ साल से फंसी लड़की जोई (जेनी स्लेट) मिलती है। जेनी की एक्टिंग और क्लाइमैक्स में उनका रोल बहुत खराब है।

तो फिल्म में तमाम टॉर्चर देने वाली चीजें मैंने आपको सबसे पहले बता दी हैं। और ये ज्यादातर टॉर्चर देने वाली तब लगती हैं जब हम किसी मैच्योर की तरह फिल्म देखें। जबकि फिल्म देखते हुए आपका बच्चा होना बहुत जरूरी है। क्योंकि छह की छह गिलहरियां इतनी प्यारी हैं कि आप चाहकर भी बुराई नहीं कर पाते। शायद बच्चा बनकर देखने के लिहाज से ही डायरेक्टर माइक मिशेल ने फिल्म को ऐसा रखा। फिर भी कहूंगा कि इस सीरिज की तीनों फिल्मों में ये सबसे कमजोर है।

अब आते हैं उन खूबसूरत बातों पर जो दिल लुभाती हैं। जो हमको और खासतौर पर बच्चों को भाएगी। फिल्म में सिमोन ने मेरा दिल चुरा लिया। नजर की ऐनक लगाए पढ़ेसरी और समझदार साइमन (मैथ्यू ग्रे गब्लर की आवाज) की पर्सनैलिटी में किसी कीड़े के काटने से बदलाव आते हैं और वो फ्रेंच एक्सेंट में बात करने वाला महारोमैंटिक, कूल डूड और रैंबो सा परमवीर सिमोन (एलन टूडी की आवाज) बन जाता है। अहा! उसका जिनेट को फ्रेंच में मेदमोजेल (मैम) बोलना, शार्क से लडऩा, फ्लर्ट करना या फिर आशिकों के जैसे इम्प्रेस करने वाले लंबे-लंबे डायलॉग बोलना फिल्म के सबसे यादगार पल हैं। मैं बस सिमोन को देखने के लिए फिल्म दोबारा देख सकता हूं।

फिल्म में क्लाइमैक्स बहुत बोरिंग है, पर बच्चों में नैतिकता और दूसरों की मदद करने या दूसरों को माफ करने का गुण डालने वाली अच्छी बात है। जब डेव लकड़ी के पुल से नीचे लटक रहा होता है और जेनी उसे मारने वाली होती है तो डेविड क्रॉस का कैरेक्टर आकर उसे समझाता है। खजाने की लोभी उस लड़की का ह्रदय परिवर्तन करता है। ये बोरिंग है पर अच्छा है। एल्विन के जंगल में सुधरने का तरीका बच्चों को एंटरटेन भी करता है और सीख भी देता है। पहले साइमन सारी टेंशन लेता था और एल्विन शैतानियां करता, अब साइमन तो सिमोन होकर आवारा हो गया है और सारी जिम्मेदारी एल्विन को लेनी पड़ती है। वो सुधरता है। फिल्म में 13 साउंडट्रेक हैं और कुछ एडिशनल हैं, पर उन्हें फिल्म में पिरोया ऐसे गया है कि कहीं कोई भावुक-यादगार पल नहीं पैदा होते। इन्हें एडजस्ट करने के चक्कर में भी फिल्म की एनर्जी इधर-उधर भागती है।

तमाम कमजोरियों के बावजूद बच्चों के लिहाज से कहूंगा कि उन्हें ये फिल्म जरूर दिखाएं। फिल्मी ग्रामर में तो ये फिल्म फेल होती है, पर मासूमियत में पास। बड़ों, आपके लिए ये फिल्म डेढ़ स्टार वाली है पर बच्चों के लिहाज से ढाई स्टार।

एल्विन और चिपमंक्स कथा: भाग तीन
पहली फिल्म थी फ्लॉप सॉन्गराइटर डेव (जेसन ली) के तीन नाचने-गाने वाली मेल गिलहरियों यानी चिपमंक्स से मिलने और हिट होने की। दूसरी फिल्म में तीन फीमेल गिलहरियां यानी चिपेट्स भी आ गईं। अब इस तीसरी फिल्म में शरारती चिपमंक एल्विन को सुधरना होगा। कहानी शुरू होती है एल्विन, साइमन, थियोडोर, ब्रिटनी, जिनेट और एलेनॉर इन चिपमंक्स के अपने मैनेजर और पिता समान डेव के साथ समुद्री जहाज पर छुट्टियां मनाने जाने के साथ। डेव के बार-बार समझाने पर भी एल्विन (आवाज जस्टिन लॉन्ग की) की बदमाशियां कम नहीं होती है और एक दिन पतंग से खेलते-खेलते वह और उसके सभी साथी चिपमंक उड़ जाते हैं। अब वो किसी टापू पर फंस जाते हैं और डेव को मिस करते हैं। एल्विन को पछतावा होता है और वो जिम्मेदार बनने की कोशिश करता है। पर क्या वो कभी इस टापू से निकल नहीं पाएंगे, जो ज्वालामुखी फटने से नष्ट होने वाला है? और क्या डेव उन्हें बचाने आएगा?

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गजेंद्र सिंह भाटी

Friday, December 23, 2011

"उन्होंने कोई आधा घंटा 40 मिनट मिल्खा की कहानी सुनाई और मैं दंग रह गयाः फरहान अख्तर"

उनके निर्देशन वाली पहली ही फिल्म 'दिल चाहता है को नेशनल अवॉर्ड मिला। फिल्म यूथ पर छा गई। अगली फिल्म 'लक्ष्य कुछ यूं रही कि आर्मी में ऑफिसर बनना चाह रहे लड़के इसका गाना (हां यही रस्ता है तेरा, तूने अब जाना है) सुनकर खुद को मोटिवेट करते। फिर 'रॉक ऑन में चार्टबस्टर गाने गाकर और एक्टिंग करके उन्होंने सबको चौंकाया। इस शुक्रवार शाहरुख खान के साथ उनकी बनाई 'डॉन’ की सीक्वल 'डॉन-2’ रिलीज हुई है। अब खास ये है कि डायरेक्टर राकेश ओमप्रकाश मेहरा की बहुप्रतीक्षित 'भाग मिल्खा भाग में मिल्खा सिंह का लीड रोल वो करेंगे। ये फरहान अख्तर हैं। सफल डायरेक्टर, सफल एक्टर, सफल प्रॉड्यूसर और सफल सिंगर। उनके खास सेंस ऑफ ह्यूमर और खराश भरी मोहक आवाज के साथ हुई ये बेहद संक्षिप्त मुलाकात। पढ़ें सबकुछ उऩके बातें डिलीवर करने के अपने अंदाज में, बिना कोई मोटी एडिटिंग के।


‘डॉन-2’ में आपको खुलकर खेलने का मौका मिला है? पिछली फिल्म में स्टोरी फिक्स थी, इसमें जैसे चाहे स्टोरी आगे बढ़ा सकते थे, जहां जाना चाहते जा सकते थे, जो करना चाहते कर सकते थे?
बिल्कुल। ऐसा ही था, आप बिल्कुल ठीक कह रहे हैं। ये एक्शन फिल्म है और सही मायनों में ये मेरी पहली एक्शन फिल्म है। जो पहली फिल्म थी वो ट्रिब्यूट थी, उस ‘डॉन’ को जो 1978 में आई थी। शाहरुख है, रितेश, प्रियंका, बोमन जी हैं, ओम जी हैं। सब के सब फैन थे पहली डॉन के। तो हमने सोचा कि मिलकर उस फिल्म को ट्रिब्यूट करें। उस फिल्म को ही नहीं, उस दौर में जो फिल्में बना करती थी। मैं बहुत प्रभावित हुआ हूं जिन फिल्मों से। तो इस बार मौका मिला है कि डॉन के कैरेक्टर को ऑरिजिनल स्क्रीनप्ले में डालने का, या जिस तरीके से मैं एक्शन फिल्मों को देखता-समझता हूं उस तरीके की एक्शन फिल्म बनाने का। तो ये वो मौका था जो मुझे मिला।

जब मैं प्रोमो देखता हूं ‘डॉन-2’ का, उसी वक्त ‘मिशन इम्पॉसिबल-4’ और ‘द गर्ल विद ड्रैगन टैटू’ के प्रोमो भी देखता हूं। इन्हें देख लगता है कि सबकी क्वालिटी एक ही है, एक ही रेंज की हैं, इनकी मेकिंग और रंग एक से ही हैं। तो ये बढ़िया चीज है। दूसरी चीज ये कि सब दिखने में एक जैसी हैं। ऐसे में हम कैसे पहचानें या भेद करें कि ये इंडियन फिल्म है? इंडियन आइडेंटिटी के साथ आई है? पहचान मुश्किल नहीं होती?
मतलब मैं इंडियन हूं, जो लोग हैं इस फिल्म में वो इंडियन हैं। जिस लेंग्वेज में बात करते हैं वो हिंदी है। हिंदुस्तानी जबान। कुछ दो दिन पहले शाहरुख और मैं बात कर रहे थे कि ये सवाल काफी पूछा गया है, और हमारी फिल्म की ‘एम.आई.4’ से काफी तुलना की जा रही है। तो हम लोग सोच रहे थे कि एक्चुअली इतनी अच्छी बात है और इतनी बड़ी बात है। अगर सोचने जाएं कि पांच साल पहले जब ‘डॉन-1’ रिलीज हुई थी, तो उसी साल ‘एम.आई.3’ भी रिलीज हुई थी। तो मतलब कभी ये बात हुई ही नहीं कि दोनों फिल्मों का नाम एक ही सेंटेंस में लिया जाता हो। मगर जो अवेयरनेस है इंडियन फिल्मों की, जो टेक्नीकल सैवी आ गई है हिंदी फिल्मों में, जो पॉलिश आ गई है, सॉफिस्टिकेशन आ गई है, जिस तरीके से लोकेशंस पर हम वेलकम किए जाते हैं शूट करने के लिए। और एक जो ऑडियंस बढ़ रहा है इस फिल्म का। तो एक्चुअली ये बड़ी गर्व करने की बात है। कि ‘एम.आई.’ या हॉलीवुड की बड़ी फिल्मों के साथ एक बराबरी पर हमारा नाम लिया जाए, हमारी फिल्मों की बात हो। ये बात दिखाती है कि इंडियन फिल्में कितनी बढ़ी हैं। तो मुझे उससे प्रॉब्लम नहीं है, जहां तक कहानी के फर्क का सवाल है तो ‘एम.आई.4’ अलग ही होगी, मैंने तो नहीं देखी। रितेश ने जाकर देखी, शाहरुख ने जाकर देखी। उन हॉलीवुड फिल्मों का जो अंदाज है स्टोरीटेलिंग का, वो हमारे स्टोरीटेलिंग अंदाज से अलग होता है। जब ऑडियंस देखेगी तो खुद-ब-खुद समझ जाएगी।

भाग मिल्खा भाग की शूटिंग कब शुरू हो रही है?
मार्च से शुरू हो रही है।

तो आप कैसे जुड़े, पहले राकेश ओमप्रकाश मेहरा ऑडिशन करने वाले थे मिल्खा सिंह के लीड रोल के लिए।
ये सारी डीटेल तो मुझे नहीं पता, वो तो वो ही बता सकेंगे। मगर, वो मुझे मिले ऑफिस में। और उन्होंने मुझे कुछ आधे घंटे 40 मिनट में कहानी सुनाई, मैं बिल्कुल दंग रह गया कि एक तो इतनी अच्छी कहानी लिखी है, मुझे इसमें किरदार निभाने का मौका मिल रहा है। ये बहुत ही इम्पॉर्टेंट फिल्म है हिस्सा लेने के लिए। मुझे ताज्जुब भी बहुत हुआ, जैसे आप कह रहे हैं कि ऑडिशन किया था राकेश जी ने ‘भाग मिल्खा भाग’ के लिए। दूसरे लोगों से भी बात की होगी उन्होंने। मुझे बहुत ताज्जुब था कि उन्हें इतनी मुश्किल क्यों हो रही है एक एक्टर ढूंढने में। जब कहानी इतनी बेहतरीन है। तो मैं उन सब एक्टर्स को भी शुक्रिया कहना चाहूंगा जिन्होंने शायद न की हो (हंसते हुए) इससे मुझे मौका मिल गया।

मिल्खा सिंह बनने के लिए खुद को फिजीकली कितना पुश किया?
चल रहा है, जारी है। मैं ट्रेन कर रहा हूं। सेंट्रल रेलवे के एक कोच हैं, दिल्ली के भी एक कोच हैं रितेंदर सिंह जी। वो हमारे हैड कोच हैं। उन्होंने सेंट्रल रेलवे के मुंबई में एक कोच हैं मेल्विन, उन्हें मेरा कोच बनाया है। हफ्ते में तीन दिन ट्रेन करता हूं। अभी तो इतना ट्रेवल वगैरह कर रहा हूं कि लगातार प्रैक्टिस का टाइम नहीं मिलता है। मगर देखिए ‘डॉन-2’ रिलीज होगी। फिर जनवरी से शुरू करेंगे। हफ्ते में चार दिन, और जैसे बढ़ते जाएगा तो पांच दिन और छह दिन।

स्क्रिप्ट कितनी एक्साइटिंग है?
बहुत ही ज्यादा एक्साइटिंग है। मैंने लिखी नहीं है, मैं डायरेक्टर नहीं हूं तो ज्यादा कह नहीं सकूंगा उस बारे में। किसी और की प्रॉपर्टी है, इंटेलेक्चुअल राइट्स हैं। मगर बहुत ही बेहतरीन फिल्म है। कहानी के अलावा इसमें एक पॉजिटिव मैसेज है। हम सब थोड़े कम्फर्ट में हमेशा रहने के आदी हो गए हैं। लेकिन जो आप हासिल करना चाहते हैं उसके लिए अपने कम्फर्ट से कॉम्प्रोमाइज करने को कितना तैयार हैं ये सीखने की बात है। उन्होंने (मिल्खा सिंह) इतनी कुर्बानियां दी हैं, जो वो रनर बने, किस तरीके से बने, किस तरह का मोटिवेशन था उनका, किन मुश्किलों से गुजरना पड़ा उन्हें। ये बहुत अच्छा मैसेज है आज के यूथ के लिए। यूथ में थोड़ा बहुत कनफ्यूजन हमेशा रहता है, क्योंकि मौके इतने ज्यादा हो गए हैं, उन्हें लगता है कि आसानी से कुछ भी बन सकता हूं। मगर त्याग तो करना पड़ता है। ये स्पिरिट का बहुत अच्छा मैसेज है।

एक्टिंग, डायरेक्शन, प्रोडक्शन आपने किया। बहुत कम लोग जानते हैं कि आपने और जोया नेब्राइड एंड प्रेजुडिसके तीन सॉन्ग लिखे थे। वो कैसे हुआ?
एक्चुअली, गुरिंदर जी की फिल्म में मेरे पिता जावेद अख्तर साहब लिरिक्स लिख रहे थे हिंदी में। तो गुरिंदर जी ने कहा कि वो चाहती हैं कि इंग्लिश में लिरिक्स भी वो ही लिखें। उन्होंने कहा कि “दरअसल अंग्रेजी में लिरिक्स लिखने में मैं इतना कम्फर्टेबल नहीं हूं। लेकिन जोया और फरहान दोनों इंग्लिश में पोएट्री लिखते हैं, शायद मैं उनसे बात कर सकता हूं। आप मिल लीजिए, अगर लगे कि वो कुछ अच्छा लिखकर दे सकते हैं तो ठीक है।“ हमारी मुलाकात हुई गुरिंदर जी से, हमने एक गाना लिखकर दिया, और उन्हें बहुत अच्छा लगा। बस वही हुआ।

जिंदगी मिलेगी दोबारामें जावेद साहब की लिखी पोएट्री की लाइन्स आप फिल्म में बीच-बीच में जिस अंदाज में बोलते रहते हैं उसे काफी पसंद किया गया। (बहुत-बहुत शु्क्रिया), उसमें आपने खुद कुछ ध्यान रखा या जावेद साहब से बात की?
मैंने उनसे काफी बात की। मैंने उन्हें कहा कि आप मुझे रिसाइट करके टेप या सीडी में दे दीजिए। मैं सुनता रहूंगा क्योंकि एक अंदाज होता है बोलने का, जो मतलब हम डायलॉग लिखते हैं, डायलॉग बोलते हैं। जब आप नज्म पढ़ते हो या करीमा पढ़ते हो, तो उसमें जो वजन होता है, और कि कहां वजन आना चाहिए, कहां जल्दी बात निकल जाए या थोड़ा पॉज भी रहे। ये सब सीखना पड़ेगा। तो ये मैंने उनसे सीखा है। अगर घर में इतने टेलंटेड पोएट हैं तो कहीं और जाने की जरूरत भी नहीं पड़ी। मैं बहुत भाग्यशाली हूं इस मामले में, कि मैं उनसे इस मामले में इतनी डीटेल में बात कर सकता हूं।

आपने एचआईवी एड्स पर एकपॉजिटिवनाम की शॉर्ट फिल्म बनाई थी। उसकी मेकिंग कैसे हुई?
मेरा ये मानना है कि एचआईवी अवेयरनेस इस देश के लिए बहुत जरूरी है। ताकि आप एचआईवी अवॉयड कर सकें, सेफ्टी से अपनी जिंदगी जी सकें। एक ये भी पहलू है कि अगर आपकी फैमिली में, दोस्तों में किसी को ये इनफेक्शन हो जाए तो बहुत जरूरी है कि उनके साथ आपका बर्ताव बदले नहीं। क्योंकि वो बस एक मरीज है, उसने कोई जुर्म नहीं किया है। मतलब, लोग उन्हें कभी-कभी आउटकास्ट कर देते हैं। तो ये सब बताना-दिखना फिल्मों में बहुत जरूरी था। मीरा जी (मीरा नायर, डायरेक्टर) जो हैं उन्होंने मुझे फोन करके पूछा कि क्या मैं एक शॉर्ट फिल्म बनाना चाहूंगा। मैं खुद भी सोच रहा था कि किस तरीके से इस मुद्दे को उठाया जाए। मुझे लगा कि मैं ऐसे परिवार की बात करूं जिसमें एक मेंबर को ये इनफेक्शन हो गया है। उस फिल्म की सीडी डिस्ट्रीब्यूट हुई थी हर जगह। इंटरनेट पर भी फ्री अवेलेबल थी। सिर्फ मेरी फिल्म को ही नहीं, विशाल (भारद्वाज) ने भी एक शॉर्ट फिल्म बनाई थी, संतोष सिवन ने भी एक फिल्म बनाई थी और मीरा खुद ने। चारों शॉर्ट फिल्मों को लोगों ने बहुत सराहा है।

आपने एक्टिंग कहीं सीखी, क्योंकि एफर्टलेस लगती है?
नहीं, मुझे शौक बचपन से था एक्टिंग था। जब बड़ा हुआ तो, अंदर एक आवाज होनी चाहिए जो कहे कि अब तुम तैयार हो, वो आवाज मैंने 2008 तक कभी सुनी नहीं (हंसते हुए)। इसलिए मैं दूर ही रहा हूं। क्योंकि बहुत बड़ी जिम्मेदारी होती है, किसी और की स्क्रिप्ट होती है, डायरेक्शन होता है, तो मतलब अपने मन को बहलाने के लिए आप एक्टर नहीं बन सकते। जब मुझे लगा कि अब मैं एक्टिंग करने के लिए तैयार हूं, मैं डिलीवर कुछ कर पाऊंगा, तब मैंने ये स्टेप ले लिया। थैंक यू अगर आपको एफर्टलेस लगी।

दिल चाहता हैको नेशनल अवॉर्ड मिला। लोगों ने सराहा। आपको पता है कि देश के अंदरुनी हिस्सों में युवाओं पर इसका कितना असर पड़ा? फीडबैक मिलता है उसका?
हां, मिलता है। तब इंटरनेट और दूसरा कम्युनिकेशन इतना था नहीं। पर जब मैं ट्रेवल कर रहा था ‘लक्ष्य’ बनाने के दौरान देहरादून, दिल्ली और लद्दाख तो ये जानकर अमेजिंग लगा कि कहां-कहां लोगों ने फिल्म देखी है। और आज भी मैं कहीं जाता हूं, जैसे अभी कुछ दिन पहले कानपुर में था, इंदौर में था, जहां भी मैं जाता हूं लोग उस फिल्म के बारे में जिक्र हमेशा करते हैं। यूथ पर इस फिल्म का बड़ा असर रहा और खुशी की बात है अगर आपका पहला काम कुछ ऐसा कर दिखाए या यादगार हो जाए। अपने आपको लकी मानता हूं।

मौजूदा फिल्मों में कौनसी पसंद है?
जो कुछ अलग कर रही हैं, जैसे एक ‘देल्ही बैली’ थी। उसने कुछ नियम तोड़े हैं हालांकि उसमें कॉन्ट्रोवर्शियल भी था। मगर मेरी ये सोच है कि अगर सिनेमा को इवॉल्व करना है तो हमें थोड़ा सा खुलना पड़ेगा। अगर एक ही नियम के भीतर घूमते रहेंगे तो लोग बोर हो जाएंगे। वही सब कुछ हो रहा है, उसी जबान में लोग बात कर रहे हैं, तो आपको बदलने की जरूरत है। थोड़ा बहुत रियल होना जरूरी है। उसके अलावा ‘डर्टी पिक्चर’ थोड़ी बहुत अच्छी लगी, वो अलग सी थी। ‘सिंघम’ मुझे एक्चुअली बहुत पसंद आई, जो एक मेनस्ट्रीम रिवाइवल ऑफ द ओल्ड फॉर्म्युला कहते हैं।
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गजेंद्र सिंह भाटी

Tuesday, December 20, 2011

“इंडिया में शेखर कपूर से अच्छा डायरेक्टर नहीः तिग्मांशु धूलिया”

तिग्मांशु धूलिया फिल्ममेकिंग की जिन भट्टियों से होकर निकले हैं, वो उन्हें सबसे स्पेशल बनाती हैं। कल्ट फिल्मों की मेकिंग में वो शामिल रहे। चाहे मणिरत्नम की 'दिल से’ की स्क्रिप्ट लिखना हो, या शेखर कपूर की 'बैंडिट क्वीन’ और आसिफ कपाड़िया की अवॉर्ड विनिंग फिल्म 'द वॉरियर’ की कास्टिंग करना। टीवी को उन्होंने 'जस्ट मोहब्बत’ और 'स्टार बेस्टसेलर् जैसे अनोखे सीरियल दिए। बीते दिनों उनकी अच्छी फिल्म 'साहब बीवी और गैंगस्टर’ आई और अब इरफान खान के साथ बहुप्रतीक्षित फिल्म 'पान सिंह तोमर’ के आने की बारी है। इस सुपर सॉलिड निर्देशक से हुई ये बहुमूल्य बातचीत। संक्षिप्त अंश यहां, संपूर्ण संस्करण यानी अनकट वर्जन फिर कभी।

'पान सिंह तोमर’ कब से तैयार है, रिलीज में देरी क्यों?
हुआ ये कि 'पान सिंह तोमर’ की शूटिंग खत्म हो गई और ये तीन-चार फिल्म फेस्टिवल्स में गई। आबू धाबी, लंदन, न्यू यॉर्क। और बहुत सराही गई। बहुत अच्छे रिव्यूज मिले वहां। एक-आध रिव्यू तो ऐसे मिले कि मुझे खुद शर्म आने लग गई, कि ये फिल्म 'बैंडिट क्वीन’ से भी बेहतर है। मेरे तो गुरू हैं शेखर जी (शेखर कपूर, बैंडिट क्वीन के डायरेक्टर)। उसके बाद क्या हुआ कि 'पान सिंह...’ बिक चुकी थी, सैटेलाइट राइट बिक चुके थे। जब बेचे थे तब सैटेलाइट बतौर टैरेटरी बहुत हॉट नहीं थी, फिर एकदम से हॉट हो गई, क्योंकि बहुत से मूवी चैनल लॉन्च होने वाले थे। तो फिल्म के प्रॉड्यूसर यूटीवी ने चैनलों से प्राइस को लेकर फिर से बातचीत की। उसमें वक्त लग गया। उसके बाद क्या हुआ कि तब से लेकर दिसंबर-जनवरी तक हर हफ्ते इतनी सारी फिल्में है न, कि करेक्ट टाइम नहीं मिल रहा था 'पान सिंह...’ को रिलीज करने का, इसलिए अब फाइनली 9 मार्च 2012 को रिलीज होगी।

आपने मणिरत्नम और शेखर कपूर को असिस्ट किया है। आकांक्षी फिल्ममेकर-राइटर जिसका सपना देखा करते हैं। अपनी जिंदगी और फिल्मों में आपने इन दोनों से क्या लिया?
शेखर जी की पर्सनैलिटी बड़े चार्मिंग आदमी की है। वो चार्म तो मैं ला नहीं सकता। उनका अपना डीएनए है। कोशिश भी करता हूं तो फेल हो जाता हूं। लेकिन बतौर डायरेक्टर ईमानदारी से बोलूं तो इंडिया में उनसे अच्छा डायरेक्टर नहीं है। एक्टरों को कैसे हैंडल करना है, वो मैंने उनसे सीखा। बहुत प्यार से हैंडल करते हैं वो, कोई जोर-जबरदस्ती नहीं, कोई चिल्लाना नहीं, बहुत ही पोलाइट आदमी हैं। रियल लाइफ में भी बहुत तमीज से बात करते हैं। मैं कोशिश करता हूं उनके इस पहलू को पकडऩे का। मणि सर कमाल के डायरेक्टर हैं। विजय आनंद साहब के बाद कोई अगर गाने शूट करता है तो मणि सर करते हैं। दूसरा काम को लेकर उनकी इतनी शिद्दत है, एकदम पूजा की तरह लेते हैं। उसको लेकर मैं बहुत ही इंस्पायर्ड हूं।

आपने 'हासिल’ जैसी कल्ट फिल्म बनाई, पर 'साहब बीवी और गैंगस्टर’ तक आते-आते ऐसा क्यों लगने लगा कि कभी आप कोई मैग्नम ओपस (बहुत बड़ी) बनाना चाहें तो बजट के लिए थोड़ा सा स्ट्रगल करना पड़ता है?
नहीं, ऐसा नहीं है। जिस दिन पिक्चर 'चरस’ रिलीज हुई थी, उसके दूसरे ही दिन ही मैंने अपनी थर्ड पिक्चर की शूटिंग शुरू कर दी थी। थोड़ी एक्सपेरिमेंटल फिल्म थी। 'किलिंग ऑफ अ पॉर्न फिल्ममेकर’ नाम था उसका। इरफान (खान) था उसमें, तो हफ्ते भर शूटिंग की। फिर पता चला कि प्रॉड्यूसर ने उसी पैसे से कोई दूसरी फिल्म शुरू कर दी है, जिसका मुझे इल्म ही नहीं था। उन्होंने वो पिक्चर बना दी, पर आज तक रिलीज नहीं हो पाई और हमारी रुक गई। ऐसे में जो टाइम स्क्रिप्ट लिखने और प्री-प्रॉडक्शन में गया वो बर्बाद हो गया। उसके बाद आप जो बोल रहे हैं मैग्नम ओपस, तो मैंने बहुत बड़ी फिल्म उसके बाद शुरू की, 'गुलामी’ 1857 की क्रांति पर थी। सनी देओल के साथ। उसमें सनी, समीरा रेड्डी, इरफान और लंदन के बहुत सारे एक्टर थे। स्क्रिप्ट लिखने में बहुत वक्त लगा। लोकेशंस ढूंढी, कास्टिंग की, हथियार बनाए, कॉस्ट्यूम बनाई। पीरियड फिल्म थी तो उसमें बहुत टाइम गया। पूना के पास एक जगह है भोर, वहां पर मैंने 70 लाख का सेट लगाया। तीन दिन की शूट के बाद मुझे लगा कि कुछ पैसे की कमी हो रही है, कभी डीजल नहीं आ रहा है, कभी कुछ और। पता चला कि प्रॉड्यूसर के पास पैसे नहीं हैं। शूटिंग रुक गई। हफ्ते भर बाद प्रॉड्यूसर बिल्डिंग से गिर गया और शरीर की सारी हड्डियां टूट गई। वो एक साल बेड पर रहे और पिक्चर समेट ली गई। तो ऐसा नहीं है कि मैग्नम ओपस नहीं बनाऊंगा, जरूर बनाऊंगा उस फिल्म को।

'किलिंग ऑफ अ पॉर्न फिल्ममेकर’ के बारे में पूछना चाहता था कि फिर बंद क्यों हो गई?

इरफान और मैं अपने-अपने काम में लग गए। लेकिन बनाऊंगा मैं उसको, बड़ी इंट्रेस्टिंग स्क्रिप्ट है वो, बड़ी स्पिरिचुअल फिल्म है। रेसिज्म पर है, इंटरनेशनल रेसिज्म पर।

बहुत कम लोग जानते हैं कि आप 'बैंडिट क्वीन’ के कास्टिंग डायरेक्टर थे। आप एनएसडी से निकले, आपको ऑफर मिला, आपने किया। पर क्या ऐसा है कि कोई कास्टिंग डायरेक्टर नहीं बने रहना चाहता, आखिर में सबको डायरेक्टर ही बनना है?
जब मैंने 'बैंडिट क्वीन’ की तब कास्टिंग डायरेक्टर का बहुत डिसिप्लिन था नहीं। जो बाहर से फिल्में आती थी उसमें होते थे कास्टिंग डायरेक्टर। डॉली ठाकुर और ये लोग करते थे कुछ। लेकिन 'बैंडिट क्वीन’ की कास्टिंग सबको ऑन द फेस लगी। इंट्रेस्टिंग थी। अभी तो इंडस्ट्री में हैं कास्टिंग डायरेक्टर। मुकेश छाबड़ा है, नमिता सहगल है। अच्छा है और अब ये डिसिप्लिन में आ गया है।

मौजूदा वक्त में कौन फिल्ममेकर अच्छी फिल्में बना रहे हैं?
राजू हीरानी तो बेस्ट हैं। जितने अच्छे फिल्ममेकर हैं उतने ही अच्छे इंसान भी हैं वो। इम्तियाज का काम मुझे बहुत अच्छा लगता है। दिबाकर का काम मुझे बहुत इंट्रेस्टिंग लगता है। नीरज पांडे की 'अ वेडनसडे’ बहुत अच्छी लगी थी।

इतनी अच्छी राइटिंग कैसे कर लेते हैं?
ड्रामा स्कूल में एक्टिंग में स्पेशलाइज किया था। एक बड़ा रियलिस्टिक नाटक हुआ नॉर्वे के प्ले राइटर हैनरिक इब्सन का। उसका हिंदी में ट्रांसलेशन था जो बहुत खराब था। उसमें मुझे मेन रोल दे दिया गया। मैंने रोल निभाया मगर वो नाटक बहुत बड़ा फ्लॉप हुआ। तब से मैंने खुद से कहा कि मैं बहुत बुरा एक्टर हूं। अब कभी एक्ट नहीं करूंगा। पर इस वाकये के बाद से लगातार लिखने लग गया। हमेशा सोचता था कि एक्टर के लिए ऐसे डायलॉग हों जो थोड़े ड्रमैटिक तो हों, वजन वाले तो हों लेकिन ऐसे न लगें कि लिखे गए हैं। बड़े एफर्टलेस हों और एक्टर को बोलने में सुविधा हो। क्योंकि मैं खुद एक्टर था तो डायलॉग जब लिखता तो पहले बोलकर देखता कि मजा कैसे आएगा।
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गजेंद्र सिंह भाटी

Saturday, December 17, 2011

इस एलीट एक्शन में कुछ हंसी लाए हैं रैटाटूई वाले ब्रेड बर्ड

फिल्मः मिशन इम्पॉसिबल-घोस्ट प्रोटोकॉल (अंग्रेजी)
निर्देशक: ब्रेड बर्ड
कास्ट: टॉम क्रूज, पॉला पैटन, जैरेमी रेनर, साइमन पेग, माइकल नेक्विस्ट, अनिल कपूर, व्लादिमीर माशकोव
स्टार: तीन, 3.0'मिशन: इम्पॉसिबल-घोस्ट प्रोटोकॉल' का सबसे थ्रिलिंग सी है। ईथन बने टॉम क्रूज दुबई की 2,717 फुट ऊंची ईमारत बुर्ज खलीफा की एक सौ चौबीसवीं मंजिल पर, कांच पर सिर्फ चुंबकी दस्तानों के सहारे चढ़ रहे हैं। बिना कोई सिक्योरिटी वायर पहने। नीचे गिरे तो मौत पक्की। तभी कुछ बुरा होता है। एक दस्ताने की बैटरी खत्म हो जाती है। वो उस दस्ताने को फैंक देते हैं। मौत से बाल-बाल बचते हुए कुछ ऊप चढ़ते हैं तो देखते हैं कि हवा से उड़कर वो दस्ताना जरा दूर कांच पर चिपक गया है। जैसे हीरो को चिढ़ा रहा हो। सीन में यहां ऐसा कॉमिक सेंस बनता है कि ऑडियंस हंस पड़ती है। यकीन नहीं होता कि मिशन इम्पॉसिबल जैसी एलीट एक्शन सीरिज में, सबसे रौंगटे खड़े करने वाले सीन में भी हमें हंसाने की कोशिश हो सकती है। चुस्त एक्शन में चुटकी काटने भर की कॉमेडी की एंट्री इस फ्रैंचाइजी में डायरेक्टर ब्रेड बर्ड की एंट्री से ही हो जाती है। इन्होंने 'रैटाटूई' और 'द इनक्रेडेबल्स' जैसी फनी फन फिल्में बनाई है। अगर दुबई, मुंबई और मॉस्को में ईथन के जेम्स बॉन्डनुमा सनसनीखेज एक्शन सीन कहीं कम नहीं होते तो बीच-बीच में चपल हास्य भी घुलता रहता है।

अस्पताल से भागने की कोशिश में खिड़की से बाहर हवा में टंगा ईथन फंस गया है, तो मुंह में सिगरेट दाबे रूसी इंटेलिजेंस ऑपरेटिव सिदिरोव (व्लादिमीर माशकोव) खिड़की पर कुहनियां टिकाए कहता है, '(इशारे में) अब कूदो। नॉट गुड आइडिया।' ईथन वापिस कहता है, 'एक मिनट पहले तो लगा था।' इसी तरह बुर्ज खलीफा वाले स्टंट में मरते-मरते बचे ईथन और ब्रैंट को हांफते देख बस कुछ टेक्नीकल काम करके कमरे में लौटा बेंजी कहता है, 'ओह, ड़ा टफ काम है। (फिर) तुम लोग हांफ क्यों रहे हो, डि आई मिस समथिंग।'

उपलब्धि के नाम पर फिल्म में डायरेक्टर बर्ड का ये सेंस ऑफ ह्यूमर ही है। बाकी 'एम.आई.-4' में जो दावे स्टंट्स को लेकर किए गए थे, वो हैं। आप थियेटर में जाकर देख सकते हैं। फिल्म एंगेज करके रखती है। पर सीक्वल में हमारी उम्मीदें बिलाशक बहुत ज्यादा थी, जो पूरी नहीं हुईं। इसके अलावा स्क्रिप्ट के स्तर पर कुछ अनोखा सोचने की जरूरत है। क्या प्रॉड्यूसर लोग पढ़ रहे हैं? बीच में हमें लगता है कि उसी पुराने 'रूसी बुरे और विलेन होते हैं, अमेरिकी अच्छे होते हैं' ट्रैक पर फिल्म दौड़ रही है, पर कहानी कुछ बदल जाती है। पर अंत में वही होत़ा है, एक अमेरिकी हीरो हो जाता है और एक रूसी उसे थैंक यू बोल रहा होता है। हद है भई।

खैर, जैरेमी रेनर फिल्म में स्मार्टनेस लाते हैं और क्रोएशिया के अपने मिशन के बारे में बताते हुए इंटेंस लगते हैं। अच्छा है। साइमन पेग सबसे इंट्रेस्टिंग हैं। अगली फिल्म में भी वो जरूर रहेंगे। वो हर सीन में राहत देते हैं। अनिल कपूर का रोल सबसे कमजोर है। तकरीबन न के बराबर। पर अचरज क्या करना, एशियन कलाकारों का कद अमेरिकी फिल्मों में इतना ही तो रखा जाता है।

एम.आई. 4 की कहानी
आईएमएफ की एजेंट कार्टर (पॉला पैटन) और टेक्नीकल फील्ड एजेंट बेंजी (साइमन पेग) मॉस्को की एक जेल में बंद मशहूर एजेंट ईथन हंट (टॉम क्रूज) को निकालते हैं। अब ये ईथन की नई टीम है और उन्हें अगला मिशन मिलता है रूस के मशहूर क्रेमलिन पैलेस से सीक्रेट डॉक्युमेंट चुराने और 'कोबाल्ट' कोड नेम वाले शख्स का पता लगाने का। उनके इस मिशन के बीचोंबीच के्रमलिन का एक हिस्सा बम से उड़ा दिया जाता है। इसका आरोप अमेरिका पर लगता है। ईथन को आईएमएफ सेक्रेटरी (टॉम विल्किनसन) बताते हैं कि अमेरिकी राष्ट्रपति ने ऑपरेशन 'घोस्ट प्रोटोकॉल' घोषित कर दिया है। इसका मतलब होता है कि पूरी संस्था आईएमएफ को बंद कर दिया जाए। पर ईथन और उसकी टीम को सरकार के हाथों में पडऩे से पहले कोबाल्ट का पता लगाना है और क्रेमलिन पर हमले का दाग अमेरिका के सिर से धोना है। इस टीम में अब आईएमएफ का डेस्क एनेलिस्ट विलियम ब्रैंट (जैरेमी रेनर) भी शामिल है। इन लोगों का लक्ष्य दुबई से होता हुआ मुंबई तक जाता है। कहानी के प्रमुख किरदारों में रूसी न्यूक्लियर रणनीतिकार कर्ट हैंड्रिक्स (माइकल नेक्विस्ट) भी है। अनिल कपूर मुंबई के मशहूर रईस बृजनाथ बने हैं।


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गजेंद्र सिंह भाटी

Thursday, December 15, 2011

“भेजे का एक स्क्रू हमेशा ढीला ही होना चाहिएः राजकुमार गुप्ता”

राजकुमार गुप्ता नई पीढ़ी के उन चंद डायरेक्टर्स में से हैं, जो कमर्शियल सिनेमा में रियलिज्म की घुट्टी मिलाते हुए आगे बढ़ रहे हैं। सधे कदमों के साथ। 'आमिर’ और 'नो वन किल्ड जैसिका’ के बाद वो अपनी पहली ब्लैक कॉमेडी बनाने जा रहे हैं। फिल्म का नाम 'घनचक्कर’ रखा गया है और इसमें इमरान हाशमी लीड रोल निभाएंगे। इसके अलावा वह एक हल्की-फुल्की उचकी सी रोमैंटिक मूवी 'रापचिक रोमैंसकी स्क्रिप्ट पर भी काम कर रहे हैं। राजकुमार गुप्ता से उनके फैमिली बैकग्राउंड, फिल्मों में आने और फिल्में बनाने के अनुभवों पर बात हुई।


आप, दिबाकर बैनर्जी, श्रीराम राघवन और अनुराग कश्यप जैसे फिल्ममेकर आम लोगों का सिनेमा बनाते हैं, बाकी फिल्ममेकर काल्पनिक कहानियां, क्या ऐसा है?
कभी भी एकतरफा चीज नहीं होनी चाहिए। जब मैं अनुराग के साथ काम कर रहा था तो हम 'ब्लैक फ्राइडे’, 'नो स्मोकिंग’, 'गुलाल’ और 'एल्विन कालीचरण’ येफिल्में करना चाहते थे, लेकिन कुछ हो नहीं रहा था। सब फ्रस्ट्रेटेड थे। तब लगता था कि इंडस्ट्री में एक माफिया बन चुका है जो सिर्फ एक तरह की फिल्में बनाना चाहता है। हम इस बात को लेकर लड़ते थे कि यार कम से कम फिल्में तो बननी चाहिए। अलग-अलग तरीके की। मुझे लगता है कि हम अपनी तरह का सिनेमा बनाएं। जो झकझोरने वाला हो जिससे हम संतुष्ट हों। लेकिन कभी ये न करें कि कोई बना रहा है तो उसको गाली दें। कोई पोर्न फिल्म भी बनाना चाहता है तो ये उसका हक है, भले ही बाद में कोई उसकी आलोचना करे।

'बॉडीगार्ड’ जैसी फिल्मों की सफलता चुनौती देती है कि जनता का मन समझने में हम कहां भूल कर रहे हैं?
सब फिल्में बनाते हैं, जिसको जो फिल्में बनानी है बनाओ। अब कोई बॉडीगार्ड बनाना चाह रहा है तो मुझसे तो बनेगी नहीं भई। जिससे बन सकती है उसे बनानेदो।

क्या कनविक्शन ही सबसे जरूरी है?
हर डायरेक्टर या क्रिएटिव आदमी सटका हुआ होता है। वो पागल होता है इसीलिए वो वो होता है। उसके भेजे का एक स्क्रू तो हमेशा ढीला होता है। होना भी चाहिए। क्योंकि लिखने के दौरान, डायरेक्ट करने के दौरान उसे लोगों के हजारों ओपिनियन सुनने पड़ते हैं, ऐसे में उसे खुद से क्या चाहिए इस कनविक्शन को भटकने नहीं देना होता है।

आपका बैकग्राऊंड क्या है?
हजारीबाग, झारखंड में जन्मा। बहुत बुरा स्टूडेंट था। शर्मीला था। जैसा छोटे शहरों में होता है, पापा बैंक में थे तो मैं बैंकर बनना चाहता था। दसवीं वहां से की, बारहवीं डीपीएस बोकारो से और बी. कॉम में ग्रेजुएशन दिल्ली के रामजस कॉलेज से। वहां मेरा क्रिएटिव राइटिंग की तरफ झुकाव हुआ। एड फिल्में देखता था लगता कि मैं एड फिल्में लिख सकता हूं। कॉपीराइटर बन सकता हूं। ग्रेजुएशन हुई तो तय कर लिया कि बंबई जाना है। करना है या मरना है। शुरू में मेरे पास दो-ढाई हजार रुपये ही थे। एक इंस्टीट्यूट में एडमिशन लिया। लड़-झगड़कर हॉस्टल ले लिया। इससे अच्छी बात ये हुई कि अगले नौ महीने तक मेरा रहने और खाने का इंतजाम हो गया। साल 2000 आया। एड फिल्में लिखी। सीरियल लिखे। सहारा का सीरियल 'कगार' लिखा। फिल्ममेकिंग को लेकर मैं सीरियस वहां से हुआ। वहां से चीजें डिस्कवर करते-करते यहां तक पहुंच गया।

'आमिर’ कैसे बनी?
मेरी चौथी या पांचवी स्क्रिप्ट 'आमिर’ थी। 2006 में लिख ली थी। स्ट्रगल शुरू हुआ। तब अनुराग 'नो स्मोकिंग’ के साथ स्ट्रगल कर रहा था। उसने कहा कि तुम्हें भी काम और पैसे चाहिए। स्ट्रगल भी करना है, तो मैं चाहता हूं कि मेरी फिल्म में असिस्टेंट बन जाओ। फिर हम मिलकर तुम्हारी फिल्म के लिए स्ट्रगल करेंगे। 'नो स्मोकिंग’2008 में खत्म हुई और 2007 में मुझे एक इंडिपेंडेंट प्रॉड्यूसर मिल गया 'आमिर’ के लिए। एक बात मैंने तय कर रखी थी कि कॉरपोरेट हाउस के साथ ही फिल्म करनी है। क्योंकि दौ सौ लोगों की फिल्म को बनने के बाद कोई हाथ भी न लगाए तो किसी का भला नहीं होता। फिर यूटीवी स्पॉटबॉय आ गया। मैंने अनुराग को कहा कि मेरी फिल्म के क्रिएटिव प्रॉड्यूसर बनो। मैं उसे साथ इसलिए रखना चाहता था क्योंकि उसने इंडस्ट्री ज्यादा देखी है। तो 2008 में फिल्म बनी और रिलीज हुई।

'नो वन किल्ड जैसिका’ कैसे लिखी?
मैं स्पष्ट था कि इस फिल्म में मुझे किसी पर आरोप नहीं लगाने थे। न ही कोई अपील या जांच करनी थी। इस घटना ने पूरे मुल्क का ध्यान बटोरा। लोग कहने लगे कि हम भी टैक्सपेयर हैं भई, ये बात तो गलत हुई। हमें अच्छी नहीं लगी। हम तो कैंडल लेकर जाएंगे यार। हर दिन तो कोई कैंडल लेकर या मैं हूं अन्ना की टोपी पहनकर घर से निकलता नहीं है न। ये बड़ी ड्रमैटिक चीज थी। डर ये लगा कि इस कहानी के सब पहलुओं को साथ कैसे रख पाऊंगा। स्क्रिप्ट की बारहवीं स्टेज में पता लगा कि स्टोरी कहां जा रही है। कई लोगों से मिला।सबरीना से भी। फिर एक महीना इस प्रोसेस से अलग होकर घर गया। लौटा और लिखना शुरू किया।

कोई फिल्म बनाना चाहता है तो शुरुआत कैसे करे?
पहले तो आपके पास एक कहानी हो, स्क्रिप्ट हो। स्क्रिप्ट होगी तो किसी प्रॉड्यूसर के पास जा सकते हैं। और सीखते-सीखते फिल्म बना सकते हैं। अपने पर भरोसा रखना बहुत जरूरी है। यकीन जानिए आप कुछ भी कर सकते हैं। दूसरा रास्ता ये है कि किसी डायरेक्टर को असिस्ट करें और साथ-साथ में लिखते रहें। और जब डेढ़ दो साल बाद सारे तौर-तरीके जान जाएं तो अपनी फिल्म बनाएं।
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गजेंद्र सिंह भाटी

Tuesday, December 13, 2011

“मैं आपसे असहमत हूं: अभिषेक बच्चन”

सफेद कुर्ते-पायजामे में बैठे अभिषेक बच्चन। अपने हंसने-हंसाने के उस जाने-पहचाने अंदाज के साथ, जो उन्होंने अपने पिता अमिताभ बच्चन से विरासत में पाया है। अपने एक्सक्लूसिव होने के उस आवरण के साथ, जो हर हिट-फ्लॉप के बावजूद उनके इर्द-गिर्द बना हुआ है। कोई ऐसा सवाल पूछता है तो कोई वैसा। पर मुंह बनाने की बजाय वह या तो अहसमति जताते हैं, या फिर उस सवाल को हंसी में छिपा देते हैं। बेटी के जन्म के बाद उनके व्यक्तित्व में एक अलग किस्म का ठहराव, झुकाव और तसल्ली देखी जा सकती है। हो सकता है ऐसा ही कुछ बदलाव परदे पर उनके अभिनय में भी दिखे। अब्बास-मुस्तान के निर्देशन में उनकी फिल्म 'प्लेयर्स’ 6 जनवरी 2012 को रिलीज हो रही है। इसी सिलसिले में उनसे बातचीत हुई। कुछेक सवाल दूसरे सिरों से भी आए, बाकी इसी छोर से।


आलोचना
मुझे स्वीकार है
फिल्म क्रिटिक्स भले ही उनकी फिल्मों की तारीफ नहीं कर पाते हों, पर अभिषेक कहते हैं कि मैंने हमेशा खुद को बदला है। उनके मुताबिक, “मेरी कोशिश रहती है कि हर फिल्म पिछली से अलग हो। 'दिल्ली-6’, 'दोस्ताना’, 'खेलें हम जी जान से’ या 'दम मारो दम’ सब अलग थीं। अब 'प्लेयर्स’ आई है जो एक्शन फिल्म है। आने वाली फिल्मों में 'बोल बच्चन’ कॉमेडी है और 'धूम-3’ मसाला एंटरटेनर है।" मगर इतनी कोशिशों के बाद भी जब उनकी फिल्म आती है तो एक झटके से आलोचक उनके काम को खारिज कर दते हैं। क्या वो इस क्रिटिसिज्म को स्वीकार करते हैं या मन ही मन कहते हैं कि नहीं, इस फिल्म में मैंने अच्छा काम किया था, मैं सहमत नहीं हूं? उनका बेहद सुलझा हुआ छोटा जवाब आता है, “नहीं, मैं ऐसा नहीं सोचता। मैं हमेशा क्रिटिसिज्म को स्वीकार करता हूं।"

इंडियन सेंस में देखें ये रीमेक
अब्बास-मुस्तान की फिल्में देखकर जवान हुए अभिषेक इनमें से अपनी फेवरेट बताते हैं। कहते हैं, “खिलाड़ी, बाजीगर और 1990 के बाद की सारी फिल्में मैंने देखी हैं। मुझे रेस और एतराज भी पसंद है। आई लव देम। शायद इसलिए मैं शुरू से उनके साथ काम करना चाहता था।" इन भाइयों की हालिया फिल्म 'प्लेयर्स’ हॉलीवुड फिल्म 'इटैलियन जॉब’ की ऑफिशियल रीमेक है। जब ऑरिजिनल फिल्म लोग देख चुके हैं, तो रीमेक के दर्शक क्या घट नहीं जाते? उन्हें क्यों और कैसे देखा जाए? सुनकर फिल्म में चार्ली मैस्केरेनहस का लीड रोल कर रहे अभिषेक कहते हैं, “ये फिल्म पहले 1969 में बनी थी और फिर 2003 में। उन्होंने इसके राइट्स खरीदे हैं। और इंडियन संदर्भ में अब्बास-मुस्तान भाई ने कहानी बदली है। वो लोगों को जरूर पसंद आएगी। और चाहे अंग्रेजी फिल्म का रीमेक हो, हमें इंडियन सेंस में देखना चाहिए। मैं भी फिल्में ऐसे ही देखता हूं।"

पापा की फिल्में लैजेंड्री और कल्ट
इस फिल्म में अभिषेक एक थीफ बने हैं। लेकिन ये रोल पॉजिटिव है। कहते हैं, “ये कैरेक्टर रॉबरी पैसों के लिए नहीं करता है, बदला लेने के लिए करता है। फिल्म सोना लूटने के बारे में है। जिसे मेरा कैरेक्टर चार्ली अपने दोस्तों के साथ लूटता है।" बातचीत के दौरान सवाल कहीं से उठकर कहीं जाते रहे। 'डॉन-टू’ और 'अग्निपथ’ जैसी अमिताभ बच्चन की फिल्मों की रीमेक वो क्यों नहीं करते? इसके जवाब में उनकी प्रतिक्रिया आती है, “अरे भाई, कोई मुझे पूछता नहीं तो मैं क्या करूं। मैं चाहूंगा कि मेरी फिल्मों का रीमेक हो, दूसरों की फिल्मों का मैं न करूं। पापा की जितनी भी फिल्में हैं वो लैजेंड्री हैं और कल्ट हैं। उन्हें वैसे ही रहने दिया जाए।"

आधे-अधूरे पर पूरे...
# 'बोल बच्चन’ में अजय देवगन के साथ काम कर रहा हूं।
# 'प्लेयर्स’ में जॉनी भाई भी हैं। वो बहुत बिजी एक्टर हैं और एक लैजेंड हैं। उनके साथ काम करके हमेशा सीखता हूं।
# उनका नाम मुस्तान (डायरेक्टर मुस्तान बर्मावाला) है और दुर्भाग्य से इंडस्ट्री ने उन्हें मस्तान नाम से रीनेम कर दिया है।
# ये डिबेट पुरानी है कि आर्ट जिंदगी की नकल करता है या जिंदगी आर्ट की। ये एंटरटेनमेंट की दुनिया है। आपको बस अपनी फिल्में बनाते रहना चाहिए।
# मैंने दोनों 'इटैलियन जॉब’ देखी है। ऑरिजिनल 1969 में बनी थी, ब्रिटिश एक्टर माइकल केन के लीड रोल वाली, वो मेरी फेवरेट फिल्मों में से है।

प्रश्नोत्तर सहमति-असहमति के
इन
दिनों हमारी फिल्में स्टाइल, टेक्नीक और एक्शन में हूबहू हॉलीवुड मूवीज सी ही लगने लगी हैं। हॉलीवुड ने तो अपना अंदाज खुद इजाद किया था, क्या हमें भी उन्हें कॉपी करने की बजाय अपना अंदाज नहीं ढूंढना चाहिए?
मैं इसे ऐसे नहीं देखता। मैं आपको बहुत सारी हॉलीवुड मूवीज दिखा सकता हूं जो इंडियन फिल्मों से इंस्पायर्ड हैं और उन जैसी बनी हैं। हॉलीवुड और हम सब एक बड़ी क्रिएटिव फैमिली हैं। हमारे बीच ये शेयरिंग होनी चाहिए। हमारे टेक्नीशियन वहां काम करते हैं, वहां के टेक्नीशियन यहां। तो ये भेद नहीं होना चाहिए।

'प्लेयर्समल्टीप्लेक्स के लिए है या सिंगल स्क्रीन के लिए। क्या हम ये बंटवारा करके देख सकते हैं?
नहीं, ये फिल्म दोनों के लिए है। अगर आपने अब्बास-मुस्तान भाई की फिल्में देखी हैं तो वो हर तरह की ऑडियंस के लिए होती हैं। और मुझे ये मल्टीप्लेक्स और सिंगल स्क्रीन को अलग करके देखने की बात कभी समझ नहीं आई है। मैं ये फर्क नहीं मानता। क्योंकि पांच साल पहले मल्टीप्लेक्स नहीं थे तो सब ऑडियंस थियेटर में जाकर देखती थी। फर्क कहां था?

नहीं, कस्बों में और इंडिया के इंटीरियर्स में लोगों को 'डेल्ही बैलीजैसी फिल्मों का सेंस ऑफ ह्यूमर शायद समझ आए, जबकि उन्हें 'सिंघमसमझ आएगी।
नो, नो! आई डिसअग्री विद यू! ये कहना गलत होगा कि रूरल में ऑडियंस को समझ नहीं आता। वो लोग बहुत इंटेलिजेंट हैं। उनकी पसंद अलग जरूर हो सकती है। समझ आना एक बात है और पसंद आना दूसरी। आप चंडीगढ़ से हैं, आपको शायद साउथ इंडियन फिल्म पसंद न आए, पर इसका मतलब ये नहीं कि आपको समझ नहीं आएगी।

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गजेंद्र सिंह भाटी

Sunday, December 11, 2011

सूडानी बच्चों का मशीन गन वाला संत

फिल्मः मशीन गन प्रीचर
निर्देशकः मार्क फॉर्स्टर
कास्टः जेरॉर्ड बटलर, मिशेल मोनाहन, माइकल शैनॉन, मैडलिन कैरल, सोउलेमने सवाने, रेमा मारवेन
सर्टिफिकेटः ए (एडल्ट)
स्टारः तीन, 3.0

सोमालिया के बागियों के खिलाफ अमेरिकी सैनिकों की हेल्प पर बनी 'ब्लैक हॉक डाउन’ और स्टीवन स्पीलबर्ग की 'सेविंग प्राइवेट रायन’ में रिएलिटी और इमोशन दोनों थे। बावजूद इसके दोनों मसाला एंटरटेनर थी। 'मशीन गन प्रीचर’ मसाला एंटरटेनर नहीं है। 'द रम डायरी’ जैसी बायोपिक की तरह ये भी जोड़ती तो है, पर कुछ फॉर्मल है। जैसे लाइफ होती है। फिल्म सैम चिलर्स की जिंदगी पर आधारित है जिन्होंने दक्षिणी सूडान में बच्चों के लिए काम किया। उनके लिए अनाथालय बनवाया और उन्हें अगुवा करने वालों के कब्जे से मुक्त करवाया। मगर असली सैम चिलर्स के काम करने के तरीके को सही और गलत ठहराने का फैसला फिल्म से करने की बजाय, उनके बारे में जानकर ही करें। फिल्म में आते हैं। जब सैम 'लॉड्र्स रजिस्टेंस आर्मी’ की गाडिय़ों पर हमले करके अगुवा बच्चों को छुड़वाना शुरू करता है तो वो सीन थ्रिलिंग बन पड़ते हैं। कुछ-कुछ रंगो को धुकधुकाते हुए। जेरॉर्ड बटलर सैम चिलर्स के रोल के लिए सही चुनाव रहे। उनका साथ देते अश्वेत एक्टर सोउलेमने सवाने भी सुहावने लगते हैं। कुछेक सीन विचलित करने वाले हैं इसलिए मूवी को ए सर्टिफिकेट मिला है। पर फूहड़, फालूदा और टाइमपास फिल्मों के बीच ऐसी फिल्में भी होनी चाहिए जो अंतरराष्ट्रीय घटनाओं की तरफ, फिल्मों में ही सही, रुचि जगाए। सूडान और उसके आंतरिक संघर्ष को ही लीजिए। इसमें इंटरनेशनल एजेंसियों की भूमिका भी जांची-परखी जा सकती है। अपने सब्जेक्ट और जरा से हटके ट्रीटमेंट की वजह से ये फिल्म मुझे औसत से अच्छी लगी। फिल्म में अमेजिंग चाइल्ड सिंगर रेमा मारवेन भी हैं। सैम बने जेरॉर्ड की बैप्टिज्म सैरेमनी के वक्त रेमा का फिल्म में असल में अमेजिंग ग्रेस गाना अद्भुत है।कौन है ये वाइट प्रीचर
पेंसिलवेनिया की जेल से सैम चिलर्स (जेरॉर्ड बटलर) छूटा है। ड्रग्स और आवारागर्दी में रहता है। घर पर एक बच्ची (मैडलिन कैरल), बीवी (मिशेल मोनाहन) और मां (कैथी बेकर) है। जब नशे की अति हो जाती है तो बीवी उसे चर्च ले जाती है और नशा छुड़वाती है। खैर, समुद्री तूफान आने से कस्बा तबाह हो जाता है और सैम को हाउसिंग का बिजनेस मिलता है। वो कुछ समृद्ध हो जाता है। एक बार युगांडा से आए किसी मिशनरी को सुनने के बाद उसकी सूडान जाने की इच्छा होती है। वहां लॉड्र्स रजिस्टेंस आर्मी (एलआरए) लोगों पर अत्याचार करती है। खासतौर पर छोटे बच्चों का किडनैप करना, उनके हाथों में हथियार थमाना और उनका यौन शोषण करना। सैम की मुलाकात यहां पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) के एक सैनिक डेंग (सोउलेमने सवाने) से होती है। यहां से सैम दक्षिणी सूडान की हिंसक खूनी हकीकत देखता है और बच्चों को बचाने की कोशिश करता है। पर इस भलाई के काम के लिए भी सैम बहुत सारी मुश्किलों से गुजरता है।

असली सैम का संदेश
दूसरे इंटरनेशनल हेल्प ग्रुप्स के सैम के हिंसक तरीकों की आलोचना करने पर फिल्म के आखिर में असली सैम चिलर्स का वीडियो फुटेज है। उसमें वह कहते हैं, 'कोई अपहरणकर्ता या टेरेरिस्ट आपके बच्चे को अगुवा कर ले। और मैं आपसे कहूं कि आपके बच्चे को वापिस ला सकता हूं। तो फिर, इससे क्या फर्क पड़ता है कि मैं उसे कैसे लाता हूं।‘ फिल्म खत्म होने के बाद भी ये असली डॉयलॉग इम्प्रेस करता है। ये और बात है कि हिंसा कभी जायज नहीं होती।

सोचता हूं...
# जेल से छूटकर आए सैम से घर में सबसे पहले उसकी छोटी सी बेटी मिलती है। कुछ सीन बाद जब वो उम्र में कुछ बड़ी नजर आती है तो पता चलता है कि सैम चिलर्स की जिंदगी के कुछ साल अपने काम को करते हुए बीच चुके हैं। क्योंकि हाउसिंग के काम में फक्कड़ से समृद्ध होने का कोई और संकेत फिल्म में नहीं है। एक सीन है। रात को पेंसिलवेनिया में हरिकेन आता है, सुबह बिजनेस से जुड़ा आदमी आकर कहता है कि बहुत सा बिजनेस आया है, टूटे घरों को बनाने का, करोगे क्या, तो सैम कहता है, 'हां, फिफ्टी-फिफ्टी में।' खैर, यहां के बाद सीधा वो सीन है जहां सैम अपनी वाइफ और बेटी को उनका नया बड़ा बंगला दिखाने लाया है। कुछ पलों में समझ आता है कि सैम पैसे वाला हो गया है। बाद में उसके सूडान जाने और आने के कई मौकों में भी बीतते टाइम का पता उसकी बेटी के बड़े होने से ही लगता है।
# चाहे इसे मिसिंग पहलू कह लें या नया प्रयोग कि सैम के दिमाग में चल रही उधेड़बुन और सुसाइडल टेंडेंसी स्क्रीन पर देखकर सीधे-सीधे समझ नहीं आती। दर्शक को खुद अनुमान लगाना पड़ता है। मसलन ये कि हां, शायद सूडानी लोगों की मदद के लिए लड़ रहा अश्वेत लीडर जब हैलीकॉप्टर क्रैश में मारा जाता है, तो सोफे पर बैठा सैम बौखला जाता है। अपने सूडानी कैंप के लिए बड़ी गाड़ी चाहिए, ताकि ज्यादा बच्चों को बचाया जा सके, पर कोई भी हैल्प करने से मना कर देता है। पैसे की किल्लत और ऊपर से मानवता की इस लड़ाई में एक बड़ा लीडर भी मारा गया और उसपर बेटी लिमोजीन खरीदने की बात कह रही है। फिर अपने दोस्त डॉनी को उसका बुरा भला कहना और टुकड़ों पे पल रहा कुत्ता कहना। कारोबार बेच, बीवी और बच्ची को रोता छोड़ चला जाना। पीछे से दोस्त डॉनी का ड्रग्स ओवरडोज और सैम के बुरा-भला कहने की वजह से मर जाना। वहां सूडान कैंप में पहुंचने पर भी बच्चों के प्रति वो प्यार अपनी आंखों में नहीं रख पाना। उस बागी को माथे में गोली मारना। हाथ पर गलती से सूप गिरा देने वाले अनाथ बच्चे को धक्का देना। ...ये सब विश्लेषण हमारे सामने जरूर होते हैं, पर सैम क्यों खुद को शूट कर लेना चाहता है। इसके कोई सीधे समझ आते इमोशन नहीं हैं। हमें सोचना पड़ता है। ये कि भगवान का उसकी मदद न करना और उसका सूडानी बच्चों की मदद न कर पाना उसे फ्रस्ट्रेट कर देता है।
# ये तो सैम के इमोशन की एक स्टेज है। शुरू में भी जैसे, एक युगांडा से आए हेल्पएड सज्जन को चर्च में सुनना और फिर एकदम से अफ्रीका जाने का मन बनाना, जबकि दर्शकों को पता नहीं चलता कि आखिर सैम इतना इम्प्रेस और प्रेरित, बाहर जाने के लिए क्यों हुआ है। इतना ही सपाट उसका बैप्टाइज होने का इरादा भी है। ये सपाट और पता न चलने वाली बात अच्छी भी है और बुरी भी। अच्छी इसलिए क्योंकि कुछ दर्शक स्मार्ट होते हैं, वो खुद समझना चाहते हैं और हीरो की लाइफ में कुछ भी अद्वितीय होता नहीं देखना चाहते। हर बार हीरो अपनी लाइफ में कोई बड़ा फैसला ले इसलिए किसी बड़े दैवीय चमत्कार का होना जरूरी नहीं होता। और वैसे भी असल लाइफ में ऐसा कहां होता है। होता भी है तो हम उसका विश्लेषण उतना हीरोइक तरीके से कहां करते हैं। चे गुवेरा की बायोपिक को ही लें। वो कोढिय़ों की मदद करने के लिए जाने को क्यों और कितना इच्छुक है ये उसी के दिमाग में है दर्शक को पता नहीं चलता। बस वो मोटरसाइकल जर्नी पर अपने दोस्त के साथ निकलता है। वैसे ही, यहां सैम का सूडान जाने का फैसला लेना भी उतना ही सिंपल सा हो सकता है। इंसानी सा। बुरा बस इतना ही है कि कहानी फिल्मी नहीं हो पाती।
# फिल्म खत्म होने के बाद क्रेडिट्स में असली सैम चिलर्स नजर आते हैं। उनकी, उनकी फैमिली की तस्वीरें, उनके सूडान और चर्च में प्रीच करते हुए वीडियो, उनकी पर्सनैलिटी और अंदाज नजर आता है। बहुत कम ही ऐसा होता है जब फिल्मी नायक से असली बायोग्राफिकल फिगर ज्यादा प्रभावी लगता है। यहां भी सैम फिल्म के सैम (जेरॉर्ड बटलर) से बिल्कुल भी कम नहीं लगते हैं।ये फिल्म सैम चिलर्स की लिखी स्मृतियों "अनॉदर मेन्स वॉर" पर बनाई गई है। सैम आज भी युगांडा, सूडान, दक्षिणी सूडान और पूर्वी अफ्रीका में अपने काम जारी रखे हुए हैं। तमाम विवादों के साथ।
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गजेंद्र सिंह भाटी