Saturday, July 30, 2011

गायें जलाते एलियन और हीरोइक चरवाहे

फिल्म: काऊबॉयज एंड एलियंस (अंग्रेजी)
निर्देशक: जॉन फेवरॉउ
कास्ट: डेनियल क्रेग, हैरिसन फोर्ड, ओलिविया वाइल्ड, सैम रॉकवेल, पॉल डेनो
स्टार: तीन, 3.0

पहले ही दृश्य में जब पथरीले खाली लैंडस्केप में कैमरा शांति से मूव कर रहा होता है। अचानक से फ्रेम में डेनियल क्रेग ठिठक आता है। बेहोशी से जागा हुआ। फिर तीन काऊबॉयज उसे परेशान करने लगते हैं और वह करारा जवाब देता है। अच्छा सीन है। एक और सीन में कर्नल बने हैरिसन के मवेशियों को चराने वाला नदी किनारे दारू के नशे में हल्का होने को होता है कि बड़ा धमाका होता है। वह नदी में गिर जाता है। बाहर आकर देखता है तो सारी गायें और मवेशी जल रहे होते हैं। इन दो सीन में जो गैर-मशीनी रोचक बात है, वह मूवी में आगे भी जारी रह पाती तो मजा आ जाता। हालांकि ये एलियंस से न्यूक्लियर हथियारों के साथ लडऩे वाली फिल्मों से काफी दूर है और हमारा टेस्ट बदलती है। मेरे लिए यही खास है। इस जॉनर की कहानियों में इस तसल्लीबख्श फिल्म को फ्रेंड्स को साथ देख सकते हैं। फैमिली के साथ भी। बस अति-महत्वाकांक्षी होकर न जाएं।

चरवाहों और एलियंस की शत्रुता
एरिजोना के बंजर रेगिस्तान की बात है। जेक लोनरगन (डेनियल क्रेग) की बेहोशी एकदम से टूटती है। याददाश्त गायब है। कलाई पर एक रहस्यमयी चीज बंधी है। वह अगले टाउन में घुसता है। धीरे-धीरे पता चलता है कि वह बड़ा लुटेरा है। इस टाउन के सबसे ताकतवर आदमी कर्नल डॉलराइड (हैरिसन फोर्ड) का सोना भी उसने लूटा था। ये सब अपने पुराने हिसाब चुकता करें, उससे पहले इन पर एलियन विमानों का हमला होता है। कर्नल के बेटे पर्सी (पॉल डेनो) को भी बाकी लोगों की तरह ये विमान उड़ा ले जाते हैं। अब जेक, कर्नल और एक घूमंतू लड़की एला (ओलिविया वाइल्ड) अपने दोस्तों-दुश्मनों सबसे मिलकर इन एलियंस से टक्कर लेते हैं।

कंसेप्ट हमें खींचता है
मॉडर्न अमेरिका में एलियन अटैक हमने बहुत देख लिए। 'बैटलफील्ड: लॉस एंजेल्स', 'इंडिपेंडेंस डे', 'वॉर ऑफ द वल्ड्र्स', 'प्रिडेटर' और 'मैन इन ब्लैक' जैसी दर्जनों फिल्में हमारे सामने हैं। ये जो एलियन-काऊबॉय की लड़ाई है यहां कोई अत्याधुनिक हथियार और फाइटर प्लैन नहीं है। काऊबॉयज को लडऩा है तो ले-देकर अपने घोड़ों पर चढ़कर और पिस्टल-राइफल्स के सहारे। बिल्कुल नया और तरोताजा करने वाला ये कंसेप्ट है। साथ ही गुजरे दौर की तासीर वाले 'बॉन्ड' ब्रैंड डेनियल क्रेग हैं और 'इंडियाना जोन्स' छाप (बूढ़े होते) हैरिसन फोर्ड हैं। चूंकि बात 1873 की है, इसलिए एलियंस को सोना चाहिए।

कहानी के वक्त से न्याय
डेनियल ने उस दौर के हिसाब से अपना वजन कम किया है। एलियंस जानवरों की तरह भागते और शैतानों की तरह दिखते हैं, जो कहानी के टाइम के साथ न्याय करता है। लोकेशन और कॉस्ट्यूम्स में कोई नुक्स नहीं हैं। बस कहानी में बहुत सी जगहों पर गैप नजर आते हैं। इंतजार करना पड़ता है। इसे कमी भी माना जा सकता है और शोर-शराबे से दूर एक पीसफुल अलग टेस्ट वाली एलियन मूवी भी। क्लाइमैक्स में भी ज्यादा खौफ और डर पैदा करने की कोशिश नहीं की गई है। आखिर हमारे हीरो लोगों को अजेय जो बताना है भई। जैसे हमारी साउथ की फिल्मों में होता है। हीरो एक भी मुक्का नहीं खाता है। इस फिल्म पर आते हैं। एलियंस किसी लेजर रोशनी से इंसानों को नहीं सोखते हैं, बल्कि जंजीरों और हुक से खींचकर उड़ा ले जाते हैं। इस तथ्य को भी फिल्म के प्लस में रख लीजिए।
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गजेंद्र सिंह भाटी

एक स्क्रिप्ट जिसे रद्दी में होना था

फिल्म: गांधी टु हिटलर
निर्देशक: राजीव रंजन कुमार
कास्ट: रघुवीर यादव, नेहा धूपिया, नलिन सिंह, निकिता आनंद, अमन वर्मा, लकी वखारिया
स्टार: एक 1.0

पचास मिनट। पचास मिनट हैं आपके पास। ये फिल्म झेलने के लिए। क्योंकि ज्यादा चांस यही है कि उन चार लोगों की फैमिली की तरह आप भी पचासवें मिनट तक थियेटर से उठकर चले जाएंगे। मैं हिम्मती था तो बैठा रहा। ऐसा नहीं है कि लोग सीरियस फिल्में देखना नहीं चाहते। बस राकेश रंजन कुमार का डायरेक्शन हो और नलिन सिंह का लेखन हो तो सीरियस, पॉलिटिकल और विचाराधारा वाले विषयों पर बनी हिंदी फिल्मों से विश्वास उठ जाता है। हिटलर का भय क्या होता है और उसका ऑरा क्या था ये जानना है तो आप 2008 में आई निर्देशक ब्रायन सिंगर की फिल्म 'वॉलकायरी' देखिए। इसमें हिटलर बने डेविड बैंबर को देखिए, कर्नल स्टॉफनबर्ग बने टॉम क्रूज को देखिए। 'गांधी टु हिटलर' में हम कहानी कहने के निहायती गैर-गंभीर तरीके से किसी भी फिल्मी मनोरंजन वाले भाव को तरस जाते हैं। फिर होता ये है कि रोने वाले सीन में भी हम निर्दयी बनकर हंसते हैं। मेरी सख्त चेतावनी - ये फिल्म कभी न देखें।

विचारधारा की फेल कहानी
दूसरे विश्वयुद्ध में जर्मन तानाशाह एडॉल्फ हिटलर (रघुवीर यादव) की सेना कमजोर पड़ रही है। आजाद हिंद फौज बनाने वाले बोस (भूपेश कुमार) जर्मनी छोड़ देते हैं और 1945 में उनके सैनिक जंगलों-पहाड़ों में भटकते हैं। बलवीर सिंह (अमन वर्मा) और उसके पांच-छह साथियों की टुकड़ी भी भटक रही है। बलवीर की गांधीवादी वाइफ अमृता (लकी वखारिया) पति के लौटने का इंतजार कर रही है। इंडिया में गांधी (अविजीत दत्त) अंहिसा का महत्व पढ़ा रहे हैं। कहानी गांधी, हिटलर और बलवीर के तीन सिरों पर चलती है।

सीरियस विषय, बचकाना ट्रीटमेंट
पूरी फिल्म में रघुवीर सैनिक वर्दी की बजाय सूट पहने हैं, जो हिटलर को ऑथेंटिक और प्रभावी नहीं बना पाता। उनका अंग्रेजी एक्सेंट कमजोर है। ऐसे में उनके मुंह से शेक्सपीयर के उद्धरण बेहद अप्रभावी लगते हैं। फिल्म की सबसे बड़ी नाकामी यही है कि इस हिटलर से जरा भी डर नहीं लगता। नलिन शर्मा हिटलर के प्रॉपगैंडा मिनिस्टर जोसफ गॉबेल्स बन हैं। गॉबेल्स को वह क्षण भर भी नहीं जीवित कर पाते। साथी कलाकारों पर वह बोझ की तरह लगते हैं। जर्मनी की गोरी चमड़ी वाली सेना के उलट फिल्म में हिटलर और उनके सब कमांडर सांवले हैं। यही नहीं फ्रांसीसी सेना और रूसी सेना के सैनिक भी सांवले हैं। अब जिसने इतिहास पढ़ा है और ऐसे इश्यू पर बनी हॉलीवुड या यूरोपियन मूवीज देखी हैं, वो इस तथ्य को कैसे निगल पाएगा। इस फिल्म के शॉट्स के साथ दूसरे विश्वयुद्ध की असली रॉ फुटेज मेल नहीं खाती।

फिल्म बनाने वाले, क्या तेरे मन में समाई
अविजित दत्त ने गांधी के रोल के साथ न्याय किया है। वो कद, त्वचा, चाल और भावों से ऑथेंटिंक गांधी लगते हैं। पर दो सीन छोड़कर पूरी फिल्म में वह बस चलते रहते हैं। इसका कोई सेंस नहीं बनता। बताया गया था कि हिटलर को गांधी के लिखे खतों पर ये फिल्म आधारित है। फिल्म जब खत्म होने को होती है तब ऐसा जिक्र आता है। दूसरा हिंसा और अहिंसा जैसी सीरियस विचाराधाराओं से साथ न्याय भी नहीं हो पाता है। अमन वर्मा का अभिनय फिल्म में सबसे बेहतर है। मगर जंगलों में भटकते उन्हें अपनी बीवी के और उनकी बीवी को उनके खत कैसे मिलते हैं, ये समझ नहीं आता। स्टोरी डिवेलपमेंट जैसा कुछ भी इस स्क्रिप्ट में नहीं है।
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गजेंद्र सिंह भाटी

Wednesday, July 27, 2011

वो जो सोसायटी के ढांचे पर प्रहार करना चाहते थे

फिल्म 'होबो विद अ शॉटगन' का केंद्रीय किरदार जो गन चलाकर "न्याय" करता है.

आंदर्स. गिरफ्तार होने के बाद.
आंदर्स बेरिंग ब्रूविंग ने पिछले हफ्ते नॉर्वे में हुए नरसंहार को करना तो कबूल लिया है, मगर उसकी आपराधिक जिम्मेदारी को स्वीकार नहीं किया है। उसे नहीं लगता कि उसे सजा मिलनी चाहिए। उसके वकील गेर लिपिस्टेड कहते हैं, "आंदर्स ने माना था कि इन कृत्यों को करना बहुत ही निर्मम था, पर उसके दिमाग में इनका किया जाना जरूरी था। वह सोसायटी और सोसायटी के ढांचे पर प्रहार करना चाहता था।"

आंदर्स से आते हैं इस केस के मनोविज्ञान पर और ऐसे विषयों की प्रतिनिधि फिल्मों पर। ऐसी फिल्में जो महीन तरीके से 'मेकिंग ऑफ अ किलर' विषय का स्टडी मटीरियल बनती हैं। जो सोसायटी पर अटैक करने वालों के मन में घुसती हैं। दो महीने पहले रिलीज हुई निर्देशक जेसन आइजनर की कैनेडियन फिल्म 'होबो विद अ शॉटगन' एक हक्का-बक्का करने वाली फिल्म है। इसमें 67 साल के डच एक्टर रुटजर हुवे ने एक ऐसे बिना घर-बार के फक्कड़ की भूमिका अदा की है जो 'होप टाऊन' में आता है। इस कस्बे में होप कहीं नहीं है बस अपराध और अन्याय है। वह मेहनत करने की कोशिश करता है, एक अपराधी को पुलिस स्टेशन तक पकड़कर ले जाता है, पर पुलिस उसे ही पीटती है। उसके सीने पर गर्म लोहा दागकर कचरे के डिब्बे में फैंक दिया जाता है। बिना संवेदना और बिना न्याय वाली व्यवस्था में वह बंदूक हाथ में ले लेता है। कस्बे के अपराधियों को एक-एक करके खत्म करता है। उसके कृत्यों से लोगों में हौसला आता है। मैं इस फिल्म के संदेश, हिंसक कंटेंट और निष्कर्ष से वास्ता नहीं रखता, पर इस बुजुर्ग होबो की कहानी में आप एक किलर को बनाने में सिस्टम और समाज की भूमिका को देखते हैं।

मार्टिन स्कॉरसेजी की कल्ट फिल्म 'टैक्सी ड्राइवर' में रॉबर्ट डि नीरो का किरदार ट्रैविस भी उसी मानसिक ब्लास्ट वाली स्थिति में है। मैनहैटन के ऊंचे नाम और चमक-दमक तले ट्रैविस सबसे करीब है शहर की परेशान करने वाली असलियत के। वह उनींदा है। रात-दिन टैक्सी चला रहा है। इसमें चढऩे वालों को देखता है। पीछे की सीट पर न जाने क्या-क्या होता रहता है। जब वो उतरते हैं तो सीट की सफाई करते हुए इस पूर्व मरीन के दिमाग में शहर की बदसूरत तस्वीर और गाढ़ी होती जाती है। उसे शहर के वेश्यालय परेशान करते हैं। एक लड़की उसे भली दिखती है, पर धोखा खाता है। चुनाव होने को हैं और सभी राजनेताओं के बयान उसे खोखले और धोखा देने वाले लगते हैं। कहीं व्यवस्था नहीं है। अमेरिका में राजहत्याओं या पॉलिटिकल एसेसिनेशन्स का ज्यादातर वास्ता ट्रैविस जैसे किरदारों से ही रहा है। जैसा हमारे यहां नाथूराम गोडसे का था। हां, उसका रोष विचारधारापरक और
साम्प्रदायिक ज्यादा था, यहां ट्रैविस सिस्टम से नाखुश हैं।

'फॉलिंग डाउन' के पोस्टर में माइकल डगलस; 'टैक्सी ड्राइवर' में रॉबर्ट.
ठीक वैसे ही जैसे जोएल शूमाकर की 1993 मे आई फिल्म 'फॉलिंग डाउन' का विलियम है। इस रोल को माइकल डगलस ने प्ले किया था। विलियम इस दिन पूरे लॉस एंजेल्स को आड़े हाथों लेता है। अकेले में उसे लूटने की कोशिश करने वाले गुंड़े, परचून की दुकान पर छुट्टे मांगने पर सामान खरीदने की शर्त रखता कोरियाई दुकानदार और फास्ट फूड चेन में ब्रेकफस्ट की जगह जबरदस्ती लंच थोपता व्यक्ति... ये सब विलियम की फ्रस्ट्रेशन का शिकार होते हैं।

होबो, ट्रैविस और विलियम तीनों भले ही सही नहीं हैं, पर सिस्टम और समाज भी इन तीनों से पहले इन तीनों से ज्यादा दोषी है। आंद्रे का केस इनसे अलग है, पर ये बात समान है कि आप अपने मीडिया, समाज और राजनीति के जरिए लोगों को जैसा बना रहे हैं, वो वैसा ही बन रहे हैं। माइकल मूर की 2002 में बनी डॉक्युमेंट्री 'बॉलिंग फॉर कोलंबाइन' नॉर्वे नरसंहार जैसे हादसों को सबसे ज्यादा सार्थकता से देखती है। ऑस्कर से सम्मानित ये डॉक्यु फीचर बताती है कि क्यों 1999 का कोलंबाइन हाई स्कूल नरसंहार हुआ और क्यों अमेरिका में सबसे ज्यादा अपराध दर है। इस असल वाकये में एरिक और डिलन नाम के दो सीनियर छात्रों ने एक सुबह अपने स्कूल कैंपस में अचानक गोलियां चलानी शुरू कर दी और दर्जनों को घायल करते हुए 12 दोस्तों और एक टीचर को मार डाला। बाद में दोनों में खुद को गोली मार ली।

(साप्ताहिक कॉलम सीरियसली सिनेमा में प्रकाशित.)

Tuesday, July 26, 2011

'मेरे सिवा धीरज पांडे का किरदार कोई भी नहीं कर पाता'

अगर प्रशां 'चाणक्य' जैसी क्लासिक टीवी सीरिज में कॉस्ट्यूम डायरेक्टर रहे हैं तो उन्होंने श्याम बेनेगल, गोविंद निहलानी और सुभाष घई जैसे डायरेक्टर्स की फिल्मों का आर्ट डायरेक्शन भी संभाला है। वह गाने भी लिखते हैं, गाते हैं, म्यूजिक भी देते हैं। टीवी पर वह 'फुलवा' कर रहे हैं। हाल ही में फिल्म 'ये साली जिंदगी' और 'भिंडी बाजार' में नजर आए। इतना सब करने के बावजूद ज्यादातर लोगों ने उन्हें नोटिस किया 'मर्डर-' में धीरज पांडे का रोल करने के बाद। वह कहते हैं कि इस फिल्म में लोगों ने उनकी तुलना मशहूर हॉलीवुड एक्टर एंथनी हॉपकिन्स तक से कर डाली। बेहद मुंहफट और संजीदा प्रशांत नारायणन से ये बातचीत।

बहुत बरसों से अच्छा काम कर रहे हैं, पर नोटिस हुए 'मर्डर-२' में।
मुझे लगता है मैं आज तक गरीबों और दोस्तों के साथ काम करता आया हूं। इन्होंने न मुझे कभी ढंग के पैसे नहीं दिए और न ही उनके पास अपनी मूवी रिलीज करने के पैसे थे। चाहे आप 'छल' देख लो, 'वैसा भी होता है' देख लो। ऐसी काफी अच्छी फिल्में में बुरी प्लानिंग वाले लोगों के साथ कर चुका हूं। अब कोई पॉइंट प्रूव नहीं करना चाहता हूं, कि अच्छा रोल है तो कर लेता हूं।

1992 से लेकर अब तक आपने टीवी और मूवीज दोनों को बदलते देखा है। डीडीवन के प्रोग्रैम्स से 'बंदिनी' और 'फुलवा' तक। पैरेलल और मैनस्ट्रीम मूवीज की फिक्स कैटेगरी से आज की बदलती लेंग्वेज वाली फिल्मों तक। इस सबको कैसे देखते हैं?
दुख ये होता है कि इतने सालों में हमारे पास तीन-चार अच्छे एक्टर्स ही हैं। इस दौरान न कोई विश्वस्तरीय एक्टर निकला है न कोई टेक्नीशियन। एक ए.आर.रहमान है जो बाहर की चीजें कर रहा है। मैं हूं, इरफान है। हम लोग बाहर की फिल्में करते हैं। टेक्नॉलजी, प्रैशर और मनी सब कुछ बढ़ गया है। पर पहले हम लोगों के पास टीवी में जो क्वालिटी होती थी, वह सेडली कम हुई है।

तो अपने काम के बारे में आगे क्या सोचा है?
मेरा काम आप बीस-तीस साल बाद भी देखेंगे तो वही फ्रैशनेस, जोश और जज्बा पाएंगे। मैं चाहता हूं कि मेरा माइंडब्लोइंग डीवीडी क्लेक्शन बने जो कोई भी इंडियन एक्टर सपने में ही देखे। यही लक्ष्य है। मुझे बस स्टूपिड मनी नहीं कमानी है। ये सारे एक्टर लोग तेल वेल बेच रहे हैं। कच्छे, बनियान, दारु और पान पराग बेच रहे हैं। अरे यार क्या करोगे, कितना पैसा डालोगे, कहां डालोगे। अगर जरा सी एक्टिंग की तमीज होती तो ये सब नहीं करते। मैं यार सिर्फ एक्टिंग ही बेचता आया हूं। इन लोगों को मेरे लेवल तक पहुंचते-पहुंचते लाइफ में काफी टाइम लगेगा।

भट्ट कैंप की 'मर्डर-2 में आपका चेहरा नहीं जुड़ता तो फिल्म में देखने लायक कुछ था नहीं?
मैं तो कहता हूं न यार, कि अगर किसी और ने किया होता तो ये रोल वो बर्बाद कर चुका होता। क्योंकि इस रोल में बर्बादी के बहुत चांसेज हैं। जो भी एक्टर थोड़ी समझदारी से काम नहीं लेगा तो वो सिर्फ बेवकूफ दिखेगा यहां। इसमें खुल के मूर्खता करने का मौका है और कहीं-कहीं उससे आप जितना बचोगे उतना ही दिखोगे।

कैरेक्टर के स्पेस में कितना घुसना है, कैसे घुसना है, क्या एड करना है, कैसे तय करते हैं?
बस अपने राइटर और डायरेक्टर पर भरोसा करो। आप उनसे मिलते हैं, बात करते हैं, उनका लहजा सुनते हैं। ये सब ऑब्जर्व करना पड़ता है। मैं पूरा स्लिप याद रखता हूं कि सीन 26 में क्या है और सीन 23 का ए सेक्शन कहां 72 बी में कनेक्ट करता है। यहां लोग सिर्फ अपनी डायलॉग कॉपी मंगवाते हैं, मेरे पास काफी टाइम से स्लिप पड़ा होता है। मेरा मैथड एक्टिंग से दूर-दूर का कोई रिश्ता नहीं है। मुझे बकवास किस्म का काम लगता है वो। अब सिर मुंडवाने और ये वो करवाने से एक्टिंग हो जाती तो क्या बात थी।

अपने बारे में कुछ बताइए?
मैं मूलत: केरल से हूं, जो दिल्ली का है और मुंबई का हो गया है। चौथी क्लास में दिल्ली आ गया। फादर डिफेंस में रहे। ग्रेजुएशन किरोड़ीमल कॉलेज से की, फिर दिल्ली स्टेट बैडमिंटन प्लेयर रहा। फिर ये सब छोड़-छाड़ के इस लाइन में आ गया प्रॉड्यूसर बनने। एक्टिंग नहीं करनी थी यार। बहुत साल खो दिए अपने। कॉस्ट्यूम डायरेक्शन किया, डायरेक्शन किया, चीफ असिस्टेंट डायरेक्शन किया। गोविंद निहलानी की फिल्म में असिस्टेंट आर्ट डायरेक्टर था। 'रुकमावती की हवेली', फिर 'सौदागर', फिर 'सरदार पटेल'। केतन मेहता का भी असिस्टेंट रहा एक साल।

सिर्फ प्रॉड्यूसर ही क्यों बनना चाहते थे?
हमारे साथ प्रॉब्लम ये है कि ज्यादातर प्रॉड्यूसर्स योग्य नहीं हैं। वो निगरानी नहीं रख सकते कि डायरेक्टर क्या कर रहा है। मतलब सेट पर, स्क्रिप्ट, थोड़ा कमांडिंग आदमी होना चाहिए, क्योंकि प्रॉड्यूसर का हाथ सिर्फ पैसे बांटने में नहीं जाता है। उसे तो ये भी पता है कि कैमरे में कौनसा लेंस लगा है। मतलब मैं उस किस्म का क्रिएटिव हैड बनना चाहता था।

अब क्रिएटिव हैड बनेंगे या एक्टिंग करनी है?
मैं सब कुछ करना चाहता हूं। कंपोजर भी हूं। गाने लिखता हूं। कुछ फिल्मों की स्क्रिप्ट भी तैयार है। एक शॉर्ट स्टोरी बुक और कॉफी टेबल बुक लिख रहा हूं।

इन बरसों में कितनी बार बहुत निराश हुए?
जब भी हुआ अपनी नॉन प्लानिंग की वजह हुआ। इसमें गैर-भरोसेमंद लोगों पर भरोसा करना भी शामिल है। पर कभी ऐसा नहीं हुआ कि आर अब क्या करेंगे।

डिफेंस फैमिली से हैं तो पेरंट्स कहते नहीं कि ये तू क्या कर रहा है?
नहीं 'मर्डर-२' केरला में भी रिलीज हुई। तो बड़े खुश थे, पिक्चर देखी भी उन्होंने। मेरे डैड ने धीरे से मेरी मां को बोला, किसी को कानों कान खबर नहीं होनी चाहिए कि ये हमारा बेटा है। फिर फिल्म जैसे ही खत्म होगी, चुपचाप से चले जाएंगे। (ठहाके लगाते हैं)

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गजेंद्र सिंह भाटी

Saturday, July 23, 2011

एक बड़ी इमेज के फ्रेम में शेरदिल कॉप बाजीराव सिंघम

फिल्म: सिंघम
डायरेक्टर: रोहित शेट्टी
कास्ट: अजय देवगन, प्रकाश राज, अशोक सर्राफ, काजल अग्रवाल
स्टार: तीन 3.0

इस फिल्म से हमें हमारे वही 'फूल और कांटे' वाले अजय देवगन वापस मिल गए हैं। 'सुहाग', 'दिलजले' और 'नाजायज' वाले भी। मूछों के साथ खाकी वर्दी और ह्रष्ट-पुष्ट बॉडी में उनके संवादों और महाशक्तिशाली मुक्कों-लातों का असर डबल हो जाता है। रोहि शेट्टी मेहनती फिल्ममेकर हैं और समाज के सबसे बड़े ऑडियंस ग्रुप की सेंसिबिलिटी के हिसाब से फिल्में बनाते हैं, ऐसे में कुछ ऑडियंस को फिल्म हवा-हवाई ल सकती है, मगर कुल मिलाकर ये डीसेंट एंटरटेनर है। आप अपने फ्रेंड सर्किल के साथ जा सकते हैं। फैमिली के साथ भी। कहानी के ताने-बाने में, म्यूजिक में और फिल्म के अंत में कुछ अद्भुत नहीं है इसलिए कमतर लगता है। पुलिसवालों की ईमानदार कोशिशों, पॉलिटिकल प्रेशर और उनकी तकलीफों को कमर्शियली ही सही फिल्में एक बार फिर सामने रखती है।

गांव का न्यायप्रिय पुलिसवाला
गोवा के नक्शे पर एक छोटा लेकिन खुशहाल गांव है शिवगढ़। सब-इंस्पेक्टर बाजीराव सिंघम (अजय देवगन) इसी गांव का है और हर मसले को चतुराई से हल करता है इसी वजह से यहां अपराध नहीं है। उसके पिता के दोस्त की बेटी काव्या (काजल अग्रवाल) उससे प्यार करती है। जयकांत शिक्रे (प्रकाश राज) वैसे तो गोवा का बड़ा कारोबारी है, पर असल में धन उगाही, अपहरण, हत्या और गुंडागर्दी का काम करता है। एक मर्डर केस में उसे हाजिरी देने शिवगढ़ जाना पड़ता है। यहां बाजीराव से सामना होने पर उसके अहंकार को चोट पहुंचती है और यहीं से शुरू होता है ट्विस्ट। इसके बाद फिल्म पुलिस सिस्टम, बाजीराव और जयकांत के बीच से आगे बढ़ती है। ये कहानी अपनी मूल तमिल वर्जन वाली 'सिंगम' से इंटरवल के बाद अलग हो जाती है।

जहां सीटियां बजती हैं
बाजीराव सिंघम के किरदार के जितने भी अपीयरेंस हैं उन्हें डायरेक्टर रोहित शेट्टी हीरोइक अंदाज में पेश करते जाते हैं। मंदिर के सरोवर में डुबकी लगाकर निकलने के पहले सीन से लेकर मेघा कदम (सोनाली कुलकर्णी) को सेल्यूट करने के आखिरी सीन तक बस सीटियां ही बजती हैं। मशहूर फाइट मास्ट एम.बी.शेट्टी के बेटे रोहित अपनी फिल्म में एक्शन पर सबसे ज्यादा ध्यान देते हैं। स्टंट ऐसे डिजाइन करते हैं जैसे कोई एपिक फिल्म बना रहे हों। 'गोलमाल' जैसी कॉमेडी मूवी में ही इतनी कारें उड़ती हैं तो ये तो फिर 'सिंघम' है। हालांकि चलती गाड़ी से निकलते हुए अजय जैसे गोली चलाते हैं वह सीन पिछले साल आई हॉलीवुड मूवी 'रेड' के ऐसे ही ब्रूस विलिस सीन से हूबहू लिया गया है। फिल्म में तीन बड़े एक्शन सीक्वेंस हैं, जो बहुत खतरनाक हैं। इनका श्रेय जाता है रोहित और स्टंट डायरेक्टर जय सिंह निज्जर को। अशोक सर्राफ (हैड कॉन्स्टेबल प्रभु) के हिस्से आए एक-दो कॉमिक सीन और सचिन खेड़ेकर को गोटिया नाम से बुलाए जाने का शुरुआती सीन फिल्म में कॉमेडी की डोज है। प्रकाश राज भी क्लाइमैक्स के दौरान अपनी उचकती डायलॉग डिलीवरी में हंसाते हैं।

ये होता तो अच्छा होता
फिल्म में अजय के कैरेक्टर की इमेज बिल्डिंग और एक्शन सीक्वेंस के अलावा किसी चीज पर खास ध्यान नहीं दिया गया है। एक्टिंग में तो किसी से शिकायत नहीं है, बस काजल अग्रवाल की रंगत में अकडऩ अजीब लगती है। डिजाइनर सलवार-कमीज दिखाने के अलावा उनके रोल की कोई संजीदा प्लानिंग नहीं की गई है। एक सबसे कमजोर हिस्सा है फिल्म का म्यूजिक। पहला इंट्रोड्यूसिंग गाना मन भंवर उठे, तन सिहर उठे, जब खबर उठे, के आवे सिंघम... 'दबंग' के इंट्रो सॉन्ग हुड़ हुड़ दबंग दबंग.. की तर्ज पर है। गाने के बोल अच्छे हैं, बस सुखविंदर की भन्नाती आवाज में समझ नहीं आते। ये बड़ा माइनस पॉइंट है। दूसरा रोमेंटिंक गाना साथिया... भी कोई भावनाएं नहीं जगा पाता। प्रकाश राज की एक्टिंग उनकी सभी कमर्शियल हिंदी फिल्मों (वॉन्टेड, सिंघम, बुड्ढा होगा तेरा बाप) में एक जैसी बासी लगने लगी है। हर फिल्म में उनका थुलथुल शरीर, क्लीन शेव्ड चेहरा, अजीब डायलॉग डिलीवरी और कपड़े एक जैसे लगते हैं, जो कि स्टूपिड बात है। अगर अजय क्लीन शेव्ड से मूछों वाले हो सकते हैं तो प्रकाश की फिजिकल पहचान भी तो कुछ बदली जा सकती थी। मतलब, उन्हें देखकर किसी खूंखार विलेन वाली फीलिंग नहीं होती, जब ऐसा नहीं होता तो फिल्म का नेगेटिव पक्ष कमजोर हो जाता है और हम उसे सीरियसली नहीं लेते। इससे कहानी हमें इमोशनली इस्तेमाल नहीं कर पाती।

आखिर में..
जैकी चेन की फिल्मों की तरह रोहित की फिल्मों की भी ये पहचान बन चुकी है कि अंत में के्रडिट्स के साथ शूटिंग की रॉ फुटेज दिखाई जाती है। ये स्टंट सीन्स की मेकिंग की एक्सक्लूसिव वीडियो होती हैं। इसलिए 'सिंघम' खत्म हो तो सीटों से उठकर दौड़ें नहीं, बैठकर क्रेडिट्स को पूरा देखें।

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गजेंद्र सिंह भाटी

Thursday, July 21, 2011

'इस बार स्टीयरिंग सिर्फ मेरे हाथ है'

निर्देशक अश्विनी चौधरी को आज भी 10 साल पहले बनाई उनकी हरियाणवी फिल्म 'लाडो' के लिए सबसे ज्यादा पहचाना जाता है। इस पहली ही फिल्म ने उन्हें 47वां राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार दिलवाया था। उसके बाद उन्होंने 'धूप' जैसी अच्छी फिल्म भी बनाई। इस रीजन से ताल्लुक रखते हैं, मुंबई में रहते हैं और इन दिनों 'घायल' के सीक्वल 'घायल-2' के निर्देशन को लेकर बहुत एक्साइटेड हैं।

खुद के बारे में कुछ बताएं।
हरियाणा के चौटाला गांव से हूं। करियर इंडियन एक्सप्रेस के जनसत्ता अखबार से शुरू किया। दो साल चंडीगढ़ एडीशन में काम किया। कल्चरल बीट देखता था, लिटरेचर और फिल्म रिव्यू पर लिखता था। फिर दिल्ली एडीशन चला गया और 1999 में पहली फिल्म 'लाडो' बनाई।

फिल्में क्यों बनाने लगे?
घर में पढ़ाई का माहौल था, बाऊजी गांव के कुछ सबसे पढ़े-लिखे लोगों में आते थे। दिल्ली में जॉब के दौरान इंटरनेशनल फिल्म फेस्ट जाया करता था। एक बार गेस्ट कमल हसन थे। ऑडियंस में मेरे पास बैठा दोस्त बोला, यार कितने साल हो गए, दूसरों की फिल्मों पर तालियां बजाते हैं। तो मैंने कहा, कि अगले साल स्टेज पर मैं होऊंगा और लोगों से तालियां बजवाऊंगा। अगले साल मैंने 'लाडो' बना ली थी।

मतलब आपने फिल्म बनाने की टेक्निकल ट्रेनिंग नहीं ली है?
नहीं ली। पर सिनेमा इज अबाउट स्टोरी टेलिंग। मैं जब सात-आठ साल का था तो राजस्थान बॉर्ड बसे हमारे गांव में ठंड बहुत पड़ती थी। हम बच्चे दिनभर खूब खेलते और रात में रजाई में नानी से दो-ती घंटे लंबी कहानियां-किस्से सुनते। ये बात मुझे बहुत साल बाद पता चली कि अगर आप अपनी कहानी से एक आठ साल के बच्चे को दो-ढाई घंटे तक बांध कर रख सकते हैं तो आप बहुत अच्छे कथावाचक हैं। मेरी नानी कभी गांव की हद से बाहर नहीं गई, पर चाहती तो एक फिल्म बना सकती थी, क्योंकि उसे कहानी कहनी आती थी। बाकी टेक्नीक और क्राफ्ट जरूरी है पर कहानी पहले है। 'लाडो' मेरे लिए वो कहानी थी जिसे मैं कहना चाहता था। मेरी वाइफ कुमुद ने स्क्रिप्ट लिखी।

'लाडो' एनएफडीसी ने फाइनेंस की। उसकी फिल्मों के धीमे और नॉन-कमर्शियल पहलू के उलट इसमें गाने हरियाणवी स्टाइल में ही पूरे हिंदी फिल्मों जैसे थे।
फ्राइडे दर्शकों के लिए होता है। लोग पचास-सौ रुपए खर्च करके फिल्म देखने जाते हैं। अगर आप फिल्म में कुछ कहना चाहते हैं तो ऐसे कहिए कि वह दर्शक निराश या चीटेड फील न करे। मैंने 'लाडो' के साथ यही कोशिश की। ये पहली ऐसी हरियाणवी फिल्म थी जिसमें कहानी भी सीरियसली कही गई और मनोरंजन भी पूरा था।

ये फिल्म हरियाणा और राजस्थान के अंदरूनी इलाकों जैसी थी। लड़की की शादी हो गई है और वह अपने देवर से शारीरिक संबंध बनाती है। इन इलाकों में व्यवस्था इतनी क्रूर है कि कहानी के इस मोड़ के बारे में सोचकर ही सिहर जाता हूं। क्या आपको ये सिहरन नहीं हुई?
ये रिएलिटी है। मैं खुद भी वहीं से आता हूं इसलिए हरियाणा-राजस्थान की इस जमीनी सच्चाई को जानता हूं। चूंकि प्रेजेंट सोसायटी पुरुष प्रधान है, तो महिला को यहां दूसरे दर्जे का नागरिक बनाकर रखा गया है। अब खाप और ऑनर किलिंग भी दिखने लगे हैं। तो ये थोड़ा रिस्की तो था पर मुझे सब्जेक्ट उठाना था, मैंने उठाया। पहली फिल्म में मैं स्ट्रॉन्ग कंटेंट चाहता था।

आपकी मूवीज में जब भी कुछ इमोशनल होता है तो बरसात होती है। ऐसा क्यों?
(हंसते हुए) एक जाट ने ये मुझे रोहतक में कहा था कि फिल्म शूट तो आपने हरियाणा में की है लेकिन लगता है असली शूट चैरापूंजी में हुआ है। हर डायरेक्टर का एक ऑब्सेशन होता है। मेरे साथ भी है। शायद सब-कॉन्शियस माइंड में बरसात से कोई लगाव रहा होगा। इससे सीन निखर जाता है।

सोशल रेलेवेंस वाली फिल्मों के बीच आपने 'गुड बॉय बैड बॉय' कैसे बना दी?
सोशल कंसर्न अपनी जगह होती है, पर शाम को बच्चों को खाना भी खिलाना होता है। मैं कोई फिल्मी आदमी नहीं था। पहली ही फिल्म को नेशनल अवॉर्ड मिल गया। पर समाज से, सरकार से जितनी उम्मीद थी उतनी मदद मिली नहीं। हरियाणा में मेरी फिल्म को चलने नहीं दिया गया। कोर्ट केस हुए। घर-वर बिक गया। फिल्म अच्छी बनी पर जिंदगी भर जो कमाया था वो उसमें लग गया। तो फिल्म ने नाम के अलावा मुझे कुछ नहीं लौटाया। ये मेरे लिए बड़ा झटका था। फिर मुंबई आकर 'धूप' और 'सिसकियां' बनाई। पर इस दौरान अस्तित्व पर बन आती है। अपनी लड़ाई खुद लडऩी पड़ती है। इस दौरान कुछ अच्छी फिल्में बनती हैं कुछ बुरी। और मैं अभी उस मुकाम तक नहीं पहुंचा हूं जहां मैं मार्केट फोर्सेज की परवाह किए बगैर अपने मन की फिल्में बना सकूं।

'गुड बॉय...' में जो कमर्शियल कमी रह गई वो क्या 'घायल-2' में पूरी करेंगे?
देखिए सुभाष घई बहुत बड़े प्रॉड्यूसर हैं और मुक्ता आट्र्स जैसे बड़े बैनर ने गुड बॉय... बनाई थी। ये अनुभव बहुत बुरा रहा। उन्होंने मुझे वैसी फिल्म नहीं बनाने दी जैसी मै बनाना चाहता था। क्रिएटिव डिफरेंसेज की वजह से मैंने वो फिल्म 60 पर्सेंट पूरी होने के बाद छोड़ दी थी। फिर बचा डायरेक्शन और एडिटिंग सुभाष जी ने खुद की। पर फिल्म गई मेरे नाम से। इसलिए मुझे मानना पड़ता है कि वो मेरी फिल्म थी, अदरवाइज वो है नहीं।

'घायल-2'से बहुत उम्मीदें हैं, इन्हें बरकरार रखने में सिरदर्दी हो रही है?
ये फिल्म राजकुमार संतोषी ने बनाई थी और अपने टाइम की कल्ट फिल्म थी। ऐसे में जब आप घायल का सीक्वल बनाते हैं तो पहली फिल्म से इक्कीस न हो तो बनाने का कोई मतलब नहीं है। मैं तय करके चल रहा था कि स्क्रिप्ट जब तक बहुत बढिय़ा नहीं होगी फिल्म नहीं बनाउंगा। सनी और मैं बहुत वक्त से इस पर सोच रहे थे, एक दिन दिमाग में कुछ आया और मैंने उसे सुनाया तो वो बहुत एक्साइटेड हो गया। फिर सोच-विचारकर ही हमने फिल्म अनाउंस की।

पिछले ग्यारह-बारह साल में आपने सिर्फ चार-पांच फिल्में ही बनाईं हैं?
पिछले दो साल से मैंने कोई फिल्म नहीं बनाई है। इन 11 साल में कम फिल्में बनाई पर ये वो वक्त होता है जब आप अपने हथियार पैने करते हैं। अब मेरा ब्रेक खत्म हुआ है। आठ जुलाई से आर.माधवन, बिपाशा बसु, ओमी वैद्य और मिलिंद सोमन के साथ एक रोमैंटिक कॉमेडी की शूटिंग शुरू कर रहा हूं। ये फिल्म सितंबर तक खत्म हो जाएगी और अक्टूबर से 'घायल-2' शुरू होगी।

जलेबी-शीला-मुन्नी अब कॉर्पोरेट प्रैशर से फिल्मों में जबरदस्ती रखे जाने लगे हैं। आपकी फिल्मों पर ऐसा कोई दबाव है क्या?
'गुड बॉय..' के अनुभव के बाद मैंने फैसला लिया था कि बेमर्जी की फिल्म नहीं बनाऊंगा। तभी तो लंबे वक्त से फिल्म नहीं बनाई। अब जो माधवन-बिपाशा वाली फिल्म है, उसमें पूरी फ्रीडम है। 'घायल' को भी सनी बना रहे हैं अपने बैनर विजेता फिल्म्स के तले। पिछले एक-डेढ़ साल से चूंकि इसपर काम हो रहा है तो मुझपर उनका भरोसा है।

कैसी फिल्में देखना पसंद करते हैं?
मेरे पसंदीदा इस वक्त राजकुमार हीरानी हैं, उनका कोई जवाब नहीं। अनुराग कश्यप के प्रॉड्क्शन में 'उड़ान' बहुत अच्छी बनी। 'शैतान' देख नहीं पाया हूं। 'दबंग' अच्छी लगी, क्योंकि मैं गया ही उस माइंडसेट के साथ था कि दबंग देखने जा रहा हूं। बाकी मैं हर तरह की फिल्में देखता हूं।

Saturday, July 16, 2011

हैरी की जादुई महाभारत खत्म

फिल्म: हैरी पॉटर एंड द डैथली हैलोज पार्ट-टू
डायरेक्टर: डैविड येट्स
कास्ट: डेनियल रेडक्लिफ, रुपर्ट ग्राइंट, एम्मा वॉटसन, राल्फ फिएन्स, मैथ्यू लुईस, माइकल गैम्बॉन, हैलेना बॉनहैम कार्टर, मैगी स्मिथ
स्टार: तीन 3.0

जाहिर है कि नन्हे हैरी की इस आखिरी फिल्म को अश्रु भरे नैनों से विदाई मिलेगी। हां, इसने कमर्शियली बड़ी सफलता पाई, प्रॉड्यूसर्स को सोने में तौल दिया पर इस आठवीं फिल्म में अच्छाई के विषय में कुछ खास होता है। जब लॉर्ड वॉलडिमॉर्ट अपने मैनईटर्स के साथ आता है और उसके साथ हैरी का शरीर होता है तो सब रो रहे होते हैं, डर जाते हैं। उन्हें लगता है कि बुराई जीत गई। पर सब सहमों के बीच से आगे आता है सदा डरपोक दिखने वाला नेवाइल लॉन्गबॉटम (मैथ्यू लुईस)। ग्रिफिनडोर की तलवार उठाए वह वॉलडिमॉर्ट के डर को दुत्कारते हुए कुछ ऐसा ही कहता है, 'मैं किस बात से डरूं। मरने से? जो एक न एक दिन हर किसी को है।' फिल्म यहीं पर आकर सार्थक हो जाती है। डैथली हैलोज-2 में ऐसी ही अच्छी बातें हैं। पूरी सीरिज में लॉन्गबॉटम की तरह रॉन भी कुछ बुद्धू सा लगता है, पर यहां आकर उसकी होशियारी की कायल हरमाइनी भी हो जाती है। क्लाइमैक्स उन लोगों के लिए बहुत खास है जिन्होंने पहली फिल्म और बुक से हैरी की चिंता की है और उसे अपनी जिंदगी का हिस्सा माना है।

आखिरी अध्याय!
डैथली हैलोज-एक में हैरी (डेनियल रेडक्लिफ), रॉन (रुपर्ट ग्राइंट) और हरमाइनी (एम्मा वॉटसन) मारे मारे फिर रहे होते हैं। हॉगवड्र्स स्कूल के कर्ता-धर्ता डम्बलडोर (माइकल गैम्बॉन) की हत्या के बाद लॉर्ड वॉलडिमॉर्ट (राल्फ फिएन्स) का सामना इन्हीं को करना है। तीनों के बीच लव टाइएंगल भी नजर आता है। फिर फिल्म के आखिर तक प्यारा सा डॉबी अपनी जान देकर हैरी की जान बचाता है। भाग दो में डॉबी को दफनाने के बाद हैरी ग्राइपहुक गोबलिन से ग्रिंगॉट्स में जाने का रास्ता पूछता है। हैरी को लगता है कि हॉरक्रक्स (वॉलडिमॉर्ट की जान हॉरक्रक्सेज में छिपी है) यहीं छिपाया हुआ है। इस तरह एक-एक करके उसे कुल तीन हॉरक्रक्स नष्ट करने हैं और वॉडडिमॉर्ट का सामना करना है। हॉगवट्र्स स्कूल तहस-नहस हो चुका है, हैरी के बहुत सारे साथी अपने प्राण गवां चुके हैं। इस दौरान हैरी को अपने अस्तित्व और पहचान के लेकर भी बहुत सी नई बातें पता चलती हैं। फिल्म का अच्छा अंत उस चक्र को पूरा करता है, जहां से कहानी शुरू हुई थी।

जब बुराई बहुत बुरी हो
प्रफेसर मैकगॉन्गल (मैगी स्मिथ) का ये सीन इम्प्रेसिव है, जब हैरी को हॉरक्रक्स ढूंढने के लिए वक्त चाहिए तो वह हॉगवड्र्स की सुरक्षा के लिए 'पारतोतम लोकोमोतोह' बोलती हैं और ऊपर से कूद जमीन पर आ खड़े होते हैं पत्थर के सैनिक। ये बहुत विशेष मंत्र है जो गहरे सकंट के वक्त यूज किया जाता है। इस टेंस मौके में भी (बदमाशी भरे हंसोड़ अंदाज में) वह कहती हैं, 'मैं इस शब्द का हमेशा से इस्तेमाल करना चाहती थी।' फिल्म में अच्छाई के पक्ष में दर्शक तभी हो पाते हैं जब उस फिल्म की बुराई बहुत बुरी हो। यहां भी बुराई का भय वॉलडिमॉर्ट के उच्चारण में बने ठहराव और नजाकत की वजह से ही हो पाता है। जब सेवक माई लॉर्ड बोलते हैं और उसके गुस्से को भांपकर सिर झुकाकर दो कदम पीछे हो जाते हैं तो असर ऑडियंस पर दिखता है। उनका मंत्र 'अवाडा केडाव्रा' उनके सबसे स्पेशल डायलॉग्स में से एक रहेगा।

संदर्भ भगवद्गीता के
वॉलडिमॉर्ट से हैरी की पहली भिडं़त के बाद वह अचेत हो जाता है और अपने मानस में डंबलडोर से मिलता है। पॉटर फिल्मों के तिलिस्म, रोशनी और जादू के बीच ये बहुत सुकून भरा सीन है। इसे बड़ी आसानी से गीता के ज्ञान और महाभारत के अर्जुन-कृष्ण संवाद से जोड़कर देख सकते हैं। सीन के मायने भी महाभारत के संदर्भ से बहुत मिलते जुलते हैं। दूसरा लेखिका जे.के.रॉलिंग का इंडिया के पौराणिक ग्रंथों और कहानियों से प्रेरित होना भी इसका एक कारण है। हैरी को यहां एक बूढ़े भ्रूण की तरह खून से लथपथ जीव दिखाई देता है। ये संदर्भ जीवन और मृत्यु के दर्शन का है। वह निर्णायक लड़ाई से पहले अपने मन की उथल-पुथल के सवाल डंबलडोर से पूछता है। ये बड़े शांत तरीके से होता है। शुरू में डंबलडोर पूछता है, 'हैरी तुम्हें क्या लगता है ये कौन सी जगह है' और हैरी बोलता है (सब हंस पड़ते हैं), 'मुझे तो किंग्स क्रॉस स्टेशन जैसा लग रहा है। बस उससे ज्यादा क्लीन है।' फिल्म में इसी किस्म का ह्यूमर साथ-साथ चलता रहते है, जिससे फिल्म भारी नहीं होती।

आखिर में
मुझे लगता है कि कहानी अभी खत्म नहीं हुई। ये फिल्म उस दरवाजे को खुला छोड़ आई है, जहां से बहुत सारे रोचक, मजेदार और हैरी के शुरुआती दिनों जैसे भोले सीक्वल दर्शकों के लिए अंदर आएंगे।

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गजेंद्र सिंह भाटी

Wednesday, July 13, 2011

फिल्मों! तुम्हारा असर होता है

नसीरुद्दीन शाह ने पिछले साल मार्च में दिए अपने एक इंटरव्यू में कहा था कि फिल्मों का समाज पर कोई असर नहीं होता। उनका इशारा समाज सुधार वाली और समानांतर फिल्मों की ओर था। संदर्भ एफटीआईआई, वहां का डायरेक्शन कोर्स, श्याम बेनेगल, केतन मेहता और मैसेज वाले आर्ट सिनेमा का था तो उनका फ्रस्ट्रेशन भी झलक रहा था। अनुराग कश्यप अपनी फिल्मों की बोल्ड लेंग्वेज पर कहते हैं कि उनकी फिल्मों में वही लेंग्वेज होती है जो लोग बोलते हैं। इसी दौरान हमारे बीच 'जिंदगी न मिलेगी दोबारा' आने वाली है और 'डेल्ही बैली' रिलीज हुई ही है। मेरा ये मानना है कि फिल्मों में सिर्फ वह ही नहीं दिखाया जाता जो सोसायटी में होता है, बल्कि वह दिखाया जाता है जो सोसायटी में होना (अच्छा-बुरा दोनों) चाहिए। क्या होना चाहिए ये 'जाने' में ज्यादा और 'अनजाने' में कम, फिल्ममेकर तय करते हैं। जहां तक नसीर का कहना है तो सिनेमा का असर फिजीकली भी पड़ता है, लोगों की सोच पर भी पड़ता है और सोसायटी की डिक्शनरी पर भी पड़ता है। हम करते, बोलते, सोचते और जीते इन फिल्मों के दिशा-निर्देश पर ही हैं।

डीडीवन पर हर रविवार सुबह मुकेश खन्ना का सीरियल 'शक्तिमान' टेलीकास्ट होता था। कस्बों, छोटे शहरों और महानगरी बच्चों को इस बात से कोई मतलब नहीं था कि हॉलीवुड मूवी 'सुपरमैन' में क्लार्क केंट के रोल से ही पंडित गंगाधर विद्याधर मायाधर ओमकारनाथ शास्त्री का किरदार गढ़ा गया। उनपर तो बस प्रोग्रेम का खतरनाक असर था। रविवार की सुबह उन्हें बड़े खुलासे की लगती थी। टेक्नीकली ये प्रोग्रेम इतना कमजोर था कि इसके पसंद किए जाने की कोई वजह नहीं थी। पर शक्तिमान बचाने आएगा यह सोचकर असल में कई बच्चे ऊंची मंजिलों से कूद गए। ये है फिजीकल असर। यहां इस फिल्म मीडियम ने कई बच्चों की जान ली। हालांकि बाद में उभारकर टीवी पर ये पट्टी चलाई जाने लगी कि धारावाहिक पूरी तरह काल्पनिक है, इससे प्रभावित न हों।

लोग 'लगे रहो मुन्नाभाई' देखकर थियेटर से निकले तो प्रोटेस्ट मार्च में गुलाब और गेट वेल सून के प्लेकार्ड जुड़ गए। ये एक रोमैंटिसाइज्ड असर था। 'मुन्नाभाई एम.बी.बी.एस' के बाद जादू की झप्पी बंटने लगी। अस्पतालों, कॉलेजों और स्कूलों में। सोशल डिक्शनरी में 'मामू', 'रुलाएगा क्या', 'बोले तो', 'सर्किट' और 'गुड मार्निंग मुंबई' जैसे शब्द एड हो गए। आज 'ये साली जिंदगी' और 'डेल्ही बैली' में खूब गालियां होती हैं तो भी यही कहा जाता है कि यूथ बोलता है, इसलिए दिखाते हैं। पर ये बताएं कि हमने ये 'एफ' वर्ड बोलना कहां से सीखा? हमारी अपनी देसी गाली है, पर हम ये शब्द (फिल्मों से सीख) बोलने लगे। ये बताएं कि कौन अपने ट्राउजर पर बैठे दोस्त से कहता है कि 'योर गा** इज लाइक सोलर एक्लिप्स'? कौन अपने दोस्त को ससुर से गिफ्ट में मिली कार के बारे में कहता है कि 'वेन अ डॉन्की फ** अ रिक्शा, देन यू गेट दिस'? करोड़ों में कोई एक कहता भी होगा, तो थियेटर से निकलने के बाद हजारों बोलने को प्रेरित हो गए या होंगे। फिल्म बनाने वाले को कमर्शियल गेन के अलावा इस असर से कोई सरोकार नहीं है। सरोकार रखने हैं तो लोगों को ही रखने होंगे।

फिल्में हमारी सोच और जिंदगी जीने के तरीके को भी बदलती है। अगर फिल्में न होती तो सुनीता विलियम्स कभी पायलट न बनती, अंतरिक्ष में 195 दिन रहने का रिकॉर्ड न बनाती। टॉनी स्कॉट की फिल्म 'टॉप गन' में मैवरिक (टॉम क्रूज) को एफ-14 उड़ाते देख ही उन्होंने यूएस एयरफोर्स में जाने को अपनी जिंदगी का लक्ष्य बनाया था। आप अपने दोस्तों के साथ कैसे हैंगआउट करते हैं, ये भी फिल्में सिखा जाती हैं। फरहान अख्तर ने 'दिल चाहता है' बनाई तो कई वेस्टर्न फिल्मों से प्रेरित होकर, पर इंडियन ऑडियंस ऐसी कहानी और दोस्ती पहली बार देख रही थी। मैसेज ये मिला कि लाइफ में फ्रेंड्स कार (बाइक वाले बाइक पर) ट्रिप पर जाएं (फिल्म में छोटा सा हिस्सा) तो बेस्ट एंजॉय कर सकते हैं। देखकर लोग गए भी। अब बैचलर पार्टी नाम की टर्म को सोशल डिक्शनरी में डालने आ रही है 'जिंदगी न मिलेगी दोबारा'। हालांकि 'हैंगओवर' में हम ये देख चुके हैं, पर क्या करें फिल्ममेकर आजाद है कहीं से भी प्रेरणा लेने के लिए। इस तरह की दर्जनों विदेशी फिल्में हैं जो 1936 से बन रही हैं। इन कहानियों में मोटा-मोटी दो थीम होती हैं। तीन-चार दोस्तों के झुंड में कोई एक दोस्त शादी करने वाला है तो, उससे पहले सब मिलकर बैचलर पार्टी करते हैं। इसमें दारु, जुआ, गालियां, लापरवाही और विशेष लड़कियां होती हैं। दूसरी थीम ये कि बहुत दिनों से न मिले दोस्त ऑफिस (सिर्फ व्हाइट कॉलर जॉब) के काम में इतना उलझ गए हैं कि अपने बचपन की मासूमियत और जवानी के हैंगआउट मिस करते हैं। तो क्या करते हैं कि एडवेंचर ट्रिप पर जाते हैं।

जोया अख्तर ने 'जिंदगी न...' प्योर एंटरटेनमेंट के लिए बनाई होगी, इसके सोशल असर के बारे में ज्यादातर फिल्ममेकर्स की तरह उन्होंने भी नहीं सोचा होगा। सिंगल स्क्रीन, कस्बाई, मिडिल क्लास और अधपकी इंग्लिश बोलने की कोशिश करने वाली ऑडियंस ये फिल्म देखकर थियेटर से निकलेगी तो सोच चुकी होगी कि जिंदगी हो तो फिल्म के कैरेक्टर्स जैसी। फ्लाइट्स में सफर करना, स्पेन जाना, ल टॉमेटाना फेस्टिवल में हिस्सा लेना और कटरीना की तरह न्यूड बीच पर चलना दिव्य है। उन्हें मासूमियत से लगेगा कि पैसा है तो सब है, ब्रैंडेड कपड़े बहुत जरूरी हैं और अपने बच्चों को एडवेंचर स्पोट्र्स सिखाएंगे। पर क्या एंजॉय करने के लिए केरल या मैसूर नहीं जा सकते? ऋषिकेश या धर्मशाला नहीं घूम सकते? दिसंबर में जोधुपर, जैसलमेर और जयपुर की ट्रिप नहीं बना सकते? पंजाब नहीं जा सकते? ये सवाल इसलिए भी क्योंकि इंडिया की आधी से ज्यादा आबादी, जो फिल्म की ऑडियंस होगी, निश्चित तौर पर आर्थिक कारणों से कभी विदेश टूर पर नहीं जा पाएगी। पर उनके मन में असंतोष का बीज बो देगी। 'द दार्जलिंग लिमिटेड' के तीन विदेशी जोड़ीदार भारत के अंदरुनी हिस्सों की जर्नी के दौरान जिंदगी के असल मायने समझते हैं, पर 'जिंदगी न..' हमें सब-कॉन्शियस में ही सही ये सिखाएगी कि जीना हो तो बाहर स्पेन या ईजिप्ट जाओ।

हां, ये सही है कि हर निर्देशक-राइटर को अपनी कहानी चुनने का अधिकार है, पर जहां रीमा कागती और जोया अख्तर का काम खत्म होता है, वहीं से सोसायटी पर उनकी कहानी का असर पडऩा शुरू होता है।
गजेंद्र सिंह भाटी

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एक हिंदी दैनिक के साप्ताहिक कॉलम सीरियसली सिनेमा में प्रकाशित

Saturday, July 9, 2011

इन दिनों जो बच्चे हैं, वो इस फिल्म को संजोएंगे अपने बचपन की सुनहरी स्मृतियों में

फिल्म: चिल्लर पार्टी
डायरेक्टर: नीतेश तिवारी और विकास बहल
कास्ट: सनथ मेनन, नमन जैन, चिन्मय चंद्रांशु, रोहन ग्रोवर, आरव खन्ना, विशेष तिवारी, वेदांत देसाई, दिवजी हांडा, इरफान खान, श्रेया शर्मा
स्टार: साढ़े तीन, 3.5


बहुत दिन बात किसी मूवी से तृप्त होकर लौटा हूं। 'चिल्लर पार्टी' फिल्म का नाम जितना लापरवाह सा लगता है, इसकी स्टोरी और निर्देशन उतना ही झकास है। फिल्म में शायद ही कोई ऐसा सेकंड हो जहां आप नुक्स निकाल सकें। जहां भी हंसी (बहुत) आती है वो बासी नहीं लगती है। मुझे लगता है कि बहुत बरस के बाद बच्चों के लिए कोई अद्भुत मूवी आई है। इस मूवी को आप कैसे देखें, किसके साथ देखें... ये इस बार आपसे कहने की जरूरत नहीं पड़ेगी। हर क्लास और हर एज ग्रुप इसे जीभर के एंजॉय कर सकता है। शायद मैं 'दबंग' देखते वक्त भी उतना नहीं हंसा था, जितना 'चिल्लर पार्टी' ने हंसाया। अ मस्ट वॉच। जांगिया की भूमिका निभा रहे नमन जैन हंसाने में मामले में आज के बड़े-बड़े एक्टर्स से बहुत आगे खड़े नजर आते हैं।

इन बच्चों का परिचय
चंदन नगर कॉलोनी में ये सब बच्चे रहते हैं। कुछ-कुछ 'तारक मेहता का उल्टा चश्मा' की टप्पू सेना की तरह। इन्हें पड़ोस के एक अंकल (रवि झांकल) ने नाम दिया है चिल्लर पार्टी। टप्पू सेना ड्रमैटिक है पर चिल्लर पार्टी एंटरटेनिंग, रियलिस्टिक और ठहाकेदार। खैर, कहानी पर आते हैं। ज्यादा कुछ नहीं बताऊंगा, अदरवाइज फिल्म देखने में मजा नहीं आएगा। ये सात बच्चे एक ही स्कूल में पढ़ते हैं। इनके नाम तो अर्जुन, बलवान, लकी, लक्ष्मण और रमाशंकर है, मगर दोस्त कुछ और कहकर पुकारते हैं। एनसाइक्लोपीडिया (सनथ मेनन), जांगिया (नमन जैन), पनौती (चिन्मय चंद्रांशु), अकरम (रोहन ग्रोवर), अफलातून (आरव खन्ना), सेकंड हैंड (विशेष तिवारी), साइलेंसर (वेदांत देसाई) और शाओलिन (दिवजी हांडा).. ये निक नेम इनकी फनी आदतों और अजीब लाइफ की वजह से पड़े हैं। इनकी कॉलोनी में एक दिन गाड़ी साफ करने का काम करने फटका (इरफान खान) और उसका दोस्त भीड़ू (कुत्ता) आता है। इन सबमें गहरा लगाव हो जाता है। पर इस बीच कुछ ऐसा होता है कि इन बच्चों को अपनी दोस्ती के लिए एक लोकल नेता से भिडऩा पड़ता है। बिना कोई भाषणबाजी के फिल्म क्लाइमैक्स तक पहुंचती है। कैसे, यही पार्ट सबसे इंट्रेस्टिंग है।

बहुत ही कम्युनिकेटिव
देखा जाए तो ऐसी कहानी और विषय में करने के लिए ज्यादा कुछ होता नहीं है। मगर नीतेश तिवारी और विकास बहल ने अनूठा निर्देशन किया है। कैरेक्टर इंट्रोडक्शन से लेकर, फिल्म में एंटरटेनमेंट को लगातार बनाए रखने तक कहीं एक पल भी फेल नहीं होते। पहले मुझे लगा था कि यूटीवी के एसी ऑफिस में क्रिएटिव ऑफिसर बनकर बैठने वाले विकास डायरेक्शन में भला क्या कर पाएंगे, मगर उन्होंने बहुत कुछ किया। जितनी दिखती है ये फिल्म अपने ट्रीटमेंट में उससे ज्यादा मैच्योर है। आप कहीं भी इसे बाल फिल्म समझकर इग्नोर नहीं कर सकते हैं। अपने मिशन के पूरा करते वक्त ये बच्चे 'लगान' और 'चक दे इंडिया' के किरदारों और उनकी तैयारी जैसे लगते हैं। अमित त्रिवेदी का म्यूजिक सदाबहार नहीं है तो कहीं भी फिल्म पर थोपा गया नहीं लगता।

आखिर में...
एक फिल्ममेकर के लिए चैलेंज होता है कि उसकी फिल्म किसी रिक्शॉ चलाने वाले को भी बहुत आसानी से समझ आए और वही फिल्म ज्यादा पढ़े-लिखों को भी उतनी ही अच्छी लगे। 'चिल्लर पार्टी' ये चैलेंज पूरा करती है। इस साल की सार्थक फिल्मों में से एक। निश्चित तौर पर एंटरटेनमेंट टैक्स से मुक्त कर दिए जाने लायक।

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ग़जेंद्र सिंह भाटी

...क्योंकि लैरी कभी टॉम हैंक्स नहीं हो सकता है

फिल्म: लैरी क्राउन
डायरेक्टर: टॉम हैंक्स
कास्ट: जूलिया रॉबट्र्स, टॉम हैंक्स, गुगु मबाथा, सेड्रिक द एंटरटेनर, विल्मर वॉल्डरामा, जॉर्ज ताकेई
स्टार: दो, 2.0

टॉम हैंक्स की लिखी और डायरेक्ट की इस मूवी के लिए चंडीगढ़ में इससे बुरा और कुछ नहीं हो सकता था। टिकट काउंटर पर बैठी युवती फिल्म के बारे में पूछने पर बोली, 'केड़ी मूवी?' आखिर तक उनका उच्चारण वो लैरी वाली फिल्म से आगे नहीं बढ़ पाया। ऑडी के दरवाजे पर पहुंचा तो अटेंड करने खड़ा युवक बोला, 'एनी अदर मूवी सर, क्योंकि आपके अलावा कोई भी नहीं आया है।' खैर, हॉलीवुड की फिल्मों को लेकर शहर में इतनी कम जानकारी होना नई बात नहीं है। आते हैं 'लैरी क्राउन' पर। टॉम हैंक्स के करियर की सबसे कम याद रखी जाने वाली ये फिल्म जरूरत से ज्यादा ही हल्की है। न तो स्टोरी में कोई एक्साइटमेंट है, न ही इसमें कोई कथ्य है और न ही कहानी किसी लक्ष्य तक पहुंचती है। हैंक्स फैन हैं तो एक बार देख सकते हैं, जो कभी-कभार ही फिल्म देख पाते हैं उन्हें कुछ और ट्राई करना चाहिए। लैरी के पड़ोसी की भूमिका में लमार (सेड्रिक द एंटरटेनर) बार-बार आकर कुछ रिलैक्स करते हैं, पर उनका रोल भी दबा हुआ ही है।

बिना कहानी जैसी कहानी
खुशमिजाज एक्स नैवीमेन लैरी क्राउन (टॉम हैंक्स) यू मार्ट स्टोर में काम करता है। पिछले नौ साल उसे बेस्ट वर्कर का अवॉर्ड दिया गया है, इस बार मिलता है नौकरी से निकाला। इस पार्ट तक आते-आते 'अप इन द एयर' के जॉर्ज क्लूनी याद आने लगते हैं। टर्मिनेशन लेटर देने की बेस्ट गाथा तो वही है। खैर, लैरी को कारण ये बताया जाता है कि उसने अपनी पढ़ाई पूरी नहीं की थी। थोड़ी निराशा के बाद वह ईस्ट वैली कम्युनिटी कॉलेज में भर्ती होता है। जिस स्पीच कोर्स में उसने दाखिला लिया है उसकी निराश-खड़ूस प्रफेसर है मर्सी उर्फ मिस टेनो (जूलिया रॉबट्र्स). वह डॉ. मत्सुतानी (जॉर्ज ताकेई) की इकोनॉमिक्स क्लास में भी बैठता है और वहां बेस्ट है। वहीं उसकी यंग दोस्त बनती है तालिया (गुगु मबाथा). तालिया का बॉयफ्रेंड है स्कूटर गैंग का लीडर और अच्छे दिलवाला डेल गोर्दो (विल्मर वॉल्डरामा). देखिए ऐसे उलझिए मत, बताने को कहानी के नाम पर बस यही है। बाकी ये तो अंदाजा आपको भी होगा कि आखिरकार लैरी और टेनो एक-दूसरे के दिल में बस जाएंगे।

दो दिग्गज, दोनों व्यर्थ

जूलिया का रोल स्क्रिप्टवाइज बिल्कुल भी ऐसा नहीं है कि उस पर मोहित हो सकें। टॉम हैंक्स कॉलेज में आकर आखिर क्या हासिल करते हैं, ये समझ नहीं आता है। वह कहते हैं कि मिस टेनो की क्लास ने उनकी लाइफ बदल दी जबकि पूरे सैशन के दौरान वह सिखाती कुछ भी नहीं है। टॉम के साथ पढऩे वाली तालिया उसकी बेस्ट फ्रेंड क्यों है ये भी नहीं बताया जाता। वह टॉम को नई ड्रेसेज, घड़ी और हेयर कट देती रहती है, उसकी चिंता करती रहती है, क्यों ये नहीं पता। शायद सिर्फ इसलिए कि वो टॉम हैंक्स है। इसमें सुकून भरा सिर्फ उनका स्कूटर और लाइफ को जीने का शांत अंदाज है। हां, ये जरूर है कि ये कहानी, टॉम जैसे लोग और टेनो जैसी प्रफेसर हमारे आस-पास के ही लगते हैं। शायद इसी ने टॉम को कहानी लिखने के लिए प्रेरित किया हो।

आखिर में...
एक फिल्म पहले फिल्म होती है फिर कुछ और। चूंकि अब टॉम इतनी क्लासिक फिल्में कर चुके हैं तो किसी लैजेंड की तरह दर्शकों के छोर से नहीं खुद के छोर से सोचने लगते हैं। जिन्हें बुरा लग रहा हो वो नाखुश न हों 'द टर्मिनल', 'फॉरेस्ट गंप', 'कास्ट अवे' और 'सेविंग प्राइवेट रायन' जैसी हैंक्स मूवीज की ओर मुड़ें।

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गजेंद्र सिंह भाटी

Tuesday, July 5, 2011

रियल प्रेस कॉन्फ्रेंस के रील सबक

इन एसीपी राठौड़ को हमने जॉन मैथ्यू मथान के निर्देशन में बनी 'सरफरोश' में देखा था। पहली बार कोई फिल्मी असिस्टेंट कमिश्नर ऑफ पुलिस इतना ह्यूमन लगा था। तब से 'सरफरोश' मेरी फेवरेट फिल्मों में और जय सिंह राठौड़ फेवरेट किरदारों में शामिल हो गए। उसके बाद अगर कोई दूसरा ऐसा किरदार मिल पाया है तो वो है जेसीपी रॉय का। जॉइंट कमिश्नर ऑफ पुलिस मुंबई (क्राइम) हिमांशु रॉय। मौका सीनियर क्राइम जर्नलिस्ट जे.डे के मर्डर केस पर रॉय की सबसे महत्वपूर्ण प्रेस कॉन्फ्रेंस का था, जो 27 जून को हुई। मैंने ज्यों ही देखना शुरू किया, त्यों ही इस इमेज एनेलिसिस में घुसता चला गया। घनी काली मूछें साउथ के हीरोज (सुपर) जैसी, मुख पर गंभीरता, दिमाग बर्फ सा शांत, चौड़ा ललाट, चौड़ा सीना, चौकड़ी वाला ब्लू शर्ट, अंदर सफेद टी-शर्ट, खाकी पेंट और खाकी सा बेल्ट। बोलने का अंदाज सीधा, सोफिस्टिकेटेड, बैलेंस्ड, सुलझा हुआ, क्लीयर, मैच्योर और एक फिल्मी हीरो (एसीपी/एसपी/डीसीपी/जॉइंट कमिश्नर/एसीपी क्राइम ब्रांच स्पेशल टीम) के लिहाज से बिल्कुल परफेक्ट। शायद परफेक्ट से भी ज्यादा ही परफेक्ट।

दर्जनों कैमरों के सामने केस सुलझाने वाली स्पेशल टीम खड़ी थी। सादे कपड़ों में ये सब 'आन:मेन एट वर्क' के डीसीपी हरिओम पटनायक (अक्षय कुमार) की सीबीआई टीम के मेंबर लग रहे थे। इनमें कोई अप्पा कदम (सुनील शेट्टी) था, कोई विक्रम सिंह (शत्रुघ्न सिंह) तो कोई कॉन्सटेबल खालिद अंसारी (परेश रावल). माइक के सामने जेसीपी हिमांशु रॉय के आते ही मुझे टीवी स्क्रीन 70 एमएम का परदा लगने लगी। अपनी प्रेंजेंटेशन में हीरोइक, सशक्त और रियलिस्टिक सी रॉय की ये कॉन्फ्रेंस फिल्ममेकर्स के लिए एक रियल डॉक्युमेंट साबित हो सकती है। इसमें फिल्मी जरूरत जितना ड्रामा भी है, हीरोइज्म वाला एटिट्यूड भी और देश की नजरों में चढ़ा हुआ बड़ा केस भी। बाकी उनकी मूछें और कपड़े भी सिचुएशन और कैरेक्टर को रियल बनाते हैं। केस के बारे में मीडिया को उन्होंने बेदाग अंग्रेजी, अच्छी हिंदी और मराठी तीनों भाषाओं में बताया। केस की एक-एक डीटेल बिना अटके, बिना कोई प्रेस नोट पढ़े वह बताते गए। ये लेंग्वेज वाला ऐसा पहलू है जो एक्टर्स के रोल को बहुत प्रभावी बना सकता है।

ये सोचने वाली बात है कि कमिश्नर, जॉइंट कमिश्नर और एसीपी तो पहले भी रहे हैं फिर बात सिर्फ रॉय के बारे में ही क्यों। क्योंकि उनके अनुकूल ही अभी हमारे दौर के फिल्मी पुलिसवाले और उनकी फिजिकैलिटी है। हमारे पुलिस और नॉन-पुलिस रोल में रॉय की घनी मूछें नजर आने लगी हैं। तभी तो बिन मूछ वाले हीरोज के दौर में हमने 'वंस अपॉन अ टाइम इन मुंबई' में एसीपी विल्सन (रणदीप हुड्डा, हीरो नहीं सूत्रधार), 'गंगाजल' में एसपी अमित कुमार (अजय देवगन) और 'खाकी' में डीसीपी अनंत श्रीवास्तव (अमिताभ बच्चन) को स्वीकार किया। मूछों और प्लॉट के मामले में साउथ के गहरे असर वाला फेज अभी हमारी फिल्मों पर चल रहा है। 'रावण' के एसपी देव प्रताप (विक्रम), 'दम मारो दम' के एसीपी विष्णु कामथ (अभिषेक) और 'सिंघम' के बाजीराव सिंघम (देवगन) में मूछों और अच्छी कद काठी वाला फैक्टर है। सबके चेहरे में वो एक हीरो और एक मॉडल वाला अंश झलकता है। 'शैतान' में भी राजीव खंडेलवाल की इंटेंसिटी में इनवेस्टिगेटिव एजेंसियों के काम करने के तरीके को देख सकते हैं। कमिश्नर पवन मल्होत्रा के साथ उनके अनौपचारिक-औपचारिक रहते, उग्र-शांत होते ताने-बाने को देख सकते हैं।

आप रॉय की कॉन्फ्रेंस का वीडियो नेट से निकालिए और एक-एक चीज को ऑब्जर्व करना शुरू करिए। आपको अपनी फिल्म का आदर्श हीरो नजर आएगा। एक-एक वाक्य के साथ उनके बोलने का तरीका और इस मर्डर केस में जल्दी रिजल्ट सामने ले आना हमें कायल करता है। जैसे हम एसीपी राठौड़ के 'सरफरोश' में होते जाते हैं। जैसे हम 'सिंघम' में बाजीराव सिंघम के हो सकते हैं। रॉय के पुलिस रिकॉर्ड पर मैं कोई टिप्पणी नहीं करता। मेरा ध्यान रियल और रील की इमेज पर है। कैसे असल जिंदगी के लोग रील के हीरोज से ज्यादा हीरोइक लगने लगते हैं और कैसे रील पर हमारे हीरो इन असली अधिकारियों से कुछ सीखकर ऐतिहासिक रोल निभा सकते हैं। इसमें 'दबंग' छिछला उदाहरण है तो 'सरफरोश-सिंघम' सीरियस। हालांकि 'सिंघम' घोर कमर्शियल फिल्म है पर सीरियस काम करने वाले अजय देवगन और उनकी 'गंगाजल' वाली ईमानदारी 'सिंघम' को सीरियसली स्वीकार करने योग्य बनाती है। रॉबिन हुड पांडे हमारे दिल में छोटी-छोटी अच्छी अदाओं से जगह बना लेते हैं। एसीपी राठौड़ हमारे जीवन के सबसे बेस्ट रोल्स में शुमार होते हैं। इसकी वजह ये है कि अपने काम को सही से न करने और लोगों के साथ बुरे बर्ताव के लिए बदनाम पुलिस की वर्दी को कुछ (फिल्मों में) अच्छे इंसान मिल जाते हैं, जो बहुत अच्छे हैं। सोचिए ऐसे में अगर हिमांशु रॉय जैसे लोग और उनकी क्राइम ब्रांच की रिजल्ट देने वाली टीम यूं मिलती है तो आने वाले वक्त में ऐसे फिल्मी रोल हमें ज्यादा असल लगेंगे और असल लोगों में फिल्मी हीरो वाला अंश दिखाई देने लगेगा।
गजेंद्र सिंह भाटी

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एक हिंदी दैनिक के साप्ताहिक कॉलम सीरियसली सिनेमा में प्रकाशित पहली कड़ी

Friday, July 1, 2011

'ए' को याद रखिए और हंसिए

फिल्मः डेल्ही बैली
डायरेक्टरः अभिनय देव
कास्टः विजय राज, इमरान खान, वीर दास, कुणाल रॉय कपूर, पूर्णा जगन्नाथन, शैनाज ट्रैजरीवाला
स्टारः तीन, 3.0

जो डर था वही हुआ। कुछ साल पहले जब 'अमेरिकन पाई' देखी थी, तो लगा था कि इसके अंश उड़कर हमारी फिल्मों में भी आएंगे ही। यकीन मानिए, ये सोचकर बहुत अच्छा नहीं लगा था। फिर हाल ही में 'हैंगओवर' आई। अब 'डेल्ही बैली' आई है। अब हम भी 'ऐसी' फिल्में बनाने लगे हैं। सोचना पड़ेगा। एंटरटेनमेंट के मामले में ये फिल्म बहुत अच्छी है। उम्मीदों से दोगुना देती है। सीट से हिलने नहीं देती है और हंसा-हंसाकर (मुझे नहीं) दोहरा कर देती है। सिर्फ एंटरटेनमेंट (ए सर्टिफिकेट वाला) के लिए मैं इसे तीन स्टार दे रहा हूं। मुश्किल है परिवार के साथ जाने में। इसे आप परिवार के साथ नहीं देख सकते हैं, न ही बच्चों और टीनएजर्स को ये फिल्म देखनी चाहिए। एडल्ट हैं तो दोस्तों के साथ जाएं, चाहें तो अकेले जाएं।

दिल्ली का उदर
तीन दोस्त हैं। दिल्ली में न जाने किस कॉलोनी में एक घर के फर्स्ट फ्लोर में किराए पर रहते हैं। कमरे में अंधेरा है, टॉयलेट में पानी नहीं है, सोने-रहने की जगह बिखरी पड़ी है और बिखरी पड़ी है इनकी लाइफ। ताशी (इमरान खान) एक अंग्रेजी अखबार में जर्नलिस्ट है। नितिन (कुणाल रॉय कपूर) उसका फोटोजर्नलिस्ट दोस्त है और 'काम' करना बड़ा पसंद करता है। तीसरा दोस्त अरूप (वीर दास) अखबार में ही कार्टूनिस्ट है। पानी सुबह दो घंटे ही आता है, पर इन तीनों को उठने में आलस आता है और पानी चला जाता है, फिर संडास में मुश्किल होती है। मेनका (पूर्णा जगन्नाथन) ताशी के साथ दफ्तर में काम करती है और सोनिया (शेनाज ट्रैजरीवाला) उसकी होने वाली वाइफ है। ये लो परिचय पूरा। कहानी सिंपल है। इन तीनों की जिंदगी फिल्म के दो घंटों के दौरान नरक बन गई है, कारण कई है। ये पहले भी भाग रहे थे और अब भी भाग रहे हैं।

सिर्फ ये ही अच्छा है
फिल्म में हुफैजा लोखंडवाला की एडिटिंग (अगर उन्होंने अकेले की है तो) पहली अच्छी चीज है। कैरेक्टर्स और कहानी कैसे डिवेलप होंगे, इसको दिमाग में सोचना और उन्हें पेश करना दूसरी बेहतर चीज है। हर बार हालात और कैरेक्टर के चेहरे के पिटे हुए भाव हंसाते हैं। कार्टूनी पहलू भी है। मसलन, वह सीन जिसमें विजय राज इमरान के कैरेक्टर ताशी को गोली मारने वाला है, अरूप टाई के सहारे छत से लटका हुआ है। उसके भार से और ऊपरी फ्लोर में चल रही कथक क्लास से छत क्रैक हो जाती है और कथक कर रही लड़की का पांव छेद में से नीचे निकल आता है। कुछ अच्छे पल भी हैं, जैसे बुरके में बैठे वीर दास का पानी पीना। वह बुरका उठाए बगैर ही पानी की गिलास मुंह को लगाता है और पानी बाहर गिर जाता है। फनी। फिल्म में एक्टिंग को लेकर किसी से शिकायत नहीं है। विजय राज सारे थ्रिल की डोरी अकेले खींचे रहते हैं। उनके मुंह से निकली हिंदुस्तानी गालियां थोपी हुई नहीं लगती। पर गाली तो गाली है, नहीं होती तो बेहतर होता।

कहीं तो लिमिट रखो
इसे यूथ की फिल्म कहा जा रहा है, पर मैं नहीं मानता। हां, मैट्रोपॉलिटन सिटीज के अंग्रेजी बोलने वाले यंगस्टर इसे देखकर तुरंत आकर्षित हो जाएंगे, फिर भी ये फिल्म भारत के आधे युवाओं को भी रेप्रजेंट नहीं करती है। मैं गारंटी के साथ कह सकता हूं कि फिल्म में जितनी बार 'एफ' शब्द का इस्तेमाल हुआ है, उतनी बार उसके हिंदी वर्जन वाले शब्द को बोला जाता तो थियेटर में बैठे लोग कानों में अंगुलियां डाल लेते और इसे सी ग्रेड माना जाता। आखिर 'अमेरिकन पाई' और अब 'डेल्ही बैली' के अलावा कितनी ऐसी फिल्में हैं जिनमें 'विष्ठा' (स्टूल) दिखाई गई है। कितनी ऐसी हिंदी फिल्में हैं (हॉलीवुड में तो हर दूसरी फिल्म में) जहां एक बॉयफ्रेंड अपनी गर्लफ्रेंड की शादी रोकने आता है और एक ऐसी यौन क्रिया का नाम लेता है जो शारीरिक संबंध बनाने के दौरान की जाती है। आखिर ये कैसा मनोरंजन है जिसमें लड़की को 'जा चुड़ैल' कहा जाता है, ताकि हम सब हंसें। इन सबमें लॉजिक ये दिया जाता है कि फिल्म को 'ए' सर्टिफिकेट मिला है। पर कितने ऐसे मल्टीप्लेक्स हैं जहां इटेबल्स के साथ-साथ अठारह से कम उम्र के टीनएजर्स को भी अंदर नहीं जाने दिया जाता है, बाहर ही रोक दिया जाता है।

क्या ये हमारी फिल्म है?
'डेल्ही बैली' दिखने में हिंदुस्तानी फिल्म लगती है। एक्टर्स यहां के हैं, उनके कैरेक्टर और जबान हॉलीवुड के। खासतौर पर वीर दास और इमरान खान के कैरेक्टर्स और उनके मैनरिज्म। देखते वक्त ध्यान रखें कि आपकी रगों में अलग किस्म का सेंस ऑफ ह्यूमर स्थापित किया जा रहा होगा। बरास्ते फिल्म के राइटर अक्षत वर्मा, ये ह्यूमर लॉस एंजेल्स से आया है। वहीं पर उन्होंने फिल्ममेकिंग कोर्स सीखा और वहां की इंडस्ट्री की मनोरंजन की परिभाषा को यहां ले आए। ये जो फिल्मों में गंदा बोलकर और दिखाकर दर्शकों के मन में शॉक वैल्यू पैदा करने की आदत है, वह हमारी फिल्मों में कभी नहीं थी। हॉलीवुड से आई है। फिल्म राइटिंग और मेकिंग की एक आचार संहिता होती है, कि एंटरटेनमेंट के बहाने हम इस सीमा को पार नहीं करेंगे। अब इस फिल्म के आने के बाद ये आचार संहिता टूटेगी और बुरे नतीजे सामने आएंगे। धन्यवाद, उन दो दर्जन हिंदी फिल्ममेकर्स का जिन्होंने अपने स्वयं के तय किए नैतिक नियमों में रहते हुए ही अब तक की सर्वश्रेष्ठ फिल्में बनाईं। ऐसी फिल्में जो अगले सौ-हजार साल तक हमें स्वस्थ मनोरंजन देती रहेंगी।

आखिर में...
फिल्म के शुरुआती सीन किरण राव की 'धोबीघाट' जैसे ट्रीटमेंट वाले हैं। 'भेजा फ्राई' में भारत भूषण नाम को सुनकर अंग्रेजीदां यूथ हंस पड़ता है। 'धोबीघाट' में मुन्ना (प्रतीक बब्बर) के बिहारी मूल को सुनकर ये यूथ हंसता है। 'थ्री ईडियट्स' में राजू रस्तोगी (शरमन जोशी) की सांवली-मोटी बहन को देखकर ये यूथ हंसता है। इस फिल्म में इस यूथ को हंसाने के लिए के.एल.सहगल जैसी आवाज में 'दुनिया में प्यार जब बरसे, ना जाने दिल ये क्यों तरसे, इस दिल को कैसे समझाऊं, पागल को कैसे मैं मनाऊं' गाना बजता है। आमिर खान आइटम नंबर में अपनी छाती पर उगे नकली घने बालों को अनिल कपूर के बालों से जोड़ते हैं। आखिर हम कब, कहां, किसपर, क्यों हंस रहे हैं, ये सोचना क्या अब गैर-जरूरी हो गया है।
गजेंद्र सिंह भाटी