Friday, June 24, 2011

जब कोई कॉमेडी चिड़चिड़ा-दुखी बनाने लगे

फिल्मः डबल धमाल
डायरेक्टरः
इंद्र कुमार
कास्टः जावेद जाफरी, रितेश देशमुख, संजय दत्त, आशीष चौधरी, अरशद वारसी, कंगना रनाउत, मल्लिका सेहरावत
स्टारः ढाई 2.5

मुझे लगता है कि अच्छी कॉमेडी के लिए आने वाली फिल्मों का इंतजार करने से अच्छा है कि खुद ही कुछ बंदोबस्त कर लूं। 'डबल धमाल' देखने के बाद ये सोच पुख्ता हो गई है। पीवीआर के ऑडी फोर में मेरे अलावा बहुत कम ऐसे लोग थे जो हंस नहीं रहे थे। इसके बावजूद मैं 'डबल धमाल' को एक बुरी फिल्म कहूंगा चूंकि ये फिल्म जहां-तहां हंसाती रहती है, एंटरटेन करती है इसलिए थियेटर जाकर इसे देखने से आपको बिल्कुल नहीं रोकूंगा। डेविड धवन और प्रियदर्शन की फिल्में अब अच्छी लगने लगी हैं और हमारे दौर की गोलमाल-धमाल चिड़चिड़ा और दुखी बनाने लगी हैं। इस एंटरटेनमेंट में कोई कहानी और आत्मा नहीं है पर आप देखने जा सकते हैं। किसी का साथ हो तो अच्छा।

बात कहानी की नहीं
'धमाल' के पांच मुख्य किरदार 'डबल धमाल' में भी हैं। आदि (अरशद वारसी), मानव(जावेद जाफरी), रॉय (रितेश देशमुख) बोमन (आशीष चौधरी) और इंस्पेक्टर कबीर (संजय दत्त). पिछली मूवी में जिस छिपे खजाने के पीछे सब दौड़ रहे थे वो चैरिटी में चला गया था। चारों दोस्त अब रोड़ पर आ गए हैं। इसका दोष वो कबीर को देते हैं। एक दिन कबीर उन्हें एक बड़ी गाड़ी में बड़े से आफिस जाता दिखता है। चारों तय करते हैं कि कबीर से सब छीन लेंगे। जाहिर है मजाकिया अंदाज में ही ये सब हो रहा है। कबीर की वाइफ है कामिनी (मल्लिका सेहरावत) और सेक्रेटरी कीया (कंगना रनाउत). असल में ये चारों कबीर के प्लैन में फंस रहे हैं। इसमें उसकी गर्लफ्रेंड कामिनी और छोटी बहन कीया भी शामिल है। खैर, ये चार बेचारे बाटा भाई (सतीश कौशिक) को चूना लगाकर ढाई सौ करोड़ रुपए कबीर को देते हैं और कबीर मकाऊ भाग जाता है। अब भाई लोग इन चारों के पीछे है और ये भी मकाऊ चले जाते हैं। यहां ये फिर कबीर को सबक सिखाने की सोचते हैं। फिल्म के आखिर तक लगता है कि इन्होंने कबीर को मूर्ख बना दिया, पर यहां भी मामला उल्टा है। होता वही है जो तीसरी फिल्म बनने के लिए जरूरी है। मॉरल ऑफ द स्टोरी इज, कोई स्टोरी नहीं है और भूल कर भी दिमाग मत लगाइएगा।

मुझे क्या दिक्कत है
दरअसल 'दबंग', 'भेजा फ्राई' (ये भी एक फ्रेंच फिल्म से प्रेरित है), 'दो दूनी चार' और 'थ्री ईडियट्स' जैसी फिल्मों में वो सब है जो 'डबल धमाल' बनाने वालों ने बस कमर्शियली बनाना चाहा, पर बना नहीं पाए। ये फिल्में मेहनत से लिखी गई थी, कुछ चीजों को छोड़ दें तो हेल्दी और फ्रैश मनोरंजन वाली थी। 'डबल धमाल' में बासीपन बहुत ज्यादा है और मौलिकता यानी ऑरिजिनेलिटी न के बराबर। हम फिल्म में बाटा भाई बने सतीश कौशिक को देखते हैं। उनके एक्सेंट, हाव-भाव, लहजे और रोल को हू-ब-हू डेविड धवन की 1997 में आई कॉमेडी 'दीवाना मस्ताना' के किरदार पप्पू पेजर से उठाया गया है। राजू श्रीवास्तव के 'भाई आया बाबागिरी के धंधे में' गैग को इसमें बिल्कुल कॉपी कर लिया गया है, जो वह टीवी के हालिया पहले स्टेंडअप कॉमेडी शो 'द ग्रेट इंडियन लाफ्टर चैलेंज' में चार-पांच साल पहले कर चुके हैं। चलिए ये भी माफ। अब साथ-साथ चल रही है वल्गर कॉमेडी, डबल मीनिंग डायलॉग्स, रिपीटेशन, शोर, सुने-सुनाए वन लाइनर और ऐसे पंच जो पांच रुपए में फुटपाथ किनारे मिलने वाली चुटकुले की किताब में पिछले बीस साल से लिखे-पढ़े जा रहे हैं। जमीन से क्रूड ऑयल निकलने वाला जो सीन है वो हंदी फिल्मों में आधा दर्जन बार तो यूज हो ही चुका है। मसलन, 1986 में आई जीनत अमान स्टारर 'बात बन जाए' जिसमें संजीव कुमार के किरदार की जमीन से क्रूड ऑयल का फव्वारा फूट पड़ता है।

स्क्रिप्ट लिखने वालों की सीमा
फिल्म में सबसे बुरी और कमजोर कड़ी है स्क्रिप्ट राइटर तुषार हीरानंदानी और डायलॉग राइटर राशिद साजिद। 'धमाल' में कम से कम असरानी, विजय राज, टीकू तलसानिया और संजय मिश्रा थे और कहानी में मिस्टर बीननुमा ह्यूमन कॉमेडी वाला पहलू था। इस सीक्वल में तो ले-देकर सात-आठ बेरंग किरदार हैं। रीतेश, अरशद, आशीष और जावेद जाफरी अपने एक्सप्रेशन और एक्टिंग में बेइंतहा कोशिशें झोंकते नजर आते हैं, पर हर बार हंसी मुंह से निकलकर हवा में ही राख बनकर खत्म हो जाती है। आप किसी सीन को रिवाइंड करके कभी हंसना चाहें तो भूल ही जाइए। इसका मतलब ये है कि कॉमेडी फिल्म के साथ ये सबसे बड़ी ट्रेजेडी है। स्क्रिप्ट में मौजूदा वक्त की फिल्मों के रेफरेंस कूट-कूटकर डाले गए हैं।
ज्यादातर तो इनका मखौल उड़ाया गया है। इनमें दबंग, डेल्ही बेली, थ्री ईडियट्स,रंग दे बसंती, पीपली लाइव, कौन बनेगा करोड़पति, बच्चन साहब, प्रोमो, फिल्म डिवीजन, मकाऊ, वंस अपऑन अ टाइम इन मुंबई, बारबरा मोरी, तारे जमीं पर और गुजारिश के रेफरेंस देखे जा सकते हैं। इसके अलावा फिरोज खान, अमिताभ बच्चन, शाहरुख, धर्मेंद्र, शत्रुघ्न सिन्हा और गुजरे जमाने के विलेन जीवन की मिमिक्री पूरी मूवी के दौरान चलती रहती है।

ऐसा लगता है
- चल कुडि़ए नी चल चल मेरे नाल... गाने की कोरियोग्रफी बड़ी ढीली है। इसमें कुछ और ढिलाई जोड़ देते हैं संजय दत्त, जिनका अकड़ा-फूला हुआ शरीर और धंसा हुआ गला देखने में बोझिल सा लगता है।
- बाटा भाई बने सतीश कौशिक बहुत दिन बाद ऐसी कॉमेडी में दिखे, पर उनकी तेज हरकतों और करंट मारती एक्टिंग में अब धीमापन आ गया है। शायद, उसे सही से एंजॉय करने के लिए फिर से 'दीवाना मस्ताना' की डीवीडी की ओर लौटना पड़ेगा।
- निर्देशक इंद्र कुमार 'दिल', 'बेटा', 'इश्क' और 'मन' बनाकर जितना ऊपर उठे उतना ही नीचे गिरते गए 'डैडी कूल', 'प्यारे मोहन' और 'डबल धमाल' जैसी फिल्मों से।
- वक्त आ गया है कि चश्म-ए-बद्दूर, प्रतिज्ञा (1975), जाने भी दो यारों, गोपी (1970), राम और श्याम, चुपके-चुपके, राजा बाबू, साजन चले ससुराल और चलती का नाम गाड़ी (1958) जैसी ढेर सारी दूसरी फिल्मों को जमा कर लें, क्योंकि आगामी कॉमेडीज पर से विश्वास कुछ उठता जा रहा है। ये हंसाती जरूर है, पर तीन घंटे बाद हम खुद को भूखा और टेंशन से भरा हुआ पाते हैं।

आखिर में
अगर इस कॉमेडी में कोई एक बात है जो ध्यान जुटाती है और खुश करती है तो वो है एक्टर के और कैरेक्टर के तौर पर जावेद जाफरी की ईमानदारी। फिल्म में सबसे ज्यादा हंसी आती है उन्हीं की बातों पर। अपनी कॉमिक टाइमिंग और डांस स्टेप्स में वो पूरे नंबर ले जाते हैं। बहुत बार वह एक्टिंग में अपने पिता जगदीप की याद दिलाते हैं। वेरिएशन के मामले में नंबर ले जाते हैं रितेश देशमुख।
गजेंद्र सिंह भाटी

Friday, June 10, 2011

ब्लूडी गुड! खान फैमिली

फिल्मः वेस्ट इज वेस्ट
डायरेक्टरः एंडी डिमोनी
राइटरः अयूब खान-दीन
कास्टः ओम पुरी, अकिब खान, लिंडा बैसेट, विजय राज, इला अरुण, राज भंसाली, एमिल मारवाह, नदीम सावल्हा,लेस्ली निकोल
स्टारः तीन 3.0
कहानी कहने के तरीके में 'ईस्ट इज ईस्ट’ में एक नॉवेल जैसा रोमांच, एक टेंशन हर मोड़ पर रहती है कि अब क्या होगा। इस टेंस-फैमिली ड्रामा के उलट 'वेस्ट इज वेस्ट’ किसी पुरानी खुद को एक्सप्लोर करने वाली अच्छी कहानी जैसी लगती है। सैलफर्ड के हरदम गीले रहने वाले आसमान और मुहल्ले को छोड़कर इस फिल्म में हम पहुंचते हैं धूल भरे पाकिस्तान में। जो पेस पसंद करने वाले दर्शक हैं उन्हें कहीं-कहीं फिल्म धीमी लगेगी। मगर मुझे अच्छी लगी। साफ-सुथरी, समझ आने वाली, चेहरे पर चुटीली हंसी ले आने वाली और टेंशन फ्री। पर्याप्त फिल्मी एंटरटेनमेंट, पर्याप्त स्टोरी सेंस। हर तरह का सिनेमा पसंद करने वाले इसे देखें और फैमिली ऑडियंस भी ट्राई करें। ब्लैंक होकर दोस्तों के साथ जाएंगे तो मजा आएगा।

खान कहानी: 'ईस्ट इज ईस्ट’ के चार साल बाद 1975 का सैलफर्ड, इंग्लैंड। पिछली मूवी में जहां जॉर्ज खान (ओम पुरी, दूसरा नाम जहांगीर खान) और वाइफ एला (लिंडा बैसेट) का घर सात बच्चों से भरा था, वहीं अब घर में सिर्फ सबसे छोटा बेटा साजिद (अकिब खान) ही दिखता हैं। 15 साल का साजिद पूरी तरह ब्रिटिश है पर स्कूल में लड़के 'पाकी’ कहकर चिढ़ाते हैं। घर पर पिता उसे सच्चा मुसलमान और पाकिस्तानी होते देखना चाहता है। उसके मन में यही पहचान का गुस्सा और कन्फ्यूजन है। स्कूल से आती शिकायतों और उसके बुरे बर्ताव का इलाज जॉर्ज को यही लगता है कि अब अपने असली घर यानी पाकिस्तान लौट चला जाए। बड़े बेटे मुनीर (एमिल मारवा) को तो जॉर्ज पहले ही अपनी पहली बीवी बशीरा (इला अरुण) के पास पाकिस्तान भेज चुका है। फिल्म की कहानी तो इतनी ही जानिए। आगे तो साजिद की जर्नी है। वह पाकिस्तान आने के बाद अपने पिता, अपनी पहचान और अपने अंदर के इंसान को बेहतर तरीके से जान पाता है। इसमें उसकी मदद करते हैं पीर नसीम (नदीम सावलहा) और हमउम्र दोस्त जायद (राज भंसाली)। इन दोनों की एक्टिंग बड़ी मिस्टीरियस और अच्छी लगी। इस फिल्म का अंत ठीक उसी सीन पर होता है, जिस पर 'ईस्ट इज ईस्ट’ खत्म हुई थी।

किरदार क्या करते हैं!: खान साहब का एक्सेंट फिल्म को 'ईस्ट इज ईस्ट’ के बिल्कुल बाद से जारी रखता है। जब ओम पुरी बास्टर्ड को 'बास्टर’ कहते हैं, हर लाइन में 'ब्लूडी’ (ब्लडी) शब्द का इस्तेमाल करते हैं और 30 साल लंकाशायर, इंग्लैंड में रहने के बाद भी हर वाक्य में से वर्ब खा जाते हैं तो ब्रिटेन में रह रहे उस जमाने के सच्चे एशियन लगते हैं। ...और पाकिस्तान में हल चलाने के बाद अपने हाथों पर उगे छालों की दवाई ढंढते हुए हमारी ट्रेडमार्क मां की गाली बोलते हैं तो पूरे पाकी-हिंदुस्तानी लगते हैं। अकिब ने साजिद के रोल को अपनी तरफ से एक आइडेंटिटी दी है, जो कम उम्र में समझ भरी एक्टिंग की निशानी है। सैलफर्ड में गुस्सा करते हुए और पिता से पिटते हुए अकिब अलग मुंह बनाते हैं और पाकिस्तान पहुंचने के बाद बिल्कुल अलग। उनका चौंकने का अंदाज फिल्म में स्पेशल है, देखते ही हंसी फूट पड़ती है। इला अरुण नीव का पत्थर हैं। 30 साल बाद विदेश से लौटे अपने पति को देखने के बाद एक औरत कैसे रिएक्ट करती है, वो इला से सीखना चाहिए। इस सीक्वेंस के दौरान 'पूरब और पश्चिम’ में निरुपा रॉय और प्राण के कई साल बाद मिलने के सीक्वेंस को याद कर सकते हैं।

ईस्ट और वेस्ट फिल्मों में: इस रंग-रूप वाली कई फिल्में हमारे सामने है। 'मॉनसून वेडिंग’, 'नेमसेक’, 'ब्रिकलेन’, 'ईस्ट इज ईस्ट’, 'द दार्जिलिंग लिमिटेड’ और कुछ हद तक 'आउटसोस्र्ड’। सब की सब रुचिकर। 'वेस्ट इज वेस्ट’ में साजिद की जो जर्नी है वही जर्नी 'द दार्जिलिंग लिमिटेड’ के पीटर, फ्रांसिस और जैक की है। बस पाकिस्तान हिंदुस्तान का फर्क है। इस फिल्म में ओमपुरी का कैरेक्टर 'ब्रिकलेन’ के सतीश कौशिक और 'नेमसेक’ में इरफान खान के किरदारों के करीब खड़ा है। हर मायने में नहीं, पर एशियाई पहचान और परदेस आने के बाद बदलते रिश्तों के लिहाज से। इन सब फिल्मों में एक समानता रेफरेंस की भी है। चूंकि 'वेस्ट इज वेस्ट’ एक फनी टेक ज्यादा है इसलिए इसके रविशंकर, गांधी, मोगली और रुडयार्ड किपलिंग के नॉवेल 'किम’ के रेफरेंस अलग लगते हैं, पर ये ऐसी मूवीज का अहम हिस्सा ही हैं।
आखिर में: फिल्म में आप जिस 15 साल के साजिद को देखते हैं, वो फिल्म के लेखक अयूब खान-दीन का असल किरदार है। 1970 में 13 साल के एक लड़के के तौर पर सैलफर्ड में अयूब ने जो जिंदगी बिताई, उसकी ही यादें 'ईस्ट इज ईस्ट’ और 'वेस्ट इज वेस्ट’ जैसी फिल्म बनी। अब तीसरी फिल्म पर काम चालू है।
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गजेंद्र सिंह भाटी

Thursday, June 9, 2011

कुछ बन गया तो भी ऐसे ही मिलूंगा और समय से मिलूंगाः प्रवेश राणा

गजेंद्र सिंह भाटी

इन मुलाकातों के साथ मुश्किलें ये हैं कि आपको इनको जहर मुंह लगे सवाल नहीं पूछने होते हैं। ये और बात है कि अपने कार्यक्रमों में ये खूब इमोशनल अत्याचार करते हैं, एक्स फैक्टर वाले बनते हैं, खुद को बिंदास कहते हैं। फिर होता ये है कि अगर चैनल के प्रोग्रामिंग हैड को आप एक ढंग का सवाल पूछ लो तो उन्हें चक्कर आने लगता है। यकीन मानिए, इस वक्त मैं खुद को अपराधी मानने लगा था। सोचा ये फील्ड छोड़ दूं, क्योंकि यहां सतही बातें हैं और सब उसमें राजी हैं, सार्थक को यहां जगह नहीं है। आइए, मोफत का मीठा खाइए, मुस्कराइए, चाशनी भरे सवाल करिए और चले जाइए। ये प्रारुप तो बड़ा डरावना लगता है। पर है भी तो यही। आखिर 'दादागिरी अगेंस्ट टैरेरिज्मः ग्लैमराइज्ड देशभक्ति (चार साल में कैप्टन-मेजर की रेंक लेकर भारतीय सेना छोड़ चुके लड़कों की मदद से)', 'इमोशनल अत्याचारः यूथ का रिश्ता सुधारों बीप बीप अभियान' और कई मिडिल फिंगर दिखाते कार्यक्रम आप ही ने तो बनाए हैं। आप इन प्रोग्राम की योजना बनाती हैं, इन्हें न्यायोचित ठहराती हैं, चैनल के करोड़ों रुपए इन तथाकथित भारत के युवाओं के प्रतिनिधि कार्यक्रमों पर खर्च करती हैं, तो एक सवाल नहीं संभलता। कमाल है। बातें बहुत हैं, होनी और भी ज्यादा चाहिए। फिलहाल तो इतने संकेतों को ही समझ जाइए। समझदार हैं।

खैर, मौका था प्रवेश राणा से मिलने का। सामूहिक सवालों में वो बिदक गए और टालने लगे। फिर अलग से जो नौ मिनट की बातें हुई, वो अलग रहीं। शुरू के तीन सवाल में उनके मन में मेरी इमेज कूल वाली नहीं थी, फिर चौथे सवाल तक सुविधाजनक महसूस करने लगे। जब बातचीत अच्छी होने को थी, तब खत्म हो गई। मॉडलिंग में आने के बाद बिग बॉस मिला, फिर टीवी के कई डांस रिएलिटी शोज, इमोशनल अत्याचार वगैरह में एंकरिंग की। अब इमोशनल अत्याचार के तीसरे मौसम के प्रस्तोता तो हैं ही, तिग्मांशु धूलिया की हैमलेट उपन्यास पर बनी एक फिल्म में भी काम कर रहे हैं। जमीन से जुड़े नौजवान हैं, पर मुंबई रहते-रहते कुछ-कुछ आसमानी होने लगे हैं।

1. एंकरिंग के दौरान के एक्सपीरियंस कैसे रहे। वेस्ट में इमोशनल अत्याचार का मूल प्रोग्रेम है चीटर्स, उसमें ऐसा हुआ कि एंकर पर एक बार किसी ने चाकू से हमला कर दिया था। अब तक आपके साथ भी ऐसा कुछ हुआ?
पता नहीं मेरे साथ तो कभी ऐसा हुआ नहीं। शायद मेरी कद-काठी देखकर कोई ऐसी कोशिश करता नहीं। हां, माहौल कई बार टेंस जरूर होता है, पर अभी तक तो हुआ नहीं आगे देखते हैं।

2. आपको नई मूवी मिल गई है?
नई नहीं पहली मिली है।

3. लेकिन सॉलिड मिली है...तो क्या तैयारी है?
बहुत अच्छा लगा और तैयारी काफी जोर-शोर से चल रही है। सेशंस होंगे। शूट स्टार्ट होने से पहले डायरेक्टर को समझना और अपने कैरेक्टर को समझना बहुत ज्यादा जरूरी है। उस पर बहुत काम होगा। डायरेक्टर तिग्मांशु के साथ बहुत समय बिताना भी जरूरी है। क्योंकि एक एक्टर तब तक अच्छा एक्टर नहीं है जब तक वो डायरेक्टर का एक्टर नहीं है। और होपफुली चंडीगढ़ में ही आएंगे, यहीं शूट होना है। आस-पास के इलाकों में ही, क्योंकि ब्रैंडस्मिथ मोशन पिक्चर्स के राहुल मित्रा जो प्रोड्यूसर हैं वो यहीं के ही हैं।

4. डायरेक्टर तिग्मांशु की आपने हासिल या कोई और फिल्म देखी है?
मैंने उनकी सारी मूवीज देखी हैं। हासिल, चरस, शागिर्द देखी है और आई फील वैरी लकी कि मुझे मौका दे रहे हैं वो और इतना भरोसा किया। और मैं निराश नहीं करूंगा।

5. बहुत करंट वाले डायरेक्टर हैं वो?
एकदम, फ्लैवर उनका अलग है। एंटरटेनिंग रियलिज्म दिखाते हैं। वो अलग जॉनर दिखाते हैं, वैसा जॉनर किसी और के पास है नहीं।

6. बहुत से फैशन डिजाइनर्स के लिए वॉक किया है आपने तो उनमें आपके फैवरेट्स कौन हैं?
मैन्स वियर का जहां तक सवाल है तो रोहित बल, अर्जुन खन्ना और नरेंद्र कुमार ये तीन मेरे फेवरेट डिजाइनर्स हैं।

7. एकदम ग्रामीण बैकग्राउंड से हैं, और अब बिल्कुल एक्ट्रीम मेट्रो कल्चर में हैं और प्रोग्रैम को होस्ट कर रहे हैं। दोनों जगहों के लोगों को देख चुके हैं तो इस बात को कैसे देखते हैं आप?
बहुत खुशकिस्मत हूं। मेरे पेरंट्स ने मेरी एजुकेशन बेस्ट ऑफ द बेस्ट इंस्टिट्यूट में करवाई है। पैदाइश मेरी गांव की है तो मुझे गांव की भी सब जानकारी है। मेरठ में पढ़ा हूं, इलाहाबाद में पढ़ा हूं, बरेली में पढ़ा हूं, मुरादाबाद से पढ़ा हूं। इतनी सारी जगहों से मेरी स्कूलिंग हुई है। फिर मैं दिल्ली में आ गया। दिल्ली में ग्रेजुएशन की रामजस कॉलेज से। वहां नॉर्थ-ईस्ट के, साउथ के, हिंदुस्तान के हर पार्ट के लोग मिले। बॉम्बे में मुझे चार साल हो गए हैं। तो मेरे ख्याल से जब आप इतनी सारी जगहों पर जाते हैं और इतने तरीके के लोगों से मिलते हैं तो एक्सपोजर इंसान को हो जाता है। फिर इतनी जगह जाना और नए लोगों से मिलना मुश्किल नहीं लगता। आप बहुत ही जल्दी किसी की साइकॉलजी को समझ जाते हैं।

8. इस शो इमोशनल अत्याचार में ऐसा मूमेंट आता है जब आप लॉयल्टी टेस्ट करवाने वाले को उसके चीटिंग करने वाले पार्टनर से मिलवाने ले जाते हो। तब माहौल बड़ा टेंस हो जाता होगा। एक एंकर के तौर पर आप बाहर से तो बड़े कूल नजर आते हो पर अंदर क्या चल रहा होता है?
यही चल रहा होता है कि यार चीटर निकल न जाए। बस रंगे हाथों पकड़ा जाए। क्योंकि वही तो क्लाइमैक्स होता है, उसी पर तो सबकुछ निर्भर करता है। क्योंकि जो वो कर रहा है वो कैमरे पर न पकड़ा जाए तो जो लॉयल्टी करवा रहा है उसको शांति नहीं मिलती है।

9. लॉयल्टी टेस्ट में फेल होने वाले के व्यवहार को लेकर आशंका नहीं होती कि वो कैसे व्यवहार करेगा। कहीं हिंसक तो नहीं हो उठेगा?
देखिए वॉयलेंस होता है तो उसको उसी लैवल में कंट्रोल करने की कोशिश करते हैं जिस लैवल तक किया जा सकता है। पर जहां प्यार होता है वहां रिएक्शन होते हैं और इंटेंस प्यार के रिएक्शन भी इंटेंस होते हैं दोनों तरफ से। तो चीटर को रंगे हाथों पकड़ा सबसे जरूरी है, मेरे दिमाग में बस यही चल रहा होता है।

10. शो को हम पूरा आधे घंटे में देख लेते हैं, पर जो क्लाइमैक्स वाला दिन होता है वो असल में कितने घंटे चलता है?
छह घंटे। पूरा शूट छह घंटे तक चलता है। क्योंकि जो ट्रैक कर रहे होते हैं और जो अंडरकवर एजेंट होते हैं, उनके काम के प्रोसेस में इतना वक्त लग जाता है।

11. अभी इस वक्त बॉलीवुड में कौन से डायरेक्टर्स सबसे ज्यादा पसंद हैं?
मैं तो बहुत बड़ा फैन हूं राजकुमार हीरानी का। मुझे व्यक्तिगत तौर पर लगता है कि हिंदी सिनेमा को हिंदी सिनेमा कहलवाने का काम अगर किसी ने किया है तो राजू हीरानी ने वरना तो सब बॉलीवुड कहते थे। ऑरिजिनल स्क्रिप्ट्स जिस हिसाब से बन रही है उसमें विशाल भारद्वाज, अनुराग कश्यप, दिबाकर बैनर्जी या रोहित शेट्टी और इम्तियाज अली बहुत पसंद हैं।

12. नए टेलेंटेड हमउम्र आए हैं जैसे कि एक हैं रणवीर सिंह, और पुराने एक्टर जो अभी भी काम कर रहे हैं उनमें आप किसके काम की तारीफ करते हैं (अमरीश पुरी को छोड़कर)?
(अमरीश पुरी का नाम सुनते ही हंसने लगते हैं) मैं धरम जी का बहुत बड़ा फैन हूं और नाना पाटेकर का भी। अजय देवगन के काम को आई लव अजय। सलमान भी है और अमित जी तो हैं ही। रितिक भी हैं, एक स्टार सन होने के बावजूद उन्होंने खुद को प्रूव किया है और बहुत ऊंचाइयों तक पहुंचाया है।

13. जैसे ही आप बंबई से बाहर निकल कर ऐसे इलाकों में आने लगते हैं वैसे ही इस शो को लेकर सोशल कंसर्न के सवाल बहुत आने लगते हैं, उसे सुनकर कभी इरीटेट होते हैं कि क्या हर वक्त सोसायटी और मैसेज की बातें..?
नहीं, देखिए बात ऐसी है कि मैं इरीटेट नहीं होता हूं। प्रॉब्लम है अंडरस्टैंडिंग की। एक छोटी सी प्रॉब्लम है कि अगर कोई आपसे ज्यादा पढ़ा लिखा है, जिसने किताबें आपसे ज्यादा पढ़ी हो या आप उससे कम पढ़े-लिखे हो, अगर वो कोई बात कहता है तो आप उसे मान लेंगे। लेकिन अपने नजरिए से हर किसी को सोचना चाहिए। कि मेरे लिए क्या है। और कोई भी चीज हम थोड़ी अलग बना दें ना तो कहने लगते हैं अरे सोसायटी का क्या। अरे, लोग देख रहे हैं उसको, उनके पास रिमोट है वो चेंज कर देंगे। लोग देखेंगे भी तभी ना जब उनका इंट्रेस्ट होगा उस चीज में। और अगर उनको एंटी-सोशल लग रहा है, उनके मां-बाप को लग रहा है कि उनके बच्चों पर गलत असर पड़ रहा है, यूथ को लग रहा है कि मेरे रिलेशन पर फर्क पड़ रहा है तो वो चैनल चेंज कर देंगे। ऐसे बहुत सारे शोज बनते हैं लोग उन्हें तो नहीं देखते हैं।

14. स्टार बनेंगे तो ऐसे ही मिलेंगे कि बदल जाएंगे। एटिट्यूड आ जाएगा?
अरे यार, मैं तो ऐसे ही मिलूंगा। मैं तो ऐसा ही हूं। स्कूल टाइम से ही, कॉलेज टाइम से ही। ऐसे ही मिलूंगा और समय से मिलूंगा इस बात की गारंटी है।

Saturday, June 4, 2011

इतनी ढिंक चिका नहीं रेडी


फिल्मः रेडी
डायरेक्टरः अनीस बज़्मी
कास्टः सलमान खान, असिन थोट्टूकमल, परेश रावल, मोहित बाघेल, शरत सक्सेना, महेश मांजरेकर, पुनीत इस्सर, मनोज जोशी, मनोज पावा, आर्य बब्बर, अखिलेंद्र मिश्र, सुदेश लहरी, हेमंत पांडे, निकितेन धीर, मिथिलेश चतुर्वेदी, इवा ग्रोवर
स्टारः ढाई स्टार

साउथ की मूवीज के फॉर्म्युला दर्शकों के लिए ढेर सारा एंटरटेनमेंट (अच्छा कम, बुरा ज्यादा) लाते हैं और प्रॉड्यूसर्स के लि पैसों की खान। दूसरे कारण से हमारी 'रेडी’ बनी। लगता है डायरेक्टर अनीस बज्मी को अब 'फ्रैश’ शब्द से कोई गाव नहीं रहा है। हां, इंटरवल के पांच मिनट बाद मूवी कुछ वक्त के लिए बड़ी इंट्रेस्टिंग जरूर होती है। फिर आखिर तक ठीक-ठाक ही रहती है। ओवरऑल ये फिल्म उस खाने की तरह है जो न स्वास्थ्य देता है और न ही स्वाद। फिल्म के स्क्रिप्ट कंसल्टेंट मशहूर राइटर सलीम खान रहे हैं, पर एक-दो सीन छोड़कर कहीं ऐसा लगता नहीं है। मैं तारीफ करूंगा छोटे स्टैंडअप कमेडियन मोहित बाघेल की जो छोटे अमर चौधरी के रोल में हैं। उनके शुरुआती दो सीन सबसे ज्यादा हंसाने वाले हैं। सुदेश लहरी भी कुछ ताजगी लाते हैं। संभव हो तो आप 2008 में आई तेलुगु मूवी 'रेडी’ देख लें। टाइम पास के लिए कोई बेहतर ऑप्शन न हो तो फैमिली के साथ जा सकते हैं। डबल मीनिंग कंटेंट आपकी टेंशन।

प्रेम की कहानी
मानें तो कहानी है नहीं तो फटी स्क्रिप्ट में इधर-उधर से बीनकर लगाए पैबंद। प्रेम कपूर (सलमान खान) फिल्म का हीरो है। काम क्या करता है पता नहीं। इतना मालूम है कि रईस है। घर में मां और पिता (महेश मांजरेकर) हैं, दो चाचा हैं (मनोज जोशी, मनोज पावा) और दो चाचियां हैं। दोस्तों की हेल्प करता है और टेढ़ा है। फैमिली वाले चाहते हैं कि सुधर जाए। एक दिन संजना (असिन) उसकी जिंदगी में आती है। जाहिर है प्यार हो जाता है। पर दिक्कत हैं संजना के दो डॉन मामा (शरत सक्सेना, अखिलेंद्र मिश्र) जो एक दूसरे से नफरत करते हैं, और संजना की शादी उसकी जायदाद के लिए अपने-अपने सालों से करवाना चाहते हैं। कहानी सिंपल और जानी-पहचानी है। कुछ नया नहीं है, बस उसका ट्रीटमेंट कैसा हो यही बड़ा सवाल रहता है।

कुछ पोस्टमॉर्टम
फिल्म में कई घिसे-पिटे कैरेक्टर हैं, लाइन्स हैं और हालात हैं। एक क्लीशे है महेश मांजरेकर का कैरेक्टर। यहां वैसे ही हकलाते हैं जैसे पहले अपनी कई मूवीज में कर चुके हैं। राहत बस इतनी है कि महेश अपनी चतुराई से इस हकलाहट को अलग बनाकर चलते हैं। जैसा दर्जनों बार हुआ है, सलमान की एंट्री कैरेक्टर ढीला है... जैसे एक गाने से होती है। गाने के डबल मीनिंग मतलब को उचित ठहराने के लिए फेसबुक, इशक, शीला और मुन्नी जैसे कॉमन वर्ड डाले गए हैं। एक और टोटका 'रेडी’ में किया गया है और वो है गेस्ट अपीयरेंस में ढेर सारे एक्टर्स का आना। फिल्म की शुरू में कंगना रनाउत, अरबाज खान, अजय देवगन, संजय दत्त और जरीन खान सब नजर आते हैं। गलतफहमी होती है कि फिल्म में उनका मजबूत रोल है, पर अगले ही पल से वो सब नजर ही नहीं आते। इतने गेस्ट अपीयरेंस, प्रेम का बड़ा परिवार, संजना का बड़ा परिवार और कइयों गुंडे। ये लोग इतने ज्यादा हैं कि शुरू में फिल्म को कुछ बिखेर सा देते हैं। जैसे किसी को, कहीं भी, कुछ भी बना दिया गया हो। इंटरवल की जगह 'पी ब्रेक’ लिखा आता है और लोगो पर चाय की गिलास छपी होती है। मल्टीप्लेक्स और सिंगल स्क्रीन दोनों के दर्शकों का इस बदलाव में खास ध्यान रखा गया है। कई शॉर्टकट लिए गए हैं और बहुत से डायलॉग्स और उनकी भाषा निचले दर्जे की रखी गई है। ढिंक चिका... और मेरी अदा भी क्या कमाल कर गई... दोनों सिचुएशन के हिसाब से काफी प्रभावी लगते हैं।

मसलन...
'मैं कुत्ता हूं, ये कुतिया है, कि आया मौसम प्यार का।‘ इसे एक इमोशनल सीन होना था जैसा कि 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ में फरीदा जलाल और शाहरुख के कैरेक्टर के बीच होता है। वह कहती है कि सिमरन के बाबूजी इस शादी के लिए कभी राजी नहीं होंगे। वैसे ही यहां संजना की मामी कहती है कि उसके दोनों मामा शादी के लिए राजी नहीं होंगे। तो पहले सीन में आप शाहरुख का इमोशनल और इज्जतदार जवाब जानते ही हैं और यहां है ये कुत्ता-कुतिया जवाब। यहां तक कि सलमान की ही एक मूवी के अच्छे गाने ...कि आया मौसम प्यार का को भी नहीं ब शा गया। ऐसे कई आइडिया मूवी की स्क्रिप्ट में लगाए गए हैं जो फनी नहीं, स्टूपिड लगते हैं।
गजेंद्र सिंह भाटी

Wednesday, June 1, 2011

क्यों फॉलिंग डाउन अच्छी लगती है...

साउथ की मूवीज लोकतांत्रिक और संवैधानिक भले ही नहीं होती। पर वो कमजोर की मां बनना स्वीकार करती हैं। उस कमजोर की जो सड़कों पर चार पहिए वाले बड़ों के शासन में पल-पल बेइज्जत किया जाता है, जो आक्रोश के लहानिया भीखू (ओम पुरी) की तरह गला होते हुए भी गूंगा बना दिया गया है और उसकी मजदूरी करती जवान बहन की कीमत वहशियों की नजर में बस एक बिस्किट का लालच है। हर जायज बात में सवाल करने पर उसे गालियां और जलालत ही मिलती है। वह गुलाल के रणसा की तरह कोई फिल्मी किरदार भी नहीं है, जो पलटकर इतना कह सके कि "ये सवाल से सबकी फटती क्यों है, कोई जवाब नहीं है इसलिए?" बच्चे-बीवी उम्मीद लगाए बैठे रहते हैं और वह रोज शरीर और इरादों से कमजोर होता चला जाता है। वो शूल का समर प्रताप और यशवंत का यशवंत लोहार भी नहीं है कि क्षरण होते हुए भी व्यवस्था से अपना बदला आखिर में ले ही ले। उसकी जिंदगी में दुख के आने के तरीकों के अलावा कुछ भी ड्रमैटिक नहीं है। इसीलिए वह न तो किसी डीयो लगाए छरहरे मॉडल की ब्यूटी और इंग्लिश बातों के आगे अड़ सकता है और न ही सख्त शरीर वाले दर्जनों भीमकाय गुंडों से रोबॉट के रजनी रोबॉट चिट्टी की तरह भिड़ सकता है। सिर पर किसी नेता का नाम या ताकत भी नहीं है... है तो बस शरीर की कुछ अति-औसत सूखी बोटियां। समाज की गोरे रंग की सुंदर इमेज वाली जिंदगी एक-एक पैसे के लिए उसे 46.7 डिग्री तले झुलसाती है। यहां झुलसकर भी उसे जितना मिलता है उतने में शायद दिल्ली अब उसे एक सेर दूध भी न दे।

इस कमजोर की कमजोरी का अनुपात और चेहरा भले ही अलग लगे पर मूलतः साउथ की, हिंदी की, हॉलीवुड की और दूसरे देशों की मसालेदार या यथार्थ से भागने का अफीम कही जाने वाली फिल्मों से उसका रिश्ता सबसे करीबी है। जब पूरी व्यवस्था में उसे लगता है कि कुछ नहीं बदलने वाला और जिस संविधान और कानून की दुहाई दी जाती है उसका कोई नियुक्त प्रतिनिधि उसे जवाब देने को तैनात नहीं है तो उसके कांधे पर हाथ रखने आती हैं मार्टिन स्कॉरसेजी की फिल्म टैक्सी ड्राईवर और जोएल शूमाकर की फॉलिंग डाउन। एक ऐसी व्यवस्था जिसमें जिनके पास सबकुछ है, वो जिनके पास नहीं है उनके लिए चीजों के भाव तय करते हैं। फिर खुद उपभोग करने लगते हैं और दूर बैठे जिनके पास नहीं है उनसे कहते हैं कि "तुम्हारे पास नहीं है. हमारे पास तो है इसलिए तुम बस भुगतो।" इन दोनों फिल्मों के मूल तत्वों में से एक ये है। यहां से कह दिया जाता है कि "सोसायटी में एव्रीथिंग इज ऑलराइट। फिल्में हों तो सभ्य हों, एक लैवल वाली हों वरना न हों।" सभ्यता का पैमाना कहीं न कहीं बन जाते हैं मल्टीप्लेक्स और लैवलहीन होने का लैवल बन जाते हैं सिंगल स्क्रीन थियेटर।

...एक बार चंडीगढ़ के पीवीआर सिनेप्लेक्स में शो से दस मिनट लेट अंधेरे में अपनी सीट तलाशते एक लैवल वाले कस्टमर आए। वहां हाथ बांधे खड़े नीली वर्दी वाले (एम्पलॉयमेंट पाए) लड़के से कहने लगे, "वॉट इज दिस। डोन्ट यू हैव टॉर्च और समथिंग। वॉट इज दिस, इज दिस अ मल्टीप्लेक्स और सम स्टूपिड प्लेस।" उनका अंग्रेजी रुबाब देखता रहा। बीच-बीच में उनके अंग्रेजी डायलॉग आते रहे। शो छूटा। संयोग से लिफ्ट में वो मेरे सामने ही थे। लिफ्ट नीचे जा रही थी। बोले, "यहां तो कुछ है ही नहीं। बड़ी पिछड़ी जगह है। एसी भी ठीक से नहीं चलते। मैं बाहर ही रहता हूं, यहां तो कुछ भी नहीं है।" मैं अचरज से सुन रहा था और उसका भ्रम यूं ही कायम रहे इसलिए धीमी मुस्कान के साथ सिर सहमति में हिला रहा था। लिफ्ट से निकले और पिंड छूटा। पर सवाल रह गया कि आखिर ऐसे दर्शक.. सॉरी ऑडियंस आखिर चांद से आगे भी कुछ चाहते हैं क्या।

मैं अब भी पिछले साल की श्रेष्ठ फिल्म दो दूनी चार को ही मान रहा हूं, पर कुछ-कुछ दो दूनी चार को छोड़ दें तो सड़क पर चलने वालों की मां तो दबंग ही बनी। ये मैं दबंग की दर्जनों खामियों को इस दौरान किनारे रखते हुए कह रहा हूं। उसे व्यक्तिगत तौर पर खास नहीं बता रहा हूं। चुलबुल पांडे नाटकीय ज्यादा हैं पर देखने वालों को पसंद आए। हालांकि रॉबिन हुड पांडे (दबंग), संजय सिंघानिया (गजनी) और राधे (वॉन्टेड) ने कहानी और इमोशंस की आड़ में किए तो अपराध ही न। ये अपराधी हैं पर ज्यादातर दर्शकों के लिए इनके व्यक्तिगत प्रतिशोध तीन घंटे तक बेहद जरूरी भी रहते हैं। संजय सिंघानिया की सदाचारी प्रेमिका कल्पना का निर्मम वध मुझ कमजोर दर्शक के सामने ही होता है। उस सुंदर, मासूम, निर्मल, कमजोरों की मदद करने वाली लड़की की पीठ में चाकू घोंप दिया गया है। घर में हत्यारे छिपे हैं। ये वो मोड़ है जहां मैं संजय के साथ-साथ बेसब्री से इंतजार कर रहा हूं कि विदेश से लौटने के बाद वह अपने बारे में कल्पना को बताएगा और दोनों खुशी-खुशी अपनी प्यार भरी जिंदगी बिताएंगे। पर अब कांच सी चिकनी सफेद फ्लोर टाइल्स पर गजनी लोहे का विकृत सरिया पटक रहा है। इसकी आवाज खौफनाक है। दिल बींध रहा है। ये सारे भाव भीतर आखिर क्यों पनप रहे हैं? न सिर्फ पनप रहे हैं, बल्कि मैं इस संकट की घड़ी में संजय सिंघानिया के साथ हूं। उससे ज्यादा मैं ये चाहता हूं कि वो शॉर्ट टर्म मैमोरी लॉस (एंटेरोग्रेड एमनीज़िया) में रहते हुए ही चुनौती पूरी करे और पूरी इंटैंसिटी से गजनी का नाश कर दे।

चाहे वैध हो या अवैध पर अनिल मट्टू के निर्देशन में बनी फिल्म यशवंत का यशवंत लोहार (नाना पाटेकर) थियेटर में जाने वाले उस कमजोर को अपना सा लगता है। क्योंकि थियेटर से बाहर की क्रूर दुनिया से जो लड़ा मैं कमजोर दर्शक नहीं लड़ (जीत) सकता, उसे इंस्पेक्टर लोहार जीतता है। मुझ कमजोर दर्शक के सामने होली के दिन कोई मंत्री का साहबजादा किसी लड़की का स्कर्ट खींचकर चला जाए, तो मैं कुछ नहीं कर पाऊंगा। अपनी बेबसी पर ज्यादा से ज्यादा दो आंसू गिरा दूंगा। पर मेरा प्रतिनिधि इंस्पेक्टर लोहार उस मंत्री के लड़के को पकड़कर जीप में डाल देता है। मैं खुश होता हूं। थाने पहुंचते हैं तो क्या देखते हैं कि वह रईसजादा इंस्पेक्टर की कुर्सी पर बैठा है और वो भी मेज पर पैर रखकर। मुझे गुस्सा आता है, पर मैं बेबस हूं। मेरी शक्तियां सीमित से भी सीमित हैं। तभी लोहार आता है, एक मोटा सा डंडा हाथ में लेता है और कसकर उस कमीने लड़के को मारना शुरू करता है। ठीक वैसे ही जैसे मैं करना चाहता था। हां, हां मुझे पता है कि ये अनडेमोक्रेटिक है, पर तीन घंटे के लिए तो मुझे कम-स-कम ये ज्ञान मत ही बांटो। जब मैं बेबस होता हूं थियेटर से बाहर तब तो तुम मुझे कुछ सिखाने-बताने नहीं आते और जब मैं परदे के सामने मजबूत होने लगता हूं तो तुम कानून-कायदा ले आते हो। मैं कमजोर दर्शक जिंदगी की नाइंसाफी के प्रति गंभीर हो जाना चाहता हूं। यहां भी लोहार मेरा प्रतिनिधि बनता है। उस दृश्य में जब लोहार की बीवी रागिनी (मधु) अपनी पति की हो जाना चाहती है तो सीने पर ठंडा लोहा और जीभ पर तेजाब रखकर लोहार शायद यूं ही कुछ बोलता है ... "खेलो। खेलो। तुम खेलो मेरे इस शरीर से खेलो। ये जिस्म तुम्हारा है, तुम्हें इसकी भूख है, पर मेरी आत्मा यहां नहीं है। वो वहां है, जहां किसी को अभी-अभी मार दिया गया है।"

चोर रास्ते से हमारे समाज में आई पर्सनैलिटी डिवेलपमेंट और पॉजिटिव थिंकिंग की बाहरी किताबें हमें सिखाने लगी हैं कि कुछ भी बुरा न देखो। आप अपने हिस्से को देखकर खुश हो जाओ। अपनी सोचो। पॉजिटिव सोचो पर स्वार्थी बनो। समाज गया तेल लेने। पर उन किताबों ने ये नहीं बताया कि समाज ही नहीं रहेगा तो हम कहां से रहेंगे। इसके ठीक विपरीत मौजूद है यशवंत लोहार। जो हर क्षण समाज और व्यवस्था में फैली गंदगी के अवसाद से ग्रस्त रहता है। राजनीति में, प्रशासन में, घरों में, पढ़ाई के संस्थानों में, चौपालों में, गलियों में, आप में और हम में भ्रष्ट हो जाने को सामूहिक रूप से स्वीकार कर लिए जाने से जो बहुत नाराज रहता है। पूंजी के वल्गर होते नाच से उसके तन-बदन में आग लगी हुई है। इसी लिए वो तेजाबी हो गया है। अब लौटते हैं टैक्सी ड्राईवर और फॉलिंग डाउन की ओर। फिल्मी कथ्य और समाजी असर दोनों ही लिहाज से टैक्सी ड्राईवर के ट्रैविस (रॉबर्ट डी नीरो) का कोई मुकाबला नहीं है। मैनहैटन के ऊंचे नाम और चमक-दमक तले ट्रैविस सबसे करीब है शहर की परेशान करने वाली असलियत के। वही जो यशवंत लोहार को परेशान करती है, वही जो फॉलिंग डाउन के विलियम फॉस्टर (माइकल डगलस) को उत्तेजित बनाए हुए है। ट्रैविस उनींदा है। लगातार टैक्सी चला रहा है। इसमें चढ़ने वालों को देखता है। पीछे की सीट पर न जाने क्या-क्या होता रहता है। जब वो उतरते हैं तो सीट की सफाई करते हुए इस पूर्व मरीन के दिमाग में शहर की बदसूरत तस्वीर और गाढ़ी होती जाती है। उसे शहर के वेश्यालय परेशान करते हैं। एक लड़की में उसे भलाई नजर आती है। वह आकर्षित होता है, खुद को पॉजिटिव बनाता है, पर यहां भी उसकी नजर में उसे धोखा ही मिलता है। चुनाव होने को हैं और सभी राजनेताओं के बयान उसे खोखले और धोखा देने वाले लगते हैं। कहीं व्यवस्था नहीं है। अमेरिका में राजहत्याओं या पॉलिटिकल एसेसिनेशन्स का ज्यादातर वास्ता ट्रैविस जैसे किरदारों से ही रहा है। जैसा हमारे यहां नाथूराम गोडसे का था। हां, उसका रोष विचारधारापरक और साम्प्रदायिक ज्यादा था, यहां ट्रैविस और विलियम सिस्टम से नाखुश हैं। जैसे कि मेरा प्रतिनिधि यशवंत लोहार है और सड़कों पर चलने वाले हम सब हैं।

विलियम फॉस्टर और फॉलिंग डाउन का जिक्र करना यहां बहुत जरूरी है। फिल्मों में जिस एंटरटेनमेंट की बात की जाती है वो टैक्सी ड्राईवर से ज्यादा फॉलिंग डाउन में है। विलियम के साथ एलएपीडी सार्जेंट प्रेंडरगास्ट (रॉबर्ट डूवॉल) की कहानी चलती है। विलियम खतरनाक है और हिंसक, वहीं जिदंगी भर डेस्क के पीछे ही बैठे प्रेंडरगास्ट में अहिंसा का भाव है। हथियार चलाने का सरकारी लाइसेंस होते हुए भी पुलिस के अपने पेशे में उसने गोली चलाने को जिंदगी के अंतिम विकल्प के तौर पर चुन रखा है। बुनियादी तौर पर यशवंत लोहार, विलियम फॉस्टर, ट्रैविस, संजय सिंघानिया, राधे और चुलबुल पांडे से बिल्कुल अलग। नैतिक चुनाव को छोड़कर आगे चलें। डिफेंस एजेंसी से निकाल दिए गए विलियम का अपनी पत्नी बेथ से अलगाव हो गया है। एक छोटी बच्ची है एडेली जिससे वो मिलने को तरस रहा है और उसी से मिलने निकला है। लॉस एंजेल्स में इस दिन विलियम पूरे सिस्टम को आड़े हाथों लेता है, जैसे कभी-कभी हमारा भी करने का मन करता है। गाड़ी खराब हो गई है। एसी नहीं चल रहा। सड़क के बीचों-बीच छोटी सी बात पर लोग बर्बर हो रहे हैं। फोन पर बात करने के लिए एक परचून की अमेरिकी दुकान से वह छुट्टे मांगता है। दुकान का कोरियाई मालिक कहता है कुछ सामान खरीदो तो छुट्टे दूंगा। ठीक वैसे ही जैसे मुझे दवाई, दूध, केंटीन और दूसरी शॉप्स पर छुट्टे नहीं दिए जाते, टॉफी दे दी जाती है। पूछता हूं क्या ये टॉफी लौटाते वक्त भी करंसी का काम करेगी तो जवाब में मुझे गैर-व्यावहारिक घोषित कर दिया जाता है। इस घड़ी में उस कोरियाई दुकानदार के सामने यशवंत लोहार होता तो भी वही करता जो आज विलियम ने किया। ऑफिस पर्सन लगने वाले ने उठा लिया बेसबॉल बैट। भूख लगने पर फास्ट फूड रेस्टोरेंट में घुसता है। ब्रेकफस्ट ऑर्डर करता है, पर उसे कह दिया जाता है कि आप पांच मिनट लेट हो गए हैं, अब तो लंच मैन्यू ऑर्डर करना होगा। चेहरे पर बेशर्मी और जुबान पर 'सर' का संबोधन लिए ये मल्टीनेशनल फास्ट फूड चेन अपने किए को भुगतती है और विलियम का रौद्र रूप देखती है, कि कलेजे में ठंडक पड़ जाती है। तभी तो फॉलिंग डाउन अच्छी लगती है। ये तो हुई सिस्टम के खिलाफ हमारी और इस फिल्म के खून के रिश्ते की बात, पर मनोरंजन के लिहाज से भी इसमें रोमांच हर पल बना रहता है। माइकल डगलस को कोई अगर प्रमुख अमेरिकी अभिनेताओं में न गिनता हो तो उसे फॉलिंग डाउन देखनी चाहिए।

सही-गलत क्या है और कितना है, इस बहस के बीच हर 26 जनवरी और 15 अगस्त जैसे मौकों पर आखिर डीडी1 क्रांतिवीर ही क्यों दिखाता है, ये भी सोचने वाली बात है। आखिर मेहुल कुमार ने अपनी फिल्म में नायक प्रताप (नाना पाटेकर) के हाथों भ्रष्ट बताए गए नेताओं को अदालती न्याय के उलट गोलियां ही तो मरवाई थीं। सरकारें गांधी की अहिंसा के बीच और संविधान की सख्त लकीर के बीच क्या क्रांतिवीर के इस असंवैधानिक तत्व को देखना नहीं चाहती। या फिर मुझ कमजोर और सबल प्रताप के बीच होते कनेक्शननुमा एंटरटेनमेंट को वो भी प्रमुख मानती है।

बात साउथ की मूवीज से शुरू हुई थी, खत्म भी वहीं पर हो। शुरू-शुरू में इन फिल्मों की अजीब डबिंग भले ही परेशान करती हो और ये हिंदी फिल्मों से कमतर लगती हो पर मनोरंजन और कमर्शियल पहलुओं के लिहाज से ये फिल्में ज्यादा स्मार्ट साबित होती हैं। निश्चित तौर पर हिंसा इनमें बहुत ज्यादा होती है। अब ये हिंसा नाजायज न लगे इसलिए इस पर भावनाओं, रिश्तों, प्रतिशोध और प्रतिरोध का वर्क चढ़ाया जाता है। घटिया फिल्मों में भी ये होता है और सार्थक बातों के साथ आई मूवीज में भी। चिरंजीवी की इंद्र को ले लीजिए या फिर महेश बाबू के अभिनय वाली अर्जुन को। इनमें ऊपर जिक्र की गई फिल्मों की तरह व्यवस्था की कमजोरियां मुद्दा नहीं है। यहां मुद्दा ये है कि आम इंसान और लाइन में खड़े आखिरी दर्शक को कहां मनोरंजनयुक्त संतोष ज्यादा मिलता है। वो यहां मिलता है। इंद्र में इंद्रसेन की कहानी है। कैसे वाराणसी के घाट पर नाव खेने वाला नायक शुरू के कुछ वक्त हंसी-मजाक में आपका मनोरंजन करता है और उसके बाद ऐसे खुलासे होते हैं कि उसके लिए मन में श्रद्धा पैदा होती चली जाती है। उसका सशक्त व्यक्तित्व और देवताओं जैसी इमेज बनती चली जाती है। वजह होती है उसका दूसरों की मदद करना, अपनों के लिए बड़ा त्याग करना और वचन के लिए अपनी जान तक लड़ा देना। थियेटर आने वाले दर्शक की इन मूल्यों के साथ गर्भनाल जुड़ी है। ये और बात है कि अब इन्हें निभा पाना उसके लिए बड़ा मुश्किल हो गया है। ऐसे में अगर इंद्रसेन जैसा किरदार उसका ही होने का दावा करता है तो तीन घंटे वो खुश हो जाता है। अब आते हैं अर्जुन (महेश बाबू) पर। अपनी बहन की रक्षा करने वाला चतुर नौजवान। एक ऐसा नौजवान जो बस जीतता ही है। बहन के सास-ससुर अपनी बहु को मारकर बेटे की दूसरी शादी कर देना चाहते हैं पर अर्जुन मुझ दर्शक की तरह भोला नहीं है। दुश्मनों से दस कदम वह आगे ही चलता है।

देखिए बात सीधी सी है। हिंदी मूवीज में एक बैलेंस बनाने के लिए हीरो को पिटते और एक मोड़ पर हारते भी दिखाया जाता है, पर साउथ के फिल्ममेकर और कथाकार इस बात को समझते हैं कि एक रिक्शेवाला और एक मजदूर दिन भर की निराशा और कड़ी मेहनत के बाद एक अच्छी दुनिया में जाने के लिए अपने खून-पसीने की कमाई लगाना चाहता है। एक ऐसी दुनिया में जहां सारी मुश्किलों को हल होते दिखाया जाता हो। जहां आखिर में सब खुश हों। सब बुरों को उनके किए की सजा दी जाए और भलों को शाबासी। इसी वजह से गजनी में संजय सिंघानिया और वॉन्टेड में राधे सिर्फ मारते ही हैं, मार खाते नहीं हैं। साउथ की फिल्में कमजोर की मां इसलिए भी बनती हैं, कि हर फिल्म में सिस्टम और समाज में फैली बुराइयों को भी पिरोया जाता है। हिंदी मूवीज ने बरास्ते गजनी, वॉन्टेड और रेडी मनोरंजन के स्वर को तो पकड़ लिया है, पर भ्रष्टाचार, नैतिक मूल्य और अन्याय को उसके मूल रूप में पटकथा में जगह दे पाना उसे अभी सीखना है।

गजेंद्र सिंह भाटी